হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (11368)


11368 - عن سعد بن أبي وقَّاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَنْ تصبَّحَ كلَّ يومٍ سبعَ تمراتٍ عجوةً لم يضرّه في ذلك اليوم سُمٌّ ولا سحرٌ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأطعمة (5445)، ومسلم في الأشربة (2047: 155) كلاهما من طريق مروان بن معاوية الفزاري، أخبرنا هاشم بن هاشم، أخبرنا عامر بن سعد، عن أبيه، فذكره. واللفظ للبخاري، وأحال به مسلم على حديث أبي أسامة، عن هاشم به مثله، لكن ليس فيه
قوله:"كل يوم".

وقوله:"العجوة" وهي أجود أنواع تمور المدينة وأنفَسِها.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি প্রতিদিন সকালে সাতটি আজওয়া খেজুর খাবে, সেদিন তাকে কোনো বিষ বা জাদু (বা, যাদু-টোনা) ক্ষতি করতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (11369)


11369 - عن سعد بن أبي وقَّاص قال: قال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"من اصطبحَ كُلَّ يوم تمرات عجوةً لم يضره سُمٌّ ولا سحرٌ ذلك اليوم والليل".

صحيح: رواه البخاريّ في الطب (5768) عن علي، حَدَّثَنَا مروان، أخبرنا هشام، أخبرنا عامر ابن سعد، عن أبيه فذكره.

وليس فيه ذكر عدد التمرات.




সাদ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি প্রতিদিন সকালে আজওয়া খেজুর খাবে, সেই দিন ও রাতে তাকে বিষ বা যাদু ক্ষতি করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (11370)


11370 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن في عَجْوة العالية شفاء -أو إنها ترياق - أول البكرة" وزاد في رواية: على الريق.

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2048) من طرق، عن إسماعيل بن جعفر، عن شريك بن أبي نمر، عن عبد الله بن أبي عتيق، عن عائشة فذكرته.

والزيادة لأحمد (24484) من طريق سليمان بن بلال، عن شريك به. وإسنادها صحيح أيضًا.

وقوله:"العالية" المقصود بها عالية المدينة وهي من جهة الجنوب.

وقوله:"الترياق" ما يستعمل لدفع السم من الأدوية والمعاجين وهو معرب.

وقوله:"أول البُكرة" المراد أكلها في الصباح قبل أن يأكل أي شيء آخر.

وقوله:"من تصبح" عام في كل زمان ومكان، ولا دليل على تخصيصه لأهل المدينة وزمان النبوة فقط، وإن كان قد قال بعض العلماء.

وقوله:"تصبح" أي أكل صباحا قبل أن يطعم شيئًا.

وقوله:"عجوة العالية" هذا تخصيص من عموم عجوة المدينة، وهذا التخصيص لا يسقط حكم العام، كل ما في الأمر أن"العالية" له خصوصية أكثر من غيرها لمناخها.

وقوله:"سبع تمرات عجوة" التحديد بالسبع هذا مما لا مجال للاجتهاد؛ فإن النَّبِي صلى الله عليه وسلم خص هذا العدد من العجوة لعلاج السحر والسم فهو كالطبيب الذي يصف الدواء ومقاديره لأن تحديد المقادير من الأدوية له أهمية كبيرة في الاستشفاء وهو أمر يعرفه الجميعُ.

وكانت عائشة تأمر من الدوام -أو من الدوار- بسبع تمرات عجوة في سبع غدوات على الريق.

رواه ابن أبي شيبة (23945) عن ابن نمير، قال: أخبرنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. وهو موقوف عليها.

والدُّوار: بالضم وبالفتح هو شبه الدوران في الرأس.

وأما ما رواه الإمام أحمد (1442) عن أبي عامر، حَدَّثَنَا فليح، عن عبد الله بن عبد الرحمن، -
يعني ابن معمر- قال: حدث عامرُ بنُ سعد عمرَ بنَ عبد العزيز -وهو أمير على المدينة- أن سعدا قال: فذكر الحديث.

وجاء فيه: قال فليح: وأظنه قال:"وإن أكلها حين يُمسي لم يضره شيء حتى يصبح". فقال عمر: انظر يا عامر ما تُحَدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: أشهد ما كذبت على سعد، وما كذب سعد على رسول الله صلى الله عليه وسلم.

فذكر المساء فيه نكارة، تفرّد به فليح وهو ابن سليمان الخزاعي وهو ضعيف ضعّفه ابن معين، وأبو حاتم، والدارمي، والنسائي، وغيرهم، ومشّاه الآخرون إذا لم يخالف، ولم يأت في حديثه بما ينكر عليه. وهنا زاد في المتن ولم يتابعه عليه أحد، ثمّ هو يخالف بما جاء في حديث عائشة:"أول البكرة".

وعند أحمد (24735):"أول البكرة على ريق النفس".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয় আলিয়া (উঁচু অঞ্চল) অঞ্চলের আজওয়া খেজুরে আরোগ্য রয়েছে – অথবা নিশ্চয় এটি বিষনাশক (তরিয়াক) – সকালের প্রথমভাগে।” এবং এক বর্ণনায় যোগ করা হয়েছে: খালি পেটে।









আল-জামি` আল-কামিল (11371)


11371 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"العجوة من الجنة وفيها شفاء من السم، والكمأة من المن، وماؤها شفاء للعين".

حسن: رواه الترمذيّ (2066) من طرق، عن سعيد بن عامر، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو (هو ابن علقمة) فإنه حسن الحديث.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب وهو من حديث محمد بن عمرو ولا نعرفه إِلَّا من حديث سعيد بن عامر عن محمد بن عمرو".

ورواه أحمد (8002)، والطيالسي (2519)، وأبو يعلى (6398) كلهم من حديث أبي بشر، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة فذكر نحوه.

ورواه ابن ماجة (3455) من وجه آخر عن مطر الوراق، عن شهر بن حوشب به.

وشهر بن حوشب لا بأس به في المتابعة فإنه حسن الحديث.

وأبو بشر هو جعفر بن إياس بن أبي وحشية ثقة، وثّقه ابن معين، وأبو زرعة وغيرهم، وضعّفه شعبة في حبيب بن سالم وفي مجاهد. وهو توبع أيضًا.

رواه الترمذي (2068) عن محمد بن بشار قال: حَدَّثَنَا معاذ بن هشام، حَدَّثَنَا أبي، عن قتادة، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة: أن ناسا من أصحاب النَّبِي صلى الله عليه وسلم قالوا: الكمأة جدري الأرض فقال النَّبِي: صلى الله عليه وسلم"الكمأة من المن، وماؤها شفاء للعين، والعجوة من الجنة، وهي شفاء من السم".

قال الترمذي:"هذا حديث حسن".
وللحديث طرق أخرى، والذي ذكرته أصحها.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আজওয়া (খেজুর) জান্নাত থেকে এসেছে এবং এর মধ্যে বিষের নিরাময় রয়েছে। আর আল-কামআহ (মাশরুম বা ট্রাফল) হলো মান্ন-এর অন্তর্ভুক্ত, এবং এর পানি চোখের জন্য আরোগ্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (11372)


11372 - عن أبي سعيد، وجابر، قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الكمأة من المن، وماؤها شفاء للعين، والعجوة من الجنة، وهي شفاء من السم".

حسن: رواه ابن ماجه (3453)، وأحمد (11453) كلاهما من طريق أسباط بن محمد، حدثنا الأعمش، عن جعفر بن إياس، عن شهر بن حوشب، عن أبي سعيد، وجابر فذكراه.

وإسناده حسن من أجل شهر بن حوشب وإنه لا مانع من أنه سمعه عن أبي سعيد وجابر كما سمعه من أبي هريرة. والطريقان محفوظان.

ورواه ابن ماجه (3453) من وجه آخر عن سعيد بن مسلمة بن هشام، عن الأعمش، عن جعفر ابن إياس، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ. وحده، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله.




আবূ সাঈদ ও জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা উভয়ে বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল-কামআ (মাশরুম বা ট্রাফল) হলো মান্নের অন্তর্ভুক্ত, আর এর পানি হলো চোখের জন্য আরোগ্য, এবং আজওয়া খেজুর হলো জান্নাতের ফল, আর তা বিষের প্রতিষেধক।"









আল-জামি` আল-কামিল (11373)


11373 - عن رافع بن عمرو المزني قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم وأنا وصيف يقول:"العجوة والشجرة من الجنّة".

صحيح: رواه أحمد (15508) عن يحيى بن سعيد، حدثنا المشمعل، قال: حدثني عمرو بن سليم المزني، قال: سمعت رافع بن عمرو المزني فذكره.

وإسناده صحيح إِلَّا قوله"الشجرة" فإنه شاذ، وقد قيل المراد بالشجرة: شجرة تمور المدينة.

والمشمعل هو ابن إياس ويقال: ابن عمرو بن إياس المدني البصري، وقال ابن معين: هو ابن ملحان وقال: ليس به بأس، ووثقه أبو داود، وابن خزيمة وغيرهما.

وقوله:"أنا وصيف" الوصيف هو العبد أو الخادم.



الثقفي، حَدَّثَنَا سفيان بن عيينة بهذا الإسناد فقال:"عن سعد بن أبي رافع".

ويونس بن الحجاج مجهول؛ لأنه لم يرو عنه إِلَّا محمد بن عبد الله الحضرمي، ومع ذلك ذكره ابن حبَّان في الثقات، ثمّ هو أخطأ في قوله:"سعد بن أبي رافع" لأنه لا يعرف في الصحابة من يسمى سعد بن أبي رافع.

ولكن روى ابن إسحاق عن إسماعيل بن محمد بن سعد أبي وقَّاص، عن أبيه، عن جده مثل هذا كما في الإصابة (3165). والله تعالى أعلم.

و"المفؤود": الذي أصيب فؤاده، فهو يشتكيه كالمبطون الذي يشتكي بطنه.

و"اللدود": ما يُسقاه الإنسان من أحد جانبي الفم، وفي التمر خاصية عجيبة لهذا الداء، ولا سيما تمر المدينة، ولا سيما العجوة منه، وفي كونها سبعا خاصية أخرى تدرك بالوحي. زاد المعاد (4/ 96).

وقوله:"فليجأهن بنواهن" يريد ليرُضّهن.

وقوله:"الوجيئة": حساء يُتخذ من التمر والدقيق، فيتحسّاه المريض. قاله الخطّابي.

وقال البغوي:"فليجأهن" أي فليدقّهن، ومنه أخذت الوجيئة، وهي المدقوقة حتى يلزم بعضه بعضا، ومنه أخذ الوجاء في الحديث:"الصوم له وجاء". شرح السنة (11/ 3




রাفع বিন আমর আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে শুনেছি, যখন আমি ছিলাম একজন যুবক (সেবক), তিনি বলছিলেন: "আজওয়া খেজুর ও (খেজুর) গাছ জান্নাত থেকে এসেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11374)


11374 - عن سعد بن أبي وقَّاص أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أكل سبع تمرات مما بين لابتيْها حين يصبح لم يضره سم حتّى يمسي".

صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2047: 154) عن عبد الله بن مسلمة بن قعنب، حَدَّثَنَا سليمان -يعني ابن بلال-، عن عبد الله بن عبد الرحمن، عن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص، عن أبيه فذكره.

وقوله:"لابتيها" هما الحرتان الشرقية والغربية في المدينة.

والحديث عام في تمور المدينة، لكنْ ذهب بعضُ أهل العلم إلى أن هذا العام مقيد، والمراد بالتمرات هنا:"العجوة" كما ورد في أحاديث أخرى.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি সকালবেলা মদীনার উভয় প্রান্তের (লাবাতাইন) মধ্যবর্তী স্থানে উৎপন্ন সাতটি খেজুর খাবে, সন্ধ্যা পর্যন্ত তাকে কোনো বিষ ক্ষতি করতে পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (11375)


11375 - عن شهاب بن عباد أنه سمع بعض وفد عبد القيس وهم يقولون: قدّمنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث بطوله وجاء فيه: ثمّ أومأ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إلى صُبْرة فقال:"أتسمون هذا البرني؟" قلنا: نعم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما إنه خير تمركم، وأنفعه لكم".

قال: فرجعنا من وفادتنا تلك فأكثرنا الغَرْز منه، وعَظُمتْ رغبتُنا فيه حتّى صار عُظْمَ نخلنا وتمرنا البرني.
حسن: رواه أحمد (15559) عن يونس بن محمد، قال: حَدَّثَنِي يحيى بن عبد الرحمن العصري، حَدَّثَنَا شهاب بن عباد قال: فذكره.

والحديث فيه قصة وهي: قال الراوي: قدّمنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فاشتد فرحهم بنا، فلما انتهينا إلى القوم أوسعوا لنا، فقعدنا فرحب بنا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، ودعا لنا، ثمّ نظر إلينا فقال:"من سيّدُكم وزعيمُكم؟" فأشرنا بأجمعنا إلى المنذر بن عائذ، فقال النَّبِي صلى الله عليه وسلم:"أهذا الأشج" وكان أول يوم وضع عليه هذا الاسم بضربة لوجهه بحافر حمار، قلنا: نعم يا رسول الله، فتخلف بعض القوم، فعقل رواحلهم، وضم متاعهم، ثمّ أخرج عيبته فألقى عنه ثياب السفر، ولبس من صالح ثيابه، ثمّ أقبل إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وقد بسط النبي صلى الله عليه وسلم رِجْله، واتكأ، فلمّا دنا منه الأشجّ أوسع القومُ له، وقالوا: هاهنا يا أشج، فقال النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم واستوى قاعدًا، وقبض رجله:"هاهنا يا أشج" فقعد عن يمين النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فرحب به، وألطفه، وسأله عن بلاده وسمى له قريةً قريةً: الصفا، والمُشَقَّر وغير ذلك من قرى هَجَر، فقال: بأبي وأمي يا رسول الله، لأنت أعلم بأسماء قُرانا منا، فقال:"إنَّي قد وطئت بلادكم، وفسح لي فيها"، قال: ثمّ أقبل على الأنصار فقال:"يا معشر الأنصار، أكرموا إخوانكم، فإنهم أشباهكم في الإسلام أشبه شيء بكم أشعارا وأبشارا، أسلموا طائعين غير مكرهين، ولا مَوْتورين إذ أبى قوم أن يسلموا حتّى قُتِلوا".

قال: فلمّا أن أصبحوا قال:"كيف رأيتم كرامة إخوانكم لكم، وضيافتهم إياكم؟" قالوا: خير إخوان، ألانوا فراشنا، وأطابوا مطعمنا، وباتوا، وأصبحوا يعلِّمونا كتاب ربنا تبارك وتعالى، وسنة نبينا صلى الله عليه وسلم، فأعجبت النبيَّ صلى الله عليه وسلم وفرح بها، ثمّ أقبل علينا رجلًا رجلًا يعرضُنا على ما تعلَّمْنا، وعَلِمْنا، فمنا من علم التحيات وأم الكتاب، والسورة والسورتين، والسنن، ثمّ أقبل علينا بوجهه، فقال:"هل معكم من أزوادكم شيء؟" ففرح القوم بذلك وابتدروا رحالهم، فأقبل كل رجل منهم معه صُبْرة من تمر فوضعوها على نِطَع بين يديه، فأومأ بجريدةٍ في يده كان يختصر بها فوق الذراع، ودون الذراعين، فقال:"أتسمون هذا التعضوض؟" قلنا: نعم، ثمّ أومأ إلى صُبْرة أخرى، فقال:"أتسمون هذا الصرفان؟" قلنا: نعم، ثمّ أومأ إلى صُبْرة، فقال:"أتسمون هذا البرني؟" قلنا: نعم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما إنه خير تمركم، وأنفعه لكم" قال: فرجعنا من وفادتنا تلك، فأكثرنا الغرز منه، وعظمت رغبتنا فيه حتّى صار عُظْم نخلِنا وتمرِنا البرني.

فمال: الأشجّ: يا رسول الله، إن أرضنا أرضٌ ثقيلةٌ وَخِمةٌ، وإنا إذا لم نشرب هذه الأشربة هِيجت ألوانُنا، وعظمت بطونُنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تشربوا في الدباء، والحنتم، والنقير، وليشربْ أحدُكم في سقاء يُلاث على فيه" فقال له الأشج: بأبي، وأمي يا رسول الله، رَخِّصْ لنا في مثل هذه، وأومأ بكفيه، فقال:"يا أشج، إني إن رخَّصْتُ لك في مثل هذه" -وقال بكفيه هكذا -شربته في مثل هذه، -وفرج يديه وبسطها، يعني أعظم منها- حتّى إذا ثَمِلَ أحدُكم من شرابه، قام إلى ابن عمه فهزر ساقه بالسيف"، وكان في الوفد رجل من بني عضل يقال له: الحارث، قد
هُزِرَتْ ساقه في شراب لهم في بيت تَمَثَّله من الشِّعر في امرأة منهم، فقام بعضُ أهل ذلك البيت فهزر ساقَه بالسيف، فقال الحارث:"لما سمعتها من رسول الله صلى الله عليه وسلم جعلت أسدل ثوبي، فأغطّي الضربة بساقي، وقد أبداها الله تبارك وتعالى.

وإسناده حسن من أجل يحيى بن عبد الرحمن، وشيخه شهاب بن عباد العبدي البصري، وثّقهما ابن حبَّان، وقصة وفد عبد القيس رُوي من أوجه كثيرة يشدّ بعضها بعضًا.

وأمّا قوله:"خير تمركم البرني" فله شواهد كثيرة، وفي أسانيدهم مقال إِلَّا أن الشواهد الكثيرة تدل على أن له أصلًا.

وقال الهيثمي في"المجمع" (8/ 177 - 178):"رواه أحمد ورجاله ثقات" اعتمادًا على توثيق ابن حبَّان.




শিহাব ইবনে আব্বাদ থেকে বর্ণিত, তিনি আব্দুল কাইস গোত্রের প্রতিনিধি দলের কয়েকজনকে বলতে শুনেছেন যে, তারা বলছেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম। বর্ণনাকারী বিস্তারিত হাদীসটি উল্লেখ করেছেন। এর মধ্যে এসেছে: অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খেজুরের একটি স্তূপের দিকে ইঙ্গিত করে বললেন: "তোমরা কি এটাকে 'বারনি' (আল-বারনি) খেজুর বলো?" আমরা বললাম: হ্যাঁ। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জেনে রাখো, নিশ্চয়ই এটি তোমাদের খেজুরের মধ্যে সর্বোত্তম এবং তোমাদের জন্য সবচেয়ে উপকারী।"

বর্ণনাকারী বললেন: এরপর আমরা আমাদের সেই প্রতিনিধি দল থেকে ফিরে এসে ব্যাপকভাবে তা রোপণ করলাম এবং এর প্রতি আমাদের আগ্রহ প্রবল হলো। শেষ পর্যন্ত আমাদের অধিকাংশ খেজুর গাছ ও খেজুর 'বারনি' খেজুরে পরিণত হলো।

আর এই হাদীসে একটি ঘটনা আছে। রাবী বলেছেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলাম, তিনি আমাদের আগমনে খুব খুশি হলেন। যখন আমরা লোকদের কাছে পৌঁছালাম, তারা আমাদের জন্য জায়গা করে দিলেন। আমরা বসলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের অভ্যর্থনা জানালেন এবং আমাদের জন্য দুআ করলেন। অতঃপর তিনি আমাদের দিকে তাকিয়ে বললেন: "তোমাদের মধ্যে তোমাদের সর্দার ও নেতা কে?" আমরা সকলে মুনযির ইবনে আ'ইযের দিকে ইঙ্গিত করলাম। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইনি কি আশাজ্জ (যার মুখে আঘাতের চিহ্ন আছে)?" একটি গাধার খুরের আঘাতে তার চেহারায় আঘাতের চিহ্ন থাকার কারণে প্রথম দিনই তাঁকে এই নামে ডাকা হয়। আমরা বললাম: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। তখন দলের কিছু লোক পেছনে থাকলেন, তারা তাদের বাহনগুলির বাঁধলেন এবং তাদের আসবাবপত্র একসাথে রাখলেন। অতঃপর তিনি (আল-আশাজ্জ) তার থলে বের করে ভ্রমণের কাপড় পরিবর্তন করলেন এবং তাঁর ভালো পোশাক পরলেন। এরপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন, আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন পা ছড়িয়ে হেলান দিয়ে বসেছিলেন। যখন আশাজ্জ তাঁর কাছে গেলেন, তখন লোকেরা তাঁকে জায়গা করে দিল এবং বলল: এখানে আসুন, হে আশাজ্জ। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সোজা হয়ে বসলেন এবং তাঁর পা গুটিয়ে নিলেন আর বললেন: "এখানে এসো, হে আশাজ্জ।" তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ডান পাশে বসলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে স্বাগত জানালেন এবং স্নেহ করলেন। তিনি তাঁর দেশের বিষয়ে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন এবং একে একে তাঁর গ্রামের নাম উল্লেখ করলেন: আস-সাফা, আল-মুশাক্কার এবং হাজরের অন্যান্য গ্রাম। তিনি (আশাজ্জ) বললেন: আমার পিতা-মাতা আপনার প্রতি কুরবান হোক, হে আল্লাহর রাসূল, আপনি আমাদের গ্রামের নাম আমাদের চেয়েও বেশি জানেন। তিনি বললেন: "আমি তোমাদের দেশে গিয়েছি এবং সেখানে আমার জন্য পথ উন্মুক্ত করা হয়েছিল।" রাবী বলেন: অতঃপর তিনি আনসারদের দিকে ফিরে বললেন: "হে আনসারগণ, তোমাদের ভাইদেরকে সম্মান করো, কারণ তারা ইসলামের ক্ষেত্রে তোমাদের মতোই। চেহারা ও বর্ণে তোমাদের সাথে তাদের অদ্ভুত মিল রয়েছে। তারা স্বেচ্ছায় ইসলাম গ্রহণ করেছে, কোনো জোর বা আঘাত ছাড়াই, যখন অন্য লোকেরা নিহত না হওয়া পর্যন্ত ইসলাম গ্রহণ করতে অস্বীকার করেছিল।"

রাবী বলেন: অতঃপর যখন সকাল হলো, তিনি বললেন: "তোমাদের ভাইদের আতিথেয়তা ও সম্মান কেমন দেখলে?" তারা বললেন: তারা উত্তম ভাই। তারা আমাদের বিছানা নরম করে দিয়েছেন, আমাদের খাবারকে সুস্বাদু করেছেন এবং রাতভর ও সকাল পর্যন্ত তারা আমাদের রবের কিতাব ও আমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুন্নাত শিক্ষা দিয়েছেন। এতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুব খুশি হলেন এবং আনন্দিত হলেন। অতঃপর তিনি একে একে আমাদের দিকে মনোযোগ দিলেন, আমরা যা শিখেছি এবং জেনেছি তা যাচাই করলেন। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ 'তাহিয়্যাত', উম্মুল কিতাব (সূরা ফাতিহা), এক বা দুটি সূরা এবং সুন্নাতসমূহ শিখেছিল। অতঃপর তিনি আমাদের দিকে মুখ করে বললেন: "তোমাদের কাছে কি তোমাদের পাথেয় থেকে কিছু আছে?" এতে উপস্থিত লোকেরা আনন্দিত হলো এবং দ্রুত তাদের মালপত্রের দিকে ছুটে গেল। অতঃপর তাদের প্রত্যেকে এক স্তূপ খেজুর নিয়ে এসে তাঁর সামনে একটি চামড়ার দস্তরখানে রাখল। তিনি তাঁর হাতে থাকা একটি লাঠি (যা বাহুর উপরে এবং দুই বাহুর নিচে ছিল) দিয়ে ইঙ্গিত করে বললেন: "তোমরা কি এটিকে 'তা'দুদ' বলো?" আমরা বললাম: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি অন্য একটি স্তূপের দিকে ইঙ্গিত করে বললেন: "তোমরা কি এটিকে 'সির্ফান' বলো?" আমরা বললাম: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি (আরেকটি) স্তূপের দিকে ইঙ্গিত করে বললেন: "তোমরা কি এটিকে 'বারনি' বলো?" আমরা বললাম: হ্যাঁ। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জেনে রাখো, নিশ্চয়ই এটি তোমাদের খেজুরের মধ্যে সর্বোত্তম এবং তোমাদের জন্য সবচেয়ে উপকারী।" রাবী বললেন: এরপর আমরা আমাদের সেই প্রতিনিধি দল থেকে ফিরে এসে ব্যাপকভাবে তা রোপণ করলাম এবং এর প্রতি আমাদের আগ্রহ প্রবল হলো। শেষ পর্যন্ত আমাদের অধিকাংশ খেজুর গাছ ও খেজুর 'বারনি' খেজুরে পরিণত হলো।

তখন আশাজ্জ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল, আমাদের দেশটি ভারী ও আর্দ্র (রোগ সৃষ্টিকারী) ভূমি। আর যদি আমরা এই পানীয়গুলি পান না করি, তবে আমাদের রং ফ্যাকাশে হয়ে যায় এবং আমাদের পেট বড় হয়ে যায়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা শুকনো লাউয়ের খোল (দুব্বা), সবুজ রং করা পাত্র (হানতাম), এবং ছিদ্র করা কাঠের পাত্রে (নাকীর) পান করো না। বরং তোমাদের প্রত্যেকে মুখ ঢাকা চামড়ার মশক বা পাত্রে পান করবে।" আশাজ্জ তাঁকে বললেন: আমার পিতা-মাতা আপনার প্রতি কুরবান হোক, হে আল্লাহর রাসূল, আমাদের জন্য এমন পাত্রে (পান করার) অনুমতি দিন। তিনি তাঁর উভয় হাতের তালু দিয়ে ইঙ্গিত করলেন (ছোট আকারের পাত্র বুঝাতে)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আশাজ্জ, যদি আমি তোমাদেরকে এমন পাত্রে অনুমতি দেই"—এভাবে তিনি তাঁর উভয় হাত দিয়ে ইঙ্গিত করলেন—"তবে তোমরা এর চেয়েও বড় পাত্রে পান করবে"—এবং তিনি তাঁর হাত দুটি প্রসারিত করলেন (অর্থাৎ আরও বড় পাত্র বুঝাতে)—"যার ফলে তোমাদের কেউ তার পানীয় পান করে মাতাল হবে, তারপর সে তার চাচাতো ভাইয়ের দিকে গিয়ে তলোয়ার দিয়ে তার পায়ের গোড়ালি কেটে ফেলবে।" প্রতিনিধি দলে বানু আদাল গোত্রের আল-হারিথ নামক এক ব্যক্তি ছিল, তার পায়ের গোড়ালি তাদের মদের কারণে কেটে ফেলা হয়েছিল একটি কবিতার কারণে যা সে তাদের এক মহিলার সম্পর্কে আবৃত্তি করেছিল। তখন ঐ বাড়ির লোকেরা এসে তলোয়ার দিয়ে তার পায়ের গোড়ালি কেটে দিয়েছিল। আল-হারিথ বললেন: "আমি যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এটি শুনলাম, তখন আমি আমার পোশাক নিচে নামাতে লাগলাম যাতে আমার আঘাতের স্থানটি ঢেকে দিতে পারি, অথচ আল্লাহ তাআলা তা প্রকাশ করে দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (11376)


11376 - عن أبي ذرّ قال: خرجنا من قومنا غفار، وكانوا يحلون الشهر الحرام، فخرجتُ أنا وأخي أُنيس وأُمُّنا -فذكر قصة إسلامه ودخوله مكة- وفيه: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"متي كنت ههنا؟" قال: قلت: قد كنت ههنا منذ ثلاثين بين ليلة ويوم. قال:"فمن كان يطعمك؟" قال: قلت: ما كان لي طعام إِلَّا ماء زمزم، فسمنت حتّى تكسرت عكن بطني، وما أجد على كبدي سخفة جوع، قال:"إنها مباركة، إنها طعام طُعْم". الحديث بطوله.

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصّحابة (2473: 132) عن هداب بن خالد الأزدي، ثنا سليمان بن المغيرة، أنا حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصَّامت قال: قال أبو ذر: خرجنا من قومنا غفار فذكره.

والحديث بطوله مذكور في فضائل الصحابة باب قصة إسلام أبي ذر.




আবূ যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আমাদের কওম গিফার থেকে বের হলাম। তারা হারাম মাসকে হালাল মনে করত। আমি, আমার ভাই উনায়স এবং আমাদের মা— আমরা বের হলাম। এরপর তিনি তাঁর ইসলাম গ্রহণ ও মক্কায় প্রবেশের ঘটনা বর্ণনা করেন। এর মধ্যে আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে বললেন, "তুমি কতদিন ধরে এখানে আছো?" তিনি (আবূ যার্র) বললেন: আমি বললাম: আমি এখানে গত ত্রিশ দিন ও রাত ধরে আছি। তিনি বললেন, "কে তোমাকে খাবার দিত?" তিনি বললেন: আমার জন্য খাবার বলতে শুধু যমযমের পানিই ছিল। এতে আমি এমন মোটা হয়ে গেলাম যে আমার পেটের ভাঁজগুলো ভেঙে যাচ্ছিল, আর আমার কলিজার মধ্যে আমি কোনো ক্ষুধার দুর্বলতা অনুভব করতাম না। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয় এটি (যমযম) বরকতময়। নিশ্চয় এটি (পরিপূর্ণ) খাদ্য।" হাদীসটি পূর্ণাঙ্গ।









আল-জামি` আল-কামিল (11377)


11377 - عن أبي جمرة الضبعي قال: كنتُ أجالس ابن عباس بمكة فأخذتني الحمى فقال: أبردْها عنك بماء زمزم فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الحمى من فيح جهنم فأبردوها بالماء -أو قال: - بماء زمزم".

صحيح: رواه البخاري في بدء الخلق (3261) عن عبد الله بن محمد، حَدَّثَنَا أبو عامر العقدي، حَدَّثَنَا همام (هو ابن يحيى) عن أبي هريرة فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ জামরাহ আদ্ব-দ্বুবাঈ বলেন: আমি মক্কায় ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসতাম। একবার আমি জ্বরে আক্রান্ত হলে তিনি আমাকে বললেন: তুমি যমযমের পানি দ্বারা তোমার জ্বরকে ঠান্ডা করে নাও। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জ্বর হলো জাহান্নামের উত্তাপ (ফায়হ) থেকে। সুতরাং তোমরা তা পানি দ্বারা ঠান্ডা করো - অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন - যমযমের পানি দ্বারা।"









আল-জামি` আল-কামিল (11378)


11378 - عن سعيد بن زيد قال: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"الكمأة من المن وماؤها شفاء للعين"
متفق عليه: رواه البخاري في الطب (5708)، ومسلم في الأشربة (2049: 158) كلاهما عن محمد بن المثنى، حَدَّثَنَا غندر، حَدَّثَنَا شعبة، عن عبد الملك، سمعت عمرو بن حريث، قال: سمعت سعيد بن زيد فذكره.

ورواه أبو عوانة في مسنده (8347، 8349) عن عباس بن محمد الدوريّ، عن يزيد بن هارون، عن شعبة به وزاد فيه:"والعجوة من الجنّة".

وقوله:"الكمأة" وهي تكون في الأرض من غير أن تُزرع.

وقوله:"من المن" شبّه الكمأة بالمن الذي أنزله الله على بني إسرائيل من غير تعب ولا كلفة من زرع وسقي.

وقوله:"ماؤها شفاء للعين" أي يعصر ماؤها ويُقطر في العيون، وقد يخلط به الأدوية الأخرى مثل الإثمد ثمّ يكتحل به، وهذا شيء يُعرف بالتجربة.




সাঈদ ইবনে যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "আল-কামআহ (ট্রাফল) হলো মান্ন থেকে, এবং এর পানি চোখের জন্য আরোগ্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (11379)


11379 - عن أم سلمة أن امرأة توفي زوجُها فاشتكتْ عينُها فذكروها للنبي صلى الله عليه وسلم، وذكروا له الكحل، وأنه يخاف على عينها فقال:"لقد كانت إحداكن تمكث في بيتها في شر أحلاسها - أو في أحلاسها في شر بيتها- فإذا مر كلب رمتْ بعرةً فهلا أربعة أشهر وعشرا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الطب (5706)، ومسلم في الطلاق (1488: 60) كلاهما من طريق شعبة، حَدَّثَنِي حميد بن نافع، سمعت زينب بنت أم سلمة تحدث عن أمها فذكرته.




উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক মহিলার স্বামী মারা গেলে তার চোখে পীড়া দেখা দিল। তখন তারা বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করল এবং সুরমা ব্যবহারের কথা বলল। তারা জানাল যে, সুরমা ব্যবহার না করলে তার চোখের ক্ষতি হওয়ার ভয় আছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ (জাহিলী যুগে স্বামীর মৃত্যুর পর) তার নিকৃষ্টতম পশুর বস্ত্রে তার বাড়িতে অবস্থান করত—অথবা, তার পশুর বস্ত্রে নিকৃষ্টতম ঘরে অবস্থান করত—এরপর যখন কোনো কুকুর পাশ দিয়ে যেত, তখন সে (শোকের সমাপ্তি জানিয়ে) একটি লাদি ছুঁড়ে মারত। (এত কঠিন শোক পালনের পর) অথচ (এখন ইসলামে মাত্র) চার মাস দশ দিন (ইদ্দত পালন করা কেন যথেষ্ট নয়)!'"









আল-জামি` আল-কামিল (11380)


11380 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"البسوا من ثيابكم البيض، فإنها من خير ثيابكم، وكفّنوا فيها موتاكم، وإن خير أكحالكم الإثمد: يجلو البصرَ ويُنبت الشعرَ".

حسن: رواه أبو داود (3878، 4061)، والتِّرمذيّ (994)، وابن ماجه (1472، 3497)، والنسائي (5113)، وأحمد (2219)، وصحّحه ابن حبَّان (5423، 6072)، والحاكم (1/ 354) كلّهم من طرق، عن عبد الله بن عثمان بن خُثيم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره واللّفظ لأبي داود، واختصره البعض.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن عثمان بن خُثيم فإنه حسن الحديث.

قال الترمذيّ:"حسن صحيح".




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের পোশাকের মধ্যে সাদা পোশাক পরিধান করো, কেননা এটি তোমাদের শ্রেষ্ঠ পোশাক। তোমরা এতে তোমাদের মৃতদের কাফন দাও। আর তোমাদের শ্রেষ্ঠ সুরমা হলো ইছমিদ; যা দৃষ্টিকে উজ্জ্বল করে এবং (চোখের) পশম গজাতে সাহায্য করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11381)


11381 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عليكم بالإثمد؛ فإنه يجلو البصر، ويُنبت الشعر".

حسن: رواه ابن ماجه (3495)، والحاكم (4/ 207) كلاهما من حديث أبي عاصم، ثنا عثمان ابن عبد الملك، عن سالم بن عبد الله، عن عبد الله بن عمر فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

قلت: فيه عثمان بن عبد الملك المكي المؤذن مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت بما ينكر عليه، ولحديثه أصل، وهذا منه.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অবশ্যই ইথমিদ (সুরমা) ব্যবহার করবে; কারণ তা দৃষ্টিশক্তি উজ্জ্বল করে এবং (চোখের) পশম গজাতে সাহায্য করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11382)


11382 - عن جابر قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"عليكم بالإثمد عند النوم؛ فإنه يجلو البصر، وينبت الشعر".

حسن: رواه ابن ماجه (3496) عن أبي بكر بن أبي شيبة -وهو في مصنفه (23951) - قال: حَدَّثَنَا عبد الرحيم بن سليمان، عن إسماعيل بن مسلم، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكره.

وفيه إسماعيل بن مسلم وهو المكي ضعيف، ولكن تابعه محمد بن إسحاق عند الترمذيّ في الشمائل (50)، وأبي يعلى (2058) كلاهما من حديث أحمد بن منيع، حَدَّثَنَا محمد بن يزيد الواسطيّ، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن المنكدر، عن جابر فذكر مثله.

ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ولكن لا بأس به في المتابعة وخاصة إذا كان له أصل، وهذا منه، وبه صار الحديث حسنا.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: তোমরা ঘুমের সময় ইথমিদ (সুরমা) ব্যবহার করবে; কারণ এটি দৃষ্টিশক্তিকে তীক্ষ্ণ করে এবং চুল গজাতে সাহায্য করে।









আল-জামি` আল-কামিল (11383)


11383 - عن عليّ بن أبي طالب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"عليكم بالإثمد" فإنه منبتة للشعر، ومذهبة للقذى، مصفاة للبصر".

حسن: رواه البخاريّ في التاريخ الكبير (8/ 412)، والطَّبرانيّ في الكبير (1/ 66 - 67)، وفي الأوسط - مجمع البحرين (4180) كلاهما من طريق يونس بن راشد، ثنا عون بن محمد بن الحنفية، عن أبيه، عن جده عليّ بن أبي طالب فذكره.

وإسناده حسن من أجل عون بن محمد ابن الحنفية روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبَّان في الثّقات، ولحديثه أصول ثابتة، ويونس بن راشد أيضًا حسن الحديث.

وقد حسّنه المنذري في الترغيب والترهيب، والحافظ ابن حجر في فتح الباري.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অবশ্যই ইথমিদ (সুরমা) ব্যবহার করো। কারণ তা চুল গজায়, ময়লা দূর করে এবং দৃষ্টিকে স্বচ্ছ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11384)


11384 - عن عمران بن أبي أنس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يكتحل بالإثمد، ويكتحل اليُمنى ثلاثَ قراود، واليُسْرى قِرْودين.

حسن: رواه ابن أبي شيبة (23953) عن عيسى بن يونس، عن عبد الحميد بن جعفر، عن عمران بن أبي أنس فذكره.

وهذا مرسل، ووصله أبو الشّيخ في أخلاق النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم (ص 147) من وجه آخر عن عبد الحميد ابن جعفر، عن عمران بن أبي أنس، عن أنس فذكر مثله.

إِلَّا أنه جعل في كل عين ثلاثًا، والصواب بما في المصنف، وإسناده حسن من أجل عبد
الحميد بن جعفر الأنصاري تكلم فيه بعض أهل العلم، ولكن وثّقه ابن معين، وقال أبو حاتم: محله الصدق فمثله يُحسن حديثه إذا لم يخالف حكما، ولم يأت بما ينكر عليه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইসমীদ (সুরমা) ব্যবহার করতেন। তিনি ডান চোখে তিনবার শলাকা এবং বাম চোখে দুইবার শলাকা ব্যবহার করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11385)


11385 - عن عقبة بن عامر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الكيّ، وكان يكره شرب الحميم، وكان إذا اكتحل اكتحل وترا، وإذا استجمر استجمر وترا.

حسن: رواه أحمد (17426) عن حسن، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، حَدَّثَنَا الحارث بن يزيد، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عقبة بن عامر فذكره.

ورواه أيضًا من أوجه أخرى عن ابن لهيعة (17427، 17428).

ورواه الطبراني في الكبير (4/ 93) من وجه آخر عن أبي عبد الرحمن المقرئ، عن ابن لهيعة بإسناده مختصرًا.

ورواية المقرئ أعدل من غيره، وهي تُقوّي ما سبق، وظهر منه أن ابن لهيعة لم يخطئ في هذا الحديث، وبه صار الحديث حسنا.

وقوله:"يكتحل وترا" يحمل على معنيين، الأوّل: أن يكتحل لكل عين وترا. والثاني: أن يجمع بمجموع الاكتحال للعينين وتراكما في حديث أنس.




উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগুনে দাগানো (দগ্ধ করে চিকিৎসা করা) থেকে নিষেধ করেছেন। আর তিনি গরম পানি পান করা অপছন্দ করতেন। তিনি যখন সুরমা ব্যবহার করতেন, তখন বেজোড় সংখ্যায় ব্যবহার করতেন এবং যখন ধূপ বা সুগন্ধি কাঠ ব্যবহার করতেন, তখনও বেজোড় সংখ্যায় ব্যবহার করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11386)


11386 - عن عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنها كانت إذا مات الميت من أهلها فاجتمع لذلك النساء ثمّ تفرقن إِلَّا أهلها وخاصتها أمرت بِبُرْمة من تلبينةٍ، فطبخت، ثمّ صُنِعَ ثريدٌ فصبت التلبينة عليها، ثمّ قالت: كلن منها فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"التلبينةُ مجمّةٌ لفؤاد المريض تُذْهب ببعض الحزن".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الطب (5689)، ومسلم في السّلام (2216) كلاهما من طريق عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة فذكرته.

ورواه البخاريّ (5690) من طريق هشام، عن أبيه، عن عائشة أنها كانت تأمر بالتلبينة وتقول: هو البغيض النافع.

قوله:"التلبينة" هي طعام يتخذ من دقيق وربما جعل فيها عسل سميت بذلك لشبهها باللبن في البياض والرقة.

وقوله:"مُجِمَّة" أي مريحة، والجِمام بكسر الجيم: الراحة.

وقد رُوي عنها أيضًا بلفظ: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قيل له: إن فلانًا وجِع لا يطعم الطعام قال:"عليكم بالتلبينة فحسّوه إياها، فوالذي نفسي بيده إنها لتغسل بطن أحدكم كما يغسل أحدُكم وجهَه بالماء من الوسخ".
رواه أحمد: (24500)، وابن ماجه (3446) كلاهما من حديث أيمن بن نابل، عن أم كلثوم ابنة عمرو، عن عائشة فذكرته.

وأم كلثوم ويقال: كلثوم القرشية لا يعرف حالُها كما في"التقريب"، ولم يرو عنها إِلَّا أيمن بن نابل إِلَّا أن النسائيّ زاد في الكبرى (7532) بين نابل وأم كلثوم"فاطمة بنت أبي عقرب" وهي مجهولة أيضًا، وقد وقع اضطراب شديد في إسناد هذا الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত, তাঁর পরিবারের কেউ মারা গেলে, তার জন্য মহিলারা একত্রিত হতো। অতঃপর তারা (মেহমান মহিলারা) চলে গেলেও তাঁর নিজস্ব পরিবারের ও ঘনিষ্ঠ মহিলারা অবশিষ্ট থাকলে, তিনি এক পাতিল তালবীনা (যব বা গমের ছাতুর তৈরি এক ধরনের খাবার) তৈরি করার নির্দেশ দিতেন। অতঃপর তা রান্না করা হতো। এরপর সারীদ (রুটির টুকরোগুলো দিয়ে তৈরি এক ধরনের খাবার) প্রস্তুত করা হতো এবং তার উপর তালবীনা ঢেলে দেওয়া হতো। এরপর তিনি বলতেন: তোমরা এটা থেকে খাও। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তালবীনা অসুস্থ ব্যক্তির অন্তরকে শান্তি দেয় এবং কিছু পরিমাণে দুঃখ দূর করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11387)


11387 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الحمى من فيح جهنّم فأطفئوها بالماء" متفق عليه: رواه مالك في العين (16) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ورواه البخاري في الطب (5723)، ومسلم في السّلام (2209: 79) من طريق مالك به مثله.

وقوله:"فيح" هو: سطوعُ الحر وفورانُه، ويقال: بالواو الفوح يقال: فاحت القِدر تفيح وتفوح إذا غلتْ.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জ্বর হলো জাহান্নামের উত্তাপ থেকে সৃষ্ট। সুতরাং তোমরা তা পানি দ্বারা নিভিয়ে দাও।"