হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (11928)


11928 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ضِرْس الكافر -أو ناب الكافر- مثل أحد، وغِلَظُ جلده مسيرة ثلاث".

صحيح: رواه مسلم في الجنة وصفة نعيمها (2851) عن سريج بن يونس، حدّثنا حميد بن عبد الرحمن، عن الحسن بن صالح، عن هارون بن سعد، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.

وقوله: {وَنُدْخِلُهُمْ ظِلًّا ظَلِيلًا} أي: ظلا عميقا.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কাফিরের মাড়ির দাঁত—অথবা কাফিরের শ্বদন্ত—হবে উহুদ পাহাড়ের মতো। আর তার চামড়ার পুরুত্ব হবে তিন দিনের পথ পরিমাণ।"









আল-জামি` আল-কামিল (11929)


11929 - عن سهل بن سعد عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن في الجنة لشجرة يسير الراكب في ظلها مائة عام لا يقطعها".

متفق عليه: رواه مسلم في الجنة وصفة نعيمها (2827) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، أخبرنا المخزومي (وهو المغيرة بن سلمة)، حدّثنا وهيب، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره.

ورواه البخاريّ في الرقاق (6552) فقال: وقال إسحاق بن إبراهيم بإسناده. وظاهره معلق، وقوله محمول على الاتصال لأنه من شيوخه.




সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই জান্নাতে এমন একটি বৃক্ষ রয়েছে, যার ছায়ায় কোনো আরোহী একশ বছর ধরে ভ্রমণ করলেও তা শেষ করতে পারে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (11930)


11930 - عن أبي هريرة عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إن في الجنة لشجرة يسير الراكب فى ظلها مئة سنة".

صحيح: رواه مسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (2826) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا ليث، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وزاد في رواية من وجه آخر:"لا يقطعها".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জান্নাতে এমন একটি বৃক্ষ রয়েছে, যার ছায়ায় একজন আরোহী একশ বছর ধরে চলতে থাকবে।"
অন্য এক বর্ণনায় যোগ করা হয়েছে: "সে তা শেষ করতে (বা অতিক্রম করতে) পারবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (11931)


11931 - عن صفية بنت شيبة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما نزل مكة، واطمأن الناس، خرج حتى جاء البيت فطاف به سبعا على راحلته، يستلم الركن بمحجن في يده، فلما قضى طوافه دعا عثمان بن طلحة، فأخذ منه مفتاح الكعبة، ففتحت له، فدخلها، فوجد فيها حمامة من عيدان، فكسرها بيده، ثم طرحها، ثم وقف على باب الكعبة، وقد استكف
له الناس في المسجد.

ثم جلس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في المسجد، فقام إليه علي بن أبي طالب ومفتاح الكعبة في يده، فقال: يا رسول اللَّه، اجمع لنا الحجابة مع السقاية صلى اللَّه عليك، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أين عثمان بن طلحة؟" فدعي له فقال:"هاك مفتاحك يا عثمان، اليوم يوم بر ووفاء".

حسن: رواه محمد بن إسحاق - السيرة لابن هشام (2/ 411) قال: حدثني محمد بن جعفر بن الزبير، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن أبي ثور، عن صفية بنت شيبة، فذكرته. وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.

وفي معناه ما رواه ابن جرير الطبري في تفسيره (7/ 170): حدّثنا القاسم قال: حدّثنا الحسين، قال: حدثني حجاج، عن ابن جريج قوله: {إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا}، قال: نزلت في عُثمان بن طلحة، قَبض منه النبي صلى الله عليه وسلم مفتاح الكعبة، فدخل به البيت يوم الفتح، فخرج وهو يتلو هذه الآية، فدعا عثمان إليه، فدفع إليه المفتاح. قال: وقال عمر بن الخطاب لما خرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو يتلو هذه الآية: فداهُ أبي وأمي! ما سمعته يَتلوها قبل ذلك!

والحسين هو سُنَيد صاحب التفسير، وهو ضعيف عند أكثر المحدثين، والحجاج هو ابن محمد المصيصي، وكان سُنيد يُلَقِّنُ شيخه بعد ما تغير.

وقوله: {إِنَّ اللَّهَ كَانَ سَمِيعًا بَصِيرًا}.




সফিয়্যা বিনত শাইবাহ থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কায় অবতরণ করলেন এবং মানুষজন শান্ত হলো, তখন তিনি বের হয়ে বাইতুল্লাহর কাছে এলেন। এরপর তিনি তাঁর বাহনের ওপর আরোহণ অবস্থায় সাতবার তাওয়াফ করলেন। তিনি তাঁর হাতে থাকা বাঁকা লাঠি (মিহজান) দিয়ে রুকন (কালো পাথর) স্পর্শ করছিলেন। যখন তিনি তাঁর তাওয়াফ সম্পন্ন করলেন, তখন উসমান ইবনে তালহাকে ডাকলেন এবং তাঁর কাছ থেকে কা'বার চাবি নিলেন। এরপর কা'বা তাঁর জন্য খোলা হলো এবং তিনি তাতে প্রবেশ করলেন। তিনি এর ভেতরে কাঠ দিয়ে তৈরি একটি ঘুঘু (পাখির মূর্তি) দেখতে পেলেন। তিনি সেটি নিজ হাতে ভেঙে ফেললেন, এরপর বাইরে ফেলে দিলেন। অতঃপর তিনি কা'বার দরজায় দাঁড়ালেন, আর মানুষজন মসজিদের মধ্যে তাঁর চারদিকে ভিড় করে দাঁড়িয়েছিল।

এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে বসলেন। তখন আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে তাঁর কাছে এলেন, আর কা'বার চাবি তাঁর হাতে ছিল। তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের জন্য হাউজের (পানি পান করানোর) দায়িত্বের সাথে কা'বার চাবির (হিফাজতের) দায়িত্বও একত্রিত করে দিন, আল্লাহ আপনার ওপর সালাত বর্ষণ করুন।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "উসমান ইবনে তালহা কোথায়?" তাঁকে ডাকা হলো। এরপর তিনি (উসমানকে) বললেন: "এই নাও তোমার চাবি হে উসমান! আজ হচ্ছে পুণ্য ও অঙ্গীকার পূরণের দিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (11932)


11932 - عن أبي يونس سُليم بن جبير مولى أبي هريرة قال: سمعت أبا هريرة يقرأ هذه الآية: {إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا} إلى قوله: {إِنَّ اللَّهَ كَانَ سَمِيعًا بَصِيرًا} رأيتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يضع إبهامه على أذنه، والتي تليها على عينيه.

قال أبو هريرة: رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقرؤها ويضع إصبعيه.

قال ابن يونس: قال المقري: يعني (إن اللَّه سميع بصير) يعني: إن للَّه سمعا وبصرا. قال أبو داود: وهذا رد على الجهمية.

صحيح: رواه أبو داود (4728) والحاكم (1/ 24) كلاهما من حديث عبد اللَّه بن يزيد المقرئ، حدّثنا حرملة - يعني ابن عمران، حدثني أبو يونس سليم بن جبير، فذكره، واللفظ لأبي داود. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وقوَّى الحافظ ابن حجر هذا الإسناد، وقال: على شرط مسلم. انظر: الفتح (1
وَأَحْسَنُ تَأْوِيلًا (59)}




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর মাওলা আবূ ইউনুস সুলাইম ইবনে জুবাইর বলেন,) আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই আয়াতটি তেলাওয়াত করতে শুনলাম: {নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদেরকে নির্দেশ দিচ্ছেন, তোমরা যেন আমানতসমূহ সেগুলোর হকদারদের কাছে পৌঁছে দাও} তাঁর বাণী {নিশ্চয় আল্লাহ সর্বশ্রোতা, সর্বদ্রষ্টা} পর্যন্ত। (এরপর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন,) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখলাম, তিনি তাঁর বৃদ্ধাঙ্গুলি কানে এবং তার পরের অঙ্গুলিটি তাঁর দু’চোখের উপর রাখলেন। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তা (আয়াতটি) তেলাওয়াত করতে এবং তাঁর দু’টি অঙ্গুলি রাখতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (11933)


11933 - عن ابن عباس: {أَطِيعُوا اللَّهَ وَأَطِيعُوا الرَّسُولَ وَأُولِي الْأَمْرِ مِنْكُمْ} قال: نزلت في عبد اللَّه ابن حذافة بن قيس بن عدي، إذ بعثه النبي صلى الله عليه وسلم في سرية.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4584) عن صدقة بن الفضل، أخبرنا حجاج بن محمد، عن ابن جريج، عن يعلى بن مسلم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه مسلم في الإمارة (1834) عن زهير بن حرب وهارون بن عبد اللَّه، قالا: حدّثنا حجاج ابن محمد، قال: قال ابن جريج: نزل: في عبد اللَّه بن حذافة بن قيس بن عدي السهمي، بعثه النبي صلى الله عليه وسلم في سرية، أخبرنيه يعلى بن مسلم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس.

تنبيه: ذكر المزي في ترجمة سنيد بن داود المصيصي أبي علي المحتسب، واسمه الحسين، وسنيد لقب غلب عليه، قال: روى البخاري في تفسير سورة النساء (أي: في هذا الموضع) عن صدقة، عن حجاج بن محمد، عن ابن جريج، عن يعلى بن مسلم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر الآية، وقال: هكذا رواه الجماعة عن الفربري، عن البخاري. وروى أبو علي سعيد بن عثمان بن السكن وحده عن الفربري، عن البخاري قال: حدّثنا سنيد، عن حجاج بن محمد، فذكره.

قال أبو محمد بن يربوع الإشبيلي: الصواب ما رواه الجماعة، وليس يبعد فإن سنيدا هذا صاحب تفسير. وذكر ابن السكن له في التفسير من الأوهام المحتملة؛ لأنه إنما ذكره في بابه الذي هو مشهور به. فهو قريب بعيد" انتهى.

والخلاصة فيه أنه إذا روى في تفسيره حديثا مرفوعًا يُنظر فيه، وإذا روى عن الصحابي أو التابعي ولم يكن فيه نكارة أو غرابة فيحسّن.

ذكرتُ هذا التنبيه لأن سُنيدًا قد يكثر ذكره في التفسير.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [আল্লাহ্‌র বাণী:] {তোমরা আল্লাহ্‌র আনুগত্য করো, রাসূলের আনুগত্য করো এবং তোমাদের মধ্যে যারা কর্তৃত্বের অধিকারী} - এই আয়াতটি নাযিল হয়েছিল আব্দুল্লাহ ইবনে হুযাফা ইবনে কায়স ইবনে আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাপারে, যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে একটি সামরিক অভিযানে প্রেরণ করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11934)


11934 - عن ابن عباس قال: كان أبو بردة كاهنا يقضي بين اليهود فيما يتنافرون إليه، فتنافر إليه أناس من أسلم، فأنزل اللَّه تعالى: {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يَزْعُمُونَ}.

صحيح: رواه الطبراني في الكبير (11/ 295) وابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 991) كلاهما من طريق أبي اليمان الحكم بن نافع، ثنا صفوان بن عمرو، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. وإسناده صحيح.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ বুরদাহ একজন ভবিষ্যদ্বক্তা (কাহিন) ছিলেন, যিনি ইহুদিদের মধ্যে বিচার করতেন যখন তারা তার কাছে ফায়সালা চাইত। তখন আসলাম গোত্রের কিছু লোকও তার কাছে বিচার প্রার্থনা করল। অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {আপনি কি তাদের দেখেননি, যারা দাবি করে...}।









আল-জামি` আল-কামিল (11935)


11935 - عن يزيد بن الأسود قال: حججنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حجة الوداع، قال: فصلى بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم صلاة الصبح أو الفجر، قال: ثم انحرف جالسا، واستقبل الناس بوجهه، فإذا هو برجلين من وراء الناس لم يصليا مع الناس، فقال:"ائتوني بهذين الرجلين" قال: فأتي بهما ترعد فرائصهما، فقال:"ما منعكما أن تصليا مع الناس؟" قالا: يا رسول اللَّه، إنا كنا قد صلينا في الرحال. قال:"فلا تفعلا، إذا صلى أحدكم في رحله، ثم أدرك الصلاة مع الإمام، فليصلها معه، فإنها له نافلة". قال: فقال أحدهما: استغفر لي يا رسول اللَّه. فاستغفر له، قال: ونهض الناس إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ونهضت معهم، وأنا يومئذ أشب الرجال وأجلده. قال: فما زلت أزحم الناس حتى وصلت إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فأخذت بيده فوضعتها إما على وجهي أو صدري، قال: فما وجدت شيئًا أطيب ولا أبرد من يد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال: وهو يومئذ في مسجد الخيف.

صحيح: رواه أحمد (17476) والسياق له، وأبو داود (575) والترمذي (219) والنسائي (858) وصحّحه ابن خزيمة (1279) وابن حبان (2395، 1565) كلهم من طرق عن يعلى بن عطاء، عن جابر بن يزيد بن الأسود، عن أبيه، قال: فذكره. وإسناده صحيح.

وذكر النووي في المجموع (8/ 274) والإيضاح (ص: 498) وابن كثير في تفسيره قصة غريبة عن العتبي قال: كنت جالسا عند قبر النبي صلى الله عليه وسلم فجاء أعرابي فقال: السلام عليك يا رسول اللَّه، سمعت اللَّه يقول: وقد جئتك مستغفرا لذنبي، مستشفعا بك إلى ربي، ثم أنشأ يقول: {وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ رَسُولٍ إِلَّا لِيُطَاعَ بِإِذْنِ اللَّهِ وَلَوْ أَنَّهُمْ إِذْ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ جَاءُوكَ فَاسْتَغْفَرُوا اللَّهَ وَاسْتَغْفَرَ لَهُمُ الرَّسُولُ لَوَجَدُوا اللَّهَ تَوَّابًا رَحِيمًا}.

يا خير من دفنت بالقاع أعظمه … فطاب من طيبهن القاع والأكم.
نفسي الفداء لقبر أنت ساكنه … فيه العفاف وفيه الجود والكرم

ثم انصرف الأعرابي فغلبتني عيني، فرأيت النبي صلى الله عليه وسلم في النوم فقال: يا عُتْبِي، الحق الأعرابي فبشره أن اللَّه قد غفر له.

وهذه قصة باطلة مختلقة مخالفة لما كان عليه الصحابة والتابعون ومن تبعهم بإحسان إلى يومنا هذا، فإن أحدا من الصحابة ومن بعدهم لم يذهب إلى قبر النبي صلى الله عليه وسلم مستشفعا لربه. ولو فعلوا ذلك لتواترت النقول.

والعتبي هو الشاعر الأخباري أبو عبد الرحمن محمد بن عبيد اللَّه بن عمرو بن معاوية بن عمرو بن عتبة بن أبي سفيان بن حرب الأموي، ثم العتبي البصري، لم يكن محدثا، وإنما هو أخباري فقط.

وذكر الذهبي: أنه كان يشرب، ومات سنة ثمان وعشرين ومائتين. سير أعلام النبلاء (11/ 96) فمن كان هذا حاله لا يجوز النقل عنه إلا بالتعجب.

ورواه البيهقي في شعب الإيمان (3880) فقال:"أخبرنا أبو علي الروذباري، حدّثنا عمرو بن محمد بن عمرو بن الحسين بن بقية إملاء، حدّثنا شكر الهروي، حدّثنا يزيد الرقاشي، عن محمد ابن روح بن يزيد البصري، حدثني أبو حرب الهلالي، قال: حج أعرابي فلما جاء إلى باب مسجد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أناخ راحلته فعقلها، ثم دخل المسجد حتى أتى القبر ووقف بحذاء وجه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: بأبي أنت وأمي يا رسول اللَّه جئتك مثقلا بالذنوب والخطايا مستشفعا بك على ربك لأنه قال في محكم كتابه: ، وقد جئتك بأبي أنت وأمي مثقلا بالذنوب والخطايا أستشفع بك على ربك أن يغفر لي ذنوبي، وأن تشفع في ثم أقبل في عرض الناس، وهو يقول:

يا خير من دفنت في الترب أعظمه … فطاب من طيبه الأبقاع والأكم

نفسي الفداء بقبر أنت ساكنه … فيه العفاف وفيه الجود والكرم

وفي غير هذه الرواية: فطاب من طيبه القيعان والأكم" انتهى.

وفيه يزيد الرقاشي وهو أبان القاصّ ضعيف جدا، وفي الإسناد من لا يعرف حالهم، ولذا قال الحافظ ابن عبد الهادي في الصارم المنكي (ص: 245 - 247):"وقد ذكرها البيهقي في كتاب شعب الإيمان بإسناد مظلم عن محمد بن روح بن يزيد البصري، حدثني أبو حرب الهلالي قال: حج أعرابي فلما جاء إلى باب مسجد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أناخ راحلته فعقلها، ثم دخل المسجد حتى أتى القبر، ثم ذكر نحو ما تقدم، وقد وضع لها بعض الكذابين إسنادًا إلى علي بن أبي طالب رضي الله عنه.

وفي الجملة: ليست هذه الحكاية المنكورة (أي منكرة) عن الأعرابي مما يقوم به حجة، وإسنادها مظلم مختلف ولفظها مختلف أيضًا، ولو كانت ثابتة لم يكن فيها حجة على مطلوب المعترض، ولا يصلح الاحتجاج بمثل هذه الحكاية، ولا الاعتماد على مثلها عند أهل العلم،
وباللَّه التوفيق" اهـ.




ইয়াযিদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জে অংশগ্রহণ করলাম। তিনি (ইয়াযিদ) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে সুবহে সাদিকের অথবা ফজরের সালাত আদায় করলেন। তিনি বলেন: এরপর তিনি ঘুরে বসলেন এবং তাঁর চেহারা জনগণের দিকে ফেরালেন। তিনি দেখলেন যে, পিছনে দুইজন লোক রয়েছে যারা জামা‘আতের সাথে সালাত আদায় করেনি। তিনি বললেন: "ঐ দুইজন লোককে আমার কাছে নিয়ে আসো।" তিনি বলেন: অতঃপর তাদের দু’জনকে আনা হলো, তখন তাদের কাঁধের উপরের মাংসপেশী ভয়ে কাঁপছিল। তিনি বললেন: "তোমরা লোকদের সাথে সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকলে কেন?" তারা দু’জন বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা আমাদের আস্তানায় সালাত আদায় করে এসেছিলাম। তিনি বললেন: "তোমরা এমন করবে না। তোমাদের কেউ যখন তার আস্তানায় সালাত আদায় করবে, এরপর যদি সে ইমামের সাথে জামা‘আত পায়, তাহলে সে যেন তাদের সাথে পুনরায় সালাত আদায় করে। কেননা, তা তার জন্য নফল (অতিরিক্ত) হবে।" তিনি বলেন: তখন তাদের একজন বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। অতঃপর তিনি তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করলেন। তিনি (ইয়াযিদ) বলেন: এরপর লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে উঠে দাঁড়াল এবং আমি তাদের সাথে দাঁড়ালাম। সে সময় আমি ছিলাম সবচেয়ে যুবক ও শক্তিশালী পুরুষদের একজন। তিনি বলেন: আমি লোকদের ভিড় ঠেলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পৌঁছলাম এবং তাঁর হাত ধরে আমার চেহারা অথবা বুকের উপর রাখলাম। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতের চেয়ে অধিক পবিত্র ও শীতল আর কিছুই পাইনি। তিনি (ইয়াযিদ) বলেন: আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন মাসজিদুল খায়ফে ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11936)


11936 - عن عروة، قال: خاصم الزبير رجلا من الأنصار، في شريج من الحرة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"اسق يا زبير، ثم أرسل الماء إلى جارك"، فقال الأنصاري: يا رسول اللَّه، أن كان ابن عمتك؟ ! فتلون وجهه، ثم قال:"اسق يا زبير، ثم احبس الماء حتى يرجع إلى الجدر، ثم أرسل الماء إلى جارك". واستوعى النبي صلى الله عليه وسلم للزبير حقه، في صريح الحكم، حين أحفظه الأنصاري، كان أشار عليهما بأمر لهما فيه سعة. قال الزبير: فما أحسب هذه الآيات إلا نزلت في ذلك: {فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ}.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4585) عن علي بن عبد اللَّه، حدّثنا محمد بن جعفر، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن عروة، قال: فذكره.

وصورته إرسال وهو متصل بالمعنى.

فقد رواه أحمد (1419) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني عروة بن الزبير، أن الزبير كان يحدث، أنه خاصم رجلا من الأنصار، فذكر القصة، وكان عمر عروة عند مقتل أبيه ثلاثة عشر عاما، ولذا جزم البخاري وغيره بسماعه من أبيه.

وقد يكون عروة سمعه أيضًا من أخيه عبد اللَّه بن الزبير، كما رواه البخاريّ في المساقاة (2359 - 2360) ومسلم في الفضائل (5357) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، أن عبد اللَّه بن الزبير، حدثه أن رجلا من الأنصار خاصم الزبير، فذكر الحديث.

ورواه ابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 993) من حديث الليث ويونس كلاهما عن الزهري نحوه.

وفيه رد على الحاكم (3/ 363): في قوله بعد أن رواه عن محمد بن عبد اللَّه بن مسلم الزهري، عن عمه، عن عروة بن الزبير، عن عبد اللَّه بن الزبير، عن الزبير:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، فإني لا أعلم أحدا أقام هذا الإسناد عن الزهري، بذكر عبد اللَّه بن الزبير، عن أخيه، وهو عنه ضعيف".

وأما ما روي عن أبي الأسود قال: اختصم رجلان إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقضى بينهما، فقال الذي قضى عليه: ردنا إلى عمر بن الخطاب، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"نعم، انطلقا إلى عمر"، فلما أتيا عمر قال الرجل: يا ابن الخطاب قضى لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على هذا، فقال: ردنا إلى عمر فردنا إليك، فقال: أكذلك؟ قال: نعم، فقال عمر: مكانكما حتى أخرت إليكما فأقضي بينكما، فخرج
إليهما، مشتملا على سيفه، فضرب الذي قال: ردنا إلى عمر فقتله، وأدبر الآخر فارا إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول اللَّه، قتل عمر واللَّه صاحبي، ولو ما أني أعجزته لقتلني، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما كنت أظن أن يجترئ عمر على قتل مؤمنين"، فأنزل اللَّه تعالى: {فَلَا وَرَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ حَتَّى يُحَكِّمُوكَ فِيمَا شَجَرَ بَيْنَهُمْ ثُمَّ لَا يَجِدُوا فِي أَنْفُسِهِمْ حَرَجًا مِمَّا قَضَيْتَ وَيُسَلِّمُوا تَسْلِيمًا}. فهدر دم ذلك الرجل، وبرئ عمر من قتله، فكره اللَّه أن يسن ذلك بعد، فقال: {وَلَوْ أَنَّا كَتَبْنَا عَلَيْهِمْ أَنِ اقْتُلُوا أَنْفُسَكُمْ أَوِ اخْرُجُوا مِنْ دِيَارِكُمْ مَا فَعَلُوهُ إِلَّا قَلِيلٌ مِنْهُمْ} إلى قوله: {وَأَشَدَّ تَثْبِيتًا (66)}. فهو ضعيف.

رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 994) عن يونس بن عبد الأعلى قراءة، أنبأنا ابن وهب، أخبرني عبد اللَّه بن لهيعة، عن أبي الأسود قال: فذكره.

وأبو الأسود لم يلق عمر، بل لم يلق أحدا من الصحابة، وإنما يروي عن أتباع التابعين.

وعبد اللَّه بن لهيعة فيه كلام معروف، وإن كانت رواية عبد اللَّه بن وهب -وهو أحد العبادلة- أعدل من غيرهم.

قال الحافظ ابن كثير في تفسيره:"هو أثر غريب، وهو مرسل، وابن لهيعة ضعيف" اهـ.



تعالى ونهيه، ولم يطمعوا ما لم يأمرهم اللَّه تعالى أو نهى عنه لكان خيرا لهم في الدنيا والآخرة؛ فإن من تكلف بعمل لم يأمره اللَّه تعالى أو اجتنب من شيء لم ينه اللَّه تعالى عنه، فقد وقع في حرج شديد، ولا يستطع القيام به.




উরওয়াহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) 'আল-হাররাহ' নামক স্থানের একটি নালা (যার মাধ্যমে পানি সরবরাহ করা হতো) নিয়ে একজন আনসারী ব্যক্তির সাথে ঝগড়া করলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে যুবাইর! তুমি (আগে) তোমার ক্ষেতে পানি দাও, অতঃপর তোমার প্রতিবেশীর দিকে পানি ছেড়ে দাও।" তখন আনসারী লোকটি বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! তিনি কি আপনার ফুফাতো ভাই বলে?" (এ কথা শুনে) তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর) চেহারা পরিবর্তিত হয়ে গেল। অতঃপর তিনি বললেন: "হে যুবাইর! তুমি (আগে) তোমার ক্ষেতে পানি দাও এবং (তোমার খেতের) সীমানা প্রাচীর পর্যন্ত পানি আটকে রাখো, তারপর তোমার প্রতিবেশীর দিকে পানি ছেড়ে দাও।" আনসারী লোকটি যখন তাঁকে (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কে) ক্রোধান্বিত করল, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম স্পষ্ট ফয়সালার মাধ্যমে যুবাইরের পুরো অধিকার নিশ্চিত করলেন। (অথচ এর আগে) তিনি তাদের দু'জনের জন্য সহজসাধ্য একটি সমাধানের দিকে ইশারা করেছিলেন। যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার মনে হয় না যে এই আয়াতগুলো এ ঘটনা ছাড়া অন্য কোনো বিষয়ে অবতীর্ণ হয়েছে: "কিন্তু না, আপনার রবের শপথ! তারা কিছুতেই মুমিন হতে পারবে না, যতক্ষণ না তারা তাদের নিজেদের মধ্যে সৃষ্ট কলহ-বিবাদের বিচারভার আপনার ওপর ন্যস্ত করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (11937)


11937 - عن عائشة قالت: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من نبي يَمْرضُ إلا خُيِّرَ بين الدنيا والآخرة"، وكان في شكواه الذي قُبِضَ فيه أخذته بحَّةٌ شديدة، فسمعته يقول: {مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ} فعلمت أنه خُيِّرَ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4586) ومسلم في فضائل الصحابة (2444: 86) كلاهما من طريق سعد بن إبراهيم، عن عروة، عن عائشة، قالت: فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো নবী নেই যিনি অসুস্থ হন, কিন্তু তাঁকে দুনিয়া ও আখিরাতের মধ্যে যেকোনো একটি বেছে নেওয়ার সুযোগ দেওয়া হয়।" আর যেই অসুস্থতায় তাঁর মৃত্যু হয়েছিল, তাতে তাঁর কণ্ঠস্বর খুব বেশি ভেঙে গিয়েছিল (বা গলা ভারি হয়ে গিয়েছিল)। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: "{যাদের উপর আল্লাহ অনুগ্রহ করেছেন, সেই নবীগণ, সিদ্দীকগণ, শহীদগণ এবং নেককারদের সাথে}"। তখন আমি বুঝলাম যে, তাঁকে (দুনিয়ার উপর আখিরাতকে) বেছে নেওয়ার সুযোগ দেওয়া হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (11938)


11938 - عن عائشة قالت: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول اللَّه، واللَّه إنك لأحب إليَّ من نفسي، وإنك لأحب إلي من أهلي، وأحب إليَّ من ولدي، وإني لأكون في البيت فأذكرك فما أصبر حتى آتيك، فأنظر إليك، وإذا ذكرت موتي وموتك عرفت أنك إذا دخلت الجنة رُفِعْتَ مع النبيين، وإني إذا دخلت الجنة خشيت أن لا أراك. فلم يَرُدَّ عليه النبي صلى الله عليه وسلم حتى نزل جبريل بهذه الآية {مَعَ الَّذِينَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ مِنَ النَّبِيِّينَ وَالصِّدِّيقِينَ وَالشُّهَدَاءِ وَالصَّالِحِينَ} الآية.

حسن: رواه الطبراني في الأوسط (480)، وأبو نعيم في الحلية (4/ 239 - 240)، وعنه الواحدي في أسباب النزول (ص: 159) وابن مردويه في تفسيره (ابن كثير) كلهم من حديث عبد اللَّه ابن عمران العابدي، قال: حدّثنا فضيل بن عياض، عن منصور، عن الأسود، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن عمران بن رزين -بفتح الراء وكسر الزاي- العابدي المكي صدوق معمر كما في"التقريب".

قال الهيثمي في المجمع (7/ 7):"رجاله رجال الصحيح غير عبد اللَّه بن عمران وهو ثقة". ونقل ابن كثير عن الحافظ أبي عبد اللَّه المقدسي أنه قال:"لا أرى بإسناده بأسا".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর কসম, আপনি আমার কাছে আমার নিজের চেয়েও অধিক প্রিয়, আমার পরিবারের চেয়েও অধিক প্রিয় এবং আমার সন্তান-সন্ততি থেকেও অধিক প্রিয়। আমি ঘরে থাকি, যখনই আপনাকে স্মরণ করি, আমি ধৈর্য ধারণ করতে পারি না যতক্ষণ না আপনার কাছে আসি এবং আপনাকে দেখি। আর যখন আমি আমার মৃত্যু ও আপনার মৃত্যুর কথা স্মরণ করি, তখন আমি জানি যে আপনি জান্নাতে প্রবেশ করলে নবীগণের সাথে উচ্চ মর্যাদায় উন্নীত হবেন। আর আমি যদি জান্নাতে প্রবেশ করি, তবে আশঙ্কা করি যে আমি আপনাকে দেখতে পাব না। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে কোনো উত্তর দিলেন না, যতক্ষণ না জিবরীল (আঃ) এই আয়াত নিয়ে নাযিল হলেন: "যাদের উপর আল্লাহ অনুগ্রহ করেছেন— সেইসব নবী, সিদ্দীক (সত্যবাদী), শহীদ ও সালিহীন (নেককার)দের সঙ্গে।" (সূরা নিসা, আয়াত ৬৯)।









আল-জামি` আল-কামিল (11939)


11939 - عن ربيعة بن كعب الأسلمي قال: كنت أبيت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأتيته بوضوئه وحاجته، فقال:"سَلْ"، فقلت: أسألك مرافقتك في الجنة، قال:"أو غير ذلك؟" قلت: هو ذاك، قال:"فَأَعِنّي على نفسك بكثرة السجود".
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (489) عن الحكم بن موسى أبي صالح، حدّثنا هقل بن زياد، قال: سمعت الأوزاعي، قال: حدثني يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن، حدثني ربيعة بن كعب الاسلمي، فذكره.

قوله:"فَأَعِنّي على نفسك بكثرة السجود" أي: تكثر من الصلاة إن كنت تريد مرافقتي، والمعية لا تستلزم المساواة، ولذا لا يحتاج إلى تأويل، وفيه دليل لمن قال: إن كثرة الركوع والسجود أفضل من إطالة الركوع والسجود.




রাবী'আ ইবনু কা'ব আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রাত্রি যাপন করতাম এবং তাঁর ওযুর পানি ও অন্যান্য প্রয়োজনের বস্তু নিয়ে আসতাম। তিনি বললেন, 'চাও।' আমি বললাম, আমি জান্নাতে আপনার সাথীত্ব প্রার্থনা করি। তিনি বললেন, 'অন্য কিছু কি নয়?' আমি বললাম, এটাই (আমার একমাত্র আকাঙ্ক্ষা)। তিনি বললেন, 'তবে তুমি বেশি বেশি সিজদা করার মাধ্যমে নিজের ব্যাপারে আমাকে সাহায্য করো।'









আল-জামি` আল-কামিল (11940)


11940 - عن حذيفة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في ليلة الأحزاب:"ألا رجل يأتيني بخبر القوم، جعل اللَّه معي يوم القيامة؟" ثلاث مرات، فلم يجبه أحد. ثم قال:"قم يا حذيفة، فأتنا بخبر القوم".

صحيح: رواه مسلم في الجهاد والسير (1788) من طرق عن جرير، عن الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن أبيه، عن حذيفة، فذكره في حديث طويل.




হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আহযাবের (খন্দকের) রাতে বললেন, "এমন কোনো লোক কি নেই যে শত্রুদের খবর এনে আমাকে দেবে? আল্লাহ তাকে কিয়ামতের দিন আমার সাথী বানাবেন।" তিনি তিনবার একথা বললেন, কিন্তু কেউ সাড়া দিল না। অতঃপর তিনি বললেন, "হে হুযাইফাহ! ওঠো, এবং শত্রুদের খবর নিয়ে এসো।"









আল-জামি` আল-কামিল (11941)


11941 - عن ابن عباس قال: كنت أنا وأمي من المستضعفين، أنا من الولدان وأمي من النساء.

صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1357) عن علي بن عبد اللَّه، قال: حدّثنا سفيان، عن عبيد اللَّه قال: سمعت ابن عباس، قال: فذكره.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি ও আমার আম্মা দুর্বলদের (মুস্তাদ‘আফীন) অন্তর্ভুক্ত ছিলাম; আমি ছিলাম শিশুদের মধ্যে এবং আমার আম্মা ছিলেন নারীদের মধ্যে।









আল-জামি` আল-কামিল (11942)


11942 - عن ابن أبي مليكة، أن ابن عباسِ تلا: {إِلَّا الْمُسْتَضْعَفِينَ مِنَ الرِّجَالِ وَالنِّسَاءِ وَالْوِلْدَانِ} [النساء: 98] قال: كنت أنا وأمي ممن عذره اللَّه.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4588) عن سليمان بن حرب، حدّثنا حماد بن زيد، عن أيوب، عن ابن أبي مليكة، فذكره.



يودون لو فرض عليهم القتال كما يدل عليه الحديث الآتي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি [কুরআনের আয়াত]: {ব্যতীত দুর্বল পুরুষ, নারী ও শিশুদেরকে} [সূরা নিসা: ৯৮] তিলাওয়াত করলেন। তিনি বললেন: আমি এবং আমার মা তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম, যাদেরকে আল্লাহ অব্যাহতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (11943)


11943 - عن ابن عباس أن عبد الرحمن بن عوف وأصحابا له أتوا النبي صلى الله عليه وسلم بمكة، فقالوا: يا رسول اللَّه، إنا كنا في عزّ، ونحن مشركون، فلما آمنا صرنا أذلة، فقال: إني أُمِرت بالعفو، فلما حولنا اللَّه إلى المدينة أُمِرْنا بالقتال، فكفوا، فأنزل اللَّه عز وجل: {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوا أَيْدِيَكُمْ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ فَلَمَّا كُتِبَ عَلَيْهِمُ الْقِتَالُ إِذَا فَرِيقٌ مِنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ}.

حسن: رواه النسائي (3086) والحاكم (2/ 66 - 67) وعنه البيهقي (9/ 11) وابن أبي حاتم في تفسيره (3/ 1005) والطبري في تفسيره (7/ 231) كلهم من طريق الحسين بن واقد، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الحسين بن واقد، فإنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط البخاري".

قوله: {إِذَا فَرِيقٌ مِنْهُمْ يَخْشَوْنَ النَّاسَ كَخَشْيَةِ اللَّهِ أَوْ أَشَدَّ خَشْيَةً وَقَالُوا رَبَّنَا لِمَ كَتَبْتَ عَلَيْنَا الْقِتَالَ لَوْلَا أَخَّرْتَنَا إِلَى أَجَلٍ قَرِيبٍ}.

هذا قول قوم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم الذين استعجلوا القتال، فلما فرض عليهم شق عليهم، وخافوا الناس أن يقاتلوهم، وقالوا: يعني إلى موتهم الطبيعي مثل موتهم على فراشهم، فوبخهم اللَّه تعالى، ووعظهم بأن متاع الدنيا قليل، وإن الآخرة خير لهم، وقد جاء في الحديث الصحيح.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আবদুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর কয়েকজন সঙ্গী মক্কায় নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমরা মুশরিক থাকাকালে সম্মানের মধ্যে ছিলাম। কিন্তু যখন আমরা ঈমান আনলাম, তখন আমরা লাঞ্ছিত হয়ে গেলাম।’ তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘নিশ্চয়ই আমাকে ক্ষমা করার (সংযম অবলম্বনের) নির্দেশ দেওয়া হয়েছে। এরপর যখন আল্লাহ আমাদের মদিনায় স্থানান্তরিত করলেন, তখন আমাদের যুদ্ধের নির্দেশ দেওয়া হলো। অতএব, তোমরা (যুদ্ধ থেকে) বিরত থাকো।’ অতঃপর আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {তুমি কি তাদের দেখনি, যাদের বলা হয়েছিল—তোমরা তোমাদের হাত গুটিয়ে রাখো, সালাত কায়েম করো এবং যাকাত প্রদান করো? অতঃপর যখন তাদের উপর যুদ্ধ ফরয করা হলো, তখন তাদের একদল মানুষকে ভয় করতে শুরু করলো...}।









আল-জামি` আল-কামিল (11944)


11944 - عن سهل بن سعد الساعدي أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"وموضع سوط أحدكم من الجنة خير من الدنيا وما فيها".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد (2892) ومسلم في الإمارة (1881) كلاهما من حديث أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره في حديث طويل، واللفظ للبخاري، ولم يذكر مسلم هذا اللفظ.

وقيل: إن قوله تعالى: {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ قِيلَ لَهُمْ كُفُّوا أَيْدِيَكُمْ} نزلت في اليهود، ونهى اللَّه تبارك وتعالى هذه الأمة أن يصنعوا صنيعهم. روي ذلك عن ابن عباس، ولا يصح، والأول هو الصحيح.




সাহল ইবনু সা'দ আস-সা'ইদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের কারো এক বেত পরিমাণ জায়গা জান্নাতে পাওয়া— দুনিয়া এবং এর মধ্যে যা কিছু আছে, তা থেকে উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (11945)


11945 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أطاعني فقد أطاع اللَّه، ومن عصاني فقد عصى اللَّه، ومن أطاع أميري فقد أطاعني، ومن عصى أميري فقد عصاني".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأحكام (7137) ومسلم في الإمارة (1835: 33) كلاهما من حديث عبد اللَّه بن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن، أنه
سمع أبا هريرة، يقول: فذكره، ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে আমার আনুগত্য করল, সে অবশ্যই আল্লাহর আনুগত্য করল, আর যে আমার অবাধ্যতা করল, সে অবশ্যই আল্লাহর অবাধ্যতা করল। আর যে আমার শাসকের (আমীরের) আনুগত্য করল, সে অবশ্যই আমার আনুগত্য করল, আর যে আমার শাসকের (আমীরের) অবাধ্যতা করল, সে অবশ্যই আমার অবাধ্যতা করল।”









আল-জামি` আল-কামিল (11946)


11946 - عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده قال:"لقد جلست أنا وأخي مجلسا ما أُحِبّ أنّ لي به حُمْرُ النعم، أقبلتُ أنا وأخي، وإذا مشيخةٌ من صحابة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جلوس عند باب من أبوابه، فكرهنا أن نفرّق بينهم، فجلسنا حَجرةً، إذ ذكروا آيةً من القرآن، فتماروا فيها، حتى ارتفعت أصواتهم، فخرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مُغضَبًا، قد احمرّ وجهه، يرميهم بالتراب، ويقول:"مهلا يا قوم، بهذا أُهلكت الأمم مِن قبلكم، باختلافهم على أنبيائهم، وضربهم الكُتُب بعضها ببعض، إنّ القرآن لم ينزل يُكذّب بعضه بعضا، بل يصدّق بعضه بعضا، فما عرفتم منه، فاعملوا به، وما جهلتم منه، فرُدّوه إلى عالمه".

حسن: رواه أحمد (6702) عن أنس بن عياض، حدّثنا أبو حازم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب؛ فإنّه حسن الحديث، وكذا أبوه.

وقد حذّر النبي صلى الله عليه وسلم من الاختلاف في القرآن الكريم كما في الحديث الآتي.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং আমার ভাই এমন এক মজলিসে বসেছিলাম, যার বিনিময়ে মূল্যবান উট (বা দুনিয়ার সকল সম্পদ) লাভ করাটাও আমি পছন্দ করি না (অর্থাৎ, সেই মজলিসে বসা উচিত হয়নি)। আমি ও আমার ভাই সেখানে উপস্থিত হলাম, তখন আমরা দেখলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্য হতে কয়েকজন প্রবীণ লোক তাঁর দরজার কাছে বসে আছেন। আমরা তাদের মাঝে ফাঁক করে বসতে অপছন্দ করলাম, তাই আমরা একপাশে বসে পড়লাম। এমন সময় তারা কুরআনের একটি আয়াত আলোচনা করলেন এবং সেটি নিয়ে তর্ক-বিতর্ক শুরু করলেন, এমনকি তাদের কণ্ঠস্বর উঁচু হয়ে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত অবস্থায় বের হয়ে আসলেন। তাঁর চেহারা লাল হয়ে গিয়েছিল। তিনি তাদের দিকে মাটি ছুঁড়ে মারতে লাগলেন এবং বলছিলেন: "হে লোক সকল! থামো! তোমাদের পূর্বের উম্মতগণ এ কারণেই ধ্বংস হয়ে গিয়েছিল—নবীগণের ব্যাপারে মতভেদ করা এবং কিতাবের কিছু অংশ দ্বারা অন্য অংশকে আঘাত করার (খণ্ডন করার) কারণে। নিশ্চয়ই কুরআন এমনভাবে নাযিল হয়নি যে, এর কিছু অংশ অন্য অংশকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করবে; বরং এর কিছু অংশ অন্য অংশকে সত্যায়ন করে। সুতরাং এর মধ্যে যা তোমরা জানতে পেরেছ, তদনুযায়ী আমল করো। আর যা তোমরা জানো না, তা এর জ্ঞানীর দিকে ফিরিয়ে দাও (জিজ্ঞাসা করো)।"









আল-জামি` আল-কামিল (11947)


11947 - عن أبي عمران الجوني قال:"كتب إليّ عبد اللَّه بن رباح الأنصاري أنّ عبد اللَّه ابن عمرو قال:"هجّرتُ إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومًا". قال:"فسمع أصوات رجلين اختلفا في آية. فخرج علينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يعرف في وجهه الغضب فقال:"إنّما أهلك مَن كان قبلكم باختلافهم في الكتاب".

صحيح: رواه مسلم في العلم (2666) عن أبي كامل فضيل بن حسين الجحدري، حدّثنا حماد ابن زيد، حدّثنا أبو عمران الجوني فذكره.

وفي معناه أحاديث أخرى مذكورة في كتاب العلم.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দিনের প্রথম প্রহরে গেলাম। তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর) বললেন, তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুজন লোকের কণ্ঠস্বর শুনতে পেলেন যারা একটি আয়াত নিয়ে মতবিরোধ করছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট বের হয়ে আসলেন, যার চেহারায় রাগের চিহ্ন স্পষ্ট ছিল। অতঃপর তিনি বললেন, "তোমাদের পূর্ববর্তীরা কেবল কিতাবের বিষয়ে তাদের মতানৈক্যের কারণেই ধ্বংস হয়েছে।"