আল-জামি` আল-কামিল
10648 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف قال: السنة في الصلاة على الجنائز أن يكبر، ثم يقرأ بأم القرآن، ثم يصلى على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم يخلص الدعاء للميت، ولا يقرأ إلا في التكبيرة الأولى، ثم يسلم في نفسه عن يمينه.
صحيح: رواه عبد الرزاق (6428) - ومن طريقه ابن الجارود في المنتقى (540) - عن معمر، عن الزهري قال: سمعت أبا أمامة بن سهل بن حنيف يحدث ابن المسيب قال فذكره. وإسناده صحيح.
وصحّحه أيضا ابن القيم في جلاء الأفهام (ص 193).
وأبو أمامة هو: أسعد بن سهل بن حُنيف الأنصاري، وُلِد في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يسمع منه، فروايته عن النبي صلى الله عليه وسلم من باب مراسيل الصحابة. وهي مقبولة باتفاق أهل العلم.
وللحديث طرق أخرى مذكورة في كتاب الجنائز.
আবূ উমামা ইবনু সাহল ইবনু হুনাইফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জানাযার সালাতের সুন্নাত হলো এই যে, তিনি তাকবীর বলবেন, তারপর উম্মুল কুরআন (সূরা ফাতিহা) পাঠ করবেন, তারপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সালাত (দরূদ) পাঠ করবেন, তারপর একনিষ্ঠভাবে মাইয়্যেতের (মৃত ব্যক্তির) জন্য দু‘আ করবেন। আর তিনি প্রথম তাকবীর ছাড়া আর কোনো (কিছুর) তিলাওয়াত করবেন না, তারপর তিনি নীরবে ডানদিকে সালাম ফেরাবেন।
10649 - عن عبد الرحمن بن عبدٍ القاري - وكان في عهد عمر بن الخطاب مع عبد الله بن الأرقم على بيت المال - أن عمر خرج ليلة في رمضان، فخرج معه عبد الرحمن بن عبدٍ القاري، فطاف بالمسجد، وأهل المسجد أوزاع متفرقون، يصلي الرجل لنفسه، ويصلي الرجل فيصلي بصلاته الرهط، فقال عمر: والله! إني أظن لو جمعنا هؤلاء على قارئ واحد لكان أمثل، ثم عزم عمر على ذلك، وأمر أبي بن كعب أن يقوم لهم في رمضان، فخرج عمر عليهم، والناس يصلون بصلاة قارئهم فقال عمر: نعم البدعة هي، والتي تنامون عنها أفضل من التي تقومون - يريد آخر الليل - فكان الناس يقومون أوله، وكانوا يلعنون الكفرة في النصف: اللهم! قاتل الكفرة الذين
يصدون عن سبيلك، ويكذبون رسلك، ولا يؤمنون بوعدك، وخالف بين كلمتهم، وألق في قلوبهم الرعب، وألق عليهم رجزك وعذابك إله الحق، ثم يصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ويدعو للمسلمين بما استطاع من خير، ثم يستغفر للمؤمنين.
قال: وكان يقول إذا فرغ من لعنة الكفرة وصلاته على النبي واستغفاره للمؤمنين والمؤمنات ومسألته:"اللهم! إياك نعبد، ولك نصلي ونسجد، وإليك نسعى ونحفد، ونرجو رحمتك ربنا، ونخاف عذابك الجد، إن عذابك لمن عاديت ملحق، ثم يكبر ويهوى ساجدا".
صحيح: رواه ابن خزيمة (1100) عن الربيع بن سليمان المرادي، نا عبد الله بن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أخبرني عروة بن الزبير، عن عبد الرحمن بن عبد القاري فذكره.
ورواه البخاري (2010) من طريق ابن شهاب به الجزء الأول منه إلى قوله:"وكان الناس يقومون أوله".
আবদুর রহমান ইবনে আব্দিল ক্বারী থেকে বর্ণিত—তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে আব্দুল্লাহ ইবনুল আরকামের সাথে বাইতুল মালের (কোষাগারের) দায়িত্বে ছিলেন—তিনি বলেন, এক রাতে রমযান মাসে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন। আবদুর রহমান ইবনে আব্দিল ক্বারীও তাঁর সাথে বের হলেন। তিনি মসজিদ প্রদক্ষিণ করলেন। মসজিদের লোকেরা বিচ্ছিন্ন ও বিক্ষিপ্ত অবস্থায় ছিল। কেউ একা সালাত পড়ছিল, আবার কেউ সালাত পড়লে একটি ছোট দল তার সাথে সালাত আদায় করছিল। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি মনে করি, যদি আমি এই লোকগুলোকে একজন ক্বারীর (ইমামের) পেছনে একত্র করে দেই, তবে তা সর্বোত্তম হবে। এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই সিদ্ধান্ত নিলেন এবং উবাই ইবনে কা'বকে নির্দেশ দিলেন যে তিনি যেন রমযানে তাদের নিয়ে (জামায়াতে) সালাত আদায় করান।
এরপর একদিন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে বের হলেন, আর লোকেরা তাদের ক্বারীর সাথে সালাত আদায় করছিল। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই কতই না চমৎকার বিদ'আত! আর তোমরা রাতের যে অংশটুকু ঘুমিয়ে থাকো, তা জেগে সালাত আদায়ের অংশটুকু থেকে উত্তম—তিনি রাতের শেষ অংশকে বোঝাতে চাইলেন। লোকেরা রাতের প্রথম অংশে (সালাত) আদায় করত, আর রাতের মধ্যভাগে তারা কাফিরদের প্রতি অভিশাপ করত (অর্থাৎ কুনুতে): "হে আল্লাহ! তুমি সেই কাফিরদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করো, যারা তোমার পথ থেকে বাধা দেয়, তোমার রাসূলদের মিথ্যা প্রতিপন্ন করে, তোমার প্রতিশ্রুতির উপর ঈমান আনে না। তাদের মধ্যে বিভেদ সৃষ্টি করো, তাদের হৃদয়ে ভয় ঢুকিয়ে দাও এবং তাদের উপর তোমার গজব ও শাস্তি বর্ষণ করো, হে সত্য ইলাহ!"
এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সালাত (দরুদ) পড়তেন এবং মুসলিমদের জন্য যথাসম্ভব কল্যাণের দু'আ করতেন। তারপর মুমিনদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতেন।
তিনি (আব্দুর রহমান) আরও বলেন: যখন তিনি কাফিরদের উপর অভিশাপ করা, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর দরুদ পাঠ করা, মুমিন-মুমিনাদের জন্য ইস্তিগফার (ক্ষমা প্রার্থনা) করা এবং প্রার্থনা করা শেষ করতেন, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! আমরা কেবল তোমারই ইবাদত করি, তোমারই জন্য সালাত আদায় করি এবং সিজদা করি। আমরা তোমারই দিকে দ্রুত অগ্রসর হই এবং কঠোর পরিশ্রম করি। হে আমাদের রব! আমরা তোমার দয়ার আশা করি এবং তোমার কঠোর শাস্তিকে ভয় করি। নিশ্চয়ই তোমার শাস্তি তাদের উপর আপতিত হবে, যাদের সাথে তুমি শত্রুতা করো।" অতঃপর তিনি তাকবীর বলে সিজদায় যেতেন।
10650 - عن أبي حميد أو أبي أسيد الأنصاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إذا دخل أحدكم المسجد فليسلم على النبي صلى الله عليه وسلم ثم ليقل:"اللهم! افتح لي أبواب رحمتك"، فإذا خرج فليقل:"اللهم إني أسألك من فضلك".
صحيح: رواه أبو داود (465)، وابن ماجه (772)، والبيهقي (2/ 441 - 442)، وصحّحه ابن حبان (2048) كلهم من طرق، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن عبد الملك بن سعيد بن سويد، عن أبي حميد أو أبي أسيد فذكره. إلا أنه ليس في رواية ابن ماجه ذكر أبي أسيد. وإسناده صحيح.
ورواه مسلم (713) عن ربيعة به إلا أنه ليس عنده لفظ التسليم.
قال البيهقي:"ولفظ التسليم فيه محفوظ".
وثبت عن كعب الأحبار أنه قال: يا أبا هريرة! احفظ مني اثنين، أوصيك بهما: إذا دخلت المسجد فصل على النبي صلى الله عليه وسلم وقل:"اللهم! افتح لي أبواب رحمتك"، وإذا خرجت من المسجد فصل على النبي صلى الله عليه وسلم وقل:"اللهم! احفظني من الشيطان".
رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (91) بإسناد جيد.
وقد روي مرفوعا، والصواب وقفه كما هو مبسوط في كتاب الصلاة.
ورُوي الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم عند دخول المسجد والخروج منه من حديث فاطمة عند الترمذي (314)، وابن ماجه (771)، وإسناده منقطع.
আবু হুমাইদ অথবা আবু উসাইদ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন তোমাদের কেউ মাসজিদে প্রবেশ করে, তখন সে যেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি সালাম পেশ করে। এরপর সে যেন বলে: "আল্লাহুম্মা! ইফতা’হ লী আবওয়াবা রাহমাতিক" (অর্থাৎ, হে আল্লাহ! আমার জন্য আপনার দয়ার দরজাগুলো উন্মুক্ত করে দিন)। আর যখন সে বের হয়, তখন সে যেন বলে: "আল্লাহুম্মা ইন্নি আসআলুকা মিন ফাদলিক" (অর্থাৎ, হে আল্লাহ! আমি আপনার অনুগ্রহ চাই)।
10651 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما قعد قوم مقعدا لا يذكرون فيه الله عز وجل، ويصلون على النبي إلا كان عليهم حسرة يوم القيامة وإن دخلوا الجنة للثواب".
صحيح: رواه أحمد (9965)، وصحّحه ابن حبان (591، 592) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن شعبة، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره. وإسناده صحيح.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখনই কোনো সম্প্রদায় কোনো মজলিসে বসে আর সেখানে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার যিকির করে না এবং নবীর উপর সালাত (দরূদ) পড়ে না, তবে তা তাদের জন্য কিয়ামতের দিন আফসোস হবে, যদিও তারা সওয়াবের কারণে জান্নাতে প্রবেশ করে।
10652 - عن جابر قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما اجتمع قوم ثم تفرقوا عن غير ذكر الله وصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم إلا قاموا عن أنتن جيفة".
حسن: رواه الطيالسي (1863) - ومن طريقه النسائي في عمل اليوم والليلة (411) - عن يزيد بن إبراهيم التستري، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.
وقال ابن القيم في جلاء الأفهم (ص 175):"قال أبو عبد الله المقدسي - وهو الضياء صاحب المختارة -:"هذا عندي على شرط مسلم".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো দল একত্রিত হয় এবং অতঃপর তারা আল্লাহর স্মরণ ও নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপর দরূদ পাঠ করা ব্যতীত বিচ্ছিন্ন হয়, তখন তারা যেন নিকৃষ্টতম মৃতদেহ (লাশ) থেকে উঠে দাঁড়াল।
10653 - عن أوس بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ من أفضل أيامكم يوم الجمعة، فيه خلق آدم، وفيه قبض، وفيه النفخة، وفيه الصعقة، فأكثروا عليَّ من الصلاة فيه، فإنَّ صلاتكم معروضة عليَّ". قال: قالوا: يا رسول الله! كيف تُعرض صلاتنا عليك وقد أَرِمتَ؟ يقولون: بَليتَ؟ فقال:"إنَّ الله عز وجل حرَّمَ على الأرض أجسادَ الأنبياء".
صحيح: رواه أبو داود (1047) والنسائي (1374) وابن ماجه (1636) وصحّحه ابن خزيمة (1733)، وابن حبان (910) والحاكم (1/ 278) كلّهم من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، فذكره. وإسناده صحيح.
وصحّحه النووي في"الأذكار" (97) وقد أُعلَّ هذا الحديث بما لا يقدح في صحَّته، انظر"جلاء الأفهام" (66 - 67).
وقوله:"وفيه الصعقة": أي الغشي والموت.
আওস ইবন আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের সর্বোত্তম দিনগুলোর মধ্যে হলো জুমুআর দিন। এ দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এতেই তাঁর রূহ কবজ করা হবে, এতেই শিঙ্গায় ফুঁক দেওয়া হবে এবং এতেই (সকলে) বেহুশ হয়ে যাবে। অতএব তোমরা সেদিন আমার উপর অধিকহারে দরূদ পাঠ করো। কারণ তোমাদের দরূদ আমার নিকট পেশ করা হয়।" সাহাবীগণ বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের দরূদ আপনার নিকট কিভাবে পেশ করা হবে, অথচ আপনি তো পচে গলে যাবেন?" (তারা বলতে চাইলেন: আপনি তো বিলীন হয়ে যাবেন)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা জমিনের জন্য নবীদের দেহকে ভক্ষণ করা হারাম করে দিয়েছেন।"
10654 - عن أبي بن كعب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا ذهب ثلثا الليل قام فقال:"يا أيها الناس اذكروا الله اذكروا الله، جاءت الراجفة تتبعها الرادفة، جاء الموت بما فيه، جاء الموت بما فيه".
قال أبي: قلت: يا رسول الله! إني أكثر الصلاة عليك، فكم أجعل لك من صلاتي؟ فقال:"ما شئت". قال: قلت: الربع؟ . قال:"ما شئت، فإن زدت فهو خير لك، قلت: النصف؟ قال:"ما شئت، فإن زدت فهو خير لك"، قال: قلت: فالثلثين. قال:"ما شئت، فإن زدت فهو خير لك"، قلت: أجعل لك صلاتي كلها، قال:"إذًا تكفي همك، ويغفر لك ذنبك".
حسن: رواه الترمذي (2457)، وأحمد (21241 - 21242)، والحاكم (2/ 421) كلهم من طريق سفيان هو الثوري، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن الطفيل بن أبي بن كعب، عن أبيه قال فذكره. واللفظ للترمذي.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن محمد بن عقيل فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث ما لم يتبين خطؤه.
وحسنه أيضا الترمذي. وقال الحاكم: صحيح الإسناد.
وكان الصحابة يصلون على النبي صلى الله عليه وسلم في المواطن الأخرى، وكل ذلك خير منها:
1 - في الخطب: فقد روى عبد الله بن أحمد (837) عن منصور بن أبي مزاحم، حدثنا خالد الزيات، حدثني عون بن أبي جحيفة، قال: كان أبي من شرط علي، وكان تحت المنبر، فحدثني أبي: أنه صعد المنبر - يعني عليا - فحمد الله تعالى وأثنى عليه، وصلى على النبي صلى الله عليه وسلم، وقال:"خير هذه الأمة بعد نبيها أبو بكر، والثاني عمر، وقال: يجعل الله تعالى الخير حيث أحب".
وإسناده حسن من أجل خالد الزيات فإنه لا بأس به.
وروي الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم في الخطبة عن ابن مسعود وعمرو بن العاص وأبي موسى الأشعري وغيرهم.
قال ابن القيم في جلاء الأفهام (ص 526):" … إن الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم في الخطب كان أمرا مشهورا معروفا عند الصحابة رضي الله عنهم أجمعين" أهـ.
2 - عند زيارة قبره صلى الله عليه وسلم: فقد روى مالك عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر أنه كان يقف على قبر النبي صلى الله عليه وسلم، فيصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ويدعو لأبي بكر وعمر.
هكذا رواه غير واحد عن مالك كما قال ابن عبد البر في الاستذكار (6/ 262 - 263). وإسناده صحيح.
ورواه يحيى الليثي في الموطأ (399) عن مالك، عن عبد الله بن دينار قال: رأيت عبد الله بن عمر يقف على قبر النبي صلى الله عليه وسلم، فيصلي على النبي صلى الله عليه وسلم وعلى أبي بكر وعمر. وأنكر العلماء على يحيى روايته بهذا اللفظ كما ذكر ابن عبد البر في الاستذكار.
وروي الأثر عن ابن عمر من طرق أخرى منها ما رواه البيهقي في الشعب (3854) من طريق محمد بن عبد الله بن نمير، حدثنا محمد بن بشر، حدثنا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر أنه كان
إذا قدم من سفر بدأ بقبر النبي صلى الله عليه وسلم فصلى عليه وسلم، ودعا له، ولا يمس القبر، ثم يسلم على أبي بكر، ثم قال: السلام عليك يا أبة.
3 - وعلى الصفا والمروة: روى ابن أبي شيبة في المصنف (30253 - 30254) من طرق عن الشعبي، عن وهب بن الأجدع قال: سمعت عمر يقول: إذا قمتم على الصفا فكبروا سبع تكبيرات، بين كل تكبيرتين حمد الله وثناء عليه، وصلاة الله على النبي صلى الله عليه وسلم ودعاء لنفسك، وعلى المروة مثل ذلك. وإسناده صحيح.
وروى إسماعيل بن إسحاق القاضي في الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم - كما في جلاء الأفهام (ص 537) - عن هدبة بن خالد، ثنا همام بن يحيى، ثنا نافع، أن ابن عمر كان يكبر على الصفا ثلاثا يقول: لا إله إلا الله وحده لا شريك له له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير، ثم يصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم يدعو ويطيل القيام والدعاء، ثم يفعل على المروة مثل ذلك. وإسناده صحيح.
4 - عند الخروج إلى السوق أو إلى دعوة ونحوها: فقد روى ابن أبي شيبة في المصنف (30429) عن وكيع، عن مسعر، عن عامر بن شقيق، عن أبي وائل، قال: ما شهد عبد الله مجمعا، ولا مأدبة فيقوم حتى يحمد الله ويصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، وإن كان مما يتبع أغفل مكان في السوق فيجلس فيه فيحمد الله ويصلي على النبي صلى الله عليه وسلم. وإسناده صحيح.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতের দুই-তৃতীয়াংশ পার হয়ে যেত, তখন তিনি দাঁড়িয়ে বলতেন: "হে লোক সকল! তোমরা আল্লাহকে স্মরণ করো, আল্লাহকে স্মরণ করো! প্রথম মহা কম্পন (আর-রাজাফা) এসে গেছে, যা দ্বিতীয় মহা কম্পন (আর-রাদিফা) দ্বারা অনুসরণ করা হবে। মৃত্যু তার সব কিছু নিয়ে এসে পড়েছে, মৃত্যু তার সব কিছু নিয়ে এসে পড়েছে।"
উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি আপনার প্রতি অধিক পরিমাণে দরূদ পাঠ করে থাকি। আমি আমার দোয়ার কতটুকু অংশ আপনার দরূদের জন্য নির্দিষ্ট করব? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা।" আমি বললাম: এক-চতুর্থাংশ? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা। তবে যদি তুমি বাড়াও, তবে তা তোমার জন্য উত্তম হবে।" আমি বললাম: অর্ধেক? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা। তবে যদি তুমি বাড়াও, তবে তা তোমার জন্য উত্তম হবে।" তিনি বললেন: আমি বললাম: তাহলে দুই-তৃতীয়াংশ? তিনি বললেন: "তোমার যা ইচ্ছা। তবে যদি তুমি বাড়াও, তবে তা তোমার জন্য উত্তম হবে।" আমি বললাম: আমি আমার সব দোয়াই আপনার দরূদের জন্য নির্দিষ্ট করব? তিনি বললেন: "তাহলে তোমার সব দুশ্চিন্তা থেকে মুক্তি দেওয়া হবে এবং তোমার গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হবে।"
10655 - عن جابر بن عبد الله أن امرأة قالت للنبي صلى الله عليه وسلم: صلِّ علي وعلى زوجي، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"صلى اللهُ عليكِ، وعلى زوجكِ".
صحيح: رواه أبو داود (1533)، وأحمد (15281)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (423)، وصحّحه ابن حبان (916، 918) كلهم من طريق الأسود بن قيس، عن نبيح العنزي، عن جابر بن عبد الله فذكره. وسياق أحمد أطول. وإسناده صحيح.
وقوله:"صلى الله عليكِ وعلى زوجكِ" أي رَحِمَ الله عليكِ وعلى زوجكِ.
জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে এক মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: "আপনি আমার ও আমার স্বামীর জন্য দু'আ করুন।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তোমার ও তোমার স্বামীর উপর রহমত বর্ষণ করুন।"
10656 - عن عبد الله بن أبي أوفى قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أتاه قوم بصدقتهم قال:"اللهم! صلِّ على آل فلان"، فأتاه أبي بصدقته فقال:"اللهم! صلِّ على آل أبي أوفى".
متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1497)، ومسلم في الزكاة (1078) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن عبد الله بن أبي أوفى فذكره.
فقه الباب:
يُصلى ويُسلم على سائر الأنبياء والمرسلين قال تعالى عن نوح عليه السلام: {وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآخِرِينَ (78) سَلَامٌ عَلَى نُوحٍ فِي الْعَالَمِينَ (79)} [الصافات: 78، 79].
وقال عن إبراهيم: {وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآخِرِينَ (108) سَلَامٌ عَلَى إِبْرَاهِيمَ} [الصافات: 108، 109].
وقال تعالى في موسى وهارون: {وَتَرَكْنَا عَلَيْهِمَا فِي الْآخِرِينَ (119) سَلَامٌ عَلَى مُوسَى وَهَارُونَ} [الصافات: 119، 120].
ورُوي في الصلاة على سائر الأنبياء والمرسلين أحاديث، وفي سندها مقال، وقد حكى النووي وغيره الإجماع على أن الصلاة على جميع النبيين مشروعة. انظر: جلاء الأفهام (ص 635).
وأما غير الأنبياء فلا بأس بالصلاة عليهم أحيانا ما لم يتخذ ذلك عادة. قال ابن القيم في جلاء الأفهام (ص 663 - 664):"وفصل الخطاب في هذه المسألة أن الصلاة على غير النبي صلى الله عليه وسلم، إما أن تكون على آله وأزواجه وذريته أو غيرهم، فإن كان الأول، فالصلاة عليهم مشروعة مع الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم، وجائزة مفردة.
وأما الثاني فإن كان الملائكة وأهل الطاعة عموما الذين يدخل فيهم الأنبياء كلهم وغيرهم، جاز ذلك أيضا، فيقال: اللهم صل على ملائكتك المقربين، وأهل طاعتك أجمعين. وإن كان شخصا معينا، أو طائفة معينة كره أن يتخذ الصلاة عليه شعارا لا يخل به، ولو قيل بتحريمه لكان له وجه، ولا سيما إذا جعلها شعارا له، ومنع منها نظيره، أو من هو خير منه، وهذا كما تفعل الرافضة بعلي فإنهم حيث ذكروه قالوا: عليه الصلاة والسلام، ولا يقولون ذلك فيمن هو خير منه، فهذا ممنوع لا سيما إذا اتخذ شعارا لا يحل به، فتركه حينئذ متعين. وأما إن صلى عليه أحيانا بحيث لا يجعل ذلك شعارا كما صلي على دافع الزكاة، … وكما صلى النبي صلى الله عليه وسلم على المرأة وزوجها … فهذا لا بأس به. وبهذا التفصيل تتفق الأدلة وينكشف وجه الصواب والله الموفق" انتهى.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবি আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যখন কোনো সম্প্রদায় তাদের সাদকা (যাকাত) নিয়ে আসত, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! অমুকদের পরিবারের উপর রহমত বর্ষণ করুন।" অতঃপর আমার পিতা তাঁর সাদকা নিয়ে তাঁর কাছে আসলেন, তখন তিনি (নবী) বললেন: "হে আল্লাহ! আবু আওফার পরিবারের উপর রহমত বর্ষণ করুন।"
10657 - عن النعمان بن بشير، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الدعاء هو العبادة" ثم قرأ: {وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ} [سورة غافر: 60].
صحيح: رواه أبو داود (1479)، والترمذي (3372)، وابن ماجه (3828)، وأحمد (18352)، وصحّحه ابن حبان (890)، والحاكم (1/ 490 - 491) كلهم من طرق عن ذر بن عبد الله الهمداني، عن يُسيع الحضرمي، عن النعمان بن بشير فذكره. وإسناده صحيح.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وروى الحاكم (1/ 491) - وصحّحه - بإسنادين عن ابن عباس قال: أفضل العبادة هو الدعاء وقرأ: {وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ}.
وأما ما روي عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الدعاء مخ العبادة". فهو ضعيف. رواه الترمذي (3371)، والطبراني في الأوسط (3220)، والدعاء (8) كلاهما من طريق ابن لهيعة، عن عبيد الله بن أبي جعفر، عن أبان بن صالح، عن أنس بن مالك فذكره.
وقال الترمذي:"غريب من هذا الوجه، لا نعرفه إلا من حديث ابن لهيعة".
وابن لهيعة سيء الحفظ فأخطأ في هذا الحديث فقال:"الدعاء مخ العبادة". والصحيح:"الدعاء هو العبادة" فإنه ليس للدعاء مخ بل الدعاء كله عبادة.
নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দোয়া হলো ইবাদত।" অতঃপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "আর তোমাদের রব বলেছেন, তোমরা আমাকে ডাকো, আমি তোমাদের ডাকে সাড়া দেব। নিশ্চয়ই যারা অহংকারবশত আমার ইবাদত থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়, তারা অচিরেই লাঞ্ছিত হয়ে জাহান্নামে প্রবেশ করবে।" (সূরা গাফির: ৬০)।
10658 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليس شيء أكرم على الله تعالى من الدعاء".
حسن: رواه الترمذي (3370)، وابن ما جه (3829)، وأحمد (7848)، وصحّحه ابن حبان (870)، والحاكم (1/ 490) كلهم من طرق، عن عمران القطان، عن قتادة، عن سعيد بن أبي الحسن، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمران القطان وهو ابن داور البصري وهو مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث إذا لم يخالف.
وقال الترمذي:"حديث حسن غريب". وفي نسخة:"حديث غريب".
وقال ابن القطان الفاسي في بيان الوهم والإيهام (3/ 614) بعد أن نقل تحسين الترمذي إياه:"ولا موضع في الإسناد للنظر إلا عمران بن داور القطان وهو رجل ما بحديثه بأس".
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহর কাছে দু’আর চেয়ে অধিক সম্মানিত (মর্যাদাপূর্ণ) আর কিছুই নেই।
10659 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يقول الله تعالى: أنا عند ظن عبدي بي، وأنا معه إذا ذكرني …".
وفي رواية:"إن الله عز وجل يقول: أنا عند ظن عبدي بي، وأنا معه إذا دعاني".
متفق عليه: رواه البخاري في التوحيد (7405)، ومسلم في الذكر والدعاء (2675: 2) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره باللفظ الأول.
واللفظ الآخر: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2675: 19) عن أبي كريب محمد بن العلاء، ثنا وكيع، عن جعفر بن برقان، عن يزيد بن الأصم، عن أبي هريرة فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তাআলা বলেন: আমি আমার বান্দার ধারণা অনুযায়ী থাকি এবং যখন সে আমাকে স্মরণ করে, আমি তার সাথেই থাকি...
অন্য এক বর্ণনায় (আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা) বলেন: আমি আমার বান্দার ধারণা অনুযায়ী থাকি এবং যখন সে আমাকে ডাকে (দোয়া করে), আমি তার সাথেই থাকি।
(হাদীসটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি।
10660 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يقول الله: أنا عند ظن عبدي بي، وأنا معه إذا دعاني".
صحيح: رواه أحمد (13192)، وأبو يعلى (3232) كلاهما من حديث أبي داود سليمان (هو الطيالسي)، حدثنا شعبة، حدثنا قتادة، عن أنس بن مالك فذكره. وإسناده صحيح.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা বলেন: আমি আমার বান্দার ধারণা (আশা) অনুযায়ী থাকি যা সে আমার প্রতি পোষণ করে, আর যখন সে আমাকে ডাকে, আমি তার সাথে থাকি।"
10661 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنه من لم يسأل الله يغضب عليه". وفي لفظ:"من لم يدع الله".
حسن: رواه الترمذي (3373) - واللفظ له -، وابن ماجه (3827)، وأحمد (9719)، - واللفظ الآخر لهما -، والحاكم (1/ 491) كلهم من طرق، عن أبي المليح المدني، قال: سمعت أبا صالح، عن أبي هريرة فذكره.
وزاد الحاكم:"وإن الله ليغضب على من يفعله، ولا يفعل ذلك أحد غيره" يعني في الدعاء.
ثم قال: حديث صحيح الإسناد؛ فإن أبا صالح الخوزي وأبا المليح الفارسي لم يذكرا بالجرح إنما هما في عداد المجهولين لقلة الحديث" اهـ.
قلت: ليس كما قال، فإن أبا صالح الخوزي مختلف فيه، فنقل الدارمي عن ابن معين"ضعيف" كما في الكامل (7/ 2749).
ولكن سئل أبو زرعة عن اسمه فقال: لا يُعرف روى عنه أبو المليح، لا بأس به. الجرح والتعديل (9/ 393) فأقل درجاته أنه حسن الحديث.
وأما أبو المليح المدني، والمعروف بالفارسي واسمه صبيح فقد روى عنه جمع من الثقات، ووثقه ابن معين.
وأما ما روي عن أنس مرفوعا:"ليسأل أحدكم ربه حاجته كلها حتى يسأله شسع نعله إذا انقطع". فالصواب أنه مرسل.
رواه الترمذي (3604/ 8)، وابن حبان (866، 894، 895)، وابن عدي (6/ 2076) كلهم من طريق قطن بن نسير البصري، أخبرنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس فذكره.
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب، وروى غير واحد هذا الحديث عن جعفر بن سليمان، عن ثابت البناني، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، ولم يذكروا فيه عن أنس، ثم رواه عن صالح بن عبد الله، عن جعفر بن سليمان مرسلا، ثم قال: وهذا أصح من حديث قطن، عن جعفر بن سليمان". اهـ
قلت: قطن بن نسير قال عنه ابن أبي حاتم: سئل أبو زرعة عنه فرأيته يحمل عليه، وذكر أنه روى أحاديث عن جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس مما أنكر عليه. اهـ وهذا منها.
وذكر ابن عدي أن رجلا قال للقواريري: إن لي شيخا يحدث به عن جعفر، عن ثابت، عن أنس فقال القواريري: باطل. يعني أن وصله باطل، والصواب إرساله. قال ابن عدي عقبه: وهذا كما قال.
وثبت عن عائشة أنها قالت:"سلوا الله كل شيء حتى الشسع فإن الله عز وجل إن لم ييسره لم يتيسر". رواه أبو يعلى (4560)، وعنه ابن السني في عمل اليوم والليلة (356) بإسناد حسن.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من فتح له منكم باب الدعاء فتحت له أبواب الرحمة، وما سئل الله شيئا يعني أحب إليه من أن يسأل العافية". وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الدعاء ينفع مما نزل ومما لم ينزل، فعليكم عباد الله بالدعاء".
رواه الترمذي (3548)، والحاكم (1/ 498) كلاهما من طريق يزيد بن هارون، عن عبد الرحمن بن أبي بكر القرشي، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر فذكره. والسياق للترمذي، وليس عند الحاكم:"إن الدعاء ينفع مما نزل …".
وقال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث عبد الرحمن بن أبي بكر القرشي، وهو المكي المليكي، وهو ضعيف في الحديث، قد تكلم فيه بعض أهل الحديث من قبل حفظه.
وقد روى إسرائيل هذا الحديث عن عبد الرحمن بن أبي بكر عن موسى بن عقبة عن نافع عن
ابن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما سئل الله شيئا أحب إليه من العافية". حدثنا بذلك القاسم بن دينار الكوفي، حدثنا إسحاق بن منصور الكوفي، عن إسرائيل بهذا". انتهى كلام الترمذي.
وأما الحاكم فقال:"هذا حديث صحيح الإسناد"، وتعقبه الذهبي بقوله:"المليكي ضعيف".
وكذلك لا يصح ما روي عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"سلوا الله من فضله، فإن الله عز وجل يحب أن يسأل، وأفضل العبادة انتظار الفرج".
رواه الترمذي (3571)، وابن عدي في الكامل (2/ 665) كلاهما من طريق حماد بن واقد، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد الله فذكره. وحماد بن واقد هو الصفار ضعيف، وقد خولف في إسناده.
قال الترمذي:"هكذا روى حماد بن واقد هذا الحديث، وقد خولف في روايته، وحماد بن واقد هذا هو الصفار، ليس بالحافظ.
وروى أبو نعيم هذا الحديث عن إسرائيل، عن حكيم بن جبير، عن رجل، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، وحديث أبي نعيم أشبه أن يكون أصح". اهـ
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই যে ব্যক্তি আল্লাহর কাছে কিছু প্রার্থনা করে না, আল্লাহ তার ওপর রাগান্বিত হন।" অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "যে ব্যক্তি আল্লাহকে ডাকে না (আল্লাহ তার ওপর রাগান্বিত হন)।"
10662 - عن * *
থেকে বর্ণিত...
10663 - عن أبي موسى الأشعري قال: دعا النبي صلى الله عليه وسلم بماء فتوضأ، ثم رفع يديه فقال:"اللهم! اغفر لعبيد أبي عامر". ورأيت بياض إبطيه، فقال:"اللهم! اجعله يوم القيامة فوق كثير من خلقك من الناس".
متفق عليه: رواه البخاري في الدعوات (6383)، ومسلم في فضائل الصحابة (2498) كلاهما عن أبي كريب محمد بن العلاء، ثنا أبو أسامة، عن بريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبيه أبي موسى الأشعري قال: فذكره.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানি চাইলেন এবং উযু করলেন। অতঃপর তিনি দু'হাত উপরে তুললেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! আবূ আমির-এর পুত্র উবাইদকে ক্ষমা করে দিন।" (আবূ মূসা বলেন) আমি তাঁর বগলের শুভ্রতা দেখতে পেলাম। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! কিয়ামতের দিন তাকে আপনার সৃষ্টির বহু মানুষের উপরে স্থান দিন।"
10664 - عن عبد الله بن زيد الأنصاري: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج إلى المصلى يستسقي، وأنه لما أراد أن يدعو استقبل القبلة وحوّل رداءه.
متفق عليه: رواه البخاري في الاستسقاء (1028)، ومسلم (894: 3) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد (هو الأنصاري) قال: أخبرني أبو بكر بن محمد بن عمرو (هو ابن حزم)، أن عباد بن تميم أخبره، أن عبد الله بن زيد الأنصاري أخبره فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনু যায়দ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইসতিসকার (বৃষ্টি প্রার্থনার) জন্য মুসাল্লার দিকে বের হলেন। এবং তিনি যখন দু'আ করতে চাইলেন, তখন তিনি কিবলামুখী হলেন এবং তাঁর চাদর উল্টে দিলেন।
10665 - عن عمر بن الخطاب قال: لما كان يوم بدر نظر رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى المشركين وهم ألف، وأصحابه ثلاثمائة وتسعة عشر رجلا، فاستقبل نبي الله صلى الله عليه وسلم القبلة، ثم مد يديه فجعل يهتف بربه"اللهم! أنجز لي ما وعدتني، اللهم! آت ما وعدتني، اللهم! إن تهلك هذه العصابة من أهل الإسلام لا تعبد في الأرض" فما زال يهتف بربه، مادًا يديه، مستقبل القبلة، حتى سقط رداؤه عن منكبيه … الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1763: 58) من طرق، عن عكرمة بن عمار، حدثني أبو زميل سماك الحنفي، حدثني عبد الله بن عباس، قال: حدثني عمر بن الخطاب قال: فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন বদরের দিন আসলো, তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুশরিকদের দিকে তাকালেন। তারা ছিল এক হাজার, আর তাঁর সাহাবীগণ ছিলেন তিনশত ঊনিশ জন। অতঃপর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিবলামুখী হলেন, তারপর তাঁর দু'হাত প্রসারিত করলেন এবং উচ্চস্বরে তাঁর রবের কাছে ফরিয়াদ করতে লাগলেন: "হে আল্লাহ! তুমি আমার সাথে যে অঙ্গীকার করেছো, তা পূর্ণ করো। হে আল্লাহ! তুমি আমাকে যা প্রতিশ্রুতি দিয়েছো তা প্রদান করো। হে আল্লাহ! ইসলামের এই ছোট দলটি যদি ধ্বংস হয়ে যায়, তবে পৃথিবীতে আর তোমার ইবাদত করা হবে না।" তিনি এভাবে তাঁর রবের কাছে দু'হাত প্রসারিত করে, কিবলামুখী হয়ে উচ্চস্বরে ফরিয়াদ করতে থাকলেন, যতক্ষণ না তাঁর চাদর কাঁধ থেকে পড়ে গেল...। (হাদীস)
10666 - عن أبي موسى الأشعري قال: لما فرغ النبي صلى الله عليه وسلم من حنين، بعث أبا عامر على جيش إلى أوطاس. الحديث
وفيه: ثم رفع يديه فقال:"اللهم! اغفر لعبيد أبي عامر". ورأيت بياض إبطيه.
متفق عليه: رواه البخاري في الدعوات (6323)، ومسلم في فضائل الصحابة (2498) كلاهما عن أبي كريب محمد بن العلاء، ثنا أبو أسامة، عن بريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبيه أبي موسى الأشعري قال: فذكره.
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইনের যুদ্ধ থেকে অবসর হলেন, তখন তিনি আবূ আমিরকে একটি সৈন্যদলের প্রধান করে আওতাসের দিকে পাঠালেন। (হাদীসের মধ্যে রয়েছে) অতঃপর তিনি তাঁর দু’হাত তুলে বললেন: “হে আল্লাহ! আবূ আমিরের উবাইদকে ক্ষমা করুন।” আর আমি তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) বগলের শুভ্রতা দেখতে পেলাম।
10667 - عن عبد الله بن عمر قال: بعث النبي صلى الله عليه وسلم خالد بن الوليد إلى بني جذيمة، فدعاهم إلى الإسلام. الحديث.
وفيه: حتى قدمنا على النبي صلى الله عليه وسلم فذكرناه، فرفع النبي صلى الله عليه وسلم يده فقال:"اللهم! إني أبرأ عليك مما صنع خالد".
صحيح: رواه البخاري (4339) من طريق معمر، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه قال: فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খালিদ ইবনে ওয়ালীদকে বনী জুযায়মার নিকট প্রেরণ করলেন। তিনি তাদেরকে ইসলামের দিকে আহ্বান করলেন। (পুরো) হাদীসটিতে আরও আছে যে, অবশেষে আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম এবং তাঁকে বিষয়টি জানালাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত তুললেন এবং বললেন: "হে আল্লাহ! খালিদ যা করেছে, তা থেকে আমি আপনার নিকট (নিজেকে) মুক্ত ঘোষণা করছি।"