আল-জামি` আল-কামিল
11888 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اجتنبوا السبع الموبقات"، فذكر منها:"وأكل مال اليتيم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الوصايا (2766)، ومسلم في الإيمان (89) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، عن ثور بن زيد المدني، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة، فذكره.
وأما روي عن أبي سعيد الخدري قال: قلنا يا رسول اللَّه، حدّثنا ما رأيت ليلة الاسراء بك قال:"انطلق بي إلى خلق من خلق اللَّه كثير، رجال كل رجل منهم له مشفران كمشفر البعير، وهو موكل بهم، رجال يفكون لحى أحدهم، ثم يجاء بصخرة من نار، فتقذف في في أحدهم حتى تخرج من أسفله، وله خوار وصراخ، فقلت: يا جبريل! من هؤلاء؟ قال: هؤلاء الذين يأكلون أموال اليتامى ظلما، إنما يأكلون في بطونهم نارا وسيصلون سعيرا". فلا يصح.
رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 879) وفيه أبو هارون العبدي يروي عن أبي سعيد وهو عمارة بن جوين كذاب، قال ابن حبان:"كان يروي عن أبي سعيد ما ليس من حديثه، لا يحل كتب حديثه إلا على جهة التعجب".
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي برزة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: يبعث يوم القيامة قوم من قبورهم
تأجج أفواههم نارا، فقيل: من هم يا رسول اللَّه؟ قال: ألم تر اللَّه يقول: {إِنَّ الَّذِينَ يَأْكُلُونَ أَمْوَالَ الْيَتَامَى ظُلْمًا إِنَّمَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ نَارًا وَسَيَصْلَوْنَ سَعِيرًا}.
رواه ابن حبان (5566) وابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 879) كلاهما من حديث عقبة بن مكرم، حدّثنا يونس بن بكير، حدّثنا زياد بن المنذر، عن نافع بن الحارث، عن أبي برزة، قال: فذكره.
وزياد بن المنذر ضعيف جدا، بل نسبه ابن معين إلى الكذب، والعجب من ابن حبان أخرج حديثه هذا في صحيحه، وقال في المجروحين (359):"كان رافضيا يضع الحديث في مثالب أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، ويروي في فضائل أهل البيت أشياء ما لها أصول، لا يحل كتابة حديثه" ثم عاد فذكره في الثقات (6/ 326) فسبحان من لا ينسى.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাতটি ধ্বংসাত্মক কাজ থেকে বেঁচে থাকো।" অতঃপর তিনি সেগুলোর মধ্যে উল্লেখ করলেন: "এবং ইয়াতীমের সম্পদ ভক্ষণ করা।"
11889 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: جاءت امرأة سعد بن الربيع بابنتيها من سعد إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول اللَّه هاتان ابنتا سعد بن الربيع، قتل أبوهما معك يوم أحد شهيدا، وإن عمهما أخذ مالهما، فلم يدع لهما مالا، ولا تنكحان إلا ولهما مال، قال:"يقضي اللَّه في ذلك"، فنزلت آية الميراث، فبعث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إلى عمهما فقال:"أعط ابنتي سعد الثلثين، وأعط أمهما الثمن، وما بقي فهو لك".
حسن: رواه الترمذيّ (2092)، واللفظ له، وابن ماجه (2720) وأبو داود (2892) وأحمد (14798) كلهم من حديث عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح، لا نعرف إلا من حديث عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، وقد رواه شريك أيضًا عن عبد اللَّه بن عقيل".
قلت: إسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وأما أبو داود فرواه من هذا الوجه، وجعل القصة لثابت بن قيس، ثم رواه من هذا الوجه في قصة سعد بن الربيع، وقال: هذا هو أصح.
وذكر البخاري رحمه اللَّه تعالى حديث جابر بن عبد اللَّه في تفسير هذه الآية، وذكره في آخر سورة النساء في آية الكلالة أولى. وسيأتي في محله.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবন আর-রাবীর স্ত্রী তাঁর দুই মেয়েকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এরা সা'দ ইবন আর-রাবীর দুই মেয়ে। তাদের পিতা উহুদ যুদ্ধের দিন আপনার সাথে শহীদ হয়েছিলেন। তাদের চাচা তাদের সম্পদ নিয়ে নিয়েছে। তাদের জন্য সে কোনো সম্পদই রাখেনি। তাদের জন্য সম্পদ না থাকলে তারা বিবাহবন্ধনে আবদ্ধ হতে পারবে না। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ এই বিষয়ে ফয়সালা করবেন।" এরপর মিরাসের (উত্তরাধিকারের) আয়াত নাযিল হলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের চাচার নিকট লোক পাঠালেন এবং বললেন: "সা'দের দুই মেয়েকে (সম্পদের) দুই-তৃতীয়াংশ দাও, আর তাদের মাকে এক-অষ্টমাংশ দাও, আর যা অবশিষ্ট থাকে তা তোমার।"
11890 - عن ابن عباس قال: كان المال للولد، وكانت الوصية للوالدين، فنسخ اللَّه من ذلك ما أحب، فجعل للذكر مثل حظ الأنثيين، وجعل للأبوين لكل واحد منهما السدس والثلث، وجعل للمرأة الثمن والربع، وللزوج الشطر والربع.
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4578) عن محمد بن يوسف، عن ورقاء، عن ابن أبي نجيح، عن عطاء، عن ابن عباس، قال: فذكره.
هذه الآيات والآية التي في آخر سورة النساء هن آيات الميراث، تشتمل على جل أحكام الفرائض إلا ميراث الجدة التي لها السدس، كما ثبت في السنة مع إجماع العلماء على ذلك.
وقوله: {وَإِنْ كَانَ رَجُلٌ يُورَثُ كَلَالَةً} الكلالة مشتقة من الإكليل، وهو الذي يحيط بالرأس من جوانبه، والمراد هنا من يرثه من حواشيه، لا أصوله مثل الأب أو الجد أو أعلاه، ذكورا وإناثا، ولا فروعه مثل الولد وولد الولد أو أدناه ذكورا وإناثا. وروي عن أبي بكر أنه سئل عن الكلالة فقال: أقول فيها برأيي، فإن يكن صوابا فمن اللَّه، وإن يكن خطأ فمن الشيطان، واللَّه ورسوله بريئان منه، الكلالة من لا ولد له، ولا والد، فلما ولي عمر ابن الخطاب قال: إني لأستحيي من اللَّه تعالى أن أخالف أبا بكر في رأي رآه.
رواه ابن جرير الطبري في تفسيره (6/ 475) من طريق عاصم الأحول، عن الشعبي قال: قال أبو بكر: فذكره. والشعبي لم يلق أبا بكر.
ولكن رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 883) والحاكم (2/ 303 - 304) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن سليمان الأحول، عن طاوس قال: سمعت عبد اللَّه بن عباس يقول: كنت آخر الناس عهدا بعمر بن الخطاب، فسمعته يقول: القول ما قلتُ. قلتُ: وما قلتَ؟ قال: الكلالة من لا ولد له ولا والد.
قال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
وهذا قول جمع من الصحابة، وهو قول الفقهاء السبعة والأئمة الأربعة، وجمهور السلف والخلف.
وقوله: {مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ تُوصُونَ بِهَا أَوْ دَيْنٍ} لقد أجمع العلماء سلفا وخلفا أن الدين مقدم
على الوصية، وإن كانت الوصية قدمت في الآية ذكرًا إلا أنها متأخرة عن الدين، لأن اللَّه تعالى لم يقصد منه الترتيب، وإنما قصد منه أن الشيئين يجب إخراجهما قبل تقسيم الميراث بين الورثة، والوصية لا تكون إلا من الثلث أو أقل بخلاف الدين فإنه قد يستغرق جميع ماله.
وروي فيه عن النبي صلى الله عليه وسلم حديث ضعيف، وهو ما رواه علي بن أبي طالب قال: قضى محمد صلى الله عليه وسلم أن الدين قبل الوصية، وأنتم تقرؤون الوصية قبل الدين.
رواه الترمذيّ (2095) وابن ماجه (2839) وأحمد (595) كلهم من حديث أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث لا نعرفه إلا من حديث أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي، وقد تكلم بعض أهل العلم في الحارث، والعمل على هذا الحديث عند أهل العلم".
قلت: وهو كما قال، فإن الحارث هو ابن عبد اللَّه الأعور الهمداني ضعيف باتفاق أهل العلم، قال ابن عدي:"عامة ما يرويه غير محفوظ". وقال ابن حبان:"كان الحارث غاليا في التشيع واهيا في الحديث".
والوصية يجب أن تكون على العدل، لا على الإضرار بالورثة، فإنه يعتبر من الظلم، وقد روي عن ابن عباس موقوفًا: الاضرار في الوصية من الكبائر. وروي مرفوعًا ولا يصح.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (প্রাথমিকভাবে) সম্পদ ছিল সন্তানের জন্য, আর ওসিয়ত ছিল পিতা-মাতার জন্য। এরপর আল্লাহ তাআলা সেখান থেকে যা ইচ্ছা করলেন তা রহিত করে দিলেন। ফলে তিনি পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান অংশ নির্ধারণ করলেন, এবং পিতা-মাতা উভয়ের প্রত্যেকের জন্য এক-ষষ্ঠাংশ (১/৬) ও এক-তৃতীয়াংশ (১/৩) নির্ধারণ করলেন। আর নারীর জন্য এক-অষ্টমাংশ (১/৮) ও এক-চতুর্থাংশ (১/৪) নির্ধারণ করলেন এবং স্বামীর জন্য অর্ধেক (১/২) ও এক-চতুর্থাংশ (১/৪) নির্ধারণ করলেন।
এই আয়াতসমূহ এবং সূরা নিসার শেষ আয়াতগুলো হচ্ছে মিরাসের (উত্তরাধিকারের) আয়াত। এগুলো উত্তরাধিকারের অধিকাংশ বিধানকে অন্তর্ভুক্ত করে, কেবল দাদী/নানী-এর মিরাসের অংশ (এক-ষষ্ঠাংশ, যা সুন্নাহ দ্বারা প্রমাণিত এবং উলামাদের ঐকমত্য রয়েছে) ছাড়া।
আল্লাহর বাণী: {وَإِنْ كَانَ رَجُلٌ يُورَثُ كَلَالَةً} (আর যদি কোনো পুরুষকে কালালাহ হিসেবে উত্তরাধিকারী করা হয়)। ‘কালালাহ’ শব্দটি 'ইকলীল' থেকে উদ্ভূত, যা মাথার চারপাশকে ঘিরে থাকে। এখানে উদ্দেশ্য হলো, যে ব্যক্তিকে তার পার্শ্বীয় (পার্শ্ব-সম্পর্কীয়) আত্মীয়রা উত্তরাধিকারী করে, তার মূল শাখা (যেমন: পিতা বা দাদা, ঊর্ধ্বতন পুরুষ ও নারী) বা উপ-শাখা (যেমন: সন্তান ও সন্তানের সন্তান, নিম্নতর পুরুষ ও নারী) কেউ জীবিত না থাকলে।
আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, তাঁকে 'কালালাহ' সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: আমি আমার নিজের মত অনুসারে এ বিষয়ে কিছু বলছি। যদি তা সঠিক হয়, তবে তা আল্লাহর পক্ষ থেকে; আর যদি তা ভুল হয়, তবে তা শয়তানের পক্ষ থেকে, এবং আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা থেকে মুক্ত। কালালাহ হলো এমন ব্যক্তি, যার সন্তানও নেই এবং পিতাও নেই।
এরপর যখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খিলাফতের দায়িত্ব পেলেন, তখন তিনি বললেন: আমি আল্লাহ তাআলার কাছে লজ্জিত যে, আবু বকরের মতকে আমি ভিন্নমত দেবো।
(অন্য একটি বর্ণনায়) আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমিই ছিলাম উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে শেষ দেখা করা লোকদের মধ্যে একজন। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: ‘আমি যা বলেছি, সেটিই চূড়ান্ত কথা।’ আমি জিজ্ঞাসা করলাম: আপনি কী বলেছেন? তিনি বললেন: কালালাহ হলো সে, যার কোনো সন্তানও নেই এবং পিতাও নেই।
সাহাবীদের একটি দল এবং সাতজন ফকীহ, চারজন ইমাম, সালাফ ও খালাফদের অধিকাংশেরই এই মত।
আল্লাহর বাণী: {مِنْ بَعْدِ وَصِيَّةٍ تُوصُونَ بِهَا أَوْ دَيْنٍ} (...যা দ্বারা ওসিয়ত করা হয়, তা পূর্ণ করার পর এবং ঋণ পরিশোধের পর...)। সালাফ (পূর্ববর্তী) ও খালাফ (পরবর্তী) উভয় যুগের উলামাগণ এই বিষয়ে ইজমা (ঐকমত্য) করেছেন যে, ওসিয়তের পূর্বে ঋণ পরিশোধের বিষয়টি অগ্রগণ্য, যদিও আয়াতে প্রথমে ওসিয়তের কথা উল্লেখ করা হয়েছে। তবে এই উল্লেখের উদ্দেশ্য ধারাবাহিকতা নয়, বরং উদ্দেশ্য হলো— উত্তরাধিকারীদের মধ্যে বন্টনের পূর্বে এই দুটি বিষয় অবশ্যই সম্পত্তি থেকে বের করে নিতে হবে। ওসিয়ত কেবল সম্পত্তির এক-তৃতীয়াংশ বা তার কম হতে পারে, পক্ষান্তরে ঋণ পুরো সম্পদও গ্রাস করতে পারে।
আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এ মর্মে একটি দুর্বল হাদীস বর্ণিত আছে যে, মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই ফয়সালা দিয়েছেন যে, ঋণ ওসিয়তের আগে, অথচ তোমরা আয়াতে ওসিয়তকে ঋণের আগে পড়ো।
ওসিয়ত অবশ্যই ন্যায়সঙ্গত হতে হবে, উত্তরাধিকারীদের ক্ষতি করার উদ্দেশ্যে নয়। কারণ, এটি জুলুম বলে গণ্য হয়। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকুফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি) হিসেবে বর্ণিত আছে: ওসিয়তে (উত্তরাধিকারীর) ক্ষতি করা কবিরা গুনাহের অন্তর্ভুক্ত। (এই সংক্রান্ত মারফূ’ (নবীর সাথে সম্পর্কযুক্ত) বর্ণনাটি সহীহ নয়।)
11891 - عن عبادة بن الصامت قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خذوا عني، خذوا عني، قد جعل اللَّه لهن سبيلا، البكر بالبكر جلد مائة ونفي سنة، والثيب بالثيب جلد مائة والرجم".
وفي رواية: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أنزل عليه كرُب لذلك، وتربَّد له وجهه، قال: فأنزل اللَّه عليه ذات يوم، فلقي كذلك، فلما سُريَ عنه قال:"خذوا عني، فقد جعل اللَّه لهن سبيلا، الثيب بالثيب والبكر بالبكر، الثيب جلد مائة ثم رجم بالحجارة، والبكر جلد مائة ثم نفي سنة".
صحيح: رواه مسلم في الحدود (1690: 12) عن يحيى بن يحيى التميمي، أخبرنا هُشَيم، عن منصور، عن الحسن، عن حطان بن عبد اللَّه الرقاشي، عن عبادة بن الصامت، قال: فذكره.
والرواية الثانية عند مسلم أيضًا من وجه آخر عن قتادة، عن الحسن بإسناده.
والخلاف معروف بين أهل العلم في الجمع بين الجلد والرجم في حق الثيب الزاني، فذهب الجمهور إلى أن الثيب الزاني إنما يرجم فقط من غير جلد، لأن النبي صلى الله عليه وسلم رجم ماعزا والغامدية واليهوديين ولم يجلدهم قبل ذلك، فصار الجلد منسوخا في حقهم.
উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আমার নিকট থেকে গ্রহণ করো, তোমরা আমার নিকট থেকে গ্রহণ করো। আল্লাহ তাদের জন্য একটি পথ (বিধান) তৈরি করে দিয়েছেন। কুমার-কুমারীর (যিনার শাস্তি) হলো একশ’ বেত্রাঘাত এবং এক বছরের জন্য নির্বাসন। আর বিবাহিত পুরুষ-নারীর (যিনার শাস্তি) হলো একশ’ বেত্রাঘাত এবং রজম (পাথর মেরে মৃত্যুদণ্ড)।"
অপর এক বর্ণনায় এসেছে: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর অহী নাযিল হতো, তখন তিনি কষ্টের সম্মুখীন হতেন এবং তাঁর মুখমণ্ডল বিবর্ণ হয়ে যেত। বর্ণনাকারী বলেন, এক দিন আল্লাহ তাঁর ওপর অহী নাযিল করলেন, ফলে তিনি একই (কষ্টকর) অবস্থার সম্মুখীন হলেন। যখন তাঁর (কষ্ট) দূর হলো, তখন তিনি বললেন: "আমার নিকট থেকে গ্রহণ করো। আল্লাহ তাদের জন্য একটি পথ (বিধান) তৈরি করে দিয়েছেন। বিবাহিত পুরুষ-নারীর জন্য বিবাহিত পুরুষ-নারী, এবং কুমার-কুমারীর জন্য কুমার-কুমারী। বিবাহিত পুরুষ-নারীর (শাস্তি) হলো একশ’ বেত্রাঘাত, এরপর পাথর মেরে রজম। আর কুমার-কুমারীর (শাস্তি) হলো একশ’ বেত্রাঘাত, এরপর এক বছরের জন্য নির্বাসন।"
11892 - عن عبد اللَّه بن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن اللَّه يقبل توبة العبد ما لم يغرغر".
حسن: رواه الترمذيّ (3537) وابن ماجه (4253) وأحمد (6160) وصحّحه ابن حبان (628) والحاكم (4/ 257) كلهم من حديث ابن ثوبان، عن أبيه، عن مكحول، عن جبير بن نفير، عن ابن عمر، فذكره، إلا أنه وقع في سنن ابن ماجه:"عن عبد اللَّه بن عمرو" وهو وهم، كما قال المزي في التحفة (5/ 328).
وقال الترمذيّ:"حسن غريب".
قلت: إسناده حسن من أجل ابن ثوبان وهو: عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان العنسي الدمشقي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আল্লাহ্ তাআলা বান্দার তওবা ততক্ষণ পর্যন্ত কবুল করতে থাকেন, যতক্ষণ না (মৃত্যুকালে) তার কণ্ঠনালী পর্যন্ত আত্মা এসে যায় (বা ঘড়ঘড় আওয়াজ শুরু হয়)।”
11893 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الشيطان قال: وعزتك يا رب لا أبرح أُغوي عبادك ما دامت أرواحهم في أجسادهم. قال الرب: وعزتي وجلالي لا أزال أغفر لهم ما استغفروني".
حسن: رواه أحمد (11237، 11729) من طريقين عن ابن لهيعة، حدّثنا دراج، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد فذكره.
وابن لهيعة فيه كلام معروف.
ودرَّاج هو ابن سمعان أبو السمح في روايته عن أبي الهيثم ضعيف.
ولكن رواه أحمد (11244) أيضًا من وجه آخر عن أبي سلمة، أخبرنا ليث (ابن سعد)، عن يزيد بن الهاد، عن عمرو، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
وفيه انقطاع، فإن عمرا وهو ابن أبي عمرو القرشي لم يدرك أبا سعيد الخدري.
وبمجموع الإسنادين يكون الحديث حسنا.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় শয়তান বলল, 'হে রব, আপনার ইজ্জত ও প্রতাপের কসম, আমি আপনার বান্দাদেরকে পথভ্রষ্ট করতে থাকব, যতক্ষণ পর্যন্ত তাদের রূহ তাদের দেহের মধ্যে থাকবে।' রব বললেন, 'আমার ইজ্জত ও আমার জালাল (মহিমা)-এর কসম, আমি তাদের ক্ষমা করতে থাকব, যতক্ষণ পর্যন্ত তারা আমার কাছে ইস্তিগফার (ক্ষমাপ্রার্থনা) করবে।'"
11894 - عن ابن عباس قال: كانوا إذا مات الرجل كان أولياؤه أحق بامرأته، إن شاء بعضهم تزوجها، وإن شاؤوا زوجوها، وإن شاؤوا لم يزوجوها، فهم أحق بها من أهلها، فنزلت هذه الآية في ذلك.
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4579) عن محمد بن مقاتل، حدّثنا أسباط بن محمد، حدّثنا الشيباني سليمان بن فيروز، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন কোনো লোক মারা যেত, তখন তার অভিভাবকরাই তার স্ত্রীর ব্যাপারে অধিক হকদার ছিল। তাদের কেউ চাইলে তাকে (ঐ বিধবাকে) বিবাহ করত, অথবা তারা চাইলে তাকে (অন্যের সাথে) বিবাহ দিত, আর তারা চাইলে তাকে বিবাহ দিত না। তার আপন পরিবারের চেয়ে তারাই তার ব্যাপারে বেশি হকদার ছিল। ফলে এই বিষয়ে এই আয়াত নাযিল হয়েছিল।
11895 - عن ابن عباس قال: {لَا يَحِلُّ لَكُمْ أَنْ تَرِثُوا النِّسَاءَ كَرْهًا وَلَا تَعْضُلُوهُنَّ لِتَذْهَبُوا بِبَعْضِ مَا آتَيْتُمُوهُنَّ إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ} وذلك أن الرجل كان يرث امرأة ذي قرابته، فيعضلها حتى تموت أو ترد إليه صداقها، فأحكم اللَّه عن ذلك، ونهى عن ذلك.
حسن: رواه أبو داود (2090) عن أحمد بن محمد بن ثابت المروزي، حدثني علي بن حسين ابن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس، قال: فذكره. وإسناده حسن من أجل علي بن حسين وأبيه فإنهما حسنا الحديث.
وقوله: {إِلَّا أَنْ يَأْتِينَ بِفَاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ} أي الزنا يعني: إذا ثبت زناها فلكم أن تسترجعوا منها الصداق الذي أعطيتموها.
وقوله: {فَعَسَى أَنْ تَكْرَهُوا شَيْئًا وَيَجْعَلَ اللَّهُ فِيهِ خَيْرًا كَثِيرًا}.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (আল্লাহর বাণী:) "তোমাদের জন্য সঙ্গত নয় যে, তোমরা নারীদেরকে জবরদস্তি উত্তরাধিকার সূত্রে গ্রহণ করো এবং তোমরা তাদেরকে আবদ্ধ করে রেখো না, যাতে তোমরা তাদেরকে যা দিয়েছ তার কিছু অংশ ফিরিয়ে নিতে পারো, যদি না তারা স্পষ্ট অশ্লীলতায় লিপ্ত হয়।" – এটা (এই আয়াত) এই জন্য যে, কোনো ব্যক্তি তার নিকটাত্মীয়ের স্ত্রীকে উত্তরাধিকার সূত্রে গ্রহণ করত, এরপর সে তাকে আটকে রাখত (বিরক্ত করত) যতক্ষণ না সে মারা যেত অথবা সে তাকে তার মোহর ফিরিয়ে দিত। তখন আল্লাহ এই বিষয়ে চূড়ান্ত বিধান নাযিল করলেন এবং তা নিষেধ করলেন।
আর আল্লাহর বাণী: "{যদি না তারা স্পষ্ট অশ্লীলতায় লিপ্ত হয়}" এর অর্থ হলো যেনা (ব্যভিচার)। অর্থাৎ, যদি তাদের ব্যভিচার প্রমাণিত হয়, তবে তোমরা যে মোহর তাদেরকে দিয়েছিলে তা তাদের কাছ থেকে ফেরত নিতে পারো।
আর আল্লাহর বাণী: "{কিন্তু হতে পারে, তোমরা কোনো কিছুকে অপছন্দ করছ, আর আল্লাহ তাতে অনেক কল্যাণ রেখেছেন।}"
11896 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يفرك مؤمن مؤمنة إن سخط منها خُلُقا رضي منها آخر".
صحيح: رواه مسلم في الطلاق (1469) عن إبراهيم بن موسى الرازي، حدّثنا عيسى -يعني ابن يونس-، حدّثنا عبد الحميد بن جعفر، عن عمران بن أبي أنس، عن عمر بن الحكم، عن أبي هريرة، فذكره.
وقوله:"يفرك" من فرِك بكسر الراء - إذا أبغضه. والفرك: البغض.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো মুমিন পুরুষ যেন কোনো মুমিন নারীকে (স্ত্রীকে) ঘৃণা না করে। যদি সে তার কোনো একটি স্বভাব অপছন্দ করে, তবে অন্য স্বভাবের প্রতি সে সন্তুষ্ট হবে।
11897 - عن ابن عباس أنه قال: كان أهل الجاهلية يُحَرِّمون ما يحرمُ إلا امرأة الأب والجمع بين الأختين، فأنزل اللَّه تعالى: {وَلَا تَنْكِحُوا مَا نَكَحَ آبَاؤُكُمْ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا قَدْ سَلَفَ إِنَّهُ كَانَ فَاحِشَةً وَمَقْتًا وَسَاءَ سَبِيلًا}.
صحيح: رواه ابن جرير في تفسيره (6/ 549) عن محمد بن عبد اللَّه المخرمي، قال: ثنا قُرَّاد، قال: ثنا ابن عيينة، عن عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده صحيح، وقُراد لقب عبد الرحمن بن غزوان الضبي، وهو من رجال البخاري.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাহিলিয়াতের লোকেরা যা কিছু হারাম, তা তারা হারাম মনে করত, তবে পিতার স্ত্রীকে বিবাহ করা এবং দুই বোনকে একত্রে বিবাহ করা ছাড়া। অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: **"আর তোমরা ঐ নারীদেরকে বিবাহ করো না, যাদেরকে তোমাদের পিতৃপুরুষগণ বিবাহ করেছে, তবে যা অতীত হয়ে গেছে (তা ব্যতীত)। নিশ্চয়ই এটা অশ্লীল কাজ এবং ঘৃণার্হ। আর এটা খুবই নিকৃষ্ট পথ।"**
11898 - عن ابن عباس قال: قوله تعالى: {وَلَا تَنْكِحُوا مَا نَكَحَ آبَاؤُكُمْ مِنَ النِّسَاءِ} كل امرأة تزوجها أبوك وابنك، دخل أو لم يدخل، فهي عليك حرام.
حسن: رواه ابن جرير في تفسيره (6/ 550) عن المثنى قال: ثنا عبد اللَّه بن صالح، قال: ثني معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن صالح وهو كاتب الليث مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ.
مِنْهُنَّ فَآتُوهُنَّ أُجُورَهُنَّ فَرِيضَةً وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيمَا تَرَاضَيْتُمْ بِهِ مِنْ بَعْدِ الْفَرِيضَةِ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلِيمًا حَكِيمًا (24)}
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মহান আল্লাহর বাণী: "{আর তোমরা সেসব নারীকে বিবাহ করো না যাদেরকে তোমাদের পিতারা বিবাহ করেছে...}" প্রসঙ্গে তিনি বলেন: তোমার পিতা অথবা তোমার পুত্র যে কোনো নারীকে বিবাহ করুক না কেন, সে (তাদের সাথে) সহবাস করুক বা না করুক, সে তোমার জন্য হারাম (নিষিদ্ধ)।
11899 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوم حنين بعث جيشا إلى أوطاس، فلقوا عدوا، فقاتلوهم، فظهروا عليهم، وأصابوا لهم سبايا، فكأن ناسا من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم تحرجوا من غشيانهن من أجل أزواجهن من المشركين، فأنزل اللَّه عز وجل في ذلك: {وَالْمُحْصَنَاتُ مِنَ النِّسَاءِ إِلَّا مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ} أي: فهن لكم حلال إذا انقضت عدتهن.
صحيح: رواه مسلم في الرضاع (1456: 33) عن عبيد اللَّه بن عمر بن ميسرة القواريري، حدّثنا يزيد بن زريع، حدّثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن صالح أبي الخليل، عن أبي علقمة الهاشمي، عن أبي سعيد الخدري، قال: فذكره.
1. أن لا يجد الرجل سعة في المال.
2. أن يخاف على نفسه الوقوع في الزنا.
3. أن تكون الأمة من المؤمنات.
4. أن تنكح بإذن سيدها.
5. أن تدفع لها المهر كالحرة.
6. أن تكون من المحصنات، أي: عفائف من الزنا. وغير مسافحات ولا متخذات أخدان.
فإذا تمت هذه الشروط جاز له نكاحهن، وإن صبر فهو خير له من تزوجه الأمة، لئلَّا يكون أولاده أرقاء لسيدها.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুনাইনের যুদ্ধের দিন একটি সৈন্যদলকে আওতাসের দিকে প্রেরণ করলেন। তারা শত্রুদের সম্মুখীন হলো, তাদের সাথে যুদ্ধ করলো এবং বিজয় লাভ করলো। আর তাদের নিকট থেকে বন্দিনীদের (সাবাওয়া) পেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী মুশরিকদের মধ্যে তাদের (বন্দিনীদের) স্বামী থাকার কারণে তাদের সাথে সহবাস করতে ইতস্তত বোধ করলেন (বা গুনাহ হবে ভেবে দ্বিধাগ্রস্ত হলেন)। তখন আল্লাহ তা'আলা এ প্রসঙ্গে এই আয়াত নাযিল করলেন: "এবং নারীদের মধ্যে যারা বিবাহিতা, তবে তোমাদের অধিকারভুক্ত দাসীগণ ছাড়া (তাদের সাথে সহবাস বৈধ)।" অর্থাৎ, যখন তাদের ইদ্দত শেষ হবে, তখন তারা তোমাদের জন্য হালাল।
১. যদি পুরুষের পর্যাপ্ত আর্থিক সামর্থ্য না থাকে।
২. যদি সে নিজের উপর যেনায় লিপ্ত হওয়ার ভয় করে।
৩. দাসী অবশ্যই মু'মিন (ঈমানদার) হতে হবে।
৪. তার মালিকের অনুমতি সাপেক্ষে তাকে বিবাহ করতে হবে।
৫. স্বাধীন নারীর ন্যায় তাকেও মোহর দিতে হবে।
৬. সে যেন 'মুহসানাহ' (সতী) হয়। অর্থাৎ, যেনা থেকে পবিত্রা হয়, প্রকাশ্য যেনাকারিণী ও গোপনে উপপতি গ্রহণকারিণী না হয়।
যখন এই শর্তগুলো পূরণ হবে, তখন তাকে বিবাহ করা বৈধ হবে। তবে যদি সে ধৈর্য ধারণ করে (এবং দাসীকে বিবাহ না করে), তবে তা তার জন্য উত্তম; কারণ এতে তার সন্তানরা তাদের (দাসীটির) মালিকের গোলাম হবে না।
11900 - عن عمرو بن العاص أنه قال: لما بعثه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عام ذات السلاسل قال: فاحتلمت في ليلة باردة شديدة البرد، فأشفقت إن اغتسلت أن أهلك، فتيممت، ثم صليت بأصحابي صلاة الصبح. قال: فلما قدمنا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذكرت ذلك له، فقال:"يا عمرو، صلَّيت بأصحابك وأنت جنب؟" قلت: نعم يا رسول اللَّه، إني احتلمت في ليلة باردة شديدة البرد، فأشفقت إن اغتسلت أن أهلك، وذكرت قول اللَّه عز وجل: {وَلَا تَقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا} فتيممتُ ثم صلَّيتُ. فضحك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ولم يقل شيئًا.
صحيح: رواه أبو داود (334) وأحمد (17812) والحاكم (1/ 177 - 178) كلهم من حديث
يزيد بن أبي حبيب، عن عمران بن أبي أنس، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عمرو بن العاص، فذكره. وإسناده صحيح.
وقد رواه أبو داود أيضًا وغيره، وزادوا بين عبد الرحمن بن جبير وعمرو بن العاص:"أبا قيس مولى عمرو بن العاص"، وكلا الوجهين صحيح.
ورواه ابن مردويه من وجه آخر عن ابن عباس أن عمرو بن العاص صلى الناس وهو جنب، فلما قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذكروا ذلك له، فدعاه فسأله عن ذلك، فقال: يا رسول اللَّه، خفت أن يقتلني البرد، وقد قال اللَّه تعالى: {وَلَا تَقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ إِنَّ اللَّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيمًا} فسكت عنه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
وقوله: {وَمَنْ يَفْعَلْ ذَلِكَ عُدْوَانًا وَظُلْمًا فَسَوْفَ نُصْلِيهِ نَارًا} حذّر اللَّه تعالى: من يقتل نفسه عدوانا وظلما أنه يدخله نارا، وقد جاء في الصحيح.
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে যাতুস সালাসিল অভিযানের বছর প্রেরণ করেন, তখন প্রচণ্ড ঠাণ্ডা এক রাতে আমার স্বপ্নদোষ হলো। আমি আশঙ্কা করলাম যে যদি গোসল করি তবে আমি ধ্বংস হয়ে যাব। তাই আমি তায়াম্মুম করলাম, অতঃপর আমার সাথীদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলাম। তিনি বলেন, যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলাম, তখন আমি তাঁকে সে বিষয়টি জানালাম। তিনি বললেন: "হে আমর, তুমি কি তোমার সাথীদের নিয়ে সালাত আদায় করলে, অথচ তুমি জুনুবী (নাপাক) ছিলে?" আমি বললাম: "হ্যাঁ, ইয়া রাসূলুল্লাহ। আমি প্রচণ্ড ঠাণ্ডা এক রাতে স্বপ্নদোষের শিকার হয়েছিলাম। আমি ভয় পেয়েছিলাম যে গোসল করলে আমি ধ্বংস হয়ে যাব। আর আমার আল্লাহ তাআলার এই বাণী মনে পড়ল: {তোমরা নিজেদেরকে হত্যা করো না; নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদের প্রতি পরম দয়ালু।} [সূরা নিসা ৪:২৯]। তাই আমি তায়াম্মুম করলাম, অতঃপর সালাত আদায় করলাম।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাসলেন এবং কিছু বললেন না।
11901 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من تردَّى من جبل فقتل نفسه فهو في نار جهنم يتردَّى فيه خالدا مخلدا فيها أبدا، ومن تحسَّى سُمَّا فقتل نفسه فسُمُّه في يده يتحساه في نار جهنم خالدا مخلدا فيها أبدا، ومن قتل نفسه بحديدة فحديدته في يده يجأ بها في بطنه في نار جهنم خالدا مخلدا فيها أبدا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الطب (5778) ومسلم في الإيمان (109: 175) كلاهما من حديث سليمان الأعمش، قال: سمعت ذكوان، يحدث عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি পাহাড় থেকে ঝাঁপ দিয়ে পড়ে নিজেকে হত্যা করে, সে জাহান্নামের আগুনেও সর্বদা (নিচের দিকে) পড়তে থাকবে এবং সেখানে সে চিরকাল, চিরস্থায়ীভাবে থাকবে। আর যে ব্যক্তি বিষপান করে নিজেকে হত্যা করে, তার বিষ তার হাতেই থাকবে এবং জাহান্নামের আগুনে সে তা পান করতে থাকবে। সেখানে সে চিরকাল, চিরস্থায়ীভাবে থাকবে। আর যে ব্যক্তি ধারালো অস্ত্র দ্বারা নিজেকে হত্যা করে, তার সেই অস্ত্র তার হাতে থাকবে এবং জাহান্নামের আগুনে সে তা দিয়ে নিজের পেটে আঘাত করতে থাকবে। সেখানে সে চিরকাল, চিরস্থায়ীভাবে থাকবে।"
11902 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اجتنبوا السبع الموبقات"، قالوا: يا رسول اللَّه، وما هن؟ قال:"الشرك باللَّه، والسحر، وقتل النفس التي حرم اللَّه إلا بالحق، وأكل الربا، وأكل مال اليتيم، والتولي يوم الزحف، وقذف المحصنات المؤمنات الغافلات".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الوصايا (2766)، ومسلم في الإيمان (89) كلاهما من حديث سليمان بن بلال، عن ثور بن زيد، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة، فذكره.
وأما ما روي عن أبي هريرة وأبي سعيد قالا: خطبنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومًا فقال:"والذي نفسي بيده" ثلاث مرات، ثم أكبَّ فأكبَّ كل رجل منا يبكي، لا ندري على ماذا حلف، ثم رفع رأسه في وجهه البشرى، فكانت أحب إلينا من حمر النعم، ثم قال:"ما من عبد يصلي الصلوات الخمس، ويصوم رمضان، ويخرج الزكاة، يجتنب الكبائر السبع إلا فتحت له أبواب الجنة، فقيل له: ادخل
بسلام". ففيه رجل مجهول.
رواه النسائي (2438) وصحّحه ابن خزيمة (315) وابن حبان (1748) والحاكم (1/ 200 - 201) كلهم من حديث سعيد بن أبي هلال، عن نعيم المجمر، أخبرني صهيب مولى العتواري، أنه سمع من أبي هريرة وأبي سعيد، قالا: فذكرا الحديث.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: فيه صهيب مولى العتواري مجهول، لم يرو عنه إلا نُعَيم الْمُجْمِر، ولم أجد من وثّقه غير ابن حبان.
وفي معناه أحاديث أخرى مخرجة في موضعها.
وقد رأى جمهور العلماء أن النص على هذه السبع لا ينفي ما عداهن، لما ثبت في الأحاديث الأخرى أنها أكثر من ذلك، مثل عقوق الوالدين، وتعلم السحر، وشهادة الزور، وأن تقتل ولدك خشية أن يأكل معك، وأن تزني حليلة جارك، واليمين الغموس، ولعن الرجل والديه، وسباب المسلم وقتاله وغيرها.
وقد سئل ابن عباس: ما السبع الكبائر؟ قال: هي إلى السبعين أقرب منها إلى السبع، وروي عنه أكثر من ذلك.
وروى ابن جرير وغيره من طرق عن ابن مسعود قال: الكبائر من أول سورة النساء إلى ثلاثين آية منها، ثم تلا: {إِنْ تَجْتَنِبُوا كَبَائِرَ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ نُكَفِّرْ عَنْكُمْ سَيِّئَاتِكُمْ وَنُدْخِلْكُمْ مُدْخَلًا كَرِيمًا}.
وروى ابن جرير عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس في قوله: {إِنْ تَجْتَنِبُوا كَبَائِرَ مَا تُنْهَوْنَ عَنْهُ} قال: الكبائر كل ذنب ختمه اللَّه بنار، أو غضب، أو لعنة، أو عذاب.
وروى ابن أبي حاتم في تفسيره بإسناده عن عائشة قالت: ما أخذ على النساء من الكبائر، قال ابن أبي حاتم: تعني قوله تعالى: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ إِذَا جَاءَكَ الْمُؤْمِنَاتُ يُبَايِعْنَكَ عَلَى أَنْ لَا يُشْرِكْنَ بِاللَّهِ شَيْئًا وَلَا يَسْرِقْنَ وَلَا يَزْنِينَ وَلَا يَقْتُلْنَ أَوْلَادَهُنَّ وَلَا يَأْتِينَ بِبُهْتَانٍ يَفْتَرِينَهُ بَيْنَ أَيْدِيهِنَّ وَأَرْجُلِهِنَّ وَلَا يَعْصِينَكَ فِي مَعْرُوفٍ فَبَايِعْهُنَّ وَاسْتَغْفِرْ لَهُنَّ اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (12)} [الممتحنة:
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমরা সাতটি ধ্বংসাত্মক কাজ থেকে দূরে থাকো।” তাঁরা বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! সেইগুলো কী?” তিনি বললেন: “আল্লাহর সাথে শরীক করা, যাদু করা, আল্লাহ যে জীবনকে হত্যা করা হারাম করেছেন, ন্যায়সঙ্গত কারণ ব্যতীত তাকে হত্যা করা, সুদ খাওয়া, ইয়াতীমের সম্পদ ভক্ষণ করা, যুদ্ধের দিনে পৃষ্ঠপ্রদর্শন করে পলায়ন করা, এবং সতী-সাধ্বী, সরলমনা মুমিন নারীদের অপবাদ দেওয়া।”
11903 - عن أم سلمة أنها قالت: يغزو الرجال ولا تغزو النساء، وإنما لنا نصف الميراث، فأنزل اللَّه عز وجل: {وَلَا تَتَمَنَّوْا مَا فَضَّلَ اللَّهُ بِهِ بَعْضَكُمْ عَلَى بَعْضٍ}
صحيح: رواه الترمذيّ (3022)، وأحمد (26736) وابن أبي حاتم في تفسيره (4/ 935)
والواحدي في أسباب النزول (ص: 99) والحاكم (2/ 305، 306، 416) كلهم من طريق ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن أم سلمة، فذكرته.
وقال الترمذيّ: هذا حديث مرسل، ورواه بعضهم عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، مرسل، أن أم سلمة قالت كذا وكذا.
وقال الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط الشيخين إن كان سمع مجاهد من أم سلمة".
قلت: نعم، سمع مجاهد من أم سلمة، لأنه ولد سنة 21 هـ، وماتت أم سلمة سنة 60 هـ، ومجاهد لم يتهم بالتدليس، فقوله عن أم سلمة يحمل على الاتصال.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: পুরুষেরা যুদ্ধে অংশগ্রহণ করে কিন্তু মহিলারা যুদ্ধে অংশগ্রহণ করে না, আর আমরা কেবল উত্তরাধিকারের অর্ধেক অংশ পাই। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা নাযিল করলেন: "আর তোমরা আকাঙ্ক্ষা করো না আল্লাহ তা’আলা তোমাদের মধ্যে কাউকে কারও ওপর যে শ্রেষ্ঠত্ব দিয়েছেন তার।"
11904 - عن ابن عباس في قوله تعالى: {وَلَا تَتَمَنَّوْا مَا فَضَّلَ اللَّهُ بِهِ بَعْضَكُمْ عَلَى بَعْضٍ لِلرِّجَالِ نَصِيبٌ مِمَّا اكْتَسَبُوا وَلِلنِّسَاءِ نَصِيبٌ مِمَّا اكْتَسَبْنَ} قال: أتت امرأة النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: يا نبي اللَّه، للذكر مثل حظ الأنثيين، وشهادة امرأتين برجل، أفنحن في العمل هكذا، إن عملت امرأة حسنة كتبت له نصف حسنة؛ فأنزل اللَّه تعالى هذه الآية: {وَلَا تَتَمَنَّوْا} فإنه عدل مني وأنا صنعته.
حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 935) والضياء في المختارة (10/ 116 - 117) كلاهما من حديث الأشعث بن إسحاق، عن جعفر بن أبي المغيرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الأشعث بن إسحاق، وهو القمي، وشيخه جعفر بن أبي المغيرة، فإنهما حسنا الحديث.
وقوله:"فإنه عدل مني وأنا صنعته" أي: إنه تأكيد من اللَّه تعالى بأنه هو الذي جعل للذكر مثل حظ الأنثيين عدلا منه سبحانه وتعالى.
وقد ذهب بعض العلماء إلى أن عمل المرأة نصف عمل الرجال، لأن اللَّه تعالى نهى أن تتمنى المرأة ما فضل اللَّه به الرجل، وكذلك نهى أن يتمنى الرجل أن يقول: ليت لي مال فلان وأهله، ولكن ليسأل اللَّه من فضله، قاله ابن عباس في تفسير قوله تعالى: {وَلَا تَتَمَنَّوْا مَا فَضَّلَ اللَّهُ بِهِ بَعْضَكُمْ عَلَى بَعْضٍ}.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে তিনি বলেন: "আর আল্লাহ তোমাদের একজনকে অন্যজনের উপর যে প্রাধান্য দিয়েছেন, তোমরা তার আকাঙ্ক্ষা করো না। পুরুষেরা যা অর্জন করে, তাতে তাদের অংশ আছে এবং নারীরা যা অর্জন করে, তাতে তাদের অংশ আছে।" [নিসা ৪:৩২]। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন, একজন নারী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন: হে আল্লাহর নবী! পুরুষের জন্য দুই নারীর অংশের সমান অংশ, এবং একজন পুরুষের সাক্ষ্য দুই নারীর সাক্ষ্যের সমান। তাহলে আমলের (কাজের) ক্ষেত্রেও কি আমাদের একই অবস্থা হবে? যদি একজন নারী কোনো ভালো কাজ করে, তবে কি তার জন্য অর্ধেক নেকি লেখা হবে? তখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াতটি নাযিল করলেন: "আর তোমরা আকাঙ্ক্ষা করো না..."। কারণ, এটা আমার পক্ষ থেকে ইনসাফ (ন্যায়বিচার) এবং আমিই এটি তৈরি করেছি।
11905 - عن ابن عباس: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} قال: ورثة. {وَالَّذِينَ عَقَدَتْ أَيْمَانُكُمْ} كان المهاجرون لما قدموا المدينة يرث المهاجريُّ الأنصاريَّ دون ذوي رحمه، للأخوة التي آخى النبي صلى الله عليه وسلم بينهم، فلما نزلت: {وَلِكُلٍّ جَعَلْنَا مَوَالِيَ} من النصر والرفادة
والنصيحة، وقد ذهب الميراث، ويوصي له.
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4580) عن الصلت بن محمد، حدّثنا أبو أسامة، عن إدريس، عن طلحة بن مصرف، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. ثم قال البخاري:"سمع أبو أسامة إدريس، وسمع إدريس طلحة".
قلت: وهو كما قال، فقد رواه في الفرائض (6727) عن إسحاق بن إبراهيم قال: قلت لأبي أسامة، حدَّثَكم إدريس، حدّثنا طلحة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر نحوه.
ورواه ابن أبي حاتم في تفسيره عن أبي سعيد الأشج، حدّثنا أبو أسامة، حدّثنا إدريس الأودي، أخبرني طلحة بن مصرف، عن سعيد به نحوه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র বাণী, "{আর আমরা প্রত্যেকের জন্য উত্তরাধিকারী (মাওয়ালী) বানিয়েছি}" এর ব্যাখ্যায় তিনি বলেন: (এর অর্থ হলো) ওয়ারিসগণ। আর আল্লাহ্র বাণী, "{এবং যাদের সাথে তোমাদের ডান হাত চুক্তি করেছে,}" (সম্পর্কে তিনি বলেন), যখন মুহাজিরগণ মদিনায় আগমন করলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মধ্যে যে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করেছিলেন, সেই কারণে একজন মুহাজির তার (রক্তের) আত্মীয়-স্বজনকে বাদ দিয়ে একজন আনসারীর উত্তরাধিকারী হতো। এরপর যখন আল্লাহ্র বাণী, "{আর আমরা প্রত্যেকের জন্য উত্তরাধিকারী (মাওয়ালী) বানিয়েছি}" (সম্পূর্ণ) নাযিল হলো, তখন (এই মিত্ৰতা) শুধু সাহায্য, সহযোগিতা ও উপদেশের মধ্যে সীমিত হলো। আর উত্তরাধিকারের বিধান বাতিল হয়ে গেল, তবে তার জন্য (মৃত্যুকালে) ওসিয়ত করার সুযোগ থাকল।
11906 - عن جابر بن عبد اللَّه في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم قال في حجة الوداع:"فاتقوا اللَّه في النساء، فإنكم أخذتموهن بأمان اللَّه، واستحللتم فروجهن بكلمة اللَّه،
ولكم عليهن أن لا يوطئن فرشكم أحدًا تكرهونه، فإن فعلن ذلك فاضربوهن ضربا غير مبَرِّح، ولهن عليكم رزقهن وكسوتهن بالمعروف".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طرق عن حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره في حديث طويل.
وقوله:"غير مُبَرِّح"، أي: كما قال الفقهاء هو ألا يكسر لها عضوا، ولا يؤثر فيها شيئًا.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হজ্জের বর্ণনা প্রসঙ্গে তিনি বিদায় হজ্জে বললেন: "তোমরা নারীদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় কর। কারণ তোমরা তাদের গ্রহণ করেছ আল্লাহর আমানত হিসেবে, এবং আল্লাহর কালেমার মাধ্যমে তাদের লজ্জাস্থান হালাল করেছ। আর তোমাদের স্ত্রীদের উপর তোমাদের অধিকার হলো, তারা যেন তোমাদের বিছানায় এমন কাউকে বসতে না দেয় যাকে তোমরা অপছন্দ কর। যদি তারা তা করে, তবে তোমরা তাদেরকে প্রহার করতে পার, তবে তা যেন গুরুতর আঘাত না হয়। আর তাদের উপর তোমাদের অধিকার হলো, ন্যায়সঙ্গতভাবে তাদের ভরণপোষণ ও পোশাক-পরিচ্ছদ প্রদান করা।"
11907 - عن عبد اللَّه بن زمعة أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم خطب، فذكر في خطبته النساء، فقال:"يعمد أحدكم يجلد امرأته جلد العبيد، فلعله يضاجعها من آخر يومه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4942) ومسلم في الجنة (2855) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عبد اللَّه بن زمعة، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে যামআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুতবা দিতে শুনেছেন। তিনি তাঁর খুতবায় নারীদের কথা উল্লেখ করলেন এবং বললেন: “তোমাদের কেউ কেউ তার স্ত্রীকে ক্রীতদাসের মতো প্রহার করে, অথচ দিনের শেষে সে তার সাথে সহবাস করতে পারে।”