হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (10568)


10568 - عن أنس بن مالك، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من قوم اجتمعوا يذكرون الله لا يريدون بذلك إلا وجهه إلا ناداهم مناد من السماء: أن قوموا مغفورا لكم، قد بدلت سيئاتكم حسنات".

حسن: رواه أحمد (12453) عن محمد بن بكر، أخبرنا ميمون المرئي، حدثنا ميمون بن سياه، عن أنس فذكره.

وإسناده حسن من أجل ميمون المرئي وهو ابن موسى، وموسى بن سياه فإنهما حسنا الحديث.

ورواه البزار - كشف الأستار (3061) -، وأبو يعلى (4141) كلاهما من وجه آخر عن ميمون بن سياه به.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো দল বা সম্প্রদায় নেই যারা আল্লাহর যিকির করার জন্য একত্রিত হয় এবং এর দ্বারা তারা একমাত্র তাঁর (আল্লাহর) সন্তুষ্টিই কামনা করে, কিন্তু আসমান থেকে একজন ঘোষণাকারী তাদের ডেকে বলেন: তোমরা উঠে দাঁড়াও! তোমাদের ক্ষমা করে দেওয়া হয়েছে, তোমাদের পাপসমূহকে নেকীতে পরিবর্তিত করা হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (10569)


10569 - عن أنس بن مالك، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا مررتم برياض الجنة فارتعوا قالوا: وما رياض الجنة؟ قال: حلق الذكر".

حسن: رواه الترمذي (3510)، وأحمد (12523)، وابن حبان في المجروحين (2/ 261)، وابن عدي في الكامل (6/ 2147) كلهم من طريق محمد بن ثابت البناني، عن أبيه، عن أنس بن مالك فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه من حديث ثابت عن أنس".
ولكن فيه محمد بن ثابت البناني ضعيف، إلا أنه لم يتهم، وقال فيه أبو زرعة: لين.

لكن رُويَ الحديثُ بإسناد آخر رواه أبو نعيم في الحلية (6/ 268) عن حبيب بن الحسن، ثنا يوسف القاضي، ثنا محمد بن أبي بكر، ثنا زائدة بن أبي الرقاد، ثنا زياد بن عبد الله النميري، عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا مررتم برياض الجنة فارتعوا قالوا: يا رسول الله! وأنى لنا برياض الجنة في الدنيا؟ قال: حلق الذكر".

وزائدة بن أبي الرقاد - بضم الراء ثم قاف - أبو معاذ البصري الصيرفي مختلف فيه، فتكلم فيه جمهور أهل العلم ولكن قال البزار: لا بأس به، وقال ابن حبان:"يروي المناكير عن المشاهير لا يحتج بخبره ولا يكتب إلا للاعتبار".

فمثله إذا لم يأت مما ينكر عليه يقبل في المتابعات وبه صار الإسناد حسنا.

وزياد بن عبد الله النميري زاهد متعبد، تكلم فيه غير واحد، وهو لا بأس به أيضا في المتابعات لأنه لم يتهمه أحد.

قال أبو حاتم:"يكتب حديثه ولا يحتج به".

وبهذين الإسنادين يصير الحديث حسنا على رسم الترمذي، ولبعض فقراته أصول ثابتة.

وفي معناه ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا مررتم برياض الجنة فارتعوا. قلت: يا رسول الله! وما رياض الجنة؟ قال: المساجد. قلت: وما الرتع يا رسول الله؟ قال: سبحان الله، والحمد لله، ولا إله إلا الله والله أكبر".

رواه الترمذي (3509)، والبزار (9311) كلاهما من طريق زيد بن حباب أن حميدا المكي مولى ابن علقمة حدثه أن عطاء بن أبي رباح حدثه، عن أبي هريرة فذكره. واللفظ للترمذي.

وقال الترمذي:"هذا حديث غريب".

وقال البزار:"وهذا الحديث لا نعلمه يروى عن أبي هريرة إلا بهذا الإسناد، وحميد مولى بني علقمة لا نعلم روى عنه إلا زيد بن الحباب".

وقال البخاري: روى عنه زيد ثلاثة أحاديث زعم أنه سمع عطاء، لا يتابع.

وجهّله أيضا الدارقطني كما في سؤالات البرقاني.



النبيّ صلى الله عليه وسلم:"والذي نفسي بيده لقد ابتدرها عشرة أملاك كلّهم حريص على أن يكتبوها، فبادروا كيف يكتبونها حتى رفعوه إلى ذي العزّة فقال: اكتبوها كما قال عبدي".

حسن: رواه النسائيّ في عمل اليوم والليلة (341) عن قتيبة بن سعيد، قال: حدّثنا خلف، عن ابن أخي أنس، عن أنس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل خلف وهو ابن خليفة بن صاعد الأشجعيّ مولاهم الواسطيّ، وهو حسن الحديث، قال ابن عدي:"أرجو أنه لا بأس به، ولا أبرئه من أن يخطئ في بعض الأحاديث في بعض رواياته".

قلت: وقد اختلط بأخرة، وأخرج له مسلم من رواية قتيبة عنه.

وصحّحه ابن حبان (845)، والضياء في"المختارة" (1887) كلاهما من حديث قتيبة بن سعيد، به، مثله.

وأخرجه الإمام أحمد (12612) من وجه آخر عن خلف بإسناده، مثله.

والذي رُوي من غير وجه عن أنس أنّ الرّجل الذي قال ذلك في الصّلاة لا يعارض ما رواه خلف للحمل على التّعدد.

وابن أخي أنس هو حفص بن عمر كما في رواية الإمام أحمد فيكون هو حفص بن عمر بن عبد الله بن أبي طلحة، وهو ابن أخي أنس لأمّه وهو"صدوق".

وقد صحّح الحاكم (1/ 503) حديثًا له في الصّلاة على شرط مسلم فوهم، فإنّ ابن أخي أنس هذا لم يرو له مسلمٌ، وإنّما روى له أبو داود والترمذيّ والبخاريّ في الأدب المفرد كما رمز له الحافظ في"التقريب".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা জান্নাতের বাগানসমূহের পাশ দিয়ে যাও, তখন তাতে বিচরণ করো।" তাঁরা বললেন: "জান্নাতের বাগানসমূহ কী?" তিনি বললেন: "যিকিরের মজলিসসমূহ।"









আল-জামি` আল-কামিল (10570)


10570 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما قعد قوم مقعدا لا يذكرون فيه الله عز وجل، ويصلون على النبي إلا كان عليهم حسرة يوم القيامة وإن دخلوا الجنة للثواب".

صحيح: رواه أحمد (9965)، وصحّحه ابن حبان (591، 592) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن شعبة، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যখন কোনো সম্প্রদায় এমন কোনো মজলিসে বসে যেখানে তারা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল-এর যিকির করে না এবং নবীর প্রতি দরূদ পড়ে না, তখন তা কিয়ামতের দিন তাদের জন্য পরিতাপের কারণ হবে—যদি তারা (অন্যান্য) সওয়াবের কারণে জান্নাতে প্রবেশ করেও থাকে।”









আল-জামি` আল-কামিল (10571)


10571 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من قوم يقومون من مجلس لا يذكرون الله فيه إلا قاموا عن مثل جيفة حمار، وكان لهم حسرة".

حسن: رواه أبو داود (4855) - واللفظ له -، وأحمد (9052)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (408)، والحاكم (1/ 491 - 492) كلهم من طريق سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل سهيل بن أبي صالح فإنه حسن الحديث.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে সম্প্রদায় কোনো মজলিস বা বৈঠক থেকে উঠে যায়, আর তাতে তারা আল্লাহর যিকির (স্মরণ) করে না, তারা কেবল একটি গাধার মরা লাশের কাছ থেকে উঠে যায়, এবং সেটি তাদের জন্য আফসোস বা পরিতাপের কারণ হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10572)


10572 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما جلس قوم مجلسا لم يذكروا الله فيه، ولم يصلوا على نبيهم إلا كان عليهم ترة، فإن شاء عذبهم وإن شاء غفر لهم".

حسن: رواه الترمذي (3380)، وأحمد (10277) كلاهما من طريق سفيان - وأحمد (9843) من طريق ابن أبي ذئب -، وأحمد (10422) من طريق زياد بن سعد - وابن السني في عمل اليوم والليلة (450)، والحاكم (1/ 496) كلاهما من طريق عمارة بن غزية - أربعتهم عن صالح مولى التوأمة، عن أبي هريرة فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن، وقد روي من غير وجه عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم".

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وصالح ليس بالساقط".

قلت: صالح مولى التوأمة يحسن حديثه إذا روى عنه من سمع منه قبل الاختلاط، وابن أبي ذئب وزياد بن سعد، وعمارة بن غزية سمعوا منه قبل الاختلاط. وأما سفيان الثوري فسماعه منه بعد الاختلاط.

وبمعناه ما رواه أحمد (9583)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (405، 406) كلاهما من طريق ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن إسحاق - أو أبي إسحاق - مولى عبد الله بن الحارث، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما جلس قوم مجلسا فلم يذكروا الله إلا كان عليهم ترة، وما من رجل مشى طريقا فلم يذكر الله إلا كان عليه ترة، وما من رجل آوى إلى فراشه فلم يذكر الله إلا كان عليه ترة".

وإسحاق مولى عبد الله بن الحارث أو أبو إسحاق - على اختلاف فيه - قال ابن حجر في التهذيب: ما عرفت من حاله شيئا.

ورواه أبو داود (4856)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (404) كلاهما من طريق الليث، عن ابن عجلان، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة.

فأسقط الواسطة بين المقبري، وبين أبي هريرة.

وابن عجلان صدوق إلا أنه تكلم فيما يرويه عن سعيد المقبري، وقد خالفه ابن أبي ذئب وهو من أثبت الناس في المقبري، ولذا قال الدارقطني في العلل (8/ 155):"وقول ابن أبي ذئب أشبه بالصواب".

قلت: وفيه من لا يعرف حاله.

وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من قوم يجلسون مجلسا لا يذكرون الله فيه إلا كانت عليهم حسرة يوم القيامة وإن دخلوا الجنة". فالأشبه كونه من مسند أبي سعيد خطأ.

رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (409) من طريق أبي عامر، عن شعبة، عن سليمان (هو
الأعمش)، عن ذكوان (هو أبو صالح)، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

والحديث معروف من مسند أبي هريرة فقد رواه عبد الرحمن بن مهدي، عن شعبة بهذا الإسناد فجعله من مسند أبي هريرة.

وكذلك رواه غير الأعمش عن أبي صالح، عن أبي هريرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখনই কোনো সম্প্রদায় কোনো মজলিসে বসে এবং তাতে তারা আল্লাহকে স্মরণ করে না, আর তাদের নবীর উপর দরূদ পাঠ করে না, তবে তা তাদের জন্য আফসোস ও ক্ষতির কারণ হয়। অতঃপর যদি আল্লাহ চান, তবে তিনি তাদেরকে শাস্তি দেবেন, আর যদি চান, তবে তিনি তাদেরকে ক্ষমা করে দেবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10573)


10573 - عن جابر قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما اجتمع قوم ثم تفرقوا عن غير ذكر الله وصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم إلا قاموا عن أنتن جيفة".

حسن: رواه الطيالسي (1863) - ومن طريقه النسائي في عمل اليوم والليلة (411) - عن يزيد بن إبراهيم التستري، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي الزبير وهو محمد بن مسلم بن تدرس المكي وهو مدلس فإذا ثبت تدليسه ضعف وإلا فهو حسن الحديث.

وقال ابن القيم في جلاء الفهم (ص 175):"قال أبو عبد الله المقدسي - وهو الضياء صاحب المختارة -:"هذا عندي على شرط مسلم".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন কোনো সম্প্রদায় একত্রিত হয়, আর আল্লাহ্র স্মরণ এবং নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর দরূদ পাঠ ব্যতিরেকে তারা বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়, তখন তারা যেন সবচেয়ে দুর্গন্ধময় মৃতদেহ থেকে উঠলো।”









আল-জামি` আল-কামিল (10574)


10574 - عن عبد الله بن مغفل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من قوم اجتمعوا في مجلس، فتفرقوا ولم يذكروا الله إلا كان ذلك المجلس حسرة عليهم يوم القيامة".

حسن: رواه الطبراني في الأوسط (3756)، والبيهقي في الشعب (530) كلاهما من طريق مسلم بن إبراهيم، حدثنا شداد بن سعيد أبو طلحة الراسبي، حدثنا أبو الوازع جابر بن عمرو، عن عبد الله بن مغفل فذكره.

ورواه أبو يعلى كما في المطالب العالية (3416) من طريق أبي معشر يوسف بن يزيد البراء، عن شداد بن سعيد به.

وقال الطبراني:"لا يروى هذا الحديث عن عبد الله بن مغفل إلا بهذا الإسناد، تفرد به شداد بن سعيد".

قلت: إسناده حسن من أجل شداد بن سعيد، وجابر بن عمرو فإنهما حسنا الحديث.

لكن رواه أحمد (7093) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، حدثنا شداد أبو طلحة الراسبي، سمعت أبا الوازع جابر بن عمرو يحدث عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.

والأشبه أنه من مسند عبد الله بن مغفل والله أعلم.




আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো সম্প্রদায় নেই যারা কোনো মজলিসে একত্রিত হয়ে আল্লাহকে স্মরণ না করেই বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল, ঐ মজলিসটি কিয়ামতের দিন তাদের জন্য আফসোস হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10575)


10575 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا جلس مجلسا أو صلى تكلم بكلمات، فسألته عائشة عن الكلمات، فقال:"إن تكلم بخير كان طابعا عليهن إلى يوم القيامة،
وإن تكلم بغير ذلك كان كفارة له: سبحانك اللهم وبحمدك أستغفرك وأتوب إليك".

حسن: رواه النسائي (1344)، وأحمد (24486) كلاهما من حديث أبي سلمة منصور بن سلمة الخزاعي، حدثنا خلاد بن سليمان الحضرمي، عن خالد بن أبي عمران، عن عروة، عن عائشة فذكرته. إلا أنه وقع عند أحمد: خالد بن سليمان.

وقال ابن حجر في الفتح (13/ 545):"وسنده قوي". وقال في النكت (2/ 733):"إسناده صحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل خالد بن أبي عمران التجيبي قاضي إفريقيا من رجال مسلم، وثقه ابن سعد والعجلي وذكره ابن حبان في الثقات. وقال أبو حاتم: لا بأس به فمثله لا يصحح حديثه إذا كان في خارج الصحيح. وإنما يحسن وقد قال الحافظ نفسه في التقريب:"صدوق" وقال الذهبي في الكاشف:"صدوق فقيه عابد".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো মজলিসে বসতেন অথবা সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি কিছু কথা বলতেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সেই কথাগুলো সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি বললেন: "যদি (মজলিসে) ভালো কথা বলা হয়, তবে কিয়ামত পর্যন্ত সেগুলোর উপর তা (সওয়াবের) মোহরস্বরূপ হয়ে থাকবে। আর যদি এর ভিন্ন কিছু বলা হয়, তবে তা তার জন্য কাফ্ফারা (গুনাহ মোচনকারী) হবে।" (সেই কথাগুলো হলো:) "সুবহানাকা আল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, আস্তাগফিরুকা ওয়া আতূবু ইলাইক।"









আল-জামি` আল-কামিল (10576)


10576 - عن يزيد بن الهاد، عن إسماعيل بن عبد الله بن جعفر قال: بلغني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من إنسان يكون في مجلس فيقول حين يريد أن يقوم: سبحانك اللهم وبحمدك لا إله إلا أنت، أستغفرك، وأتوب إليك إلا غفر له ما كان في ذلك المجلس".

فحدثت (القائل هو يزيد بن الهاد) هذا الحديث يزيد بن خصيفة قال: هكذا حدثني السائب بن يزيد عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح، رواه أحمد (15729)، والطحاوي في شرح المعاني (4/ 289)، والطبراني في الكبير (7/ 183) كلهم من طرق، عن الليث (هو ابن سعد)، عن يزيد بن الهاد، عن إسماعيل بن عبد الله بن جعفر فذكره.

وهذا مرسل، والإسناد الآخر الذي أشار إليه يزيد بن الهاد متصل صحيح، وقد صحّحه ابن حجر فقال في النكت (2/ 732):"رجاله ثقات أثبات، والسائب قد صح سماعه من النبي صلى الله عليه وسلم فالحديث صحيح". اهـ




সা'ইব ইবনু ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মজলিসে (বৈঠকে) বসে এবং সে যখন উঠে যেতে চায়, তখন যদি সে বলে: 'সুবহানাকা আল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, লা ইলাহা ইল্লা আন্তা, আসতাগফিরুকা ওয়া আতুবু ইলাইকা' (হে আল্লাহ! আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করছি এবং আপনার প্রশংসায় নিয়োজিত হচ্ছি। আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। আমি আপনার কাছে ক্ষমা চাই এবং আপনার দিকে তাওবা করি), তবে সেই মজলিসে তার যে অপরাধ হয়েছে, তা ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (10577)


10577 - عن أبي برزة الأسلمي قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول بأخرة إذا أراد أن يقوم من المجلس:"سبحانك اللهم وبحمدك أشهد أن لا إله إلا أنت، أستغفرك وأتوب إليك".

فقال رجل يا رسول الله: إنك لتقول قولا ما كنت تقوله فيما مضى قال:"كفارة لما يكون في المجلس".

حسن: رواه أبو داود (4859)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (426)، وأحمد (19812)، والحاكم (1/ 537) كلهم من طرق، عن الحجاج بن دينار، عن أبي هاشم (هو الرماني)، عن أبي العالية، عن أبي برزة الأسلمي فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحجاج بن دينار فإنه مختلف فيه. فقد وثقه جمهور أهل العلم، وتكلم فيه الدارقطني والقول فيه قول الجمهور. وهو الذي رجحه أيضا الحافظ ابن حجر فقال في الفتح (13/ 545):"سنده قوي".

ولكن رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (2428) من طريق منصور بن معتمر، عن فضيل بن عمرو، عن زياد بن حصين، عن أبي العالية، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا.

وزيادة الثقة مقبولة إلا أن أبا حاتم وأبا زرعة والدارقطني رجحوا المرسل. والله أعلم بالصواب.




আবু বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শেষের দিকে যখন কোনো মজলিস থেকে উঠতে চাইতেন, তখন বলতেন: "সুবহানাকাল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা আশহাদু আল লা-ইলাহা ইল্লা আন্তা, আসতাগফিরুকা ওয়া আতূবু ইলাইকা।" এক ব্যক্তি বলল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি এমন একটি কথা বলছেন, যা আগে কখনও বলতেন না।" তিনি বললেন: "এটা মজলিসে (যদি কোনো ভুলত্রুটি) ঘটে থাকে তার কাফফারা স্বরূপ।"









আল-জামি` আল-কামিল (10578)


10578 - عن رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه جلس مجلسا فلما أراد أن يقوم قال:"سبحانك اللهم وبحمدك أشهد أن لا إله إلا أنت أستغفرك وأتوب إليك".

قال: فقال رجل من القوم: ما هذا الحديث يا رسول الله؟ قال صلى الله عليه وسلم:"كلمات علمنيهن جبريل عليه السلام كفارات لخطايا المجلس".

صحيح: رواه أبو بكر بن أبي شيبة في مسنده كما في المطالب العالية (3383) عن أبي الأحوص، عن أبي فروة، عن أبي معشر، حدثنا رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.

قال ابن حجر في المطالب: إسناده صحيح وأبو معشر كوفي اسمه زياد بن كليب. وصحّحه أيضا في النكت (2/ 739).




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মজলিসে বসলেন। যখন তিনি (মজলিস থেকে) ওঠার ইচ্ছা করলেন, তখন বললেন: "সুবহানাকাল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, আশহাদু আল্লা ইলাহা ইল্লা আন্তা, আস্তাগফিরুকা ওয়া আতূবু ইলাইকা।"

(বর্ণনাকারী) বলেন, তখন উপস্থিত লোকজনের মধ্যে থেকে একজন ব্যক্তি জিজ্ঞেস করলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! এই বাক্যগুলো কী?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এইগুলো এমন কিছু বাক্য যা জিবরীল (আঃ) আমাকে শিখিয়েছেন। এইগুলো হলো মজলিসের (সভার) ভুল-ত্রুটিসমূহের কাফ্ফারা (গুনাহ মোচনের উপায়)।









আল-জামি` আল-কামিল (10579)


10579 - عن ابن عمر قال: قلما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقوم من مجلس حتى يدعو بهؤلاء الدعوات لأصحابه:"اللهم اقسم لنا من خشيتك ما يحول بيننا وبين معاصيك، ومن طاعتك ما تبلغنا به جنتك، ومن اليقين ما تهون به علينا مصيبات الدنيا ومتعنا بأسماعنا وأبصارنا وقوتنا ما أحييتنا، واجعله الوارث منا، واجعل ثأرنا على من ظلمنا، وانصرنا على من عادانا، ولا تجعل مصيبتنا في ديننا، ولا تجعل الدنيا أكبر همنا ولا مبلغ علمنا، ولا تسلط علينا من لا يرحمنا".

حسن: رواه الترمذي (3502)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (452) كلاهما من طريق يحيى بن أيوب، عن عبيد الله بن زحر، عن خالد بن أبي عمران، عن ابن عمر فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، وقد روى بعضهم هذا الحديث عن خالد بن أبي عمران، عن نافع، عن ابن عمر".

قلت: رواه بكر بن مضر، عن عبيد الله بن زحر، عن خالد بن أبي عمران، عن نافع، عن ابن عمر. أخرج حديثه النسائي في عمل اليوم والليلة (401)، وابن السني (447).

وعبيد الله بن زحر ضعيف، ولعل هذا الاضطراب منه ولكنه توبع على الوجه الثاني (أعني بإثبات نافع).
فقد رواه الطبراني في الدعاء (1911) من طريق يحيى بن بكير، عن ابن لهيعة، عن خالد بن أبي عمران، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وابن لهيعة فيه مقال.

ورواه الطبراني في الدعاء (1911)، والحاكم (1/ 521) كلاهما من طريق عبد الله بن صالح، عن الليث بن سعد، عن خالد، عن نافع، عن ابن عمر فذكر نحوه.

وقال الحاكم: هذا حديث صحيح على شرط البخاري.

قلت: إسناده حسن من أجل عبد الله بن صالح وهو كاتب الليث متكلم فيه إلا أنه توبع، ومن أجل خالد بن أبي عمران وهو التجيبي فإنه حسن الحديث أيضا.

وبمعناه ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من جلس في مجلس فكثر فيه لغطه فقال قبل أن يقوم من مجلسه ذلك: سبحانك اللهم وبحمدك أشهد أن لا إله إلا أنت أستغفرك وأتوب إليك إلا غفر له ما كان في مجلسه ذلك".

رواه الترمذي (3433)، وأحمد (10415)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (2397)، وابن السني (448)، وابن حبان (594)، والحاكم (1/ 536) كلهم من طريق ابن جريج، أخبرني موسى بن عقبة، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه، لا نعرفه من حديث سهيل إلا من هذا الوجه".

وقال الحاكم:"هذا الإسناد صحيح على شرط مسلم إلا أن البخاري قد أعله بحديث وهيب …".

كذا قال! وقد قال في معرفة علوم الحديث (ص 113 - 114):"هذا الحديث من تأمله لم يشك أنه من شرط الصحيح، وله علة فاحشة …".

وهي ما حدثني أبو نصر أحمد بن محمد الوراق، قال: سمعت أبا أحمد بن حمدون القصار، يقول: سمعت مسلم بن الحجاج - وجاء إلى محمد بن إسماعيل البخاري فقبّل بين عينيه وقال: دَعْني حتى أقبّل رجليك يا أستاذ الأستاذين، وسيد المحدثين، وطبيب الحديث في علله -، حدّثك محمد بن سلام قال: ثنا مخلد بن يزيد الحراني، قال: أخبرنا ابن جريج، عن موسى بن عقبة، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم في كفارة المجلس فما علته؟ قال محمد بن إسماعيل: هذا حديث مليح، ولا أعلم في الدنيا في هذا الباب غير هذا الحديث إلا أنه معلول، حدثنا به موسى بن إسماعيل، ثنا وهيب، ثنا سهيل، عن عون بن عبد الله قوله".

قال محمد بن إسماعيل:"هذا أولى، فإنه لا يذكر لموسى بن عقبة سماعا من سهيل" انتهى.

قلت: قد أعله أيضا أئمة النقد بما رواه وهيب بن خالد عن سهيل بن أبي صالح، عن عون بن
عبد الله بن عتبة قال: من جلس مجلسا … فذكر نحوه من قوله.

أخرجه البخاري في التاريخ الكبير (4/ 105)، والعقيلي في ضعفائه (2/ 156).

وعون بن عبد الله بن عتبة تابعي ثقة. ورواية وهيب هي الصواب كما قال أئمة النقد منهم: أحمد والبخاري وأبو زرعة وأبو حاتم والدارقطني. علل ابن أبي حاتم (2078)، وعلل الدارقطني (1513).

وقد قرر ابن حجر في النكت (2/ 715 - 726) إعلال النقاد في بحث طويل ثم قال في آخره:"وبهذا التقرير يتبين عظم موقع كلام الأئمة المتقدمين، وشدة فحصهم، وقوة بحثهم، وصحة نظرهم، وتقدمهم بما يوجب المصير إلى تقليدهم في ذلك، والتسليم لهم فيه، وكل من حكم بصحة الحديث مع ذلك إنما مشى فيه على ظاهر الإسناد كالترمذي كما تقدم، وكأبي حاتم بن حبان فإنه أخرجه في صحيحه وهو المعروف بالتساهل في باب النقد، ولا سيما كون الحديث المذكور في فضائل الأعمال".

وللحديث عن أبي هريرة طريق أخرى، رواه أبو داود (4858)، وابن حبان (593) كلاهما من طريق عمرو بن الحارث، عن عبد الرحمن بن أبي عمرو، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة مرفوعا.

وعبد الرحمن بن أبي عمرو هو المدني، لم يوثقه أحد وقد خولف في إسناده فرواه أبو داود (4857)، وابن حبان (593) كلاهما من طريق عمرو بن الحارث، عن سعيد بن أبي هلال، عن سعيد المقبري، عن عبد الله بن عمرو، أنه قال: كلمات لا يتكلم بهن أحد في مجلسه عند قيامه ثلاث مرات إلا كفر بهن عنه، ولا يقولهن في مجلس خير ومجلس ذكر إلا ختم له بهن عليه، كما يُختم بالخاتم على الصحيفة: سبحانك اللهم وبحمدك لا إله إلا أنت أستغفرك وأتوب إليك.

قال ابن أبي حاتم في العلل (2078) بعد ما ساق الطريقين المذكورين:"وهذا الحديث عن عبد الله بن عمرو موقوف أصح".

والحاصل أن الحديث لا يصح عن أبي هريرة وبنحوه قال أبو حاتم الرازي. والله أعلم.

وفي الباب عن أنس وجبير بن مطعم وغيرهما وكلها معلولة.

وأما قول البخاري:"ولا أعلم في الدنيا في هذا الباب غير هذا الحديث" فهو ليس بصحيح، ففي الباب أحاديث أخرى صحيحة وغير صحيحة كما رأيت، فالظاهر أن هذا النقل من البخاري فيه خطأ، أخطأ من نسب هذا القول إلى إمام المحدثين، وأمير المؤمنين في الحديث الإمام البخاري رحمه الله تعالى، فإنه أجلّ من أن يقول مثل هذا، وفي الباب أحاديث صحيحة.

والصحيح من قول البخاري:"هذا حديث مليح، ولا أعلم بهذا الإسناد في الدنيا غير هذا الحديث إلا أنه معلول".

هكذا نقل البيهقي في"المدخل" عن الحاكم كما ذكره الحافظ في النكت على مقدمة ابن
الصلاح (2/ 718).

وهذا الكلام متّجه، ولا اعتراض على البخاري حينئذ.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো মজলিস থেকে উঠে দাঁড়ানোর আগে তাঁর সাহাবিদের জন্য এই দুআগুলো পাঠ করা ব্যতীত খুব কমই যেতেন: "হে আল্লাহ! আপনার ভয়ের যতটুকু আমাদের এবং আপনার অবাধ্যতার মাঝে প্রতিবন্ধক হয়ে দাঁড়ায়, তা আমাদের জন্য বণ্টন করে দিন; আর আপনার আনুগত্যের যতটুকু দ্বারা আপনি আমাদের আপনার জান্নাতে পৌঁছিয়ে দেবেন, (তাও বণ্টন করে দিন); আর নিশ্চিত বিশ্বাসের (ইয়াক্বীনের) যতটুকু দ্বারা আপনি আমাদের জন্য দুনিয়ার বিপদাপদ সহজ করে দেবেন, (তাও দান করুন); আর আপনি যতদিন আমাদের জীবিত রাখবেন, ততদিন আমাদের কান, আমাদের চোখ এবং আমাদের শক্তি দ্বারা আমাদেরকে উপকৃত করুন এবং সেগুলোকে আমাদের উত্তরসূরি বানিয়ে দিন (অর্থাৎ আমাদের মৃত্যু পর্যন্ত এগুলো সজীব রাখুন); আর যারা আমাদের প্রতি জুলুম করেছে, তাদের উপর আমাদের প্রতিশোধ গ্রহণ করুন; আর যারা আমাদের সাথে শত্রুতা করে, তাদের বিরুদ্ধে আমাদের সাহায্য করুন; আর আমাদের বিপদ যেন আমাদের দীনের (ধর্মের) মধ্যে না হয়; আর দুনিয়াকে আমাদের সর্ববৃহৎ চিন্তা বা আমাদের জ্ঞানের শেষ সীমা বানাবেন না; আর আমাদের উপর এমন কাউকে চাপিয়ে দেবেন না, যে আমাদের প্রতি দয়া করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (10580)


10580 - عن عائشة قالت: كان النبي صلى الله عليه وسلم يذكر الله على كل أحيانه.

صحيح: رواه مسلم في الحيض (373) من طريق ابن أبي زائدة، عن أبيه، عن خالد بن سلمة، عن البهي، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

وعلقه البخاري في الأذان عن عائشة بصيغة الجزم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সর্বাবস্থায় আল্লাহর যিকির করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (10581)


10581 - عن حنظلة الأسيدي - وكان من كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم - قال: لقيني أبو بكر فقال: كيف أنت يا حنظلة؟ قال: قلت: نافق حنظلة قال: سبحان الله ما تقول؟ قال: قلت: نكون عند رسول الله صلى الله عليه وسلم يذكرنا بالنار والجنة حتى كأنا رأي عين، فإذا خرجنا من عند رسول الله صلى الله عليه وسلم عافسنا الأزواج والأولاد والضيعات، فنسينا كثيرا.

قال أبو بكر: فوالله إنا لنلقى مثل هذا، فانطلقت أنا وأبو بكر حتى دخلنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم قلت: نافق حنظلة يا رسول الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وما ذاك؟" قلت: يا رسول الله! نكون عندك تذكرنا بالنار والجنة حتى كأنا رأي عين فإذا خرجنا من عندك عافسنا الأزواج والأولاد والضيعات نسينا كثيرا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"والذي نفسي بيده إن لو تدومون على ما تكونون عندي، وفي الذكر لصافحتكم الملائكة على فرشكم وفي طرقكم ولكن يا حنظلة ساعة وساعة" ثلاث مرات.

وفي لفظ عنه: كنا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم فوعظنا، فذكر النار قال: ثم جئت إلى البيت، فضاحكت الصبيان، ولاعبت المرأة، قال: فخرجت، فلقيت أبا بكر فذكرت ذلك له فقال: وأنا قد فعلت مثل ما تذكر، فلقينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، نافق حنظلة، فقال:"مه" فحدثته بالحديث فقال أبو بكر: وأنا قد فعلت مثل ما فعل، فقال:"يا حنظلة! ساعة وساعة، ولو كانت ما تكون قلوبكم كما تكون عند الذكر لصافحتكم الملائكة حتى تسلم عليكم في الطرق".

صحيح: رواه مسلم في التوبة (2750) من طرق، عن جعفر بن سليمان، عن سعيد بن إياس الجُريري، عن أبي عثمان النهدي، عن حنظلة الأسيدي، فذكره باللفظ الأول.

ورواه أيضا (2750: 13) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا عبد الصمد، سمعت أبي يحدث:
حدثنا سعيد الجريري به باللفظ الثاني.

قوله:"عافسنا" أي: عالجنا معايشنا وحظوظنا.

قوله:"الضيعات" هي معايش الرجال من مال أو حرفة أو صناعة.




হানযালা আল-উসাইদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর লেখকদের অন্যতম ছিলেন—তিনি বলেন: আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আমার সাক্ষাৎ হলো। তিনি বললেন, হে হানযালা! তুমি কেমন আছো?

হানযালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম: হানযালা মুনাফিক হয়ে গেছে।

আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, সুবহানাল্লাহ! তুমি কী বলছো?

আমি বললাম, আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে থাকি, তখন তিনি আমাদেরকে জান্নাত ও জাহান্নামের কথা এমনভাবে স্মরণ করিয়ে দেন, যেন আমরা তা চাক্ষুষ দেখছি। কিন্তু যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে বের হয়ে আসি, তখন আমরা স্ত্রী, সন্তান-সন্ততি ও জাগতিক কাজকর্ম নিয়ে ব্যস্ত হয়ে পড়ি, ফলে অনেক কিছুই ভুলে যাই।

আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আল্লাহর কসম! আমরাও তো ঠিক এমন অবস্থার সম্মুখীন হই।

অতএব, আমি ও আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চললাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! হানযালা মুনাফিক হয়ে গেছে।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তা কীভাবে হলো?”

আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনার নিকট থাকি, আপনি আমাদেরকে জান্নাত ও জাহান্নামের কথা এমনভাবে স্মরণ করিয়ে দেন, যেন আমরা তা চাক্ষুষ দেখছি। কিন্তু যখন আমরা আপনার নিকট থেকে বের হয়ে যাই, তখন স্ত্রী, সন্তান-সন্ততি ও জাগতিক কাজকর্ম নিয়ে ব্যস্ত হয়ে পড়ি, ফলে অনেক কিছুই ভুলে যাই।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! তোমরা যদি সেই অবস্থায় সর্বদা বজায় থাকতে, যে অবস্থায় আমার নিকট থাকো এবং সর্বদা যদি আল্লাহর যিকিরে লেগে থাকতে, তবে ফেরেশতারা তোমাদের বিছানায় এবং তোমাদের পথে তোমাদের সাথে মুসাফাহা (হ্যান্ডশেক) করত। কিন্তু, হে হানযালা! কিছুক্ষণ (ইহকালীন) ও কিছুক্ষণ (পরকালীন)।" এই কথা তিনি তিনবার বললেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি বলেছেন: “হে হানযালা! কিছুক্ষণ (ইহকালীন) ও কিছুক্ষণ (পরকালীন)। তোমাদের অন্তর যদি সেই অবস্থায় থাকত, যে অবস্থায় যিকিরের সময় থাকে, তাহলে ফেরেশতারা তোমাদের সাথে মুসাফাহা করত, এমনকি রাস্তায়ও তোমাদেরকে সালাম দিত।”









আল-জামি` আল-কামিল (10582)


10582 - عن أنس أن أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قالوا للنبي صلى الله عليه وسلم: إنا إذا كنا عندك فحدثتنا رقّت قلوبنا، فإذا خرجنا من عندك، عافسنا النساء والصبيان وفعلنا وفعلنا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن تلك الساعة لو تدومون عليها لصافحتكم الملائكة".

صحيح: رواه أحمد (12796)، والبخاري في التاريخ الكبير (3/ 37) كلاهما من طرق عن ثابت البناني، عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه البزار - كشف الأستار (3234)، وأبو يعلى (3035)، وابن حبان (344) كلهم من طريق عبد الرزاق، أنبأنا معمر، عن قتادة، عن أنس فذكره.

وإسناده أيضا صحيح.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবাগণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আমরা যখন আপনার নিকট উপস্থিত থাকি এবং আপনি আমাদেরকে উপদেশ দেন, তখন আমাদের হৃদয় নরম হয়ে যায়। কিন্তু যখন আমরা আপনার নিকট থেকে বের হয়ে যাই, তখন আমরা স্ত্রী ও সন্তানদের সাথে মেলামেশা করি এবং বিভিন্ন কাজকর্মে লিপ্ত হই। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তোমরা সব সময় সেই (নরম হৃদয়ের) অবস্থার উপর স্থায়ী থাকতে, তবে ফেরেশতারা তোমাদের সাথে হাত মেলাতো।"









আল-জামি` আল-কামিল (10583)


10583 - عن أنس بن مالك، قال: غدا أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم ذات يوم فقالوا: يا رسول الله، هلكنا ورب الكعبة. فقال:"وما ذاك؟" قالوا: النفاق، النفاق. قال:"ألستم تشهدون أن لا إله إلا الله وحده لا شريك له، وأن محمدا عبده ورسوله؟" قالوا: بلى. قال:"ليس ذاك النفاق". قال: ثم عادوا الثانية فقالوا: يا رسول الله، هلكنا ورب الكعبة. قال:"وما ذاك؟" قالوا: النفاق النفاق. قال:"ألستم تشهدون أن لا إله إلا الله وأن محمدا عبده ورسوله؟" قالوا: بلى. قال:"ليس ذاك النفاق". قال: ثم عادوا الثالثة فقالوا: يا رسول الله، هلكنا ورب الكعبة، قال:"وما ذاك؟". قالوا: النفاق. قال:"ألستم تشهدون أن لا إله إلا الله وأن محمدا عبده ورسوله؟". قالوا: بلى. قال:"ليس ذاك النفاق". قالوا: إنا إذا كنا عندك كنا على حال، وإذا خرجنا من عندك همتنا الدنيا وأهلونا. قال:"لو أنكم إذا خرجتم من عندي تكونون على الحال الذي تكونون عليه، لصافحتكم الملائكة بطرق المدينة".

حسن: رواه أبو يعلى (3304) عن عبد الواحد (هو ابن غياث)، حدثنا غسّان بن بُرزين يعني الطهوي، حدثنا ثابت البناني، عن أنس بن مالك فذكره.

وإسناده حسن من أجل غسّان بن بُرزين فإنه حسن الحديث.

قال الهيثمي في المجمع (10/ 558):"رواه أبو يعلى، ورجاله رجال الصحيح غير غسّان بن برزين وهو ثقة".




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ ভোরে এসে বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! কাবার রবের শপথ, আমরা ধ্বংস হয়ে গেছি।" তিনি বললেন, "তা কী?" তাঁরা বললেন, "মুনাফিকি, মুনাফিকি।" তিনি বললেন, "তোমরা কি সাক্ষ্য দাও না যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি এক, তাঁর কোনো শরীক নেই এবং মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল?" তাঁরা বললেন, "হ্যাঁ (অবশ্যই সাক্ষ্য দেই)।" তিনি বললেন, "তাহলে এটা মুনাফিকি নয়।"

এরপর তারা দ্বিতীয়বার ফিরে এসে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! কাবার রবের শপথ, আমরা ধ্বংস হয়ে গেছি।" তিনি বললেন, "তা কী?" তাঁরা বললেন, "মুনাফিকি, মুনাফিকি।" তিনি বললেন, "তোমরা কি সাক্ষ্য দাও না যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল?" তাঁরা বললেন, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তাহলে এটা মুনাফিকি নয়।"

এরপর তারা তৃতীয়বার ফিরে এসে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! কাবার রবের শপথ, আমরা ধ্বংস হয়ে গেছি।" তিনি বললেন, "তা কী?" তাঁরা বললেন, "মুনাফিকি।" তিনি বললেন, "তোমরা কি সাক্ষ্য দাও না যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল?" তাঁরা বললেন, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তাহলে এটা মুনাফিকি নয়।"

তাঁরা বললেন, "আমরা যখন আপনার নিকট থাকি, তখন আমরা এক অবস্থায় থাকি। আর যখন আপনার নিকট থেকে বেরিয়ে যাই, তখন দুনিয়া ও আমাদের পরিবারবর্গ আমাদের মনকে আচ্ছন্ন করে ফেলে।" তিনি বললেন, "তোমরা যদি আমার নিকট থেকে বেরিয়ে যাওয়ার পরেও ঐ একই অবস্থায় থাকতে, তাহলে ফেরেশতাগণ তোমাদের সঙ্গে মদীনার পথে পথে মুসাফাহা করত।"









আল-জামি` আল-কামিল (10584)


10584 - عن المهاجر بن قنفذ أنه أتى النبي صلى الله عليه وسلم وهو يبول فسلّم عليه، فلم يرد عليه السلام حتى توضأ، ثم اعتذر إليه فقال:"إني كرهت أن أذكر الله عز وجل إلا على طهر". أو قال:"على طهارة".

صحيح: رواه أبو داود (17) - واللفظ له -، والنسائي (38)، وابن ما جه (350)، وصحّحه ابن خزيمة (206)، وابن حبان (803)، والحاكم (1/ 167) كلهم من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن، عن حضين بن المنذر أبي ساسان، عن المهاجر بن قنفذ بن عمير فذكره. وإسناده صحيح.




মুহাজির ইবনে কুনফুয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন, তখন তিনি পেশাব করছিলেন। অতঃপর তিনি তাঁকে সালাম দিলেন। কিন্তু নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযু করা পর্যন্ত সালামের উত্তর দিলেন না। অতঃপর তিনি তার কাছে ওজর পেশ করে বললেন, "আমি অপবিত্র অবস্থায় আল্লাহ আয্যা ওয়া জাল্লার নাম উচ্চারণ করা অপছন্দ করি।" অথবা তিনি বললেন, "পবিত্রতা ব্যতীত।"









আল-জামি` আল-কামিল (10585)


10585 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لأن أقعد مع قوم يذكرون الله تعالى من صلاة الغداة حتى تطلع الشمس أحب إلي من أن أعتق أربعة من ولد إسماعيل، ولأن أقعد مع قوم يذكرون الله من صلاة العصر إلى أن تغرب الشمس أحب إلي من أن أعتق أربعة".

حسن: رواه أبو داود (3667) عن محمد بن المثنى، حدثني عبد السلام - يعني ابن مطهر (أبو ظفر) حدثنا موسى بن خلف العمي، عن قتادة، عن أنس فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد السلام بن مطهر وموسى بن خلف فإنهما حسنا الحديث.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমি এমন একদল লোকের সাথে ফজরের সালাতের পর থেকে সূর্যোদয় পর্যন্ত আল্লাহ তাআলার যিকির করি, তা আমার কাছে ইসমাঈল-বংশের (বনী ইসমাঈলের) চারজন দাস মুক্ত করার চেয়েও অধিক প্রিয়। আর যদি আমি এমন একদল লোকের সাথে আসরের সালাতের পর থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত আল্লাহ তাআলার যিকির করি, তা আমার কাছে চারজন দাস মুক্ত করার চেয়েও অধিক প্রিয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (10586)


10586 - عن أبي أمامة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صلى صلاة الغداة في جماعة ثم جلس يذكر الله حتى تطلع الشمس ثم قام فركع ركعتين انقلب بأجر حجة وعمرة".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (8/ 209) عن الحسين بن إسحاق التستري، حدثنا المغيرة بن عبد الرحمن الحراني، حدثنا عثمان بن عبد الرحمن، عن موسى بن علي، عن يحيى بن الحارث، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكره.

وإسناده حسن من أجل القاسم وهو ابن عبد الرحمن الشامي الدمشقي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وعثمان بن عبد الرحمن - وهو الطرائفي - حسن الحديث أيضا.

وقال المنذري في الترغيب والترهيب (675):"رواه الطبراني وإسناده جيد". وتبعه الهيثمي في مجمع الزوائد (10/ 104).

ورواه أبو داود (558)، وأحمد (22304) من وجه آخر عن يحيى بن الحارث به بمعناه، وليس
فيه ذكر الجلوس إلى طلوع الشمس وهو مذكور في كتاب الصلاة.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি জামাতের সাথে ফজরের সালাত আদায় করে, অতঃপর সূর্য ওঠা পর্যন্ত সেখানে বসে আল্লাহর যিকির করতে থাকে, তারপর উঠে দুই রাকাত (সালাত) আদায় করে, সে একটি হজ্জ ও উমরার সওয়াব নিয়ে ফিরে আসে।"









আল-জামি` আল-কামিল (10587)


10587 - عن ابن عباس قال: أخذ النبي صلى الله عليه وسلم بنتًا له تقضِي، فاحتضنها، فوضعها بين ثدْييه فماتتْ وهي بين ثدْييه، فصاحت أم أيمن فقيل: أتبكي عند رسول الله؟ قالت: ألستُ أَراك تبكي يا رسول الله؟ قال:"لست أبكي، إنما هي رحمة، إن المؤمن بكل خير على كل حال، إن نفسه تخرج من بين جنبيه، وهو يحمد الله عز وجل".

صحيح: رواه أحمد (2475) عن أبي أحمد، حدثنا سفيان، عن عطاء بن السائب، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده صحيح، عطاء بن السائب ثقة، وثقه الأئمة إلا أنه اختلط في آخر عمره، ولكن روى سفيان عنه قبل الاختلاط.

ورواه النسائي (1843) من طريق أبي الأحوص عن عطاء به.

والكلام عليه مبسوط في الجنائز.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর এক অসুস্থ কন্যাকে কোলে তুলে নিলেন, যে (মৃত্যুশয্যায়) ছটফট করছিল। অতঃপর তিনি তাকে বুকে জড়িয়ে নিলেন এবং নিজের বক্ষের মাঝখানে রাখলেন। সে তাঁর দুই বক্ষের মাঝখানে থাকা অবস্থাতেই মারা গেল। তখন উম্মু আইমান চিৎকার করে কেঁদে উঠলেন। তাঁকে বলা হলো: আপনি আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছেও কাঁদছেন? তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, আমি কি আপনাকে কাঁদতে দেখছি না? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তো কাঁদছি না, এটি কেবল দয়া (রহমত)। নিশ্চয় মু'মিন সব অবস্থায়ই সব ধরনের কল্যাণের মধ্যে থাকে। যখন তার রূহ তার দুই পাঁজরের মাঝখান থেকে বের হয়, তখনও সে মহান আল্লাহ তা'আলার প্রশংসা করে।"