আল-জামি` আল-কামিল
12248 - عن أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المؤمن للمؤمن كالبنيان، يشد بعضه بعضا". وشبّك بين أصابعه.
متفق عليه: رواه البخاري في المظالم (2446)، ومسلم في البر والصلة (2585) كلاهما من طريق بريد، عن أبي بردة، عن أبي موسى، فذكره. واللفظ للبخاري ولم يذكر مسلم التشبيك بين الأصابع.
আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মু'মিন মু'মিনের জন্য ইমারতের (অট্টালিকার) মতো, যার এক অংশ অন্য অংশকে শক্তিশালী করে। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর আঙ্গুলগুলো একটির সাথে অপরটি প্রবেশ করিয়ে দেখালেন।
12249 - عن النعمان بن بشير قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ترى المؤمنين في تراحمهم وتوادهم وتعاطفهم كمثل الجسد، إذا اشتكى عضوا تداعى له سائر جسده بالسهر والحمى".
متفق عليه: رواه البخاري في الأدب (6011)، ومسلم في البر والصلة (2586) كلاهما من طريق زكريا، عن عامر الشعبي، عن النعمان بن بشير، قال: فذكره. واللفظ للبخاري.
নু'মান ইবন বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তুমি মু'মিনদের দেখবে তাদের পারস্পরিক দয়া, ভালোবাসা এবং সহানুভূতির ক্ষেত্রে তারা একটি দেহের মতো। যখন এর কোনো একটি অঙ্গ অসুস্থ হয়, তখন তার জন্য দেহের অন্যান্য অংশও নির্ঘুমতা ও জ্বরে আক্রান্ত হয়।"
12250 - عن عبد الله بن قيس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"جنتان من فضة، آنيتهما وما فيهما، وجنتان من ذهب آنيتهما وما فيهما، وما بين القوم وبين أن ينظروا إلى ربهم إلا رداء الكبر على وجهه في جنة عدن".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4878)، ومسلم في الإيمان (180) كلاهما من طريق عبد العزيز بن عبد الصمد العمّي، حدثنا أبو عمران الجوني، عن أبي بكر بن عبد الله بن قيس، عن أبيه (وهو عبد الله بن قيس أبو موسى الأشعري)، فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.
قوله: {وَرِضْوَانٌ مِنَ اللَّهِ أَكْبَر} أي: رضا الله عنهم أكبر وأجل وأعظم مما هم فيه من
النعيم. كما في الصحيح.
আব্দুল্লাহ ইবনে কাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দুটি জান্নাত রূপার হবে, যার পাত্রসমূহ এবং তাতে যা কিছু আছে (সব রূপার)। আর দুটি জান্নাত সোনার হবে, যার পাত্রসমূহ এবং তাতে যা কিছু আছে (সব সোনার)। আর আদন জান্নাতে সেই লোকদের (জান্নাতবাসীদের) এবং তাদের প্রতিপালকের দিকে তাকানোর মাঝে তাঁর চেহারার উপর অবস্থিত অহংকারের চাদর ব্যতীত আর কিছুই থাকবে না।”
12251 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله يقول لأهل الجنة: يا أهل الجنة! يقولون: لبيك ربنا وسعديك. فيقول: هل رضيتم فيقولون: وما لنا لا نرضى، وقد أعطيتنا ما لم تعط أحدا من خلقك. فيقول: أنا أعطيكم أفضل من ذلك. قالوا: يا رب! وأيّ شيء أفضل من ذلك؟ فيقول: أحل عليكم رضواني، فلا أسخط عليكم بعده أبدا".
متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6549)، ومسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (2829) كلاهما من طريق مالك بن أنس، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، قال: فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ জান্নাতবাসীদেরকে বলবেন: হে জান্নাতবাসীগণ! তারা বলবে: হে আমাদের প্রতিপালক! আমরা আপনার ডাকে সাড়া দিচ্ছি এবং আমরা আপনার কাছে সৌভাগ্য কামনা করছি। তখন তিনি বলবেন: তোমরা কি সন্তুষ্ট হয়েছ? তখন তারা বলবে: আমরা কেন সন্তুষ্ট হবো না, যখন আপনি আপনার সৃষ্টির মধ্যে অন্য কাউকে যা দেননি, তা আমাদের দিয়েছেন। তখন তিনি বলবেন: আমি তোমাদেরকে এর চেয়েও উত্তম কিছু দেব। তারা বলবে: হে প্রতিপালক! এর চেয়ে উত্তম আর কী হতে পারে? তখন তিনি বলবেন: আমি তোমাদের ওপর আমার সন্তুষ্টি অবধারিত করে দেব, এরপর আমি তোমাদের ওপর আর কখনো অসন্তুষ্ট হব না।"
12252 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دخل أهل الجنة الجنة" قال:"يقول الله عز وجل: هل تشتهون شيئا فأزيدكم؟ فيقولون: ربنا وما فوق ما أعطيتنا؟ قال:"يقول: رضواني أكبر".
صحيح: رواه ابن حبان (7439)، والحاكم (1/ 82) كلاهما من طريق محمد بن يوسف الفريابي، حدثنا سفيان الثوري، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله قال: فذكره. واللفظ للحاكم، ولفظ ابن حبان نحوه. وإسناده صحيح.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন জান্নাতবাসীরা জান্নাতে প্রবেশ করবে, তখন আল্লাহ তা‘আলা বলবেন: 'তোমরা কি এমন কিছু চাও যা আমি তোমাদের আরও বেশি করে দেবো?' তখন তারা বলবে: 'হে আমাদের প্রতিপালক! আপনি আমাদেরকে যা দিয়েছেন তার চেয়েও বেশি কিছু আর কী হতে পারে?' তিনি বলবেন: 'আমার পরম সন্তুষ্টি (রিদওয়ান) সবচেয়ে বড়।"
12253 - عن كعب قال: لما نزل القرآن، فيه ذكر المنافقين وما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال الجلاس: والله! لئن كان هذا الرجل صادقًا لنحن أشر من الحمير، قال: فسمعها عمير بن سعد، فقال: والله يا جلاس إنك لأحب الناس إليّ، أحسنهم عندي أثرًا أو أعزهم علي أن يدخل عليه شيء يكرهه، ولقد قلت مقالة لئن ذكرتها لتفضحنك، ولئن سكتُّ عنها لتهلكني، ولأحدهما أشر علي من الأخرى، فمشى إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر له ما قال الجلاس، فحلف بالله ما قال [ما قال] عمير، ولقد كذب علي، فأنزل الله: {يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ مَا قَالُوا وَلَقَدْ قَالُوا كَلِمَةَ الْكُفْرِ وَكَفَرُوا بَعْدَ إِسْلَامِهِمْ}.
حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1843) عن الحسن بن الربيع، ثنا عبد الله بن إدريس، قال ابن إسحاق: حدثني الزهري، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، عن أبيه، عن جده كعب، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن إسحاق؛ فإنه حسن الحديث إذا صرّح.
কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন কুরআন অবতীর্ণ হলো, যাতে মুনাফিকদের কথা এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী বলেছেন তা উল্লেখ ছিল, তখন জুল্লাস বলল: আল্লাহর কসম! যদি এই লোকটি (মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্যবাদী হন, তাহলে আমরা গাধার চেয়েও নিকৃষ্ট। কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: উমাইর ইবনু সা'দ তা শুনলেন। তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, হে জুল্লাস, তুমি আমার কাছে মানুষের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়, আমার কাছে তোমার মর্যাদা সবচেয়ে ভালো, অথবা তুমি আমার কাছে সবচেয়ে সম্মানিত যে তোমার কাছে এমন কিছু আসুক যা তুমি অপছন্দ করো (অর্থাৎ তুমি আমার কাছে খুবই শ্রদ্ধেয়)। কিন্তু তুমি এমন একটি কথা বলেছ, যা যদি আমি বলি তবে তা তোমাকে অপদস্থ করবে, আর যদি আমি নীরব থাকি তবে তা আমাকে ধ্বংস করে দেবে। আর দুটির (অপদস্থ করা ও নীরব থাকার) মধ্যে একটি আমার কাছে অন্যটি থেকে খারাপ। অতঃপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন এবং জুল্লাস যা বলেছিল, তা তাঁকে জানালেন। তখন (জুল্লাস) আল্লাহর কসম করে বলল যে উমাইর যা বলেছেন, তা সে বলেনি এবং সে (উমাইর) আমার উপর মিথ্যা আরোপ করেছে। তখন আল্লাহ তা'আলা নাযিল করলেন: "তারা আল্লাহর নামে শপথ করে যে তারা (ঐ কথা) বলেনি, অথচ তারা কুফরের কথা অবশ্যই বলেছে এবং ইসলাম গ্রহণের পর কুফরি করেছে।" (সূরা আত-তওবা, আয়াত ৭৪)।
12254 - عن ابن عباس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسًا في ظلّ شجرة، فقال:"إنه سيأتيكم إنسانٌ، فينظر إليكم بعيني شيطان، فإذا جاء فلا تكلموه". فلم يلبث أن طلَع رجل أزرقُ، فدعاه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"علامَ تشتمني أنت وأصحابك؟". فانطلق الرجل، فجاء بأصحابه، فحلفوا بالله ما قالوا وما فعلوا، حتى تجاوَز عنهم، فأنزل الله: {يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ مَا قَالُوا} ثم نعتهم جميعًا، إلى آخر الآية.
حسن. رواه ابن جرير الطبري في تفسيره (11/ 571) عن أيوب بن إسحاق بن إبراهيم، قال: ثنا عبد الله بن رجاء، قال: ثنا إسرائيل، عن سماك، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل أيوب بن إسحاق وعبد الله بن رجاء وسماك فكلهم حسن الحديث.
وفي معناه ما روي عن أنس بن مالك أنه قال: سمع زيد بن أرقم رجلا من المنافقين يقول - والنبي صلى الله عليه وسلم يخطب -: إن كان هذا صادقا لنحن شر من الحمير. فقال زيد: هو والله صادق، ولأنت أشر من الحمار، فرفع ذلك إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فجحد القائل، فأنزل الله: {يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ مَا قَالُوا} الآية. فكانت الآية في تصديق زيد.
أخرجه ابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1842 - 1843) عن أبي زرعة، ثنا يعقوب بن حميد بن كاسب، ثنا محمد بن فليح، عن موسى بن عقبة، عن عبد الله بن الفضل، عن أنس بن مالك، قال: فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل يعقوب بن حميد بن كاسب؛ فإنه يحسن حديثه إذا توبع.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি গাছের নিচে বসেছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "শীঘ্রই তোমাদের কাছে একজন লোক আসবে, যে তোমাদের দিকে শয়তানের চোখে তাকাবে। সে যখন আসবে, তখন তোমরা তার সাথে কথা বলো না।" অল্প কিছুক্ষণ পরই এক নীল চোখবিশিষ্ট (মতান্তরে: রোগা) লোক উপস্থিত হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ডাকলেন এবং বললেন: "তুমি এবং তোমার সঙ্গীরা কেন আমাকে গালি দাও?" অতঃপর লোকটি চলে গেল এবং তার সঙ্গীদের নিয়ে এলো। তারা আল্লাহর কসম করে বলল যে তারা কিছুই বলেনি এবং কিছুই করেনি। অবশেষে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের ক্ষমা করলেন। এরপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তারা আল্লাহর নামে কসম করে যে তারা কিছুই বলেনি" (সূরা মুজাদালাহ: ৬) – এরপর আল্লাহ তাদের সকলের (মুনাফিকদের) পরিচয় বর্ণনা করলেন, আয়াতের শেষ পর্যন্ত।
12255 - عن عبد الله بن مسعود قال: اعتبروا المنافقين بثلاث: إذا حدث كذب، وإذا وعد أخلف، وإذا عاهد غدر، وأنزل الله تصديق ذلك {وَمِنْهُمْ مَنْ عَاهَدَ اللَّهَ لَئِنْ آتَانَا مِنْ فَضْلِهِ} إلى قوله {يَكْذِبُونَ}.
صحيح: رواه ابن جرير في تفسيره (11/ 583)، وابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1846)، والطبراني في الكبير (9/ 252) كلهم من حديث الأعمش، عن عمارة بن عمير، عن عبد الرحمن
ابن يزيد، قال: قال عبد الله بن مسعود: فذكره.
وإسناده صحيح.
وروي عن أبي أمامة الباهلي، عن ثعلبة بن حاطب، أنه قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: ادع الله أن يرزقني مالا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ويحك يا ثعلبة، قليل تؤدِّي شكره، خير من كثير لا تطيقه". قال: ثم رجع إليه، فقال يا رسول الله، ادع الله أن يرزقني مالا قال:"ويحك يا ثعلبة، أما ترضى أن تكون مثل رسول الله، فوالله، لو سألت الله أن تسيل لي الجبال ذهبًا وفضة لسالتْ" ثم رجع إليه فقال: ادع الله أن يرزقني مالا، والله لئن آتاني الله مالا لأوتين كلّ ذي حق حقه، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم ارزق ثعلبة مالا، اللهم ارزق ثعلبة مالا، اللهم ارزق ثعلبة مالا" قال: فاتَّخذ غنمًا، فنمتْ كما ينمو الدُّود، حتى ضاقت عنها أزقة المدينة فتنحى بها، فكان يشهد الصلاة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم يخرج إليها، ثم نمت حتى تعذرت عليه مراعي المدينة فتنحى بها، فكان يشهد الجمعة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم يخرج إليها، ثم نمت، فتنحَّى بها، فترك الجمعة والجماعات، فيتلقى الركبان ويقول: ماذا عندكم من الخبر؟ وما كان من أمر الناس؟ فأنزل الله عز وجل على رسوله صلى الله عليه وسلم: {خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِمْ بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْ إِنَّ صَلَاتَكَ سَكَنٌ لَهُمْ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ} [سورة التوبة: 103] قال: فاستعمل رسول الله صلى الله عليه وسلم على الصدقات رجلين: رجلا من الأنصار ورجلا من بني سليم. وكتب لهما سنة الصدقة وأسنانها، وأمرهما أن يصدقا الناس، وأن يمرا بثعلبة فيأخذا من صدقة ماله، ففعلا حتى ذهبا إلى ثعلبة، فأقرآه كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: صدّقا الناس، فإذا فرغتما فمرّا بي ففعلا، فقال: والله ما هذه إلا أخية الجزية، فانطلقا حتى لحقا رسول الله صلى الله عليه وسلم. وأنزل الله عز وجل على رسوله صلى الله عليه وسلم: {وَمِنْهُمْ مَنْ عَاهَدَ اللَّهَ لَئِنْ آتَانَا مِنْ فَضْلِهِ} إلى قوله {يَكْذِبُونَ} قال: فركب رجل من الأنصار قريب لثعلبة راحلة حتى أتى ثعلبة، فقال: ويحك يا ثعلبة! هلكت، أنزل الله عز وجل فيك القرآن كذا، فأقبل ثعلبة، ووضع التراب على رأسه وهو يبكي ويقول:"يا رسول الله! يا رسول الله! فلم يقبل منه رسول الله صلى الله عليه وسلم صدقته حتى قبض الله رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم أتى أبا بكر بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا أبا بكر! قد عرفت موقعي من قومي ومكاني من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فاقبل مني، فأبى أن يقبله، ثم أتى عمر، فأبى أن يقبل منه، ثم أتى عثمان، فأبى أن يقبل منه، ثم مات ثعلبة في خلافة عثمان.
رواه ابن جرير الطبري في تفسيره (11/ 578 - 580)، وابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1847 - 1849)، والطبراني في الكبير (8/ 260 - 261)، وأبو نعيم في معرفة الصحابة (1/ 495 - 496)، والبيهقي في الشعب (4/ 79 - 81) كلهم من حديث معاذ بن رفاعة، عن علي بن يزيد الألهاني، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة، فذكره.
وهي قصة مختلقة، ولذا تكلم عليها كبار أئمة الحديث، فإن مداره على علي بن يزيد الألهاني، وهو ضعيف جدا عند جمهور أهل العلم.
قال البخاري فيه:"منكر الحديث ضعيف". وقال الدارقطني:"متروك". وقال الساجي:"اتفق أهل العلم على ضعفه". وقال الذهبي في تجريد أسماء الصحابة (1/ 66) بعد ما أشار إلى جزء من الحديث:"فذكر حديثا طويلا منكرا بمرة".
وقال الهيثمي في المجمع (7/ 32):"رواه الطبراني وفيه علي بن يزيد الألهاني وهو متروك".
وإني ذكرت هذا الحديث المختلق لشهرته بين الواعظين وأهل التفسير، وكان ينبغي أن أنزه كتابي هذا عن مثل هذا الحديث المنكر، ولكن ذكرته لبيان ضعفه ونكارته عند أهل العلم، والله الموفق.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা মুনাফিকদের তিনটি বিষয় দ্বারা বিবেচনা করো: যখন সে কথা বলে, মিথ্যা বলে; যখন সে ওয়াদা করে, ভঙ্গ করে; আর যখন সে চুক্তি করে, বিশ্বাসঘাতকতা করে। আর আল্লাহ্ এর সত্যতা নিশ্চিত করে আয়াত নাযিল করেছেন: "আর তাদের মধ্যে কেউ কেউ আল্লাহ্র সাথে অঙ্গীকার করেছিল, যদি তিনি নিজ অনুগ্রহে আমাদেরকে দান করেন..." [সূরা আত-তাওবা: ৭৫] থেকে শুরু করে "...তারা মিথ্যাবাদী।" [সূরা আত-তাওবা: ৭৭] পর্যন্ত।
(অন্য এক বর্ণনায়) আবু উমামা বাহিলি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সা'লাবা ইবনে হাতিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আপনি আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন, যেন তিনি আমাকে সম্পদ দান করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আফসোস তোমার জন্য হে সা'লাবা! সামান্য সম্পদ যার কৃতজ্ঞতা তুমি আদায় করো, তা এমন প্রচুর সম্পদ অপেক্ষা উত্তম যা তুমি সামলাতে পারবে না।" তিনি বলেন: এরপর সে তাঁর কাছে ফিরে এসে বললো: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন, যেন তিনি আমাকে সম্পদ দান করেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আফসোস তোমার জন্য হে সা'লাবা! তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, তুমি আল্লাহর রাসূলের মতো হবে? আল্লাহর শপথ! আমি যদি আল্লাহর কাছে চাইতাম যে, পাহাড়সমূহ আমার জন্য সোনা ও রূপা রূপে প্রবাহিত হোক, তবে তা প্রবাহিত হতো।" এরপর সে আবার ফিরে এসে বললো: আল্লাহর কাছে দু‘আ করুন, যেন তিনি আমাকে সম্পদ দান করেন। আল্লাহর শপথ! যদি আল্লাহ আমাকে সম্পদ দেন, তবে আমি অবশ্যই প্রত্যেক হকদারকে তার হক (অংশ) দেবো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু‘আ করলেন: "হে আল্লাহ! সা'লাবাকে সম্পদ দান করুন! হে আল্লাহ! সা'লাবাকে সম্পদ দান করুন! হে আল্লাহ! সা'লাবাকে সম্পদ দান করুন!"
তিনি বলেন: এরপর সে কিছু ছাগল কিনলো। সেগুলো পোকার মতো বাড়তে থাকলো, এমনকি মদীনার অলি-গলি সেগুলোর জন্য সংকীর্ণ হয়ে গেল। সে তখন সেগুলোকে নিয়ে অন্যত্র সরে গেল। সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাতে (নামাজে) অংশ নিতো, এরপর সেগুলোর কাছে চলে যেত। তারপর সেগুলো আরো বাড়তে থাকলো, এমনকি মদীনার চারণভূমি তার জন্য দুষ্প্রাপ্য হয়ে গেল। সে তখন সেগুলোকে নিয়ে আরো দূরে সরে গেল। ফলে সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জুমু‘আর নামাজে অংশ নিতো, এরপর সেগুলোর কাছে চলে যেত। তারপর সেগুলো আরো বাড়তে থাকলো, ফলে সে আরো দূরে সরে গেল এবং জুমু‘আ ও জামা‘আত (ফজিলতপূর্ণ নামাজ)-ও ত্যাগ করলো। সে আরোহীদের সাথে দেখা করতো এবং জিজ্ঞাসা করতো: তোমাদের কাছে কী খবর আছে? মানুষের কী অবস্থা?
অতঃপর আল্লাহ তা‘আলা তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর এই আয়াত নাযিল করলেন: "তাদের সম্পদ থেকে সাদাকা (যাকাত) গ্রহণ করুন। যার দ্বারা আপনি তাদেরকে পবিত্র করবেন এবং পরিশোধন করবেন। আর আপনি তাদের জন্য দু‘আ করুন। নিশ্চয় আপনার দু‘আ তাদের জন্য প্রশান্তি স্বরূপ। আর আল্লাহ সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ।" [সূরা আত-তাওবা: ১০৩]
তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের জন্য দু'জন ব্যক্তিকে নিযুক্ত করলেন: একজন আনসারী এবং অন্যজন বনূ সুলাইম গোত্রের। তিনি তাদের জন্য সাদাকার নিয়ম এবং পশুর বয়স লিখে দিলেন এবং তাদের নির্দেশ দিলেন যেন তারা মানুষের কাছ থেকে সাদাকা গ্রহণ করে এবং সা'লাবার পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় তার সম্পদ থেকে সাদাকা গ্রহণ করে। তারা সে অনুযায়ী কাজ করলো এবং সা'লাবার কাছে পৌঁছালো। তারা তাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চিঠি পাঠ করে শোনালো। সা'লাবা বললো: তোমরা (অন্য) মানুষের কাছ থেকে সাদাকা গ্রহণ করো, যখন তোমাদের কাজ শেষ হবে, তখন আমার কাছে এসো। তারা তাই করলো। এরপর সা’লাবা বললো: আল্লাহর শপথ! এটা তো জিযিয়ার (খাজনার) ভাই ছাড়া আর কিছুই নয়! তারা দু'জন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে গেল। আর আল্লাহ তা‘আলা তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর আয়াত নাযিল করলেন: "আর তাদের মধ্যে কেউ কেউ আল্লাহ্র সাথে অঙ্গীকার করেছিল..." থেকে শুরু করে "...তারা মিথ্যাবাদী।"
বর্ণনাকারী বলেন: তখন সা'লাবার এক আনসারী নিকটাত্মীয় দ্রুতগামী উটে চড়ে সা'লাবার কাছে আসলো এবং বললো: আফসোস তোমার জন্য হে সা'লাবা! তুমি ধ্বংস হয়ে গেছো! আল্লাহ তা‘আলা তোমার সম্পর্কে এই এই আয়াত নাযিল করেছেন। তখন সা’লাবা কাঁদতে কাঁদতে মাথায মাটি ঢালতে ঢালতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলো এবং বললো: হে আল্লাহর রাসূল! হে আল্লাহর রাসূল! কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাদাকা গ্রহণ করলেন না, যতক্ষণ না আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উঠিয়ে নিলেন। এরপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসলো এবং বললো: হে আবূ বাকর! আপনি আমার কওমের মধ্যে আমার অবস্থান এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আমার স্থান সম্পর্কে অবগত আছেন। অতএব আমার কাছ থেকে (সাদাকা) গ্রহণ করুন। কিন্তু তিনিও তা গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন। এরপর সে ‘উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসলো, কিন্তু তিনিও তা গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন। এরপর সে ‘উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসলো, কিন্তু তিনিও তা গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন। অতঃপর ‘উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে সা’লাবা মারা গেল।
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(পর্যালোচনা) এটি একটি মনগড়া (জাল) ঘটনা। এ কারণে হাদীসের প্রখ্যাত ইমামগণ এর বিষয়ে আলোচনা করেছেন। কারণ এর সনদ (বর্ণনা পরম্পরা) আলী ইবনে ইয়াযিদ আল-আলহানী-এর উপর নির্ভরশীল, যাকে অধিকাংশ বিশেষজ্ঞ মুহাদ্দিসগণ খুবই দুর্বল বলে আখ্যায়িত করেছেন। ইমাম বুখারী তার সম্পর্কে বলেছেন: “মুনকারুল হাদীস (প্রত্যাখ্যাত হাদীস বর্ণনাকারী), দুর্বল।” ইমাম দারাকুতনী বলেছেন: “পরিত্যক্ত।” ইমাম সাজী বলেছেন: “আহলে ইলম (বিশেষজ্ঞগণ) তার দুর্বলতার বিষয়ে ঐকমত্য পোষণ করেছেন।” হাফিয হাইসামি (মাজমাউয যাওয়াইদ গ্রন্থে) বলেছেন: “এই হাদীসটি তাবরানী বর্ণনা করেছেন এবং এতে আলী ইবনে ইয়াযিদ আল-আলহানী রয়েছে, আর সে মাতরুক (পরিত্যক্ত)।”
আমি এই মনগড়া হাদীসটি শুধুমাত্র ওয়ায়েযীন (উপদেশ দানকারী) এবং তাফসীরকারকদের মধ্যে এর ব্যাপক পরিচিতির কারণে উল্লেখ করেছি। যদিও এই কিতাবকে এ ধরনের মুনকার (প্রত্যাখ্যাত) হাদীস থেকে মুক্ত রাখা উচিত ছিল। তবে তা আলেমদের নিকট এর দুর্বলতা ও মুনকার হওয়ার বিষয়টি স্পষ্ট করার জন্য উল্লেখ করা হয়েছে। আল্লাহই তাওফীকদাতা।
12256 - عن أبي مسعود قال: لما أمرنا بالصدقة، كنا نتحامل، فجاء أبو عقيل بنصف صاع، وجاء إنسان بأكثر منه، فقال المنافقون: إن الله لغني عن صدقة هذا، وما فعل هذا الآخر إلا رئاء، فنزلت: {يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّعِينَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فِي الصَّدَقَاتِ وَالَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهْدَهُمْ} الآية.
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4668)، ومسلم في الزكاة (1018) كلاهما من طريق بشر بن خالد أبي محمد، أخبرنا محمد بن جعفر، عن شعبة، عن سليمان، عن أبي وائل، عن أبي مسعود قال: فذكره. واللفظ للبخاري.
وفي رواية عند البخاري في التفسير (4669) من وجه آخر عن سليمان به ولفظه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر بالصدقة، فيحتال أحدنا حتى يجيء بالمدّ، وإن لأحدهم اليوم مائة ألف. كأنه يُعرِّض بنفسه.
আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমাদেরকে সাদকা করার নির্দেশ দেওয়া হলো, তখন আমরা (তা বহনের জন্য) বোঝা বহন করতাম (বা কষ্ট করে উপার্জন করতাম)। এরপর আবূ আকীল অর্ধ সা‘ পরিমাণ সাদকা নিয়ে এলেন এবং আরেকজন লোক তার চেয়ে বেশি নিয়ে এলেন। তখন মুনাফিকরা বলল: আল্লাহ্ তো এই ব্যক্তির সাদকা থেকে সম্পূর্ণ অমুখাপেক্ষী। আর এই অন্য লোকটি রিয়া (লোক-দেখানো) ছাড়া এটি করেনি। ফলে এই আয়াত নাযিল হলো: {যারা মুমিনদের মধ্যে স্বেচ্ছায় (অধিক) সাদকা দেয় এবং যারা কেবল নিজ সাধ্য অনুযায়ী (সামান্য) সাদকা পায়, তাদেরকে যারা দোষারোপ করে...} এ আয়াতটি।
12257 - عن ابن عباس قوله: {يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّعِينَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فِي الصَّدَقَاتِ} قال: جاء عبد الرحمن بن عوف بأربعين أوقية من ذهب إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وجاءه رجل من الأنصار بصاع من طعام، فقال بعض المنافقين: والله ما جاء عبد الرحمن بما جاء به إلا رياءً! وقالوا: إن كان الله ورسولُه لَغنِيّيْنِ عن هذا الصاع.
حسن: رواه ابن جرير الطبري في تفسيره (11/ 378)، وابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1850) كلاهما من طريق عبد الله بن صالح أبي صالح كاتب الليث، قال: حدثنا معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل علي بن أبي طلحة وهو وإن كان يرسل عن ابن عباس، ولكن الواسطة معروف وهو صدوق في نفسه، وكذلك فيه عبد الله بن صالح كاتب الليث حسن الحديث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আল্লাহর বাণী) "{যারা মুমিনদের মধ্যে স্বেচ্ছায় দানকারীদেরকে সাদাকা সম্পর্কে দোষারোপ করে}" সম্পর্কে বলেন: (ঐ সময়ে) আব্দুর রহমান ইবনে আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চল্লিশ উকিয়া স্বর্ণ নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। আর আনসারদের এক ব্যক্তি এক সা’ পরিমাণ খাদ্য নিয়ে এলেন। তখন কিছু সংখ্যক মুনাফিক বলল: আল্লাহর কসম! আব্দুর রহমান যা এনেছে, তা রিয়া (লোক-দেখানো) ছাড়া আর কিছু নয়! এবং তারা বলল: এই এক সা’ খাদ্যের প্রতি আল্লাহ ও তাঁর রাসূল অবশ্যই মুখাপেক্ষী নন।
12258 - عن ابن عمر قال: لما توفي عبد الله، جاء ابنه عبد الله بن عبد الله إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله أن يعطيه قميصه يكفن فيه أباه، فأعطاه، ثم سأله أن يصلي عليه، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم ليصلي، فقام عمر، فأخذ بثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله! تصلي عليه وقد نهاك ربك أن تصلي عليه؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنما خيّرني الله، فقال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ} وسأزيده على السبعين". قال: إنه منافق. قال: فصلّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم فأنزل الله {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا} [سورة التوبة: 84].
متفق عليه: ورواه البخاري في التفسير (4670)، ومسلم في فضائل الصحابة (2400) كلاهما من طريق أبي أسامة، حدثنا عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، قال: فذكره. واللفظ للبخاري ولفظ مسلم نحوه.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন আব্দুল্লাহ (ইবনে উবাই) মারা গেল, তখন তার পুত্র আব্দুল্লাহ ইবনে আব্দুল্লাহ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে আসলেন এবং অনুরোধ করলেন যেন তিনি তাঁর (রাসূলের) জামাটি দেন, যাতে তিনি তা দিয়ে তার পিতাকে কাফন পরাতে পারেন। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তা দিলেন। এরপর তিনি অনুরোধ করলেন যেন তিনি তার (পিতার) জানাযার সালাত আদায় করেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সালাত আদায় করার জন্য দাঁড়ালেন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠলেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাপড় ধরে ফেললেন। তিনি (উমর) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তার জানাযা পড়াবেন? অথচ আপনার রব আপনাকে তার জানাযা পড়তে নিষেধ করেছেন? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "আল্লাহ আমাকে কেবল ইখতিয়ার (পছন্দ করার সুযোগ) দিয়েছেন। তিনি বলেছেন: 'আপনি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন বা না করুন, আপনি সত্তর বার ক্ষমা প্রার্থনা করলেও আল্লাহ তাদেরকে কখনোই ক্ষমা করবেন না। এটা এজন্য যে, তারা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে অস্বীকার করেছে। আল্লাহ ফাসিক সম্প্রদায়কে পথ দেখান না।' (সূরা তাওবা: ৮০)। আমি সত্তর বারের চেয়েও বেশি চাইব।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, সে তো মুনাফিক ছিল। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, এরপরও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার জানাযা আদায় করলেন। তখন আল্লাহ নাযিল করলেন: "আর তাদের মধ্যে কেউ মারা গেলে আপনি কখনোই তার উপর সালাত আদায় করবেন না..." [সূরা আত-তাওবা: ৮৪]।
12259 - عن عمر بن الخطاب أنه قال: لما مات عبد الله بن أبيّ ابن سلول دُعِي له رسول الله صلى الله عليه وسلم ليصلى عليه، فلما قام رسول الله صلى الله عليه وسلم وثبت إليه، فقلت: يا رسول الله، صلى الله عليه وسلم، أتصلي على ابن أبيّ؟ وقد قال يوم كذا كذا وكذا، قال: أُعدِّد عليه قوله، فتبسم رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقال:"أخِّر عني يا عمر" فلما أكثرت عليه قال:"إني خيرت فاخترت، لو أعلم أني إن زدت على السبعين يغفر له لزدت عليها" قال: فصلى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم انصرف، فلم يمكث إلا يسيرا حتى نزلت الآيتان من براءة {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا} إلى قوله {وَهُمْ فَاسِقُونَ} [سورة التوبة: 84] قال: فعجبت بعد من جرأتي على رسول الله صلى الله عليه وسلم، والله ورسوله أعلم.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4671) من طرق عن الليث، حدثني عقيل، عن ابن شهاب، قال: أخبرني عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس، عن عمر بن الخطاب، فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আব্দুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূল মারা গেল, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তার জন্য সালাত (জানাযা) আদায়ের জন্য ডাকা হলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন দাঁড়ালেন, আমি দ্রুত তাঁর কাছে গেলাম এবং বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি ইবনু উবাইয়ের উপর সালাত আদায় করবেন? অথচ সে অমুক দিন এই এই কথা বলেছিল। আমি তার বলা কথাগুলো একে একে গণনা করে শোনালাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মুচকি হাসলেন এবং বললেন, "হে উমর! তুমি আমার কাছ থেকে একটু সরে যাও।" যখন আমি তাঁর উপর বেশি জোর দিলাম, তিনি বললেন, "আমাকে ইখতিয়ার (পছন্দ) দেওয়া হয়েছে, তাই আমি পছন্দ করে নিয়েছি। আমি যদি জানতাম যে, সত্তর বারের চেয়ে বেশি ক্ষমা চাইলে তাকে ক্ষমা করা হবে, তবে আমি অবশ্যই তার চেয়েও বেশি চাইতাম।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার উপর সালাত আদায় করলেন এবং ফিরে গেলেন। অল্প কিছু সময় অতিবাহিত হওয়ার আগেই সূরা বারা'আতের (আত-তাওবাহ) দুটি আয়াত নাযিল হলো: "আর তাদের মধ্যে কেউ মারা গেলে, আপনি কখনো তার জানাযার সালাত আদায় করবেন না..." তার বাণী "...আর তারা ফাসিক (পাপী)।" [সূরা আত-তাওবাহ: ৮৪] তিনি (উমর) বলেন, এরপর আমি আমার পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর প্রতি (প্রশ্ন করার) এই সাহসিকতা দেখে বিস্মিত হয়েছি। আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সর্বাধিক অবগত।
12260 - عن ابن عباس: أن عبد الله بن أبي قال له أبوه: أي بني اطلب لي من رسول الله
- صلى الله عليه وسلم ثوبا من ثيابه تكفنني فيه، ومره يصلي علي، فقال عبد: يا رسول الله! قد عرفت شرف عبد الله، وأنه أمرني أن أطلب إليك ثوبا نكفنه به، وأن تصلي عليه، فأعطاه ثوبا من ثيابه، وأراد أن يصلي عليه، فقال عمر: يا رسول! قد عرفت عبد الله ونفاقه، أتصلي عليه وقد نهاك الله أن تصلي عليه؟ قال:"وأين؟" قال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً} قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فإني سأزيده" فأنزل الله عز وجل {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَى قَبْرِهِ} [سورة التوبة: 84] وأنزل الله {سَوَاءٌ عَلَيْهِمْ أَسْتَغْفَرْتَ لَهُمْ أَمْ لَمْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ لَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ} [سورة المنافقون: 6]. قال: ودخل رجل على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأطال الجلوس، فخرج النبي صلى الله عليه وسلم ثلاثا، لكي يتبعه، فلم يفعل، فدخل عمر، فرأى الرجل، فعرف الكراهية في وجه رسول الله صلى الله عليه وسلم بمقعده، فقال: لعلك آذيت النبي صلى الله عليه وسلم، ففطن الرجل، فقام، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لقد قمت ثلاثا لتتبعني، فلم تفعل" فقال: يا رسول الله! لو اتخذت حاجبا، فإن نساءك لسن كسائر النساء، وهو أطهر لقلوبهن، فأنزل الله عز وجل {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَنْ يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَى طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ وَلَكِنْ إِذَا دُعِيتُمْ فَادْخُلُوا فَإِذَا طَعِمْتُمْ فَانْتَشِرُوا وَلَا مُسْتَأْنِسِينَ لِحَدِيثٍ إِنَّ ذَلِكُمْ كَانَ يُؤْذِي النَّبِيَّ فَيَسْتَحْيِي مِنْكُمْ وَاللَّهُ لَا يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ وَإِذَا سَأَلْتُمُوهُنَّ مَتَاعًا فَاسْأَلُوهُنَّ مِنْ وَرَاءِ حِجَابٍ ذَلِكُمْ أَطْهَرُ لِقُلُوبِكُمْ وَقُلُوبِهِنَّ وَمَا كَانَ لَكُمْ أَنْ تُؤْذُوا رَسُولَ اللَّهِ وَلَا أَنْ تَنْكِحُوا أَزْوَاجَهُ مِنْ بَعْدِهِ أَبَدًا إِنَّ ذَلِكُمْ كَانَ عِنْدَ اللَّهِ عَظِيمًا} [سورة الأحزاب: 53] فأرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عمر، فأخبره بذلك قال: واستشار رسول الله صلى الله عليه وسلم أبا بكر وعمر في الأسارى، فقال أبو بكر: يا رسول الله! استحيي قومك، وخذ منهم الفداء، فاستعن به. وقال عمر بن الخطاب: اقتلهم. فقال:"لو اجتمعنا ما عصيناكم" فأخذه رسول الله صلى الله عليه وسلم بقول أبي بكر، فأنزل الله عز وجل {مَا كَانَ لِنَبِيٍّ أَنْ يَكُونَ لَهُ أَسْرَى حَتَّى يُثْخِنَ فِي الْأَرْضِ تُرِيدُونَ عَرَضَ الدُّنْيَا وَاللَّهُ يُرِيدُ الْآخِرَةَ وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ} [سورة الأنفال: 67] قال: تْم نزلت: {وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ سُلَالَةٍ مِنْ طِينٍ} إلى آخر الآيات فقال عمر: تبارك الله أحسن الخالقين، فأنزلت {فَتَبَارَكَ اللَّهُ أَحْسَنُ الْخَالِقِينَ} [سورة المؤمنون: 14].
حسن: رواه الطبراني في الكبير (11/ 438 - 439)، والبيهقي في الدلائل (5/ 288)، والضياء في المختارة (10/ 160 - 162) كلهم من حديث بشر بن السري، ثنا رباح بن أبي معروف المكي، عن سالم بن عجلان الأفطس، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل رباح بن أبي معروف المكي؛ فإنه حسن الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনে উবাইকে তার পিতা বলল: হে আমার পুত্র, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে তাঁর একটি পোশাক এনে দাও, যেন আমাকে তা দিয়ে কাফন দেওয়া যায় এবং তাঁকে বলো যেন তিনি আমার জানাযার সালাত আদায় করেন।
তখন (তার পুত্র) আব্দুল (ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তো আব্দুল্লাহর মর্যাদা জানেন। আর তিনি আমাকে আদেশ করেছেন যেন আমি আপনার নিকট তাঁর কাফনের জন্য একটি পোশাক চাই এবং আপনি যেন তাঁর উপর সালাত আদায় করেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পোশাকের মধ্যে থেকে একটি পোশাক তাকে দিলেন এবং তাঁর উপর সালাত আদায় করতে চাইলেন।
তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আব্দুল্লাহকে ও তার মুনাফিকি সম্পর্কে জানেন। আপনি কি তার উপর সালাত আদায় করবেন, অথচ আল্লাহ আপনাকে তার উপর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোথায় (নিষেধ করেছেন)?" উমর বললেন: "{তুমি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো অথবা না করো, যদি তুমি তাদের জন্য সত্তর বারও ক্ষমা প্রার্থনা করো (তবুও আল্লাহ ক্ষমা করবেন না...)}" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে আমি সত্তর বারের বেশি ক্ষমা চাইব।" তখন মহান আল্লাহ অবতীর্ণ করলেন: "{আর তাদের মধ্য থেকে যে কেউ মারা যায়, তার উপর তুমি কখনও সালাত আদায় করবে না এবং তার কবরের পাশে দাঁড়াবে না।}" [সূরা আত-তাওবা: ৮৪] আর আল্লাহ অবতীর্ণ করলেন: "{তারা ক্ষমা চাইলে বা না চাইলেও তাদের জন্য সমান। আল্লাহ কক্ষনো তাদের ক্ষমা করবেন না। নিশ্চয় আল্লাহ ফাসিক সম্প্রদায়কে হিদায়াত দেন না।}" [সূরা আল-মুনাফিকুন: ৬]।
তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: আর এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করল এবং দীর্ঘ সময় বসে থাকল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বিদায় জানাতে তিনবার বের হলেন, যেন সে তাঁকে অনুসরণ করে চলে যায়, কিন্তু সে তা করল না। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন এবং লোকটি দেখতে পেলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারায় তার বসে থাকার কারণে অপছন্দনীয়তা বুঝতে পারলেন। তখন তিনি (উমর) বললেন: সম্ভবত তুমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কষ্ট দিয়েছ। লোকটি তখন সচেতন হলো এবং দাঁড়িয়ে গেল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তিনবার উঠেছি যাতে তুমি আমাকে অনুসরণ করো (এবং চলে যাও), কিন্তু তুমি তা করোনি।" তখন (উমর) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! যদি আপনি একজন পাহারাদার (বা দ্বাররক্ষক) নিয়োগ করতেন, তবে ভালো হতো। কারণ আপনার স্ত্রীরা অন্য নারীদের মতো নন। এটা তাদের অন্তরের জন্য বেশি পবিত্র।
তখন মহান আল্লাহ অবতীর্ণ করলেন: "{হে মুমিনগণ! তোমাদেরকে অনুমতি না দেওয়া পর্যন্ত তোমরা খাওয়ার জন্য নবীর ঘরে প্রবেশ করো না, খাদ্য প্রস্তুতির অপেক্ষা না করে। বরং তোমাদেরকে যখন ডাকা হবে, তখন প্রবেশ করো। অতঃপর যখন খাওয়া শেষ হবে, তখন তোমরা চলে যেও, এবং কথাবার্তায় মগ্ন হয়ে যেও না। নিশ্চয় তা নবীকে কষ্ট দেয়, তিনি তোমাদের কাছে (বলতে) লজ্জা পান; কিন্তু আল্লাহ সত্য বলতে লজ্জা পান না। আর তোমরা যখন তাদের কাছে কিছু চাইবে, তখন পর্দার আড়াল থেকে চাও। এটাই তোমাদের ও তাদের হৃদয়ের জন্য অধিক পবিত্র। আর তোমাদের জন্য শোভনীয় নয় যে, তোমরা আল্লাহর রাসূলকে কষ্ট দেবে এবং তাঁর মৃত্যুর পরে কখনও তাঁর স্ত্রীদেরকে বিবাহ করবে। নিশ্চয় তা আল্লাহর কাছে গুরুতর অপরাধ।}" [সূরা আল-আহযাব: ৫৩] অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরের কাছে লোক পাঠালেন এবং তাঁকে এ বিষয়ে জানালেন।
তিনি বলেন: আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বন্দীদের ব্যাপারে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে পরামর্শ করলেন। তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এরা আপনার কওমের লোক, এদের বাঁচতে দিন এবং তাদের থেকে মুক্তিপণ গ্রহণ করুন, আর তা দ্বারা সাহায্য নিন। আর উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এদেরকে হত্যা করুন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি আমরা একত্রিত হতাম (অর্থাৎ একমত হতে), তবে আমি তোমাদের অবাধ্য হতাম না।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মত গ্রহণ করলেন। তখন মহান আল্লাহ অবতীর্ণ করলেন: "{কোনো নবীর জন্য সঙ্গত নয় যে, তিনি (শত্রুদের) বন্দী করে রাখবেন, যতক্ষণ না তিনি পৃথিবীতে (শত্রু হত্যা করে) রক্তপাত ঘটান। তোমরা পার্থিব সামগ্রী কামনা করো, আর আল্লাহ চান পরকাল। আর আল্লাহ মহাপরাক্রমশালী, প্রজ্ঞাময়।}" [সূরা আল-আনফাল: ৬৭]।
তিনি বলেন: অতঃপর যখন এই আয়াতগুলো নাযিল হলো: "{আর অবশ্যই আমি মানুষকে সৃষ্টি করেছি মাটির নির্যাস থেকে...}" শেষ আয়াত পর্যন্ত। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বরকতময় আল্লাহ, যিনি শ্রেষ্ঠ সৃষ্টিকর্তা (তাবারাকাল্লাহু আহ্সানুল খালীকীন)। তখন অবতীর্ণ হলো: "{অতএব, বরকতময় আল্লাহ, যিনি সৃষ্টিকর্তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ।}" [সূরা আল-মুমিনুন: ১৪]।
12261 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نار بني آدم التي يوقدون جزء من سبعين جزءا من نار جهنم". فقالوا: يا رسول الله! إن كانت لكافية. قال:"إنها فضلت عليها بتسعة وستين جزءا".
متفق عليه: رواه مالك في كتاب جهنم (1872) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاري في بدء الخلق (3265) من طريق مالك به.
ورواه مسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (2834) من وجه آخر عن أبي الزناد به نحوه، وزاد في آخره:"كلها مثل حرّها".
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানেরা যে আগুন জ্বালায়, তা জাহান্নামের আগুনের সত্তর ভাগের এক ভাগ।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এটাই তো যথেষ্ট ছিল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তার (জাহান্নামের আগুনের) উত্তাপ এর (দুনিয়ার আগুনের) চেয়ে উনষাটষট্টি গুণ বেশি।"
12262 - عن عبد الرحمن بن عمرو السلمي، وحجر بن حجر الكلاعي قالا: أتينا العرباض بن سارية وهو ممن نزل فيه {وَلَا عَلَى الَّذِينَ إِذَا مَا أَتَوْكَ لِتَحْمِلَهُمْ قُلْتَ لَا أَجِدُ مَا أَحْمِلُكُمْ عَلَيْهِ تَوَلَّوْا وَأَعْيُنُهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ حَزَنًا أَلَّا يَجِدُوا مَا يُنْفِقُونَ} فسلمنا، وقلنا: أتيناك زائرين ومقتبسين. فقال العرباض: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم الصبح ذات يوم، ثم أقبل علينا، فوعظنا موعظة بليغة، ذرفت منها العيون، ووجلت
منها القلوب، فقال قائل: يا رسول الله! كأن هذه موعظة مودع، فما تعهد إلينا؟ فقال:"أوصيكم بتقوى الله والسمع والطاعة وإن كان عبدا حبشيا، فإنه من يعش منكم، فسيرى اختلافا كثيرا، فعليكم بسنتي وسنة الخلفاء الراشدين المهديين، فتمسكوا بها وعضوا عليها بالنواجذ، وإياكم ومحدثات الأمور، فإن كل محدثة بدعة، وكل بدعة ضلالة".
حسن: رواه أبو داود (4607)، وأحمد (17145)، وصحّحه ابن حبان (5)، والحاكم (1/ 97) كلهم من حديث الوليد بن مسلم، حدثنا ثور بن يزيد، حدثني خالد بن معدان، حدثني عمرو بن عبد الرحمن السلمي، وحجر بن حجر الكلاعي، قالا: فذكراه.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن عبد الرحمن السلمي وحجر بن حجر الكلاعي لمتابعة بعضهما بعضا، والكلام عليه مبسوط في كتاب الاعتصام.
আল-ইরবাদ ইবনু সারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আব্দুর রহমান ইবনু আমর আস-সুলামী এবং হুজর ইবনু হুজর আল-কালাই বলেন,) আমরা আল-ইরবাদ ইবনু সারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। তিনি তাদের মধ্যে অন্যতম যাদের সম্পর্কে এই আয়াত নাযিল হয়েছিল: {আর তাদের উপরও কোনো দোষ নেই যারা তোমার কাছে এসেছিল বাহনের জন্য, যখন তুমি বলেছিলে: তোমাদের বহন করানোর মতো কিছু আমি পাচ্ছি না; তখন তারা ফিরে গিয়েছিল, আর তাদের চোখ থেকে অশ্রু ঝরছিল এই দুঃখে যে, তারা ব্যয় করার মতো কিছু পাচ্ছে না}। আমরা তাঁকে সালাম জানালাম এবং বললাম: আমরা আপনার নিকট আপনার সাক্ষাৎ লাভের জন্য ও জ্ঞান আহরণের জন্য এসেছি। তখন আল-ইরবাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: একদিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরালেন এবং আমাদেরকে অত্যন্ত মর্মস্পর্শী উপদেশ দিলেন, যার ফলে চোখগুলো অশ্রুসিক্ত হলো এবং হৃদয়গুলো ভীত-সন্ত্রস্ত হলো। তখন একজন আরয করল: হে আল্লাহর রাসূল! মনে হচ্ছে এটি যেন বিদায়কালীন উপদেশ। আপনি আমাদের জন্য কী উপদেশ রেখে যাচ্ছেন? তিনি বললেন: "আমি তোমাদেরকে আল্লাহর তাকওয়া অবলম্বন করার এবং (শাসকের) আনুগত্য ও আদেশ পালনের উপদেশ দিচ্ছি, যদিও সে একজন হাবশী গোলাম হয়। কারণ তোমাদের মধ্যে যারা জীবিত থাকবে, তারা অনেক মতপার্থক্য দেখবে। সুতরাং তোমরা আমার সুন্নাত এবং হেদায়েতপ্রাপ্ত খুলাফায়ে রাশিদীনের সুন্নাতকে দৃঢ়ভাবে আঁকড়ে ধরো। তোমরা তা মজবুতভাবে ধরবে এবং মাড়ির দাঁত দিয়ে কামড়ে ধরে থাকবে। আর তোমরা (দ্বীনের মধ্যে) নতুন সৃষ্ট বিষয়সমূহ (বিদ'আত) থেকে দূরে থাকবে। কেননা প্রতিটি নতুন সৃষ্ট বিষয়ই বিদ'আত, আর প্রতিটি বিদ'আতই হলো ভ্রষ্টতা।"
12263 - عن كعب بن مالك قال حين تخلف عن تبوك: والله! ما أنعم الله عليّ من نعمة بعد إذ هداني أعظم من صدقي رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا أكون كذبته، فأهلك كما هلك الذين كذبوا حين أنزل الوحي {سَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَكُمْ إِذَا انْقَلَبْتُمْ إِلَيْهِمْ} إلى قوله {الْفَاسِقِينَ}.
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4673)، ومسلم في التوبة (2769) كلاهما من طريق ابن شهاب، قال: أخبرني عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب بن مالك، أن عبد الله بن كعب، قال: سمعت كعب بن مالك، قال: فذكره.
والسياق للبخاري وسياق مسلم طويل.
কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (তাবুক যুদ্ধ থেকে) অনুপস্থিত থাকার সময় বলেছিলেন: আল্লাহর শপথ! আমাকে হেদায়েত দানের পর আল্লাহ আমার উপর যত নেয়ামত দিয়েছেন, তার মধ্যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আমার সত্য কথা বলার চেয়ে বড় নেয়ামত আর কিছু নয়, যে আমি তাঁকে মিথ্যা বলিনি। (যদি মিথ্যা বলতাম) তবে আমি ধ্বংস হয়ে যেতাম, যেমন তারা ধ্বংস হয়েছে যারা মিথ্যা বলেছিল, যখন ওহী নাযিল হলো: {তোমরা যখন তাদের কাছে ফিরে আসবে, তখন তারা তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে হলফ করে বলবে...} আল্লাহর বাণী {অবাধ্য পাপিষ্ঠদের} পর্যন্ত।
12264 - عن سمرة بن جندب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لنا:"أتاني الليلة آتيان، فابتعثاني، فانتهينا إلى مدينة مبنية بلبن ذهب ولبن فضة، فتلقانا رجال شطر من خلقهم كأحسن ما أنت راء، وشطر كأقبح ما أنت راء، قالا لهم: اذهبوا فقعوا في ذلك النهر. فوقعوا فيه، ثم رجعوا إلينا، قد ذهب ذلك السوء عنهم، فصاروا في أحسن صورة، قالا لي:
هذه جنة عدن، وهذاك منزلك. قالا: أما القوم الذين كانوا شطر منهم حسن وشطر منهم قبيح، فإنهم خلطوا عملا صالحا وآخر سيئا تجاوز الله عنهم".
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4674) عن مؤمل بن هشام، حدثنا إسماعيل بن إبراهيم، حدثنا عوف، حدثنا أبو رجاء، حدثنا سمرة بن جندب فذكره.
সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে বললেন: "আজ রাতে দুজন আগমনকারী আমার কাছে এসেছিলেন। তারা আমাকে সঙ্গে নিলেন, অতঃপর আমরা একটি শহরে পৌঁছলাম, যা সোনা ও রুপার ইট দিয়ে নির্মিত। সেখানে কিছু লোক আমাদের সাথে সাক্ষাৎ করল, যাদের গঠনের অর্ধেক ছিল তোমার দেখা সবচেয়ে সুন্দর আকৃতির মতো এবং বাকি অর্ধেক ছিল তোমার দেখা সবচেয়ে কুৎসিত আকৃতির মতো। তারা (আগমনকারী দুজন) তাদের (ওই লোকগুলোর) বললেন: তোমরা যাও এবং ওই নদীতে ঝাঁপ দাও। তারা তাতে ঝাঁপ দিল। অতঃপর তারা আমাদের কাছে ফিরে এলো। তাদের থেকে সেই মন্দভাব দূর হয়ে গিয়েছিল এবং তারা সুন্দরতম আকৃতি ধারণ করেছিল। তারা দুজন আমাকে বললেন: এটি জান্নাতে আদন এবং এইটি আপনার বাসস্থান। তারা আরও বললেন: আর যে লোকগুলোর অর্ধেক সুন্দর ও অর্ধেক কুৎসিত ছিল, তারা হলো সেই লোক, যারা ভালো কাজ ও খারাপ কাজ উভয়ই মিশ্রিত করেছিল, অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাদের ক্ষমা করে দিয়েছেন।"
12265 - عن ابن عباس في قوله: {وَآخَرُونَ اعْتَرَفُوا بِذُنُوبِهِمْ خَلَطُوا عَمَلًا صَالِحًا وَآخَرَ سَيِّئًا} قال: كان عشرة رهط تخلفوا عن النبي صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، فلما حضر رجوع النبي صلى الله عليه وسلم أوثق سبعة منهم أنفسهم بسواري المسجد، فكان ممر رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رجع من المسجد عليهم، فلما رأهم قال:"من هؤلاء الموثقون أنفسهم بالسواري؟" قالوا: هذا أبو لبابة وأصحاب له تخلفوا عنك، يا رسول الله! أوثقوا أنفسهم حتى يطلقهم النبي صلى الله عليه وسلم ويعذرهم، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"وأنا أقسم بالله! لا أطلقهم، ولا أعذرهم حتى يكون الله هو الذي يطلقهم، ويعذرهم، رغبوا عني، وتخلفوا عن الغزو مع المسلمين". فلما بلغهم ذلك قالوا: نحن - والله - لا نطلق أنفسنا حتى يكون الله هو الذي يطلقنا. فأنزل الله: {وَآخَرُونَ اعْتَرَفُوا بِذُنُوبِهِمْ خَلَطُوا عَمَلًا صَالِحًا وَآخَرَ سَيِّئًا عَسَى اللَّهُ أَنْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ} وعسى من الله واجب، أنه هو التواب الرحيم، فلما نزلت أرسل إليهم النبي صلى الله عليه وسلم فأطلقهم وعذرهم، فجاؤوا بأموالهم، فقالوا: يا رسول الله! هذه أموالنا، فتصدق بها عنا، واستغفر لنا. قال:"ما اُمرت أن آخذ أموالكم". فأنزل الله: {خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِمْ بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْ} يقول: استغفر لهم: {إِنَّ صَلَاتَكَ سَكَنٌ لَهُمْ} فأخذ منهم، واستغفر لهم.
حسن: رواه ابن جرير في تفسيره (11/ 651 - 652)، وابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1872، 1875)، والبيهقي في الدلائل (5/ 271 - 272) كلهم من حديث عبد الله بن صالح قال: حدثنا معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل علي بن أبي طلحة، وهو وإن كان يرسل عن ابن عباس، ولكن الواسطة معروف، وهو صدوق في نفسه، وكذلك فيه عبد الله بن صالح كاتب الليث حسن الحديث.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র বাণী, "আর অন্য একদল লোক রয়েছে, যারা তাদের অপরাধ স্বীকার করেছে। তারা একটি ভালো কাজের সাথে অপর একটি মন্দ কাজ মিশিয়ে ফেলেছে..." সম্পর্কে তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: তাবুক যুদ্ধের সময় দশজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গ ত্যাগ করেছিল (পিছিয়ে গিয়েছিল)। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ফেরার সময় হলো, তখন তাদের মধ্য থেকে সাতজন নিজেদেরকে মসজিদের খুঁটির সাথে বেঁধে ফেলল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদ থেকে ফিরলে তাঁর চলার পথ তাদের পাশ দিয়েই যেত।
যখন তিনি তাদের দেখলেন, তিনি বললেন: "খুঁটির সাথে নিজেদেরকে বেঁধে রেখেছে কারা এরা?" লোকেরা বলল: এরা হলেন আবু লুবাবাহ এবং তাঁর সঙ্গীরা, যারা আপনার সঙ্গ ত্যাগ করেছিল, হে আল্লাহ্র রাসূল! তারা নিজেদেরকে বেঁধে রেখেছে, যতক্ষণ না নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের মুক্ত করেন এবং তাদের ক্ষমা করেন।
তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আল্লাহর নামে কসম করে বলছি! আমি তাদের মুক্ত করব না এবং তাদের ক্ষমাও করব না, যতক্ষণ না আল্লাহ্ স্বয়ং তাদের মুক্ত করেন এবং ক্ষমা করেন। তারা আমার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছিল এবং মুসলমানদের সাথে যুদ্ধে পিছিয়ে গিয়েছিল।"
যখন তাদের কাছে এ খবর পৌঁছাল, তারা বলল: আল্লাহর কসম! আমরাও নিজেদের মুক্ত করব না, যতক্ষণ না আল্লাহ্ স্বয়ং আমাদের মুক্ত করেন।
অতঃপর আল্লাহ্ নাযিল করলেন: "আর অন্য একদল লোক রয়েছে, যারা তাদের অপরাধ স্বীকার করেছে। তারা একটি ভালো কাজের সাথে অপর একটি মন্দ কাজ মিশিয়ে ফেলেছে। সম্ভবত আল্লাহ্ তাদের তাওবা কবুল করবেন।" আল্লাহ্র পক্ষ থেকে 'সম্ভবত' (আসা) হলো অপরিহার্য (অর্থাৎ অবশ্যই কবুল করবেন), নিশ্চয় তিনি তাওবা কবুলকারী, পরম দয়ালু।
যখন এই আয়াত নাযিল হলো, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে লোক পাঠালেন এবং তাদের মুক্ত করলেন ও ক্ষমা করলেন।
তখন তারা নিজেদের সম্পদ নিয়ে এলো এবং বলল: হে আল্লাহ্র রাসূল! এই হলো আমাদের সম্পদ, আপনি এটা আমাদের পক্ষ থেকে সাদাকা করে দিন এবং আমাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন। তিনি বললেন: "তোমাদের সম্পদ গ্রহণ করার জন্য আমি আদিষ্ট হইনি।"
অতঃপর আল্লাহ্ নাযিল করলেন: "তাদের সম্পদ থেকে সাদাকা গ্রহণ করুন, যার মাধ্যমে আপনি তাদের পবিত্র করবেন এবং পরিশুদ্ধ করবেন। আর আপনি তাদের জন্য দু'আ করুন।" (অর্থাৎ: তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করুন)। "নিশ্চয়ই আপনার দু'আ তাদের জন্য প্রশান্তিদায়ক।" তখন তিনি তাদের থেকে (সাদাকা) গ্রহণ করলেন এবং তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করলেন।
12266 - عن جابر بن عبد الله قال: كان ممن تخلف عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في تبوك ستة: أبو لبابة، وأوس بن خذام، وثعلبة بن وديعة، وكعب بن مالك، ومرارة بن الربيع، وهلال بن أمية، فجاء أبو لبابة، وأوس، وثعلبة. فربطوا أنفسهم بالسواري، وجاؤوا بأموالهم، فقالوا: يا رسول الله! خذها، هذا الذي حبسنا عنك، فقال:"لا أحلهم
حتى يكون قتال". فنزل القرآن: {خَلَطُوا عَمَلًا صَالِحًا وَآخَرَ سَيِّئًا} إلى قوله: {إِنَّ صَلَاتَكَ سَكَنٌ لَهُمْ} الآية.
حسن: رواه أبو نعيم في معرفة الصحابة (1/ 312 - 313) عن عبد الله بن محمد بن جعفر، ثنا عبد الرحمن بن الحسن، ثنا إسماعيل بن محمد بن عصام، قال: وجدت في كتاب جدي عن سفيان، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.
ورواه أبو الشيخ في تفسيره، وابن منده في المعرفة، كما في الإصابة كلاهما من حديث سفيان الثوري بإسناده.
قال الحافظ في الإصابة:"إسناده قوي".
قلت: وهو كما قال؛ فإن فيه أبا سفيان طلحة بن نافع مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث وخاصة إذا روى عنه الأعمش فأحاديثه مستقيمة كما قال ابن عدي.
قوله: {وَصَلِّ عَلَيْهِمْ إِنَّ صَلَاتَكَ سَكَنٌ لَهُمْ} عام لكل من أتى بصدقته إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فكان يدعو لهم، ويصلي عليهم، كما جاء في الصحيح.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাবুক যুদ্ধে যারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে যোগদান থেকে পিছনে ছিল, তারা ছিল ছয়জন: আবু লুবাবা, আওস ইবনে খুযাম, সা'লাবাহ ইবনে ওয়াদী'আহ, কা'ব ইবনে মালিক, মুরারা ইবনুর রাবী, এবং হিলাল ইবনে উমাইয়্যাহ। অতঃপর আবু লুবাবা, আওস এবং সা'লাবাহ আসলেন। তারা নিজেদেরকে (মসজিদের) খুঁটির সাথে বাঁধলেন এবং তাদের সম্পদ নিয়ে আসলেন। তারা বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! এটি গ্রহণ করুন। এটিই আমাদেরকে আপনার (সাথে যুদ্ধে যাওয়া) থেকে বিরত রেখেছিল।" তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি তাদের মুক্ত করব না, যতক্ষণ না (তাদের বিষয়ে) কোনো ফয়সালা আসে।" অতঃপর কুরআন নাযিল হলো: "তারা সৎকর্মের সাথে মন্দকর্ম মিশ্রিত করেছে..." তাঁর এই উক্তি পর্যন্ত: "...নিশ্চয় আপনার দু'আ তাদের জন্য সান্ত্বনাদায়ক।" (সূরা তাওবাহ, আয়াত ১০২-১০৩)।
12267 - عن عبد الله بن أبي أوفى قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا أتاه قوم بصدقتهم قال:"اللهم صل على آل فلان". فأتاه أبي بصدقته، فقال:"اللهم صل على آل أبي أوفى".
متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1497)، ومسلم في الزكاة (1078) كلاهما من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، قال: سمعت عبد الله بن أبي أوفى قال: فذكره. واللفظ للبخاري ولفظ مسلم نحوه.
আবদুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যখন কোনো সম্প্রদায় তাদের সাদকা (যাকাত) নিয়ে আসত, তখন তিনি বলতেন: "হে আল্লাহ! অমুক পরিবারের প্রতি রহমত বর্ষণ করুন।" এরপর আমার পিতা তাঁর সাদকা (যাকাত) নিয়ে তাঁর নিকট এলেন, তখন তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আবী আওফার পরিবারের প্রতি রহমত বর্ষণ করুন।"