আল-জামি` আল-কামিল
1121 - عن حذيفة قال: سأل رجل على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم فأمسك القوم، ثم إنّ رجلًا أعطاه فأعطى القوم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من سنَّ في الإسلام سنّة حسنة فعُمل بها، كان له أجرها وأجر من عمل بها من غير أن ينتقص من أجورهم شيئًا، ومن سنَّ في الإسلام سنّة سيئة، فعُمل بها بعده، فعليه وزرها ووزر من عمل بها من غير أن ينتقص من أوزارهم شيئًا".
حسن: رواه الإمام أحمد (23289)، والبزّار -كشف الأستار (150) - والطبرانيّ في"الأوسط" (مجمع البحرين - 238) كلّهم من حديث محمد بن سيرين، عن أبي عبيدة بن حذيفة، عن أبيه، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل أبي عبيدة، لا يعرف اسمه، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 597)، ولا يعرف فيه جرح ولا انقطاع، وهو حديث البيت، وله أصل.
وأمّا ما رُوي عن أنس بن مالك، قال: أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم رجلٌ يستحمله، فلم يجد عنده ما يحمله، فدلّه على آخر فحمله، فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال:"إنّ الدّالَ على الخير كفاعله". فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (2670) عن نصر بن عبد الرحمن الكوفي، حدّثنا أحمد بن بشير، عن شبيب بن بشر، عن أنس بن مالك، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب من هذا الوجه من حديث أنس عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم".
وهذه إشارة إلى تليين هذا الحديث من هذا الوجه؛ لأنّ في بعض رواته كلامًا، فأحمد بن بشير هو المخزوميّ، أبو بكر الكوفيّ، قال ابن معين: ليس بحديثه بأس، وقال النسائي: ليس بذاك القويّ -وفي رواية: ليس به بأس-، وقال الدارقطنيّ: ضعيف يعتبر بحديثه.
وفيه أيضًا شبيب بن بشير، وهو أبو بشر الكوفيّ لم يوثقه غير ابن معين، وقال البخاريّ: منكر الحديث، وقال أبو حاتم: لين الحديث حديثه حديث الشيوخ، وذكره ابن حبان في الثقات، وقال: يخطئ كثيرًا، وقال ابن عدي: وهو من القوم الذين يكتب حديثهم.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি ভিক্ষা চাইল। তখন লোকেরা চুপ করে রইল (কিছু দিল না)। অতঃপর এক ব্যক্তি তাকে কিছু দিল, তখন লোকেরাও তাকে দেওয়া শুরু করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো উত্তম রীতি (সুন্নাহ) চালু করে, আর সেই অনুযায়ী আমল করা হয়, তবে তার জন্য তার প্রতিদান রয়েছে এবং যারা তা অনুসারে আমল করবে তাদেরও প্রতিদান রয়েছে, তাদের প্রতিদান থেকে সামান্যও কমানো হবে না। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে কোনো মন্দ রীতি (সুন্নাহ) চালু করে, আর তার পরে সেই অনুযায়ী আমল করা হয়, তবে তার জন্য তার পাপ রয়েছে এবং যারা তা অনুসারে আমল করবে তাদেরও পাপ রয়েছে, তাদের পাপ থেকে সামান্যও কমানো হবে না।”
1122 - عن سهل بن سعد، أنّه سمع النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"واللَّهِ لأنْ يهدي اللَّه بك رجلًا واحدًا خيرٌ لك من أن يكون لك حمرُ النَّعَم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2942)، ومسلم في الفضائل (2406) من طريق عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد، فذكر الحديث. وفيه قصة إعطاء النبيّ صلى الله عليه وسلم الرّاية لعلي يوم خيبر، يأتي ذكرها في موضعها إن شاء اللَّه تعالى.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আল্লাহর কসম! তোমার মাধ্যমে আল্লাহ যদি একজন মানুষকেও সঠিক পথে পরিচালিত করেন, তা তোমার জন্য লাল রঙের (দামী) উট থাকার চেয়েও উত্তম।"
1123 - عن معاوية بن أبي سفيان، قال: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من يرد اللَّه به خيرًا يُفَقُهْهُ في الدّين، وإنّما أنا قاسم، واللَّه يعطي، ولن تزال هذه الأمّة قائمة على أمر اللَّه لا يضرّهم من خالفهم حتى يأتي أمر اللَّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (71)، ومسلم في الزّكاة (1037) كلاهما من طريق ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، قال: قال حميد بن عبد الرحمن: سمعت معاوية خطيبًا يقول"فذكر نحوه"، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه، إلا أنه لا توجد عنده الجملة الأخيرة"ولن تزال هذه الأمة. . .".
ورواه مالك في القدر (8) عن يزيد بن زياد، عن محمد بن كعب القرظيّ، قال: قال معاوية على المنبر:"اللَّهمّ لا مانع لما أعطيتَ، ولا معطي لما منعتَ، ولا ينفعُ منك الجدُّ، من يرد اللَّه به خيرًا يفقهه في الدّين". سمعتُ هؤلاء الكلمات من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على هذا المنبر.
মুআবিয়া ইবনে আবি সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আল্লাহ যার কল্যাণ চান, তাকে দ্বীনের জ্ঞান দান করেন। নিশ্চয় আমি শুধু বণ্টনকারী, আর আল্লাহই দান করেন। এবং এই উম্মত সর্বদা আল্লাহর নির্দেশের ওপর প্রতিষ্ঠিত থাকবে। বিরোধীরা তাদের কোনো ক্ষতি করতে পারবে না, যতক্ষণ না আল্লাহর নির্দেশ (কিয়ামত) এসে যায়।"
1124 - عن عبد اللَّه بن عباس، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من يرد اللَّه به خيرًا يفقّهه في الدِّين".
صحيح: رواه الترمذيّ (2645) عن علي بن حجر، حدّثنا إسماعيل بن جعفر، حدّثني عبد اللَّه ابن سعيد بن أبي هند، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".
وهو كما قال؛ فإنّ رواته كلّهم ثقات معروفون، وعبد اللَّه بن سعيد بن أبي هند، قال الإمام أحمد:"ثقة ثقة". وفي رواية:"ثقة مأمون". ووثقه أيضًا ابن معين، وابن المديني، ويعقوب الفسويّ وغيرهم.
واحتجّ به الشّيخان وغيرهما من أصحاب الأصول الستة، فالصحيح أنه ثقة، وحديثه هذا قد أخرجه أيضًا الإمام أحمد في مسنده (2790) من هذا الوجه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ যার কল্যাণ চান, তাকে দ্বীনের জ্ঞান দান করেন।
1125 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من يرد اللَّه به خيرًا يفقهه في الدّين".
حسن: رواه ابن ماجه (220) عن بكر بن خلف، ثنا عبد الأعلى، عن معمر، عن الزّهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وهذا إسناد حسن من أجل بكر بن خلف؛ فإنه صدوق وهو في مسند الإمام أحمد (7194) عن عبد الأعلى بإسناده، وزاد فيه:"وإنّما أنا قاسم، ويعطي اللَّه عز وجل".
وفي الباب عن عدد من الصّحابة، منهم: حديث عمر بن الخطّاب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من يرد اللَّه به خيرًا يفهمه".
رواه الطّحاويّ في"المشكل" (1692)، وابن عبد البر في"جامع بيان العلم وفضله" (81)، والخطيب في"الفقيه والمتفقه" (5) كلّهم من حديث عمرو بن الحارث، أنّ عبّاد بن سالم حدّثه، أنّ سالم بن عبد اللَّه حدّثه، عن عبد اللَّه بن عمر، عن عمر بن الخطاب، فذكره.
وفيه عباد بن سالم، وقد ذكره البخاري في التاريخ، وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل، ولم يذكرا فيه شيئًا، فهو في عداد المجهولين، وأما ابن حبان فذكره في"ثقاته" على قاعدته في توثيق المجاهيل.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ যার কল্যাণ চান, তাকে দ্বীনের জ্ঞান দান করেন।”
1126 - عن عبد اللَّه بن مسعود، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أراد اللَّه بعبد خيرًا فقّهه في الدّين، وألهمه رشده".
حسن: رواه البزّار -كشف الأستار (137) - عن الفضل بن سهل، ثنا أحمد بن محمد بن أيوب، ثنا أبو بكر بن عياش، عن أبي وائل، عن عبد اللَّه، فذكر الحديث.
ورواه البيهقيّ في المدخل (354) من هذا الوجه إلّا أنه أدخل الأعمش بين أبي بكر بن عياش، وبين أبي وائل.
ورواه الطبرانيّ في كبيره (10445) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، عن أبيه، عن أحمد بن محمد بن أيوب، به. إلّا أنه لم يذكر فيه:"وألهمه رشده".
قال البزار:"لا نعلمه يُروى عن عبد اللَّه إلّا من هذا الوجه".
قلت: وإسناده حسن، من أجل أحمد بن محمد بن أيوب، فإنه صدوق.
ولم أجد هذا الحديث في المسند في مظانه، وكذلك لم يذكره الحافظ ابن حجر في"إطراف المُسندِ المعتلي بأطراف المسنَد الحنبلي"، فلعلّه في مصنّف آخر من مصنفاته. واللَّه تعالى أعلم.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ যখন কোনো বান্দার কল্যাণ কামনা করেন, তখন তিনি তাকে দ্বীনের জ্ঞান (ফিকহ) দান করেন এবং তাকে সঠিক পথে চলার অনুপ্রেরণা দেন।"
1127 - عن أبي هريرة، قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّما العلم بالتّعلّم، وإنّما
الحلم بالتّحلّم، ومن يتحرَّ الخير يعطه، ومن يتوقَّ الشَّر يوقه".
حسن: رواه الخطيب في تاريخه (10/ 185) عن علي بن أحمد الرّزاز، حدّثنا عبد الصمد بن علي الطَّستي، حدّثنا أحمد بن بشر بن سعد المرثدي، حدّثنا سعد بن زنبور، حدّثنا إسماعيل بن مجالد، عن عبد الملك بن عمير، عن رجاء بن حيوة، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن، من أجل علي بن أحمد الرزاز، وإسماعيل بن مجالد، فهما صدوقان، وبقية رجاله ثقات.
وفي الباب ما روي عن معاوية بن أبي سفيان، قال -وهو يخطب على المنبر- سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يا أيها النّاس إنما العلم بالتعلم، والفقه بالتّفقّه، ومن يرد اللَّه به خيرًا يفقهه في الدين، وإنما يخشى اللَّه من عباده العلماء، ولن تزال طائفة من أمّتي على الحقّ ظاهرين، لا يبالون من خالفهم، ولا من ناوأهم حتى يأتي أمر اللَّه وهم ظاهرون".
رواه البيهقيّ في المدخل (352)، والخطيب في"الفقيه والمتفقه" (12) كلاهما من حديث أبي العباس محمد بن يعقوب بن يوسف الأصمّ، أنا العباس بن الوليد بن مزيد البيروتي، قال: أخبرني محمد بن شعيب بن شابور، عن عتبة بن أبي حكيم الهمداني، عن مكحول، أنه حدّثه عن معاوية بن أبي سفيان، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل عتبة بن الحكيم الهمداني فإنه حسن الحديث، ولبعض فقراته شواهد صحيحة، إلّا أنّ علّته أن مكحولًا لم يسمع من معاوية بن أبي سفيان كما قال أبو حاتم.
وفي الباب أيضّا ما رُوي عن أبي الدّرداء. رواه الخطيب (6/ 442)، وأبو نعيم في الحلية (5/ 174)، وعزاه السخاوي في المقاصد الحسنة (210) إلى الطبراني في الكبير، والعسكريّ أيضًا، كلّهم من طريق محمد بن الحسن بن يزيد الهمداني.
قال أبو نعيم:"غريب من حديث الثوريّ عن عبد الملك، تفرّد به محمد بن الحسن".
وقال السّخاويّ في"المقاصد الحسنة":"محمد بن الحسن كذاب، ورواه البيهقي في المدخل من جهة أخرى موقوفًا على أبي الدرداء".
قلت: وفاته حديث أبي هريرة، فلم يذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "ইলম (জ্ঞান) অর্জন হয় কেবল শিক্ষার মাধ্যমে, আর ধৈর্য (হিলম) অর্জন হয় ধৈর্য ধারণের মাধ্যমে। আর যে ব্যক্তি কল্যাণের সন্ধান করে, তাকে তা দেওয়া হয়, আর যে ব্যক্তি মন্দ (অকল্যাণ) থেকে বাঁচার চেষ্টা করে, তাকে তা থেকে রক্ষা করা হয়।"
1128 - عن أبي أمامة الباهليّ، قال: ذُكر لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رجلان أحدهما عابد، والآخر عالم، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فضل العالم على العابد كفضلي على أدناكم". ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه وملائكته، وأهل السموات والأرضين حتى النملة في جحرها، وحتى الحوت ليصلُّون على معلِّم النّاس الخير".
حسن: رواه الترمذيّ (2685) عن محمد بن عبد الأعلى الصنعاني، حدّثنا سلمة بن رجاء، حدّثنا الوليد بن جميل، ثنا القاسم أبو عبد الرحمن، عن أبي أمامة، فذكره. وإسناده حسن؛ سلمة، والوليد، والقاسم، ثلاثتهم بمرتبة"صدوق".
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب". وفي نسخة ثانية:"هذا حديث حسن غريب صحيح".
قوله:"ليصلّون على معلم النّاس الخير".
قال ابن عبد البر:"الصلاة ههنا: الدّعاء والاستغفار". انظر:"جامع بيان العلم" (1/ 174).
আবু উমামা বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দু’জন লোকের কথা উল্লেখ করা হলো, যাদের একজন ছিল ইবাদতকারী (আবিদ) এবং অপরজন ছিল আলেম (জ্ঞানী)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইবাদতকারীর উপর আলেমের মর্যাদা হলো তোমাদের মধ্যেকার সর্বনিম্ন ব্যক্তির উপর আমার মর্যাদার ন্যায়।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ এবং তাঁর ফেরেশতাগণ, আসমান ও যমীনের অধিবাসীরা, এমনকি গর্তের পিঁপড়ে তার গর্তের ভেতরে এবং মাছও সেই ব্যক্তির জন্য রহমত ও কল্যাণ কামনা করতে থাকে, যে মানুষকে কল্যাণ শিক্ষা দেয়।"
1129 - عن سعد بن أبي وقاص، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"فضل العلم أحبُّ إليَّ من فضل العبادة، وخير دينكم الورع".
حسن: رواه الحاكم (1/ 92) من طريق خالد بن مخلد، عن حمزة الزيات، عن الأعمش، عن الحكم، عن مصعب بن سعد، عن أبيه، فذكر الحديث. وعنه البيهقيّ في"المدخل" (454).
قال الحاكم:"الحسن بن علي ثقة، وقد أقام الإسناد وأبهمه بكر بن بكار، فقال: ثنا حمزة الزيات، ثنا الأعمش، عن رجل -بدل الحكم-، عن مصعب، فذكره ثم قال: ثم نظرنا فوجدنا خالد بن مخلد أثبت وأحفظ وأوثق من بكر بن بكار، فحكمنا له بالزيادة.
وقال: صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، وليس كما قال؛ فإن حمزة الزيات لم يخرج له البخاري.
وإسناده حسن من أجل خالد بن مخلد القطواني فإنه مختلف فيه، فقال ابن معين: ليس به بأس، وتكلّم فيه أحمد وابن سعد وغيرهما.
وكذلك فيه حمزة وهو ابن حبيب الزيات حسن الحديث.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইলমের ফযীলত আমার কাছে ইবাদতের ফযীলত অপেক্ষা অধিক প্রিয়। আর তোমাদের দ্বীনের শ্রেষ্ঠ বিষয় হলো 'ওরা' (আল্লাহভীতি বা সন্দেহজনক বিষয় পরিহার করা)।"
1130 - عن أبي الدرداء قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إن فضل العالم على العابد كفضل القمر على سائر الكواكب".
حسن: رواه أبو داود (3641) والترمذي (2682) وابن ماجه (223) وأحمد (21715) كلّهم من حديث عاصم بن رجاء، عن داود بن جميل، عن قيس بن كثير، عن أبي الدرداء، فذكره في حديث طويل.
ومنهم من لم يذكر داود بن جميل بين عاصم بن رجاء وبين كثير بن قيس، وإسناده حسن لكثرة طرقه.
انظر لمزيد من التخريج: باب فضل من خرج في طلب العلم.
وأمّا ما رُوي عن حذيفة بن اليمان، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فضل العلم خير من فضل العبادة، وخير دينكم الورع". فموقوف.
رواه البزّار (139)، والطبرانيّ في الأوسط (مجمع البحرين - 196) كلاهما من طريق عباد بن
يعقوب الأسديّ، ثنا عبد اللَّه بن عبد القدوس، عن الأعمش، عن مطرف بن الشّخير، عن حذيفة بن اليمان، فذكر الحديث.
ومداره على عبد اللَّه بن عبد القدوس، وهو التميميّ السعديّ، فقد تفرّد بهذا الحديث.
قال البزّار:"لا نعلمه مرفوعًا إلا عن حذيفة من هذا الوجه".
وقال الطبرانيّ:"لم يروه عن الأعمش إلّا ابن عبد القدوس".
وقال أبو نعيم في الحلية (2/ 211 - 212):"لم يروه متصلًا عن الأعمش إلّا عبد اللَّه بن عبد القدوس. ورواه جرير بن عبد الحميد، عن الأعمش، عن مطرف، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم من دون حذيفة.
ورواه قتادة وحميد بن هلال عن مطرف من قوله".
وقال أبو أحمد بن عدي:"وهذا لا أعرفه إلا من حديث عبد اللَّه بن عبد القدوس، عن الأعمش".
فالظاهر من كلام هؤلاء أن عبد اللَّه بن عبد القدوس قد تفرّد برفعه، وخالف جميع أصحاب الأعمش الذين وقفوه.
وقد خرجه الحاكم (1/ 23) وعنه البيهقي في المدخل (455) من طريقه.
وقال البيهقي:"هذا الحديث يروي مرفوعًا بأسانيد ضعيفة، وهو صحيح من قول مطرف بن عبد اللَّه بن الشّخير" انتهى.
قلت: وعبد اللَّه بن عبد القدوس التميمي السعدي ضعّفه أبو داود، والنسائي وغيرهما. وفي التقريب:"صدوق، رمي بالرّفض، وكان يخطئ". فلعلّ هذا ممّا أخطأ فيه فرفعه.
وقد أورد الحافظ البيهقيّ كثيرًا من الآثار عن السلف في فضل مذاكرة العلم:
منها قول ابن عباس:"تذاكر العلم بعض ليلة أحبّ إليّ من إحيائها". وفي رواية:"مذاكرة العلم ساعة خير من إحياء ليلة".
ومنها قول ابن مسعود:"لأن أجلس في مجلس فقه ساعة أحبّ إلي من صيام يوم وقيام ليلة".
ومنها قول الشعبي:"اتقوا الفاجر من العلماء، والجاهل من المتعبدين فإنهما آفة لكل مفتون".
ومنها قول سفيان الثوري:"تعوذوا باللَّه من فتنة العالم الفاجر، والعابد الجاهل، فإن فتنتهما فتنة لكل مفتون".
আবুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই একজন আলেমের মর্যাদা একজন আবিদের (ইবাদতকারীর) উপর তেমন, যেমন চাঁদের মর্যাদা অন্যান্য সকল তারকারাজির উপর।”
1131 - عن أبي هريرة، قال: بينما النبيُّ صلى الله عليه وسلم في مجلس يحدِّث القومَ جاءه أعرابيٌّ فقال: متى الساعة؟ فمضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يحدِّث، فقال بعض القوم: سمع ما قال فكره ما قال. وقال بعضهم: بل لم يسمع، حتّى إذا قضى حديثه قال:"أين -أُراه- السائل عن الساعة؟". قال: ها أنا يا رسول اللَّه. قال:"إذا ضُيِّعت الأمانة فانتظر
السّاعة". قال: كيف إضاعتها؟ قال:"إذا وُسِّد الأمر إلى غير أهله فانتظر السّاعة".
صحيح: رواه البخاريّ في العلم (59) من طريق فليح بن سليمان، عن أبيه، عن هلال بن علي، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মজলিসে বসে লোকজনের সাথে কথা বলছিলেন, এমন সময় একজন গ্রাম্য লোক এসে জিজ্ঞেস করলো: কিয়ামত কবে হবে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কথা চালিয়ে গেলেন। তখন উপস্থিত লোকজনের মধ্যে কেউ কেউ বললো: তিনি (নবী) তার কথা শুনেছেন, কিন্তু তিনি তা অপছন্দ করেছেন। আর কেউ কেউ বললো: বরং তিনি শোনেননি। অবশেষে যখন তিনি তাঁর কথা শেষ করলেন, তখন বললেন: "আমি মনে করি, কিয়ামত সম্পর্কে প্রশ্নকারী কোথায়?" লোকটি বললো: হে আল্লাহর রাসূল, আমি এখানে। তিনি বললেন: "যখন আমানত নষ্ট করা হবে, তখন তুমি কিয়ামতের অপেক্ষা করো।" লোকটি জিজ্ঞেস করলো: কিভাবে তা নষ্ট করা হবে? তিনি বললেন: "যখন কোনো ক্ষমতা বা দায়িত্ব অযোগ্য ব্যক্তির হাতে ন্যস্ত করা হবে, তখন তুমি কিয়ামতের অপেক্ষা করো।"
1132 - عن ابن عمر، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ من الشّجر شجرةً لا يسقط ورقُها، وإنّها مثل المسلم، فحدّثوني ما هي؟". فوقع النّاسُ في شجر البوادي. قال عبد اللَّه بن عمر: ووقع في نفسي أنّها النّخلة، فاستحييتُ، ثم قالوا: حدّثنا ما هي يا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال:"هي النّخلة".
وفي رواية:"أخبروني شجرة مَثلُها مَثَلُ المسلم، تُؤتي أكلها كلَّ حين بإذن ربِّها، ولا تحت ورقها" فوقع في نفسي: النّخلة، فكرهتُ أن أتكلّم وثَمَّ أبو بكر وعمر، فلما لم يتكلما قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"هي النخلة". فلما خرجتُ مع أبي قلت: يا أبتاه! وقع في نفسي النّخلة. قال: ما منعك أن تقولها؟ لو كنتَ قلتَها كان أحبّ إليَّ من كذا وكذا. قال: ما منعني إلا أني لم أرك ولا أبا بكر تكلمتما فكرهت.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (61)، ومسلم في صفات المنافقين (2811) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا إسماعيل بن جعفر، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.
والرواية الثانية عند البخاريّ (6144) من وجه آخر عن نافع، عن ابن عمر.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "গাছসমূহের মধ্যে এমন একটি গাছ আছে যার পাতা ঝরে না, আর সেটি মুসলমানের মতো। তোমরা আমাকে বলো, সেটি কোন গাছ?"
তখন লোকেরা বন-জঙ্গলের গাছের কথা বলতে শুরু করল। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার মনে হলো সেটি খেজুর গাছ। কিন্তু আমি (লজ্জায়) চুপ রইলাম। এরপর সাহাবীরা বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনিই আমাদের বলে দিন, সেটি কী? তিনি বললেন: "সেটি হলো খেজুর গাছ।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আমাকে এমন একটি গাছের কথা বলো, যার উপমা মুসলমানের মতো, যা তার রবের অনুমতিতে সর্বাবস্থায় ফল দেয় এবং যার পাতা ঝরে না।" আমার মনে হলো সেটি খেজুর গাছ, কিন্তু সেখানে আবূ বকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত থাকায় আমি কথা বলতে অপছন্দ করলাম। যখন তাঁরা কেউই কিছু বললেন না, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সেটি হলো খেজুর গাছ।"
এরপর যখন আমি আমার পিতার (উমর রাঃ) সাথে বের হলাম, তখন বললাম, আব্বাজান! আমার মনে হচ্ছিল ওটা খেজুর গাছ। তিনি বললেন: তোমাকে বলতে বারণ করল কে? যদি তুমি সেটা বলতে, তবে আমার কাছে তা অমুক অমুক জিনিস পাওয়ার চেয়েও অধিক প্রিয় হতো। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আপনাকে এবং আবূ বকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কথা বলতে দেখিনি, তাই আমি (তাঁদের সামনে) বলা অপছন্দ করলাম।
1133 - عن أبي واقد اللّيثيّ، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بينما هو جالسٌ في المسجد والنّاس معه، إذْ أقبل نفرٌ ثلاثة، فأقبل اثنان إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وذهب واحد، فلما وقفا على مجلس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سلّما، فأما أحدهما فرأى فرجة في الحلقة فجلس فيها، وأمّا الآخر فجلس خلفهم، وأمّا الثالث فأدبر ذاهبًا، فلما فرغ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ألا أخبركم عن النّفر الثّلاثة؟ أمّا أحدهم فآوى إلى اللَّه فآواه اللَّه، وأما الآخر فاستحيا فاستحيا اللَّه منه، وأما الآخر فأعرض فأعرض اللَّه عنه".
متفق عليه: رواه مالك في السلام (4) عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أبي مُرّة -مولى عقيل بن أبي طالب-، عن أبي واقد اللّيثيّ، فذكره.
ورواه البخاريّ في العلم (66) ومسلم في السلام (2176) كلاهما عن مالك به.
আবু ওয়াক্বিদ আল-লাইসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মসজিদে বসে ছিলেন এবং তাঁর সাথে লোকজন ছিল। এমন সময় তিন জন লোক তাঁর দিকে আগমন করল। তাদের দুজন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দিকে এগিয়ে এলেন এবং একজন চলে গেল। যখন তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর মজলিসে পৌঁছলেন, তখন সালাম দিলেন। তাদের মধ্যে একজন মজলিসের গোলকের মধ্যে একটু জায়গা ফাঁকা দেখতে পেয়ে সেখানেই বসে গেলেন। আর অপরজন তাদের পেছনে বসলেন। আর তৃতীয়জন ফিরে চলে গেল। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (কথা শেষ করে) অবসর হলেন, তখন তিনি বললেন: “আমি কি তোমাদেরকে এই তিন ব্যক্তি সম্পর্কে অবহিত করব না? তাদের মধ্যে একজন আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাইল, ফলে আল্লাহ তাকে আশ্রয় দিলেন। আর অন্যজন লজ্জা অনুভব করল, ফলে আল্লাহ তার প্রতি লজ্জাবোধ করলেন (দয়া করলেন)। আর অন্যজন মুখ ফিরিয়ে নিল, ফলে আল্লাহও তার দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন।”
1134 - عن أنس بن مالك، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يعظ أصحابه فإذا ثلاثة نفر يمرون،
فجاء أحدهم فجلس إلي النبي صلى الله عليه وسلم، ومضى الثاني قليلًا ثم جلس، ومضى الثالث على وجهه، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألا أنبئكم بهؤلاء الثلاثة؟ أما الذي جاء فجلس إلينا فإنه تاب تاب اللَّه عليه، وأما الذي مضى قليلًا ثم جلس، فإنه استحيا فاستحيا اللَّه منه، وأما الذي مضى على وجهه، فإنه استغنى فاستغنى اللَّه عنه".
حسن: رواه البزار (7243)، والطبراني في الدعاء (1908) كلاهما من طريق خلف بن موسى العمي، حدّثنا أبي، عن قتادة، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن من أجل خلف بن موسى العمي وأبيه فإنهما حسنا الحديث.
وقال الهيثمي في المجمع (10/ 231):"رواه البزار، ورجاله ثقات".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের নসিহত করছিলেন। এমন সময় তিনজন লোক পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। তাদের মধ্যে একজন এসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে গেল। দ্বিতীয় জন কিছুটা দূরে চলে যাওয়ার পর বসল। আর তৃতীয় জন নিজের পথে চলে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি তোমাদের এই তিন ব্যক্তি সম্পর্কে অবহিত করব না? যে ব্যক্তি আমাদের কাছে এসে বসে গেল, সে হলো (আল্লাহর দিকে) প্রত্যাবর্তনকারী; আল্লাহ তার প্রতি প্রত্যাবর্তন করলেন (অর্থাৎ তার তাওবা কবুল করলেন)। আর যে কিছুটা দূরে চলে যাওয়ার পর বসল, সে হলো লাজুক; তাই আল্লাহও তার প্রতি লাজুক হলেন (অর্থাৎ তাকে ক্ষমা করলেন)। আর যে নিজের পথে চলে গেল, সে হলো উদাসীন/অমুখাপেক্ষী; তাই আল্লাহও তার প্রতি উদাসীন/অমুখাপেক্ষী হয়ে গেলেন।"
1135 - عن عبد اللَّه بن مسعود، قال: إنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يتخوّلنا بالموعظة في الأيام كراهة السّآمة علينا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (68)، ومسلم في صفات المنافقين (2821) من طرق عن الأعمش، عن أبي وائل، عن ابن مسعود، فذكره.
وفي رواية عندهما من طريق منصور، عن أبي وائل، قال: كان عبد اللَّه يذكِّر النّاس في كلّ خميس، فقال له رجل: يا أبا عبد الرحمن، لوددتُ أنك ذكُرتنا كلّ يوم؟ قال: أما إنّه يمنعني من ذلك أني أكره أن أملّكم وإني أتخوّلكم بالموعظة، كما كان النبي صلى الله عليه وسلم يتخوّلنا مخافة السآمة علينا.
وقوله:"يتخوّلنا" بالخاء المعجمة أي يتعهدنا في الأوقات المتفاوتة.
وجاء عن عمر بن الخطّاب أمير المؤمنين بإسناد صحيح، أنه قال: أيّها النّاس! لا تبغضوا اللَّه عز وجل إلى عباده. قال: فقال قائل: وكيف ذلك، أصلحك اللَّه؟ قال: يجلس أحدكم قاصًّا فيطول على النّاس حتى يبغض إليهم ما هم فيه، ويقوم أحدكم إمامًا فيطول على النّاس حتى يبغض إليهم ما هم فيه.
رواه البيهقيّ في"المدخل" (601) من طريق عبيد اللَّه بن عدي بن الخيار، أنه قال: سمعت عمر بن الخطاب على المنبر يقول (فذكره).
وعن عبيد بن عمير أنه دخل على عائشة فقالت: من هذا؟ فقالوا: عبيد بن عمير، فقالت: عمير ابن قتادة؟ قالوا: نعم، قالت: أحدث إنك تجلس ويُجلس إليك؟ قال: بلى يا أم المؤمنين! قالت: فإياك وإملال النّاس وتقنيطهم.
رواه البيهقي في المدخل (602)، والخطيب في"جامع أخلاق الراوي" (2/ 188)، وذكره البغويّ في شرح السنة (1/ 314) وقال:"وروي عنها أيضًا قالت له: اقصص يومًا، واترك يومًا،
ولا تمل النّاس.
আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উপর বিরক্তি আসার আশঙ্কায় মাঝেমধ্যে (সুযোগ বুঝে) আমাদের উপদেশ দিতেন।
বুখারী ও মুসলিমের অন্য এক বর্ণনায় আবূ ওয়ায়িল (রহ.) বলেন: আবদুল্লাহ (ইবনু মাসউদ) প্রতি বৃহস্পতিবার লোকদেরকে উপদেশ দিতেন। এক ব্যক্তি তাঁকে বলল: হে আবূ আবদুর রহমান! আমার ইচ্ছা হয়, আপনি যদি আমাদের প্রতিদিন উপদেশ দিতেন! তিনি বললেন: আমাকে তা থেকে বিরত রাখে এই চিন্তা যে, আমি তোমাদেরকে বিরক্ত করতে অপছন্দ করি। আমি তোমাদের প্রতি নসীহতের ক্ষেত্রে সুযোগ নিতাম (মাঝেমধ্যে দিতাম), যেমন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উপর বিরক্তি আসার আশঙ্কায় সুযোগ নিতেন।
তাঁর বাণী 'ইয়াতাখাওয়ালুনা' (يتخوّلنا) দ্বারা উদ্দেশ্য হলো: ভিন্ন ভিন্ন সময়ে আমাদের প্রতি যত্ন নেওয়া বা খোঁজখবর রাখা।
আমীরুল মু'মিনীন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহ সনদে বর্ণিত, তিনি বলেন: হে লোকসকল! তোমরা আল্লাহর বান্দাদের নিকট আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লাকে অপছন্দের পাত্র করে তুলো না। এক ব্যক্তি বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন! আল্লাহ্ আপনার কল্যাণ করুন, তা কিভাবে সম্ভব? তিনি বললেন: তোমাদের কেউ কেউ উপদেশদাতা হিসেবে বসে এবং তা লোকদের জন্য এত দীর্ঘ করে যে, তারা যে অবস্থায় আছে (অর্থাৎ উপদেশ শোনা), সেটাকেই অপছন্দ করতে শুরু করে। আর তোমাদের কেউ কেউ ইমাম হিসেবে দাঁড়ায় এবং লোকদের জন্য তা এত দীর্ঘ করে যে, তারা যে অবস্থায় আছে (অর্থাৎ সালাতে থাকা), সেটাকেই অপছন্দ করতে শুরু করে।
উবায়দ ইবনু উমায়র (রহ.) থেকে বর্ণিত, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলেন। তিনি বললেন: ইনি কে? লোকেরা বলল: উবায়দ ইবনু উমায়র। তিনি বললেন: উমায়র ইবনু কাতাদা? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমি কি শুনছি যে, তুমি বসো (উপদেশ দেওয়ার জন্য) এবং লোকেরা তোমার নিকট বসে? তিনি বললেন: হ্যাঁ, হে উম্মুল মু'মিনীন! তিনি বললেন: তুমি লোকদেরকে বিরক্ত করা এবং নিরাশ করা থেকে সাবধান থেকো।
তাঁর (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) থেকে আরও বর্ণিত আছে যে, তিনি তাকে (উবায়দ ইবনু উমায়রকে) বললেন: একদিন উপদেশ দাও এবং একদিন বিরতি দাও। আর লোকদেরকে বিরক্ত করো না।
1136 - عن محمود بن الرّبيع، قال: عقلت من النبيّ صلى الله عليه وسلم مجّة مجّها في وجهي، وأنا ابنُ خمس سنين من دلو.
صحيح: رواه البخاريّ في العلم (77) عن محمد بن يوسف، حدّثنا أبو مسهر، حدثني محمد ابن حرب، حدّثني الزبيديّ، عن الزهريّ، عن محمود بن الربيع، فذكره.
মাহমুদ ইবনু রাবী‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি ঘটনা স্মরণ করি যে, তিনি একটি বালতি থেকে এক ঢোক পানি নিয়ে আমার মুখে ছিটিয়ে দিয়েছিলেন, যখন আমি পাঁচ বছর বয়সী বালক ছিলাম।
1137 - عن أبي موسى، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ مثل ما بعثني اللَّه به عز وجل من الهُدى والعلم كمثل غيث أصاب أرضًا، فكانت منها طائفة طيبة، قبلت الماء، فأنبتت الكلأ، والعشب الكثير، وكان منها أجادب أمسكت الماء، فنفع اللَّه بها الناسَ، فشربوا منها وسَقوا ورَعوا، وأصاب طائفة منها أخرى إنّما هي قيعان، لا تمسك ماء، ولا تُنبتُ كلأ، فذلك مثل من فقه في دين اللَّه، ونفعه بما بعثني اللَّه به، فعلم وعلّم، ومثل من لم يرفع بذلك رأسًا، ولم يقبل هُدى اللَّه الذي أرسلتُ به".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (79)، ومسلم في الفضائل (2282) من طرق عن أبي أسامة (حماد بن أسامة) عن بريد بن عبد اللَّه، عن أبي بردة، عن أبي موسى، فذكر الحديث، واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
قوله:"قِيعان" بكسر القاف، جمع قاع، وهو الأرض المستوية الملساء التي لا تُنبت.
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা আমাকে যে হেদায়াত ও জ্ঞান দিয়ে প্রেরণ করেছেন, তার উদাহরণ এমন বৃষ্টির মতো যা কোনো জমিতে পড়েছে। তার মধ্যে এক প্রকার ভালো জমি ছিল, যা পানি শোষণ করে নিয়েছে এবং প্রচুর ঘাস ও তৃণলতা উৎপন্ন করেছে। আর তার মধ্যে কিছু শক্ত (উঁচু) জমি ছিল, যা পানি ধরে রেখেছে। অতঃপর আল্লাহ এর দ্বারা মানুষকে উপকৃত করেছেন। তারা তা থেকে পান করেছে, (পশুদের) পান করিয়েছে এবং চারণ করিয়েছে। এবং এর এক অন্য প্রকার জমিতেও (বৃষ্টি) পড়েছে, যা শুধু সমতল ছিল; যা পানি ধরে রাখতে পারেনি, আর না ঘাস উৎপন্ন করতে পেরেছে। এ হলো সেই ব্যক্তির উদাহরণ যে আল্লাহর দ্বীনে প্রাজ্ঞতা লাভ করেছে এবং আল্লাহ আমাকে যা দিয়ে প্রেরণ করেছেন, তার দ্বারা উপকৃত হয়েছে। অতঃপর সে নিজে শিখেছে এবং অন্যকে শিখিয়েছে। আর এ হলো সেই ব্যক্তির উদাহরণ যে এর প্রতি ভ্রুক্ষেপও করেনি এবং আল্লাহ আমাকে যে হেদায়াত দিয়ে পাঠিয়েছেন, তা গ্রহণ করেনি।"
1138 - عن طارق بن أشيم، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من علَّم آيةً من كتاب اللَّه عز وجل كان له ثوابها ما تُليت".
حسن: رواه أبو سهل القطّان في"حديثه عن شيوخه" (4/ 243/ 2) -كما في الصّحيحة (1335) - حدّثنا محمد بن الجهم، ثنا يزيد بن هارون، أنبأنا أبو مالك الأشجعيّ، عن أبيه (وهو طارق بن أشيم)، فذكر الحديث.
وهذا إسنادٌ حسن، رجاله رجال مسلم غير محمد بن الجهم، وقد وثّقه الدّارقطنيّ.
তারিক ইবনু আশইয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর কিতাব (কুরআন) থেকে একটি আয়াত শিক্ষা দেয়, যতক্ষণ সেই আয়াতটি পঠিত হবে, ততক্ষণ তার জন্য এর সওয়াব (প্রতিদান) থাকবে।”
1139 - عن عبد اللَّه بن عباس، قال: إنّ وفد عبد القيس لما أتوا النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"مَن القوم -أو من الوفد-؟". قالوا: ربيعة. قال:"مرحبًا بالقوم -أو بالوفد- غير خزايا ولا ندامي". فقالوا: يا رسول اللَّه! إنّا لا نستطيع أن نأتيك إلا في شهر
الحرام، وبيننا وبينك هذا الحيُّ من كفّار مُضر، فَمُرْنا بأمرٍ فَصْل نُخبر به من وراءنا، وندخل به الجنّة وسألوه عن الأشرية، فأمرهم بأربع ونهاهم عن أربع: أمرهم بالإيمان باللَّه وحده، قال:"أتدرون ما الإيمان باللَّه وحده؟". قالوا: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"شهادة أن لا إله إلا اللَّه، وأنّ محمّدًا رسول اللَّه، وإقام الصّلاة، وإيتاء الزّكاة، وصيام رمضان، وأن تعطوا من المغنم الخمس". ونهاهم عن أربع: عن الحنْتَم، والدُّبّاء، والنقير، والمزفَّت، وربما قال:"المقير". وقال:"احفظوهن وأخبروا بهن من وراءكم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (87)، ومسلم في الإيمان (17) من طرق عن شعبة، عن أبي جمرة، قال: كنت أترجم بين ابن عباس وبين النّاس، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আব্দুল কায়েস গোত্রের প্রতিনিধিদল নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল, তখন তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "এই দলটি কারা—অথবা প্রতিনিধিদলটি কারা?" তারা বলল: রাবী'আহ গোত্র। তিনি বললেন: "এই দলটিকে—অথবা প্রতিনিধিদলকে—স্বাগতম, তারা অপদস্থ ও অনুতপ্ত হবে না।"
তখন তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা হারাম মাস ব্যতীত অন্য সময়ে আপনার কাছে আসতে পারি না। কারণ আমাদের ও আপনার মাঝে মুদার গোত্রের কাফিররা বসবাস করে। অতএব, আপনি আমাদেরকে এমন একটি সুস্পষ্ট আদেশ দিন যা আমরা আমাদের পশ্চাতে যারা আছে তাদের কাছে পৌঁছে দিতে পারি এবং এর মাধ্যমে আমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারি।
তারা পানীয় সম্পর্কেও জিজ্ঞাসা করল। তখন তিনি তাদেরকে চারটি কাজের নির্দেশ দিলেন এবং চারটি কাজ থেকে নিষেধ করলেন। তিনি তাদেরকে একক আল্লাহর প্রতি ঈমান আনার নির্দেশ দিলেন এবং বললেন: "তোমরা কি জানো, একক আল্লাহর প্রতি ঈমান আনা কী?" তারা বলল: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সর্বাধিক অবগত। তিনি বললেন: "তা হলো: এ সাক্ষ্য দেওয়া যে, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল; সালাত (নামাজ) প্রতিষ্ঠা করা; যাকাত প্রদান করা; রমযান মাসের সাওম (রোজা) পালন করা; এবং গনীমতের এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করা।"
আর তিনি তাদেরকে চারটি পাত্র ব্যবহার করতে নিষেধ করলেন: হানতাম, দুব্বা, নাকীর এবং মুযাফ্ফাত (রাবী সম্ভবত বলেছেন, মুকাইয়ার)। তিনি বললেন: "তোমরা এগুলো মুখস্থ রাখো এবং তোমাদের পশ্চাতে যারা আছে তাদেরকে এ বিষয়ে জানিয়ে দাও।"
[মুত্তাফাকুন আলাইহি: এটি বুখারী (৮৭) 'ইলম অধ্যায়ে এবং মুসলিম (১৭) ঈমান অধ্যায়ে শু'বা থেকে, তিনি আবূ জামরা থেকে, যিনি বলেন: আমি ইবনে আব্বাস ও মানুষের মাঝে দোভাষীর কাজ করতাম, তাঁর সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।]
1140 - عن أبي بكرة، قال: خطب رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم يوم النّحر فقال:"ليبلِّغ الشاهدُ الغائبَ، فإنّه رُبَّ مبلَّغٍ يُبلَّغُه أوعى له من سامع".
متفق عليه: رواه البخاريّ (67)، ومسلم (1679)، كلاهما من طريق ابن عون، عن ابن سيرين، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه، فذكره، وهو مختصر من حديث طويل فيه ذكر خطبة النبي صلى الله عليه وسلم يوم النّحر.
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোরবানীর দিন ভাষণ দিলেন এবং বললেন: উপস্থিত ব্যক্তিরা যেন অনুপস্থিত ব্যক্তিদের কাছে (এই বার্তা) পৌঁছে দেয়। কেননা, যার কাছে বার্তা পৌঁছানো হয়, সে হয়তো তা সরাসরি শ্রবণকারীর চেয়েও অধিক ভালোভাবে সংরক্ষণকারী (বা উপলব্ধি করতে সক্ষম) হবে।