আল-জামি` আল-কামিল
11608 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من نفَّسَ عن مؤمن كربة من كرب الدنيا نفَّسَ اللَّه عنه كربة من كرب يوم القيامة، ومن يسَّر على معسر يسَّر اللَّه عليه في الدنيا والآخرة، ومن ستر مسلما ستره اللَّه في الدنيا والآخرة، واللَّه في عون العبد ما كان العبد في عون أخيه، ومن سلك طريقا يلتمس فيه علما سهَّل اللَّه له به طريقا إلى الجنة، وما اجتمع قوم في بيت من بيوت اللَّه، يتلون كتاب اللَّه، ويتدارسونه بينهم، إلا نزلت عليهم السكينة، وغشيتهم الرحمة، وحفتهم الملائكة، وذكرهم اللَّه فيمن عنده، ومن بَطَّأَ به عمله لم يسرع به نسبه".
صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2699: 38) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মু'মিন ব্যক্তির পার্থিব বিপদগুলোর মধ্য থেকে একটি বিপদ দূর করবে, আল্লাহ তাআলা তার থেকে কিয়ামতের দিনকার বিপদগুলোর মধ্যে থেকে একটি বিপদ দূর করে দেবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো অসচ্ছল ব্যক্তির জন্য সহজ করে দেবে, আল্লাহ তার জন্য দুনিয়া ও আখিরাতে সহজ করে দেবেন। যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের দোষ গোপন করবে, আল্লাহ দুনিয়া ও আখিরাতে তার দোষ ঢেকে রাখবেন। যতক্ষণ পর্যন্ত বান্দা তার ভাইয়ের সাহায্যে থাকে, ততক্ষণ পর্যন্ত আল্লাহও বান্দার সাহায্যে থাকেন। যে ব্যক্তি জ্ঞান অন্বেষণের জন্য কোনো পথে চলে, আল্লাহ এর বিনিময়ে তার জন্য জান্নাতের পথে চলা সহজ করে দেন। আর যখনই কোনো দল আল্লাহর ঘরসমূহের কোনো ঘরে একত্রিত হয়, তারা আল্লাহর কিতাব তিলাওয়াত করে এবং নিজেরা এর অধ্যয়ন করে, তখনই তাদের উপর প্রশান্তি (সাকীনাহ) অবতীর্ণ হয়, তাদের রহমত আচ্ছন্ন করে নেয়, ফিরিশতারা তাদের ঘিরে রাখে, আর আল্লাহ তাদের কথা তাঁর নিকটবর্তী ফেরেস্তাদের সামনে স্মরণ করেন। আর যার আমল তাকে পিছিয়ে দেয়, তার বংশ মর্যাদা তাকে দ্রুত এগিয়ে নিতে পারে না।"
11609 - عن أبي هريرة وأبي سعيد الخدري أنهما شهدا على النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لا يقعد قوم يذكرون اللَّه عز وجل إلا حفَّتهم الملائكة، وغشيتهم الرحمة، ونزلت عليهم السكينة، وذكرهم اللَّه فيمن عنده".
صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2705: 39) من طرق عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، سمعت أبا إسحاق، يحدث عن الأغر أبي مسلم، أنه قال: أشهد على أبي هريرة وأبي سعيد الخدري، فذكراه.
আবূ হুরাইরা ও আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সাক্ষ্য দিয়েছেন যে, তিনি বলেছেন: "যখনই কোনো সম্প্রদায় আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লার স্মরণ করতে বসে, তখনই ফিরিশতাগণ তাদের পরিবেষ্টন করে নেয়, রহমত তাদেরকে ছেয়ে ফেলে, তাদের উপর সাকীনাহ (প্রশান্তি) অবতীর্ণ হয় এবং আল্লাহ্ তাঁর কাছে উপস্থিতদের (উচ্চতর ফেরেশতাদের) মধ্যে তাদের উল্লেখ করেন।"
11610 - عن كعب بن مالك قال: كان أسيد بن حضير حسن الصوت بالقرآن، وأنه أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: بينا أنا أقرأ على ظهر بيتي والمرأة في الحجرة، والفرس مربوط بباب الحجرة إذ غشيتني مثل السحابة، فخشيت أن يبقر الفرس، فتفزع المرأة فتسقط، فانصرفت، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اقرأ يا أسيد، ذلك ملك استمع القرآن".
صحيح: رواه البزّار في مسنده (3209) والفريابي في فضائل القرآن (96) كلاهما من طرق عن الزهري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن أبيه، فذكره. وإسناده صحيح.
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উসাইদ ইবনে হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুরআন তিলাওয়াতে সুমধুর কণ্ঠস্বর বিশিষ্ট ছিলেন। তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: আমি আমার ঘরের ছাদে কুরআন তিলাওয়াত করছিলাম, আর আমার স্ত্রী তখন কক্ষে ছিলেন এবং ঘোড়াটি কক্ষের দরজার কাছে বাঁধা ছিল। হঠাৎ আমাকে মেঘের মতো কিছু একটা আবৃত করে ফেলল। আমি ভয় পেলাম যে, ঘোড়াটি হয়তো লাফিয়ে উঠবে, ফলে স্ত্রী ভীত হয়ে পড়ে যাবে। তাই আমি (তিলাওয়াত বন্ধ করে) ফিরে গেলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “হে উসাইদ, তিলাওয়াত করো। এরা ছিল ফেরেশতা, যারা কুরআন শুনছিল।”
11611 - عن أبي أمامة الباهلي، قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"اقرؤوا القرآن، فإنه
يأتي يوم القيامة شفيعا لأصحابه، اقرؤوا الزهراوين البقرة وسورة آل عمران، فإنهما يأتيان يوم القيامة كأنهما غمامتان أو كأنهما غيايتان أو كأنهما فرقان من طير صوافَّ تحاجان عن أصحابهما، أقرؤوا سورة البقرة فإن أخذها بركة، وتركها حسرة، ولا يستطيعها البطلة".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (804) عن الحسن بن علي الحلواني، حدّثنا أبو توبة (وهو الربيع بن نافع)، حدّثنا معاوية (يعني ابن سلام)، عن زيد، أنه سمع أبا سلَّام يقول: حدثني أبو أمامة، فذكره.
আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “তোমরা কুরআন পাঠ করো। কারণ কিয়ামতের দিন তা তার পাঠকদের জন্য সুপারিশকারী হিসেবে আগমন করবে। তোমরা ‘আয-যাহ্রাওয়ান’ (উজ্জ্বল দুটি সূরা) অর্থাৎ সূরা আল-বাক্বারাহ ও সূরা আলে ইমরান পাঠ করো। কারণ কিয়ামতের দিন তারা এমনভাবে আগমন করবে যেন তারা দুটি মেঘখণ্ড অথবা যেন তারা দুটি ছায়াদানকারী দল অথবা যেন তারা সারিবদ্ধ পাখিদের দুটি ঝাঁক যারা তাদের পাঠকদের পক্ষ হয়ে বিতর্ক করবে। তোমরা সূরা আল-বাক্বারাহ পাঠ করো। কেননা তা গ্রহণ (পাঠ ও আমল) করা বরকত, আর তা বর্জন করা আফসোস ও ক্ষতি, আর বাতিলপন্থীরা (জাদুকররা) এর উপর প্রভাব বিস্তার করতে পারে না।”
11612 - عن جابر بن عبد اللَّه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"القرآن مشفَّع، وماحل مصدق، من جعله أمامه قاده إلى الجنة، ومن جعله خلف ظهره ساقه إلى النار".
حسن: رواه البزّار -كشف الأستار- (122) وصحّحه ابن حبان (124) كلاهما من طريق أبي كريب محمد بن العلاء بن كريب، حدّثنا عبد اللَّه بن الأجلح، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن الأجلح وأبي سفيان طلحة بن نافع فإنهما حسنا الحديث.
وقيل: إن طلحة بن نافع أبا سفيان لم يسمع من جابر إلا أربعة أحاديث، وأخذ صحيفة جابر عن سليمان اليشكري.
قلت: سليمان هو ابن قيس اليشكري ثقة، وثَّقه أبو زرعة والنسائي وغيرهما. ولذا اعتمد الشيخان رواية أبي سفيان عن جابر، وأخرجا حديثه فى صحيحيهما.
وقوله:"ماحل" أي: خصم مجادل.
وبمعناه ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود قال:"إن القرآن شافع ومشفّع، وماحل مصدق، فمن جعله أمامه قاده إلى الجنة، ومن جعله خلفه ساقه إلى النار".
رواه عبد الرزاق (6010) عن الثوري، عن أبي إسحاق وغيره، عن عبد الرحمن بن يزيد، قال: قال عبد اللَّه، فذكره. وإسناده صحيح إلا أنه موقوف.
وعبد الرحمن بن يزيد هو النخعي أبو بكر الكوفي.
وقد روي مرفوعًا ولا يصحّ، رواه الطبرانيّ في الكبير (10/ 244) من طريق الربيع بن بدر، عن الأعمش، عن شقيق بن سلمة، عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مثله مرفوعًا.
والربيع بن بدر متروك، وبه أعلّه الهيثمي في"المجمع" (7/ 164).
ولا يصح ما روي عن علي بن أبيِ طالب مرفوعًا:"من قرأ القرآن واستظهره، فأحلَّ حلاله، وحرَّم حرامه، أدخله اللَّه به الجنة، وشفَّعه في عشرة من أهل بيته كلهم وجبت له النار".
رواه الترمذيّ (2905) -واللفظ له-، وابن ماجه (216) كلاهما من طريق حفص بن سليمان أبي عمرو، عن كثير بن زاذان، عن عاصم بن ضمرة، عن علي بن أبي طالب، فذكره. واختصره ابن ماجه.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وليس إسناده بصحيح، وحفص ابن سليمان يضعَّف في الحديث" انتهى.
وهو كما قال، وقد بسطنا القول فيه في كتاب الإيمان.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরআন (আল্লাহর কাছে) সুপারিশকারী হিসেবে গৃহীত, এবং সত্যবাদী অভিযোগকারী হিসেবে বিশ্বাসযোগ্য। যে ব্যক্তি এটিকে নিজের সামনে রাখবে, এটি তাকে জান্নাতের দিকে চালিত করবে। আর যে ব্যক্তি এটিকে নিজের পিঠের পেছনে রাখবে, এটি তাকে জাহান্নামের দিকে টেনে নিয়ে যাবে।"
11613 - عن بريدة بن حصيب قال: كنت جالسًا عند النبي صلى الله عليه وسلم فسمعته يقول:"تعلموا سورة البقرة؛ فإن أخذها بركة، وتركها حسرة، ولا يستطيعها البطلة". قال: ثم سكت ساعة، ثم قال:"تعلموا سورة البقرة وآل عمران؛ فإنهما الزهراوان يظلان صاحبهما يوم القيامة كأنهما غمامتان، أو غيايتان، أو فرقان من طير صواف، وإن القرآن يلقى صاحبه يوم القيامة حين ينشق عنه قبره كالرجل الشاحب. فيقول له: هل تعرفني؟ فيقول: ما أعرفك. فيقول: أنا صاحبك القرآن الذي أظمأتك في الهواجر، وأسهرت ليلك، وإن كل تاجر من وراء تجارته، وإنك اليوم من وراء كل تجارة، فيعطى الملك بيمينه، والخلد بشماله، ويوضع على رأسه تاج الوقار، ويكسى والداه حلتين لا يقوم لهما أهل الدنيا، فيقولان: بم كسينا هذا؟ فيقال: بأخذ ولدكما القرآن. ثم يقال له: اقرأ واصعد في درج الجنة وغرفها، فهو في صعود ما دام يقرأ، هَذًّا كان، أو ترتيلا".
حسن: رواه ابن ماجه (3781)، وأحمد (22950) والسياق له، والبزّار -كشف الأستار- (2302)، والدارمي (3435)، والحاكم (1/ 560، 566) كلهم من حديث بشير بن المهاجر، حدثني عبد اللَّه بن بريدة، عن أبيه، فذكره.
ولفظ ابن ماجه مختصر جدًّا.
وإسناده حسن من أجل بشير بن المهاجر فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.
وقد حسَّنه أيضًا ابن حجر في المطالب (3478).
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وأما العقيلي فقد ذكر هذا الحديث في ترجمة بشير بن المهاجر، وقال:"لا يصح في هذا الباب عن النبي صلى الله عليه وسلم حديث، أسانيدها متقاربة".
وأما ما روي عن معاذ بن أنس الجهني أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من قرأ القرآن وعمل بما فيه
أُلْبِسَ والداه تاجا يوم القيامة، ضؤوه أحسن من ضوء الشمس في بيوت الدنيا لو كانت فيكم، فما ظنكم بالذي عمل بهذا؟". فلا يصح إسناده.
رواه أبو داود (1453) وأحمد (15645) والحاكم (1/ 567) كلهم من طرق عن زبَّان بن فائد، عن سهل بن معاذ بن أنس الجهني، عن أبيه، فذكره.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد"، وتعقَّبه الذهبي بقوله:"زبَّان ليس بالقوي".
وهو كما قال، فإن زبَّان بن فائد ضعفه أحمد وابن معين وغيرهما.
وقال ابن حبان: منكر الحديث جدًّا، ينفرد عن سهل بن معاذ بنسخة كأنّها موضوعة، لا يحتج به.
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي هريرة يبلغ به النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من رجل يعلِّم ولده القرآن في الدنيا إلا تُوِّجَ أبوه يوم القيامة بتاج في الجنة يعرفه أهل الجنة بتعليمه ولده القرآن في الدنيا".
رواه الطبرانيّ في الأوسط (3471 - مجمع البحرين-) عن أحمد بن يحيى بن خالد بن حيان، ثنا موسى ابن ناصح، ثنا جابر بن سليم الزرقي، عن عباد بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وعباد بن أبي صالح هو عبد اللَّه بن أبي صالح السمان لين الحديث.
وأحمد بن يحيى بن خالد وموسى بن ناصح لم أجد فيهما جرحا ولا تعديلًا، وموسى قد ذكره ابن حبان في ثقاته.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس أنه قال: بينما هو جالس عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذ جاءه علي بن أبي طالب، فقال: بأبي أنت وأمي يا رسول اللَّه، تفلت هذا القرآن من صدري، فما أجدني أقدر عليه. فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا أبا الحسن أفلا أعلمك كلمات ينفعك اللَّه بهن، وينفع بهن من علَّمته، ويثبت ما علمته في صدرك؟" قال: أجل يا رسول اللَّه فعلمني قال:"إذا كانت ليلة الجمعة فإن استطعت أن تقوم في ثلث الليل الآخر فإنها ساعة مشهودة، والدعاء فيها مستجاب، وهي قول أخي يعقوب لبنيه: {قَالَ سَوْفَ أَسْتَغْفِرُ لَكُمْ رَبِّي} [يوسف: 98] حتى تأتي ليلة الجمعة، فإن لم تستطع فقم في وسطها، فإن لم تستطع فقم في أولها، فصل أربع ركعات تقرأ في الركعة الأولى بفاتحة الكتاب وسورة يس، وفي الركعة الثانية بفاتحة الكتاب والم تنزيل السجدة، وفي الركعة الثالثة بفاتحة الكتاب وحم الدخان، وفي الركعة الرابعة بفاتحة الكتاب وتبارك المفصل، فإذا فرغت من التّشهد، فاحمد اللَّه وأحسن الثناء على اللَّه، وصلِّ عليَّ وعلى سائر النبيين، وأحسن واستغفر لاخوانك الذين سبقوك بالايمان، واستغفر للمؤمنين وللمؤمنات ثم قل آخر ذلك: اللَّهم ارحمني بترك المعاصي أبدًا ما أبقيتني، وارحمني أن أتكلف ما لا يعنيني، وارزقني حسن النظر فيما يرضيك عني، اللَّهم بديع السموات والأرض ذا الجلال والإكرام والعزة التي لا ترام، أسألك يا اللَّه، يا رحمن، بجلالك ونور وجهك أن تلزم قلبي حفظ كتابك كما
علمتني، وارزقني أن أتلوه على النحو الذي يرضيك عني، اللَّهم بديع السموات والأرض ذا الجلال والاكرام والعزة التي لا ترام، أسألك يا اللَّه، يا رحمن، بجلالك ونور وجهك أن تنور بكتابك بصري، وأن تطلق به لساني، وأن تفرج به عن قلبي، وأن تشرح به صدري، وأن تشغل به بدني؛ فإنه لا يعينني على الحق غيرك، ولا يؤتيه إلا أنت، ولا حول ولا قوة إلا باللَّه العلي العظيم، أبا الحسن تفعل ذلك ثلاث جمع أو خمسًا أو سبعا يجاب بإذن اللَّه، فوالذي بعثني بالحق ما أخطأ مؤمنًا قط".
قال عبد اللَّه بن عباس: فواللَّه ما لبث علي إلا خمسًا أو سبعا حتى جاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في مثل ذلك المجلس فقال: يا رسول اللَّه، إني كنت فيما خلا لا أتعلم أربع آيات أو نحوهن فإذا قرأتهن على نفسي يتفلتن، فأما اليوم فأتعلم الأربعين آية ونحوها فإذا قرأتهن على نفسي فكما كتاب اللَّه نصب عيني، ولقد كنت أسمع الحديث فإذا أردته تفلت، وأنا اليوم أسمع الأحاديث فإذا حدثت بها لم أخرم منها حرفا، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عند ذلك:"مؤمن ورب الكعبة أبا الحسن".
رواه الترمذيّ (3570) والحاكم (1/ 316 - 317) -والسياق له- وابن جرير في تفسيره (13/ 348) مختصرًا كلهم من طرق عن أبي أيوب سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي، ثنا الوليد بن مسلم، ثنا ابن جريج، عن عطاء بن أبي رباح وعكرمة مولى ابن عباس، عن ابن عباس، قال: فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وتعقبه الذهبي بقوله:"هذا حديث منكر شاذ أخاف لا يكون موضوعا، وقد حيرني واللَّه جودة إسناده. . . والوليد بن مسلم ذكر مصرحا بقوله: ثنا ابن جريج، فقد حدَّث به سليمان قطعا وهو ثبت".
قلت: الوليد بن مسلم يدلس تدليس التسوية، واشترط بعض أهل العلم أن يصرح في جميع الطبقات، وإن كان الجمهور يكتفون بتصريحه من شيخه، فعلى رأي بعض أهل العلم لعله حذف شيخ ابن جريج، كما أن ابن جريج مدلس، ولم يصرح بالسماع من شيخيه عطاء وعكرمة. هذا من حيث الإسناد، وأما من حيث المتن ففيه نكارة واضحة. قال الذهبي في ترجمة الوليد بن مسلم من الميزان (4/ 247):"قلت: ومن أنكر ما أتى حديث حفظ القرآن".
وروي عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الرجل الذي ليس في جوفه شيء من القرآن كالبيت الخرب".
رواه الترمذي (2913) وأحمد (1947) والحاكم (1/ 554) كلهم من طريق جرير بن عبد الحميد، عن قابوس بن أبي ظبيان، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح". وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد". فتعقبه الذهبي بقوله:"قابوس لين".
وقال ابن حبان:"قابوس كان رديء الحفظ، ينفرد عن أبيه بما لا أصل له".
وهذا من روايته عن أبيه.
বুরাইদাহ ইবনু হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বসে ছিলাম। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি, "তোমরা সূরা আল-বাক্বারা শিক্ষা করো। কারণ এর গ্রহণ (পাঠ ও মুখস্থ করা) বরকত, আর এর পরিত্যাগ আফসোস। আর বাতিলপন্থীরা (যাদুকররা) এর মোকাবিলা করতে পারে না।" তিনি বললেন: অতঃপর তিনি কিছুক্ষণ নীরব থাকলেন। এরপর বললেন: "তোমরা সূরা আল-বাক্বারা ও সূরা আলে ইমরান শিক্ষা করো। কারণ তারা দু’টি হলো ‘আয-যাহরাওয়ান’ (দুটি উজ্জ্বল জ্যোতি), যা কিয়ামতের দিন তার পাঠকারীকে ছায়া দেবে, যেন তারা দু’টি মেঘমালা অথবা দু’টি ছায়া দানকারী দল, অথবা পাখা বিস্তারকারী পাখির ঝাক। নিশ্চয়ই কুরআন কিয়ামতের দিন তার পাঠকের সাথে এমন সময় দেখা করবে যখন তার কবর বিদীর্ণ হবে, শীর্ণকায় ব্যক্তির মতো। সে তাকে বলবে: তুমি কি আমাকে চেনো? সে বলবে: আমি তোমাকে চিনি না। তখন সে (কুরআন) বলবে: আমি তোমার সাথী কুরআন, যা তোমাকে প্রচণ্ড গ্রীষ্মের দিনে পিপাসার্ত রেখেছিল এবং রাতের বেলায় তোমাকে জাগিয়ে রেখেছিল। প্রত্যেক ব্যবসায়ী তার ব্যবসার পেছনে ছোটে, কিন্তু আজ তুমি সব ব্যবসার ঊর্ধ্বে (তোমার প্রতিদান লাভের অপেক্ষা করছ)। তখন তাকে ডান হাতে রাজত্ব এবং বাম হাতে চিরস্থায়ী জীবন (জান্নাতে থাকার সনদ) দেওয়া হবে। আর তার মাথায় সম্মানের মুকুট পরানো হবে, এবং তার বাবা-মাকে এমন দু’টি পোশাক পরানো হবে, যার মূল্য দুনিয়ার সমস্ত সম্পদ দ্বারাও পরিশোধ করা যাবে না। তারা দু’জন (বাবা-মা) বলবে: কী কারণে আমাদেরকে এটা পরানো হলো? বলা হবে: তোমাদের সন্তান কুরআন গ্রহণ করার (পাঠ করার ও আমল করার) কারণে। অতঃপর তাকে বলা হবে: পাঠ করতে থাকো এবং জান্নাতের স্তর ও কক্ষগুলোতে আরোহণ করতে থাকো। সে যত দ্রুত বা ধীরে, যেভাবেই পাঠ করবে, ততক্ষণ পর্যন্ত সে আরোহণ করতে থাকবে।"
11614 - عن أبي موسى الأشعري عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تعاهدوا القرآن، فوالذي نفسي بيده لهو أشد تفلُّتا من الإبل في عقلها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5033) ومسلم في صلاة المسافرين (791: 231) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن بريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى، فذكره. وفي البخاريّ:"لهو أشد تفصيا من الإبل في عقلها".
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা কুরআনের নিয়মিত চর্চা করো (বা যত্ন নাও)। সেই সত্তার কসম, যার হাতে আমার প্রাণ! এটি (কুরআন) তার বাঁধন থেকে উটের পালিয়ে যাওয়ার চেয়েও দ্রুত পালিয়ে যায়।"
11615 - عن عبد اللَّه بن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنما مثل صاحب القرآن كمثل الإبل المعقَّلَة، إن عاهد عليها أمسكها، وإن أطلقها ذهبت".
متفق عليه: رواه مالك في القرآن (6) عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في فضائل القرآن (5031) ومسلم في صلاة المسافرين (789: 226) كلاهما من طريق مالك به.
وقوله:"المعقّلة" هي المشدودة بالعقال.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরআনের ধারকের উদাহরণ হচ্ছে রশি দিয়ে বাঁধা উটের মতো। যদি সে তার প্রতি যত্নবান হয় (নিয়মিত পাঠ করে), তবে সে সেটিকে ধরে রাখতে পারে, আর যদি সে সেটিকে ছেড়ে দেয়, তবে তা চলে যায়।"
11616 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تعلَّموا كتاب اللَّه، وتعاهدوه وتغنَّوا به، فوالذي نفسي بيده لهو أشد تفلُّتا من المخاض في العقل".
صحيح: رواه أحمد (17317) وابن أبي شيبة (8660)، وصحّحه ابن حبان (119) والطبراني في الكبير (17/ 290) كلهم من طريق موسى بن عُلَيّ بن رباح، قال: سمعت أبي يقول: سمعت عقبة بن عامر يقول: فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في"المجمع" (7/ 169):"رواه أحمد والطبراني، ورجال أحمد رجال الصحيح".
قوله:"تعاهدوا" أي: حافظوا عليه بالمداومة على تلاوته.
وقوله:"تغنّوا به" أي: اقرؤوه بالصوت الحسن.
وقوله:"تفلُّتا" أي: فرارا من الصدور.
وقوله:"المخاض" هي الحوامل من النوق.
وفي معناه عن أنس بن مالك، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"تعاهدوا القرآن، فوالذي نفسي بيده فهو أشد تفصيا من صدور الرجال من الإبل المعقَّلَة إلى أعطانها".
رواه الطبرانيّ في الأوسط (3475 - مجمع البحرين-) عن أحمد (هو ابن يحيى بن زهير التستري)، ثنا إسحاق بن شاهين الواسطي، ثنا هشيم، عن عوف، عن الحسن، عن أنس بن مالك، فذكره.
والحسن هو ابن أبي الحسن البصري مدلِّس وقد عنعن ولم يصرح بالتحديث.
وقال الهيثمي في المجمع (7/ 169):"رواه الطبرانيّ في الأوسط ورجاله ثقات إلا أحمد شيخ الطبرانيّ لم ينسبه، فإن كان هو ابن الخليل فهو ضعيف، وإن كان غيره فلم أعرفه".
قلت: قد نسب الطبرانيّ شيخه أحمد هذا قبل ستة أحاديث، فقال: حدّثنا أحمد بن زهير، ثم ذكر له عدة أحاديث، وهو ثقة حافظ.
ورُوِيَ عن سعد بن عبادة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من امرئ يقرأ القرآن ثم ينساه إلا لقي اللَّه يوم القيامة أجذم".
رواه أبو داود (1474) عن محمد بن العلاء، حدّثنا ابن إدريس، عن يزيد بن أبي زياد، عن عيسى بن فائد، عن سعد بن عبادة، فذكره.
ويزيد بن أبي زياد هو الهاشمي مولاهم الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم.
وعيسى بن فائد قال عنه ابن المديني: مجهول.
واضطرب في إسناده فمرة رواه هكذا، ومرة رواه عن عيسى بن فائد، عن رجل، عن سعد بن عبادة، فزاد رجلًا بين عيسى وسعد بن عبادة.
ومرة رواه عن عيسى بن فائد، عن عبادة بن الصّامت، فجعله من مسند عبادة بن الصّامت، كما في مسند أحمد (22781)، وبه أعلَّه غير واحد من أهل العلم.
ورُوِيَ عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"عرضت عليَّ أجور أمتي حتى القذاة يخرجها الرجل من المسجد، وعرضت عليَّ ذنوب أمتي، فلم أر ذنبا أعظم من سورة من القرآن أو آية أوتيها رجل ثم نسيها".
رواه أبو داود (461) والترمذي (2916) كلاهما عن عبد الوهاب بن عبد الحكم الخزاز، أخبرنا عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي روّاد، عن ابن جريج، عن المطلب بن عبد اللَّه بن حنطب، عن أنس بن مالك، فذكره.
وإسناده منقطع، فإن ابن جريج لم يسمع من المطلب، كان يأخذ أحاديثه عن ابن أبي يحيى عنه، قاله علي بن المديني، كما في الكفاية للخطيب (ص: 358)، وتحفة التحصيل (ص: 212).
وكذلك لم يسمع المطلب بن عبد اللَّه من أنس بن مالك.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وذاكرت به محمد بن إسماعيل فلم يعرفه واستغربه، قال محمد: ولا أعرف للمطلب بن عبد اللَّه بن حنطب سماعا من أحد من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم إلا قوله: حدثني من شهد خطبة النبي صلى الله عليه وسلم. وسمعت عبد اللَّه بن عبد الرحمن يقول: لا نعرف للمطلب سماعا من أحد من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، قال عبد اللَّه: وأنكر علي بن المديني أن يكون المطلب سمع من أنس" انتهى.
উকবাহ ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা আল্লাহর কিতাব (কুরআন) শিক্ষা করো, এর (ধারাবাহিক) চর্চা করো এবং সুন্দর স্বরে এটি পাঠ করো। সুতরাং, যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ, নিশ্চয়ই এটি (কুরআন) বাঁধনে আবদ্ধ গর্ভবতী উটনী থেকে পালিয়ে যাওয়ার চেয়েও দ্রুত বিস্মৃত হয়ে যায়।”
11617 - عن ابن عباس قال: جمعت المحكم في عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقلت له: وما المحكم؟ قال: المفصل.
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5036) عن يعقوب بن إبراهيم، حدّثنا هُشيم، أخبرنا أبو بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
وقد حفظ ابن عباس المفصل وعمره عشر سنين، كما رواها البخاريّ في فضائل القرآن (5035) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا أبو عوانة، عن أبي بشر، عن سعيد بن جبير، قال: إن الذي تدعونه المفصل هو المحكم، قال: قال ابن عباس: توفي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأنا ابن عشر سنين، وقد قرأت المحكم.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আল-মুহকাম সংগ্রহ করেছিলাম। (বর্ণনাকারী) তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: আল-মুহকাম কী? তিনি বললেন: আল-মুফাস্সাল।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দশ বছর বয়সে আল-মুফাস্সাল মুখস্থ করেছিলেন... তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইন্তেকাল করেন, তখন আমার বয়স ছিল দশ বছর। আর আমি তখন আল-মুহকাম পাঠ করেছিলাম/মুখস্থ করেছিলাম।
11618 - عن عبد اللَّه بن أبي أوفى قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني لا أستطيع أن آخذ من القرآن شيئًا، فعَلِّمني ما يجزئني منه، قال:"قل: سبحان اللَّه، والحمد للَّه، ولا إله إلا اللَّه، واللَّه أكبر، ولا حول ولا قُوة إلا باللَّه العلي العظيم" قال: يا رسول اللَّه! هذا للَّه عز وجل، فما لي؟ قال:"قل: اللَّهم ارحمني وارزقني وعافني واهدني". فلما قام قال هكذا بيده، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أما هذا فقد ملأ يده من الخير".
حسن: رواه أبو داود (832)، والنسائي (924) كلاهما من طريق إبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي، عن عبد اللَّه بن أبي أوفى، فذكر الحديث.
إبراهيم بن عبد الرحمن السكسكي فيه مقال لكنه توبع.
رواه ابن حبان (1810) من طريق الفضل بن موفق، حدّثنا مالك بن مغول، عن طلحة بن مصرف، عن ابن أبي أوفى به مثله.
والفضل بن موفق هو الثقفي أبو الهيثم الكوفي، قال أبو حاتم: كان شيخا صالحًا ضعيف الحديث. وبهذا يرتقي الحديث إلى درجة الحسن.
وتقدم الكلام عليه مفصلا في كتاب الصلاة.
আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমি কুরআন থেকে (বেশি কিছু) গ্রহণ করতে সক্ষম নই, তাই আমাকে এমন কিছু শিখিয়ে দিন যা আমার জন্য যথেষ্ট হয়। তিনি বললেন: "বলো: সুবহানাল্লাহ, আলহামদুলিল্লাহ, লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ, আল্লাহু আকবার এবং লা হাওলা ওয়া লা কুওয়াতা ইল্লা বিল্লাহিল আলিয়্যিল আযীম।" লোকটি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এটা তো মহান ও পরাক্রমশালী আল্লাহর জন্য, আমার জন্য কী? তিনি বললেন: "বলো: আল্লাহুম্মা আরহামনি, ওয়ারযুকনি, ওয়া 'আফিনি, ওয়াহদিনি।" যখন লোকটি দাঁড়ালো, তখন সে তার হাত দিয়ে এভাবে ইশারা করলো (যেন সে সন্তুষ্ট হয়েছে)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ ব্যক্তি তো তার হাত কল্যাণ দিয়ে পূর্ণ করে নিল।"
11619 - عن أبي هريرة قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إن أول الناس يقضى يوم القيامة عليه، رجل استشهد فأتي به فعرَّفه نعمه فعرفها. قال: فما عملت فيها؟ قال:
قاتلت فيك حتى استشهدت. قال: كذبت ولكنك قاتلت لأن يقال جريء. فقد قيل. ثم أمر به، فسحب على وجهه حتى ألقي في النار. ورجل تعلَّم العلم وعلَّمه، وقرأ القرآن، فأتي به فعرَّفه نعمه فعرفها. قال: فما عملت فيها؟ قال: تعلَّمت العلم وعلَّمته، وقرأت فيك القرآن. قال: كذبت ولكنك تعلَّمت العلم ليقال: عالم، وقرأت القرآن ليقال: هو قارئ. فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه حتى ألقي في النار، ورجل وسَّع اللَّه عليه، وأعطاه من أصناف المال كله، فأتي به فعرَّفه نعمه فعرفها. قال: فما عملت فيها؟ قال: ما تركت من سبيل تحب أن ينفق فيها إلا أنفقت فيها لك. قال: كذبت ولكنك فعلت ليقال: هو جواد. فقد قيل، ثم أمر به، فسحب على وجهه ثم ألقي في النار".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1905: 152) عن يحيى بن حبيب الحارثي، حدّثنا خالد بن الحارث، حدّثنا ابن جريج، حدثني يونس بن يوسف، عن سليمان بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره.
وفي الحديث حثٌّ على وجوب الإخلاص في الأعمال الصالحة، كما قال اللَّه تعالى: {وَمَا أُمِرُوا إلا لِيَعْبُدُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ} [البينة: 5]، والثناء الوارد على العلماء يحمل على هذا.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: "কিয়ামতের দিন সর্বপ্রথম যার বিচার করা হবে, সে হলো এমন এক ব্যক্তি, যে শহীদ হয়েছিল। তাকে আনা হবে এবং আল্লাহ তাকে প্রদত্ত নেয়ামতসমূহ সম্পর্কে অবহিত করবেন, তখন সে তা স্বীকার করবে। আল্লাহ বলবেন: তুমি এতে কী আমল করেছ? সে বলবে: আমি তোমার জন্য যুদ্ধ করেছি, যতক্ষণ না শহীদ হয়েছি। আল্লাহ বলবেন: তুমি মিথ্যা বলেছ। বরং তুমি যুদ্ধ করেছিলে, যাতে লোকেরা তোমাকে বীর বলতে পারে। আর তা বলা হয়েছে। অতঃপর তার সম্পর্কে নির্দেশ দেওয়া হবে। ফলে তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে নিয়ে যাওয়া হবে এবং জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।
আর (দ্বিতীয় ব্যক্তি হলো) এমন এক লোক, যে জ্ঞানার্জন করেছে ও তা শিক্ষা দিয়েছে এবং কুরআন তিলাওয়াত করেছে। তাকে আনা হবে এবং আল্লাহ তাকে প্রদত্ত নেয়ামতসমূহ সম্পর্কে অবহিত করবেন, তখন সে তা স্বীকার করবে। আল্লাহ বলবেন: তুমি এতে কী আমল করেছ? সে বলবে: আমি জ্ঞান অর্জন করেছি, তা শিক্ষা দিয়েছি এবং তোমার সন্তুষ্টির জন্য কুরআন তিলাওয়াত করেছি। আল্লাহ বলবেন: তুমি মিথ্যা বলেছ। বরং তুমি জ্ঞান অর্জন করেছিলে, যাতে লোকেরা তোমাকে 'জ্ঞানী' বলতে পারে, আর কুরআন তিলাওয়াত করেছিলে, যাতে লোকেরা তোমাকে 'কারি' (পাঠক) বলতে পারে। তা বলা হয়েছে। অতঃপর তার সম্পর্কে নির্দেশ দেওয়া হবে। ফলে তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে নিয়ে যাওয়া হবে এবং জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।
আর (তৃতীয় ব্যক্তি হলো) এমন এক লোক, যাকে আল্লাহ প্রচুর সচ্ছলতা দান করেছিলেন এবং সব ধরনের সম্পদ দান করেছিলেন। তাকে আনা হবে এবং আল্লাহ তাকে প্রদত্ত নেয়ামতসমূহ সম্পর্কে অবহিত করবেন, তখন সে তা স্বীকার করবে। আল্লাহ বলবেন: তুমি এতে কী আমল করেছ? সে বলবে: এমন কোনো পথ নেই, যে পথে খরচ করা তোমার পছন্দ ছিল, কিন্তু আমি তোমার সন্তুষ্টির জন্য তাতে খরচ করিনি। আল্লাহ বলবেন: তুমি মিথ্যা বলেছ। বরং তুমি তা করেছিলে, যাতে লোকেরা তোমাকে 'দানশীল' বলতে পারে। আর তা বলা হয়েছে। অতঃপর তার সম্পর্কে নির্দেশ দেওয়া হবে। ফলে তাকে উপুড় করে টেনে-হিঁচড়ে নিয়ে যাওয়া হবে এবং জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।"
11620 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أكثر منافقي أمتي قرّاؤها".
حسن: رواه أحمد (6637) والبخاري في التاريخ الكبير (1/ 257) والبغوي في شرح السنة (39) كلهم من طريق عبد اللَّه بن المبارك، عن عبد الرحمن بن شريح المعافري، قال: حدثني شراحيل بن يزيد، عن محمد بن هديَّة، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، فذكره.
ورواه البخاريّ في أفعال العباد (613) من وجه آخر عن المعافري، بإسناده، مثله.
وإسناده حسن من أجل شراحيل بن يزيد فإنه حسن الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার উম্মতের মুনাফিকদের (কপটদের) অধিকাংশই হলো তাদের ক্বারীগণ (কুরআন পাঠকারীগণ)।"
11621 - عن عقبة بن عامر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أكثر منافقي هذه الأمة قرّاؤها".
حسن: رواه أحمد (17410) عن أبي عبد الرحمن، حدّثنا ابن لهيعة، حدثني أبو المصعب، قال: سمعت عقبة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة فإن فيه كلاما معروفا إلا أن راويه هنا أبو عبد الرحمن هو عبد اللَّه بن يزيد المقرئ وهو من الذين سمعوا ابن لهيعة قبل احتراق كتبه، وقد تابعه على ذلك عدد لا بأس بهم، فقد رواه الفريابي في"صفة المنافقين" (33) والخطيب في تاريخه (1/ 357) والطبراني في الكبير 17/ (841)، وأحمد (17366) كلهم من أوجه عن ابن لهيعة بإسناده، كما أن ابن لهيعة أيضًا لم ينفرد به؛ فقد تابعه الوليد بن المغيرة، عن أبي المصعب (وهو مشرح بن هاعان)، عن عقبة ابن عامر، فذكر الحديث.
رواه البخاريّ في خلق أفعال العباد (614) بإسناده عن الوليد بن المغيرة.
ومشرح بن عاهان فيه كلام إلا أنه يقبل حديثه في الشواهد والمتابعات.
ومعنى هذا الحديث كما قال البغوي في شرح السنة (1/ 77):""أكثر منافقي هذه الأمة قرّاؤها" هو أن يعتاد ترك الاخلاص في العمل كما جاء:"التاجر فاجر"، وأراد إذا اعتاد التاجر الكذب في البيع والشراء، لا أن نفس التجارة فجور، بل هي أمر مأذون فيه، مباح في الشرع" انتهى.
وأما ما روي عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تعوَّذوا باللَّه من جُبِّ الْحَزْن" قالوا: يا رسول اللَّه، وما جُبُّ الحزن؟ قال:"واد في جهنّم تتعوذ منه جهنّم كل يوم مئة مرة" قلنا: يا رسول اللَّه، ومن يدخله؟ قال:"القراؤون المراؤون بأعمالهم" فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (2383)، وابن ماجه (256) كلاهما من طرق عن عمار بن سيف، عن أبي معان البصري، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.
وزاد ابن ماجه في آخره:"وإن من أبغض القراء إلى اللَّه الذين يزدرون الأمراء".
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب".
وهو كما قال، فإن عمار بن سيف الضبي ضعيف عند أهل العلم، وأبو معان، -وقيل: أبو معاذ-، مجهول، كما في التقريب.
উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "এই উম্মতের বেশিরভাগ মুনাফিক হলো এর ক্বারীগণ (কুরআন তিলাওয়াতকারী/ধার্মিক হিসেবে পরিচিত ব্যক্তিগণ)।"
11622 - عن عبد اللَّه بن مغفل قال: رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوم فتح مكة على ناقته يقرأ سورة الفتح، قال: فقرأ ابن مغفل ورجَّع، فقال معاوية: لولا الناس لأخذت لكم بذلك الذي ذكره ابن مغفل عن النبي صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5034) ومسلم في صلاة المسافرين (794: 238) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي إياس معاوية بن قرة، قال: سمعت عبد اللَّه بن مغفل قال: فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি দেখেছি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মক্কা বিজয়ের দিন তাঁর উটনীর উপর থাকা অবস্থায় তিনি সূরা আল-ফাত্হ পাঠ করছিলেন। ইবনে মুগাফ্ফাল বলেন: অতঃপর আমি (সেই সূরাটি) পাঠ করলাম এবং তাতে সুর দিলাম। অতঃপর মু'আবিয়া বললেন: লোকেরা (আমার বিরোধিতা করার জন্য) না থাকলে, ইবনে মুগাফ্ফাল রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সম্পর্কে যে বর্ণনা দিয়েছেন, আমি তোমাদের জন্য সেই সুর গ্রহণ করতাম।
11623 - عن * *
১১৬২৩ - থেকে * *
11624 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أم القرآن هي السبع المثاني والقرآن العظيم".
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4704) عن آدم، حدّثنا ابن أبي ذئب، حدّثنا سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه الترمذيّ (3124) من وجه آخر عن أبي علي الحنفي، عن ابن أبي ذئب بإسناده وجاء فيه:"الحمد للَّه أم القرآن، وأم الكتاب، والسبع المثاني".
وقال:"هذا حديث حسن صحيح".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উম্মুল কুরআন (কুরআনের জননী) হলো সাব‘উল মাছানী (বারবার পঠিত সাতটি আয়াত) এবং মহা কুরআন।"
11625 - عن أبي سعيد بن المعلّى قال: كنت أصلي، فدعاني النبي صلى الله عليه وسلم فلم أجبه، قلت: يا رسول اللَّه إني كنت أصلي، قال: ألم يقل اللَّه {اسْتَجِيبُوا لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمْ لِمَا
يُحْيِيكُمْ} [سورة الأنفال: 24] ثم قال:"ألا أعلمك أعظم سورة في القرآن قبل أن تخرج من المسجد؟" فأخذ بيدي، فلما أردنا أن نخرج قلت: يا رسول اللَّه، إنك قلت: لأعلمنّك أعظم سورة من القرآن، قال: {الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ}"هي السبع المثاني والقرآن العظيم الذي أوتيته".
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5006) عن علي بن عبد اللَّه، حدّثنا يحيى بن سعيد، حدّثنا شعبة قال: حدثني خبيب بن عبد الرحمن، عن حفص بن عاصم، عن أبي سعيد بن المعلّى فذكره.
وأما ما رواه مالك في الصلاة (40) عن العلاء بن عبد الرحمن بن يعقوب، أن أبا سعيد مولى عامر بن كريز أخبره أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نادى أبي بن كعب وهو يصلي، فلما فرغ من صلاته لحقه، فوضع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يده على يده، وهو يريد أن يخرج من باب المسجد فقال:"إني لأرجو أن لا تخرج من المسجد حتى تعلم سورة، ما أنزل اللَّه في التوراة، ولا في الإنجيل، ولا في القرآن مثلها" قال أبي: فجعلت أبطئ في المشي رجاء ذلك، ثم قلت: يا رسول اللَّه! السورة التي وعدتني، قال:"كيف تقرأ إذا افتتحت الصلاة؟" قال: فقرأت: {الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ} حتى أتيت على آخرها، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هي هذه السورة، وهي السبع المثاني، والقرآن العظيم الذي أعطيت" فهذا منقطع، فإن أبا سعيد مولى عامر بن كريز تابعي من موالي خزاعة، وليس هو أبو سعيد بن المعلى الراوي في الحديث الذي قبله فإنه صحابي أنصاري.
وأما قصة أبي بن كعب فقد جاء من وجه آخر صحيح وهو الآتي، نبّه على ذلك الحافظ ابن كثير في تفسير سورة الفاتحة.
আবু সাঈদ ইবনুল মুআল্লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সালাত আদায় করছিলাম, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ডাকলেন, কিন্তু আমি তাঁর ডাকে সাড়া দিলাম না। আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমি সালাতে ছিলাম। তিনি বললেন, আল্লাহ কি এই কথা বলেননি: "{তোমরা আল্লাহ ও রাসূলের ডাকে সাড়া দাও যখন তিনি তোমাদেরকে এমন কিছুর দিকে আহ্বান করেন যা তোমাদেরকে জীবন দান করে।}" [সূরা আনফাল: ২৪] অতঃপর তিনি বললেন: "আমি কি তোমাকে মসজিদ থেকে বের হওয়ার আগেই কুরআনের সবচেয়ে মহান সূরাটি শিখিয়ে দেব না?" এরপর তিনি আমার হাত ধরলেন। যখন আমরা বের হওয়ার ইচ্ছা করলাম, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আপনি বলেছিলেন যে আপনি আমাকে কুরআনের সবচেয়ে মহান সূরাটি শিখিয়ে দেবেন। তিনি বললেন: "{আলহামদু লিল্লাহি রাব্বিল আলামীন} (সকল প্রশংসা বিশ্বজগতের প্রতিপালক আল্লাহর জন্য)।" "এটিই হলো সাব'উল মাসানী (পুনরাবৃত্ত সাতটি আয়াত) এবং সেই মহা কুরআন যা আমাকে দেওয়া হয়েছে।"
11626 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خرج على أبي بن كعب، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا أبي" وهو يصلي فالتفت أبي ولم يجبه، وصلى أبي فخفف، ثم انصرف إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: السلام عليك يا رسول اللَّه، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"وعليك السلام، ما منعك يا أبي أن تجيبني إذ دعوتك". فقال: يا رسول اللَّه إني كنت في الصلاة، قال:"أفلم تجد فيما أوحي إلي أن {اسْتَجِيبُوا لِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ إِذَا دَعَاكُمْ لِمَا يُحْيِيكُمْ} [سورة الأنفال: 24] قال: بلى، ولا أعود إن شاء اللَّه قال:"أتحب أن أعلمك سورة لم ينزل في التوراة ولا في الإنجيل ولا في الزبور ولا في الفرقان مثلها؟" قال: نعم يا رسول اللَّه، قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كيف تقرأ في الصلاة؟" قال: فقرأ أم القرآن، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"والذي نفسي بيده ما أنزلت في التوراة ولا في الإنجيل ولا في الزبور ولا في الفرقان مثلها، وإنها سبع من المثاني والقرآن العظيم الذي أعطيته".
صحيح: رواه الترمذيّ (2875)، والنسائي (914)، وأحمد (9345) وصحّحه ابن خزيمة (861)، وابن حبان (775)، والحاكم (1/ 557، و 2/ 354) كلهم من حديث العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره، واللفظ للترمذي، وا ختصره البعض.
وقال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح".
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط مسلم".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে উবাই!" তখন তিনি নামাযরত ছিলেন। উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একবার তাকালেন কিন্তু তাঁর ডাকে সাড়া দিলেন না। উবাই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নামায সংক্ষিপ্ত করলেন এবং তা শেষ করে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে ফিরে এসে বললেন: আসসালামু আলাইকা ইয়া রাসূলাল্লাহ! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওয়া আলাইকাস সালাম। হে উবাই! যখন আমি তোমাকে ডাকলাম, তখন কিসে তোমাকে আমার ডাকে সাড়া দেওয়া থেকে বিরত রাখল?" তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি নামাযে ছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে যে ওহী নাযিল হয়েছে, তার মধ্যে কি তুমি পাওনি যে, {তোমরা আল্লাহ ও রাসূলের ডাকে সাড়া দাও, যখন তারা তোমাদেরকে এমন কিছুর দিকে আহ্বান করেন, যা তোমাদেরকে জীবন দান করবে} [সূরা আনফাল: ২৪]?" উবাই বললেন: হ্যাঁ (পেয়েছি), ইনশাআল্লাহ আমি আর এমন করব না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি চাও আমি তোমাকে এমন একটি সূরা শিখিয়ে দিই যার মতো কিছু তাওরাত, ইনজীল, যাবূর কিংবা ফুরকানেও নাযিল হয়নি?" তিনি বললেন: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি নামাযে কীভাবে ক্বিরাআত পড়ো?" বর্ণনাকারী বলেন, তখন তিনি (উবাই) 'উম্মুল কুরআন' (সূরা ফাতিহা) পাঠ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! এর (সূরা ফাতিহা) মতো কোনো কিছু তাওরাত, ইনজীল, যাবূর কিংবা ফুরকানে নাযিল করা হয়নি। আর তা হলো বারবার পঠিতব্য সাতটি আয়াত (সাব'উল মাসানি) এবং সেই মহান কুরআন যা আমাকে দেওয়া হয়েছে।"
11627 - عن أبي سعيد الخدري قال: كنا في مسير لنا، فنزلنا، فجاءت جارية فقالت: إن سيد الحي سليم، وإن نفرنا غيب، فهل منكم راق؟ فقام معها رجل ما كنا نأبنه برقية، فرقاه فبرأ، فأمر له بثلاثين شاة، وسقانا لبنًا، فلما رجع قلنا له: أكنت تحسن رقية، أو كنت ترقي؟ قال: لا، ما رقيت إلا بأم الكتاب، قلنا: لا تحدثوا شيئًا حتى نأتي -أو نسأل- النبي صلى الله عليه وسلم فلما قدّمنا المدينة ذكرناه للنبي صلى الله عليه وسلم فقال:"وما كان يدريه أنها رقية؟ اقسموا واضربوا لي بسهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5007) ومسلم في السلام (66: 2201) كلاهما من طريق هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أخيه معبد بن سيرين، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একবার আমাদের এক সফরে ছিলাম। যখন আমরা অবতরণ করলাম, তখন একটি বালিকা এসে বলল: গোত্রের সর্দারকে সাপে বা বিষাক্ত পোকা কেটেছে (তিনি আক্রান্ত), আর আমাদের লোকজন অনুপস্থিত। আপনাদের মধ্যে কি কেউ ঝাড়ফুঁককারী (রাক্বী) আছেন? তখন আমাদের মধ্য থেকে একজন লোক তার সাথে গেল, যাকে আমরা ঝাড়ফুঁকের ক্ষেত্রে অভিজ্ঞ বলে জানতাম না। তিনি তাকে ঝাড়লেন এবং সে সুস্থ হয়ে গেল। গোত্রের সর্দার তাকে ত্রিশটি বকরী দেওয়ার আদেশ দিলেন এবং আমাদেরকে দুধ পান করালেন। যখন সে ফিরে আসল, আমরা তাকে বললাম: তুমি কি ঝাড়ফুঁক ভালো জানতে, নাকি তুমি ঝাড়ফুঁক করতে? সে বলল: না, আমি কেবল উম্মুল কিতাব (সূরা আল-ফাতিহা) দিয়েই ঝেড়েছি। আমরা বললাম: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসা পর্যন্ত—অথবা (বললেন) আমরা তাঁকে জিজ্ঞাসা না করা পর্যন্ত—এই বিষয়ে কিছু বলবে না। যখন আমরা মদীনায় পৌঁছলাম, তখন আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ঘটনাটি জানালাম। তিনি বললেন: "সে কীভাবে জানল যে এটি (সূরা ফাতিহা) একটি ঝাড়ফুঁক? তোমরা বকরীগুলো ভাগ করে নাও এবং আমার জন্যও এক অংশ রাখো।"