আল-জামি` আল-কামিল
11528 - عن أمّ أيوب، قالت: إنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نزل القرآن على سبعة أحرف، أيها قرأت أجزأك".
حسن: رواه أحمد (27443) عن سفيان، عن عبيد اللَّه، عن أبيه، عن أمّ أيوب فذكرت الحديث.
وإسناده حسن من أجل والد عبيد اللَّه وهو أبو يزيد المكي حليف بني زهرة، يقال: له صحبة، وثقه ابنُ حبان (7/ 657) وقال العجليّ: تابعي ثقة، وقال الترمذي (1810) في حديث رواه غير هذا:"حسن صحيح غريب".
ومن هذا الوجه أخرجه الحميدي (340)، وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (3320)، وذكر ابن كثير في فضائل القرآن (ص 64) هذا الحديث بإسناد أحمد وقال:"إسناده صحيح".
قلت: لعلّه صحّحه لشواهده.
উম্মু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কুরআন সাতটি আহরুফের (ধরনের) উপর নাযিল হয়েছে। সেগুলোর যেটিই তুমি পাঠ করো, তা তোমার জন্য যথেষ্ট হবে।”
11529 - عن حذيفة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لقيتُ جبريل عند أحجار المراءِ، فقلت: يا جبريل، إنّي أرسلتُ إلى أمّة أميّة، الرجل والمرأة والغلام والجارية والشيخ العاسي
الذي لم يقرأ كتابًا قطّ". قال: إنّ القرآن نزل على سبعة أحرف.
حسن: رواه أحمد (23326، 23398) عن عفّان، حدّثنا حماد -يعني ابن سلمة-، عن عاصم، عن زر، عن حذيفة، فذكر الحديث مختصرًا ومطوّلًا.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الطبرانيّ في الكبير (3018).
وأخرجه البزار في مسنده (2908)، والطحاويّ في شرح مشكل الآثار (3098) كلاهما من وجه آخر عن حماد بن سلمة.
وإسناده حسن من أجل عاصم وهو ابن أبي بهدلة، فإنه حسن الحديث، والاختلاف عليه في تسمية الصحابي، فإن كان حفظه فهو عن أبي بن كعب وحذيفة جميعًا، وإلّا فالمشهور أنّه من حديث أبي بن كعب.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি জিবরীলকে আহজারুল মিরার নামক স্থানে পেলাম। অতঃপর আমি বললাম, হে জিবরীল! আমাকে এমন একটি নিরক্ষর জাতির নিকট পাঠানো হয়েছে, যাদের মধ্যে রয়েছে পুরুষ, নারী, বালক, বালিকা এবং বৃদ্ধ ও কঠোর ব্যক্তি, যারা কখনো কোনো কিতাব পড়েনি।" তিনি (জিবরীল) বললেন: "নিশ্চয় কুরআন সাতটি 'আহরাফ' (পদ্ধতি)-এ অবতীর্ণ হয়েছে।"
11530 - عن أبي قيس مولى عمرو بن العاص، قال: سمع عمرو بن العاص رجلًا يقرأ آيةً من القرآن، فقال: منْ أقرأكها؟ قال: رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: فقد أقرأنيها رسول اللَّه على غير هذا! فذهبا إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال أحدهما: يا رسول اللَّه، آيةُ كذا وكذا ثم قرأها، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هكذا أُنزلتْ". فقال الآخر: يا رسول اللَّه، فقرأها على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وقال: أليس هكذا يا رسول اللَّه؟ قال:"هكذا أُنزلتْ". فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ هذا القرآن أُنزل على سبعة أحرف، فأيّ ذلك قرأتم فقد أصبتم، ولا تُماروا فيه، فإنّ المراء فيه كفرٌ". أو"آية الكفر".
صحيح: رواه أحمد (17821) عن أبي سلمة الخزاعي، قال: أخبرنا عبد اللَّه بن جعفر بن عبد الرحمن بن المسور بن مخرمة، قال: أخبرني يزيد بن أسامة بن الهاد، عن بسر بن سعيد، عن أبي قيس -مولى عمرو بن العاص-، فذكره.
وإسناده صحيح. وهو حديث موصول، وإن كانت صورته صورة المرسل، فقد رواه أحمد (17819) من وجه آخر عن يزيد بن عبد اللَّه بن أسامة بن الهاد، عن بُسْر بن سعيد، عن أبي قيس -مولى عمرو بن العاص-، عن عمرو بن العاص، فذكر نحوه.
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একজন ব্যক্তিকে কুরআনের একটি আয়াত পড়তে শুনলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "কে তোমাকে এটি পড়িয়েছেন?" লোকটি বলল, "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম।" তিনি বললেন, "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তো আমাকে এর থেকে ভিন্নভাবে পড়িয়েছেন!" তখন তারা দু'জন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে গেলেন। তাদের একজন বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! অমুক অমুক আয়াত," এরপর তিনি তা পড়লেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "এভাবেই এটি নাযিল হয়েছে।" এরপর অন্যজন বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ!" অতঃপর তিনিও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সামনে তা পড়লেন এবং বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এটি কি এভাবেই নয়?" তিনি বললেন, "এভাবেই এটি নাযিল হয়েছে।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "নিশ্চয় এই কুরআন সাতটি 'হারফ' (ধরণ)-এ নাযিল হয়েছে। এর মধ্যে যেভাবেই তোমরা পড়ো না কেন, তোমরা সঠিক পড়েছ। আর তোমরা এ নিয়ে ঝগড়া করো না। কেননা, এ নিয়ে ঝগড়া করা কুফরি।" অথবা তিনি বলেছেন: "কুফরির নিদর্শন।"
11531 - عن سمرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نَزَلَ القرآنُ على سبعة أحرف".
صحيح: رواه أحمد (20179) عن بهز، حدّثنا حماد بن سلمة، أخبرنا قتادة، عن الحسن، عن سمرة، فذكره. وإسناده صحيح.
والحسن هو الامام البصريّ مدلِّس وقد عنعن، واختلف أهل العلم في سماعه من سمرة، والذي ترجّح عندي أنّه سمع منه مطلقًا كما قال البخاري وغيره.
ولكن رواه أحمد (20262) عن عفان، حدّثنا حماد، أخبرنا قتادة، عن الحسن، عن سمرة،
أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نزل القرآن على ثلاثة أحرف".
ومن هذا الطّريق رواه البزّار -كشف الأستار (2314) -، والطّحاويّ في مشكل الآثار (3119)، والطبراني في الكبير (6853)، والحاكم (2/ 223).
قال الحاكم:"وقد احتجّ البخاريّ برواية الحسن عن سمرة، واحتجّ مسلمٌ بأحاديث حماد بن سلمة، وهذا حديث صحيح وليس له علّة".
والرّوايات الصّحيحة المتواترة أن القرآن نزل على سبعة أحرف، فرأي الطّحاوي في مشكله أنّ سمرة لعلّه سمع عند ما كان القرآن يقرأ على ثلاثة أحرف لا أكثر منها ثم مضى، ثم جاء الخبر عن النبي صلى الله عليه وسلم أنّ القرآن يقرأ على أكثر من ذلك إلى تتمة سبعة أحرف، فلم يسمع ذلك سمرة، فروى ما سمع.
قلت: بل سمع أيضًا سبعة أحرف كما مضى، ولعلّ هذا الاختلاف يعود إلى بعض الرواة فأخطأوا عليه، ولا يبعد أن يكون هذا الخطأ من حماد بن سلمة، فإنه روى الحديث من ثلاثة أوجه، الوجه الأول هو الصحيح، والوجه الثاني فيه شذوذ، وكذلك الوجه الثالث وهو قوله: عرض القرآن على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ثلاث عرضات. رواه البزار (4564) عن محمد بن المثنى، ثنا حجاج بن منهال، ثنا حماد بن سلمة فذكره.
সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'কুরআন সাতটি হরফে (পদ্ধতিতে/আকারে) নাযিল হয়েছে।'
11532 - عن أبي هريرة قال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نزل القرآن على سبعة أحرف، المراء في القرآن كفر -ثلاث مرات- فما عرفتهم منه فاعملوا، وما جهلتم منه فردُّوه إلى عالمه".
صحيح: رواه أحمد (7989) عن أنس بن عياض، حدثني أبو حازم، عن أبي سلمة، قال: لا أعلمه إلا عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه النسائي في فضائل القرآن (118) وابن حبان في صحيحه (74) من هذا الوجه بدون شك.
ورواه أحمد (8390) من وجه آخر عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه عز وجل أنزل القرآن على سبعة أحرف: عليما حكيما، غفورا رحيما".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরআন সাতটি 'হরফে' (পঠন পদ্ধতি/রূপে) অবতীর্ণ হয়েছে। কুরআন নিয়ে বিতর্ক করা কুফরী—তিনি (এ কথাটি) তিনবার বললেন। সুতরাং তোমরা এর থেকে যা জানতে পারো, তা অনুযায়ী আমল করো। আর যা তোমরা না জানো, তা এর জ্ঞানীর কাছে ফিরিয়ে দাও।"
11533 - عن أبي هريرة قال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن هذا القرآن أنزل على سبعة أحرف، فاقرؤوا ولا حرج، ولكن لا تختموا ذكر رحمة بعذاب، ولا ذكر عذاب برحمة".
حسن: رواه ابن جرير في تفسيره (1/ 40) عن عمرو بن عثمان العثماني، قال: حدّثنا ابن أبي أويس، قال: حدّثنا أخي، عن سليمان بن بلال، عن محمد بن عجلان، عن المقبري، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن أبي أويس ومحمد بن عجلان فهما حسنا الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এই কুরআন সাতটি 'আহরাফ'-এর (আক্ষরিক কাঠামোর) উপর নাযিল করা হয়েছে। অতএব, তোমরা তা পাঠ করো, এতে কোনো অসুবিধা নেই। তবে তোমরা রহমতের উল্লেখকে আযাবের উল্লেখ দ্বারা শেষ করবে না এবং আযাবের উল্লেখকে রহমতের উল্লেখ দ্বারা (শেষ করবে না)।
11534 - عن أبي طلحة قال: قرأ رجل عند عمر، فغيَّرَ عليه، فقال: قرأت على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فلم يُغَيِّرْ عليَّ، قال: فاجتمعا عند النبي صلى الله عليه وسلم، قال: فقرأ الرجل على النبي صلى الله عليه وسلم،
فقال له:"قد أحسنت" قال: فكأن عمر وجد من ذلك، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا عمر، إن القرآن كله صواب ما لم يجعل عذابٌ مغفرةً أو مغفرةٌ عذابًا".
حسن: رواه أحمد (16366) عن عبد الصمد، حدّثنا حرب بن ثابت، -كان يسكن بني سُليم- قال: حدّثنا إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أبيه، عن جده، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل حرب بن ثابت، وهو أبو ثابت المنقري، ويقال: ابن أبي حرب، فإنه يُحَسَّن حديثه، وقد حَسَّنَه ابن كثير، وذكر الهيثمي في المجمع (7/ 51) وقال:"رواه أحمد ورجاله ثقات".
আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে কুরআন তিলাওয়াত করল। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তার তিলাওয়াত পরিবর্তন করে দিলেন (বা ভুল ধরলেন)। লোকটি বলল: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তিলাওয়াত করেছি, কিন্তু তিনি আমার কোনো পরিবর্তন করেননি (বা ভুল ধরেননি)। তিনি বলেন: অতঃপর তারা দু'জন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একত্রিত হলেন। তখন লোকটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে তিলাওয়াত করল। তিনি তাকে বললেন: "তুমি অবশ্যই উত্তম করেছ।" তিনি বলেন: এতে মনে হলো উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছুটা অস্বস্তি বোধ করলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উমার, কুরআন সম্পূর্ণটাই সঠিক, যতক্ষণ না আযাবকে ক্ষমা আর ক্ষমা আযাবে রূপান্তরিত করা হয় (অর্থাৎ মূল অর্থ পরিবর্তিত হয়)।"
11535 - عن معاذ بن جبل قال:"أُنزل القرآن من سبعة أبواب على سبعة أحرف كلها شاف كاف".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (20/ 150) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، حدثني محمد بن عبد الرحيم أبو يحيى، ثنا علي بن ثابت الدهان، عن أسباط بن نصر، عن السدي (هو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة)، عن عبد خير، عن معاذ بن جبل، فذكره.
وإسناده حسن من أجل علي بن ثابت وإسماعيل بن عبد الرحمن السدي، فإنهما حسنا الحديث. وأما أسباط بن نصر فإنه يُحَسَّن حديثه إذا كان له أصل.
وقوله في الحديث:"من سبعة أبواب" لم يرد في أحاديث صحيحة فهو شاذ.
মু'আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, "কুরআন সাতটি দরজা (বা ক্ষেত্র) থেকে সাতটি হরফে (পঠন পদ্ধতিতে) অবতীর্ণ হয়েছে, আর তার সব ক'টিই নিরাময়কারী ও যথেষ্ট (পরিপূর্ণ)।"
11536 - عن عبادة بن الصامت أن أبي بن كعب، قال: أقرأني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم آية، وأقرأها آخر غير قراءة أبي، فقلت: من أقرأكها؟ قال: أقرأنيها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قلت: واللَّه لقد أقرأنيها كذا وكذا، قال أبي: فما تخلج في نفسي من الإسلام ما تخلج يومئذ، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، قلت: يا رسول اللَّه، ألم تقرئني آية كذا وكذا؟ قال:"بلى". قال: فإن هذا يدعي أنك أقرأته كذا وكذا، فضرب بيده في صدري، فذهب ذاك، فما وجدت منه شيئًا بعد، ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتاني جبريل وميكائيل، فقال جبريل: اقرإ القرآن على حرف، فقال ميكائيل: استزده، قال: اقرأه على حرفين، قال: استزده، حتى بلغ سبعة أحرف، قال: كل شاف كاف".
صحيح: رواه أحمد (21092) عن عفان، قال: حدّثنا حماد بن سلمة، قال: أخبرنا حُميد، عن أنس بن مالك، عن عبادة بن الصامت فذكره.
ورواه النسائي (942) مختصرا ولم يذكر"عبادة بن الصامت" بين أنس وأُبي بن كعب.
قال ابن عبد البر في التمهيد (8/ 283): وزاد بعضهم في هذا الحديث: ما لم تختم عذابا برحمة، أو رحمة بعذاب.
وقال: أما قوله في هذا الحديث: سميعا عليما، وغفورا رحيما، وعليما حكيما، ونحو ذلك إنما أراد به ضرب المثل للحروف التي نزل القرآن عليها، وأنها معان متفق مفهومُها، مختلف مسموعُها، لا يكون في شيء منها معنى وضدّه، ولا وجه يخالف وجها خلافا ينفيه، أو يضادّه، كالرحمة التي هي خلاف العذاب، وضِدُّه وما أشبه ذلك.
وقال: وهذا كله يعضد قول من قال: إن معنى السبعة الأحرف المذكورة في الحديث سبعة أوجه من الكلام المتفق معناه، المختلف لفظه نحو: هَلُمَّ، وتعال، وعجِّلْ، واسْرعْ، وانظرْ وأخّر ونحو ذلك. انتهى كلامه.
يعني أنهم ما كانوا يغيّرون سميعا عليما إلى غفورا رحيما، بل هكذا نزل في القرآن في اللهجات المختلفة.
ومعنى نزول القرآن على سبعة أحرف: يعني سبعة أوجه من المعاني المتفقة المتقاربة بألفاظ مختلفة، نحو أقبل، وتعال، وهلُمّ، وإلى هذا ذهب كثير من أهل العلم.
ويؤيد هذا المعنى ما رُويَ في حديث أبي بكرة أن جبريل عليه السلام قال: يا محمد، اقرإ القرآن على حرف، قال ميكائيل عليه السلام: استزده، فاستزاده قال: فاقرأ على حرفين. قال ميكائيل: استزده فاستزاده حتى بلغ سبعة أحرف. قال: كلٌّ شاف كاف ما لم تختم آية عذاب برحمة، أو آية رحمة بعذاب نحو قولك: تعال وأقبل، وهَلُمَّ، واذهبْ واسرعْ وأعجلْ.
رواه أحمد (20514)، والطبري في مقدمة تفسيره (1/ 38) كلاهما من حديث حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة فذكره.
وفي إسناده علي بن زيد -هو ابن جدعان- ضعيف، إلا أنه ما يشهد غير المثال، فلعله مدرج من بعض الرواة، وروي مثله عن بعض الصحابة أيضًا.
ورُويَ عن عمر بن الخطاب أنه قال: نزل القرآن بلغة مضر، وكانت لغة مضر هذه سبع لهجات حسب القبائل السبعة وهم: هذيل، وكنانة، وقيس، وضبة، وتيم الرباب، وأسد بن خزيمة، وقريش.
ورُويَ عن ابن عباس أنه قال: نزل القرآن على سبع لغات منها خمس بلغة العجز من الهوازن، وإثنان لسائر العرب، والعجز هم: سعد بن بكر، وجشم بن بكر، ونصر بن معاوية، وثقيف، وكان يقال لهم: عليا هوازن.
ولا يلزم من هذا أن جميع القرآن نزل على سبعة أحرف -أي أوجه-، فالصحيح أن بعضه على سبعة، وبعضه على ستة، وبعضه على خمسة هكذا، وأكثرها على واحد، إذ اختلاف هذه الأحرف هو من باب التنوع، وليس من باب التناقض أو التضاد. وأما إملاء النبي صلى الله عليه وسلم القرآن على كتاب الوحي فكان كما نزل، فكان جمع القرآن في عهد أبي بكر بما في هذه المكتوبات مع ما كان عندهم في الصدور، فلا يجوز لأحد أن يغيّر شيئًا من القرآن لا قراءةً ولا كتابةً.
وأما ما روي:"لكل آية ظهر وبطن" فهو معلول وهو ما رُويَ عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أنزل القرآن على سبعة أحرف، لكل آية منها ظهر وبطن".
رواه البزار (2081) والطحاوي في شرح مشكل الآثار (3077) وابن حبان (75) والطبراني في الكبير (10/ 125) كلهم من طريق سليمان بن بلال، عن محمد بن عجلان، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه، فذكره.
وأبو إسحاق هو إبراهيم بن مسلم الهجري ضعيف باتفاق أهل العلم، وقد تفرد به، كما قال البزار عقب إخراج الحديث:"هذا الحديث لا نعلمه يُروى إلا من حديث الهجري، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه، ولا نعلم أن ابن عجلان روى عن الهجري غير هذا الحديث. . ." اهـ.
ورواه ابن أبي شيبة في مصنفه (30746) وابن جرير في تفسيره (1/ 22) كلاهما من طرق عن إبراهيم الهجري، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه بن مسعود به، والهجري كنيته أبو إسحاق.
إلا أن ابن حبان قال في إسناده:"عن أبي إسحاق الهمداني"
يعني عمرو بن عبد اللَّه السبيعي الثقة، وهو وهمٌ.
ورواه أبو يعلى (5149)، والطحاوي في شرح المشكل (3095)، والطبراني في الكبير (10/ 130) كلهم من طريق جرير بن عبد الحميد الضبي، عن مغيرة، عن واصل بن حيان، عن عبد اللَّه ابن أبي الهذيل، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لو كنت متخذا من أهل الأرض خليلا لاتخذت أبا بكر بن أبي قحافة خليلا، ولكن صاحبكم خليل اللَّه، وإن القرآن نزل على سبعة أحرف، لكل آية منها ظهر وبطن، ولكل حدٍّ مطلع".
فزادوا في آخر الحديث نزول القرآن على سبعة أحرف مع حديث اتخاذ الخليل، إلا أن الطحاوي لم يذكر حديث اتخاذ الخليل.
ورواه مسلم في كتاب فضائل الصحابة (2383: 6) من طرق عن جرير بن عبد الحميد، عن مغيرة، بهذا الإسناد، فاقتصر على ذكر اتخاذ الخليل، ولم يذكر نزول القرآن على سبعة أحرف.
فلعل أحد الرواة أخطأ في سياق الحديث، فجعل الحديثين بإسناد واحد، لأن قصة نزول القرآن على سبعة أحرف مروي من طريق إبراهيم الهجري، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه بن مسعود، كما تقدم، والهجري ضعيف عند أهل العلم.
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে একটি আয়াত যেভাবে পাঠ করালেন, আরেকজন তা উবাইয়ের পাঠের ভিন্নভাবে পাঠ করলো। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: কে তোমাকে এটা পাঠ করিয়েছে? সে বললো: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ই আমাকে তা পাঠ করিয়েছেন। আমি বললাম: আল্লাহর কসম! তিনি তো আমাকে অমুক অমুকভাবে পাঠ করিয়েছেন। উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেদিন আমার মনে ইসলামের ব্যাপারে যে সংশয় সৃষ্টি হয়েছিল, এমন সংশয় আর কখনো হয়নি। এরপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি আমাকে অমুক অমুক আয়াত পাঠ করাননি? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম: কিন্তু এই ব্যক্তি দাবি করে যে আপনি তাকে অন্যভাবে পাঠ করিয়েছেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার বুকে হাত দিয়ে আঘাত করলেন (বা স্পর্শ করলেন)। ফলে সেই সংশয় দূর হয়ে গেল, এরপর আর আমি সেটির কোনো প্রভাব অনুভব করিনি। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে জিবরীল ও মীকাঈল এসেছিলেন। জিবরীল বললেন: আপনি কুরআনকে এক হরফে (একভাবে) পড়ুন। মীকাঈল বললেন: আরও বাড়িয়ে চাইতে বলুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: দুই হরফে পড়ুন। মীকাঈল বললেন: আরও বাড়িয়ে চাইতে বলুন। এভাবে সাত হরফ (সাতটি পাঠের ধরন) পর্যন্ত পৌঁছালো। তিনি বললেন: প্রত্যেকটিই যথেষ্ট এবং পরিপূর্ণ।"
11537 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: سمع النبي صلى الله عليه وسلم قوما يتدارؤون فقال:"إنما هلك من كان قبلكم بهذا، ضربوا كتاب اللَّه بعضه ببعض، وإنما نزل كتاب اللَّه يصدِّق بعضه بعضا، فلا تكذّبوا بعضه ببعض، فما علمتم منه فقولوا، وما
جهلتم فكِلوه على عالمه".
حسن: رواه عبد الرزاق (20367)، وأحمد (6741)، والبخاري في خلق أفعال العباد (218)، والبغوي في شرح السنة (121) كلهم من طريق معمر، عن الزهري، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদল লোককে পরস্পর তর্ক-বিতর্ক করতে শুনলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমাদের পূর্ববর্তীরা কেবল এরই কারণে ধ্বংস হয়েছে। তারা আল্লাহর কিতাবের কিছু অংশ দিয়ে অন্য অংশকে সাংঘর্ষিক মনে করত। অথচ আল্লাহর কিতাব নাযিল হয়েছে এমনভাবে যে, তার এক অংশ অন্য অংশকে সত্যায়ন করে। অতএব, তোমরা তার এক অংশ দ্বারা অন্য অংশকে মিথ্যারোপ করো না। বরং এর যে অংশ তোমরা জানো, তা তোমরা বলো। আর যে অংশ তোমরা জানো না, তার জ্ঞান যিনি জানেন তাঁর ওপর ছেড়ে দাও।"
11538 - عن البراء بن عازب يقول في هذه الآية:"لا يستوي القاعدون من المؤمنين والمجاهدون في سبيل اللَّه" فأمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم زيدا، فجاء بكتفٍ يكتبها، فشكا ابنُ أم مكتوم ضرارتَه فنزلتْ: {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ} [النساء: 95]
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2831)، ومسلم في الإمارة (1898: 141) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي إسحاق قال: سمعت البراء يقول: فذكره. واللفظ لمسلم.
ورواه البخاريّ في فضائل القرآن (4990) عن عبيد اللَّه بن موسى، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن البراء قال: لما نزلت"لا يستوي القاعدون من المؤمنين والمجاهدون في سبيل اللَّه" قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ادع لي زيدا، ولْيَجئْ باللوح والدواة والكتف، أو الكتف والدواة" ثم قال:"اكتبْ: لا يستوي القاعدون"، وخلف ظهر النبي صلى الله عليه وسلم عمرو بن أم مكتوم الأعمى، قال: يا رسول اللَّه فما تأمرني؟ فإني رجل ضرير البصر، فنزلتْ مكانها: لا يستوي القاعدون من المؤمنين، والمجاهدون في سبيل اللَّه غير أولي الضرر.
إلا أنه وقع فيه تقديم وتأخير، فقوله:"غير أولي الضرر" متعلق بقوله:"لا يستوي القاعدون من المؤمنين" لأن الآية هكذا {لَا يَسْتَوِي الْقَاعِدُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ غَيْرُ أُولِي الضَّرَرِ وَالْمُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ}. وقوله:"الكتف" هو العظم.
আল-বারাআ ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি এই আয়াত সম্পর্কে বলেন: "মুমিনদের মধ্যে যারা (জিহাদ থেকে) বসে থাকে এবং যারা আল্লাহর পথে জিহাদ করে, তারা সমান নয়।" (সূরা আন-নিসা: ৯৫)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দকে (লিখার জন্য) আদেশ দিলেন। তিনি তা লেখার জন্য একটি কাঁধের হাড় নিয়ে আসলেন। তখন ইবনু উম্মে মাকতুম তাঁর শারীরিক অক্ষমতা (অন্ধত্ব) সম্পর্কে অভিযোগ করলেন। ফলে এই আয়াত নাযিল হলো: "মুমিনদের মধ্যে যারা অক্ষমতাগ্রস্ত নয় অথচ (জিহাদ থেকে) বসে থাকে, তারা (মুজাহিদদের) সমান নয়।" (সূরা আন-নিসা: ৯৫)।
11539 - عن أنس قال: جمع القرآن على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أربعة، كلهم من الأنصار:
أبي بن كعب، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، ورجل من الأنصار يُكَنَّى أبا زيد.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5003) ومسلم في فضائل الصحابة (2465: 120) كلاهما من طريق عمرو بن عاصم، حدّثنا همام، حدّثنا قتادة، قال: سألت أنس بن مالك: من جمع القرآنَ؟ فذكره.
قوله:"جمع القرآن" يعني كتب.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে চারজন ব্যক্তি কুরআন সংগ্রহ (সংকলন) করেছিলেন, তাঁরা সকলেই ছিলেন আনসারী: উবাই ইবনু কা'ব, মু'আয ইবনু জাবাল, যায়দ ইবনু সাবিত এবং আবু যায়েদ কুনিয়তধারী একজন আনসারী পুরুষ।
11540 - عن أنس بن مالك قال: مات النبي صلى الله عليه وسلم ولم يجمع القرآن غيرُ أربعة: أبو الدرداء، ومعاذ بن جبل، وزيد بن ثابت، وأبو زيد، قال: ونحن ورثناه.
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5004) عن معلى بن أسد، حدّثنا عبد اللَّه بن المثنى، قال: حدثني ثابت البناني وثمامة، عن أنس، فذكره.
قول أنس:"لم يجمع القرآن غير أربعة" ثم زاد فيه أبا الدرداء فصاروا خمسا، وهو يقصد به أنه لم يجمع القرآن كاملا، أو أكثر القرآن غير هؤلاء، وإلا فعدد الذين كتبوا القرآن في أجزاء متفرقة كثيرون، ثم تفرّق هؤلاء في البلاد الإسلامية، فلا يمكن حصر الكُتّاب على الخمسة.
ذكر ابن حزم في جوامع السيرة (ص 26 - 27) من كُتّاب النبي صلى الله عليه وسلم علي بن أبي طالب، وعثمان، وعمر، وأبو بكر، وخالد بن سعيد بن العاص، وأُبيّ بن كعب الأنصاري، وحنظلة بن الربيع الأسيدي، ويزيد بن أبي سفيان، وزيد بن ثابت الأنصاري من بني النجّار، ومعاوية بن أبي سفيان، وكان زيد بن ثابت من ألزم الناس لذلك، ثم تلاه معاوية بعد الفتح فكانا ملازمَين للكتابة بين يديه صلى الله عليه وسلم في الوحي وغير ذلك، لا عمل لهما غير ذلك. انتهى.
وذكر بعض أهل السير والتاريخ أن كتّاب الوحي بلغ عددُهم أربعين كاتبا.
ولم يمت النبي صلى الله عليه وسلم إلا وكان القرآن كلّه مكتوبا في الصحف والألواح والعسب (جريدة النخل) في بيت النبوة، لكن غير مجموع في صحيفة واحدة؛ لأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يمكث بعد رجوعه من حجة الوداع إلا أشهرا، فلم يتمكّن من جمعه في مصحف واحد، فجمعه أبو بكر في مصحف واحد كما سيأتي.
قال الخطابي وغيره: يحتمل أن يكون النبي صلى الله عليه وسلم إنما لم يجمع القرآن في المصحف لما كان يترقبه من ورود ناسخ لبعض أحكامه أو تلاوته، فلما انقضى نزوله بوفاته ألهم اللَّه الخلفاء الراشدين ذلك وفاء لوعده الصادق بضمان حفظه. فتح الباري (9/
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যখন ইন্তিকাল হয়, তখন চারজন ব্যতীত আর কেউ কুরআন সম্পূর্ণরূপে সংগ্রহ (মুখস্থ ও লিপিবদ্ধ) করেনি। তাঁরা হলেন: আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যায়দ ইবনু ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ যায়দ। তিনি (আনাস অথবা রাবী) বলেন: আমরাই তার (আবূ যায়দের) উত্তরাধিকারী হয়েছি।
11541 - عن ابن عباس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم لا يعرف فصْل السورة حتى تنزل عليه {بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ}
وفي رواية: فإذا نزلتْ عَرَف أن السورة قد خُتِمتْ، واستُقْبِلَتْ -أو ابتُدِئَتْ- سورة أخرى.
صحيح: رواه أبو داود (788)، والحاكم (1/ 231)، والبيهقي (2/ 42) كلهم من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره. وإسناده صحيح.
والرواية الثانية عند البزار -كشف الأستار- (2187) بهذا الإسناد.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূরার সমাপ্তি বুঝতে পারতেন না, যতক্ষণ না তাঁর উপর {بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ} অবতীর্ণ হতো।
অন্য বর্ণনায় আছে: যখন এটি অবতীর্ণ হতো, তখন তিনি বুঝতে পারতেন যে সূরাটি শেষ হয়েছে এবং আরেকটি নতুন সূরা শুরু হয়েছে (বা শুরু করা হচ্ছে)।
11542 - عن عبد اللَّه بن عمرو قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"استقرؤوا القرآن من أربعة: من عبد اللَّه بن مسعود، وسالم مولى أبي حذيفة، وأُبي بن كعب، ومعاذ بن جبل".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم (3758) ومسلم في فضائل الصحابة (2464: 118) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن إبراهيم، عن مسروق، قال: ذكروا عبد اللَّه بن مسعود عند عبد اللَّه بن عمرو فقال: ذاك رجل لا أزال أحبه بعد ما سمعت من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
ورواه البخاريّ في فضائل القرآن (4999) عن عبد اللَّه بن عمرو، وفيه:"خذوا القرآن من أربعة. . ." الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "তোমরা চারজন ব্যক্তির নিকট থেকে কুরআন শিক্ষা করো: আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ, আবূ হুযাইফার আযাদকৃত গোলাম সালিম, উবাই ইবনে কা'ব এবং মু'আয ইবনে জাবাল।"
11543 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: كنت بحمص، فقال لي بعض القوم: اقرأ علينا، فقرأت عليهم سورة يوسف، قال: فقال رجل من القوم: واللَّه ما هكذا أنزلت، قال: قلت: ويحك واللَّهِ لقد قرأتها على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال لي:"أحسنت". فبينما أنا أكلمه إذ وجدتُ منه ريح الخمر، قال: فقلتُ: أَتشربُ الخمر وتُكذِّب بالكتاب، لا تبرح حتى أجلدك، قال: فجلدتُه الحد.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5001) ومسلم في صلاة المسافرين (801: 249) كلاهما من طريق الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হিমসে ছিলাম। তখন সেখানকার কিছু লোক আমাকে বলল: আমাদের কাছে (কুরআন) পড়ুন। তখন আমি তাদের কাছে সূরা ইউসুফ পড়লাম। রাবী বলেন, তখন তাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বলল: আল্লাহর কসম, এভাবে নাযিল করা হয়নি। আমি বললাম: তোমার সর্বনাশ হোক! আল্লাহর কসম! আমি তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে এটা পড়েছি এবং তিনি আমাকে বলেছিলেন: "তুমি উত্তম করেছ।" আমি যখন তার সাথে কথা বলছিলাম, তখন তার কাছ থেকে মদের গন্ধ পেলাম। রাবী বলেন, আমি বললাম: তুমি কি মদ পান করো এবং (অথচ) আল্লাহর কিতাবকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করো? তুমি এখান থেকে নড়বে না, যতক্ষণ না আমি তোমাকে বেত্রাঘাত করি। রাবী বলেন, অতঃপর আমি তাকে হদ্দের শাস্তি দিলাম (বেত্রাঘাত করলাম)।
11544 - عن ابن عباس قال: قال عمر: أُبَيٌّ أقرؤنا، وإنا لندع من لحن أُبَيّ، وأُبَيٌّ يقول: أخذته من في رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فلا أتركه لشيء، قال اللَّه تعالى: {مَا نَنْسَخْ مِنْ آيَةٍ أَوْ نُنْسِهَا نَأْتِ بِخَيْرٍ مِنْهَا أَوْ مِثْلِهَا أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ} [البقرة: 106].
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5005) عن صدقة بن الفضل، أخبرنا يحيى، عن سفيان، عن حبيب بن أبي ثابت، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: উবাই (ইবনে কা'ব) আমাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ক্বারী। কিন্তু আমরা উবাইয়ের পাঠের কিছু (বৈশিষ্ট্য/পাঠভঙ্গি) ছেড়ে দেই। আর উবাই বলেন, আমি এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুখ থেকে গ্রহণ করেছি, তাই আমি কোনো কিছুর জন্য তা ছাড়ব না। আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "আমি কোনো আয়াত রহিত করলে কিংবা ভুলিয়ে দিলে তদপেক্ষা উত্তম অথবা তার সমতুল্য কোনো আয়াত নিয়ে আসি। তুমি কি জান না যে, আল্লাহ সর্ববিষয়ে সর্বশক্তিমান?" [সূরা আল-বাক্বারাহ: ১০৬]
11545 - عن عبد العزيز بن رفيع قال: دخلتُ أنا وشداد بن معقل على ابن عباس، فقال
له شداد بن معقل: أتركَ النبي صلى الله عليه وسلم من شيء؟ قال: ما ترك إلا ما بين الدفتين. قال: ودخلنا على محمد بن الحنفية فسألناه فقال: ما ترك إلا ما بين الدفتين.
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5019) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا سفيان، عن عبد العزيز بن رُفيع، فذكره.
يعني أن القرآن الموجود الآن هو الذي تركه النبي صلى الله عليه وسلم مكتوبا في الألواح وغيرها، ومن زعم أن هناك قرآنا آخر لم يضمه المصحف الموجود فقد افترى على اللَّه تعالى إذ يقول سبحانه وتعالى: {إِنَّ عَلَيْنَا جَمْعَهُ وَقُرْآنَهُ} [القيامة: 17] وقال تعالى: {إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ} [الحجر: 9].
আব্দুল আযীয ইবনে রুফাই থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি ও শাদ্দাদ ইবনে মা‘কিল ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। তখন শাদ্দাদ ইবনে মা‘কিল তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কি (আমাদের জন্য অন্য) কিছু রেখে গেছেন? তিনি বললেন: তিনি দুই মলাটের মধ্যে যা আছে তা ছাড়া আর কিছুই রেখে যাননি। তিনি (আব্দুল আযীয ইবনে রুফাই) বলেন, অতঃপর আমরা মুহাম্মাদ ইবনুল হানাফিয়াহর নিকট প্রবেশ করলাম এবং তাকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: তিনি দুই মলাটের মধ্যে যা আছে তা ছাড়া আর কিছুই রেখে যাননি।
11546 - عن ابن عباس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم أجود الناس بالخير، وأجود ما يكون في شهر رمضان، لأن جبريل كان يلقاه في كل ليلة في شهر رمضان حتى ينسلخ، يعرض عليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم القرآن، فإذا لقيه جبريل كان أجود بالخير من الريح المرسلة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4997) ومسلم في الفضائل (2308: 50) كلاهما من طريق إبراهيم بن سعد، عن الزهري، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة بن مسعود، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কল্যাণের (দানের) ক্ষেত্রে ছিলেন মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি দানশীল। আর রমযান মাসে তিনি সবচেয়ে বেশি দানশীল হতেন। কারণ জিবরীল (আঃ) রমযান মাস শেষ না হওয়া পর্যন্ত প্রতি রাতে তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (জিবরীলকে) কুরআন শোনাতেন (দাওর করতেন)। যখন জিবরীল তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতেন, তখন তিনি দ্রুত প্রেরিত বাতাসের (বৃষ্টিবাহী বাতাসের) চেয়েও অধিক দানশীল হয়ে যেতেন।
11547 - عن أبي هريرة قال: كان يعرض على النبي صلى الله عليه وسلم القرآن كل عام مرة، فعرض عليه مرتين في العام الذي قُبِض، وكان يعتكف كل عام عشرا، فاعتكف عشرين في العام الذي قُبِض.
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4998) عن خالد بن يزيد، حدّثنا أبو بكر، عن أبي حصين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট প্রতি বছর একবার কুরআন পেশ করা হতো। কিন্তু যে বছর তিনি ইন্তেকাল করেন, সে বছর তাঁর নিকট দু’বার পেশ করা হয়েছিল। আর তিনি প্রতি বছর (রমযানের শেষ) দশ দিন ইতিকাফ করতেন, কিন্তু যে বছর তিনি ইন্তেকাল করেন, সে বছর তিনি বিশ দিন ইতিকাফ করেছিলেন।