হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (11248)


11248 - عن كريب الكندي، قال: أخذ بيدي علي بن الحسين فانطلقنا إلى شيخ من قريش يقال له ابن أبي حثمة، يصلي إلى أسطوانة، فجلسنا إليه، فلما رأى عليا انصرف إليه، فقال له علي: حدثنا حديث أمك في الرقية، قال: حدثتني أمي أنها كانت ترقي في الجاهلية، فلما جاء الإسلام قالت:"لا أرقي حتى أستأذن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأتته فاستأذنته، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ارقي، ما لم يكن فيها شرك".
حسن: رواه ابن حبان (6092)، والحاكم (4/ 57) كلاهما من طريق إسحاق بن سليمان، عن الجراح بن الضحاك الكندي، عن كريب بن سليمان الكندي فذكره.

وكريب بن سليمان الكندي لم يوثقه غير ابن حبان إلا أنه توبع.

وأم ابن أبي حثمة هي جدته الشفاء كما جاء مصرحا في رواية أبي داود (3887)، وأحمد (270959)، والحاكم (4/ 56) كلهم من طريق أبي بكر بن أبي حثمة القرشي، عن الشفاء بنت عبد الله قالت: دخل علي النبي صلى الله عليه وسلم وأنا عند حفصة فقال لي:"ألا تعلّمين هذه رقية النملة كما علّمتِيها الكتابة". واللفظ لأبي داود.

ولفظ الحاكم: أن رجلا من الأنصار خرجت به نملة فدل أن الشفاء بنت عبد الله ترقي من النملة، فجاءها فسألها أن ترقيه، فقالت: والله! ما رقيت منذ أسلمت، فذهب الأنصاري إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبره بالذي قالت الشفاء، فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم الشفاء فقال:"اعرضي علي" فأعرضتها عليه، فقال:"ارقيه وعلميها حفصة كما علمتيها الكتاب".

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين"

والقصة واحدة، وقع فيها التقديم والتأخير في بيانها، وللحديث أسانيد أخرى متصلة ومرسلة، ساق بعض هذه الطرق الدارقطني في العلل (4057) مرسلة، ولم يسق جميعها.




কুরাইব আল-কিন্দি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আলী ইবনুল হুসাইন আমার হাত ধরলেন এবং আমরা কুরাইশ গোত্রের ইবনু আবি হাথমা নামক একজন শাইখের (বৃদ্ধের) কাছে গেলাম, যিনি একটি স্তম্ভের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করছিলেন। আমরা তার কাছে বসলাম। যখন তিনি আলীকে দেখলেন, তিনি তার দিকে মনোযোগ দিলেন। তখন আলী (ইবনুল হুসাইন) তাকে বললেন, আপনার মায়ের রুকিয়া (ঝাড়-ফুঁক) সংক্রান্ত হাদীসটি আমাদের বলুন। তিনি বললেন, আমার মা আমাকে বলেছিলেন যে তিনি জাহিলিয়্যাতের যুগে ঝাড়-ফুঁক করতেন। অতঃপর যখন ইসলাম এলো, তখন তিনি বললেন, “আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুমতি না নেওয়া পর্যন্ত আর ঝাড়-ফুঁক করব না।” এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন এবং অনুমতি চাইলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “তুমি ঝাড়-ফুঁক করো, যদি তাতে শিরক না থাকে।”









আল-জামি` আল-কামিল (11249)


11249 - عن عمير مولى آبي اللحم قال: شهدت خيبر مع سادتي فكلموا فيّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكلموه أني مملوك، قال: فأمرني، فقلدت السيف، فإذا أنا أجره، فأمر لي بشيء من خرثي المتاع، وعرضت عليه رقية كنت أرقي بها المجانين، فأمرني بطرح بعضها، وحبس بعضها.

وفي رواية: وعرضت عليه رقية كنت أرقي بها المجانين في الجاهلية قال:"اطرح منها كذا وكذا، وارق بما بقي".

قال محمد بن زيد: وأدركته وهو يرقي بها المجانين.

صحيح: رواه الترمذي (1557)، والنسائي في الكبرى (7493)، والحاكم (1/ 327) كلهم من طريق قتيبة، حدثنا بشر بن المفضل، عن محمد بن زيد (هو ابن المهاجر بن قنفذ)، عن عمير مولى آبي اللحم فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديت حسن صحيح".

ورواه أحمد (21941) من وجه آخر عن محمد بن زيد به نحوه، واللفظ الثاني له.




উমায়র (আবী লা'হমের আযাদকৃত গোলাম) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার মনিবদের সাথে খায়বার যুদ্ধে উপস্থিত ছিলাম। অতঃপর তারা আমার বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কথা বললেন এবং তাঁকে জানালেন যে আমি একজন গোলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আদেশ করলেন। আমি তরবারি ধারণ করলাম। তখন আমি দেখলাম যে আমি সেটিকে (ভূমিতে) টেনে নিয়ে যাচ্ছিলাম। অতঃপর তিনি আমার জন্য কিছু পুরাতন আসবাবপত্রের ব্যবস্থা করলেন। আর আমি তাঁর কাছে একটি ঝাড়ফুঁকের (রুকিয়া) ব্যবস্থা পেশ করলাম, যা দ্বারা আমি পাগলদের ঝাড়তাম। অতঃপর তিনি আমাকে তার কিছু অংশ বাদ দিতে এবং কিছু অংশ রেখে দিতে আদেশ করলেন।

অপর এক বর্ণনায় আছে: আর আমি তাঁর কাছে একটি ঝাড়ফুঁক পেশ করলাম, যা দিয়ে আমি জাহিলিয়াতের যুগে পাগলদের ঝাড়তাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি এর থেকে অমুক অমুক জিনিস ফেলে দাও এবং যা বাকি থাকে তা দিয়ে ঝাড়ো।"

মুহাম্মদ ইবনু যায়দ বলেন: আমি তাকে এমন অবস্থায় পেয়েছি যখন তিনি তা দিয়ে পাগলদের ঝাড়তেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11250)


11250 - عن عبادة بن الصامت قال: كنت أرقي من حمة العين في الجاهلية، فلما أسلمت ذكرتها لرسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"اعرضها عليّ"، فعرضتُها عليه، فقال:"ارقِ
بها فلا بأس بها".

قال عبادة: ولولا ذلك ما رقيت بها إنسانا أبدا.

حسن: رواه أبو يعلى - المطالب العالية (2483)، والضياء في المختارة (8/ 354 - 355) كلاهما من طرق، عن محمد بن إسحاق قال: حدثنى عبادة بن الوليد بن عبادة بن الصامت، عن أبيه الوليد، عن جده عبادة بن الصامت فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.

وقال الهيثمي في المجمع (5/ 111):"رواه الطبراني وإسناده حسن".

قلت: مسند عبادة بن الصامت ما زال في عداد المفقود، ولكن أخرجه الضياء من طريق الطبراني والروياني.

وأما ما روي أن خالدة بنت أنس أم بني حزم الساعدية جاءت إلى النبي صلى الله عليه وسلم فعرضت عليه الرقى، فأمرها بها. فهي مرسلة.

رواه ابن ماجه (3514) عن ابن أبي شيبة (24001) عن محمد بن عمارة، عن أبي بكر بن محمد، أن خالدة بنت أنس جاءت فذكرته.

وأبو بكر بن محمد هو: ابن عمرو بن حزم لم يحضر القصة، ولم يبين سماعها من خالدة بنت أنس.

وفيه من الآثار أن أبا بكر دخل على عائشة وهي تشتكي، ويهودية ترقيها فقال أبو بكر: ارقيها بكتاب الله.

رواه مالك في العين (11) عن يحيى بن سعيد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، أن أبا بكر دخل على عائشة فذكره.

قال الربيع: سألت الشافعي عن الرقية فقال: لا بأس أن يرقى بكتاب الله، وبما يعرف من ذكر الله قلت: أيرقي أهل الكتاب المسلمين؟ قال: نعم إذا رقوا من كتاب الله. ذكره الزرقاني في شرح الموطأ (4/ 328).

وأما ما رواه ابن حبان (6098) من طريق أبي أحمد الزبيري، حدثنا سفيان، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها، وامرأة تعالجها أو ترقيها فقال:"عالجيها بكتاب الله" فهو ضعيف.

أبو أحمد هو محمد بن عبد الله بن الزبير بن عمرو بن درهم الأسدي ثقة ثبت إلا أنه قد يخطئ في حديث الزهري كما قال أحمد وغيره.

وفي أحاديث الباب دلالة على أن كل نهي ورد عن الرقى فإنما هو فيما لا يعرف الراقي، وقد يكون من المشركين، وأما إنْ كان من المسلمين ولا يرقي إلا بالكتاب والسنة وبالرقية التي ليس فيها شرك فلا حرج في ذلك.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জাহেলিয়াতের যুগে চোখ লাগা জনিত যন্ত্রণার জন্য রুকিয়াহ করতাম। যখন আমি ইসলাম গ্রহণ করলাম, তখন বিষয়টি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: "তা আমাকে পেশ করো।" আমি তা তাঁর নিকট পেশ করলাম। তখন তিনি বললেন: "তুমি এর দ্বারা রুকিয়াহ করো; এতে কোনো অসুবিধা নেই।"
উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যদি রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুমতি না দিতেন, তবে আমি আর কখনও এর দ্বারা কারো উপর রুকিয়াহ করতাম না।









আল-জামি` আল-কামিল (11251)


11251 - عن السائب بن يزيد يقول: ذهبت بي خالتي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله إن ابن أختي وَجِعٌ، فمسح رأسي ودعا لي بالبركة.

متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5670)، ومسلم في الفضائل (2345) كلاهما من حديث حاتم بن إسماعيل، عن الجعد بن عبد الرحمن، قال: سمعت السائب بن يزيد يقول: فذكره.




সা'ইব ইবনে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার খালা আমাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার ভাগিনা অসুস্থ। তখন তিনি আমার মাথায় হাত বুলিয়ে দিলেন এবং আমার জন্য বরকতের দুআ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11252)


11252 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا اشتكى أحدكم فليضع يده حيث يشتكي، ثم يقول:"بسم الله، أعوذ بعزة الله وقدرته من شر ما أجد من وَجَعي هذا، ثم يرفع يده ثم يُعيد ذلك وترًا".

حسن: رواه الترمذي (3588)، وصحّحه الحاكم (4/ 219) من حديث عبد الوارث بن عبد الصمد، حدثني أبي، حدثنا محمد بن سالم، حدثنا ثابت البناني، عن أنس بن مالك فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل محمد بن سالم وهو لا بأس به كما قال أبو حاتم، وذكره ابن حبان في الثقات (7/ 396).




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যখন অসুস্থ হয় (বা ব্যথা অনুভব করে), তখন সে যেন তার হাত ব্যথার স্থানে রাখে। এরপর সে যেন বলে: 'বিসমিল্লাহ, আমি এই ব্যথার কারণে যে কষ্ট অনুভব করছি, তার ক্ষতি থেকে আল্লাহর সম্মান ও তাঁর ক্ষমতার দ্বারা আশ্রয় প্রার্থনা করছি।' এরপর সে তার হাত উঠাবে এবং বিজোড় সংখ্যায় তা আবার করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11253)


11253 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرقي يقول:"امسح الباس رب الناس بيدك الشفاء لا كاشف له إلا أنت".

متفق عليه: رواه البخاري في الطب (5744)، ومسلم في السلام (2191: 49) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه وليس فيه:"امسح البأس" وإنما فيه:"أذهب البأس".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (রোগীকে) ঝাড়-ফুঁক (রুকিয়াহ) করতেন এবং বলতেন: "হে মানুষের প্রতিপালক! কষ্ট দূর করে দিন। আরোগ্য আপনার হাতেই। আপনি ছাড়া অন্য কেউ তা দূরকারী নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (11254)


11254 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا اشتكى منا إنسان مسحه بيمينه، ثم قال:"أذهب الباس رب الناس واشف أنت الشافي لا شفاء إلا شفاؤك شفاء لا يغادر سقما"، فلما مرض رسول الله صلى الله عليه وسلم وثقل، أخذت بيده لأصنع به نحو ما كان يصنع فانتزع يده من يدي تم قال:"اللهم! اغفر لي واجعلني مع الرفيق الأعلى".

قالت: فذهبت أنظر فإذا هو قد قضى.

متفق عليه: رواه مسلم في السلام (2191: 46) من طرق، عن جرير، عن الأعمش، عن أبي الضحى، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.

ورواه البخاري في الطب (5743) من وجه آخر عن الأعمش مختصرا.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সাহাবিদের মধ্যে কেউ যখন অসুস্থ হতেন, তখন তিনি তার ডান হাত দ্বারা তাকে মুছে দিতেন (বা স্পর্শ করতেন) এবং বলতেন: "أذهب الباس رب الناس واشف أنت الشافي لا شفاء إلا شفاؤك شفاء لا يغادر سقما" (হে মানুষের প্রতিপালক! কষ্ট দূর করে দাও এবং আরোগ্য দান করো। তুমিই আরোগ্য দানকারী। তোমার আরোগ্য ছাড়া অন্য কোনো আরোগ্য নেই। এমন আরোগ্য, যা কোনো রোগকে অবশিষ্ট রাখে না।) অতঃপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অসুস্থ হলেন এবং তাঁর রোগ গুরুতর হলো, আমি তাঁর হাত ধরলাম, যেন তিনি যা করতেন, আমিও তার সাথে তাই করি। তখন তিনি আমার হাত থেকে তার হাত টেনে নিলেন এবং বললেন: "اللهم! اغفر لي واجعلني مع الرفيق الأعلى" (হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করুন এবং আমাকে সর্বোচ্চ বন্ধুর (আল্লাহর) সাথে মিলিত করুন।) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি দেখতে গেলাম, তখন দেখি যে তিনি ইন্তেকাল করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11255)


11255 - عن عبد العزيز بن صُهيب قال: دخلت أنا وثابت على أنس بن مالك فقال ثابت: يا أبا حمزة! اشتكيتُ. فقال أنس: أفلا أرقيك برقية رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال:
بلى. قال:"اللهم رَبَّ الناس، مُذْهِبَ البأسَ، اشفِ أنت الشافي، لا شافي إلا أنت. شفاءً لا يغادر سقَمًا".

صحيح: رواه البخاري في الطب (5742) عن مسدد، حدثنا عبد الوارث، عن عبد العزيز بن صُهيب فذكره.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুল আযীয ইবনু সুহাইব বলেন, আমি ও সাবিত তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম। সাবিত বললেন, হে আবূ হামযা! আমি অসুস্থ বোধ করছি। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি কি তোমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রুকিয়া দ্বারা ঝাড়-ফুঁক করব না? সে বলল, অবশ্যই। তিনি বললেন: "(দো‘আটি হলো) ‘হে আল্লাহ! মানুষের রব! কষ্ট দূরকারী! আরোগ্য দান করো। তুমিই আরোগ্য দানকারী। তুমি ছাড়া আরোগ্য দানকারী আর কেউ নেই। এমন আরোগ্য, যা কোনো অসুস্থতাকে বাকি রাখে না।’"









আল-জামি` আল-কামিল (11256)


11256 - عن عبد الرحمن بن السائب ابن أخي ميمونة الهلالية أنه حدثه أن ميمونة قالت له: يا ابن أخي ألا أرقيك برقية رسول الله صلى الله عليه وسلم قلت: بلى قالت:"بسم الله أرقيك، والله يشفيك من كل داء فيك، أذهب الباس، رب الناس، واشف أنت الشافي، لا شافي إلا أنت".

حسن: رواه أحمد (26821)، والطبراني في الكبير (23/ 438)، وصحّحه ابن حبان (6095) كلهم من حديث معاوية بن صالح، عن أزهر بن سعيد، عن عبد الرحمن بن السائب فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن السائب فإنه روى عنه جمع، ووثقه ابن حبان، وقال ابن سعد:"كان قليل الحديث" ولم يضعفه، وقد أصاب في هذا الحديث لشواهده، وكذلك الراوي عنه أزهر بن سعيد حسن الحديث.




মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাকে (তাঁর ভাগ্নেকে) বললেন: হে আমার ভাগ্নে! আমি কি তোমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর রুকইয়া (দোয়া/ঝাড়-ফুঁক) দ্বারা ঝেড়ে দেব না? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "বিসমিল্লাহ (আল্লাহর নামে) আমি তোমাকে রুকইয়া করছি, আল্লাহ তোমাকে তোমার ভেতরের সব রোগ থেকে আরোগ্য দান করুন। হে মানুষের প্রতিপালক! কষ্ট দূর করে দিন, আর আরোগ্য দান করুন, আপনিই আরোগ্যদাতা। আপনি ছাড়া আর কোনো আরোগ্যদাতা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (11257)


11257 - عن أبي سعيد أن جبريل أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا محمد! اشتكيت؟ فقال:"نعم" قال:"باسم الله أَرقيك، من كل شيء يُؤذيك، من شر كل نفس أو عين حاسدٍ، اللهُ يشفيكَ باسم الله أَرْقِيك".

صحيح: رواه مسلم في السلام (2186) عن بشر بن هلال الصواف، حدثنا عبد الوارث، حدثنا عبد العزيز بن صُهيب، عن أبي نَضْرة، عن أبي سعيد فذكره.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরাঈল (আঃ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, "হে মুহাম্মাদ! আপনি কি অসুস্থ বোধ করছেন?" তিনি বললেন, "হ্যাঁ।" তিনি (জিবরাঈল) বললেন, "আল্লাহর নামে আমি আপনাকে রুক্‌ইয়া (ঝাড়ফুঁক) করছি, সেই সকল কিছু থেকে যা আপনাকে কষ্ট দেয়, প্রত্যেক আত্মার অনিষ্ট থেকে অথবা ঈর্ষাপরায়ণ চক্ষুর অনিষ্ট থেকে। আল্লাহ আপনাকে আরোগ্য দান করুন, আল্লাহর নামে আমি আপনাকে রুক্‌ইয়া করছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (11258)


11258 - عن عائشة قالت: كان إذا اشتكى رسول الله صلى الله عليه وسلم رقاه جبريل قال:"باسم الله يُبريك، من كل داء يَشْفيك، ومن شر حاسد إذا حسد، وشر كل ذي عين".

صحيح: رواه مسلم في السلام (2185) عن محمد بن أبي عمر المكي، حدثنا عبد العزيز الدراوردي، عن يزيد (وهو ابن عبد الله بن أسامة بن الهاد) عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অসুস্থ হতেন, তখন জিবরীল (আঃ) তাঁর জন্য রুকইয়াহ করতেন। তিনি বলতেন: "আল্লাহর নামে, তিনি তোমাকে আরোগ্য দান করুন, প্রতিটি রোগ থেকে তিনি তোমাকে নিরাময় দান করুন, আর হিংসুক যখন হিংসা করে তার অনিষ্ট থেকে এবং (বদ) নজরওয়ালা সকলের অনিষ্ট থেকে (তিনি তোমাকে রক্ষা করুন)।"









আল-জামি` আল-কামিল (11259)


11259 - عن عبادة بن الصامت يقول: أتى جبريل عليه السلام النبي صلى الله عليه وسلم وهو يوعك فقال:"بسم الله أرقيك، في كل شيء يؤذيك، من حسد حاسد، ومن كل عين، الله يشفيك".

حسن: رواه ابن ماجه (3527) -واللفظ له- وأحمد (22760)، وصحّحه ابن حبان (953)، والحاكم (4/ 412) كلهم من طريق عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان، عن عمير بن هانئ أنه سمع جنادة بن أبي أمية الكندي يقول: سمعت عبادة بن الصامت يقول: فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ، وقد توبع.

رواه أحمد (22759) عن عبد الصمد، حدثنا ثابت، عن عاصم، عن سلمان رجل من أهل الشام، عن جنادة، عن عبادة بن الصامت فذكر نحوه.

وسلمان الشامي هذا لم يرو عنه غير عاصم، وذكره ابن حبان في الثقات، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة وقد توبع.

وفي معناه ما روي عن أبي هريرة قال: جاء النبي صلى الله عليه وسلم يعودني فقال لي:"ألا أرقيك برقية جاءني بها جبرائيل؟" قلت بأبي وأمي. بلى يا رسول الله قال:"بسم الله أرقيك، والله يشفيك، من كل داء فيك، من شر النفاثات في العقد، ومن شر حاسد إذا حسد" ثلاث مرات.

رواه ابن ماجه (3524)، وأحمد (9757) كلاهما عن عبد الرحمن (هو ابن مهدي)، حدثنا سفيان، عن عاصم بن عبيد الله، عن زياد بن ثويب، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل عاصم بن عبيد الله العدوي المدني، ومن أجل شيخه زياد بن ثويب فإنه مجهول، لم يوثقه أحد هانما ذكره ابن حبان في الثقات.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিবরাঈল (আঃ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন যখন তিনি জ্বরের কারণে কষ্ট পাচ্ছিলেন। অতঃপর তিনি (জিবরাঈল) বললেন: আল্লাহর নামে আমি আপনাকে ঝাড়ফুঁক (রুকিয়া) করছি, যা কিছু আপনাকে কষ্ট দেয়, হিংসুক ব্যক্তির হিংসা থেকে এবং সমস্ত প্রকার বদ নজর থেকে। আল্লাহ আপনাকে আরোগ্য দান করুন।









আল-জামি` আল-কামিল (11260)


11260 - عن عائشة بنت سعد أن أباه قال: تشكيت بمكة شكوى شديدة فجاءني النبي صلى الله عليه وسلم يعودني فوضع يَدَه على جبهتي، ثم مسح يديه على وجهي وبطني، ثم قال:"اللهم! اشف سعدًا، وأتمم له هجرته" فمازلت أجد بردَه على كبدي فيما يُخال إلي حتى الساعة.

متفق عليه: رواه البخاري في المرضى (5659) عن المكي بن إبراهيم، أخبرنا الجُعيد، عن عائشة بنت سعد فذكرته.

ورواه مسلم في الوصايا (1628/ 8) من أوجه أخرى عن ثلاثةٍ من ولد سعد، كلهم يحدثه عن أبيه، أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل على سعد يعوده بمكة، فبكى قال:"ما يبكيك؟" فقال: قد خشيتُ أن أموت بالأرض التي هاجرت منها كما مَات سعد بن خولة فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اللهم! اشف سعدًا، اللهم اشف سعدًا" ثلاث مرار فذكر الحديث بطوله وهو مذكور في كتاب الوصية.

وثلاثة أولاد سعد هم: عامر بن سعد، ومصعب بن سعد، وعائثة بنت سعد، وحديث عائشة بنت سعد لم يخرجه مسلم، وإنما أخرجه البخاري وحده.




সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মক্কায় গুরুতর অসুস্থ হয়ে পড়ি। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখতে এলেন। তিনি আমার কপালে হাত রাখলেন, অতঃপর তার উভয় হাত আমার মুখমণ্ডল ও পেটের ওপর বুলিয়ে দিলেন। এরপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! সা'দকে আরোগ্য দান করুন এবং তার হিজরতকে পূর্ণ করে দিন।" (সা'দ বলেন) আমার মনে হয়, আমি যেন সেই সময় থেকে এখন পর্যন্ত তাঁর হাতের শীতলতা আমার কলিজায় অনুভব করছি।









আল-জামি` আল-কামিল (11261)


11261 - عن عثمان بن أبي العاص الثقفي، أنه شكا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وجعا، يجده في جسده منذ أسلم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ضع يدك على الذي تألم من جسدك، وقل باسم الله ثلاثا، وقل سبع مرات"أعوذ بالله وقدرته من شر ما أجد وأُحاذِر".
وفي لفظ عنه: أنه أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم قال عثمان: وبي وجع قد كان يهلكني، قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"امسحه بيمينك سبع مرات. وقل"أعوذ بعزة الله وقدرته من شَرِّ ما أجد".

قال: فقلت ذلك. فأذهب الله ما كان بي. فلم أزل آمر بها أهلي وغيرهم.

صحيح: رواه مسلم في السلام (2202) من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أخبرني نافع بن جبير بن مطعم، عن عثمان بن أبي العاص فذكره باللفظ الأول.

ورواه مالك في العين (9) عن يزيد بن خصيفة، أن عمرو بن عبد الله بن كعب السلمي أخبره أن نافع بن جبير أخبره، عن عثمان بن أبي العاص فذكره باللفظ الثاني.

ومن طريق مالك رواه أبو داود (3891)، والترمذي (2080)، وأحمد في مسنده (16268).

وصحّحه ابن حبان (2965)، والحاكم (1/ 343).

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

ورويَ عن عمرو بن كعب بن مالك، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا وجد أحدكم ألما فليضع يده حيث يجد ألمه ثم ليقل سبع مرات: أعوذ بعزة الله وقدرته على كل شيء من شر ما أجد".

رواه أحمد (27179) وفيه أبو معشر هو نَجيح بن عبد الرحمن السندي ضعيف، وقد أخطأ فيه فجعله من مسند كعب بن مالك.




উসমান বিন আবিল-আস আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তার ইসলাম গ্রহণের পর থেকে শরীরে অনুভূত একটি ব্যথার অভিযোগ জানালেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “তোমার শরীরের যে স্থানে ব্যথা অনুভব করছ, সেখানে তোমার হাত রাখো এবং তিনবার 'বিসমিল্লাহ' বলো। আর সাতবার বলো: 'আউযু বিল্লাহি ওয়া কুদরাতিহি মিন শাররি মা আজিদু ওয়া উহাজিরু' (আমি যা অনুভব করছি এবং যার আশঙ্কা করছি, তার অনিষ্ট থেকে আল্লাহ্‌র নিকট ও তাঁর ক্ষমতার নিকট আশ্রয় প্রার্থনা করছি)।”

তাঁর থেকে অন্য এক বর্ণনায় আছে যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমার এমন ব্যথা ছিল যা আমাকে ধ্বংস করে দিচ্ছিল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার ডান হাত দ্বারা তা সাতবার মাসাহ করো (মুছে দাও)। এবং বলো: 'আউযু বি'ইজ্জাতিল্লাহি ওয়া কুদরাতিহি মিন শাররি মা আজিদু' (আমি যে ব্যথা অনুভব করছি, তার অনিষ্ট থেকে আল্লাহর ক্ষমতা ও তাঁর মর্যাদার নিকট আশ্রয় চাচ্ছি)।”

তিনি বললেন: আমি তাই করলাম। ফলে আল্লাহ্‌ আমার থেকে সেই ব্যথা দূর করে দিলেন। আমি তখনো থেকে আমার পরিবার ও অন্যদেরকে এই আমল করার নির্দেশ দিতে থাকি।

অন্য এক বর্ণনায় আমর ইবনু কা'ব ইবনু মালিক তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করে বলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যদি কোনো ব্যথা অনুভব করে, তবে সে যেন তার হাত সেই স্থানে রাখে যেখানে ব্যথা অনুভব করছে। তারপর সে যেন সাতবার বলে: 'আউযু বি'ইজ্জাতিল্লাহি ওয়া কুদরাতিহি আলা কুল্লি শাইয়িন মিন শাররি মা আজিদু' (আমি যা অনুভব করছি, তার অনিষ্ট থেকে আল্লাহর মর্যাদা ও তাঁর সবকিছুর উপর ক্ষমতার নিকট আশ্রয় চাচ্ছি)।"









আল-জামি` আল-কামিল (11262)


11262 - عن أبي التياح قال: قلت لعبد الرحمن بن خَنْبش التميمي -وكان كبيرًا- أدركتَ رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: نعم. قال: قلت: كيف صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة كادته الشياطين؟ فقال: إن الشياطين تحدرت تلك الليلة على رسول الله صلى الله عليه وسلم من الأودية والشعاب، وفيهم شيطان، بيده شعلة نار يريد أن يحرق بها وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فهبط إليه جبريل عليه السلام، فقال: يا محمد! قل. قال: ما أقول؟ قال: قل: أعوذ بكلمات الله التامة من شر ما خلق، وذرأَ، وبرأَ، ومن شر ما ينزل من السماء، ومن شر ما يعرج فيها، ومن شر فتن الليل والنهار، ومن شر كل طارق إلا طارقا يطرق بخير يا رحمن، قال: فطَفِئتْ نارُهم، وهزمهم الله تبارك وتعالى.

حسن: رواه أحمد (15460) عن سيار بن حاتم أبو سلمة العنزي، قال: حدثنا جعفر يعني ابن سليمان، قال: حدثنا أبو التياح قال: فذكره.

وهذا إسناد حسن من أجل سيار بن حاتم وهو مختلف فيه، فوثّقه ابن معين، وابن حبان، ومن أجل شيخه جعفر بن سليمان فإنه مختلف فيه أيضا، ووثقه أيضا ابن معين وابن المديني، وهو من رجال مسلم.
ولكن رواه أحمد أيضا (15461) عن عفان، حدثنا جعفر بن سليمان، حدثنا أبو التياح، قال: سأل رجلٌ عبدَ الرحمن بن خنبش كيف صنعَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حين كادتْه الشياطينُ … ؟ الحديث.

وقد يكون أبو التياح حاضرا عند السؤال فمرةً عبّره بقوله: قلت، وأخرى أحال السؤال إلى الرجل، وقدْ أعلّ بعض أهل العلم الإسناد الثاني بالارسال أو الانقطاع.




আবদুর রহমান ইবনে খনবিশ আত-তামিমি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে শয়তানরা যেই রাতে প্রায় বিপদে ফেলেছিল, সেই রাতে তিনি কী করেছিলেন—এই প্রশ্নের উত্তরে তিনি বলেন: সেই রাতে শয়তানরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে উপত্যকা ও গিরিপথ থেকে দ্রুত নেমে এসেছিল। তাদের মধ্যে এমন এক শয়তান ছিল যার হাতে ছিল আগুনের একটি শিখা, যার দ্বারা সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা পুড়িয়ে দিতে চেয়েছিল। তখন জিবরীল (আঃ) তাঁর কাছে অবতরণ করলেন এবং বললেন: হে মুহাম্মাদ! বলুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমি কী বলব? জিবরীল (আঃ) বললেন: আপনি বলুন:

**أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّةِ مِنْ شَرِّ مَا خَلَقَ، وَذَرَأَ، وَبَرَأَ، وَمِنْ شَرِّ مَا يَنْزِلُ مِنْ السَّمَاءِ، وَمِنْ شَرِّ مَا يَعْرُجُ فِيهَا، وَمِنْ شَرِّ فِتَنِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ، وَمِنْ شَرِّ كُلِّ طَارِقٍ إِلَّا طَارِقًا يَطْرُقُ بِخَيْرٍ يَا رَحْمَنُ**

(উচ্চারণ: আ’ঊযু বিকালিমা-তিল্লাহিত তা-ম্মাহ মিন শাররি মা খলাক্ব, ওয়া যারাআ’, ওয়া বারাআ’, ওয়া মিন শাররি মা ইয়ানযিলু মিনাস সামা-ই, ওয়া মিন শাররি মা ইয়া’রুযু ফীহা-, ওয়া মিন শাররি ফিতানিল্লাইলি ওয়ান্নাহা-র, ওয়া মিন শাররি কুল্লি ত্বা-রিক্বিন ইল্লা ত্বা-রিক্বান ইয়াত্বরুকু বিখাইরিন ইয়া- রাহমা-ন।)

(অর্থ: আমি আল্লাহ্‌র পরিপূর্ণ বাক্যসমূহের মাধ্যমে আশ্রয় প্রার্থনা করছি—তিনি যা সৃষ্টি করেছেন, যা সৃষ্টিতে ছড়িয়ে দিয়েছেন এবং যা অস্তিত্বে এনেছেন তার অনিষ্ট থেকে; আর আশ্রয় চাই আকাশ থেকে যা কিছু নেমে আসে তার অনিষ্ট থেকে; আর যা আকাশে আরোহণ করে তার অনিষ্ট থেকে; আর আশ্রয় চাই রাত-দিনের ফেতনা বা বিপর্যয় থেকে; এবং আশ্রয় চাই (রাতে) আগমনকারী প্রতিটি অনিষ্টকারীর অনিষ্ট থেকে, তবে হে দয়াময়, যে ভালো কিছু নিয়ে আসে সে ছাড়া।)

তিনি (আবদুর রহমান) বলেন: তখন তাদের আগুন নিভে গেল এবং আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তাদেরকে পরাজিত করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11263)


11263 - عن محمد بن سالم قال: حدثنا ثابت البناني قال: قال لي يا محمد! إذا اشتكيت، فضع يدك حيث تشتكي، وقل:"بسم الله أعوذ بعزة الله وقدرته من شر ما أجد، من وجعي هذا، ثم ارفع يدك، ثم أعد ذلك وترا" فإن أنس بن مالك حدثني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم حدثه بذلك.

حسن: رواه الترمذي (3588)، والحاكم (4/ 219) كلاهما من حديث عبد الوارث بن عبد الصمد قال: حدثني أبي قال: حدثنا محمد بن سالم فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن سالم وهو الربعي البصري قال أبو حاتم: لا بأس به، وذكره ابن حبان في ثقاته، فقول الحافظ في التقريب:"مقبول" محل نظر.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، ومحمد بن سالم هذا شيخ بصري".

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (রাবী) মুহাম্মাদ ইবনু সালিম বলেন, সাবিত আল-বুনানী আমাকে বললেন: হে মুহাম্মাদ! যখন তুমি অসুস্থতা অনুভব করো, তখন তোমার হাত সেই স্থানে রাখো যেখানে তুমি কষ্ট পাও এবং বলো: "বিসমিল্লাহি আ‘ঊযু বি-‘ইয্যাতিল্লাহি ওয়া কুদরাতিহি মিন শাররি মা আজিদু, মিন ওয়াজায়ি হাযা।" (অর্থাৎ: আল্লাহর নামে। আমি আল্লাহর ক্ষমতা ও মহিমার কাছে আশ্রয় চাই, আমি যে কষ্ট পাচ্ছি, এই ব্যথা থেকে।) এরপর তোমার হাত উঠিয়ে নাও। এরপর বেজোড় সংখ্যায় তা পুনরায় করো। কারণ আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বলেছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে এই বিষয়ে শিক্ষা দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11264)


11264 - عن محمد بن حاطب قال: انصبتْ على يدي من قِدْرٍ، فذهبتْ بي أمي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في مكان، قال: فقال كلامًا فيه:"أذهبِ الباسَ ربَّ الناس" وأحسبه قال:"اشفِ أنت الشافي" قال: كان يتفُلُ.

حسن: رواه أحمد (15452) عن يحيى بن سعيد، عن شعبة، عن سماك، قال: قال محمد بن حاطب فذكره.

ورواه ابن حبان (2976) من طريق النضر، عن شعبة به وفيه: فأتيناه، وهو في الرحبة، فأحفظ أنه قال:"أَذهب الباس ربَّ الناس" وأكثر علمي أنه قال:"أنت الشافي لا شافي إلا أنت".

وإسناده حسن من أجل سماك وهو ابن حرب، وسماع شعبة عنه كان قديمًا.




মুহাম্মদ ইবনু হাতিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একবার একটি হাঁড়ি থেকে গরম কিছু আমার হাতের উপর পড়ে গেল। তখন আমার মা আমাকে নিয়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলেন। তিনি তখন এক জায়গায় ছিলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু কথা বললেন, যার মধ্যে ছিল: "হে মানুষের রব, কষ্ট দূর করে দাও।" আমি ধারণা করি যে, তিনি আরও বলেছিলেন: "আরোগ্য দান করো, তুমিই তো আরোগ্য দানকারী।" তিনি (মুহাম্মদ ইবনু হাতিব) বলেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফুঁ দিচ্ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11265)


11265 - عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من عاد مريضا لم يحضر أجله فقال عنده سبع مرار: أسأل الله العظيم، رب العرش العظيم أن يشفيك إلا عافاه الله من ذلك المرض".

حسن: رواه أبو داود (3106)، والترمذي (2083)، وأحمد (2137)، والحاكم (1/ 342) كلهم من طريق شعبة، عن يزيد أبي خالد، عن المنهال بن عمرو، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

وقال الترمذي:"حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث المنهال بن عمرو".
وإسناده حسن من أجل الكلام في يزيد أبي خالد الدالاني غير أنه حسن الحديث، والكلام عليه مبسوط في كتاب الجنائز.

وبمعناه ما رُوي عن علي قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا عاد مريضا قال:"أذهب البأس رب الناس واشفِ أنت الشافي، لا شفاء إلا شفاؤك شفاء لا يغادر سقما".

رواه الترمذي (3565)، وأحمد (566) كلاهما من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي فذكره.

وقال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب".

قلت: في إسناده الحارث وهو الأعور ضعفوه، ولكن الحديث صحيح رُوي من غير وجه عن النبي صلى الله عليه وسلم.

وبمعناه ما روي عن يوسف بن محمد بن ثابت بن قيس بن شماس، عن أبيه، عن جده، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه دخل على ثابت بن قيس، وهو مريض، فقال:"اكشف البأس، ربّ الناس، عن ثابت بن قيس بن شماس"، ثم أخذ ترابا من بطحان، فجعله في قدح، ثم نفث عليه بماء، ثم صب عليه.

رواه أبو داود (3885)، والنسائي في الكبرى (10789)، وابن حبان (6069) كلهم من طريق عبد الله بن وهب قال: حدثني داود بن عبد الرحمن، عن عمرو بن يحيى المازني، عن يوسف بن محمد بن ثابت بن قيس بن شماس، عن أبيه، عن جده فذكره موصولا.

ورواه النسائي (10790) من طريق ابن جريج قال: أخبرنا عمرو بن يحيى بن عمارة قال: أخبرني يوسف بن محمد بن ثابت بن قيس بن شماس أن النبي صلى الله عليه وسلم أتى ثابت بن قيس … مرسلا.

ومدار الموصول والمرسل على يوسف بن محمد بن ثابت بن قيس بن شماس، ولم يذكر في ترجمته راو غير عمرو بن يحيى، ولم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في الثقات. ولذا قال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا.

وفي متنه غرابة وهي"أخذ ترابا من بطحان فجعله في قدح …".

وفي الباب ما روي عن أبي الدرداء قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من اشتكى منكم شيئًا أو اشتكاه أخ فليقل: ربنا الله الذي في السماء تقدس اسمك، أمرك في السماء والأرض كما رحمتك في السماء فاجعل رحمتك في الأرض، اغفر لنا حوبنا وخطايانا، أنت رب الطيبين، أنزل رحمةً من رحمتك، وشفاء من شفائك على هذا الوجع فيبرأ".

رواه أبو داود (3892)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (1037)، وابن عدي في الكامل (3/ 1054) كلهم من حديث الليث، عن زيادة بن محمد، عن محمد بن كعب، عن فضالة بن عبيد، عن أبي الدرداء فذكره.

وأخرجه الحاكم (1/ 342 - 344) من هذا الوجه وقال:"احتج الشيخان بجميع رواة هذا
الحديث غير زيادة بن محمد وهو شيخ من أهل مصر قليل الحديث".

وتعقبه الذهبي فقال:"قال البخاري وغيره: منكر الحديث".

قلت: وهو كما قال، وزيادة بن محمد هو الأنصاري قال ابن عدي: أظنه وقال بعد قول البخاري: ما أعرف له إلا مقدار حديثين أو ثلاثة، روى عن الليث وابن لهيعة، ومقدار ما له لا يتابع عليه وقال: وهو في جملة الضعفاء، ويكتب حديثه، وساق له هذا الحديث.

وقال ابن حبان في المجروحين (362):"منكر الحديت جدا، يروي المناكير عن المشاهير فاستحق الترك".

وروى الحديث المذكور عنه عن محمد بن كعب القرظي، عن فضالة بن عبيد، ولم يذكر فيه أبا الدرداء.

وكذلك رواه أيضا سعيد بن أبي مريم، عن الليث بن سعد، عن زيادة بن محمد الأنصاري، عن محمد بن كعب القرظي، عن فضالة بن عبيد، أنه قال: جاء رجلان من أهل العراق يلتمسون الشفاء لأب لهما حبس بوله، فدلهما القوم على فضالة … فذكر الحديث.

رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (1038)، واللالكائي في أصول الاعتقاد (647، 648)، والحاكم (4/ 218 - 219) كلهم من هذا الوجه، وقرن اللالكائي ابن أبي مريم بيزيد بن خالد بن موهب الرملي كما أنه جعله من مسند أبي الدرداء.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وسعيد بن أبي مريم هذا ثقة ثبت من رجال الجماعة. وزيادة بن محمد هذا سبق الكلام فيه فإنه جعل مرة من مسند أبي الدرداء، وأخرى من مسند فضالة بن عبيد، وقد وجدت له متابعا ضعيفا، وهو ما رواه الإمام أحمد (23957) عن أبي اليمان قال: حدثنا أبو بكر -يعني ابن أبي مريم- عن أشياخ، عن فضالة بن عبيد الأنصاري قال: علمني النبي صلى الله عليه وسلم رقية، وأمرني أن أرقي بها من بدا لي فذكر الحديث.

وابن أبي مريم هو أبو بكر بن عبد الله بن أبي مريم الغساني الشامي، قد ينسب إلى جده ضعيف باتفاق أهل العلم، وأشياخه غير معروفين.

وفي الباب عن طلق بن حبيب، عن أبيه، أنه كان به الأسر، فانطلق إلى المدينة والشام يطلب من يداويه، فلقي رجلا فقال: ألا أعلمك كلمات سمعتهن من رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ربنا الله الذي في السماء، تقدس اسمك، أمرك في السماء والأرض، كما رحمتك في السماء اجعل رحمتك في الأرض، اغفر لنا حوبنا وخطايانا، أنت رب الطيبين، أنزل رحمة من رحمتك، وشفاء من شفائك على هذا الوجع فيبرأ".

رواه النسائي في الكبرى (10874) من طريق سفيان، عن منصور، عن طلق بن حبيب، عن أبيه فذكره.
ورواه أيضًا من طريق أبي داود، قال: حدثنا شعبة، قال: أخبرني يونس بن خباب، قال: سمعت طلق بن حبيب، عن رجل، من أهل الشام، عن أبيه، أن رجلا، أتى النبي صلى الله عليه وسلم كان به الأسر، فأمره النبي صلى الله عليه وسلم أن يقول: فذكر الحديث.

وفي الإسناد الأول حبيب أبو طلق وهو العنزي لا يعرف من هو؟ ولذا قال الحافظ في التقريب:"مجهول".

وفي الإسناد الثاني يروي عن رجل، عن أبيه، أن رجلا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث، وفي الإسناد اضطراب شديد.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি এমন কোনো রোগীকে দেখতে যায়, যার মৃত্যুর সময় এখনও আসেনি, অতঃপর সে তার কাছে সাতবার বলে: ‘আমি মহান আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করি, যিনি মহান আরশের রব, তিনি যেন তোমাকে সুস্থ করে দেন,’ তবে আল্লাহ তাকে সে রোগ থেকে মুক্তি দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11266)


11266 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا اشتكى الإنسان الشيء منه، أو كانت به قرحة أو جرح قال النبي صلى الله عليه وسلم بإصبعه هكذا -ووضع سفيان سبابته بالأرض ثم رفعها-:"باسم الله، تربة أرضنا، بريقة بعضنا، ليُشفى به سقيمنا بإذن ربنا".

متفق عليه: رواه البخاري في الطب (5745)، ومسلم في السلام (2194: 54) من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، ثني عبدُ ربه بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة فذكرته. والسياق لمسلم.

قوله:"تربة أرضنا" قال جمهور العلماء: المراد بها جملة الأرض، فيفعل كلُّ واحدٍ هذا بالأرض التي يسكن فيها.

ومعنى الحديث كما قال النووي:"أنه يأخذ من ريق نفسه على أصبعه السبابة، ثم يضعها على التراب، فيعلق بها منه شيء فيمسح به على الموضع الجريح أو العليل، ويقول هذا الكلام في حال المسح". اهـ.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যদি কোনো ব্যক্তি তার কোনো অঙ্গের ব্যথা বা কোনো ফোঁড়া কিংবা ক্ষত নিয়ে অভিযোগ করত, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর আঙুল দ্বারা এভাবে বলতেন – (বর্ণনাকারী) সুফইয়ান তাঁর শাহাদাত আঙ্গুল মাটিতে রেখে তা উঠিয়ে দেখালেন –: "আল্লাহর নামে, আমাদের ভূমির মাটি, আমাদের কারো লালার সাথে, যাতে আমাদের অসুস্থ ব্যক্তি আরোগ্য লাভ করে আমাদের রবের অনুমতিতে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11267)


11267 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"العين حق، ونهى عن الوشم"

متفق عليه: رواه البخاري في الطب (5740)، ومسلم في السلام (2187) كلاهما من طريق عبد الرزاق، ثنا معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة فذكره. ولم يذكر مسلم الوشم.

وأما ما رواه أحمد (9668) بلفظ:"العين حق، ويحضرها الشيطان، وحسد ابن آدم". فهو ضعيف.

رواه عن ابن نمير قال: حدثنا ثور بن يزيد، عن مكحول، عن أبي هريرة فذكره مرفوعا.

ومكحول لم يسمع من أبي هريرة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, “বদ নজর (চোখের প্রভাব) সত্য এবং তিনি (উল্কি) অঙ্কন করতে নিষেধ করেছেন।”