হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1061)


1061 - عن طاوس أنه قال: أدركتُ ناسًا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقولون: كلّ شيء بقدر. قال: وسمعت عبد اللَّه بن عمر يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كلّ شيء بقدر، حتّى العجز والكَيْس، أو الكَيْس والعجز".

صحيح: رواه مالك في القدر (4) عن زياد بن سعد، عن عمرو بن مسلم، عن طاوس اليمانيّ، قال (فذكره).

ورواه مسلم في القدر (2655) عن عبد الأعلى بن حمّاد، قال: قرأتُ على مالك بن أنس، فذكر مثله.

والكيّس: ضد العجز وهو النّشاط والحذق بالأمور. ومعناه: أنّ العاجز قدر عجزه، والكيس قدر كيسه.




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাউস (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এমন কিছু সাহাবীকে পেয়েছি, যারা বলতেন: সবকিছু তাকদীর অনুযায়ী হয়। তিনি (তাউস) আরও বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “সবকিছুই তাকদীর অনুযায়ী হয়, এমনকি অক্ষমতা (দুর্বলতা) এবং চতুরতা (সক্ষমতা) পর্যন্ত, অথবা চতুরতা (সক্ষমতা) এবং অক্ষমতা (দুর্বলতা)।”









আল-জামি` আল-কামিল (1062)


1062 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تسأل المرأةُ طلاق أختها لتستفرغ صحْفتها، ولتنكح، فإنّما لها ما قُدر لها".

صحيح: رواه مالك في القدر (7) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في القدر (6601) عن عبد اللَّه بن يوسف، عن مالك، بإسناده، مثله.

قال ابن عبد البر: وهذا الحديث من أحسن أحاديث القدر عند أهل العلم؛ لما دلّ عليه من أنّ الزّوجَ لو أجابها، وطلَّق من تظنُّ أنّها تزاحمُها في رزقها، فإنّه لا يحصل لها من ذلك إلّا ما كتب اللَّه لها سواء أجابها أو لم يجبْها، وهو كقوله تعالى: {قُلْ لَنْ يُصِيبَنَا إِلَّا مَا كَتَبَ اللَّهُ لَنَا} [سورة التوبة: 51]".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো নারী যেন তার (মুসলিম) বোনের তালাক না চায়—যাতে সে (তালাকপ্রাপ্ত নারীর) ভাগ খালি করে দিতে পারে এবং (নিজে সেই স্বামীকে) বিবাহ করতে পারে। কেননা তার জন্য ততটুকুই রয়েছে, যতটুকু তার জন্য নির্ধারণ করা হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1063)


1063 - عن أبي هريرة، قال: جاء مشركوقريش يخاصمون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في القدر. فنزلت: {يَوْمَ يُسْحَبُونَ فِي النَّارِ عَلَى وُجُوهِهِمْ ذُوقُوا مَسَّ سَقَرَ (48) إِنَّا كُلَّ شَيْءٍ خَلَقْنَاهُ بِقَدَرٍ} [سورة القمر: 48 - 49].

صحيح: رواه مسلم في القدر (2659) من طرق عن وكيع، عن سفيان، عن زياد بن إسماعيل، عن محمد بن عباد بن جعفر المخزومي، عن أبي هريرة، فذكره.

والقَدَر: بتحريك الدال هو المقدور.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশের মুশরিকরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাকদীর (ভাগ্য) নিয়ে বিতর্ক করতে এসেছিল। তখন এই আয়াতগুলি নাযিল হয়: {যেদিন তাদেরকে মুখে ভর দিয়ে জাহান্নামে টেনে নিয়ে যাওয়া হবে (এবং বলা হবে): তোমরা সাকার (জাহান্নামের) স্পর্শের স্বাদ গ্রহণ করো। (৪৮) নিশ্চয় আমি প্রতিটি বস্তু সৃষ্টি করেছি পরিমাপ অনুসারে।} [সূরা আল-কামার: ৪৮-৪৯]।









আল-জামি` আল-কামিল (1064)


1064 - عن أبي بردة، قال: أتيتُ عائشة، فقلت: يا أمّتاه، حدِّثيني شيئًا سمعتيه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الطّير تجري بقدر". وكان يعجبُه الفأل الحسن.

حسن: رواه الإمام أحمد (25972)، والبزّار - كشف الأستار (2161) كلاهما من حديث
حسان بن إبراهيم، قال: حدّثنا سعيد بن مسروق، عن يوسف بن أبي بردة بن أبي موسى الأشعريّ، عن أبي بردة، فذكره.

قال البزّار:"لا نعلم رواه إلَّا عائشة، ولا له إلّا هذا الإسناد".

وصحّحه ابنُ حبان (5824)، والحاكم (1/ 32) وقال:"قد احتجّ الشّيخان برواة هذا الحديث عن آخرهم غير يوسف بن أبي بردة، والذي عندي أنّهما لم يهملاه بجرح ولا بضعف، بل لقلّة حديثه، فإنّه عزيز الحديث جدًّا".

قلت: وهو كما قال؛ فإنّ يوسف هذا روى له اثنان، وذكره ابنُ حبان في"الثقات" (7/ 638)، ووثّقه العجليّ، وصحّح حديثه ابنُ خزيمة، وقال الذّهبي في"الكاشف":"ثقة". فمن المحتمل أن يكون حسن الحديث.

وأمّا قول البزّار:"ولا له إلّا هذا الإسناد".

فهو متعقّب؛ لأنّ الطّحاويّ رواه في"مشكله" (2/ 342) بإسناد آخر عن الرّبيع بن سليمان الأزديّ، ثنا يحيى بن مسلمة بن قعنب، ثنا حسان بن إبراهيم، عن سعد بن إبراهيم، عن سفيان الثوريّ، عن أبي بردة، قال:"سئلت عائشة: ما كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول في القدر؟ فقالت: كان يقول:"كلّ شيء بقدر". وكان يعجبه الفأل".

وهذا رجال إسناده ثقات غير يحيى بن مسلمة، فقال فيه العقيليّ (2060):"لا يتابع على حديثه، وقد حدَّث بمناكير".

قلت: وليس الأمر كما قال، فقد تُوبع يحيى بن مسلمة في الإسناد الأوّل.

تنبيه: إسناد الطّحاويّ اختلف تمامًا في النّسخة المحقّقة (5/ 101) والأمر يحتاج إلى التأكّد.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আবু বুরদাহ বলেন) আমি তাঁর নিকট এসে বললাম, "হে আমার আম্মাজান! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শোনা কোনো একটি বিষয় আমাকে বলুন।" তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাখিরাও তাকদির (আল্লাহর পূর্বনির্ধারিত বিধান) অনুযায়ী চলে।" আর তিনি শুভ লক্ষণ পছন্দ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1065)


1065 - عن ابن عباس، قال: ما رأيتُ شيئًا أشبه باللمم مما قال أبو هريرة عن النبيّ صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه كتب على ابن آدم حظّه من الزِّنا، أدرك ذلك لا محالة، فزنا العين النّظر، وزنا اللّسان المنطق، والنّفس تمنّى وتشتهي، والفرْج يصدِّق ذلك أو يكذّبه".

وفي رواية:"كُتب على ابنِ آدم نصيبُه من الزِّنا، مدرك ذلك لا محالة، فالعينان زناهما النّظر، والأذنان زناهما الاستماع، واللّسان زناه الكلام، واليد زناها البطش، والرّجل زناها الْخُطَا، والقلب يَهْوى ويتمنَّى، ويصدّق ذلك الفرْجُ ويكذّبه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في القدر (6612)، ومسلم في القدر (2657) كلاهما من حديث عبد الرزاق، حدّثنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن عباس، فذكره.

والرواية الثانية عند مسلم من وجه آخر عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة،
فذكره مرفوعًا.

قوله:"ما رأيت شيئًا أشبه باللَّمم" معناه تفسير قوله تعالى: {الَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ إِلَّا اللَّمَمَ إِنَّ رَبَّكَ وَاسِعُ الْمَغْفِرَةِ} [سورة النجم: 32]، ومعنى الآية واللَّه أعلم: الذين يجتنبون المعاصي غير اللّمم يغفر لهم اللّمم، كما في قوله تعالى: {إِنْ تَجْتَنِبُوا كَبَائِرَ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ نُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ} [سورة النساء: 31] فمعنى الآيتين: أنّ اجتناب الكبائر يسقط الضّغائر وهي اللّمم. وفسّره ابنُ عباس بما في هذا الحديث من النّظر، واللّمس ونحوهما، وهو كما قال، وهذا هو الصّحيح في تفسير اللّمم. أفاده النّوويّ رحمه الله.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে যা বর্ণনা করেছেন, আমি ‘লামাম’ (ক্ষুদ্র পাপ)-এর সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ এর চেয়ে অন্য কিছু দেখিনি। (তিনি বলেছেন): "নিশ্চয় আল্লাহ্‌ আদম সন্তানের উপর যিনার একটি অংশ লিখে রেখেছেন, যা সে অনিবার্যভাবে লাভ করবে। চোখের যিনা হলো দৃষ্টি দেওয়া, জিহ্বার যিনা হলো কথা বলা, আর মন আশা করে ও কামনা করে, অবশেষে লজ্জাস্থান তা সত্যে পরিণত করে বা মিথ্যা প্রতিপন্ন করে।"

আরেক বর্ণনায় এসেছে: "আদম সন্তানের উপর যিনার অংশ লিপিবদ্ধ করা হয়েছে। অনিবার্যভাবে সে তা প্রাপ্ত হবে। দুই চোখের যিনা হলো দৃষ্টি দেওয়া, দুই কানের যিনা হলো শোনা, জিহ্বার যিনা হলো কথা বলা, হাতের যিনা হলো ধরা বা আঘাত করা, পায়ের যিনা হলো পদক্ষেপ এবং অন্তর কামনা করে ও আশা করে। আর লজ্জাস্থান তা সত্যে পরিণত করে বা মিথ্যা প্রতিপন্ন করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1066)


1066 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"العينان تزنيان، واللّسان يزني، واليدان تزنيان، والرِّجلان تزنيان، ويحقِّقُ ذلك الفرْجُ أو يُكذِّبه".

صحيح: رواه البغويّ في شرح السنة (76) عن أبي عبد اللَّه الحرقي، نا أبو الحسن الطّيْفوني، أنا عبد اللَّه بن عمر الجوهريّ، نا أحمد بن علي الكشميهني، نا علي بن حُجْر، نا إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

قال البغويّ:"هذا حديث صحيح. والعلاء: هو العلاء بن عبد الرحمن بن يعقوب الحرقي مولى الحرقة، ورقة من جُهينة، يقال: مات العلاء سنة ثنتين وثلاثين ومائة". انتهى




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুই চোখ যেনা করে, জিহ্বা যেনা করে, দুই হাত যেনা করে, আর দুই পা যেনা করে, আর লজ্জাস্থান (যৌনাঙ্গ) তাকে বাস্তবায়িত করে অথবা মিথ্যা প্রমাণ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1067)


1067 - عن ابن مسعود، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"العينان تزنيان، واليدان تزنيان، والرِّجْلان تزنيان، والفرْجُ يزني".

حسن: رواه الإمام أحمد (3912)، وأبو يعلى (5364)، والبزّار -كشف الأستار (1550) - كلّهم من طريق همّام بن يحيى العوذيّ، حدّثنا عاصم بن بهدلة، عن أبي الضُّحى، عن مسروق، عن ابن مسعود، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن بهدلة فإنه حسن الحديث.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (6/ 256) وقال:"رواه أحمد، وأبو يعلى، والبزّار، والطّبراني، وإسنادهما جيِّد".

وفي الباب عن أنس في حديث طويل رواه أبو داود (4904) عن أحمد بن صالح، حدّثنا عبد اللَّه بن وهب، حدّثني سعيد بن عبد الرحمن بن أبي عمياء، أنّ سهل بن أبي أمامة، حدّثه أنّه دخل هو وأبوه على أنس بن مالك بالمدينة، فذكر القصّة وفيها:"والعين تزني، والكفّ والقدم واليد واللسان والفرْج يصدِّق ذلك أو يكذّبه".

ورواه أبو يعلى (3694) من طريق عبد اللَّه بن وهب به، وفيه بعض الزّيادات.

وفي الإسناد سعيد بن عبد الرحمن بن أبي عمياء روى عنه اثنان، ولم يوثقه إلّا ابن حبان، ولذا قال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي عند المتابعة، وإلّا فلين الحديث. ولم أجد له متابعًا.
واعتمد الحافظ الهيثمي على توثيق ابن حبان له فقال في"المجمع" (6/ 256):"رواه أبو يعلى، ورجاله رجال الصّحيح غير سعيد بن عبد الرحمن بن أبي عمياء وهو ثقة". ولم يُشر كعادته إلى رواية أبي داود وإلّا فليس على شرطه.

ثم إنّ لفظ الحديث ليس بمرفوع، إلّا أن يقال: إنّه في حكم الرّفع؛ لأنّ مثل هذا لا يقال بالرّأي.




ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: "দুই চোখ ব্যভিচার করে, দুই হাত ব্যভিচার করে, দুই পা ব্যভিচার করে এবং লজ্জাস্থান ব্যভিচার করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1068)


1068 - عن عياض بن حمار، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم فيما يرويه عن ربِّه تبارك وتعالى أنه قال:"خلقتُ عبادي حتفاء كلّهم وإنهم أتتهم الشياطين فاجتالتهم عن دينهم، وحرّمتْ عليهم ما أحللتُ لهم، وأمرتْهم أن يشركوا بي ما لم أُنزل به سلطانًا".

صحيح: رواه مسلم في كتاب التوبة (2865) من طرق عن معاذ بن هشام، عن أبيه، عن قتادة، عن مطرِّف بن عبد اللَّه بن الشخّير، عن عياض بن حمار المجاشعيّ، فذكره في حديث طويل، سيأتي في موضعه.




ইয়াদ ইবনু হিমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রব আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা থেকে বর্ণনা করে বলেন: "আমি আমার সকল বানলাদাকে বিশুদ্ধ স্বভাবের (একনিষ্ঠ) করে সৃষ্টি করেছি। কিন্তু তাদের কাছে শয়তানরা আসে এবং তাদেরকে তাদের দ্বীন থেকে বিচ্যুত করে দেয়। আর আমি যা তাদের জন্য হালাল করেছিলাম, তা তারা (শয়তানরা) তাদের ওপর হারাম করে দেয় এবং তারা তাদেরকে এমন জিনিসকে আমার সাথে শরীক করতে আদেশ করে, যার জন্য আমি কোনো দলিল (বা ক্ষমতা) নাযিল করিনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (1069)


1069 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مولود إلّا يولد على الفطرة، فأبواه يهودانه وينصرانه، كما تُنتجون البهيمة هل تجدون فيها من جدعاء حتى تكونوا أنتم تجدعونها؟". قالوا: يا رسول اللَّه، أفرأيتَ من يموت وهو صغير؟ قال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في القدر (6599)، ومسلم في القدر (2658: 24) كلاهما من حديث عبد الرزاق، عن معمر، عن همّام بن مُنبِّه، قال: هذا ما حدّثنا أبو هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر أحاديث، منها هذا.

ومعنى الحديث كما قال حماد بن سلمة:"هذا عندنا حيث أخذ اللَّه عليهم العهد في أصلاب آبائهم حيث قال: {أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى} [سورة الأعراف: 172]".

أخرجه أبو داود (4716) بإسناده عنه، وحسَّن هذا المعنى الخطّابي فقال:"معنى قول حمّاد في هذا حسن، وكأنه ذهب إلى أنه لا عبرة للإيمان الفطري في أحكام الدّنيا، وإنّما يعتبر الشّرعي المكتسب بالإرادة والفعل، ألا ترى أنه يقول:"فأبواه يهودانه وينصّرانه" فهو مع وجود الإيمان الفطري فيه محكوم له بحكم أبويه الكافِرَيْن". انتهى. انظر القضاء والقدر للبيهقيّ (3/ 871).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রতিটি শিশুই ফিতরাতের (সহজাত শুদ্ধ প্রকৃতি) উপর জন্মগ্রহণ করে। অতঃপর তার পিতামাতা তাকে ইয়াহুদী বানায়, অথবা খ্রিস্টান বানায়। যেমন তোমরা চতুষ্পদ জন্তুর জন্ম দিতে দেখো, তোমরা কি এর মধ্যে নাক-কান কাটা কোনো অঙ্গহানি দেখতে পাও, যতক্ষণ না তোমরা নিজেরাই তা কেটে দাও?" সাহাবীগণ বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! যদি কেউ ছোট অবস্থায় মারা যায়, (তবে তার হুকুম কী হবে?)' তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তারা কী আমল করত, সে সম্পর্কে আল্লাহই অধিক অবগত।"









আল-জামি` আল-কামিল (1070)


1070 - عن أبي هريرة أنه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مولود إلّا يولد على الفطرة، فأبواه يهوّدانه وينصّرانه ويمجّسانه، كما تُنتج البهيمةُ ببهيمة جمعاء، هل تُحسُّون فيها من
جدعاء؟". ثم يقول أبو هريرة: واقرؤوا إن شئتم: {فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ} [سورة الروم: 30]".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1359)، ومسلم في القدر (2658) كلاهما من حديث يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، أنّ أبا سلمة بن عبد الرحمن أخبره، أنّ أبا هريرة، قال (فذكره).

ورواه مالك في الجنائز (53) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكر مثله، ولم يذكر قول أبي هريرة وهو:"واقرؤا إن شئتم. . .". ولكن زاد فيه:"قالوا: يا رسول اللَّه: أرأيتَ الذي يموت وهو صغير؟ قال: اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

وهذه الزّيادة ليست في رواية ابن شهاب، وقد روى هذا الحديث عبد اللَّه بن الفضل الهاشميّ شيخ مالك، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"كل مولود يولد على الفطرة، فأبواه يهودانه، وينصّرانه، ويمجسانه كالبهيمة تُنتج البهيمة، هل تحسون فيها من جدعاء حتى تكونوا أنتم تجدعونها". إلى هنا انتهى حديثه، ولم يذكر ما في حديث مالك قوله:"أرأيت يموت وهو صغير" إلى آخر الحديث.

هكذا رواية ابن شهاب لهذا الحديث ليس فيها قوله:"أرأيت من يموت وهو صغير؟ قال: اللَّه أعلم بما كانوا عاملين". انتهى بما في التمهيد (18/ 58 - 59).

قلت: قوله صلى الله عليه وسلم:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين". وهو في حديث الزّهريّ، عن عطاء بن يزيد، عن أبي هريرة، كما سبق.

ولكن لا يبعد أن يكون أبو هريرة ذكر هذا في الحديثين كما في الحديث الآتي.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এমন কোনো নবজাতক নেই, যে ফিতরাত (সহজাত স্বভাব)-এর ওপর জন্মগ্রহণ করে না। অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায়, খ্রিস্টান বানায় এবং অগ্নিপূজক বানায়। যেমন চতুষ্পদ জন্তু আরেকটি নিখুঁত জন্তু জন্ম দেয়। তোমরা কি তাতে কোনো কাটা-কাটা (অঙ্গহানি) দেখতে পাও?" এরপর আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তোমরা চাইলে পাঠ করতে পারো: "{আল্লাহর দেওয়া প্রকৃতি, যে প্রকৃতির ওপর তিনি মানুষকে সৃষ্টি করেছেন। আল্লাহর সৃষ্টিতে কোনো পরিবর্তন নেই। এটাই সুপ্রতিষ্ঠিত দীন।}" [সূরা রূম: ৩০]।









আল-জামি` আল-কামিল (1071)


1071 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من مولود إلّا يولد على الفطرة، فأبواه يهودانه وينصرانه ويشركانه". فقال رجل: يا رسول اللَّه، أرأيتَ لو مات قبل ذلك؟ قال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

صحيح: رواه مسلم في القدر (2658: 23) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه من وجه آخر عن ابن نمير، وأبي معاوية - كلاهما عن الأعمش بهذا الإسناد. إلّا أنّ في حديث ابن نمير:"ما من مولود يولد إلّا وهو على الملّة".

وفي حديث أبي معاوية:"إلّا على هذه الملة حتى يُبَيّن عنه لسانه".

وفي رواية عنه:"حتّى يعبّر عنه لسانه".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক শিশুই ফিতরাতের (ইসলামের স্বভাবধর্ম) ওপর জন্মগ্রহণ করে। এরপর তার বাবা-মা তাকে ইয়াহুদী বানায়, নাসারা (খ্রিস্টান) বানায় অথবা মুশরিক (অংশীবাদী) বানায়।" তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), যদি সে তার পূর্বেই মারা যায়, তাহলে আপনি কী বলেন? তিনি বললেন: "তারা কী আমলকারী ছিল, সে সম্পর্কে আল্লাহই অধিক অবগত।"









আল-জামি` আল-কামিল (1072)


1072 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"كلّ إنسان تلده أمُّه على الفطرة، وأبواه بعدُ يهوِّدانه، وينصّرانه، ويمجِّسانه، فإن كانا مسلمَيْنِ فمسلم، كلّ إنسان تلده
أمُّه يلكزه الشّيطان في حِضْنَيْه إلّا مريم وابنَها".

صحيح: رواه مسلم في القدر (2658: 25) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا عبد العزيز (يعني الدّراورديّ)، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وقوله:"حِضْنَيْه" تثنية حِضن وهو الجنب، وقيل: الخاصرة.

وأمّا ما رُوي عن الأسود بن سريع:"أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعث سريّة يوم حنين فقاتلوا المشركين، فأفضى بهم القتلُ إلى الذّريّة، فلما جاءوا قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما حملكم على قتل الذريّة"؟ قالوا: يا رسول اللَّه، إنّما كانوا أولاد المشركين. قال:"أَوَ هَلْ خياركم إلّا أولاد المشركين؟ والذي نفس محمّد بيده ما من نسمة تُولد إلّا على الفطرة، حتى يُعرب عنها لسانُها". فهو منقطع.

رواه الإمام أحمد (15588)، والطبرانيّ في الكبير (826، 828)، وفي الأوسط (2005)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (3/ 863) كلّهم من طرق عن الحسن، عن الأسود بن سريع، فذكره.

والحسن هو ابن أبي الحسن البصريّ الإمام المشهور، إلّا أنّه كان يدلِّس، وقد أكَّد أهلُ العلم أنه لم يسمع من الأسود بن سريع. قال علي بن المديني:"لم يسمع من الأسود بن سريع؛ لأنّ الأسود بن سريع خرج من البصرة أيام علي رضي الله عنه، وكان الحسن بالمدينة". انظر: تحفة التحصيل (ص 71).

وقال أبو عبيد الآجريّ: سألت أبا داود: الحسن سمع من الأسود بن سريع؟ قال:"لا، قال: الأسود بن سريع لما وقعت الفتنة بالبصرة ركب البحر، فلا يدري خبره. قال أبو داود: ما أرى الحسن سمع من الأسود بن سريع. سؤالات الآجري (727).

وأمّا ما جاء التّصريح بالتحديث من الحسن في بعض الرّوايات، منها ما ذكره البخاريّ في"التاريخ الكبير" (1/ 445)، والحاكم في"المستدرك" (2/ 123)، والبيهقيّ في"القضاء والقدر" (3/ 867) فهو مؤوّل على معناه حدّث أهل البصرة، كقوله:"خطبنا ابن عباس". وهو لم يدركه، فتأولوا: أي خطب أهل البصرة؛ لأنّ الحسن لم يعرف عنه التّعمد في الكذب، وقد أكّد أيضًا البيهقيّ بأنّ الحفّاظ لا يُثْبِتون سماع الحسن من الأسود بن سريع.

وكذلك ما رُوي عن جابر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كلُّ مولود يولد على الفطرة، حتى يعرب عنه لسانُه، فإذا أعربَ عنه لسانه إمّا شاكرًا وإمّا كفورًا".

رواه الإمام أحمد (14805) عن هاشم، حدثّنا أبو جعفر، عن الرّبيع بن أنس، عن الحسن، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.

وأبو جعفر هو الرّازيّ المشهور بكنيته، واسمه عيسى بن أبي عيسى مختلف فيه، فوثّقه ابن معين وأبو حاتم وابن سعد، وقال أحمد: ليس بقوي، وقال النسائيّ: ليس بالقوي، وقال ابن حبان: كان ينفرد عن المشاهير بالمناكير، لا يُعجبني الاحتجاج بحديثه إلّا فيما وافق الثقات".
وفي الإسناد أيضًا الحسن وهو البصّري مدلِّس وقد عنعن.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (7/ 218) وقال:"رواه أحمد، وفيه أبو جعفر الرّازيّ وهو ثقة، وفيه خلاف، وبقية رجاله ثقات".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রত্যেক মানুষকেই তার মা ফিতরাতের (স্বাভাবিক ইসলামী প্রকৃতির) উপর জন্ম দেয়, এরপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায়, অথবা খ্রিস্টান বানায়, অথবা অগ্নিপূজক বানায়। আর যদি তার বাবা-মা মুসলিম হয়, তবে সে মুসলিম হয়। প্রত্যেক মানুষকেই তার মা জন্ম দেওয়ার সময় শয়তান তার দুই পাশে (পাঁজরে) খোঁচা মারে, তবে মারইয়াম ও তাঁর পুত্র (ঈসা) ছাড়া।









আল-জামি` আল-কামিল (1073)


1073 - عن الصّعب بن جثَّامة قال: مَرَّ بي النبيُّ صلى الله عليه وسلم بالأبواء أو بودَّان، وسُئل عن أهل الدّار يُبيِّتون من المشركين، فيصاب من نسائهم وذراريهم؟ قال:"هم منهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3012)، ومسلم في الجهاد والسير (1745) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن الزّهريّ، عن عبيد اللَّه، عن ابن عباس، عن الصّعب بن جثّامة، فذكره.

ورواه مسلم من حديث عمرو بن دينار، عن ابن شهاب، بإسناده وفيه:"هم من آبائهم". فهذا يدلُّ على أنّ حكمهم في البيات حكم آبائهم، وأمّا في الآخرة فيرجع أمرهم إلى قوله:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

انظر: البيهقي: القضاء والقدر




সা'ব ইবনু জাছছামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল-আবওয়া অথবা ওয়াদ্দান নামক স্থানে আমার নিকট দিয়ে অতিক্রম করছিলেন। তখন তাঁকে মুশরিকদের এমন গোত্র সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো যাদের উপর রাতে আক্রমণ করা হয় এবং এর ফলে তাদের নারী ও শিশুদের আঘাত লাগে (তারা নিহত হয়)? তিনি বললেন, "তারা (নারী ও শিশুরা) তাদের (মুশরিকদের) অন্তর্ভুক্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (1074)


1074 - عن أبي هريرة، قال: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن ذراري المشركين، فقال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

وفي رواية:"من يموت منهم صغيرًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في القدر (6598)، ومسلم في القدر (2659) كلاهما من حديث ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد، عن أبي هريرة، فذكره.

والرواية الثانية عند مسلم من طريق سفيان، عن أبي الزِّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، قال: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن أطفال المشركين من يموت منهم صغيرًا؟ فقال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুশরিকদের সন্তান-সন্ততি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "তারা কী আমল করত, সে সম্পর্কে আল্লাহই সবচেয়ে ভালো জানেন।"

অন্য এক বর্ণনায় (জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল) তাদের মধ্যে যারা ছোট অবস্থায় মারা যায় (তাদের সম্পর্কে)।

অন্য বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুশরিকদের সেইসব শিশু-সন্তান সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো যারা ছোট অবস্থায় মারা যায়? তিনি বললেন: "তারা কী আমল করত, সে সম্পর্কে আল্লাহই সবচেয়ে ভালো জানেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (1075)


1075 - عن ابن عباس، قال: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن أولاد المشركين فقال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

وفي رواية:"اللَّه إذْ خلقهم أعلم بما كانوا عاملين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في القدر (6597)، ومسلم في القدر (2660) كلاهما من حديث أبي بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
والرّواية الثانية عند البخاريّ أيضًا (1383).

وفي قوله:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين". أي إن اللَّه علم ما كان، ويعلم ما يكون، وما لا يكون.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুশরিকদের (অংশীবাদী বা কাফিরদের) সন্তান-সন্ততিদের (পরিণতি) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: "তারা কী কাজ করবে, সে সম্পর্কে আল্লাহই অধিক অবগত।"

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "আল্লাহ যখন তাদের সৃষ্টি করেন, তখন তারা কী কাজ করবে সে সম্পর্কে তিনি অধিক অবগত ছিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (1076)


1076 - عن ابن عباس، قال: أتي عليَّ زمانٌ، وأنا أقول: أولاد المسلمين مع المسلمين، وأولاد المشركين مع المشركين، حتّى حدّثني فلانٌ، عن فلان، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سئل عنهم فقال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين". قال: فلقيت الرّجل، فأخبرني فأمْسَكتُ عن قولي.

صحيح: رواه الإمام أحمد (20697، 23484) من وجهين عن عمّار بن أبي عمّار، عن ابن عباس، فذكره. وإسناده صحيح.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابنُ أبي عاصم في"السنة" (214).




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক সময় আমার এমন ধারণা ছিল যে, মুসলিমদের সন্তানরা মুসলিমদের সাথে এবং মুশরিকদের সন্তানরা মুশরিকদের সাথে থাকবে। যতক্ষণ না অমুক ব্যক্তি, অমুক ব্যক্তির সূত্রে আমার কাছে হাদিস বর্ণনা করলো যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাদের (শিশুদের) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো। তখন তিনি বললেন: "তারা কী কাজ করত সে সম্পর্কে আল্লাহই অধিক অবগত।" ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর আমি সেই লোকটির সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং সে আমাকে ঘটনাটি জানালো। ফলে আমি আমার (পূর্বের) কথা বলা থেকে বিরত থাকলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1077)


1077 - عن ابن عباس، قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في بعض مغازيه فسأله رجل، فقال: يا رسول اللَّه، ما تقول في اللاهين؟ فسكت فلم يردّ عليه، فلما فرغ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من غزوه -أو عدوه- وظهر عليهم طاف، فإذا هو بصبي قد سقط من محفّة، فإذا هو يبحث في الأرض، فأمر مناديًا: أين السّائل عن اللاهين؟ فجاء الرّجلُ إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فنهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن قتل الأولاد، فقال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

حسن: رواه الفريابي في القدر (177)، والبزّار -كشف الأستار (2173) - كلاهما عن أبي كامل الجحدريّ، حدّثنا أبو عوانة، عن هلال بن خبّاب، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه الطّبرانيّ في الكبير (11/ 330) من طريق أبي عوانة، به، مثله.

قال البزّار:"لا نعلمه عن ابن عباس إلّا من هذا الوجه، ولا حدّث به عن هلال إلّا أبو عوانة".

قلت: إسناده حسن من أجل هلال بن خبّاب فإنّه حسن الحديث، وقد وثّقه الإمام أحمد، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، وتكلّم فيه ابنُ حبان بلا حجّة.

ولذا قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 218):"رواه البزّار، والطبراني في"الكبير" و"الأوسط"، وفيه هلال بن خبّاب، وهو ثقة، وفيه خلاف، وبقية رجاله ثقات".

وقوله:"اللاهين" قيل: هم البله الغافلون، وقيل: الذين لم يتعمّدوا الذّنوب، وإنّما فرط منهم سهوًا ونسيانًا، وقيل: هم الأطفال الذين لم يقترفوا ذنبًا.

انظر: النهاية (4/ 1283).




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো এক সামরিক অভিযানে ছিলেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: হে আল্লাহর রাসূল, আপনি ‘লাহিন’ (খেলায় মগ্ন ব্যক্তি বা শিশুদের) সম্পর্কে কী বলেন? তিনি চুপ থাকলেন এবং তাকে কোনো উত্তর দিলেন না। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর অভিযান—অথবা শত্রুদের—থেকে ফারিগ হলেন এবং তাদের উপর বিজয় লাভ করলেন, তখন তিনি চারদিকে ঘুরে দেখলেন যে, একটি শিশু পালকি (অথবা হাওদা) থেকে পড়ে গিয়ে মাটিতে হাত-পা নাড়ছে। তখন তিনি একজন ঘোষককে নির্দেশ দিলেন: ‘লাহিন’ সম্পর্কে প্রশ্নকারী কোথায়? লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শিশুদের হত্যা করতে নিষেধ করলেন এবং বললেন: “আল্লাহই ভালো জানেন তারা কী কাজ করত।”









আল-জামি` আল-কামিল (1078)


1078 - عن عائشة، قالت: قلتُ: يا رسول اللَّه، ذراري المؤمنين؟ فقال:"هم من آبائهم. فقلت: يا رسول اللَّه، بلا عمل؟ ! قال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين". قلت: يا رسول اللَّه، فذراري المشركين؟ قال:"من آبائهم". قلت: بلا عمل؟ !
قال:"اللَّه أعلم بما كانوا عاملين".

صحيح: رواه أبو داود (4712) عن عبد الوهاب بن نجدة، حدّثنا بقية ح. وحدّثنا موسى بن مروان الرّقيّ وكثير بن عبيد المذحجي، قالا: حدّثنا محمد بن حرب -المعنى- عن محمد بن زياد، عن عبد اللَّه بن أبي قيس، عن عائشة، فذكرته. وإسناده صحيح.

ومحمد بن حرب هو الخولانيّ الحمصيّ الأبرش، ثقة، من رجال الجماعة.

وأمّا ما رُوي عن علي بن أبي طالب، قال: سألتْ خديجةُ النَّبيَّ صلى الله عليه وسلم عن ولَدين ماتا لها في الجاهليّة؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هما في النّار". قال: فلمّا رأى الكراهيّة في وجهها قال:"لو

رأيتِ مكانهما لأبغضتهما": قالتْ: يا رسول اللَّه، فولدي منك؟ قال:"في الجنّة". قال: ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ المؤمنين أولادهم في الجنّة، وإنّ المشركين أولادهم في النّاره. ثم قرأ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم {وَالَّذِينَ آمَنُوا وَاتَّبَعَتْهُمْ ذُرِّيَّتُهُمْ بِإِيمَانٍ أَلْحَقْنَا بِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ} [سورة الطور: 21]". فهو ضعيف.

رواه عبد اللَّه في مسند أبيه (1131) عن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا محمد بن فُضيل، عن محمد ابن عثمان، عن زاذان، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

وفيه محمد بن عثمان مجهول. قال الذّهبيّ في"الميزان" (3/ 642):"لا يدري من هو؟ فتشتُ عنه في أماكن، وله خبر منكر". ثم ساق هذا الحديث عن عبد اللَّه بن أحمد بهذا الإسناد.

ومن هذا الوجه أخرجه ابنُ أبي عاصم في"السنة" (213)، وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 217).

والنكارة في هذا الحديث قوله بأن أولاد المشركين في النّار لمخالفته لقوله تعالى: {وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّى نَبْعَثَ رَسُولًا} [سورة الإسراء: 15]، فإذا كان اللَّه لا يعذِّبُ العاقل لكونه لم تبلغه الدّعوة فلأن لا يعذِّب غير العاقل من الأولاد من باب أولى، ولمخالفته أيضًا العديد من الأحاديث الدّالة على أنّ أولاد المشركين في الجنّة فضلًا من اللَّه ورحمة. من إفادات الشيخ الألبانيّ رحمه اللَّه تعالى في تعليقه على"السنة" لابن أبي عاصم (1/ 95).

وأمّا ما رُوي بأنّ أطفال المشركين خدم أهل الجنّة فلم يثبت بسند يعتمد عليه، وقد رُوي من حديث أنس بن مالك، وفي إسناده مبارك بن فضالة، عن علي بن زيد، عن أنس.

ومن طريقه رواه البزّار - كشف الأستار (2170، 2171) مرفوعًا وموقوفًا.

ومبارك بن فضالة، وعلي بن زيد وهو ابن جدعان كلاهما ضعيفان.

ورواه أبو يعلى، وفيه يزيد الرَّقاشيّ، وهو ضعيف.

ورُوي أيضًا من حديث سمرة بن جندب، وفيه عباد بن منصور، ضعيف. رواه البزّار -كشف الأستار (2172) -.

قال البزّار:"ولا نعلم روى هذا الحديث عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم إلا سمرة، ولا عنه إلّا أبو رجاء".
قلت: كذا قال! وقد أخرجه أيضًا عن أنس، كما سبق، ولكن كلّه ضعيف.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! মুমিনদের শিশুরা (তাদের ভাগ্য কী হবে)?’ তিনি বললেন, ‘তারা তাদের পিতৃ-মাতাদের সাথে।’ আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমল ছাড়াই?’ তিনি বললেন, ‘তারা যা আমল করত, আল্লাহ সে সম্পর্কে সর্বাধিক অবগত।’ আমি বললাম, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), তাহলে মুশরিকদের শিশুরা (তাদের অবস্থা কী)?’ তিনি বললেন, ‘তারাও তাদের পিতৃ-মাতাদের সাথে।’ আমি বললাম, ‘আমল ছাড়াই?’ তিনি বললেন, ‘তারা যা আমল করত, আল্লাহ সে সম্পর্কে সর্বাধিক অবগত।’









আল-জামি` আল-কামিল (1079)


1079 - عن أبي حسّان، قال: قلت لأبي هريرة: إنّه قد مات لي ابنان، فما أنت محدثي عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بحديث تُطَيِّبُ أنفسنا عن موتانا؟ قال: قال: نعم:"صغارهم دَعاميص الجنّة، يتلقَّى أحدُهم أباه -أو قال: أبويه- فيأخذ بثوبه -أو قال: بيده- كما آخذ أنا بصنفة ثوبك هذا، فلا يتناهى -أو قال: فلا ينتهي- حتّى يدخله اللَّه وأباه الجنّة".

صحيح: رواه مسلم في البر والصّلة (2635) من طرف عن المعتمر، عن أبيه، عن أبي السليل، عن أبي حسان، فذكره.

وقوله:"دعاميص". جمع دُعموص -وهو من صغار أهلها- أصل الدّعموص دُويبة تكون في الماء لا تفارقه، أي أن هذا الصغير في الجنّة لا يفارقها.

وقوله:"صنفة ثوبك". أي طرف ثوبك، ويقال: صَنيفة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ হাসসান বলেন: আমি আবু হুরায়রাকে বললাম, আমার দুজন পুত্রসন্তান মারা গেছে। আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এমন কোনো হাদীস বলবেন, যা আমাদের মৃতদের ব্যাপারে আমাদের মনকে শান্ত করবে? তিনি বললেন: হ্যাঁ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তাদের ছোট শিশুরা হলো জান্নাতের দা'আমীস (শিশু অধিবাসী)। তাদের মধ্যে একজন তার পিতাকে—অথবা তিনি বলেছেন: তার পিতা-মাতাকে—দেখা করবে এবং তার কাপড়—অথবা তিনি বলেছেন: তার হাত—এমনভাবে ধরবে, যেমনভাবে আমি তোমার এই কাপড়ের কিনারা ধরেছি। আর সে ততক্ষণ পর্যন্ত বিরত হবে না—অথবা তিনি বলেছেন: সে ক্ষান্ত হবে না—যতক্ষণ না আল্লাহ তাকে ও তার পিতাকে জান্নাতে প্রবেশ করান।"









আল-জামি` আল-কামিল (1080)


1080 - عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ذراري المسلمين في الجنّة يكفلهم إبراهيم".

وفي رواية:"أولاد المسلمين في جبل في الجنّة يكفلهم إبراهيم عليه السلام وسارة، فإذا كان يوم القيامة دُفعوا إلى آبائهم".

حسن: رواه الإمام أحمد (8324) عن موسى بن داود، حدّثنا عبد الرحمن بن ثابت، عن عطاء ابن قرّة، عن عبد اللَّه بن ضَمْرة، عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم فيما أعلم -شكّ موسى- قال (فذكر الحديث).

وإسناده حسن من أجل الخلاف في عبد الرحمن بن ثابت وهو ابن ثوبان العنسيّ ضعّفه النسائيّ، وقال ابن معين: لين، ووثقه أبو حاتم وابن حبان وغيرهما.

وقد صحّحه ابنُ حبان (7446)، والحاكم (2/ 370)، وروياه من هذا الوجه.

والرواية الثانية أخرجها البيهقيّ في القضاء والقدر (3/ 898) بإسناد آخر صحيح عن أبي هريرة، وأشار البيهقيّ بأنه رُوي من وجه آخر عن أبي هريرة مرفوعًا، فلعلّه أشار إلى الإسناد الأوّل.

وللحديث أسانيد أخرى، وهذه أصحّها.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুসলমানদের শিশুরা জান্নাতে থাকবে, ইব্রাহীম তাদের দেখাশোনা করবেন।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "মুসলমানদের সন্তানরা জান্নাতের একটি পাহাড়ে থাকবে। ইব্রাহীম (আঃ) ও সারা তাদের দেখাশোনা করবেন। যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন তাদের তাদের পিতামাতার কাছে ফিরিয়ে দেওয়া হবে।"