হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (10108)


10108 - عن ابن عباس قال: كنت ألعب مع الصبيان فجاء رسول الله صلى الله عليه وسلم فتواريت خلف باب، قال: فجاء فحطأني حطأة، وقال:"اذهب وادع لي معاوية" قال: فجئت فقلت: هو يأكل، قال: ثمّ قال لي:"اذهب وادع لي معاوية" قال: فجئت فقلت: هو يأكل، فقال:"لا أشبع الله بطنه".

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (96: 2604) من طرق عن أمية بن خالد، حَدَّثَنَا شعبة، عن أبي حمزة القصاب، عن ابن عباس فذكره.

ورواه أحمد (2651) من طرق آخر عن ابن عباس مختصرًا، وفيه قال ابن عباس"وكان كاتبه" يعني معاوية.

وقوله:"فحطأني حطأة" الحطء: الدفع بالكف.

قوله:"لا أشبع الله بطنه" إن هذا الدعاء عليه سيجعله يوم القيامة صلاة وزكاة وقربة كما جاء في الصحيحين وغيرهما منها حديث أنس بن مالك مرفوعًا:"يا أم سليم! أما تعلمين أن شرطي على ربي، أني اشترطت على ربي فقلت: إنّما أنا بشر أرضى كما يرضى البشر، وأغضب كما يغضب البشر، فأيما أحد دعوت عليه من أمتي بدعوة ليس لها بأهل أن يجعلها له طهورًا وزكاة وقربة، يقربه بها منه يوم القيامة".




আব্দুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি তখন শিশুদের সাথে খেলছিলাম। এমন সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন। আমি একটি দরজার পিছনে লুকিয়ে গেলাম। তিনি এলেন এবং আমাকে মৃদু ধাক্কা দিলেন এবং বললেন, "যাও, মু'আবিয়াকে আমার কাছে ডেকে আনো।" তিনি (ইবন আব্বাস) বলেন, আমি ফিরে এসে বললাম, তিনি খাচ্ছেন। এরপর তিনি আমাকে আবার বললেন, "যাও, মু'আবিয়াকে আমার কাছে ডেকে আনো।" তিনি বলেন, আমি পুনরায় ফিরে এসে বললাম, তিনি খাচ্ছেন। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহ যেন তার পেট পূর্ণ না করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10109)


10109 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: بعث رسول صلى الله عليه وسلم إلى معاوية، وكان كاتبه.

حسن: رواه البزّار (2491) - واللّفظ له - والطَّبرانيّ في الكبير (14/ 554) كلاهما من طريق سليمان الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن عبد الله بن الحارث، عن عبد الله بن مالك الزبيدي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن مالك الزبيدي فإنه حسن الحديث، وهو أبو كثير الزبيدي، واختلف في اسمه فقيل عبد الله بن مالك كما عند البزّار، وقيل: زهير بن الأقمر كما عند الطبراني، وثّقه النسائيّ والعجلي وابن حبَّان.
وحسّنه الهيثميّ في"المجمع" (9/ 357) فقال:"رواه الطبرانيّ وإسناده حسن".

وأمّا ما رُوي عن عبد الرحمن بن أبي عميرة وكان من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أنه قال لمعاوية:"اللهم اجعله هاديًا مهديًا واهد به". فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (3842)، وأحمد (17895) كلاهما من طريق سعيد بن عبد العزيز، عن ربيعة بن يزيد، عن عبد الرحمن بن أبي عميرة قال: فذكره.

وسعيد بن عبد العزيز هو التنوخي الدّمشقيّ اختلط في آخر عمره، ولم يدر كل من روى عنه هذا الحديث متى سمع منه قبل الاختلاط أو بعده.

ولذا وقع في هذا الحديث اضطراب شديد في الإسناد واللّفظ، وقد أشار إليه ابن عبد البر في الاستيعاب، وابن حجر في الإصابة.

وقال في الفتح (7/ 114):"وقد ورد في فضائل معاوية أحاديث كثيرة لكن ليس فيها ما يصح من طريق الإسناد، وبذلك جزم إسحاق بن راهويه، والنسائي وغيرهما".

وأمّا الاختلاف في صحبة عبد الرحمن بن أبي عميرة فالصحيح أنه له صحبة.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে (দূত) প্রেরণ করলেন। তিনি ছিলেন তাঁর (রাসূলের) লেখক।









আল-জামি` আল-কামিল (10110)


10110 - عن ابن أبي مليكة قال: أوتر معاوية بعد العشاء بركعة وعنده مولى لابن عباس، فأتى ابن عباس، فقال: دعه فإنه صحب رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه البخاريّ في فضائل الصّحابة (3764) عن الحسن بن بشر المعافى عن عثمان بن الأسود، عن ابن أبي مليكة قال: فذكره.

وفي لفظ:"قيل لابن عباس: هل لك في أمير المؤمنين معاوية، فإنه ما أوتر إِلَّا بواحدة، قال: إنه فقيه". رواه البخاريّ في فضائل الصّحابة (3765) من وجه آخر عن ابن أبي مليكة به.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনে আবি মুলাইকা বলেন: মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এশার পর এক রাকাত বিতর পড়লেন। ইবনে আব্বাসের এক আযাদকৃত গোলাম তার নিকট ছিল। সে ইবনে আব্বাসের নিকট এসে (তাকে তা জানাল)। তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: তাকে (এরূপ করতে) দাও। কেননা সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহচর্য লাভ করেছে।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলো, আমীরুল মুমিনীন মুআবিয়ার ব্যাপারে আপনার কী অভিমত, তিনি তো শুধু এক রাকাত বিতর আদায় করেন? তিনি বললেন: তিনি নিঃসন্দেহে ফকীহ (ইসলামী আইনজ্ঞ)।









আল-জামি` আল-কামিল (10111)


10111 - عن المغيرة بن شعبة قال: ما سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم أحد عن الدَّجال أكثر مما سألته عنه، فقال لي:"أي بني، وما ينصبك منه، إنه لن يضرّك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7122)، ومسلم في الآداب (32: 2152) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن المغيرة بن شعبة قال: فذكره. واللّفظ لمسلم ولفظ البخاريّ نحوه.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাজ্জাল সম্পর্কে যত বেশি প্রশ্ন আমি করেছি, অন্য কেউ তত বেশি প্রশ্ন করেনি। অতঃপর তিনি আমাকে বললেন: "হে আমার বৎস, তুমি কেন তার ব্যাপারে এত চিন্তিত? নিশ্চয়ই সে তোমার কোনো ক্ষতি করতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (10112)


10112 - عن عبد الله بن مسعود قال: شهدت من المقداد بن الأسود مشهدًا لأن أكون صاحبه أحب إلي مما عدل به: أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وهو يدعو على المشركين فقال: لا نقول
كما قال قوم موسى: اذهب أنت وربك فقاتلا، ولكنا نقاتل عن يمينك وعن شمالك وبين يديك وخلفك، فرأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أشرق وجهه وسره، يعني قوله.

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (3952) عن أبي نعيم، حَدَّثَنَا إسرائيل، عن مخارق، عن طارق بن شهاب قال: سمعت ابن مسعود يقول: فذكره.

وقوله:"وهو يدعو على المشركين" يعني يوم بدر على كفار مكة كما ورد في أحاديث أخرى.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এমন একটি দৃশ্যের সাক্ষী হয়েছিলাম যে, ঐ দৃশ্যে আমি তাঁর সঙ্গী হতে পারলে তা আমার কাছে তার বিনিময়ে যা কিছু গণ্য হতো, তার চেয়েও বেশি প্রিয় হতো। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন, যখন তিনি মুশরিকদের বিরুদ্ধে বদদোয়া করছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমরা মূসার কওম যা বলেছিল, তা বলব না: ‘তুমি এবং তোমার প্রতিপালক যাও, আর যুদ্ধ করো।’ বরং আমরা আপনার ডান দিক থেকে, বাম দিক থেকে, আপনার সামনে থেকে এবং আপনার পিছন দিক থেকে যুদ্ধ করব। তখন আমি দেখলাম, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা উজ্জ্বল হয়ে উঠল এবং তিনি আনন্দিত হলেন— অর্থাৎ তাঁর (মিকদাদের) এই কথায়।









আল-জামি` আল-কামিল (10113)


10113 - عن المقداد قال: أقبلت أنا وصاحبان لي وقد ذهبت أسماعنا وأبصارنا من الجهد، فجعلنا نعرض أنفسنا على أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فليس أحد منهم يقبلنا، فأتينا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فانطلق بنا إلى أهله، فإذا ثلاثة أعنز، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"احتلبوا هذا اللبن بيننا". قال: فكنا نحتلب فيشرب كل إنسان منا نصيبه، ونرفع للنبي صلى الله عليه وسلم نصيبه، قال: فيجيء من الليل فيسلم تسليما لا يوقظ نائما، ويسمع اليقظان، قال: ثمّ يأتي المسجد فيصلي، ثمّ يأتي شرابه فيشرب، فأتاني الشّيطان ذات ليلة، وقد شربت نصيبي، فقال: محمد يأتي الأنصار فيتحفونه، ويصيب عندهم، ما به حاجة إلى هذه الجرعة، فأتيتها فشربتها، فلمّا أن وغلت في بطني، وعلمت أنه ليس إليها سبيل، قال: ندمني الشّيطان، فقال: ويحك ما صنعت؟ أشربت شراب محمد؟ فيجيء فلا يجده، فيدعو عليك فتهلك، فتذهب دنياك وآخرتك؟ وعليّ شملة، إذا وضعتها على قدمي خرج رأسي، وإذا وضعتها على رأسي خرج قدماي، وجعل لا يجيئني النوم، وأمّا صاحباي فناما ولم يصنعا ما صنعت، قال: فجاء النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فسلم كما كان يسلم، ثمّ أتى المسجد فصلى، ثمّ أتى شرابه، فكشف عنه فلم يجد فيه شيئًا، فرفع رأسه إلى السماء، فقلت: الآن يدعو عليّ فأهلك، فقال:"اللهم! أطعم من أطعمني وأسق من أسقاني". قال: فعمدت إلى الشملة فشددتها علي، وأخذت الشفرة فانطلقت إلى الأعنز أيها أسمن فأذبحها لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فإذا هي حافلة، وإذا هن حفل كلهن، فعمدت إلى إناء لآل محمد صلى الله عليه وسلم ما كانوا يطعمون أن يحتلبوا فيه، قال: فحلبت فيه حتَّى علته رغوة، فجئت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"أشربتم شرابكم الليلة؟". قال: قلت: يا رسول الله! اشرب، فشرِب، ثمّ ناولني فقلت: يا رسول الله! اشرب، فشرِب، ثمّ ناولني، فلمّا عرفت أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قد روى، وأصبت في عوته، ضَحِكْتُ حتَّى ألقيت إلى الأرض، قال: فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إحدى سوآتك يا مقداد!". فقلت: يا رسول الله! كان من أمري كذا وكذا، وفعلت كذا، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"ما هذه إِلَّا رحمة
من الله، أفلا كنت آذنتني فنوقظ صاحبينا فيصيبان منها؟". قال: فقل: والذي بعثك بالحق ما أبالي إذا أصبتها وأصبتها معك من أصابها من الناس.

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (174: 2055) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا شبابة بن سوّار، حَدَّثَنَا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن المقداد قال: فذكره.




মিকদাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং আমার দুই সঙ্গী (মদীনায়) আগমন করলাম, তখন আমরা ক্ষুধার তাড়নায় এমন অবস্থায় ছিলাম যে আমাদের (শুনার ও দেখার শক্তি কমে) চক্ষু ও কর্ণ দুর্বল হয়ে গিয়েছিল। আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের কাছে নিজেদেরকে পেশ করছিলাম, কিন্তু আমাদের কাউকে কেউ গ্রহণ করলেন না। অতঃপর আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তিনি আমাদের নিয়ে তাঁর পরিবারের নিকট গেলেন। সেখানে তিনটি ছাগল ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা এই দুধ আমাদের সকলের মধ্যে ভাগ করে নাও।"

তিনি বলেন: আমরা দুধ দোহন করতাম এবং আমাদের প্রত্যেকে তার অংশ পান করত। আর আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশ তাঁর জন্য উঠিয়ে রাখতাম। তিনি বলেন: তিনি রাতে আগমন করতেন এবং এমনভাবে সালাম দিতেন যে, ঘুমন্ত ব্যক্তি জেগে উঠত না, কিন্তু জাগ্রত ব্যক্তি শুনতে পেত। তিনি বলেন: অতঃপর তিনি মসজিদে এসে সালাত আদায় করতেন, তারপর এসে তাঁর পানীয় পান করতেন।

এক রাতে আমি আমার অংশ পান করার পর শয়তান আমার কাছে এল এবং বলল: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের কাছে আসেন। তারা তাঁকে উপহার দেয় এবং তিনি তাদের নিকট থেকে প্রাপ্ত হন। তাঁর এই সামান্য দুধের প্রয়োজন নেই। তখন আমি সেটির কাছে গেলাম এবং তা পান করে ফেললাম। যখন তা আমার পেটে গেল এবং আমি বুঝলাম যে, এখন আর ফেরার পথ নেই, তখন শয়তান আমাকে অনুতপ্ত করে বলল: তোমার সর্বনাশ হোক! তুমি কী করলে? তুমি কি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পানীয় পান করেছ? তিনি এসে যখন তা পাবেন না, তখন তোমার বিরুদ্ধে বদদু’আ করবেন, ফলে তুমি ধ্বংস হয়ে যাবে এবং তোমার দুনিয়া ও আখিরাত সব নষ্ট হয়ে যাবে।

আর আমার গায়ে একটি চাদর ছিল, যা আমি পায়ে দিলে মাথা বের হয়ে যেত এবং মাথায় দিলে পা বেরিয়ে যেত। আমার ঘুম আসছিল না। কিন্তু আমার দুই সঙ্গী ঘুমিয়ে পড়ল এবং তারা আমার মতো কাজ করেনি।

তিনি বলেন: অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং আগের মতোই সালাম দিলেন। তারপর মসজিদে এসে সালাত আদায় করলেন। তারপর এসে তাঁর পানীয়ের পাত্রের ঢাকনা সরালেন এবং তাতে কিছু পেলেন না। তিনি তাঁর মাথা আকাশের দিকে উঠালেন। আমি মনে মনে বললাম: এইবার তিনি আমার বিরুদ্ধে বদদু’আ করবেন, ফলে আমি ধ্বংস হয়ে যাব। তখন তিনি দু’আ করলেন: "হে আল্লাহ! যে আমাকে আহার করাবে, তাকে তুমি আহার করাও, আর যে আমাকে পান করাবে, তাকে তুমি পান করাও।"

তিনি বলেন: তখন আমি আমার গায়ের চাদরটি শক্ত করে বাঁধলাম, ছুরি নিলাম এবং ছাগলগুলোর দিকে গেলাম—কোনটি বেশি মোটা তা দেখার জন্য, যাতে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য তা যবেহ করতে পারি। কিন্তু দেখলাম, সবগুলো ছাগলের ওলান দুধে ভরা এবং সবগুলিই পূর্ণ দুধের। তখন আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের একটি পাত্রের দিকে গেলাম, যাতে তারা কখনও দুধ দোহন করতেন না। তিনি বলেন: আমি তাতে এত বেশি দুধ দোহন করলাম যে, তার উপরে ফেনা জমে গেল। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "আজ রাতে তোমরা কি তোমাদের পানীয় পান করেছ?"

আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! পান করুন। তিনি পান করলেন, তারপর আমাকে দিলেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! পান করুন। তিনি আবার পান করলেন, তারপর আমাকে দিলেন। যখন আমি বুঝলাম যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তৃপ্ত হয়েছেন এবং আমি তাঁর কাছে (দুধ ফিরিয়ে দিয়ে) আমার মনোবাসনা পূর্ণ করতে পেরেছি, তখন আমি এমনভাবে হাসলাম যে মাটিতে লুটিয়ে পড়লাম। তিনি বলেন: তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে মিকদাদ! এ তোমার বদ অভ্যাসগুলোর একটি!" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমার ঘটনা এমন এমন হয়েছিল এবং আমি এই এই কাজ করেছিলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ তো আল্লাহর পক্ষ থেকে রহমত! তুমি আমাকে কেন জানালে না যে, আমরা আমাদের দুই সঙ্গীকে জাগিয়ে তুলতাম, যাতে তারাও পান করতে পারত?" তিনি (মিকদাদ) বলেন: আমি বললাম: সেই সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন! যখন আমি তা পেয়েছি এবং আপনার সঙ্গে তা পান করতে পেয়েছি, তখন অন্য কেউ তা পান করুক বা না করুক—তাতে আমার কোনো পরোয়া নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (10114)


10114 - عن خالد بن معدان قال: وفد المقدام بن معد يكرب، وعمرو بن الأسود، ورجل من بني أسد من أهل قنسرين إلى معاوية بن أبي سفيان. فقال معاوية للمقدام: أعلمت أن الحسن بن عليّ توفي؟ فرجع المقدام. فقال له رجل: أتراها مصيبة؟ قال له: ولم لا أراها مصيبة، وقد وضعه رسول الله صلى الله عليه وسلم، في حجره فقال:"هذا مني، وحسين من عليّ!" فقال الأسدي: جمرة أطفأها الله عز وجل، قال: فقال المقدام: أما أنا فلا أبرح اليوم حتَّى أغيظك، وأسمعك ما تكره، ثمّ قال: يا معاوية! إن أنا صدقت فصدقني، وإن أنا كذبت فكذبني، قال: أفعل، قال: فأنشدك بالله، هل تعلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، نهى عن لبس الذهب؟ قال: نعم، قال: فأنشدك بالله، هل تعلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، نهى عن لبس الحرير؟ قال: نعم، قال: فأنشدك بالله، هل تعلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم، نهى عن لبس جلود السباع والركوب عليها؟ قال: نعم، قال: فوالله! لقد رأيت هذا كله في بيتك يا معاوية، فقال معاوية: قد علمت أني لن أنجو منك يا مقدام، قال خالد: فأمر له معاوية، بما لم يأمر لصاحبيه، وفرض لابنه في المائتين، ففرقها المقدام في أصحابه، قال: ولم يعط الأسدي أحدًا شيئًا مما أخذ، فبلغ ذلك معاوية فقال: أما المقدام فرجل كريم بسط يده، وأمّا الأسدي فرجل حسن الإمساك لشيئه.

حسن: رواه أبو داود (4131)، وأحمد (17189)، والطَّبرانيّ في الكبير (20/ 269) كلّهم من طرق، عن بقية بن الوليد، حَدَّثَنَا بحير بن سعد، عن خالد بن معدان قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد، وقد تقبل عنعنته مطلقًا، إذا روى عن بحير بن سعد قاله ابن عبد الهادي في تعليقه على علل ابن أبي حاتم.

وهنا روى عن بحير بن سعد مصرحا بالتحديث، والجمهور على أن تصريح بقية عن شيخه ينفي عنه التدليس.

وذكره الذّهبيّ في السير (3/ 258) وقال:"وإسناده قوي".




মিকদাম ইবনু মা'দীকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি, আমর ইবনুল আসওয়াদ এবং কিন্নাসরীনের অধিবাসী বনূ আসাদ গোত্রের এক ব্যক্তি মু'আবিয়া ইবনু আবূ সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রতিনিধি হিসেবে আগমন করলেন। তখন মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিকদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, আপনি কি জানেন যে হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তেকাল করেছেন?

মিকদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (তা শুনে বিমর্ষ হলেন)। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে বলল, আপনি কি একে মুসীবত মনে করছেন? তিনি বললেন, কেন আমি একে মুসীবত মনে করব না? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তো তাঁকে স্বীয় কোলে বসিয়ে বলেছিলেন: "এ (হাসান) আমার থেকে, আর হুসাইন আলীর থেকে!"

আসাদী লোকটি বলল, এ তো এমন এক অগ্নিস্ফুলিঙ্গ, যা আল্লাহ তা'আলা নিভিয়ে দিয়েছেন।

মিকদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আজ আমি তোমাকে রাগানো এবং তোমার অপছন্দের কথা না শুনিয়ে যাব না।' এরপর তিনি মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, 'হে মু'আবিয়া! আমি যদি সত্য বলি, তবে আপনি আমাকে সত্যবাদী বলে স্বীকার করুন, আর যদি মিথ্যা বলি তবে মিথ্যা প্রতিপন্ন করুন।' মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আমি তাই করব।'

মিকদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আমি আপনাকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, আপনি কি জানেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সোনা পরিধান করতে নিষেধ করেছেন?' তিনি বললেন, 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন, 'আমি আপনাকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, আপনি কি জানেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রেশম পরিধান করতে নিষেধ করেছেন?' তিনি বললেন, 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন, 'আমি আপনাকে আল্লাহর কসম দিয়ে জিজ্ঞেস করছি, আপনি কি জানেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হিংস্র জন্তুর চামড়া পরিধান করতে ও তার উপর আরোহণ করতে নিষেধ করেছেন?' তিনি বললেন, 'হ্যাঁ।'

মিকদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আল্লাহর শপথ! হে মু'আবিয়া! আমি আপনার ঘরে এসব কিছুই দেখেছি।'

মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'আমি জানতাম, হে মিকদাম! আমি আপনার কাছ থেকে রেহাই পাব না।'

[বর্ণনাকারী] খালিদ বললেন, এরপর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে (মিকদামকে) তাঁর সাথীদ্বয়ের চেয়ে বেশি দান করার নির্দেশ দিলেন এবং তাঁর ছেলের জন্য দু'শ (দিরহাম) বরাদ্দ করলেন। মিকদাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই অর্থ তাঁর সাথীদের মধ্যে বিতরণ করে দিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, কিন্তু আসাদী লোকটি তার প্রাপ্ত সম্পদের কিছুই কাউকে দেয়নি। এ খবর মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি বললেন, 'মিকদাম তো একজন উদার ব্যক্তি, যে তার হাত খুলে দেয়। আর আসাদী লোকটি তো নিজের সম্পদ ধরে রাখতে পছন্দ করে এমন ব্যক্তি।'









আল-জামি` আল-কামিল (10115)


10115 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: - في قصة وفد عبد القيس - قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأشج عبد القيس:"إنَّ فيك لخصلتين يحبهما الله: الحلم والأناة".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (18: 26) عن يحيى بن أيوب، حَدَّثَنَا ابن علية، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروة، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ قال: فذكره. والحديث بطوله مذكور في الإيمان وسيرة الرسول.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আব্দুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধি দলের ঘটনা প্রসঙ্গে) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল কায়েসের আশাজ্জকে বললেন: "নিশ্চয় তোমার মধ্যে এমন দুটি গুণ রয়েছে যা আল্লাহ ভালোবাসেন: ধৈর্য (সহনশীলতা) এবং ধীরস্থিরতা।"









আল-জামি` আল-কামিল (10116)


10116 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للأشج - أشج عبد القيس:"إنَّ فيك خصلتين يحبهما الله: الحلم والأناة".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (17: 25) من طرق، عن قرة بن خالد، عن أبي جمرة، عن ابن عباس قال: فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আশাজ্জ (আশাজ্জ আব্দুল কায়স)-কে বললেন: "নিশ্চয়ই তোমার মধ্যে দুটি গুণ আছে যা আল্লাহ পছন্দ করেন: ধৈর্য (হিলম) এবং ধীরস্থিরতা (আনাতাহ)।”









আল-জামি` আল-কামিল (10117)


10117 - عن أشج بني عصر: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ فيك لخلقين يحبهما الله". قال: قلت: ما هما؟ قال:"الحلم والحياء". قال: قلت: أقديما كانا أو حديثًا؟ قال:"لا، بل قديمًا". قلت: الحمد الله جبلني على خُلُقين يحبهما الله.

صحيح: رواه ابن أبي شيبة (25851)، وأحمد (17828)، والبخاري في الأدب المفرد (584)، والنسائي في فضائل الصّحابة (201) كلّهم من طريق يونس (هو ابن عبيد)، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة قال: قال أشج بني عصر فذكره. وإسناده صحيح.

وأشج بني عصر اسمه: المنذر بن عائذ بن العصري المعروف بأشج عبد القيس، وأمّا الهيثميّ فزعم في"المجمع" (9/ 388):"أن عبد الرحمن بن أبي بكرة لم يدرك أشج عبد القيس".




আশাজ্জ বনী আসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই তোমার মধ্যে এমন দুটি স্বভাব রয়েছে, যা আল্লাহ পছন্দ করেন।" তিনি [আশাজ্জ] বললেন, আমি বললাম: সেগুলো কী? তিনি [রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] বললেন: "ধৈর্য (সহনশীলতা) ও লজ্জা (হায়া/শালীনতা)।" তিনি [আশাজ্জ] বললেন, আমি বললাম: এ স্বভাব দুটি কি জন্মগত (আদিম) না সম্প্রতি অর্জিত (নতুন)? তিনি বললেন: "না, বরং জন্মগত (আদিম)।" আমি বললাম: সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমাকে এমন দুটি স্বভাবের ওপর সৃষ্টি করেছেন যা তিনি পছন্দ করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10118)


10118 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأشج عبد القيس:"إنَّ فيك خصلتين يحبهما الله: الحلم والأناة".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (14/ 247) وفي الأوسط (5723) من طرق، عن نعيم بن يعقوب ويحيى بن طلحة اليربوعي قالا: حَدَّثَنَا فضيل بن عياض، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن ابن عمر قال: فذكره.

نعيم بن يعقوب: هو ابن أخت سفيان بن عيينة ذكره ابن حبَّان في الثّقات، وقال العقيلي: لا يتابع على حديثه. لكنه توبع في هذا الحديث، تابعه يحيى بن طلحة اليربوعي قال فيه الحافظ: لين الحديث.

قال الهيثميّ في"المجمع" (9/ 388):"رواه الطبرانيّ من طريقين، ورجال أحدهما رجال الصَّحيح غير نعيم بن يعقوب وهو ثقة، ورواه في الأوسط من طريق حسنة الإسناد".

وفي معناه عن الوازع بن زارع يقول: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم والأشج المنذر بن عامر أو عائذ بن
المنذر، ومعهم رجل مصاب، فانتهوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فلمّا رأوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وثبوا عن رواحلهم، فقبلوا يده، ثمّ نزل الأشجّ، فعقل راحلته، وأخرج عيبته ففتحها، فأخرج ثوبين أبيضين من ثيابه فلبسهما، ثمّ أتى رواحلهم فعقلها، فأتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"يا أشج! إن فيك خصلتين يحبهما الله ورسوله: الحلم والأناة". فقال: يا رسول الله! أنا تخلقتهما، أو جبلني الله عليهما؟ قال:"بل الله جبلك عليهما". قال: الحمد لله الذي جبلني على خُلُقين يحبهما الله ورسوله.

فقال الوازع: يا رسول الله، إن معي خالًا لي مصابًا فادع الله له، فقال:"أين هو؟ ائتني به". قال: فصنعت مثل ما صنع الأشجّ، ألبسته ثوبيه فأتيته، فأخذ من ردائه يرفعها حتَّى رأينا بياض إبطه، ثم ضرب بظهره فقال:"اخرج عدو الله". فولى وجهه وهو ينظر بنظر رجل صحيح.

رواه أحمد (39/ 490) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، ثنا مطر بن عبد الرحمن، سمعت هند بنت الوازع أنها سمعت الوازع يقول: فذكره.

وهند بنت الوازع: تكنى بأم أبان لم يرو عنها غير مطر بن عبد الرحمن، ولم أجد بينهما جرحا ولا تعديلًا. وذكرها الذّهبيّ في المجهولات، وقال: تفرّد عنهما مطر الأعنق" الميزان (11004).

وأمّا الحافظ ابن حجر فقال:"مقبولة" أي عند المتابعة ولم أجد لها متابعًا.

ومع ذلك فقد اختلف عليها. فمرة رُوي عنها عن أبيها الوازع كما هنا، ومرة رُوي عنها عن جدها زارع كما عند أبي داود (5225)، ومرة رُوي عنها عن أبيها، عن جدها كما عند الطبرانيّ في الكبير (5/ 3




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আশাজ্জ আব্দুল ক্বায়েসকে বললেন: "নিশ্চয় তোমার মধ্যে এমন দুটি গুণ রয়েছে যা আল্লাহ পছন্দ করেন: সহনশীলতা এবং ধীরস্থিরতা।"









আল-জামি` আল-কামিল (10119)


10119 - عن أم عاصم، وهي أم ولد سنان بن سلمة بن المحبق الهذلي قالت: دخل علينا نبيشة، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم سماه نبيشة الخير، دخل على رسول الله صلى الله عليه وسلم وعنده أسارى، يا رسول الله، إما أن تمنّ عليهم وإما أن تفاديهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرتَ بخير، أنت نبيشة الخير بعد ذلك".

حسن: رواه الحاكم (3/ 463) عن عبد الله بن محمد بن موسى العدل، ثنا محمد بن أيوب، ثنا عيسى بن إبراهيم البَركي، ثنا المعلى بن راشد النبال أبو اليمان، حدثتني أم عاصم فذكرته. وإسناده حسن لأن غالب رجال الإسناد صدوق.

وأم عاصم جدة المعلي بن راشد تابعية روت عن عدد من الصّحابة كما روى عنها عدد من
الرواة، ومدار هذا الخبر عليها، وشهرة نبيشة الخير تُغني عن جهالة حال أم عاصم. وبالله التوفيق.




নুবায়শাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (উম্মে আসিম, যিনি সিনান ইবনু সালামাহ ইবনুল মুহাব্বাক আল-হুযালীর উম্মে ওয়ালাদ ছিলেন, তিনি বলেন) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে নুবায়শাহ আল-খাইর (কল্যাণময় নুবায়শাহ) নামে নামকরণ করেছিলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন, যখন তাঁর কাছে কিছু বন্দী ছিল। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! হয় আপনি তাদের প্রতি অনুগ্রহ করে মুক্ত করে দিন, অথবা তাদের মুক্তিপণ গ্রহণ করুন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি কল্যাণের নির্দেশ দিয়েছ। এরপর থেকে তুমিই নুবায়শাহ আল-খাইর (কল্যাণময় নুবায়শাহ)।









আল-জামি` আল-কামিল (10120)


10120 - عن أبي عقيل أنه كان يخرج به جده عبد الله بن هشام من السوق أو إلى السوق، فيشتري الطعام، فيلقاه ابن الزُّبير وابن عمر فيقولان: أشركنا، فإن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قد دعا لك بالبركة، فيشركهم، فربما أصاب الراحلة كما هي، فيبعث بها إلى المنزل.

صحيح: رواه البخاريّ في الدعوات (6353) عن عبد الله بن يوسف حَدَّثَنَا ابن وهب حَدَّثَنَا سعيد بن أبي أيوب عن أبي عقيل فذكره.

ذهبتْ به أمه زينب بنت حُميد إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وهو صغير، فمسح رأسه، ودعا له بالبركة.




আব্দুল্লাহ ইবনে হিশাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নাতি আবূ আকীল বলেন, তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে হিশাম) তাঁকে (আবূ আকীলকে) সঙ্গে নিয়ে বাজার থেকে বের হতেন অথবা বাজারের দিকে যেতেন এবং খাদ্যশস্য কিনতেন। তখন ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতেন এবং বলতেন: "আমাদেরকেও অংশীদার করুন, কারণ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আপনার জন্য বরকতের দোয়া করেছেন।" তখন তিনি তাদেরকে অংশীদার করে নিতেন। ফলে কখনো কখনো তিনি (খাদ্যশস্য বোঝাই) বাহনটি সম্পূর্ণ যেমন ছিল তেমনই লাভ করতেন, আর তিনি তা বাড়িতে পাঠিয়ে দিতেন।

(এই বরকতের কারণ উল্লেখ করে) তাঁকে তাঁর মা যাইনাব বিনত হুমাইদ ছোটবেলায় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট নিয়ে গিয়েছিলেন। তখন তিনি তাঁর মাথায় হাত বুলিয়ে দেন এবং তাঁর জন্য বরকতের দোয়া করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10121)


10121 - عن عائشة في قصة أول ما بدئ به الوحي قالت: فانطلقت به خديجة حتَّى أتت به ورقة بن نوفل بن أسد بن عبد العزى ابن عم خديجة، وكان امرءا تنصر في الجاهليّة، وكان يكتب الكتاب العبراني، فيكتب من الإنجيل بالعبرانية ما شاء الله أن يكتب، وكان شيخًا كبيرًا قد عمي، فقالت له خديجة: يا ابن عم! اسمع من ابن أخيك، فقال له ورقة: يا ابن أخي ماذا ترى؟ فأخبره رسول الله صلى الله عليه وسلم خبر ما رأى، فقال له ورقة: هذا الناموس الذي نزل الله على موسى، يا ليتني فيها جذعا، ليتني أكون حيا إذ يخرجك قومك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أو مخرجي هم؟". قال: نعم، لم يأت رجل قطّ بمثل ما جئت به إِلَّا عودي، وإن يدركني يومك أنصرك نصرا مؤزرا،
ثمّ لم ينشب ورقة أن توفي وفتر الوحي.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (3)، ومسلم في الإيمان (160) كلاهما من حديث اللّيث بن سعد، عن عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن عروة يقول: سمعت عائشة فذكرت الحديث، واللّفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.

ففيه أن ورقة أقرّ بنبوته ومات قبل أن يدعو الرسول صلى الله عليه وسلم الناس إلى الإسلام.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ওহী শুরু হওয়ার প্রথম ঘটনা প্রসঙ্গে তিনি বলেন: খাদিজা তাঁকে (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) নিয়ে গেলেন ওয়ারাকা ইবনু নাওফাল ইবনু আসাদ ইবনু আবদুল উযযার নিকট, যিনি ছিলেন খাদিজার চাচাতো ভাই। তিনি জাহেলিয়াতের যুগে খ্রিষ্টধর্ম গ্রহণ করেছিলেন এবং তিনি ইবরানী (হিব্রু) ভাষায় কিতাব লিখতেন। আল্লাহর ইচ্ছায় তিনি ইঞ্জিল কিতাব থেকে ইবরানী ভাষায় যা ইচ্ছা তা লিখতেন। তিনি ছিলেন একজন অতি বৃদ্ধ ব্যক্তি, যিনি অন্ধ হয়ে গিয়েছিলেন।

তখন খাদিজা তাঁকে বললেন: হে চাচাতো ভাই! আপনার ভাতিজার কথা শুনুন। তখন ওয়ারাকা তাঁকে বললেন: হে ভাতিজা! তুমি কী দেখছো? তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে তাঁর দেখা সব খবর জানালেন। তখন ওয়ারাকা তাঁকে বললেন: ইনি সেই ‘নামূস’ (ফেরেশতা) যিনি আল্লাহ তাআলা মূসার (আঃ) উপর নাযিল করেছিলেন। হায়! যদি আমি সেই সময় যুবক থাকতাম! হায়! যদি আমি সেই সময় জীবিত থাকতাম, যখন তোমার কওম তোমাকে বের করে দেবে!

তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা কি আমাকে বের করে দেবে?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। আপনি যা নিয়ে এসেছেন, এমন কিছু নিয়ে যে কেউ এসেছেন, তাকে শত্রুতা করা হয়েছে (বা তার বিরুদ্ধাচরণ করা হয়েছে)। আর যদি আমি তোমার সেই দিনটি পাই, তবে আমি তোমাকে জোরালোভাবে সাহায্য করব।

এরপর বেশি দেরি না করেই ওয়ারাকা ইন্তেকাল করলেন এবং ওহী আসা বন্ধ হয়ে গেল।

[মুত্তাফাকুন আলাইহি: এ হাদীসটি ইমাম বুখারী (৩) ঈমান অধ্যায়ে এবং ইমাম মুসলিম (১৬০) ঈমান অধ্যায়ে বর্ণনা করেছেন। দু’জনই লাইস ইবনু সা'দ থেকে, তিনি উকাইল ইবনু খালিদ থেকে, তিনি ইবনু শিহাব থেকে, তিনি উরওয়া থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ হাদীস বলতে শুনেছেন। এখানে ব্যবহৃত শব্দগুলো ইমাম বুখারীর এবং ইমাম মুসলিমের শব্দগুলোও প্রায় একই।
সুতরাং এতে প্রমাণিত হয় যে, ওয়ারাকা তাঁর নবুয়তকে স্বীকার করেছিলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষকে ইসলামের দিকে আহ্বান করার আগেই তিনি মৃত্যুবরণ করেন।]









আল-জামি` আল-কামিল (10122)


10122 - عن عائشة أن خديجة سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ورقة بن نوفل، فقال:"قد رأيته في المنام، فرأيت عليه ثياب بياض، فأحسبه لو كان من أهل النّار لم يكن عليه بياض".

حسن: رواه أحمد (24367) عن حسن بن موسى، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، حَدَّثَنَا أبو الأسود، عن عروة، عن عائشة فذكرته، وصورة الإسناد المرسل إِلَّا أن مراسيل الصّحابة مقبولة عند الجمهور. وابن لهيعة فيه كلام معروف.

ورواه عبد الرزّاق (5/ 324) عن معمر، عن الزهري قال: وسئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ورقة بن نوفل - كما بلغنا - فقال فذكره نحوه.

وبهذا المرسل يتقوى الإسناد الأوّل.

وقد روي موصولًا ولا يصح، رواه الترمذيّ (2288)، والحاكم (4/ 393) كلاهما من طريق يونس بن بكير، حَدَّثَنِي عثمان بن عبد الرحمن، عن الزّهري، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث غريب، وعثمان بن عبد الرحمن ليس عند أهل الحديث بالقوي".

وأمّا الحاكم فقال:"هذا حديث صحيح الإسناد".

قلت: ليس كما قال، فإن عثمان بن عبد الرحمن هو الوقاصي - نسبة إلى جده الأعلى أبي وقَّاص، ضعيف باتفاق أهل العلم، بل كذّبه ابن معين وقال ابن حبَّان: يروي عن الثّقات الموضوعات لا يجوز الاحتجاج به، وبه أعلّه الذّهبيّ في تلخيص المستدرك فقال:"متروك".

أما ما رُوي عن أسماء بنت أبي بكر أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم سئل عن ورقة بن نوفل فقال:"يبعث يوم القيامة أمة واحدة". فهو منكر.

رواه الطبرانيّ في الكبير (24/ 82) عن محمد بن عبوس بن كامل السراج، ثنا عبد الله بن عمر بن أبان، ثنا أبو أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن أسماء بنت أبي بكر فذكرته.

وهذا الحديث مما تفرّد به عبد الله بن عمر بن محمد بن أبان وهو ممن لا يقبل تفرده في مثل هذا الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে খাদীজা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ওয়ারাকা ইবনু নাওফাল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তাকে স্বপ্নে দেখেছি। আমি দেখেছি, তার পরিধানে ছিল সাদা পোশাক। সুতরাং আমি মনে করি, সে যদি জাহান্নামের অধিবাসী হতো, তবে তার পরিধানে সাদা পোশাক থাকত না।"









আল-জামি` আল-কামিল (10123)


10123 - عن أبي أمامة قال: أنشأ رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوة، فأتيته فقلت: يا رسول الله، ادع
الله لي بالشهادة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم! سلمهم وغنمهم". قال: فسلمنا وغنمنا.

قال: ثمّ أنشأ رسول الله صلى الله عليه وسلم غزوا ثانيا، فأتيته، فقلت: يا رسول الله، ادع الله لي بالشهادة، فقال:"اللهم سلمهم وغنمهم". قال: فسلمنا وغنمنا.

قال: ثمّ أنشأ غزوا ثالثا، فأتيته فقلت: يا رسول الله، إني أتيتك مرتين قبل مرتي هذه، فسألتك أن تدعو الله لي بالشهادة، فدعوت الله أن يسلمنا ويغنمنا، فسلمنا وغنمنا، يا رسول الله، فادع الله لي بالشهادة، فقال:"اللهم! سلمهم وغنمهم". قال: فسلمنا وغنمنا.

ثمّ أتيته، فقلت: يا رسول الله، مرني بعمل، قال:"عليك بالصوم فإنه لا مثل له". قال: فما رئي أبو أمامة ولا امرأته ولا خادمه إِلَّا صياما، قال: فكان إذا رئي في دارهم دخان بالنهار، قيل: اعتراهم ضيف، نزل بهم نازل.

قال: فلبثت بذلك ما شاء الله، ثمّ أليته فقلت: يا رسول الله، أمرتنا بالصيام، فأرجو أن يكون قد بارك الله لنا فيه، يا رسول الله، فمرني بعمل آخر، قال:"اعلم أنك لن تسجد لله سجدة إِلَّا رفع الله لك بها درجة وحط عنك بها خطيئة".

صحيح: رواه أحمد (22140) عن روح، عن هشام، عن واصل مولى أبي عيينة، عن محمد بن أبي يعقوب، عن رجاء بن حيوة، عن أبي أمامة فذكره.

والكلام على إسناده مبسوط في كتاب الصيام.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি যুদ্ধাভিযানের প্রস্তুতি নিলেন। আমি তাঁর কাছে এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার জন্য আল্লাহর কাছে শাহাদাত লাভের দোয়া করুন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! তাদের নিরাপত্তা দিন এবং গনিমত দান করুন।" তিনি (আবু উমামা) বলেন, ফলে আমরা নিরাপদ থাকলাম এবং গনিমত লাভ করলাম।

তিনি বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দ্বিতীয় একটি যুদ্ধাভিযানের প্রস্তুতি নিলেন। আমি তাঁর কাছে এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার জন্য আল্লাহর কাছে শাহাদাত লাভের দোয়া করুন। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! তাদের নিরাপত্তা দিন এবং গনিমত দান করুন।" তিনি বলেন, ফলে আমরা নিরাপদ থাকলাম এবং গনিমত লাভ করলাম।

তিনি বলেন, এরপর তিনি তৃতীয় একটি যুদ্ধাভিযানের প্রস্তুতি নিলেন। আমি তাঁর কাছে এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার এই বারের আগে আমি দু'বার আপনার কাছে এসেছিলাম এবং আপনাকে আমার জন্য শাহাদাতের দোয়া করতে বলেছিলাম। আর আপনি তখন আমাদের নিরাপত্তা ও গনিমত দানের জন্য আল্লাহর কাছে দোয়া করেছিলেন। ফলে আমরা নিরাপদ থাকলাম এবং গনিমত লাভ করলাম। হে আল্লাহর রাসূল! এবার আমার জন্য শাহাদাতের দোয়া করুন। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! তাদের নিরাপত্তা দিন এবং গনিমত দান করুন।" তিনি বলেন, ফলে আমরা নিরাপদ থাকলাম এবং গনিমত লাভ করলাম।

এরপর আমি তাঁর কাছে এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে কোনো একটি কাজের আদেশ দিন। তিনি বললেন: "তুমি অবশ্যই সাওম (রোযা) পালন করো, কারণ এর কোনো উপমা নেই।" তিনি (আবু উমামা) বলেন, এরপর থেকে আবু উমামা, তাঁর স্ত্রী এবং তাঁর খাদেমকে সাওম পালনরত অবস্থায় ছাড়া আর দেখা যেতো না। তিনি বলেন, দিনের বেলায় যখন তাদের বাড়িতে ধোঁয়া দেখা যেতো, তখন বলা হতো: তাদের বাড়িতে হয়তো কোনো মেহমান এসেছে বা কোনো প্রয়োজন দেখা দিয়েছে।

তিনি বলেন, আমি আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী কিছুদিন সাওম পালনে অতিবাহিত করলাম। এরপর আমি তাঁর কাছে এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমাদেরকে সাওম পালনের নির্দেশ দিয়েছেন, আর আমি আশা করি আল্লাহ এতে আমাদের জন্য বরকত দিয়েছেন। হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে অন্য কোনো কাজের নির্দেশ দিন। তিনি বললেন: "জেনে রাখো, যখনই তুমি আল্লাহর জন্য একটি সিজদা করবে, আল্লাহ তার বিনিময়ে তোমার একটি মর্যাদা বৃদ্ধি করবেন এবং তার বিনিময়ে তোমার একটি গুনাহ ক্ষমা করে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (10124)


10124 - عن رجل من ثقيف قال: سألنا رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاثًا فلم يرخص لنا، فقلنا: إن أرضنا أرض باردة، فسألناه أن يرخص لنا في الطهور، فلم يرخص لنا، وسألناه أن يرخص لنا في الدباء، فلم يرخص لنا فيه ساعة، وسألناه أن يرد إلينا أبا بكرة فأبى، وقال:"هو طليق الله وطليق رسوله". وكان أبو بكرة خرج إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حين حاصر الطائف فأسلم.

صحيح: رواه أحمد (17530) عن يحيى بن آدم، حَدَّثَنَا مفضل بن مهلهل، عن مغيرة، عن شباك، عن الشعبي، عن رجل من ثقيف فذكره. وإسناده صحيح.




সাকিফ গোত্রের এক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তিনটি বিষয়ে জানতে চেয়েছিলাম, কিন্তু তিনি আমাদের অনুমতি দেননি। আমরা বললাম, "নিশ্চয় আমাদের এলাকাটি খুব ঠান্ডা।" এরপর আমরা তাঁর কাছে পবিত্রতা অর্জনের (পানি গরম করা বা অন্য কোনো) অনুমতির বিষয়ে জানতে চাইলাম, কিন্তু তিনি আমাদের অনুমতি দিলেন না। আমরা তাঁর কাছে 'দুব্বা' (শুকনো লাউয়ের তৈরি পাত্র, যাতে মদ তৈরি হতো) ব্যবহারের অনুমতিও চাইলাম, কিন্তু তিনি সে বিষয়ে এক মুহূর্তের জন্যও অনুমতি দিলেন না। আর আমরা তাঁর কাছে আবূ বাকরাহকে আমাদের কাছে ফিরিয়ে দেওয়ার জন্য চাইলাম, কিন্তু তিনি তা প্রত্যাখ্যান করলেন এবং বললেন: "সে আল্লাহর পক্ষ থেকে মুক্ত এবং তাঁর রাসূলের পক্ষ থেকেও মুক্ত।" (উল্লেখ্য যে,) আবূ বাকরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তায়িফ অবরোধের সময় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে বেরিয়ে এসেছিলেন এবং ইসলাম গ্রহণ করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10125)


10125 - عن أبي بكرة قال: لقد نفعني الله بكلمة سمعتها من رسول الله صلى الله عليه وسلم أيام الجمل بعد ما كدت أن ألحق بأصحاب الجمل فأقاتل معهم قال: لما بلغ رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أهل فارس قد ملّكوا عليهم بنت كسرى قال:"لن يفلح قوم ولَّوا أمرهم امرأة".
صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4425) عن عثمان بن الهيثم، حَدَّثَنَا عوف (هو الأعرابي)، عن الحسن (هو البصري)، عن أبي بكرة قال: فذكره.

وسبب هذا الحديث أن كسرى الذي مزّق كتاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، سلط الله عليه ابنه فقتله، ثمّ قتل إخوته حتَّى أفضى الأمر بهم إلى تأمير المرأة، فجرّ ذلك إلى ذهاب ملكهم، ومزّقوا كما دعا به النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আমাকে এমন একটি বাণীর মাধ্যমে উপকার করেছেন যা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে ‘জঙ্গলে জামাল’-এর দিনগুলোতে শুনেছিলাম। আমি তখন জামাল বাহিনীর সাথে যোগ দিয়ে তাদের পক্ষে যুদ্ধ করতে উদ্যত হয়েছিলাম। (তিনি বলেন,) যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এই সংবাদ পৌঁছল যে, পারস্যবাসী কিসরার কন্যাকে তাদের শাসক বানিয়েছে, তখন তিনি বললেন: “সেই জাতি কক্ষনো সফল হবে না, যারা তাদের কর্তৃত্ব একজন নারীর হাতে তুলে দেয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (10126)


10126 - عن أبي ثعلبة الخشني، قال: قلت: يا رسول الله! أخبرني بما يحل لي مما يحرم علي، قال: فصعد في النظر وصوّب، ثمّ قال:"نويبتة". قال: قلت: يا رسول الله، نويبتة خير، أم نويبتة شر؟ قال:"بل نويبتة خير، لا تأكل لحم الحمار الأهلي، ولا كل ذي ناب من السباع".

صحيح: رواه أحمد (17745)، والطبراني في الكبير (22/ 218) كلاهما من طريق أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج، حَدَّثَنَا عبد الله بن العلاء بن زبر، حَدَّثَنِي مسلم بن مشكم، قال: سمعت أبا ثعلبة الخشني فذكره. وإسناده صحيح.

قال الهيثميّ في"المجمع" (9/ 394):"رواه أحمد والطَّبرانيّ في الكبير والأوسط بأسانيد، وأحد أسانيد أحمد رجاله رجال الصَّحيح".

قوله:"نويبتة": تصغير نابتة أي: نشأ فيهم صغار لحقوا الكبار، وصاروا زيادة في العدد.

تنبيه: ورد في مطبوعة المسند:"حَدَّثَنَا أبو العلاء بن زبر".

والصواب:"عبد الله بن العلاء" كما في إتحاف المهرة (17426) وكما في الطبرانيّ:"عبد الله بن العلاء بن زبر" لأنه لم يذكر أحد ممن ترجم لعبد الله أنه يكنى أبا العلاء وإنما يكنى أبا زبر، أو أبا عبد الرحمن.




আবূ সা'লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আমার জন্য যা হালাল এবং যা হারাম, সে সম্পর্কে আমাকে জানান।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি আমার দিকে চোখ উঠালেন এবং নামালেন (চিন্তিত ভঙ্গিতে), তারপর বললেন, "নুওয়াইবিতা।" আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! নুওয়াইবিতা কি ভালোর, নাকি মন্দের?" তিনি বললেন, "বরং নুওয়াইবিতা ভালোর। তোমরা গৃহপালিত গাধার গোশত খেও না এবং হিংস্র জন্তুর মধ্যে দাঁতওয়ালা কোনোটিই খেও না।"









আল-জামি` আল-কামিল (10127)


10127 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ سيفا يوم أحد، فقال:"من يأخذ مني هذا؟" فبسطوا أيديهم، كل إنسان منهم يقول: أنا، أنا، قال:"فمن يأخذه بحقه؟" قال: فأحجم القوم، قال سماك بن خرشة أبو دجانة: أنا آخذه بحقه. قال: فأخذه، ففلق به هام المشركين.

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصّحابة (2470) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا عفّان، ثنا حمّاد بن سلمة، ثنا ثابت، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওহুদ যুদ্ধের দিন একটি তরবারি গ্রহণ করলেন এবং বললেন: "কে আমার কাছ থেকে এটি নেবে?" তখন উপস্থিত লোকেরা তাদের হাত বাড়ালো, তাদের প্রত্যেকেই বলছিল: "আমি, আমি।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিন্তু কে এটি তার প্রাপ্য অধিকারের (হক) সাথে গ্রহণ করবে?" বর্ণনাকারী বলেন, তখন লোকেরা নীরব হয়ে গেল। সিমাক ইবনু খারাশা আবূ দুজানা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমি এর হক আদায় করে এটি গ্রহণ করব।" অতঃপর তিনি (আবু দুজানা) সেটি নিলেন এবং তার দ্বারা মুশরিকদের মস্তক বিদীর্ণ করলেন।