আল-জামি` আল-কামিল
1101 - عن زرّ بن حُبيش، قال: أتيتُ صفوان بنَ عسَّال المراديَّ فقال: ما جاء بك؟ قلت: أُنْبِطُ العلم. قال: فإنِّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ما مِنْ خارجٍ خرج من بيته في طلب العلم إِلَّا وضع له الملائكةُ أجنحتها رضًا بما يصنع".
حسن: رواه ابن ماجه (226) من طريق عبد الرزّاق قال: أنبأنا معمر، عن عاصم بن أبي النّجود، عن زرّ بن حيش، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن أبي النّجود فإنّه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، وصحّحه ابنُ خزيمة (193)، وابن حبان (1319) فروياه من هذا الوجه.
ورواه أيضًا الدّارميّ (369) من طريق حمّاد بن سلمة، عن عاصم، به مرفوعًا.
ولا يضرّ ما رواه الترمذيّ (3535)، والنسائيّ (158)، وابن خزيمة (17)، وابن حبان (1100) كلّهم من طريق سفيان، عن عاصم، بإسناده موقوفًا؛ لأنّ من رواه مرفوعًا عنده زيادة علم.
وقد رواه الترمذيّ (3536) من وجه آخر عن عاصم وفيه:"بلغني أنّ الملائكة تضع أجنحتها" فذكر الحديث.
وهذا يدل على أنه بلغه عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم أو في أقل أحواله من أحد الصّحابة.
ورواه ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (162) من طريق عارم بن الفضل، عن الصّعق بن حزن، عن علي بن الحكم، عن المنهال بن عمرو، عن زر بن حبيش، قال: جاء رجلٌ من مراد يقال له: صفوان بن عسّال إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم-وهو في المسجد متكئ على برد له أحمر، قال: يا
رسول اللَّه! إنّي جئتُ أطلبُ العلمَ. . . قال:"مرحبًا بطالب العلم، إنّ طالب العلم لتحفّ به الملائكة، وتظله بأجنحتها فيركب بعضها بعضًا، حتّى تعلو إلى السّماء الدُّنيا من حبّهم ما يطلب. فما جئت تطلب؟". قال: يا رسول اللَّه! لا أزال أسافر بين مكة والمدينة، فافتني عن المسح على الخفين. . .". فذكر الحديث.
ورواه الطبرانيّ (7347) من طريق شيان بن فرّوخ، عن الصّعق بن حزن، به، إِلَّا أنه أدخل عبد اللَّه بن مسعود بين صفوان بن عسّال وبين زر.
والظّاهر أنّ هذا وهم من شيبان؛ فإنّه صدوق يهم.
قال ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (1/ 159):"حديث صفوان بن عسّال هذا وقفه قومٌ عن عاصم، ورفعه عنه آخرون، وهو حديث صحيح، حسن، ثابت، محفوظ، مرفوع، ومثله لا يقال بالرّأي. . .". ثم سرد بعض الطّرق الصّحيحة التي ورد بها الحديث موقوفًا على صفوان بن عسّال.
وقوله:"أُنبط العلم" من أنبط الشيءَ واستنبطه أي: استخرجه. والمراد: أي أطلب العلم. وفي بعض روايات الحديث:"فقلت: ابتغاء العلم".
সাফওয়ান ইবনু আস্সাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যার ইবনু হুবাইশ (রহ.) বলেন, আমি সাফওয়ান ইবনু আস্সাল আল-মুরাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলাম। তিনি বললেন, কী কারণে তুমি এসেছ? আমি বললাম, জ্ঞান অন্বেষণের জন্য। তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "জ্ঞান অন্বেষণের জন্য যে ব্যক্তিই তার ঘর থেকে বের হয়, সে যা করছে তার প্রতি সন্তুষ্ট হয়ে ফেরেশতারা তার জন্য তাদের ডানা বিছিয়ে দেন।"
1102 - عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما مِنْ خارج يخرجُ -يعني من بيته- إِلَّا ببابه رايتان: راية بيد ملك، وراية بيد شيطان، فإنْ خرج لما يحبُّ اللَّه عز وجل، اتَّبعه الملك برايته، فلم يزلْ تحت راية الملك حتّى يرجع إلى بيته، وإنْ خرج لما يسخط اللَّه، اتّبعه الشّيطان برايته، فلم يزل تحت راية الشّيطان حتّى يرجع إلى بيته".
حسن: رواه الإمام أحمد (8286)، والطَّبرانيّ (مجمع البحرين - 184) من طريق أبي عامر العقديّ، ثنا عبد اللَّه بن جعفر، عن عثمان بن محمد، عن المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن؛ من أجل عثمان بن محمد، وعبد اللَّه بن جعفر، فالأوّل صدوق، والآخر لا بأس به، وحديثهما حسن، وبقية رجاله ثقات.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখনই কোনো ব্যক্তি (তার ঘর থেকে) বের হয়, তার দরজায় দুটি পতাকা থাকে: একটি ফেরেশতার হাতে এবং আরেকটি শয়তানের হাতে। যদি সে এমন উদ্দেশ্যে বের হয় যা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল পছন্দ করেন, তখন ফেরেশতা তার পতাকা নিয়ে তাকে অনুসরণ করে এবং সে তার ঘরে ফিরে না আসা পর্যন্ত ফেরেশতার পতাকার নিচেই থাকে। আর যদি সে এমন উদ্দেশ্যে বের হয় যা আল্লাহর ক্রোধ উদ্রেক করে (যা আল্লাহ অপছন্দ করেন), তখন শয়তান তার পতাকা নিয়ে তাকে অনুসরণ করে এবং সে তার ঘরে ফিরে না আসা পর্যন্ত শয়তানের পতাকার নিচেই থাকে।
1103 - عن كثير بن قيس، قال: كنتُ جالسًا مع أبي الدّرداء في مسجد دمشق، فأتاه رجلٌ فقال: يا أبا الدّرداء! إنّي أتيتُك من مدينة الرّسول في حديثٍ بلغني أنَّك تحدِّثُه عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال أبو الدّرداء: أما جئتَ لحاجة، أما جئتَ لتجارة، أما جئتَ إِلَّا لهذا الحديث؟ قال: نعم. قال: فإنِّي سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"مَنْ سلك طريقًا يطلبُ فيه علمًا، سلك اللَّه به طريقًا من طرق الجنّة، والملائكةُ تضعُ أجنحتهَا رضًا لطالب العلم، وإنَّ العالم يستغفرُ له مَنْ في السموات ومن في الأرض، والحيتانُ في الماء، وفضلُ العالم على العابد كفضل القمر ليلة البدر على سائر الكواكب، إنّ العلماء ورثة الأنبياء، إنّ الأنبياء لم يورِّثوا دينارًا ولا درهمًا،
وأورثوا العلم، فمن أخذه أخذ بحظّ وافر".
حسن: رواه أبو داود (3641)، وابن ماجه (223) كلاهما من طريق عبد اللَّه بن داود الخريبيّ، قال: سمعت عاصم بن رجاء بن حيوة، عن داود بن جميل، عن كثير بن قيس، فذكر الحديث. وصحّحه ابنُ حبان (88) ورواه من هذا الوجه.
قلت: فيه داود بن جميل، ويقال: الوليد، ذكره ابن حبان في الثّقات، ولكن قال الدّارقطنيّ:"مجهول". وقال مرة:"هو ومن فوقه إلى أبي الدّرداء ضعفاء".
وكذلك فيه كثير بن قيس، ويقال: قيس بن كثير، شاميّ، فذكره أيضًا ابن حبان في"الثّقات". ولكن ضعّفه الدّارقطنيّ.
وأمّا ما رواه الإمام أحمد (21715) والتِّرمذيّ (2862) كلاهما من حديث محمد بن يزيد الواسطيّ، حدّثنا عاصم بن رجاء بن حيوة، عن قيس بن كثير، قال: قدم رجل من المدينة على أبي الدّرداء وهو بدمشق، فقال (فذكر الحديث) ففيه انقطاع كما قال الترمذيّ. وهذا لفظه:"ولا نعرف هذا الحديث إِلَّا من حديث عاصم بن رجاء بن حيوة، عن داود بن جميل، عن كثير بن قيس، عن أبي الدّرداء، عن النبيّ. وهذا أصح من حديث محمود بن خداش" انتهى.
وقول الترمذيّ:"ولا نعرف هذا الحديث إِلَّا من حديث عاصم بن رجاء بن حيوة" حسب اطلاعه وإلّا فقد جاء الحديث من وجه آخر، رواه أبو داود (3642) عن محمد بن الوزير الدّمشقيّ، حدّثنا الوليد، قال: لقيت شبيب بن شية، فحدثني به عن عثمان بن أبي سودة، عن أبي الدّرداء -يعني عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم بمعناه.
وفي إسناده شبيب بن شيبة وهو مجهول.
ولكن قال الحافظ في التهذيب (4/ 308) في ترجمة شبيب بن شيبة:"وقال عمرو بن عثمان، عن الوليد، عن شعيب بن رزيق، عن عثمان (أي ابن أبي سودة) وهو أشبه بالصَّواب".
قلت: إذا يكون إسناد هذا الحديث حسنًا؛ لأنّ شعيب بن رزيق هو أبو شيبة الشّاميّ، ذكره ابنُ حبان في الثّقات (8/ 308)، وفي التقريب:"صدوق يخطئ". ولعلّه لم يخطئ في هذا الحديث لوجود متابعات كما سبق، وله طرق أخرى جمعها الحافظ ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (1/ 160 - 170).
وذكر البخاريّ في صحيحه في كتاب العلم: باب العلم قبل القول والعمل:"إنّ العلماء هم ورثة الأنبياء، ورّثوا العلم، من أخذه أخذ بحظٍّ وافر، ومن سلك طريقًا يطلب به علمًا سهل اللَّه له طريقًا إلى الجنّة".
قال الحافظ في"الفتح" (1/ 160):"-قوله:"إن العلماء" إلى قوله:"وافر"- طرف من حديث أبي داود، والترمذيّ وابن حبان والحاكم مصححا من حديث أبي الدّرداء، وحسّنه حمزة الكنانيّ،
وضعّفه باضطراب في سنده، لكن له شواهد يتقوّى بها، ولم يفصح المصنِّف بكونه حديثًا، فلهذا لا يُعدّ في تعاليقه، لكن إيراده له في الترجمة يُشعر بأنَّ له أصلًا، وشاهده في القرآن {ثُمَّ أَوْرَثْنَا الْكِتَابَ الَّذِينَ اصْطَفَيْنَا مِنْ عِبَادِنَا} [سورة فاطر: 32]". انتهى.
আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কাফির ইবনু কায়স বলেন: আমি দামেশকের মসজিদে আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসে ছিলাম। অতঃপর তাঁর কাছে এক ব্যক্তি এসে বলল, হে আবুদ দারদা! আমি রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শহর (মদিনা) থেকে আপনার কাছে একটি হাদীসের জন্য এসেছি, যা আমার কাছে পৌঁছেছে যে, আপনি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন। তখন আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কি কোনো প্রয়োজনে আসনি? তুমি কি কোনো ব্যবসার জন্য আসনি? তুমি কি কেবল এই হাদীসটির জন্যই এসেছ? লোকটি বলল: হ্যাঁ। তিনি (আবুদ দারদা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি এমন কোনো পথে চলে, যে পথে সে জ্ঞান অর্জন করে, আল্লাহ তার জন্য জান্নাতের একটি পথ সহজ করে দেন। আর ফেরেশতাগণ জ্ঞান অন্বেষণকারীর সন্তুষ্টির জন্য তাদের ডানা বিছিয়ে দেন। নিশ্চয়ই আকাশ ও জমিনের মধ্যে যা কিছু আছে, তারা জ্ঞানীর জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করে, এমনকি পানির মধ্যে থাকা মাছও। আর ইবাদতকারীর উপর জ্ঞানীর শ্রেষ্ঠত্ব হল পূর্ণিমার রাতের চাঁদের শ্রেষ্ঠত্বের মতো অন্যান্য তারকারাজির উপর। নিশ্চয়ই আলেমগণ হলেন নবীদের উত্তরাধিকারী। আর নবীরা দিনার বা দিরহাম উত্তরাধিকার হিসেবে রেখে যাননি, বরং তাঁরা জ্ঞানের উত্তরাধিকারী করেছেন। সুতরাং যে তা গ্রহণ করল, সে যেন পূর্ণ অংশ গ্রহণ করল।”
1104 - عن أنس بن مالك، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مَنْ خرج في طلب العلم كان في سبيل اللَّه حتّى يرجع".
حسن: رواه الترمذيّ (2647) عن نصر بن علي، قال: حدّثنا خالد بن يزيد العتكيّ، عن أبي جعفر الرازيّ، عن الرّبيع بن أنس، عن أنس بن مالك، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب، ورواه بعضهم فلم يرفعه".
قلت: ومن هذا الوجه رواه ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (271)، والبيهقيّ في"المدخل" (371).
ورواه أيضًا أبو نعيم في الحلية (1/ 290)، والآجريّ في أخلاق العلماء (48) كلاهما من حديث خالد بن يزيد، بإسناده مثله.
وإسناده حسن من أجل الكلام في خالد بن يزيد العتكيّ، وأبي جعفر الرّازيّ وهو عيسى بن أبي عيسى المشهور بكنيته، والربيع بن أنس؛ فإنّ هؤلاء جميعًا دون الثّقات، وقد تكلّم في حفظهم ولم يتهم أحدٌ منهم حتّى يسقط حديثهم، فمثلهم يحسّن حديثهم في الفضائل لا سيما إذا كان له شواهد ولم يكن في حديثهم ما ينكر عليهم.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি জ্ঞান (ইলম) অর্জনের জন্য বের হয়, সে ফিরে আসা পর্যন্ত আল্লাহর পথে (সাবীলিল্লাহ) থাকে।
1105 - عن وعن أبي أمامة صُدي بن عجلان الباهليّ، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من غدا إلى المسجد لا يريد إِلَّا أن يتعلم خيرًا أو يعلمه كان له كأجر حاج تاما حجته".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (8/ 111) عن عبدان بن أحمد، ثنا هشام بن عمار، ثنا محمد ابن شعيب، ثنا نور بن يزيد، عن خالد بن معدان، عن أبي أمامة فذكره.
وإسناده حسن من أجل هشام بن عمار فإنه حسن الحديث.
وقال العراقي في تخريج الإحياء:"إسناده جيد".
আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সকালে মসজিদের দিকে যায়, যার উদ্দেশ্য কেবল ভালো কিছু শেখা বা (অন্যকে) শেখানো, তার জন্য পরিপূর্ণ হজ আদায়কারী হাজীর সমপরিমাণ সাওয়াব রয়েছে।”
1106 - عن سهل بن سعد، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من دخل مسجدي هذا يتعلّم خيرًا، أو يعلّمه كان كالمجاهد في سبيل اللَّه تعالى، ومن دخله لغير ذلك كان كمنزلة الذي يرى الشيء يُعجبه وهو لغيره".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (6/ 215)، وأبو نعيم في الحلية (3/ 254) -واللّفظ له- كلاهما من طريق يعقوب بن حميد بن كاسب، ثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد السّاعديّ، فذكر الحديث.
قال أبو نعيم:"هذا حديث غريب من حديث أبي حازم، عن سهل بن سعد، تفرّد به عنه ابنُه عبد العزيز".
قلت: عبد العزيز بن أبي حازم ثقة فقيه، وثقه ابن معين والنسائي فلا يضر تفرّده وخاصة في روايته عن أبيه. قال الإمام أحمد:"لم يكن يعرف بطلب الحديث إِلَّا كتب أبيه فإنهم يقولون: إنه سمعها، وكان يتفقّه، لم يكن بالمدينة بعد مالك أفقه منه".
ولكن في الإسناد يعقوب بن حميد بن كاسب مختلف فيه، فقال ابن معين مرة:"ثقة"، وأخرى"ليس به بأس". وضعّفه أبو حاتم والنسائي وغيرهما، ولكن قال البخاريّ: لم يزل خيرًا، هو في الأصل صدوق، وقال ابن عدي:"لا بأس به وبرواياته وهو كثير الحديث كثير الغرائب".
قلت: الخلاصة فيه إن كان لحديثه أصل فهو حسن الحديث، وهذا منه.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমার এই মসজিদে কোনো কল্যাণকর জ্ঞান শিখতে, অথবা অন্যকে শেখাতে প্রবেশ করে, সে আল্লাহ তাআলার পথে জিহাদকারীর (মুজাহিদের) মতো। আর যে ব্যক্তি এর বাইরে অন্য কোনো উদ্দেশ্যে তাতে প্রবেশ করে, তার অবস্থান এমন ব্যক্তির মতো, যে এমন কোনো জিনিস দেখে যা তার কাছে আকর্ষণীয়, কিন্তু তা তার নিজের নয়।"
1107 - عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من دخل مسجدنا هذا ليتعلّم خيرًا، أو ليُعلمه كان كالمجاهد في سبيل اللَّه، ومن دخله لغير ذلك كان كالنَّاظر إلى ما ليس له".
حسن: رواه الإمام أحمد (8603، 10814)، وابن ماجه (227)، وصحّحه ابن حبان (87)، والحاكم (1/ 91) كلّهم من حديث أبي صخر، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي صخر وهو حميد بن زياد مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
قال الحاكم: هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، فقد احتجّا بجميع رواته، ثم لم يخرجاه، ولا أعلم له علّة". كذا قال، وحميد بن زياد لم يخرج له البخاريّ، إنّما أخرج له مسلم فقط، إِلَّا أنه حسن الحديث.
وسئل الدّارقطنيّ عن هذا الحديث فقال:"اختلف فيه على سعيد المقبريّ، فرواه أبو صخر حميد بن زياد، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم.
وخالفه عبيد اللَّه بن عمر فرواه عن سعيد المقبريّ، عن عمر بن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث، عن كعب الأحبار قوله.
ورواه ابن عجلان، عن سعيد المقبريّ، عن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن كعب الأحبار قوله، وقول عبيد اللَّه بن عمر أشبه بالصواب" اهـ.
قلت: كلام الدّارقطنيّ من حيث الإسناد أقوى، ولكن الحكم لمن زاد، فإن مثل هذا لا يقال بالرأي كما هو معروف، فلعل التابعي نفسيه رواه على الوجهين، فلا يُعلّ أحدهما الآخر.
وأمّا ما رُوي عن عدد من الصّحابة:"اطلبوا العلم ولو بالصّين، فإنّ طلب العلم فريضةٌ على كلِّ مسلم" فلا يثبت منها شيء.
قال الإمام أحمد:"لا يثبت عندنا في هذا الباب شيءٌ".
وقال إسحاق بن راهويه:"إنّ طلب العلم واجب، ولم يصح فيه الخبر، إِلَّا أن معناه أن يلزمه طلب علم ما يحتاج إليه من وضوئه وصلاته وزكاته. . .".
قال ابن عبد البر:"يريد إسحاق -واللَّه أعلم- أنّ الحديث في وجوب طلب العلم في أسانيده مقال لأهل العلم، ولكن معناه صحيح عندهم"."جامع بيان العلم" (1/ 53).
وقال البيهقيّ في"المدخل" (325):"متنه مشهور، وأسانيده ضعيفة لا أعرف له إسنادًا يثبت بمثله الحديث".
وأمّا معناه فقال حسن بن الرّبيع الخشّاب: سألت ابن المبارك قلت:"طلب العلم فريضة على كل مسلم" أيّ شيء تفسيره؟ قال:"ليس هو الذي يطلبون، إنّما طلب العلم فريضة - أي يقع الرّجل في شيء من أمر دينه فيسأل عنه حتّى يعلمه"."المدخل" (329).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আমাদের এই মসজিদে ভালো কিছু শেখার জন্য অথবা তা শেখানোর জন্য প্রবেশ করে, সে আল্লাহর পথে জিহাদকারীর মতো। আর যে ব্যক্তি অন্য কোনো উদ্দেশ্যে প্রবেশ করে, সে এমন ব্যক্তির মতো, যে তার নয় এমন (বস্তু বা বিষয়ের) দিকে তাকিয়ে থাকে।"
1108 - عن عبد اللَّه بن أُنيس، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يُحشر النّاس يوم القيامة -أو قال: العباد- عُراةً غُرلًا بُهما". قال: قلنا: وما بُهْمًا؟ قال:"ليس معهم شيءٌ، ثم يناديهم بصوتٍ يسمعه مَن بعُد كما يسمعه مَن قَرُب، أنا الملك، أنا الدّيان، ولا ينبغي لأحد من أهل النّار أن يدخل النّار، وله عند أحدٍ من أهل الجنّة حقٌّ حتّى أُقِصَّه منه، ولا ينبغي لأحد من أهل الجنّة أن يدخلَ الجنّة وأحد من أهل النّار عنده حقٌّ حتّى أُقِصَّه منه حتّى اللَّطمة" قال: قلنا: كيف وإنّا إنّما نأتي اللَّه عز وجل عُراة غُرلًا بُهْمًا؟ قال:"بالحسنات والسّيئات".
حسن: رواه الإمام أحمد (16402) واللّفظ له، والحارث بن أبي أسامة في"زوائده" (44)، والبخاري في الأدب المفرد (970) وفي خلق أفعال العباد (ص 92)، وابن أبي عاصم في السنة (514)، وصحّحه الحاكم (2/ 437) كلّهم من طرق عن همام بن يحيى، عن القاسم بن عبد الواحد المكيّ، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، أنّه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول: بلغني حديث عن رجل سمعه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأشتريتُ بعيرًا، ثم شددتُ عليه رحلي، فسرتُ إليه شهرًا حتّى قدمتُ عليه الشام فإذا عبد اللَّه بن أُنيس، فقال للبّواب: قل له جابر على الباب قال: ابن عبد اللَّه؟ قلت: نعم. فخرج يطأ ثوبه فاعتنقني واعتنقته، فقلت: حديثًا بلغني عنك أنّك سمعته من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في القصاص، فخشيتُ أن تموتَ أو أموتَ قبل أن أسمعه. قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).
وإسناده حسن من أجل القاسم بن عبد الواحد المكيّ، وشيخه عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، فإنهما لم يبلغا درجة"الثّقات" وحسَّنه أيضًا المنذري في"الترغيب والترهيب" (4/ 202)، وإن
كان الهيثميّ رحمه الله ضعّفه في"المجمع" (1/ 133) من أجل عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، ولكن الصواب أنه حسن الحديث إِلَّا إذا خالف فلا يقبل كما قال الذّهبيّ في ترجمته في"الميزان"، وعلقه البخاريّ بصيغة الجزم (1/ 173) وقال:"رحل جابر بن عبد اللَّه مسيرة شهر إلى عبد اللَّه بن أنيس في حديث واحد".
قال الحافظ في"الفتح" (1/ 174):"وله طريق أخرى أخرجها الطبرانيّ في"مسند الشاميين"، وتمام في"فوائده" من طريق الحجاج بن دينار، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، وذكر نحوه وقال: وإسناده صالح، وله طريق ثالثة أخرجها الخطيب في"الرحلة" من طريق أبي الجارود العنسيّ -وهو بالنون الساكنة- عن جابر، فذكر نحوه، وفي إسناده ضعف". انتهى.
وقال ابن عباس:"كان يبلغني الحديث عن الرّجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم فلو أشاء أن أرسل إليه حتّى يجيء فيحدّثني فعلتُ، ولكني كنتُ أذهبُ إليه، فأقيل على بابه حتّى يخرج إليَّ فيحدّثني".
وعن سعيد بن المسيب أنه قال:"إن كنتُ لأسير اللَّيالي والأيام في طلب الحديث الواحد".
أخرجه ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (569 - 570)، والخطيب في"الرحلة" (41 - 42) وغيرهما.
ومن هنا قيل: الرحلة في طلب الحديث سنّة عمن سلف.
وأمّا ما رُوي أنّ أبا أيوب رحل إلى عقبة بن عامر، فأتى مسلمة بن مخلَّد، فخرج إليه، فقال: دلُّوني، فأتى عقبة، فقال: حدّثنا ما سمعته من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لم يبق أحدٌ سمعه. قال: سمعتُ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من ستر على مؤمن في الدّنيا ستره اللَّه يوم القيامة، فأتى راحلته فركب، فرجع. فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (17391)، والحميدي في"مسنده" (384)، وابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (567) كلّهم من طريق سفيان، عن ابن جريج، عن أبي سعيد الأعمى، أنّه حدّث عطاءً، فذكر نحوه.
وأبو سعيد الأعمى (وقيل: أبو سعد) لم يرو عنه غير ابن جريج، وليس فيه توثيق لأحد، لذا قال فيه الذّهبيّ وابن حجر:"مجهول".
وأخرجه الطبرانيّ في الكبير (19/ 439) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، عن أبيه، عن عباد بن عباد المهلبيّ، عن ابن عون، عن مكحول، أنّ عقبة بن عامر أتى مسلمة بن مخلد، وكان بينه وبين البواب شيء، فسمع صوته فأذن له، فقال: إنّي لم آتك زائرًا، ولكن جئتك بحاجة، أتذكر يوم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من علم من أخيه سيئة، فسترها ستر اللَّه عليه يوم القيامة"؟ قال: نعم. قال: لهذا جئتُ".
فهذا إسناد قال فيه الهيثميّ:"رجاله رجال الصحيح" وهو كما قال، لكن المشهور أنّ الذي
خرج هو أبو أيوب إلى عقبة، ثم أيضًا في صحبة مسلمة بن مخلد اختلاف، فقيل: ولد على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم، وأقرَّ بصحبته البخاريّ وتعقبه ابن أبي حاتم فقال:"ليست له صحبة، نزل مصر، وكان البخاريّ كتب: إنّ له صحبة، فغيّر أبي ذلك وقال: ليست له صحبة". وقال الإمام أحمد:"مسلمة ابن مخلد ليست له صحبة". وقال ابن حبان:"ولد في السنة الأولى من الهجرة". ونقل الحافظ عن العسكريّ أنه قال:"له رؤية وليست له صحبة".
وقيل: الذي خرج إلى مسلمة بن مخلد هو جابر بن عبد اللَّه.
ورد ذلك في رواية عند الطبراني (مجمع البحرين - 217) من طريق عبيد اللَّه بن محمد بن أبي عائشة، عن يحيى بن أبي الحجاج، عن أبي سنان، عن رجاء بن حيوة، سمعت مسلمة بن مخلد.
وفيه يحيى بن أبي الحجاج، وأبو سنان عيسى بن سنان، وفيهما كلام.
والظاهر أنه وقع في إسناد هذا الخبر اضطراب لا يخلو طريق من طرقه من مقال.
والصّحيح أن جابر بن عبد اللَّه إنّما رحل إلى عبد اللَّه بن أنيس، كما سبق، واللَّه أعلم.
আবদুল্লাহ ইবনু উনাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কিয়ামতের দিন মানুষকে—অথবা তিনি বলেছেন, বান্দাদেরকে—নগ্ন, খৎনাবিহীন (অ-বিচ্ছিন্ন চামড়াসহ) এবং 'বুহমা' অবস্থায় একত্রিত করা হবে।" তিনি বলেন, আমরা জিজ্ঞেস করলাম: 'বুহমা' অর্থ কী? তিনি বললেন: "তাদের সাথে কোনো কিছুই থাকবে না। তারপর আল্লাহ এমন এক আওয়াজে তাদের ডাকবেন যা দূরের লোকও শুনবে, যেমনটি কাছের লোক শুনে থাকে: আমিই বাদশাহ, আমিই প্রতিফলদাতা। জাহান্নামবাসীদের মধ্যে এমন কারো জন্য জাহান্নামে প্রবেশ করা উচিত হবে না, যার কাছে জান্নাতবাসীদের কারো কোনো প্রাপ্য অধিকার রয়েছে, যতক্ষণ না আমি তা (বদলা নিয়ে) পরিশোধ করে দেবো। আর জান্নাতবাসীদের মধ্যে এমন কারো জন্য জান্নাতে প্রবেশ করা উচিত হবে না, যার কাছে জাহান্নামবাসীদের কারো কোনো প্রাপ্য অধিকার রয়েছে, যতক্ষণ না আমি তা (বদলা নিয়ে) পরিশোধ করে দেবো—এমনকি একটি চড়ও (যদি মেরে থাকে)।" তিনি বলেন, আমরা জিজ্ঞেস করলাম: আমরা তো আল্লাহর কাছে নগ্ন, খৎনাবিহীন এবং 'বুহমা' (সম্পদহীন) অবস্থায় আসব। তখন তা কিভাবে সম্ভব হবে? তিনি বললেন: "নেকী ও পাপের বিনিময়ে।"
1109 - عن ابن عباس أنّه تمارى والحرُّ بن قيس بن حِصْن الفزاريّ في صاحب موسى فمر بهما أبي بن كعب فدعاه ابن عباس، فقال: إني تماريت أنا وصاحبي هذا في صاحب موسى الذي سأل السبيل إلى لُقِيّه، هل سمعتَ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يذكرُ شأنه؟ قال: نعم سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"بينما موسى في ملأ من بني إسرائيل إذْ جاءه رجل فقال: هل تعلمُ أحدًا أعلم منك؟ قال موسى: لا، فأوحى اللَّه إلى موسى: بلى، عبدنا خضر. فسأل السّبيل إلى لُقيه، فجعل اللَّه له الحوتَ آية، وقيل له: إذا فقدتَ الحوت فارجعْ فإنَّك ستلقاه، فكان موسى يتّبع أثر الحوت في البحر، فقال فتى موسى لموسى: أرأيتَ إذْ أوينا إلى الصّخرة فإنّي نسيتُ الحوت، وما أنسانيه إِلَّا الشّيطان أن أذكره. قال موسى: ذلك ما كُنَّا نبغي، فارتدّا على آثارهما قصصًا، فوجدا خضرًا، فكان من شأنهما ما قصَّ اللَّه في كتابه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (78)، ومسلم في الفضائل (2380: 174) كلاهما من طريق الزّهريّ، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة بن مسعود، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এবং হুর ইবনু ক্বাইস ইবনু হিসন আল-ফাযারী মূসা (আঃ)-এর সঙ্গীর (খিদির) ব্যাপারে বিতর্ক করছিলেন। তখন তাঁদের পাশ দিয়ে উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাচ্ছিলেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে ডাকলেন এবং বললেন: আমি এবং আমার এই সঙ্গী মূসা (আঃ)-এর সেই সঙ্গীর ব্যাপারে বিতর্ক করছি, যাঁর সাথে সাক্ষাৎ পাওয়ার জন্য তিনি (মূসা) পথ জানতে চেয়েছিলেন। আপনি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর (খিদিরের) ব্যাপারটি আলোচনা করতে শুনেছেন?
তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "একদা মূসা (আঃ) বনী ইসরাঈলের এক জামাআতের মধ্যে ছিলেন। তখন এক ব্যক্তি এসে তাঁকে জিজ্ঞেস করল: আপনি কি আপনার চেয়ে অধিক জ্ঞানী কাউকে জানেন? মূসা (আঃ) বললেন: না। তখন আল্লাহ তা'আলা মূসা (আঃ)-এর প্রতি ওহী করলেন: হ্যাঁ, আমাদের বান্দা খিদির (আঃ)।"
"তখন তিনি (মূসা) তাঁর সাথে সাক্ষাতের পথ জানতে চাইলেন। আল্লাহ মাছকে তাঁর জন্য নিদর্শন হিসেবে নির্ধারণ করলেন এবং তাঁকে বলা হলো: যখন তুমি মাছটি হারিয়ে ফেলবে, তখন ফিরে যাবে। কারণ, সেখানে তুমি তাঁর সাক্ষাৎ পাবে।"
"এরপর মূসা (আঃ) সাগরে মাছের পদচিহ্ন অনুসরণ করতে লাগলেন। তখন মূসা (আঃ)-এর যুবক সঙ্গী মূসা (আঃ)-কে বললেন: আপনি কি লক্ষ করেছেন, যখন আমরা পাথরের কাছে আশ্রয় নিয়েছিলাম, তখন আমি মাছের কথা ভুলে গিয়েছিলাম? আর শয়তান ব্যতীত আর কেউ আমাকে তা স্মরণ করাতে ভুলিয়ে দেয়নি।"
মূসা (আঃ) বললেন: আমরা তো এরই সন্ধানে ছিলাম। অতঃপর তাঁরা উভয়ে নিজেদের পদচিহ্ন অনুসরণ করে ফিরে গেলেন এবং খিদির (আঃ)-এর সাক্ষাৎ পেলেন। তারপর তাঁদের মধ্যে যা ঘটেছিল, আল্লাহ তা নিজ কিতাবে বর্ণনা করেছেন।
1110 - عن أبي الدرداء قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إن العلماء هم ورثة الأنبياء، لم يورثوا دينارًا ولا درهمًا، وإنما ورثوا العلم، فمن أخذ به أخذ بحظ وافر".
حسن: رواه أبو داود (3641) والتّرمذيّ (2682) وابن ماجه (223) وأحمد (21715) كلّهم من حديث عاصم بن رجاء بن حيوة، عن داود بن جميل عن كثير بن قيس، عن أبي الدّرداء، فذكره في حديث طويل.
ومنهم من لم يذكر داود بن جميل بين عاصم بن رجاء وبين كثير، وإسناده حسن لكثرة طرقه. وكثير بن قيس، يقال له: فيس بن كثير، والأوّل أكثر.
انظر لمزيد من التخريج: باب ما جاء في فضل من خرج في طلب العلم.
وأمّا ما روي:"علماء أمتي كأنبياء بني إسرائيل" فلا أصل له.
قال السخاوي في المقاصد الحسنة (702): قال شيخنا: (يعني ابن حجر)، ومن قبله الدميري والزركشي:"إنه لا أصل له" وزاد بعضهم:"لا يعرف في كتاب معتبر".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"أقرب النّاس من درجة النبوة: أهل العلم والجهاد"، رواه أبو نعيم في فضل العالم العفيف بسند ضعيف، قاله السخاوي في المقاصد الحسنة في الموضع المشار إليه أعلاه.
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আলেমরা হলেন নবীদের উত্তরাধিকারী। তারা দিনার বা দিরহামের উত্তরাধিকারী করেন না, বরং তারা (নবীরা) জ্ঞানের উত্তরাধিকারী করেন। অতএব, যে ব্যক্তি তা গ্রহণ করল, সে বিরাট অংশ গ্রহণ করল।"
1111 - عن أبي سعيد الخدريّ أنه قال:"مرحبًا بوصية رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوصينا بكم".
حسن: رواه الحاكم (1/ 88)، وعنه البيهقيّ في المدخل (621) من طريق سعيد بن سليمان الواسطيّ، ثنا عباد بن العوّام، عن الجريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح ثابت؛ لاتفاق الشيخين على الاحتجاج بسعيد بن سليمان، وعباد بن العوام، والجريريّ، ثم احتجاج مسلم بحديث أبي نضرة، فقد عددت له في"المسند الصّحيح" أحد عشر أصلًا للجريريّ، ولم يخرجا هذا الحديث الذي هو أوّل حديث في فضل طلاب الحديث ولا يعلم له علّة، فلهذا الحديث طرق يجمعها أهل الحديث عن أبي هارون العبديّ، عن أبي سعيد. وأبو هارون ممن سكتوا عنه".
وقال الذّهبيّ:"على شرط مسلم، ولا علّة له".
قلت: الجريريّ هو سعيد بن إياس، محدّث أهل البصرة أحد الثّقات الأثبات إِلَّا أنه اختلط قبل موته بثلاث سنين، وقد ذكر ابنُ حبان أن اختلاطه لم يكن فاحشًا، ولم يتبيّن لي رواية عباد بن
العوام عنه هل كانت قبل الاختلاط أو بعده، فإن كانت روايته عنه قبل التّغير فالحديث صحيح كما قال الحاكم والذهبي.
وقال العلائيّ في"بغية الملتمس" (ص 28):"إسناده لا بأس به".
ولكن قال مُهَنّا -كما في المنتخب من العلل للخلال (66) -:"سألت أحمد عن حديث حدثنا سعيد بن سليمان، ثنا عباد بن العوام، عن سعيد الجريريّ، عن أبي نضرة، فذكر الحديث. فقال أحمد: ما خلق اللَّه من ذا شيئا، هذا حديث أبي هارون عن أبي سعيد" انتهى.
قلت: حديث أبي هارون العبديّ، عن أبي سعيد روي بألفاظ متقاربة، منها ما أورده ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" عن أبي هارون، وشهر بن حوشب أنهما قالا:"كنّا إذا أتينا أبا سعيد الخدريّ يقول: مرحبًا بوصية رسول اللَّه، قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ستفتح لكم الأرض، ويأتيكم قوم، أو يقال: غلمان حديثة أسنانهم يطلبون العلم، ويتفقهون في الدّين، ويتعلمون منكم، فإذا جاءوكم فعلّموهم، وألطفوهم، ووسّعوا لهم في المجلس، وفهِّموهم الحديث".
فكان أبو سعيد يقول لنا: مرحبًا بوصية رسول اللَّه، أمرنا رسول اللَّه أن نوسِّع لكم في المجلس، وأن نفهمكم الحديث".
أخرجه الترمذيّ (2650)، وابن ماجه (247) وغيرهما من طرق عن أبي هارون، به.
وأبو هارون اسمه: عِمارة بن جوين العيري، متروك عند أكثرهم. وكذّبه بعضهم، لكن رواه أيضًا الخطيب في"الجامع لأخلاق الرّاوي والسامع" (357) من طريق ليث بن أبي سليم، عن شهر بن حوشب عن أبي سعيد.
قلت: وهذا أيضًا إسناد ضعيف، إِلَّا أنّه أحسن حالا من إسناد أبي هارون.
قيل ليحيى بن معين: هذا أيضًا ضعيف مثل أبي هارون؟ قال: لا، هذا أقوى من ذلك وأحسن، حدّثنا ابن أبي مريم، عن يحيى بن أيوب، عن ليث. المنتخب من العلل للخلال (65).
وقال البيهقيّ في"المدخل" بعد أن رواه من طريقه:"هكذا رواه جماعة من الأئمة عن أبي هارون العبديّ، وأبو هارون وإن كان ضعيفًا فرواية أبي نضرة له شاهدة".
والخلاصة: إن لحديث أبي سعيد هذا ثلاثة طرق، طريق أبي نضرة، وطريق أبي هارون العبديّ، وطريق شهر بن حوشب، كلّهم عن أبي سعيد الخدريّ، فما كان هذا سبيله فهو لا ينزل عن درجة الحسن عند جمهور علماء الحديث، وباللَّه التوفيق.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অসিয়তকে স্বাগত। রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের তোমাদের প্রতি অসিয়ত (নির্দেশ) করতেন।"
1112 - عن أبي موسى، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم بعثه ومُعاذًا إلى اليمن، فقال:"يسّرا ولا تُعسِّرا، بشِّرا ولا تُنفِّرا، وتطاوعا ولا تختلفا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (3038)، ومسلم في الجهاد والسير (1733) كلاهما من حديث وكيع، عن شعبة، عن سعيد بن أبي بردة، عن أبيه، عن جدّه أبي موسى
الأشعريّ، فذكره.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে এবং মু‘আযকে ইয়ামান দেশে প্রেরণ করেন। অতঃপর তিনি বলেন: তোমরা সহজ করবে, কঠিন করবে না; সুসংবাদ দেবে, বিতৃষ্ণা সৃষ্টি করবে না; এবং পরস্পর মিলেমিশে থাকবে, মতপার্থক্য করবে না।
1113 - عن أنس بن مالك، قال: كان أخوان على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فكان أحدهما يأتي النبيَّ صلى الله عليه وسلم، والآخر يحترف، فشكا المحترف أخاه إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"لعلّك ترزق به".
صحيح: رواه الترمذيّ (2345) عن محمد بن بشّار، حدّثنا أبو داود، حدّثنا حمّاد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس بن مالك، فذكر الحديث.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".
وصحّحه الحاكم (1/ 93 - 94) فرواه من طريق أبي داود، به. ثم قال:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ورواته عن آخرهم أثبات ثقات، ولم يخرجاه".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে দুইজন ভাই ছিল। তাদের একজন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসতেন (ধর্মীয় জ্ঞানার্জনের জন্য), আর অন্যজন পেশাগত কাজ (উপার্জন) করতেন। অতঃপর উপার্জনকারী ব্যক্তিটি তার ভাইয়ের বিরুদ্ধে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অভিযোগ করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সম্ভবত তুমি তার (কারণেই) রিজিকপ্রাপ্ত হচ্ছো।"
1114 - عن جابر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"معلِّم الخير يستغفر له كلُّ شيء حتّى الحيتان في البحار".
حسن: رواه الطبرانيّ في الأوسط (مجمع البحرين - 203) عن محمد بن علي الصّائغ، ثنا إسماعيل بن عبد اللَّه بن زرارة، ثنا أبو إسحاق الفزاريّ، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عبد اللَّه فإنه صدوق، وقال الطبرانيّ:"لم يروه عن الأعمش إِلَّا الفزاريّ".
قلت: هذا ليس تعليلًا؛ لأنّ أبا إسحاق الفزاريّ إمام متقن لا يضرّ تفرّده، واللَّه أعلم.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কল্যাণের শিক্ষকের জন্য সব কিছুই ক্ষমা প্রার্থনা করে, এমনকি সমুদ্রের মাছেরা পর্যন্ত।"
1115 - عن ابن عباس، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما بعث مُعاذًا على اليمن قال:"إنّك تقدّم على قوم أهل الكتاب فليكن أوّل ما تدعوهم إليه عبادة اللَّه، فإذا عرفوا اللَّه فأخبرهم أنّ اللَّه قد فرض عليهم خمس صلوات في يومهم وليلتهم، فإذا فعلوا
فأخبرهم أنّ اللَّه فرض عليهم زكاة من أموالهم، وتردُّ على فقرائهم، فإذا أطاعوا بها فخذ منهم وتوقَ كرائم أموالهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1458)، ومسلم في الإيمان (19) كلاهما عن أمية بن بسطام، عن يزيد بن زريع، عن إسماعيل بن أمية، عن يحيى بن عبد اللَّه بن محمد بن صيفيّ، أنه سمع أبا معبد مولى ابن عباس يقول: سمعت ابن عباس يقول: فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইয়ামেনের দিকে পাঠালেন, তখন তিনি বললেন: 'নিশ্চয়ই তুমি এমন এক সম্প্রদায়ের কাছে যাচ্ছ, যারা কিতাবী (আহলে কিতাব)। অতএব, সর্বপ্রথম তুমি তাদের আল্লাহর ইবাদতের দিকে আহবান করবে। যখন তারা আল্লাহকে চিনে নিবে, তখন তুমি তাদের জানাবে যে আল্লাহ তাদের উপর দিনে ও রাতে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ) ফরয করেছেন। যখন তারা (তা) পালন করবে, তখন তাদের জানিয়ে দাও যে আল্লাহ তাদের সম্পদের উপর যাকাত ফরয করেছেন, যা তাদের ধনীদের থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তাদের দরিদ্রদের মধ্যে বণ্টন করা হবে। যখন তারা তাতে অনুগত হবে, তখন তুমি তাদের থেকে তা গ্রহণ করো। তবে তাদের উৎকৃষ্ট সম্পদ (নেওয়া) হতে বিরত থেকো।'
1116 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من دعا إلى هُدى كان له من الأجر مثلُ أجور من تبعه لا يَنقص ذلك من أجورهم شيئًا، ومن دعا إلى ضلالة كان عليه من الإثم مثلُ آثام من تَبعه لا ينقص ذلك من آثامهم شيئًا".
صحيح: رواه مسلم في العلم (2674) من طرق عن إسماعيل (يعنون ابن جعفر)، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি সৎপথের দিকে আহ্বান করে, সে তার অনুসারীদের সমপরিমাণ সওয়াব লাভ করে। এর ফলে তাদের (অনুসারীদের) সওয়াব মোটেও কমে যায় না। আর যে ব্যক্তি কোনো ভ্রষ্টতার দিকে আহ্বান করে, তার উপর তার অনুসারীদের পাপের সমপরিমাণ পাপের বোঝা বর্তায়। এর ফলে তাদের (অনুসারীদের) পাপ মোটেও কমে যায় না।
1117 - عن جرير بن عبد اللَّه، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مَنْ سَنَّ في الإسلام سنةً حسنةً، فعُمل بها بعده، كُتب له مثل أجر من عمل بها، ولا ينقص من أجورهم شيءٌ. ومَنْ سنَّ في الإسلام سنَّة سيِّئةً فعُمل بها بعده، كُتب عليه مثل وِزر من عمل بها، ولا ينقص من أوزارهم شيء".
وفي رواية: قال: كنتُ جالسًا عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في صدر النّهار، قال: فجاءه قوم حفاة عراة مجتابي النّمار -أو العَبَاء- متقلِّدي السّيوف، عامتهم من مضر بل كلّهم من مضر، فَتَمَعَّر وجهُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما رأى بهم من الفاقة، فدخل، ثم خرج، فأمر بلالًا فأذّن وأقام، فصلّى ثم خطب فقال: {يَاأَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ} إلى آخر الآية: {إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا} [سورة النساء: 1]، والآية التي في الحشر: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَلْتَنْظُرْ نَفْسٌ مَا قَدَّمَتْ لِغَدٍ وَاتَّقُوا اللَّهَ} [سورة الحشر: 18]. تصدَّقَ رجلٌ من ديناره، من درهمه، من ثوبه، من صاع بُرِّه، من صاع تمره، حتّى قال:"ولو بشقِّ تمرة". قال: فجاء رجلٌ من الأنصار بصُرَّةٍ كادَتْ كفُّه تَعْجِزُ عنها، بل قد عجزَتْ. قال: ثم تتابع النَّاسُ حتّى رأيتُ كومين من طعام وثياب حتّى رأيت وجهَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يتهلَّل كأنّه مُذْهَبَةٌ، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من سنَّ في الإسلام سنّةً حسنةً فله أجرها وأجر من
عمل بها بعده من غير أن ينقص من أجورهم شيءٌ، ومن سنَّ في الإسلام سنَّةً سيّئةً كان عليه وزرها ووزرُ من عمل بها من بعده من غير أن ينقص من أوزارهم شيءٌ".
صحيح: رواه مسلم في العلم (1017: 6800) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير بن عبد الحميد، عن الأعمش، عن موسى بن عبد اللَّه بن يزيد وأبي الضّحى، عن عبد الرحمن بن هلال العبسيّ، عن جرير بن عبد اللَّه، فذكر مثله.
والرّواية الثانية رواها مسلم أيضًا في الزّكاة (1017).
قوله:"مجتابي النّمار" أي لابسيها، والنِّمار جمع نمرة، وهي ثياب صوف فيها تنمير.
وقوله:"فتمعَّر" أي تغيّر وجهه.
وقوله:"يتهلّل" أي يستنير فرحًا.
জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো উত্তম রীতি (সুন্নাতুন হাসানা) প্রচলন করে, এরপর তার পরে এর উপর আমল করা হয়, তবে যারা এর উপর আমল করে তাদের সমপরিমাণ সওয়াব তার জন্য লেখা হয়। এতে তাদের সওয়াব থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো হয় না। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো মন্দ রীতি (সুন্নাতুন সাইয়্যিআহ) প্রচলন করে, এরপর তার পরে এর উপর আমল করা হয়, তবে যারা এর উপর আমল করে তাদের সমপরিমাণ পাপ তার উপর লেখা হয়। এতে তাদের পাপ থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো হয় না।"
অন্য এক বর্ণনায় তিনি বলেন: আমি দিনের প্রথম ভাগে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম। তিনি বলেন: তখন তাঁর কাছে একদল লোক এলো, যারা ছিল খালি পায়ে, উলঙ্গ (বা প্রায় বস্ত্রহীন), ডোরাকাটা পশমী চাদর বা আবায়া পরিহিত এবং তলোয়ার গলায় ঝুলিয়ে রেখেছিল। তাদের অধিকাংশ ছিল মুদার গোত্রের, বরং সকলেই ছিল মুদার গোত্রের। তাদের চরম দারিদ্র্য দেখে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা বিবর্ণ হয়ে গেল। তিনি (ঘরের) ভেতরে গেলেন, তারপর বেরিয়ে এলেন। তিনি বিলালকে আদেশ করলেন, ফলে তিনি আযান দিলেন এবং ইকামত দিলেন। তিনি সালাত আদায় করলেন, অতঃপর খুতবা দিলেন এবং বললেন: "হে মানব জাতি! তোমরা তোমাদের প্রতিপালককে ভয় করো, যিনি তোমাদেরকে সৃষ্টি করেছেন একটিমাত্র আত্মা থেকে এবং সৃষ্টি করেছেন তা থেকে তার জোড়া এবং ছড়িয়ে দিয়েছেন..." আয়াতের শেষ পর্যন্ত: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদের উপর সর্বদা দৃষ্টি রাখেন।" (সূরা নিসা: ১)। আর হাশরের সূরার এই আয়াতটি: "হে ঈমানদারগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো এবং প্রত্যেক ব্যক্তির উচিত যে, সে আগামী দিনের জন্য কী অগ্রিম পাঠিয়েছে তা যেন দেখে। আর আল্লাহকে ভয় করো।" (সূরা হাশর: ১৮)। (অতঃপর তিনি বললেন,) একজন লোক যেন তার দীনার থেকে, তার দিরহাম থেকে, তার কাপড় থেকে, তার এক সা' গম থেকে, তার এক সা' খেজুর থেকে সাদাকা করে। এমনকি তিনি বললেন: "যদিও তা এক টুকরা খেজুরের বিনিময়ে হয়।"
বর্ণনাকারী বলেন: তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি একটি থলি নিয়ে আসলেন, যা তার হাতের জন্য বহন করা প্রায় অসম্ভব ছিল, বরং তা (ভারী হওয়ায়) সত্যিই অসম্ভব ছিল। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর লোকেরা একের পর এক আসতে শুরু করল, এমনকি আমি দেখলাম খাবার ও কাপড়ের দুটি স্তূপ তৈরি হয়ে গেছে। অবশেষে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা দেখলাম যা উজ্জ্বল হচ্ছিল, যেন তা সোনার মতো ঝলমল করছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো উত্তম রীতি (সুন্নাতুন হাসানা) প্রচলন করে, তার জন্য এর প্রতিদান রয়েছে এবং তার পরে যারা এর উপর আমল করে তাদেরও প্রতিদান রয়েছে, তাদের প্রতিদান থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো ছাড়াই। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো মন্দ রীতি (সুন্নাতুন সাইয়্যিআহ) প্রচলন করে, তার উপর এর পাপ রয়েছে এবং তার পরে যারা এর উপর আমল করে তাদেরও পাপ রয়েছে, তাদের পাপ থেকে বিন্দুমাত্রও কমানো ছাড়াই।"
1118 - عن وعن أبي مسعود الأنصاريّ قال: جاء رجلٌ إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنّي أُبْدِعَ بي فاحملني. فقال:"ما عندي". فقال رجلٌ: يا رسولَ اللَّه، أنا أدلُّه على من يحمله. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من دلَّ على خير فله مثل أجر فاعله".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1893) من طرق عن الأعمش، عن أبي عمرو الشّيبانيّ، عن أبي مسعود الأنصاريّ، فذكر الحديث.
وقوله:"أبدع بيّ" أي هلكتْ دابتي، وهي مركوبي.
আবূ মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, “আমার বাহন অকেজো হয়ে গেছে (বা ধ্বংস হয়ে গেছে), সুতরাং আপনি আমাকে একটি বাহনের ব্যবস্থা দিন।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আমার কাছে কিছু নেই।” তখন এক ব্যক্তি বলল, “হে আল্লাহর রাসূল! আমি তাকে এমন লোকের কাছে দেখিয়ে দেব, যে তাকে বাহন দেবে।” তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “যে ব্যক্তি কোনো কল্যাণের পথ দেখায়, তার জন্য সেই আমলকারীর সমপরিমাণ সওয়াব রয়েছে।”
1119 - عن أبي هريرة، بلفظ: جاء رجل إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فحثّ عليه، فقال رجل: عندي كذا وكذا، قال: فما بقي في المجلس رجلٌ إِلَّا تصدّق عليه بما قلّ أو كَثُر، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من استنَّ خيرًا فاستُنَّ به، كان له أجره كاملًا، ومن أجور منِ استنَّ به ولا ينقص من أجورهم شيئًا، ومن استنَّ سنَّة سيئة، فاستُنَّ به، فعليه وزره كاملًا، ومن أوزار الذي استنَّ به، ولا ينقص من أوزارهم شيئًا".
صحيح: رواه ابن ماجه (204) عن عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث، عن أبيه، قال: حدّثني أبيّ، عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره، وإسناده صحيح. وصحّحه البوصيريّ في"الزوائد".
وهو في مسند أحمد (10749) عن عبد الصّمد، بإسناده، مثله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তখন তিনি তার (সাহায্যের) জন্য উৎসাহিত করলেন। এক ব্যক্তি বলল, 'আমার কাছে এতো এতো জিনিস রয়েছে।' বর্ণনাকারী বলেন, এরপর মজলিসে এমন কোনো ব্যক্তি অবশিষ্ট রইল না, যে তার প্রতি কম বা বেশি কিছু দান করেনি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি কোনো উত্তম পথ (ধারা) চালু করে এবং লোকেরা তা অনুসরণ করে, সে তার পূর্ণ প্রতিদান পাবে এবং যারা তাকে অনুসরণ করবে তাদের প্রতিদানও সে পাবে, এতে তাদের প্রতিদান থেকে সামান্যও হ্রাস পাবে না। আর যে ব্যক্তি কোনো মন্দ পথ (ধারা) চালু করে এবং লোকেরা তা অনুসরণ করে, তার উপর তার পূর্ণ বোঝা (পাপ) বর্তাবে এবং যারা তাকে অনুসরণ করবে তাদের বোঝাও তার উপর বর্তাবে, এতে তাদের পাপ থেকে সামান্যও হ্রাস পাবে না।"
1120 - عن واثلة بن الأسقع، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من سنَّ سنَّةً حسنةً، فله أجرها ما عُمل به في حياته، ويعد مماته حتّى يترك، ومن سنَّ سنّة سيئة فعليه إثمها حتّى يترك، ومن مات مرابطًا في سبيل اللَّه جرى له أجر المرابط حتّى يبعث يوم القيامة".
حسن: رواه الطبرانيّ (184) من طريقين عن إبراهيم بن العلاء الحمصيّ، ثنا إسماعيل بن
عياش، عن عمر بن رؤبة، عن عبد الواحد بن عبد اللَّه النّصريّ، عن واثلة بن الأسقع، فذكر الحديث. قال الهيثميّ:". . . رجاله موثقون".
قلت: إسناده حسن، إبراهيم بن العلاء مستقيم الأمر في الحديث، ولم ينكر عليه إلا حديث واحد، فلما أخبر بذلك تركه، فهذا يدل على صدقه وورعه.
وإسماعيل بن عياش صدوق في روايته عن أهل الشّام، وشيخه في هذا الحديث عمر بن رؤبة صدوق من أهل الشّام.
ওয়াসিলাহ ইবনুল আসকা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো উত্তম প্রথা (সুন্নাহ হাসানা) চালু করে, সে তার জীবদ্দশায় ও মৃত্যুর পরেও তার সওয়াব পেতে থাকবে যতক্ষণ সেই অনুযায়ী আমল করা হয় এবং যতক্ষণ না তা সম্পূর্ণরূপে পরিত্যক্ত হয়। আর যে ব্যক্তি কোনো খারাপ প্রথা চালু করে, তার উপর তার পাপ বর্তাতে থাকবে যতক্ষণ না তা পরিত্যক্ত হয়। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে সীমান্ত প্রহরী (মুরাবিত) অবস্থায় মৃত্যুবরণ করে, কিয়ামত দিবসে তাকে পুনরুত্থিত করা পর্যন্ত তার জন্য সেই প্রহরীর সওয়াব জারি থাকে।"