আল-জামি` আল-কামিল
11768 - عن ابن عباس قال: جاء عمر إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه! هلكت، قال:"وما أهلكك؟" قال: حولت رحلي الليلة، قال: فلم يرد عليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم شيئًا، قال: فأنزلت على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم هذه الآية: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} أقبل وأدبر، واتق الدبر والحيضة.
حسن: رواه الترمذيّ (2980) والنسائي في الكبرى (10973) وأحمد (2703) والطحاوي في المشكل (6127) وصحّحه ابن حبان (4202) كلهم من طريق يعقوب بن عبد اللَّه القمّي، قال: حدّثنا جعفر بن المغيرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.
قال الترمذيّ: حسن غريب، وفي نسخة: حسن صحيح.
قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في يعقوب بن عبد اللَّه القمي وشيخه جعفر بن المغيرة غير أنهما حسنا الحديث. وجاء عن ابن عباس سبب آخر في نزول هذه الآية، وهو الآتي:
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এসে বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি ধ্বংস হয়ে গেছি! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "কিসে তোমাকে ধ্বংস করেছে?" তিনি বললেন, "আমি আজ রাতে আমার সওয়ারের স্থান পরিবর্তন করেছি।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার কথার কোনো জবাব দিলেন না। তিনি বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের উপর এই আয়াতটি নাযিল হলো: {তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের জন্য শস্যক্ষেত্র স্বরূপ। অতএব তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো} (সূরা বাকারা: ২/২২৩)। (অর্থাৎ) সামনে দিক থেকে আসো বা পেছনের দিক থেকে আসো, তবে পায়ুপথে এবং ঋতু অবস্থায় সঙ্গম করা থেকে বিরত থাকো।
11769 - عن ابن عباس قال: أتى ناس من حمير إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فسألوه عن أشياء، فقال له رجل: إني أحب النساء فكيف ترى؟ فأنزل اللَّه تعالى: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ}.
حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (2/ 404) عن يونس بن عبد الأعلى قراءة، ثنا ابن وهب، أخبرني ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عامر بن يحيى، عن حنش بن عبد اللَّه، عن عبد اللَّه بن عباس فذكره.
وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكن روى عنه عبد اللَّه بن وهب وهو أحد العبادلة، وروايتهم عنه أعدل من غيرهم، فيحسن حديثه.
وذكر عنه سبب آخر في نزول هذه الآية وهو ما رواه الإمام أحمد (2414) من وجه آخر عن
عامر بن يحيى المعافري بإسناده بلفظ: أنزلت هذه الآية في أناس من الأنصار أتوا النبي صلى الله عليه وسلم فسألوه فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ائتها على كل حال، إذا كان في الفرج".
وفي إسناده رشدين بن سعد وهو ضعيف.
فهل يقال: إن في نزول هذه الآية عدة أسباب؟ أو أنها نزلت لسبب واحد، وبقية الأسباب ذكرها ابن عباس استنباطا واجتهادًا منه، وهذا أقرب إلى الصواب.
وعن سعيد بن جبير أنه قال: بينا أنا ومجاهد جالسان عند ابن عباس، أتاه رجل فوقف على رأسه فقال: يا أبا العباس -أو يا أبا الفضل- ألا تشفيني عن آية المحيض؟ فقال: بلى، فقرأ: {وَيَسْأَلُونَكَ عَنِ الْمَحِيضِ} حتى بلغ إلى آخر الآية، فقال ابن عباس: من حيث جاء الدم، من ثم أمرت أن تأتي. فقال له الرجل: يا أبا الفضل، كيف بالآية التي تتبعها {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ}، فقال: إي ويحك! وفي الدبر من حرث؟ لو كان ما تقول حقا لكان المحيض منسوخا، إذا اشتغل من هاهنا جئت من هاهنا، ولكن {أَنَّى شِئْتُمْ} من الليل والنهار.
رواه ابن جرير في تفسيره (3/ 750) وابن أبي حاتم في التفسير (2/ 402) بإسنادهما، واللفظ لابن جرير، وفيه عمار الدهني حسن الحديث.
ففي هذه الأحاديث: المنع من إتيان النساء فيما سوى فروجهن، وهو أمر جاء النقل فيه عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من أوجه كثيرة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হামিয়রের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে কয়েকটি বিষয়ে জিজ্ঞাসা করল। তখন তাদের মধ্যে একজন লোক তাঁকে বলল: আমি নারীদের ভালোবাসি, এ ব্যাপারে আপনার অভিমত কী? তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র।" (সূরা বাকারা: ২২৩)।
এই আয়াত আনসারদের কিছু লোক সম্পর্কেও নাযিল হয়েছিল, যারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞাসা করেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে (স্ত্রীকে) যে কোনো অবস্থাতেই ব্যবহার করতে পারো, যতক্ষণ তা যোনিপথে হয়।"
আর সাঈদ ইবনু জুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং মুজাহিদ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসেছিলাম। তখন এক ব্যক্তি এসে তাঁর সামনে দাঁড়াল এবং বলল: হে ফাযলের পিতা! আপনি কি আমাকে হায়েজ (ঋতুস্রাব) সম্পর্কিত আয়াতটি পরিষ্কার করে বলবেন না? তিনি বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই। অতঃপর তিনি পাঠ করলেন: "আর তারা তোমাকে হায়েজ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে..." আয়াতের শেষ পর্যন্ত। তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যেখান থেকে রক্ত আসে, সেখান থেকে আসতে (সহবাস করতে) নিষেধ করা হয়েছে।
তখন লোকটি তাঁকে বলল: হে ফাযলের পিতা! এর পরবর্তী আয়াতটির কী হবে: "তোমাদের স্ত্রীগণ তোমাদের শস্যক্ষেত্র, সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা আসো।" (সূরা বাকারা: ২২৩)? তিনি বললেন: তোমার সর্বনাশ হোক! পিছনের পথে (পায়ুপথে) কি শস্যক্ষেত্র আছে? যদি তুমি যা বলছ তা সত্য হতো, তাহলে হায়েজ সম্পর্কিত বিধান রহিত হয়ে যেতো (অর্থাৎ, যখন সামনের পথে নিষেধ করা হতো, তখন পিছনের পথে সহবাস করা বৈধ হতো)। কিন্তু "তোমরা যেভাবে ইচ্ছা আসো" এর অর্থ হলো—দিন বা রাতের যে কোনো সময়।
এই সকল হাদীসে নারীদের যোনিপথ ব্যতীত অন্য স্থানে (পায়ুপথে) সহবাস করা থেকে নিষেধ করা হয়েছে, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বহু সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।
11770 - عن بهز بن حكيم بن معاوية بن حيدة القشيري، عن أبيه، عن جده قال: قلت: يا رسول اللَّه، نساؤنا ما نأتي منها وما نذر؟ قال:"ائت حرثك أنى شئت".
حسن: رواه أبو داود (2143) وأحمد (20030) كلاهما من طريق بهز بن حكيم بإسناده أطول منه.
وإسناده حسن من أجل بهز بن حكيم فإنه حسن الحديث.
وقوله:"أنى شئت": أي من أي وجه كان، على أن يكون ذلك في الفرج.
انظر بقية الأحاديث في هذا المعنى في كتاب النكاح.
وقيل معناه: أين شئتم، وحيث شئتم، أي في القبل والدبر. روي ذلك عن ابن عمر كما في الحديث الآتي:
মুআবিয়া ইবনু হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমাদের স্ত্রীদের সাথে আমরা কীভাবে সহবাস করব এবং কী এড়িয়ে চলব? তিনি বললেন, "তুমি তোমার শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা আসো।"
11771 - عن نافع قال: كان ابن عمر إذا قرأ القرآن لم يتكلم قال: فقرأت ذات يوم هذه الآية: فقال: أتدري فيمن نزلتْ هذه الآية؟ قلت: لا، قال: نزلت في إتيان النساء في أدبارهن.
صحيح: رواه ابن جرير (3/ 751) عن يعقوب، قال: ثنا ابن علية، قال: أخبرنا ابن عون، عن نافع فذكره.
ورواه البخاريّ في التفسير (4526) عن إسحاق، أخبرنا النضر بن شميل، أخبرنا ابن عون، عن نافع، قال: كان ابن عمر إذا قرأ القرآن لم يتكلم حتى يفرغ منه، فأخذت عليه يومًا فقرأ سورة البقرة حتى انتهى إلى مكان قال: تدري فيم أنزلت؟ قلت: لا، قال: أنزلت في كذا وكذا ثم مضى، انتهى.
ورواه أيضًا من طريق أيوب، عن نافع، عن ابن عمر {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} قال: يأتيها في" انتهى.
ورواه أيضًا من طريق عبيد اللَّه، عن نافع، عن ابن عمر" انتهى.
هكذا ساق البخاري حديث ابن عمر من ثلاثة طرق وأبهم معنى الآية، إما أنه أراد التأكد من قول ابن عمر فتركُ الفراغ لأجله، ولما لم يتأكد ذلك ترك الفراغ باقيا، أو نسيه. وإلا فالرواية الصحيحة من طريق ابن عون كما ذكره ابن جرير صريح في إتيان النساء في أدبارهن. فترك الفراغ من البخاري يؤكد أنه لا يرى إباحة ذلك، كما لا يرى نسبته إلى ابن عمر لورود أحاديث النهي عن ذلك، ولذا ذكر الحميدي في الجمع بين الصحيحين (1440): يأتيها فيه: يعني الفرج، فزاد من فهمه بأن هذا من مذهب البخاري، وبهذا صار قول البخاري مثل قول جمهور أهل العلم: أبو حنيفة والشافعي في الجديد وأحمد وغيرهم إلا مالكا فقد قال معن: وسمعت مالكا يقول: ما علمت حرامًا، ذكره النسائي في الكبرى (8/ 191).
وأما ابن عمر فقد روي عنه خلاف هذا.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাফে' (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন কুরআন পাঠ করতেন, তখন তিনি কথা বলতেন না। (নাফে' বলেন) একদিন আমি তাকে এই আয়াতটি পড়ে শোনালাম। তিনি (ইবনু উমর) বললেন: তুমি কি জানো, এই আয়াতটি কাদের সম্পর্কে নাযিল হয়েছে? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: এটি নারীদের পশ্চাৎদ্বারে সহবাস করার বিষয়ে নাযিল হয়েছে।
11772 - عن أبي النضر أنه قال لنافع: إنه قد أكثر عليك القول: إنك تقول عن ابن عمر: إنه أفتى أن تُؤتى النساء في أدبارهن، قال: نافع، كذبوا علي، ولكني سأخبرك كيف كان الأمر: إن ابن عمر عرض المصحف يومًا، وأنا عنده حتى بلغ قوله عز وجل: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ} قال: يا نافع، هل تعلم من أمر هذه الآية؟ قال: قلت: لا، قال: إنا كنا معشر قريش نجبّي النساء، فلما دخلنا المدينة، ونكحنا نساء الأنصار، أردنا منهن مثل الذي نريد، فإذا هن قد كرهن وأعظمن ذلك، وكانت نساء الأنصار قد أخذن بحال اليهود، إنما يؤتين على جنوبهن، فأنزل اللَّه تعالى: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ}.
حسن: رواه الطحاوي في مشكله (15/ 424) من حديث المفضل بن فضالة، عن عبد اللَّه، عن كعب بن علقمة، عن أبي النضر أنه قال: فذكره.
ورواه النسائي في الكبرى (8929) من حديث المفضل إلا أنه قال: حدثني عبد اللَّه بن سليمان، عن كعب بإسناده نحوه.
وعبد اللَّه هو ابن عياش بن عباس أبو حفص المصري مختلف فيه ولكن تابعه عبد اللَّه بن سليمان وهو ابن زرعة الحميري الطويل، وهو أيضًا مختلف فيه ولكن يقوي أحدهما الآخر ورسم الحديث الحسن.
ولكن يرى مالك أن القول الصحيح عن ابن عمر جواز إتيان الرجل امرأته في دبرها، فقد روى ابن جرير في تفسيره (3/ 752) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن مالك بن أنس أنه قيل له: يا أبا عبد اللَّه، إن الناس يروون عن سالم:"كذب العبد، أو: العلجُ، على أبي"! فقال مالك: أشهد على يزيد بن رومان أنه أخبرني عن سالم بن عبد اللَّه، عن ابن عمر مثل ما قال نافع. فقيل له: فإنّ الحارث بن يعقوب يروي عن أبي الحباب سعيد بن يسار أنه سأل ابن عمر فقال له: يا أبا عبد الرحمن، إنا نشتري الجواري فنُحمِّض لهن؟ فقال: وما التحميض؟ قال: الدُّبُر. فقال ابن عمر: أفْ! أفْ! يفعل ذلك مؤمن؟ ! -أو قال: مسلم! - فقال مالك: أشهد على ربيعة لأخبرني عن أبي الحباب، عن ابن عمر، مثل ما قال نافع وكان ميمون بن مهران يقول عندما ذكر له عن نافع ما حكي عنه من إباحة النساء في أدبارهن فقال: إنما قال ذلك نافع بعد ما كبر، وذهب عقله، رواه الطحاوي في مشكله (15/ 426).
وقال الطحاوي: وقد روي عن سالم نفي ذلك عن ابن عمر كما حدّثنا ابن أبي داود، حدّثنا ابن أبي مريم، أخبرنا عطاف بن خالد، عن موسى بن عبد اللَّه بن الحسن، أن أباه سأل سالم بن عبد اللَّه أن يحدثه بحديث نافع، عن ابن عمر، أنه كان لا يرى بأسًا في إتيان النساء في أدبارهن، فقال سالم: كذب العبد، أو قال: أخطأ، إنما قال: لا بأس أن يؤتين في فروجهن من أدبارهن.
وبناء على هذه الآثار ذهب بعض أهل العلم إلى أن القول الصحيح عن ابن عمر المنع، ولعله كان يقول بجوازه قبل هذا اجتهادًا منه، فلما بلغه النهي رجع إلى تحريمه.
وأما ما روي عن أبي سعيد الخدري أن رجلا أصاب امرأة في دبرها، فأنكر الناس عليه ذلك فأنزل اللَّه: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ} فهو ضعيف.
رواه الطحاوي في مشكله (6118) عن أحمد بن داود بن موسى، حدّثنا يعقوب بن كاسب، حدّثنا عبد اللَّه بن نافع، عن هشام بن سعد، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
يعقوب بن كاسب هو يعقوب بن حميد بن كاسب المدني قد ينسب إلى جده ضعفه ابن معين وأبو حاتم والنسائي وغيرهم. ولا تنفع متابعة الحارث بن سريج له فإنه ضعيف جدا، بل كذبه بعض العلماء، ومن طريقه رواه أبو يعلى (1103) بإسناده عن أبي سعيد قال: أبعر رجل امرأته على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالوا: أبعر فلان امرأته فأنزل اللَّه: {نِسَاؤُكُمْ حَرْثٌ لَكُمْ فَأْتُوا حَرْثَكُمْ أَنَّى شِئْتُمْ}.
وقوله:"أبعر رجل امرأته" أي أتى مكان خروج البعر من الأمعاء وهو الدبر.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে বর্ণিত, আবুন নাদর (আবুন নাযার) নাফি'কে বললেন: আপনার উপর এই কথাটি অনেক বেশি আরোপিত হয়েছে যে আপনি নাকি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বরাতে বলেন যে, তিনি মহিলাদের গুহ্যদ্বারে সহবাসের ফতোয়া দিয়েছেন। নাফি' বললেন: তারা আমার উপর মিথ্যা আরোপ করেছে। তবে আমি আপনাকে বলবো বিষয়টি আসলে কেমন ছিল। একদিন ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে কোরআন পেশ করলেন, আমি তাঁর পাশেই ছিলাম। তিনি যখন মহান আল্লাহর এই বাণী পর্যন্ত পৌঁছলেন: {তোমাদের স্ত্রীরা তোমাদের শস্যক্ষেত্র।} তিনি বললেন: হে নাফি'! আপনি কি এই আয়াতটির প্রেক্ষাপট সম্পর্কে জানেন? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: আমরা কুরাইশরা মহিলাদের সাথে (সম্মুখ দিকে) শুইয়ে মিলিত হতাম। যখন আমরা মদিনায় প্রবেশ করলাম এবং আনসারী মহিলাদের বিবাহ করলাম, তখন আমরা তাদের সাথে আমাদের পূর্বের আকাঙ্ক্ষা অনুযায়ী মিলিত হতে চাইলাম। কিন্তু তারা তা অপছন্দ করলো এবং এটিকে বড় করে দেখলো। কারণ আনসারী মহিলারা ইহুদিদের রীতি অনুসরণ করতো, তাদের সাথে পার্শ্বদেশ দিয়ে শুইয়ে (যোনিপথে) মিলিত হওয়া হতো। তখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {তোমাদের স্ত্রীরা তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো।}
(এই বর্ণনাটি) হাসান (শ্রেণির)। এটি তাহাবী তাঁর ‘মুশকিল’ গ্রন্থে (১৫/৪২৪) মুফাদদাল ইবনে ফাদালাহ, তিনি আবদুল্লাহ, তিনি কা'ব ইবনে আলকামাহ, তিনি আবুন নাদর থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি (আবুন নাদর) উক্ত হাদিসটি বর্ণনা করেছেন। নাসায়ীও এটি ‘কুবরা’ গ্রন্থে (৮৯২৯) মুফাদদাল থেকে বর্ণনা করেছেন। তবে তিনি বলেছেন: আমাকে আবদুল্লাহ ইবনে সুলাইমান, তিনি কা'ব থেকে তার সনদসহ একই রকম বর্ণনা করেছেন। এই আবদুল্লাহ হলেন আবদুল্লাহ ইবনে আইয়াশ ইবনে আব্বাস আবু হাফস আল-মিসরী, যিনি সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে। তবে তাকে আবদুল্লাহ ইবনে সুলাইমান—যিনি ইবনে জুরআহ আল-হিমইয়ারী আত-তাভীল—তিনি অনুসরণ করেছেন। তিনিও যদিও মতভেদের শিকার, তবে একজন আরেকজনকে শক্তিশালী করেছে এবং হাদিসটি হাসান (শ্রেণির) হিসেবে চিহ্নিত হয়েছে।
তবে ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) মনে করেন যে ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সঠিক বর্ণনা হলো—পুরুষের জন্য তার স্ত্রীর গুহ্যদ্বারে সহবাস করা বৈধ। ইবনে জারীর তাঁর তাফসীর গ্রন্থে (৩/৭৫২) আবদুর রহমান ইবনে কাসিম-এর সূত্রে মালিক ইবনে আনাস (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তাঁকে বলা হয়েছিল: হে আবু আবদুল্লাহ! লোকেরা সালিম (ইবনে আবদুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করে যে, "ঐ দাস/দাসটি আমার পিতার (অর্থাৎ ইবনে উমর) উপর মিথ্যা বলেছে!" তখন মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: আমি ইয়াযীদ ইবনে রুমানের ব্যাপারে সাক্ষ্য দিচ্ছি, তিনি আমাকে সালিম ইবনে আবদুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে ঠিক তেমনই বর্ণনা করেছেন যেমনটি নাফি' বলেছেন। তখন তাঁকে (ইমাম মালিককে) বলা হলো: হারিস ইবনে ইয়াকুব তো আবু হুবাব সাঈদ ইবনে ইয়াসার থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন: হে আবু আবদুর রহমান! আমরা দাসী ক্রয় করি এবং তাদের ‘তাহমীদ’ করি? তিনি বললেন: ‘তাহমীদ’ কী? তিনি বললেন: গুহ্যদ্বার। তখন ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'উফ! উফ! কোনো মুমিন কি এমন কাজ করতে পারে?!' —অথবা তিনি বললেন: ‘কোনো মুসলিম!’ তখন ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: আমি রাবী'আহর ব্যাপারে সাক্ষ্য দিচ্ছি, তিনি আমাকে আবু হুবাব-এর মাধ্যমে ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে ঠিক তেমনই বর্ণনা করেছেন যেমনটি নাফি' বলেছেন। আর মাইমুন ইবনে মিহরান (রাহিমাহুল্লাহ)-কে যখন নাফি'র পক্ষ থেকে মহিলাদের গুহ্যদ্বারে সহবাস বৈধ করার বর্ণনা সম্পর্কে বলা হলো, তখন তিনি বললেন: নাফি' এই কথাটি বলেছেন তার বৃদ্ধ বয়সে, যখন তার জ্ঞান লোপ পেয়েছিল। এটি তাহাবী তাঁর ‘মুশকিল’ গ্রন্থে (১৫/৪২৬) বর্ণনা করেছেন।
আর তাহাবী বলেছেন: সালিম (ইবনে আবদুল্লাহ) থেকে এই বিষয়টি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে নাকচ করার বর্ণনাও এসেছে। যেমন—ইবনে আবি দাউদ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি ইবনে আবি মারইয়াম থেকে, তিনি আত্তাফ ইবনে খালিদ থেকে, তিনি মূসা ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে হাসান থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তার পিতা সালিম ইবনে আবদুল্লাহ-কে নাফি'র সেই হাদিসটি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলেন—যা ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত ছিল যে, তিনি নাকি মহিলাদের গুহ্যদ্বারে সহবাসে কোনো অসুবিধা দেখতেন না। তখন সালিম বললেন: ঐ দাস মিথ্যা বলেছে, অথবা তিনি বললেন: ভুল বলেছে। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তো শুধু এইটুকুই বলেছিলেন: মহিলাদের সাথে তাদের যোনিপথে পেছনের দিক থেকে (অর্থাৎ ভিন্ন ভঙ্গিমায়) মিলিত হতে কোনো অসুবিধা নেই।
এই বর্ণনাগুলোর ভিত্তিতে কিছু আলেম এই মত পোষণ করেন যে, ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সঠিক বর্ণনা হলো নিষেধের। হতে পারে তিনি এর আগে ইজতিহাদ করে এটিকে বৈধ বলতেন, কিন্তু যখন তার কাছে নিষেধের বিধান পৌঁছল, তখন তিনি তা হারাম বলে ফিরে আসেন।
আর আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, এক ব্যক্তি তার স্ত্রীর গুহ্যদ্বারে সহবাস করেছিল, তখন লোকেরা তা অপছন্দ করেছিল। ফলে আল্লাহ তাআলা নাযিল করেন: {তোমাদের স্ত্রীরা তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো}—এই বর্ণনাটি দুর্বল। এটি তাহাবী তাঁর ‘মুশকিল’ গ্রন্থে (৬১১৮) আহমদ ইবনে দাউদ ইবনে মূসা, তিনি ইয়াকুব ইবনে কাসিব, তিনি আবদুল্লাহ ইবনে নাফি', তিনি হিশাম ইবনে সা'দ, তিনি যায়দ ইবনে আসলাম, তিনি আতা ইবনে ইয়াসার, তিনি আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। ইয়াকুব ইবনে কাসিব হলেন ইয়াকুব ইবনে হুমায়দ ইবনে কাসিব আল-মাদানী, যাকে মাঝে মাঝে তার দাদার দিকে সম্পর্কিত করা হয়। তাকে ইবনে মাঈন, আবু হাতিম, নাসায়ী এবং অন্যরা দুর্বল বলেছেন। হারিস ইবনে সুরইয়জ তার সমর্থন করলেও তা কোনো কাজে আসে না, কারণ তিনিও অত্যন্ত দুর্বল, বরং কিছু আলেম তাকে মিথ্যাবাদী আখ্যা দিয়েছেন। তার সূত্রে আবু ইয়া'লা (১১০৩) আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে এক ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে পশ্চাৎদেশ দিয়ে সহবাস করেছিল। তখন লোকেরা বললো: অমুক ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে পশ্চাৎদেশ দিয়ে সহবাস করেছে। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {তোমাদের স্ত্রীরা তোমাদের শস্যক্ষেত্র। সুতরাং তোমরা তোমাদের শস্যক্ষেত্রে যেভাবে ইচ্ছা গমন করো।} তার এই কথা: "এক ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে পশ্চাৎদেশ দিয়ে সহবাস করেছিল" (أبعر رجل امرأته) অর্থ হলো—সে নাড়িভুঁড়ির বর্জ্য বের হওয়ার স্থানে (অর্থাৎ গুহ্যদ্বারে) প্রবেশ করেছিল।
11773 - عن جابر بن عبد اللَّه -وهو يحدّث عن حجة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فسرد القصة إلى أن ذكر خطبة النبي صلى الله عليه وسلم يوم عرفة، وأنه صلى الله عليه وسلم ذكر النساء فقال:"فاتقوا اللَّه في النساء، فإنكم أخذتموهن بأمان اللَّه، واستحللتم فروجهن بكلمة اللَّه، ولكم عليهن أن لا يوطئن فرشكم أحدًا تكرهونه، فإن فعلن ذلك فاضربوهن ضربًا غير مبرّح، ولهن عليكم رزقهن وكسوتهن بالمعروف. ." الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طرق عن حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، قال: دخلنا على جابر بن عبد اللَّه فذكره.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর হজ্জের বর্ণনা দিতে গিয়ে আরাফাতের দিনে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর খুতবা উল্লেখ করলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নারীদের সম্পর্কে আলোচনা করতে গিয়ে বলেন: "অতএব, তোমরা নারীদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করো, কারণ তোমরা তাদেরকে আল্লাহর আমানত হিসেবে গ্রহণ করেছ এবং আল্লাহর কালেমার মাধ্যমে তাদের লজ্জাস্থান হালাল করেছো। তোমাদের ওপর তাদের ব্যাপারে এ অধিকার রয়েছে যে, তারা যেন তোমাদের বিছানায় এমন কাউকে স্থান না দেয় যাকে তোমরা অপছন্দ করো। যদি তারা তা করে, তবে তোমরা তাদেরকে এমনভাবে প্রহার করবে যা গুরুতর নয় (আঘাত হানবে না)। আর তোমাদের ওপর তাদের অধিকার হলো, তোমরা উত্তম পন্থায় তাদের ভরণপোষণ ও পোশাকের ব্যবস্থা করবে।" (সম্পূর্ণ হাদীস)।
11774 - عن معقل بن يسار قال: كانت لي أخت تخطب إليّ، فأتاني ابن عم لي، فأنكحتها إياه، ثم طلّقها طلاقًا له رجعة ثم تركها، حتى انقضت عدتها، فلما خطبت إليّ أتاني يخطبها فقلت: واللَّه لا أنكحها أبدًا، قال: ففيّ نزلت هذه الآية: {وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَنْ يَنْكِحْنَ أَزْوَاجَهُنَّ} قال: فكفرت عن يميني فأنكحتها إياه.
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4529) وأبو داود (2087) واللفظ له، كلاهما من حديث أبي عامر العقدي، حدّثنا عباد بن راشد، حدّثنا الحسن، قال: حدثني معقل بن يسار فذكره.
قال البخاري: وقال إبراهيم، عن يونس، عن الحسن، حدثني معقل بن يسار، وحدثنا أبو معمر، حدّثنا عبد الوارث، حدئنا يونس، عن الحسن: أن أخت معقل بن يسار طلقها زوجها، فتركها حتى انقضت عدتها، فخطبها، فأبى معقل، فنزلت: {فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَنْ يَنْكِحْنَ أَزْوَاجَهُنَّ} أخرج البخاري من ثلاثة طرق، ولم يسق لفظ الحديث إلا في الطريق الثالث، وفيه إرسال، فإن الحسن لم يحضر القصة ولكن في الطرق الأخرى التصريح بالسماع من معقل بن يسار.
وقول البخاري:"وقال إبراهيم" موصول في كتاب النكاح (5130) وساقه هنا لبيان سماع الحسن من معقل بن يسار، وساق ابن جرير الطبري في تفسيره عدة روايات بأنها نزلت في معقل بن يسار المدني وأخته.
وأخرجه الترمذيّ (2981) من وجه آخر عن الحسن، عن معقل بن يسار فذكر نحوه، وقال:"هذا حديث صحيح، وقد روي من غير وجه عن الحسن".
واستنبط من الحديث فقال:"وفي هذا الحديث دلالة على أنه لا يجوز النكاح بغير ولي، لأن أخت معقل بن يسار كانت ثيبًا، فلو كان الأمر إليها دون وليها لزوجت نفسها، ولم تحتج إلى وليها معقل بن يسار، وإنما خاطب اللَّه في الآية الأولياء فقال: {فَلَا تَعْضُلُوهُنَّ أَنْ يَنْكِحْنَ أَزْوَاجَهُنَّ} ففي هذه الآية دلالة على أن الأمر إلى الأولياء في التزويج مع رضاهن".
وقيل: إن الآية نزلت في جابر بن عبد اللَّه الأنصاري كانت له ابنة عم فطلقها زوجها تطليقة فانقضت عدتها، ثم رجع يريد رجعتها، فأما جابر فقال: طلقت ابنة عمنا، ثم تريد أن تنكحها الثانية؟ وكانت المرأة تريد زوجها الأول، فنزلت هذه الآية إلا أنها لا تصح.
وأما ظاهر الآية فيدل على مضمون ما ذكر وهو أن يطلق الرجل زوجته تطليقة أو تطليقتين، ثم تنقضي عدتها فيريد أن يتزوجها، والمرأة راضية أن ترجع إلى زوجها فيمنع أولياؤها حمية فقال اللَّه مخاطبا هؤلاء الأولياء: أي: لا تمنعونهن أن يرجعن إلى أزواجهن بنكاح جديد.
{إِذَا تَرَاضَوْا بَيْنَهُمْ بِالْمَعْرُوفِ} أي إذا رضيت المرأة أن ترجع إلى زوجها الأول، فيحرم على أوليائها مضارتها بعضهن بمنعها عمن أراد نكاحها من أزواج كانوا لهن.
وأصل العضل: الضيق.
মা'কিল ইবনে ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার একটি বোন ছিল, যার জন্য আমার কাছে বিয়ের প্রস্তাব আসত। আমার এক চাচাতো ভাই আমার কাছে এসে তার কাছে বিয়ের প্রস্তাব দিল। আমি তাকে তার সাথে বিয়ে দিলাম। এরপর সে তাকে এমন তালাকে রাজঈ (প্রত্যাহারযোগ্য তালাক) দিল, যার পর সে তাকে ছেড়ে দিল যতক্ষণ না তার ইদ্দতকাল শেষ হলো। যখন [অন্যদের পক্ষ থেকে] তার কাছে বিয়ের প্রস্তাব আসছিল, তখন সে (চাচাতো ভাই) আবার তাকে বিয়ে করার প্রস্তাব নিয়ে আমার কাছে এলো। আমি বললাম: আল্লাহর শপথ! আমি আর কখনোই তাকে তোমার সাথে বিয়ে দেব না! তিনি (মা'কিল) বলেন: তখন আমার ব্যাপারেই এই আয়াতটি নাযিল হয়: {আর যখন তোমরা স্ত্রীদের তালাক দেবে এবং তারা তাদের ইদ্দতকাল পূর্ণ করবে, তখন তারা যদি নিজেদের স্বামী-স্ত্রীর সাথে ন্যায্যভাবে সম্মত হয়, তবে তাদেরকে [তাদের পূর্বতন] স্বামী-স্ত্রীর সাথে বিবাহ করতে বাধা দিও না।} (সূরাহ আল-বাকারা ২:২৩২)। তিনি (মা'কিল) বলেন: এরপর আমি আমার শপথের কাফফারা দিলাম এবং তাকে তার সাথে বিয়ে দিলাম।
11775 - عن زينب بنت أبي سلمة قالت: دخلت على أم حبيبة، زوج النبي صلى الله عليه وسلم، حين توفي أبوها أبو سفيان بن حرب، فدعت أم حبيبة بطيب فيه صفرة خلوق أو غيره، فدهنت منه جارية، ثم مسحت بعارضيها، ثم قالت: واللَّه، ما لي بالطيب من حاجة، غير أني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحل لامرأة تؤمن باللَّه واليوم الآخر أن تحد على ميت فوق ثلاث ليال، إلا على زوج أربعة أشهر وعشرا".
قالت زينب: ثم دخلت على زينب بنت جحش زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين توفي أخوها، فدعت بطيب فمست منه، ثم قالت: واللَّه ما لي بالطيب حاجة غير أني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يحل لامرأة تؤمن باللَّه واليوم الآخر تحد على ميت فوق ثلاث ليال، إلا على زوج أربعة أشهر وعشرا".
قالت زينب: وسمعت أمي أم سلمة، زوج النبي صلى الله عليه وسلم تقول: جاءت امرأة إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسول اللَّه، إن ابنتي توفي عنها زوجها، وقد اشتكت عينيها أفتكحلهما؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا" مرتين أو ثلاثا كل ذلك يقول:"لا". ثم قال:"إنما هي أربعة أشهر وعشرا، وقد كانت إحداكن في الجاهلية ترمي بالبعرة على رأس الحول".
قال حميد بن نافع: فقلت لزينب: وما لرمي بالبعرة على رأس الحول؟ فقالت زينب: كانت المرأة إذا توفي عنها زوجها، دخلت حفشا ولبست شر ثيابها، ولم تمس طيبا ولا شيئًا حتى تمر بها سنة ثم تؤتى بدابة -حمار أو شاة أو طير- فتفتض به، فقلما تفتض بشيء إلا مات، ثم تخرج فتعطى بعرة فترمي بها، ثم تراجع بعد ما شاءت من طيب أو غيره.
قال مالك: والحفش: البيت الرديء، وتفتض: تمسح به جلدها كالنشرة.
متفق عليه: رواه مالك في الطلاق (1266 - 1270) عن عبد اللَّه بن أبي بكر بن محمد بن عمرو
ابن حزم، عن حميد بن نافع، عن زينب بنت أبي سلمة، أنها أخبرته هذه الأحاديث الثلاثة، قالت زينب: فذكرتها.
ورواه البخاريّ في الطلاق (5334 - 5336) ومسلم في الطلاق (1486 - 1488) كلاهما من طريق مالك به.
যায়নাব বিনত আবী সালামা (রাহিমাহাল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম, যখন তাঁর পিতা আবু সুফিয়ান ইবনু হারব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইন্তিকাল করলেন। তখন উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হলুদ রং মিশ্রিত সুগন্ধি আনালেন, যা খলূক (এক প্রকার সুগন্ধি) অথবা অন্য কিছু ছিল। তিনি তা থেকে কিছুটা এক দাসীকে মাখালেন, এরপর তিনি (নিজে) তার গালের দু'পাশে লাগালেন। অতঃপর তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! সুগন্ধির প্রতি আমার কোনো প্রয়োজন নেই। কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে নারী আল্লাহ্ ও আখিরাতের দিনের প্রতি বিশ্বাস রাখে, তার জন্য তিন দিনের বেশি কোনো মৃতের জন্য শোক পালন করা বৈধ নয়, তবে স্বামীর জন্য (শোক পালন করতে হবে) চার মাস দশ দিন।"
যায়নাব (বিনত আবী সালামা) বলেন: এরপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী যায়নাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম, যখন তাঁর ভাই ইন্তিকাল করলেন। তখন তিনি সুগন্ধি আনালেন এবং তা থেকে কিছুটা শরীরে মাখলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! সুগন্ধির প্রতি আমার কোনো প্রয়োজন নেই। কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে নারী আল্লাহ্ ও আখিরাতের দিনের প্রতি বিশ্বাস রাখে, তার জন্য তিন দিনের বেশি কোনো মৃতের জন্য শোক পালন বৈধ নয়, তবে স্বামীর জন্য (শোক পালন করতে হবে) চার মাস দশ দিন।"
যায়নাব (বিনত আবী সালামা) বলেন: আমি আমার আম্মা, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: এক মহিলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার মেয়ের স্বামী মারা গেছে এবং তার চোখে ব্যথা শুরু হয়েছে। সে কি চোখে সুরমা লাগাতে পারে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না,"—দুই বা তিনবার। প্রতিবারই তিনি বললেন: "না।" অতঃপর তিনি বললেন: "এটি মাত্র চার মাস দশ দিনের ব্যাপার। অথচ তোমাদের কেউ কেউ জাহিলী যুগে এক বছর পূর্ণ হওয়ার পর গোবর ছুঁড়ে মারত।"
হুমায়দ ইবনু নাফি’ বলেন: আমি যায়নাবকে জিজ্ঞাসা করলাম: এক বছর পূর্ণ হওয়ার পর গোবর ছুঁড়ে মারার অর্থ কী? যায়নাব (রাহিমাহাল্লাহ) বললেন: জাহিলী যুগে কোনো নারীর স্বামী ইন্তিকাল করলে সে একটি ছোট কুঠুরিতে প্রবেশ করত এবং নিকৃষ্টতম কাপড় পরিধান করত। এক বছর অতিবাহিত না হওয়া পর্যন্ত সে সুগন্ধি বা অন্য কিছু স্পর্শ করত না। এরপর তার জন্য কোনো জন্তু—গাধা, ছাগল বা পাখি—আনা হতো, যার মাধ্যমে সে ইদ্দত ভাঙত (ত্বকে স্পর্শ করত)। সে যা দিয়েই ইদ্দত ভাঙত, তার মৃত্যু ঘটত। এরপর সে বাইরে আসত এবং তাকে এক টুকরা গোবর দেওয়া হতো, যা সে ছুঁড়ে মারত। এরপর সে তার ইচ্ছামতো সুগন্ধি বা অন্য কিছু ব্যবহার করতে পারত।
ইমাম মালিক (রাহিমাহাল্লাহ) বলেন: 'আল-হাফশ' অর্থ খারাপ বা ছোট ঘর; এবং 'তাফতাদি' অর্থ হলো: ত্বকের উপর তা দিয়ে মাসাহ করা, যেমনটি ঝাড়-ফুঁক বা চিকিৎসার ক্ষেত্রে করা হয়।
11776 - عن عبد اللَّه بن مسعود في رجل تزوج امرأة فمات عنها، ولم يدخل بها، ولم يفرض لها الصداق، فقال: لها الصداق كاملا، وعليها العدة، ولها الميراث.
قال معقل بن سنان: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قضى في بروع بنت واشق.
صحيح: رواه أبو داود (2114)، والنسائي (3356)، وابن ماجه (1891) وصحّحه ابن حبان (4098)، والحاكم (2/ 180 - 181) كلهم من حديث عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن فراس، عن الشعبي، عن مسروق، عن عبد اللَّه فذكره.
ورواه أيضًا الترمذيّ (1145) من وجه آخر، عن ابن مسعود وقال:"حسن صحيح".
قوله: {أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا} أي: عدة المتوفى عنها زوجها إذا كانت غير حامل أربعة أشهر وعشرا، ويستثنى من هذا الأمةُ، فإن عدتها على النصف من عدة الحرة، وهي شهران وخمس ليال على قول جمهور أهل العلم، وخالفهم بعضهم فقالوا: لا فرق بين الحرة والأمة في العدة، لأن المقصود من العدة التأكد من خلو الرحم من الحمل، فيشترك فيه الحرة والأمة على حد سواء.
ومن أحكامها:
1 - أن تلتزم بيتها الذي مات فيه زوجها وهي ساكنة فيه، إلا أن يكون البيت مستأجرا أو ملكا لغير الزوج، فلها أن تخرج إلى بيت أهلها.
2 - ولا تخرج من بيتها إلا لحاجة أو ضرورة لمراجعة المستشفى أو أداء العمل الوظيفي، فإذا انتهت من حاجتها ترجع إلى بيتها، والليل والنهار فيه سواء.
3 - تجتنب أنواع الطيب ونحوها إلا إذا طهرت من حيضها، فلا بأس أن تتبخر بالبخور أو بغيره من الطيب، ولا مانع من تقديمها الطيب لأهلها أو ضيوفها من غير أن تشاركهم في ذلك.
4 - تجتنب الحلي من الذهب والفضة والألماس وغيرها، سواء كان ذلك قلائد أو أسورة حتى الخاتم أو غير ذلك.
5 - تجتنب استعمال الحناء والكحل وما أشبه الكحل من الأشياء، وكذلك تجتنب كل أنواع الزينة.
6 - تجتنب الملابس الجميلة، وتلبس ما سواه.
وأما الحامل المتوفى عنها زوجها ففي أصح أقوال أهل العلم مدتها وضع الحمل.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি এক মহিলাকে বিবাহ করল, কিন্তু তার সাথে সহবাসের আগেই লোকটি মারা গেল। আর সে (মৃত ব্যক্তি) তার জন্য কোনো মোহরও নির্দিষ্ট করেনি। [এ ব্যাপারে জিজ্ঞাসা করা হলে] তিনি বললেন: তার জন্য সম্পূর্ণ মোহর প্রাপ্য, তার উপর ইদ্দত পালন করা ওয়াজিব এবং সে মিরাসের (উত্তরাধিকারের) হকদার হবে।
মা'কিল ইবনু সিনান বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বারওয়া' বিনতে ওয়াশিক-এর ব্যাপারে এমন ফয়সালা করতে শুনেছি।
আল্লাহ্র বাণী: {চার মাস দশ দিন} অর্থাৎ, যে নারীর স্বামী মারা গিয়েছে এবং সে গর্ভবতী নয়, তার ইদ্দতকাল হলো চার মাস দশ দিন। এই বিধান থেকে দাসীকে ব্যতিক্রম করা হয়েছে। জমহুর উলামায়ে কেরামের (অধিকাংশ আলেমদের) মতে, দাসীর ইদ্দত হলো স্বাধীন নারীর ইদ্দতের অর্ধেক, যা হলো দুই মাস পাঁচ রাত। তবে তাদের মধ্যে কেউ কেউ মতপার্থক্য করে বলেছেন যে, ইদ্দতের ক্ষেত্রে স্বাধীন নারী ও দাসীর মধ্যে কোনো পার্থক্য নেই। কেননা ইদ্দতের উদ্দেশ্য হলো গর্ভাশয় গর্ভমুক্ত কি না তা নিশ্চিত হওয়া, আর এক্ষেত্রে স্বাধীন নারী ও দাসী উভয়েই সমানভাবে অংশীদার।
আর ইদ্দতের কয়েকটি বিধান হলো:
১। সে তার ঘরেই অবস্থান করবে যেখানে তার স্বামী মারা গিয়েছে এবং যেখানে সে বসবাস করত। তবে যদি বাড়িটি ভাড়া নেওয়া থাকে বা স্বামীর মালিকানাধীন না হয়, তাহলে সে তার বাবার বাড়িতে চলে যেতে পারবে।
২। কোনো প্রয়োজন বা অত্যাবশ্যকীয় কারণ ছাড়া সে তার বাড়ি থেকে বের হবে না, যেমন হাসপাতালে যাওয়া বা দাপ্তরিক কাজ সম্পাদন করা। যখন তার প্রয়োজন শেষ হবে, তখন সে বাড়িতে ফিরে আসবে। এক্ষেত্রে দিন ও রাত উভয়ই সমান।
৩। সে সকল প্রকার সুগন্ধি ও অনুরূপ জিনিস ব্যবহার করা থেকে বিরত থাকবে। তবে যখন সে তার মাসিক থেকে পবিত্র হবে, তখন ধূপ বা অন্য কোনো সুগন্ধি ব্যবহার করতে কোনো বাধা নেই। আর সে তার পরিবার বা অতিথিদের জন্য সুগন্ধি পেশ করতে পারবে, কিন্তু নিজে তাতে অংশ নেবে না।
৪। সে সোনা, রূপা, হীরা এবং অন্যান্য সকল প্রকার অলঙ্কার পরিহার করবে, চাই তা হার, চুড়ি বা এমনকি আংটিই হোক না কেন।
৫। সে মেহেদি, সুরমা এবং সুরমার মতো অন্যান্য জিনিস ব্যবহার করা থেকে বিরত থাকবে। একইভাবে সকল প্রকার সাজসজ্জা পরিহার করবে।
৬। সে সুন্দর ও জমকালো পোশাক পরিহার করবে এবং অন্য পোশাক পরবে।
আর যে গর্ভবতী নারীর স্বামী মারা গিয়েছে, অধিকাংশ নির্ভরযোগ্য আলেমদের মতে, তার ইদ্দতের সময়কাল হলো সন্তান প্রসব হওয়া পর্যন্ত।
11777 - عن المسور بن مخرمة أن سبيعة الأسلمية نُفِست بعد وفاة زوجها بليال، فقال
لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"قد حللت، فانكحي من شئت".
صحيح: رواه مالك في الطلاق (58) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن المسور بن مخرمة، فذكره. ورواه البخاريّ في الطلاق (5320) من طريق مالك به.
والمسألة مبسوطة في المنة الكبرى (6/ 455 - 45
আল-মিসওয়ার ইবন মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুবাইয়া আল-আসলামিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার স্বামীর মৃত্যুর কয়েক রাত পর সন্তান প্রসব করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি (ইদ্দত থেকে) মুক্ত হয়ে গেছ, সুতরাং যাকে ইচ্ছা বিবাহ করতে পারো।"
11778 - عن علي أن النبي صلى الله عليه وسلم قال يوم الخندق:"حبسونا عن صلاة الوسطى حتى غابت الشمس، ملأ اللَّه قبورهم وبيوتهم -أو أجوافهم- نارا".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4533)، ومسلم في المساجد (202: 627) كلاهما من حديث هشام (بن حسان القردوسي)، عن محمد (بن سيرين)، عن عبيدة (السلماني)، عن علي فذكره، واللفظ للبخاري.
وليس في لفظ مسلم:"أو أجوافهم".
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খন্দকের (যুদ্ধের) দিন বললেন: “তারা আমাদেরকে সালাতুল উস্তা (মধ্যবর্তী সালাত) থেকে বিরত রেখেছে যতক্ষণ না সূর্য অস্তমিত হয়েছে। আল্লাহ যেন তাদের কবর ও তাদের ঘরসমূহ—অথবা তাদের উদরসমূহ—আগুন দ্বারা পূর্ণ করে দেন।”
11779 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: حبس المشركون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن صلاة العصر حتى احمرت الشمس، أو اصفرت، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"شغلونا عن الصلاة الوسطى صلاة العصر، ملأ اللَّه أجوافهم وقبورهم نارا" أو قال:"حشا اللَّه أجوافهم وقبورهم نارا".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (628) عن عون بن سلام الكوفي، نا محمد بن طلحة اليامي، عن زبيد، عن مرة، عن عبد اللَّه فذكر الحديث.
আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুশরিকরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আসরের সালাত আদায় করা থেকে আটকে রেখেছিল, এমনকি সূর্য লাল হয়ে গিয়েছিল অথবা হলুদ হয়ে গিয়েছিল। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তারা আমাদের 'সালাতুল উসতা' (মধ্যবর্তী সালাত), অর্থাৎ আসরের সালাত থেকে বিরত রেখেছে। আল্লাহ তাদের পেট ও কবরগুলো আগুন দিয়ে ভরে দিন।" অথবা তিনি বলেছেন: "আল্লাহ তাদের পেট ও কবরগুলো আগুন দিয়ে পূর্ণ করে দিন।"
11780 - عن جابر بن عبد اللَّه أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال يوم الخندق:"ملأ اللَّه بيوتهم وقبورهم نارا كما شغلونا عن الصلاة الوسطى حتى غابت الشمس".
حسن: رواه البزار - كشف الأستار (390) من طرق عن محمد بن عبد الرحمن الطفاوي، عن أيوب، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عبد الرحمن الطفاوي فإنه حسن الحديث.
وأبو الزبير هو محمد بن مسلم بن تدرس معروف بالتدليس، لكن لم يتحقق لي تدليسه في هذا الحديث، لأنه ليس فيه مخالفة ولا نكارة، بل له عدة شواهد صحيحة.
জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খন্দকের যুদ্ধের দিন বললেন: "আল্লাহ তাদের ঘরসমূহ ও কবরসমূহ আগুনে পূর্ণ করে দিন, কারণ তারা আমাদেরকে 'সালাতুল উস্তা' (মধ্যবর্তী সালাত) আদায় করা থেকে সূর্য ডোবা পর্যন্ত ব্যস্ত রেখেছিল।"
11781 - عن كهيل بن حرملة النميري، عن أبي هريرة أقبل حتى نزل على أبي كلثوم الدوسي، فتذاكروا الصلاة الوسطى، فقال: اختلفنا فيها كما اختلفتم بفناء بيت
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وفينا الرجل الصالح أبو هاشم بن عتبة بن ربيعة بن عبد شمس، فقال: أنا أعلم لكم ذلك، فأتى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وكان جريئا عليه فاستأذن فدخل عليه، ثم خرج إلينا فأخبرنا أنها العصر.
حسن: رواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (557)، والبزار - كشف الأستار (391)، والطبراني في الكبير (7/ 361) كلهم من طريق صدقة بن خالد، ثنا خالد بن دهقان، حدثني خالد سبلان، عن كهيل بن حرملة فذكره.
وإسناده حسن من أجل خالد بن دهقان فإنه حسن الحديث كما سبق في كتاب الصلاة.
وأبو هاشم بن عتبة بن ربيعة بن عبد شمس القرشي يكنى أبا سفيان العبشي أسلم يوم الفتح، ونزل الشام إلى أن مات في خلافة عثمان.
وفي الباب أحاديث أخرى مذكورة في كتاب الصلاة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (মদীনা থেকে) এসে আবূ কুলসূম দাওসীর কাছে অবস্থান করলেন। তারা (সেখানে) 'সালাতুল উসতা' (মধ্যবর্তী সালাত) সম্পর্কে আলোচনা করছিলেন। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর গৃহের আঙিনায় আমরাও এ বিষয়ে তোমাদের মতো মতভেদ করেছিলাম। আমাদের মাঝে ছিলেন নেককার ব্যক্তি আবূ হাশিম ইবনু উতবাহ ইবনু রাবী‘আহ ইবনু আবদ শামস। তিনি বললেন: আমি তোমাদের জন্য এর সঠিক জ্ঞান আনব। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন। তিনি তাঁর প্রতি কিছুটা নির্ভীক ছিলেন। তিনি অনুমতি চাইলেন এবং তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন। অতঃপর তিনি আমাদের কাছে বেরিয়ে এসে জানালেন যে, সেটি হলো আসরের সালাত।
11782 - عن البراء بن عازب قال: نزلت هذه الآية {حافظوا على الصلوات وصلاة العصر} فقرأناها ما شاء اللَّه، ثم نسخها اللَّه فنزلت: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى} فقال رجل: كان جالسا عند شقيق له: هي إذن صلاة العصر، فقال البراء: قد أخبرتك كيف نزلت، وكيف نسخها اللَّه، واللَّه أعلم.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (630) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، أخبرنا يحيى بن آدم، حدّثنا الفضيل بن مرزوق، عن شقيق بن عقبة، عن البراء بن عازب فذكره.
قال مسلم: ورواه الأشجعي، عن سفيان الثوري، عن الأسود بن قيس، عن شقيق بن عقبة، عن البراء بن عازب قال: قرأناها مع النبي صلى الله عليه وسلم زمانا بمثل حديث فضيل بن مرزوق. انتهى.
يعني: {وصلاة العصر} كان زمنا من القرآن يقرأ، ثم نسخها اللَّه تعالى، فأنزل: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى}.
ويدل على ذلك قول عائشة وحفصة، فإنهما سمعتا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يقرأ بها ولم تدريا أنها نسخت.
আল-বারা’ ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এই আয়াতটি নাযিল হয়েছিল: {তোমরা সালাতসমূহ এবং আসরের সালাতের প্রতি যত্নবান হও} (حافظوا على الصلوات وصلاة العصر)। আমরা আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী তা পাঠ করতাম। অতঃপর আল্লাহ তা রহিত করে দিলেন এবং নাযিল করলেন: {তোমরা সালাতসমূহ এবং মধ্যবর্তী সালাতের প্রতি যত্নবান হও} (حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى)। তখন শাকীক (ইবনে উকবা)-এর কাছে বসা এক ব্যক্তি বললো: তাহলে এটি আসরের সালাতই (আল-উসতা)? আল-বারা’ বললেন: আমি তো তোমাকে বলেই দিলাম কিভাবে এটি নাযিল হয়েছিল এবং কিভাবে আল্লাহ এটি রহিত করেছেন। আল্লাহই সর্বজ্ঞ।
সহীহ। এটি মুসলিম তার মাসাজিদ অধ্যায়ে (৬৩০) ইসহাক ইবনে ইবরাহীম আল-হানযালি থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনে আদম থেকে, তিনি আল-ফুদাইল ইবনে মারযূক থেকে, তিনি শাকীক ইবনে উকবা থেকে, তিনি বারা’ ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
মুসলিম বলেন: এটি আল-আশজাঈও বর্ণনা করেছেন সুফিয়ান আস-সাওরী থেকে, তিনি আল-আসওয়াদ ইবনে কাইস থেকে, তিনি শাকীক ইবনে উকবা থেকে, তিনি বারা’ ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি (বারা’) বলেন: আমরা এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ফুদাইল ইবনে মারযূকের হাদীসের মতোই কিছুকাল পাঠ করেছিলাম। (বর্ণনা সমাপ্ত)।
অর্থাৎ: {ওয়া সালাতিল ‘আসর} (এবং আসরের সালাত) কুরআনের একটি অংশ ছিল যা কিছুকাল তেলাওয়াত করা হতো। অতঃপর আল্লাহ তাআলা তা রহিত করে দেন এবং নাযিল করেন: {তোমরা সালাতসমূহ এবং মধ্যবর্তী সালাতের প্রতি যত্নবান হও}।
আয়িশা ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্যও এর প্রমাণ বহন করে। কেননা তারা উভয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এটি তেলাওয়াত করতে শুনেছিলেন, কিন্তু তারা জানতেন না যে তা রহিত করা হয়েছে।
11783 - عن أبي يونس مولى عائشة أنه قال: أمرتني عائشة أن أكتب لها مصحفا، وقالت: إذا بلغت هذه الآية فآذنّي: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى} فلما بلغتها آذنتها، فأملت علي: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وصلاة العصر وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ (238)} قالت عائشة: سمعتها من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مالك في صلاة الجماعة (26) عن زيد بن أسلم، عن قعقاع بن حكيم، عن أبي يونس فذكره. ورواه مسلم في المساجد (629) من طريق مالك.
وفي معناه ما روي عن عمرو بن رافع مولى عمر بن الخطاب أنه كان يكتب المصاحف في عهد
أزواج النبي صلى الله عليه وسلم قال: فاستكتبتني حفصة مصحفا وقالت: إذا بلغت هذه الآية من سورة البقرة فلا تكتبها حتى تأتيني بها، فأملها عليك كما حفظتها من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: فلما بلغتها جئتها بالورقة التي أكتبها، فقالت: أكتب: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وصلاة العصر وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ (238)}.
رواه ابن حبان (6323)، والطحاوي في مشكله (2068) كلاهما من حديث يعقوب بن إبراهيم ابن سعد، عن أبيه إبراهيم بن سعد، عن ابن إسحاق قال: حدثني أبو جعفر محمد بن علي ونافع مولى عبد اللَّه بن عمر أن عمرو بن رافع مولى عمر بن الخطاب حدثهما أنه كان يكتب فذكره.
وعمرو بن رافع لم يوثقه غير ابن حبان والعجلي، ولم أجد له متابعا، ورواه مالك عن زيد بن أسلم عنه أنه قال: كنت أكتب مصحفا لحفصة أم المؤمنين فقالت: إذا بلغت هذه الآية فآذني: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ (238)} فلما بلغتها آذنتها فأملت علي: {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وصلاة العصر وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ (238)}.
هكذا رواه موقوفا فإن حفصة لم ترفع ذلك إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وقد اختلف في رفعه ووقفه ومداره على عمرو بن رافع، فمثل هذه الروايات لا تؤخذ في قراءة القرآن.
ولذا جرّد أمير المؤمنين عثمان بن عفان المصحف من القراءات المنسوخة، كما جرده من تفاسير الصحابة وفهومهم، فإنهم كانوا أحيانا يكتبون مع المصحف تفسيره الذي سمعوه من النبي صلى الله عليه وسلم أو فهموه من الآية الكريمة، هكذا حفظ اللَّه كتابه الكريم من الزيادة والنقصان.
وقوله: {وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ (238)} أي مطيعين.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর মুক্ত দাস আবূ ইউনুস বলেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে নির্দেশ দিলেন যে আমি যেন তাঁর জন্য একটি মুসহাফ (কুরআনের কপি) লিখি। তিনি বললেন: যখন তুমি এই আয়াতে পৌঁছবে, তখন আমাকে জানাবে: "তোমরা সালাতসমূহ ও মধ্যবর্তী সালাতের প্রতি যত্নবান হও (২:২৩৮)।"
আবূ ইউনুস বলেন: যখন আমি তাতে পৌঁছলাম, তখন আমি তাঁকে জানালাম। অতঃপর তিনি আমাকে মুখে মুখে (ইমলা করে) বললেন: "তোমরা সালাতসমূহ, মধ্যবর্তী সালাত এবং আসরের সালাতের প্রতি যত্নবান হও এবং আল্লাহর জন্য বিনয়ী হয়ে দাঁড়াও (২৩৮)।"
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।
এর সমার্থে বর্ণিত হয়েছে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুক্ত দাস আমর ইবনু রাফে' থেকে, যে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণের যুগে মুসহাফ লিখতেন। তিনি বলেন: হাফসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে একটি মুসহাফ লেখার নির্দেশ দিলেন এবং বললেন: যখন তুমি সূরা বাকারার এই আয়াতে পৌঁছবে, তখন সেটি লিখবে না যতক্ষণ না তুমি আমার কাছে আসো। তখন আমি এটি তোমার ওপর ইমলা (মুখে মুখে বলে) করব, যেভাবে আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে মুখস্থ করেছি। তিনি বলেন: আমি যখন তাতে পৌঁছলাম, তখন আমি তাঁকে লেখা পাতাটি দেখালাম। অতঃপর তিনি বললেন: লেখো: "তোমরা সালাতসমূহ, মধ্যবর্তী সালাত এবং আসরের সালাতের প্রতি যত্নবান হও এবং আল্লাহর জন্য বিনয়ী হয়ে দাঁড়াও (২৩৮)।"
আর একারণেই আমীরুল মুমিনীন উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মনসূখ (বাতিল) হয়ে যাওয়া কিরাতসমূহ থেকে মুসহাফকে মুক্ত করেন, যেমন তিনি একে সাহাবীদের তাফসীর ও তাদের বোধগম্যতা থেকেও মুক্ত করেন। কেননা তারা কখনো কখনো মুসহাফের সাথে সেই তাফসীরও লিখতেন যা তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছিলেন অথবা আয়াত থেকে বুঝেছিলেন। এভাবেই আল্লাহ তা'আলা তাঁর কিতাবকে কম-বেশি হওয়া থেকে সংরক্ষণ করেছেন।
আর তাঁর বাণী: "তোমরা আল্লাহর জন্য বিনয়ী হয়ে দাঁড়াও (২৩৮)"—এর অর্থ হলো: অনুগত হয়ে।
11784 - عن زيد بن أرقم قال: كنا نتكلم في الصلاة، يكلم أحدنا أخاه في حاجته، حتى نزلت هذه الآية {حَافِظُوا عَلَى الصَّلَوَاتِ وَالصَّلَاةِ الْوُسْطَى وَقُومُوا لِلَّهِ قَانِتِينَ (238)} فأمرنا بالسكوت، ونهينا عن الكلام.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4534)، ومسلم في المساجد (35: 539) كلاهما من حديث إسماعيل بن أبي خالد، عن الحارث بن شبيل، عن أبي عمرو الشيباني، عن زيد بن أرقف فذكره.
ولفظهما سواء إلا أن البخاري لم يذكر:"ونهينا عن الكلام".
القنوت: معناه العبادة والطاعة.
وروي عن أبي سعيد مرفوعا:"كل حرف من القرآن يذكر فيه الكنوت فهو الطاعة".
رواه أحمد (11711) وفيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف، وشيخه دراج روى عن أبي الهيثم وفيه ضعف.
وفي معناه أحاديث أخرى، انظر كتاب الصلاة.
যায়েদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা সালাতের মধ্যে কথা বলতাম। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার ভাইকে তার প্রয়োজন সম্পর্কে কথা বলত। যতক্ষণ না এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমরা সালাতসমূহ এবং মধ্যবর্তী সালাতের প্রতি যত্নবান হও এবং আল্লাহর জন্য বিনয়ীভাবে (বা অনুগতভাবে) দাঁড়াও।" (সূরা বাকারা, ২৩৮)। অতঃপর আমাদের নীরব থাকার আদেশ দেওয়া হলো এবং (সালাতে) কথা বলতে নিষেধ করা হলো।
11785 - عن جابر قال: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: أي الصلاة أفضل؟ قال:"طول القنوت".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (756: 165) من طرق عن أبي معاوية، حدّثنا الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر قال: فذكره.
قوله:"طول القنوت": أي إطالة الصلاة - قيامها وركوعها وسجودها مع الخشوع وعدم الالتفات.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলো: কোন সালাত (নামাজ) সর্বোত্তম? তিনি বললেন: "দীর্ঘ কুনুত।"
11786 - عن نافع أن ابن عمر كان إذا سئل عن صلاة الخوف قال: فذكر صفة صلاة الخوف ثم قال: فإن كان خوف هو أشدّ من ذلك صلوا رجالًا قياما على أقدامكم، أو ركبانا مستقبلي القبلة أو غير مستقبليها.
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الخوف (3) عن نافع، فذكره.
قال مالك: قال نافع: لا أرى عبد اللَّه بن عمر ذكر ذلك إلا عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. ورواه البخاري في التفسير (4535) من طريق مالك به. ورواه مسلم في صلاة الخوف (306: 839) من حديث موسى بن عقبة، عن نافع. وجاء فيه: وقال ابن عمر: فإذا كان خوف أكثر من ذلك فصل راكبًا، أو قائما تومئ إيماءًا.
وقوله: {فَرِجَالًا} أي فصلوا را جلين، وهو جمع راجل، كقائم وقيام.
وقوله: {أَوْ رُكْبَانًا} أي أو فصلوا ركبانا جمع راكب.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে যখন সালাতুল খাওফ (ভয়ের সালাত) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হতো, তখন তিনি সালাতুল খাওফের পদ্ধতি বর্ণনা করতেন। অতঃপর তিনি বলতেন: যদি এমন ভয় উপস্থিত হয় যা তার (সাধারণ সালাতুল খাওফ) চেয়েও কঠিন, তবে তোমরা পদাতিক অবস্থায় তোমাদের পায়ের উপর দাঁড়িয়ে, অথবা আরোহিত অবস্থায় সালাত আদায় করো— কিবলামুখী হয়ে অথবা কিবলামুখী না হয়ে।
11787 - عن قال ابن الزبير: قلت لعثمان: هذه الآية التي في البقرة: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ بِأَنْفُسِهِنَّ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا} إلى قوله. {غَيْرَ إِخْرَاجٍ} قد نسختها الأخرى فلم تكتبها؟ قال: دعها يا ابن أخي، لا أغير شيئًا من مكانه.
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4536) عن عبد اللَّه بن أبي الأسود، حدّثنا حميد بن الأسود،
ويزيد بن زريع قالا: حدّثنا حبيب بن الشهيد، عن ابن أبي مليكة قال: قال ابن الزبير فذكره.
وروي نحوه عن مجاهد والحسن وعكرمة وقتادة والضحاك والربغ بن أنس ومقاتل بن حيان فقالوا: نسختها {أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَعَشْرًا} ذكره ابن أبي حاتم في تفسيره (2/ 452). انظر للمزيد: كتاب النكاح.
আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: বাকারাহ সূরার এই আয়াতটি—"আর তোমাদের মধ্যে যারা মৃত্যুবরণ করবে এবং স্ত্রী রেখে যাবে, তারা (স্ত্রীগণ) চার মাস দশ দিন অপেক্ষায় থাকবে" (২:২৩৪) থেকে শুরু করে তাঁর উক্তি {গাইরা ইখরাজিন} (বের করে না দেওয়া - ২:২৪০) পর্যন্ত—এটি তো অন্য আয়াত দ্বারা রহিত (মানসুখ) হয়ে গেছে, তাহলে আপনি কেন তা (কুরআনে) লিখলেন? তিনি (উসমান) বললেন: হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র, তুমি এটি ছেড়ে দাও। আমি এর স্থান থেকে কোনো কিছু পরিবর্তন করব না।