হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (11648)


11648 - عن أبي أمامة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من قرأ آية الكرسي في دبر كل صلاة مكتوبة لم يمنعه من دخول الجنة إلا أن يموت".

حسن: رواه النسائيّ في اليوم والليلة (100) عن الحسين بن بشر قال: حدّثنا محمد بن حِمْيَر، قال: حدّثنا محمد بن زياد، عن أبي أمامة فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل محمد بن حمير فإنه حسن الحديث، وتقدم في كتاب الأذكار.

وأما ما روي عن أنس مرفوعًا:"آية الكرسي ربع القرآن" فهو ضعيف. رواه أحمد (13309) عن عبد اللَّه بن الحارث، قال: حدثني سلمة بن وردان، عن أنس بن مالك فذكره.
ورواه الترمذيّ (2895) من وجه آخر عن سلمة بن وردان، ولكنه لم يذكر آية الكرسي، وفي الحديث قصة.

وإسناده ضعيف من أجل سلمة بن وردان الليثي المدني ضعيف باتفاق أهل العلم، وقد قال ابن حبان: يرُوي عن أنس أشياء لا تُشبه حديثه.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি প্রত্যেক ফরয সালাতের পর আয়াতুল কুরসি পাঠ করে, মৃত্যু ব্যতীত আর কিছুই তাকে জান্নাতে প্রবেশ করা থেকে বিরত রাখতে পারে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (11649)


11649 - عن النواس بن سمعان الكلابي يقول: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"يؤتى بالقرآن يوم القيامة، وأهله الذين كانوا يعملون به، تقدمه سورة البقرة وآل عمران"، وضرب لهما رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ثلاثة أمثال، ما نسيتهن بعد، قال:"كأنهما غمامتان، أو ظلّتان سوداوان بينهما شرق، أو كأنهما حزقان من طير صواف تحاجان عن صاحبهما".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (805) عن إسحاق بن منصور، أخبرنا يزيد بن عبد ربه، حدّثنا الوليد بن مسلم، عن محمد بن مهاجر، عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشي، عن جبير ابن نفير، قال: سمعت النواس بن سمعان يقول: فذكره.

قوله:"الظّلة"، هي السحابة.

وقوله:"شرق"، أي: ضياء.

وقوله:"حزقان"، أي: جماعات.




নুওয়াস ইবনু সাম‘আন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "কিয়ামতের দিন কুরআনকে নিয়ে আসা হবে এবং তার ধারক-বাহকদেরও, যারা তদনুযায়ী আমল করত। সেগুলোর আগে থাকবে সূরাহ আল-বাক্বারাহ ও সূরাহ আলে ইমরান।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সে দুটির জন্য তিনটি উপমা পেশ করেছেন, যা আমি এরপর আর ভুলিনি। তিনি বলেন: "সেগুলো দেখতে) যেন দুটি মেঘমালা, অথবা দুটি কালো আচ্ছাদন, যার মাঝে থাকবে এক জ্যোতি, অথবা যেন তারা হবে কাতারবদ্ধ পাখির দুটি ঝাঁক, যা তার পাঠকের (সাথীর) পক্ষ হয়ে প্রমাণ পেশ করবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (11650)


11650 - عن أبي أمامة قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"اقرؤوا القرآن، فإنه يأتي يوم القيامة شفيعا لأصحابه، اقرؤوا الزهراوين: البقرة وسورة آل عمران، فإنهما تأتيان يوم القيامة كأنهما غمامتان، أو كأنهما غيايتان، أو كأنهما فرقان من طير صوّاف، تحاجان عن أصحابهما، اقرؤوا سوره البقرة، فإن أخذها بركة، وتركها حسرة، ولا تستطيعها البطلة".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (804) عن الحسن بن علي الحلواني، حدّثنا أبو توبة -وهو الربيع بن نافع- حدّثنا معاوية -يعني ابن سلّام- عن زيد أنه سمع أبا سلّام يقول: حدثني أبو أمامة الباهلي فذكره.

قال معاوية: بلغني أن البطلة: السحرة.

قلت: معاوية بن سلّام بن أبي سلّام، روى عن أخيه زيد وهو ابن سلّام بن أبي سلّام، وهو عن جده أبي سلّام.

وقوله:"الزهراوان"، أي: النيران، فإن فيهما نورًا وهداية.

وقوله:"غيايتان"، الغياية كل شيء أظل الانسان فوق رأسه من سحابة وغيرها.
وقوله:"البطلة"، أي: السحرة كما قال معاوية، وسموا بطلة لأن ما يأتون به باطل.




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: তোমরা কুরআন পাঠ করো। কেননা কিয়ামতের দিন তা তার পাঠকদের জন্য সুপারিশকারী হিসেবে আগমন করবে। তোমরা দুটি উজ্জ্বল সূরা, অর্থাৎ সূরা বাকারা ও সূরা আলে ইমরান পাঠ করো। কেননা কিয়ামতের দিন তারা দুটি মেঘমালার মতো অথবা দুটি ছায়াদানকারীর মতো অথবা সারিবদ্ধ পক্ষীকূলের দুটি ঝাঁকের মতো (বাস্তব রূপ ধারণ করে) আগমন করবে, তারা তাদের পাঠকদের পক্ষ হয়ে (আল্লাহর কাছে) সওয়াল-জবাব করবে। তোমরা সূরা বাকারা পাঠ করো। কেননা তা গ্রহণ করা (পাঠ করা ও আমলে আনা) বরকত, আর তা বর্জন করা আফসোস ও পরিতাপের কারণ। আর জাদুকররা এর ওপর ক্ষমতা খাটাতে পারে না।









আল-জামি` আল-কামিল (11651)


11651 - عن بريدة بن حصيب قال: كنت جالسًا عند النبي صلى الله عليه وسلم فسمعته يقول:"تعلّموا سورة البقرة، فإن أخذها بركة، وتركها حسرة، ولا يستطيعها البطلة". قال: ثم سكت ساعة، ثم قال:"تعلموا سورة البقرة وآل عمران، فإنهما الزهراوان يظلان صاحبهما يوم القيامة كأنهما غمامتان، أو غيايتان، أو فرقان من طير صواف، وإن القرآن يلقى صاحبه يوم القيامة حين ينشق عنه قبره كالرجل الشاحب، فيقول له: هل تعرفني؟ فيقول: ما أعرفك، فيقول: أنا صاحبك القرآن الذي أظمأتك في الهواجر، وأسهرت ليلك، وإن كل تاجر من وراء تجارته، وإنك اليوم من وراء كل تجارة، فيعطى الملك بيمينه، والخلد بشماله، ويوضع على رأسه تاج الوقار، ويكسى والداه حلتين لا يقوم لهما أهل الدنيا، فيقولان: بم كسينا هذا؟ فيقال: بأخذ ولدكما القرآن. ثم يقال له: اقرأ، واصعد في درج الجنة وغرفها، فهو في صعود ما دام يقرأ، هذًّا كان، أو ترتيلا".

حسن: رواه أحمد (22950) والبزار -كشف الأستار- (2302)، والدارمي (3435) والحاكم (1/ 560) كلهم من حديث بشير بن المهاجر، حدثني عبد اللَّه بن بريدة، عن أبيه فذكره. واللفظ لأحمد، وهو عند ابن ماجه (3781) بلفظ مختصر جدًّا.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كذلك إلا أن بشير بن المهاجر مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما ينكر عليه.

وهذا الحديث ليس فيه ما ينكر عليه لوجود شواهد له، وقد حسّنه ابن حجر في المطالب (3478).

قال البزّار: معناه: يجيء ثوابها كما ورد أن اللقمة لتجيء مثل أحد، وقال: ظل المؤمن صدقته، هذا كله على ثوابه.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম। আমি তাঁকে বলতে শুনেছি:

"তোমরা সূরা আল-বাক্বারাহ শিক্ষা করো। কারণ এর গ্রহণ বা তেলাওয়াত করা হলো বরকত, আর এর পরিত্যাগ করা হলো আফসোস বা ক্ষতি, এবং জাদুকররা এর উপর জয়ী হতে পারে না।"

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর তিনি কিছুক্ষণ নীরব থাকলেন। এরপর বললেন: "তোমরা সূরা আল-বাক্বারাহ এবং সূরা আলে ইমরান শিক্ষা করো। কারণ এই দুটি হলো ‘আয-যাহরাওয়ান’ (দুটি দীপ্তিময় আলো)। কিয়ামতের দিন এই দুটি তাদের পাঠকারীর উপর ছায়া দেবে— যেন তারা দুটি মেঘ, অথবা দুটি চাঁদোয়া, অথবা উড়ন্ত পাখা মেলে দেওয়া পাখিদের দল। নিশ্চয়ই কুরআন কিয়ামতের দিন তার পাঠকের সাথে এমনভাবে সাক্ষাৎ করবে, যখন তার কবর ফেটে যাবে, তখন সে ফ্যাকাশে চেহারার (শীর্ণ) পুরুষের রূপ নিয়ে আসবে। সে তাকে বলবে: তুমি কি আমাকে চেনো? সে বলবে: আমি তোমাকে চিনি না। তখন সে বলবে: আমিই তোমার সঙ্গী কুরআন, যা আমি তোমাকে গরমের দিনে পিপাসার্ত রেখেছি এবং তোমার রাতের ঘুম কেড়ে নিয়েছি। আর প্রত্যেক ব্যবসায়ী তার ব্যবসার পিছনে পড়ে থাকবে, কিন্তু আজ তুমি সব ব্যবসার ঊর্ধ্বে (তোমার প্রতিদান লাভের জন্য)। তখন তাকে তার ডান হাতে রাজত্ব এবং বাম হাতে চিরস্থায়ী জীবন দান করা হবে, তার মাথায় সম্মানের মুকুট পরানো হবে, আর তার পিতা-মাতাকে এমন দুটি পোশাক (জুড়ি) পরানো হবে, যার মূল্য দুনিয়ার সব সম্পদ দিয়েও দেওয়া সম্ভব নয়। তারা (পিতা-মাতা) তখন বলবে: কী কারণে আমাদের এই পোশাক পরানো হলো? বলা হবে: তোমাদের সন্তান কুরআন গ্রহণ করার (শিক্ষা করার) কারণে। অতঃপর তাকে বলা হবে: তুমি কুরআন পড়তে থাকো এবং জান্নাতের স্তরে স্তরে ও কক্ষসমূহে আরোহণ করতে থাকো। সে যত দ্রুত বা ধীরগতিতে (তাজভীদসহ) পড়বে, ততক্ষণ পর্যন্ত সে উপরে উঠতে থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11652)


11652 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اقرؤوا الزهراوين، اقرؤوا البقرة وآل عمران، فإنهما تأتيان يوم القيامة كأنهما غمامتان، أو فرقان من طير صواف".

حسن: رواه البزّار -كشف الأستار- (2303) عن أحمد بن منصور، حدّثنا عبد اللَّه بن صالح أبو صالح، أخبرنا الليث، عن سعيد، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن صالح؛ فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في الشواهد.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা 'আয-যাহরাওয়াইন' পাঠ করো। তোমরা সূরা আল-বাক্বারাহ ও সূরা আলে-ইমরান পাঠ করো। কারণ কিয়ামতের দিন তারা উভয়ই আগমন করবে যেন তারা দুটি মেঘমালা, অথবা তারা হবে সারিবদ্ধ পাখির দুটি ঝাক।"









আল-জামি` আল-কামিল (11653)


11653 - عن عائشة قالت: إن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من أخذ السبعَ الأُوَل فهو حَبْرٌ".

حسن: رواه أحمد (24443) وابن الضريس في فضائل القرآن (72) والبزّار -كشف الأستار- (2327) وصحّحه الحاكم (1/ 564) كلهم من حديث عمرو بن أبي عمرو، عن حبيب بن هند الأسلمي، عن عروة، عن عائشة فذكرته، واللفظ لأحمد.

وفي بعض الروايات:"من أخذ السبع الطوال".

وإسناده حسن من أجل حبيب بن هند وهو ابن أسماء بن هند بن حارثة الأسلمي وهو من رجال التعجيل (180) روى عنه عمرو بن أبي عمرو وعبد اللَّه بن أبي بكر بن محمد، وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال البخاريّ: هو حجازي (يعني كان البخاريّ يعرفه)، وصحّحه الحاكم.

وقوله:"السبع الأُول"، يعني البقرة، وآل عمران، والنساء، والمائدة، والأنعام، والأعراف، واختلف في السابعة فقيل: يونس، وقيل: الكهف، وقيل: البراءة مع الأنفال.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি প্রথম সাতটি (সূরা) আয়ত্ত করে, সে একজন মহাজ্ঞানী (বা পণ্ডিত)।"









আল-জামি` আল-কামিল (11654)


11654 - عن ابن عباس قال: أوتي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سبعا من المثاني الطُّول، وأوتي موسى عليه السلام ستا، فلما ألقى الألواح رفعت ثنتان، وبقي أربع.

صحيح: رواه أبو داود (1459) والحاكم (2/ 3354 - 3355) كلاهما من حديث جرير، عن الأعمش، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره، واللفظ لأبي داود. ولفظ الحاكم:"سبعا من المثاني والطول" وقال:"صحيح على شرط الشّيخين".

ورواه الحاكم من وجه آخر عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس في قوله عز وجل: {وَلَقَدْ آتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي وَالْقُرْآنَ الْعَظِيمَ} [الحجر: 87] قال: البقرة، وآل عمران، والنساء، والمائدة، والأنعام، والأعراف، وسورة الكهف. وقال:"صحيح على شرط الشّيخين".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে 'সাব'উম মিনাল মাছানী' (বারবার পঠিত সাতটি দীর্ঘ সূরা) দেওয়া হয়েছিল। আর মূসা (আঃ)-কে ছয়টি (একই প্রকারের সূরা) দেওয়া হয়েছিল। যখন তিনি (মূসা আঃ) (তওরাতের) ফলকগুলো ছুঁড়ে ফেললেন, তখন দুটি তুলে নেওয়া হলো এবং চারটি অবশিষ্ট রইল।









আল-জামি` আল-কামিল (11655)


11655 - عن واثلة بن الأسقع أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أعطيت مكان التوراة السبع، وأعطيت مكان الزبور المئين، وأعطيت مكان الإنجيل المثاني، وفضّلت بالمفصل".

حسن: رواه أحمد (16982) والطبراني في الكبير (22/ 75) كلاهما من حديث عمران القطان، عن قتادة، عن أبي المليح الهذلي، عن واثلة بن الأسقع فذكره.

وفيه عمران القطان وهو ابن داور -بفتح الواو وبعدها راء- أبو العوام مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، ولم يأت في حديث ما ينكر عليه.

وتابعه سعيد بن بشير، وهو الأزدي مولاهم عند الطبرانيّ وهو ضعيف عند جمهور أهل العلم، ولكن قال ابن عدي:"لا أرى بما يرويه بأسا".

قلت: تنفع هذه المتابعة.
الموت إلى غير ذلك مما ذكر في القرآن والسنة الصحيحة.

وقوله: {وَيُقِيمُونَ الصَّلَاةَ} إقامة الصلاة هي أداء الصلاة كاملة ابتداء من إسباغ الوضوء، وقراءة القرآن، وإتمام الركوع والسجود، والتشهد والصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم مع المحافظة على مواقيتها.




ওয়াছিলাহ ইবনুল আসকা‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমাকে তাওরাতের পরিবর্তে ‘আস-সাব‘ (দীর্ঘ সূরাসমূহ) প্রদান করা হয়েছে, আমাকে যাবুরের পরিবর্তে ‘আল-মিঈন’ (শত শ্লোকের সূরাসমূহ) প্রদান করা হয়েছে, আমাকে ইঞ্জিলের পরিবর্তে ‘আল-মাসানি’ (পুনরাবৃত্ত সূরাসমূহ) প্রদান করা হয়েছে, আর আমাকে ‘আল-মুফাস্সাল’ দ্বারা বিশেষ মর্যাদা দেওয়া হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11656)


11656 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن المؤمن إذا أذنب كانت نكتة سوداء في قلبه فإن تاب ونزع واستغفر اللَّه صقل قلبه، فإن زاد زادت، فذلك الران الذي ذكره اللَّه في كتابه: {كَلَّا بَلْ رَانَ عَلَى قُلُوبِهِمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ} [المطففين: 14]".

حسن: رواه الترمذيّ (3334) وابن ماجه (4244) وأحمد (7952) وصححه ابن حبان (930) والحاكم (2/ 517) كلهم من حديث محمد بن عجلان، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عجلان فإنه حسن الحديث.



وقوله: {قَالُوا إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ} أي: نحن على الهدى والرشاد، فقال اللَّه تعالى: {أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْمُفْسِدُونَ وَلَكِنْ لَا يَشْعُرُونَ} أي: أنهم على الكفر والضلال والنفاق فهم مفسدون حقا وإن كانوا يدّعون أنهم يحسنون صنعًا.

{وَلَكِنْ لَا يَشْعُرُونَ} من جهلهم وبغضهم للَّه ولرسوله ولكتابه.



ضرب اللَّه مثل المنافقين بأنهم لو كانوا مؤمنين حقا لكان مثلهم مثل الذي استوقد نارًا فأضاءت ما حوله، ولكنهم لم يؤمنوا، وإنما كفروا ونافقوا فصاروا كالذي ذهب اللَّه بنوره فصار كل شيء له ظلمات، وفي هذه الظلمات هو مثل الصم الذي لا يسمع الخير، والبكم الذي لا ينطق بالحق، والأعمى الذي لا يبصر الحق فمهما أفهمتهم فهم لا يرجعون إليه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় মু'মিন যখন কোনো গুনাহ করে, তখন তার হৃদয়ে একটি কালো দাগ পড়ে। অতঃপর যদি সে তওবা করে, গুনাহ থেকে বিরত থাকে এবং আল্লাহর কাছে ক্ষমা চায়, তাহলে তার হৃদয় পরিষ্কার হয়ে যায়। আর যদি সে (গুনাহ) বৃদ্ধি করে, তবে দাগও বৃদ্ধি পায়। আর এটাই হলো সেই 'রান' (আচ্ছাদন), যা আল্লাহ তাঁর কিতাবে উল্লেখ করেছেন: {কখনোই না! বরং তাদের কৃতকর্মসমূহ তাদের হৃদয়ের উপর মরিচা (রান) ধরিয়ে দিয়েছে} [সূরা মুতাফ্ফিফীন: ১৪]।"

আর তাঁর বাণী: {তারা যখন বলে: আমরা তো সংশোধনকারী} এর অর্থ: আমরা হেদায়াত ও সঠিক পথে আছি। তখন আল্লাহ তাআলা বলেন: {সাবধান! এরাই তো বিপর্যয় সৃষ্টিকারী, কিন্তু তারা অনুভব করে না}। অর্থাৎ, তারা কুফর, পথভ্রষ্টতা ও মুনাফেকির উপর রয়েছে। সুতরাং তারা প্রকৃতই বিপর্যয় সৃষ্টিকারী, যদিও তারা দাবি করে যে, তারা ভালো কাজ করছে। {কিন্তু তারা অনুভব করে না} — তাদের অজ্ঞতা এবং আল্লাহ, তাঁর রাসূল ও তাঁর কিতাবের প্রতি বিদ্বেষের কারণে।

আল্লাহ মুনাফিকদের জন্য উপমা দিয়েছেন যে, যদি তারা প্রকৃতই মু'মিন হতো, তবে তাদের উপমা হতো সেই ব্যক্তির মতো, যে আগুন জ্বালোলো এবং তা তার চারপাশ আলোকিত করলো। কিন্তু তারা ঈমান আনেনি; বরং কুফরি করেছে ও মুনাফিকি করেছে। ফলে তারা এমন ব্যক্তির মতো হয়ে গেল, যার আলো আল্লাহ কেড়ে নিয়েছেন এবং তার জন্য সব কিছু অন্ধকার হয়ে গেছে। আর এই অন্ধকারের মধ্যে সে সেই বধিরের মতো, যে কল্যাণ শুনতে পায় না; সেই মূকের মতো, যে সত্য কথা বলে না; এবং সেই অন্ধের মতো, যে সত্যকে দেখতে পায় না। তুমি তাদের যতই বোঝাও না কেন, তারা তার দিকে ফিরে আসবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (11657)


11657 - عن عائشة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان إذا رأى المطر قال:"صيّبًا نافعًا".

صحيح: رواه البخاريّ في الاستسقاء (1032) عن محمد -هو ابن مقاتل- أبو الحسن المروزي، قال: أخبرنا عبد اللَّه، قال: أخبرنا عبيد اللَّه، عن نافع، عن القاسم بن محمد، عن عائشة فذكرته.

قال البخاريّ: وتابعه القاسم بن يحيى، عن عبيد اللَّه.

ورواه الأوزاعي وعقيل، عن نافع (يعني عن القاسم بن محمد، عن عائشة).

في هذه الآية الكريمة ضرب اللَّه مثلا آخر للمنافقين بأنهم مثل المطر الذي ينزل في الظلمات فهم في نفاقهم وسلوكهم مثل الذي في الظلمات.

وقوله: {وَرَعْدٌ}: وهو الصيحة التي تزعج القلوب، والمنافق يعيش في خوف مستمر.

وقوله: {وَبَرْقٌ} الضوء شديد اللمع يظهر مع السحاب.

وقوله: {الصَّوَاعِقِ}: جمع صاعقة، وهي نار تنزل من السماء وقت الرعد.

وقوله: {يَكَادُ الْبَرْقُ يَخْطَفُ أَبْصَارَهُمْ}: لشدة ضوئه لا يقدر أحد أن ينظر إليه، والخطف: ذهاب البصر.

هذه حال المنافقين فإنهم يواجهون الرعد الذي يخوف القلوب، والبرق الذي يبهر الأعين فيجعلون أصابعهم في آذانهم من الخوف والفزع، ولكن لا ينفع حذرهم شيئًا من قدرة اللَّه الذي محيط بهم.

وروي عن ابن عباس: {كُلَّمَا أَضَاءَ لَهُمْ مَشَوْا فِيهِ} يقول: كلما أصاب المنافقين من عز الإسلام اطمأنوا إليه، وإن أصاب الإسلام نكبة ما قاموا يرجعون إلى الكفر كقوله تعالى: {وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ فَإِنْ أَصَابَهُ خَيْرٌ اطْمَأَنَّ بِهِ وَإِنْ أَصَابَتْهُ فِتْنَةٌ انْقَلَبَ عَلَى وَجْهِهِ خَسِرَ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةَ ذَلِكَ هُوَ الْخُسْرَانُ الْمُبِينُ} [الحج: 11]، أخرجه ابن جرير الطبري.

وروي عن أبي العالية في قوله تعالى: {كُلَّمَا أَضَاءَ لَهُمْ مَشَوْا فِيهِ وَإِذَا أَظْلَمَ عَلَيْهِمْ قَامُوا}: فمثله
كمثل قوم ساروا في ليلة مظلمة لها مطر ورعد وبرق على جادة، كلما أبرقت أبصروا الجادة فمضوا فيها، فإذا ذهب البرق تحيروا، فكذلك المنافق كلما تكلم بكلمة الاخلاص أضاء له، وكلما شك تحير ووقع في الظلمة". رواه ابن أبي حاتم في تفسيره.

وقوله: أي وإذا تعرض لهم شكوك عادوا إلى نفا قهم، وعاشوا خائبين وخاسرين.

وقوله: أي لو أراد اللَّه منهم سلب إيمانهم لفعل لتركهم الحق، فعاشوا في الأرض مثل الكفار الذين لا يسمعون الحق ولا يبصرونه.

وفيه تحذير للمنافقين الذين يسمعون كلام اللَّه ولا يعتبرون به، بل يجعلون أصابعهم في آذانهم ويعرضون عن أوامره ونواهيه من أجل نفاقهم، واللَّه قادر على كشف ما يبطنون.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বৃষ্টি দেখতেন, তখন বলতেন: "উপকারী বৃষ্টিপাত (হোক)।" (صيّبًا نافعًا)

(সহীহ: এটি বুখারী কিতাবুল ইসতিসকাতে (১ ০৩২) মুহাম্মাদ—তিনি ইবনু মুকাতিল আবুল হাসান মারওয়াযী—থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদেরকে আব্দুল্লাহ খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন: আমাদেরকে উবাইদুল্লাহ খবর দিয়েছেন, তিনি নাফি’ থেকে, তিনি কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন)।

এই সম্মানিত আয়াতে আল্লাহ তাআলা মুনাফিকদের জন্য আরেকটি উদাহরণ দিয়েছেন যে তারা অন্ধকারের মধ্যে পতিত বৃষ্টির মতো। তারা তাদের মুনাফেকি ও আচরণের দিক থেকে অন্ধকারে থাকা ব্যক্তির মতো।

আর তাঁর বাণী: {বজ্রনিনাদ (র‘আদ)}: এটি সেই চিৎকার যা হৃদয়কে আলোড়িত করে। আর মুনাফিক সর্বদা ভয়ের মধ্যে বাস করে।

আর তাঁর বাণী: {বিদ্যুৎ (বারক)}: এটি তীব্র দীপ্তিময় আলো যা মেঘের সাথে প্রকাশ পায়।

আর তাঁর বাণী: {বজ্রপাতসমূহ (আস্-সাওয়া’ইক)}: এটি 'সা-ইকাহ'-এর বহুবচন, যা বজ্রনিনাদের সময় আকাশ থেকে নেমে আসা আগুন।

আর তাঁর বাণী: {বিদ্যুৎ যেন তাদের দৃষ্টি কেড়ে নেয়}: এর আলোর তীব্রতার কারণে কেউ এটির দিকে তাকাতে পারে না। 'খাতফ' (কেড়ে নেওয়া) হলো দৃষ্টিশক্তি চলে যাওয়া।

এটি মুনাফিকদের অবস্থা। তারা এমন বজ্রনিনাদের সম্মুখীন হয় যা হৃদয়কে ভয় দেখায়, এবং এমন বিদ্যুতের সম্মুখীন হয় যা চোখকে ঝলসে দেয়। ফলে তারা ভয় ও আতঙ্কে তাদের কানে আঙ্গুল ঢুকিয়ে দেয়। কিন্তু তাদের সাবধানতা আল্লাহর ক্ষমতার সামনে কোনো উপকারে আসে না, যিনি তাদের পরিবেষ্টন করে আছেন।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে: {যখনই তা তাদের জন্য আলোকিত হয়, তারা তাতে চলতে থাকে}। তিনি বলেন: যখনই ইসলামের শক্তি দ্বারা মুনাফিকরা লাভবান হয়, তখনই তারা তাতে স্থির হয়। আর যখন ইসলামের ওপর কোনো বিপদ আসে, তখন তারা কুফরির দিকে ফিরে যায়, যেমন আল্লাহর বাণী: {আর মানুষের মধ্যে এমন লোকও আছে যারা দ্বিধার সাথে আল্লাহর ইবাদত করে। যদি তার কল্যাণ হয়, তবে সে তাতে স্থির থাকে; আর যদি কোনো বিপদ আসে, তখন সে তার চেহারা উল্টিয়ে ফেলে। সে দুনিয়া ও আখিরাতে ক্ষতিগ্রস্ত হয়। এটাই সুস্পষ্ট ক্ষতি} [সূরা আল-হাজ্জ: ১১]। এটি ইবনু জারীর আত-তাবারী বর্ণনা করেছেন।

আল্লাহ তাআলার বাণী: {যখনই তা তাদের জন্য আলোকিত হয়, তারা তাতে চলতে থাকে এবং যখনই তা তাদের ওপর অন্ধকারাচ্ছন্ন হয়, তারা দাঁড়িয়ে পড়ে} এর ব্যাখ্যায় আবুল আলিয়াহ থেকে বর্ণিত হয়েছে: তাদের উদাহরণ এমন একদল লোকের মতো যারা অন্ধকার রাতে বৃষ্টি, বজ্রপাত ও বিদ্যুৎসহ একটি পথে চলছে। যখনই বিদ্যুৎ চমকায়, তারা পথ দেখতে পায় এবং তাতে চলতে থাকে। আর যখন বিদ্যুৎ চলে যায়, তারা হতবিহ্বল হয়ে যায়। অনুরূপভাবে, মুনাফিক যখনই ইখলাসের (আন্তরিকতার) কথা বলে, তখনই তার জন্য তা আলোকিত হয়, আর যখনই সে সন্দেহ করে, তখনই সে হতবিহ্বল হয়ে যায় এবং অন্ধকারে পতিত হয়। ইবনু আবী হাতিম তাঁর তাফসীরে এটি বর্ণনা করেছেন।

আর তাঁর বাণী: অর্থাৎ যখন তাদের সামনে সন্দেহ উপস্থিত হয়, তারা তাদের মুনাফেকির দিকে ফিরে যায় এবং তারা ব্যর্থ ও ক্ষতিগ্রস্ত হিসেবে জীবনযাপন করে।

আর তাঁর বাণী: অর্থাৎ আল্লাহ যদি তাদের থেকে তাদের ঈমান কেড়ে নিতে চাইতেন, তবে তিনি তাই করতেন এবং তাদেরকে হক (সত্য) থেকে দূরে সরিয়ে দিতেন। ফলে তারা জমিনে কাফিরদের মতো জীবনযাপন করত, যারা সত্য শোনেও না, দেখেও না।

এতে মুনাফিকদের জন্য সতর্কবাণী রয়েছে, যারা আল্লাহর কালাম শোনার পরও তা থেকে শিক্ষা গ্রহণ করে না, বরং তারা তাদের মুনাফেকির কারণে তাদের কানে আঙ্গুল ঢুকিয়ে দেয় এবং তাঁর আদেশ-নিষেধ থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়। আল্লাহ তাদের অন্তরের গোপন বিষয় প্রকাশ করতে সক্ষম।









আল-জামি` আল-কামিল (11658)


11658 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: سألت النبي صلى الله عليه وسلم: أي الذنب أعظم عند اللَّه؟ قال:"أن تجعل للَّه ندًا وهو خلقك" قلت: إن ذلك لعظيم، قلت: ثم أي؟ قال:"وأن تقتل ولدك تخاف أن يطعم معك" قلت: ثم أي؟ قال:"أن تزاني حليلة جارك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4476) ومسلم في الإيمان (86) كلاهما عن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن عمرو بن شرحبيل، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, আল্লাহর নিকট সবচেয়ে গুরুতর পাপ কোনটি? তিনি বললেন: "আল্লাহর সাথে কাউকে শরিক (সমকক্ষ) করা, অথচ তিনিই তোমাকে সৃষ্টি করেছেন।" আমি বললাম: নিশ্চয়ই এটি অতি গুরুতর। আমি পুনরায় জিজ্ঞাসা করলাম: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "তোমার সন্তানকে হত্যা করা, এই ভয়ে যে সে তোমার সাথে আহার করবে (তোমার সংসারে অভাব আনবে)।" আমি বললাম: তারপর কোনটি? তিনি বললেন: "তোমার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে ব্যভিচার করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (11659)


11659 - عن معاذ بن جبل قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يا معاذ، أتدري ما حق اللَّه على العباد؟" قال: اللَّه ورسوله أعلم، قال:"أن يعبدوه ولا يشركوا به شيئًا، أتدري ما حقهم عليه؟" قال: اللَّه ورسوله أعلم، قال:"أن لا يعذبهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7373) ومسلم في الإيمان (50: 30) كلاهما من حديث محمد بن جعفر غندر، حدّثنا شعبة، عن أبي حصين والأشعث بن سليم، سمعا الأسود بن هلال، عن معاذ بن جبل، فذكره.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে মু'আয, তুমি কি জানো বান্দাদের উপর আল্লাহর কী হক?" তিনি বললেন: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সর্বাধিক অবগত। তিনি বললেন: "তাঁর ইবাদত করা এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক না করা।" (তিনি পুনরায় জিজ্ঞেস করলেন): "তুমি কি জানো (এই কাজ করলে) আল্লাহর উপর বান্দাদের কী হক?" তিনি বললেন: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সর্বাধিক অবগত। তিনি বললেন: "তিনি যেন তাদেরকে শাস্তি না দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (11660)


11660 - عن قتيلة امرأة من جهينة أن يهوديا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إنكم تندّدون، وإنكم تشركون تقولون: ما شاء اللَّه وشئت، وتقولون: والكعبة، فأمرهم النبي صلى الله عليه وسلم إذا أرادوا
أن يحلفوا أن يقولوا:"ورب الكعبة" ويقولوا:"ما شاء اللَّه ثم شئت".

صحيح: رواه النسائيّ (3773) عن يوسف بن عيسى، قال: حدّثنا الفضل بن موسى، قال: حدّثنا مسعر، عن معبد بن خالد، عن عبد اللَّه بن يسار، عن قتيلة فذكرته.

وإسناده صحيح.




কুতাইলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জাহিনা গোত্রের একজন মহিলা কুতাইলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, একজন ইহুদি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: তোমরা নিশ্চয়ই (আল্লাহর সাথে অন্য কাউকে) সমকক্ষ সাব্যস্ত করছো এবং তোমরা শিরক করছো। তোমরা বল: 'যা আল্লাহ চেয়েছেন এবং তুমি চেয়েছ,' আর তোমরা বল: 'কাবার শপথ (কসম)।' অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁরা শপথ করতে চাইতেন, তখন তাঁদেরকে নির্দেশ দিলেন যেন তাঁরা বলেন: 'কাবার রবের শপথ' এবং তাঁরা বলেন: 'যা আল্লাহ চেয়েছেন, অতঃপর তুমি চেয়েছ'।









আল-জামি` আল-কামিল (11661)


11661 - عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"وإذا حلف أحدكم فلا يقل: ما شاء اللَّه وشئت، ولكن ليقل: ما شاء اللَّه ثم شئت".

حسن: رواه ابن ماجه (2117) عن هشام بن عمار، قال: حدّثنا عيسى بن يونس، قال: حدّثنا الأجلح الكندي، عن يزيد بن الأصم، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل هشام بن عمار، والأجلح وهو ابن عبد اللَّه بن حجية الكندي فإنهما مختلف فيهما غير أنهما حسنا الحديث.

انظر أحاديث هذا الباب في كتاب الإيمان.

في هذه الآيات دلالة على وجود الصانع الحكيم، فإن هذا العالم المحكم لا بد له من صانع، وقد سئل أعرابي: ما الدليل على وجود الرب تعالى؟ فقال: البعرة تدل على البعير، والروث على الحمير، وآثار الأقدام على المسير، فسماء ذات أبراج، وأرض ذات فجاج، وبحار ذات أمواج أما تدل على الصانع الحليم العليم القدير؟ ذكره الرازي في تفسيره (2/ 99 -
كلام الخالق؛ لأن النبي صلى الله عليه وسلم خص بهذا القرآن، وهو من أكبر الآيات البينات لنبوة محمد صلى الله عليه وسلم كما جاء في الصحيح:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যখন কেউ (ইচ্ছার বিষয়ে) কথা বলে, তখন সে যেন না বলে: 'আল্লাহ যা চেয়েছেন এবং তুমি যা চেয়েছো,' বরং সে যেন বলে: 'আল্লাহ যা চেয়েছেন, অতঃপর তুমি যা চেয়েছো'।"









আল-জামি` আল-কামিল (11662)


11662 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من الأنبياء نبي إلا أعطي من الآيات ما مثله آمن عليه البشر، وإنما كان الذي أوتيت وحيا أوحاه اللَّه إليّ، فأرجو أن أكون أكثرهم تابعًا يوم القيامة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (4981) ومسلم في الإيمان (152) كلاهما من حديث الليث، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره، ولفظهما سواء.

قوله:"أعطي من الآيات ما مثله": أي أعطي من المعجزات الخوارق مثلها، يعني أنه أعطي أكثر من معجزة.

وقوله:"إنما كان الذي أوتيت وحيا أوحاه اللَّه إلي": أي القرآن وهو من أكبر معجزات النبي صلى الله عليه وسلم مع معجزاته الكثيرة، ولكنه خص بالقرآن كما كل نبي خص بمعجزة مثل موسى عليه السلام خص بالعصا، وعيسى عليه السلام خص بإحياء الموتى وهكذا.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো নবী নেই, যাকে এমন নিদর্শনাবলী (মুজিযা) দেওয়া হয়নি যার অনুরূপ দেখে মানুষ ঈমান এনেছে। আর আমাকে যা দেওয়া হয়েছে, তা হলো আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে আমার প্রতি প্রত্যাদেশ (ওয়াহী)। সুতরাং আমি আশা করি, কিয়ামতের দিন তাদের মধ্যে আমার অনুসারীর সংখ্যাই সর্বাধিক হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (11663)


11663 - عن جابر، قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ أهل الجنة يأكلون فيها ويشربون، ولا يتفلون ولا يبولون، ولا يتغوطون، ولا يمتخطون"، قالوا: فما بال الطعام؟ قال:
"جُشاء ورشح كرشح المِسْك يُلهمون التسبيح والتحميد كما تلهمون النفس".

صحيح: رواه مسلم (2835) من طريق جرير، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، قال: فذكره.

والجُشاء هو: تنفس المعدة من الامتلاء.



وقوله: {لَكُمْ}: دليل على الانتفاع بما خلق اللَّه في السموات والأرض، واللَّه تعالى لا يمتن علينا بخلقه إلا أن يكون فيه نفع لنا، ففيه إشارة إلى الابتعاد عن كل ما فيه ضرر للإنسان سواء كان من الخبائث التي ورد تحريمها في النصوص، أو من الفساد الذي يدمر كوكب الأرض.

وقوله: {ثُمَّ اسْتَوَى إِلَى السَّمَاءِ} أي قصد وأقبل، لأن الاستواء إذا تعدى بـ"إلى" فمعناه قصد، وإذا تعدى بـ"على" فمعناه ارتفع كما في قوله تعالى: {ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ} [الأعراف: 54] وإذا ذكر بدون حرف يكون معناه الكمال والتمام كقوله تعالى عن موسى: {وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَاسْتَوَى} [القصص: 14].

وهنا ذكر بحرف"إلى" فمعناه إن اللَّه بعد أن خلق لكم ما في الأرض جميعًا لتنتفعوا بها قصد إلى خلق السماوات السجع مع شموسها، وأقمارها، ونجومها، وفضائها، ومن فيهنّ لتنتفعوا بها.

وقوله: {وَهُوَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ} أي أنه يعلم احتياجكم ولذا خلق لكم ما في الأرض وما في السموات.

وهنا لا يقصد اللَّه سبحانه وتعالى أن يبين أدوار خلق الأرض والسماوات، بل المقصود فيه امتنانه على عباده بأن هذه المخلوقات خلقها اللَّه تعالى لينتفع بها الانسان.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় জান্নাতবাসীরা সেখানে পানাহার করবে, কিন্তু তারা থুথু ফেলবে না, পেশাব করবে না, পায়খানা করবে না এবং নাক ঝাড়বে না।" সাহাবীরা জিজ্ঞেস করলেন: তাহলে খাবারের পরিণতি কী হবে? তিনি বললেন: "তা ঢেকুর এবং কস্তুরীর ঘামের মতো ঘামের মাধ্যমে নিঃশেষ হয়ে যাবে। তাদেরকে তাসবীহ (আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা) ও তাহমীদ (আল্লাহর প্রশংসা) করার জন্য এমনভাবে অনুপ্রাণিত করা হবে, যেমনভাবে তোমরা শ্বাস-প্রশ্বাস গ্রহণের জন্য অনুপ্রাণিত হও।"









আল-জামি` আল-কামিল (11664)


11664 - عن أبي ذر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سئل: أي الكلام أفضل؟ قال:"ما اصطفى اللَّه لملائكته أو لعباده: سبحان اللَّه وبحمده".

صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2731) عن زهير بن حرب، حدّثنا حبان بن هلال، حدّثنا وهيب، حدّثنا سعيد الجريري، عن أبي عبد اللَّه الجسري، عن عبد اللَّه بن الصّامت، عن أبي ذر فذكره.

وقوله: {إِنِّي أَعْلَمُ مَا لَا تَعْلَمُونَ (30)}: بأن يكون من هذا الخليفة الأنبياء والصالحون وأنابهم
عليهم وأنتم لا تعلمون، وفيه حصر على أن علم الغيب خاص للَّه تعالى دون غيره.




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল: কোন কথাটি সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "যা আল্লাহ তাঁর ফেরেশতাদের জন্য অথবা তাঁর বান্দাদের জন্য মনোনীত করেছেন: 'সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি'।"









আল-জামি` আল-কামিল (11665)


11665 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا قرأ ابن آدم السجدة فسجد اعتزل الشيطان يبكي، يقول: يا ويلي، أمر ابن آدم بالسجود فسجد فله الجنة، وأمرت بالسجود فأبيت فلي النار".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (81) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال: فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আদম সন্তান সিজদার আয়াত পাঠ করে এবং সিজদা করে, তখন শয়তান কাঁদতে কাঁদতে দূরে সরে যায় এবং বলতে থাকে: হায় দুর্ভোগ আমার! আদম সন্তানকে সিজদার নির্দেশ দেওয়া হলো এবং সে সিজদা করলো, ফলে তার জন্য জান্নাত (নির্ধারিত হলো), আর আমাকে সিজদার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল, কিন্তু আমি অস্বীকার করলাম, ফলে আমার জন্য জাহান্নাম (নির্ধারিত হলো)।"









আল-জামি` আল-কামিল (11666)


11666 - عن أبي سعيد الخدري، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ بالمدينة نفرا من الجن قد أسلموا، فمن رأى شيئًا من هذه العوامر فليؤذنه ثلاثًا، فإن بدأ له بعد فليقتله، فإنه شيطان".

صحيح: رواه مسلم في السلام (141: 2236) عن زهير بن حرب، حدّثنا يحيى بن سعيد، عن ابن عجلان، حدثني صيفي، عن أبي السائب، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই মদীনায় একদল জিন আছে যারা ইসলাম গ্রহণ করেছে। সুতরাং যে ব্যক্তি এই গৃহবাসী জিনদের (আওয়ামির)-এর কাউকে দেখে, সে যেন তাকে তিনবার সতর্ক করে (বা ঘর ছেড়ে যেতে বলে)। এরপরও যদি সে তার সামনে আসে (চলে না যায়), তবে সে যেন তাকে হত্যা করে। কারণ সে তো শয়তান।"









আল-জামি` আল-কামিল (11667)


11667 - عن أسامة قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يؤتى بالرجل يوم القيامة، فيلقى في النار، فتندلق أقتاب بطنه، فيدور بها كما يدور الحمار بالرحى، فيجتمع إليه أهل النار فيقولون: يا فلان، ما لك؟ ألم تكن تأمر بالمعروف وتنهى عن المنكر؟ فيقول: بلى، قد كنت آمر بالمعروف ولا آتيه، وأنهى عن المنكر وآتيه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3267) ومسلم في الزهد والرقائق (2989) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي وائل شقيق، عن أسامة بن زيد، قال: فذكره، واللفظ لمسلم ولفظ البخاريّ نحوه.




উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: কিয়ামতের দিন এক ব্যক্তিকে আনা হবে এবং তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে। তার নাড়িভূঁড়ি বেরিয়ে আসবে এবং সে সেগুলোর সাহায্যে এমনভাবে ঘুরতে থাকবে যেমন গাধা যাঁতার সঙ্গে ঘোরে। অতঃপর জাহান্নামীরা তার কাছে একত্রিত হয়ে বলবে: হে অমুক, তোমার কী হয়েছে? তুমি কি সৎ কাজের আদেশ দিতে না এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করতে না? সে বলবে: হ্যাঁ, আমি সৎ কাজের আদেশ দিতাম কিন্তু আমি নিজে তা করতাম না, আর অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করতাম কিন্তু আমি নিজেই তা করতাম।