হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (12268)


12268 - عن أبي موسى، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الله عز وجل يبسط يده بالليل ليتوب مسيء النهار، ويبسط يده بالنهار ليتوب مسيء الليل حتى تطلع الشمس من مغربها".

صحيح: رواه مسلم في التوبة (2759) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن عمرو بن مُرّة، قال: سمعت أبا عبيدة يحدث عن أبي موسى، فذكره.

قوله: {وَيَأْخُذُ الصَّدَقَاتِ}.




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা রাতের বেলায় তাঁর হাত প্রসারিত করেন, যেন দিনের পাপীরা তওবা করতে পারে। আর তিনি দিনের বেলায় তাঁর হাত প্রসারিত করেন, যেন রাতের পাপীরা তওবা করতে পারে। (তিনি এরূপ করতে থাকেন) যতক্ষণ না সূর্য পশ্চিম দিক থেকে উদিত হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (12269)


12269 - عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الرجل ليتصدق بالصدقة من الكسب الطيب، ولا يقبل الله إلا الطيب، فيتلقاه الرحمن تبارك وتعالى بيده، فيربيها كما يربي
أحدكم فلوّه ووصيفه أو فصيله".

حسن: رواه البزار - كشف الأستار (931) -، والطبراني في الأوسط (مجمع البحرين: 1412) كلاهما من حديث إسماعيل، حدثني أبي، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته.

قال الهيثمي في المجمع (3/ 112):"رواه البزار، ورجاله ثقات".

وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل وهو ابن أبي أويس - واسمه عبد الله - فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وهو من رجال الشيخين.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি হালাল (উত্তম) উপার্জন থেকে কোনো দান (সদকা) করলে—আর আল্লাহ্‌ উত্তম (পবিত্র) ছাড়া কিছু গ্রহণ করেন না—তখন দয়াময় আল্লাহ্ তাবারাকা ওয়া তা‘আলা তা নিজ হাতে গ্রহণ করেন, অতঃপর তিনি সেটাকে লালন-পালন করেন, যেমন তোমাদের কেউ তার ঘোড়ার বাচ্চা, তার বালক দাস, অথবা তার উটের বাচ্চাকে লালন-পালন করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (12270)


12270 - عن ابن عباس أن قوله: {وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مَسْجِدًا ضِرَارًا} هم أناس من الأنصار، ابتنوا مسجدا، فقال لهم أبو عامر: ابنوا مسجدكم، واستعدوا بما استطعتم من قوة، وسلاح. فإني ذاهب إلى قيصر ملك الروم، فآتي بجند من الروم فأُخرج محمدا وأصحابه.

حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1878) عن أبيه، عن أبي صالح، ثنا معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي صالح وهو عبد الله بن صالح كاتب الليث، حسن الحديث.

وأبو عامر هذا هو الراهب الذي تنصر في الجاهلية قبل مقدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، وقرأ علم أهل الكتاب، فلما قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينة، واجتمع المسلمون عليه، وصارت للإسلام كلمة عالية أظهر العداوةَ والبغضاءَ، وحث أصحابه من أهل المدينة، ببناء هذا المسجد مجاورا لمسجد قباء، ليكون لهم مركزا للتشاور فيما بينهم.

وأما هو فذهب إلى الشام يستنصره على النبي صلى الله عليه وسلم، فوعده ملك الشام بجيش وعدة.

فلما فرغوا من بناء مسجدهم أتوا النبي صلى الله عليه وسلم، فقالوا: قد فرغنا من بناء مسجدنا، فنحب أن
تصلي فيه، وتدعو لنا بالبركة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إنا على سفر، ولكن إذا رجعنا إن شاء الله". أي إلى تبوك.

فلما قفل من تبوك راجعا إلى المدينة، ولم يبق بينه وبينها إلا يوم أو بعض يوم نزل عليه الوحي: {لَا تَقُمْ فِيهِ أَبَدًا لَمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى التَّقْوَى مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَنْ تَقُومَ فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ} فبعث رسول الله صلى الله عليه وسلم من يهدمه.

قوله: {لَمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى التَّقْوَى مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ} قيل: هو مسجد قباء. كما جاء في الصحيح:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই তাঁর (আল্লাহর) বাণী: “আর যারা মসজিদকে (ইসলামের) ক্ষতির উদ্দেশ্যে তৈরি করেছে...” (সূরা আত-তাওবাহ ৯:১০৭) তারা ছিল আনসারদের মধ্য থেকে কিছু লোক, যারা একটি মসজিদ নির্মাণ করেছিল। তখন আবু আমির তাদের বলেছিল: তোমরা তোমাদের মসজিদ তৈরি করো এবং শক্তি ও অস্ত্রশস্ত্রের যা কিছু তোমরা পারো, তা দিয়ে প্রস্তুত থাকো। কারণ আমি রোমের সম্রাট কায়সারের কাছে যাচ্ছি। আমি রোম থেকে একদল সৈন্য নিয়ে আসব এবং মুহাম্মাদ ও তার সঙ্গীদের বের করে দেব।

আর এই আবু আমির ছিল সেই খ্রিস্টান পাদ্রী, যে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মদিনায় আগমনের পূর্বে জাহিলিয়্যাতের যুগে খ্রিস্টান ধর্ম গ্রহণ করেছিল এবং কিতাবধারীদের জ্ঞান পাঠ করেছিল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনায় আগমন করলেন এবং মুসলিমরা তাঁর কাছে সমবেত হলো, ইসলামের অবস্থান যখন সুদৃঢ় হলো, তখন সে প্রকাশ্য শত্রুতা ও বিদ্বেষ পোষণ করতে শুরু করলো। সে মদিনার তার সঙ্গীদেরকে কুব্বা মসজিদের পাশে এই মসজিদটি নির্মাণের জন্য উৎসাহিত করলো, যাতে এটি তাদের নিজেদের মধ্যে পরামর্শ করার একটি কেন্দ্র হতে পারে। আর সে নিজে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিরুদ্ধে সাহায্যের জন্য সিরিয়ার দিকে রওনা হলো। সিরিয়ার বাদশাহ তাকে সৈন্য ও যুদ্ধ সরঞ্জামের প্রতিশ্রুতি দিল। যখন তারা তাদের মসজিদের নির্মাণ কাজ শেষ করলো, তখন তারা নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললো: আমরা আমাদের মসজিদের নির্মাণ কাজ শেষ করেছি। আমরা চাই আপনি সেখানে সালাত আদায় করুন এবং আমাদের জন্য বরকতের দু'আ করুন। তখন নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমরা সফরে আছি, তবে ইনশাআল্লাহ ফিরে আসার পর (তা করা যাবে)।" অর্থাৎ তাবুক থেকে ফেরার পর। যখন তিনি তাবুক থেকে মদিনায় ফিরে আসছিলেন এবং মদিনা ও তাঁর মধ্যে এক দিন বা দিনের কিছু অংশ মাত্র দূরত্ব ছিল, তখন তাঁর ওপর ওহী নাযিল হলো: “আপনি তাতে (ঐ মসজিদে) কক্ষনো দাঁড়াবেন না। তবে যে মসজিদ প্রথম দিন থেকেই তাকওয়ার ভিত্তিতে প্রতিষ্ঠিত হয়েছে, সেটাই আপনার দাঁড়াবার বেশি উপযুক্ত। সেখানে এমন লোক আছে যারা পবিত্র হতে ভালোবাসে। আর আল্লাহ্ পবিত্রতা অর্জনকারীদের ভালোবাসেন।” (সূরা আত-তাওবাহ ৯:১০৮)। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেটিকে ভেঙে ফেলার জন্য লোক পাঠালেন। তাঁর (আল্লাহর) বাণী: “তবে যে মসজিদ প্রথম দিন থেকেই তাকওয়ার ভিত্তিতে প্রতিষ্ঠিত হয়েছে,”—বলা হয়েছে, তা হলো কুব্বা মসজিদ, যেমনটি সহীহ (হাদীসে) এসেছে:









আল-জামি` আল-কামিল (12271)


12271 - عن عروة بن الزبير قال: - في قصة هجرته صلى الله عليه وسلم: فلبث رسول الله صلى الله عليه وسلم في بني عمرو بن عوف بضع عشرة ليلة، وأسس المسجد الذي أسس على التقوى، وصلّى فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم ركب راحلته، فسار يمشي معه الناس حتى بركت عند مسجد الرسول صلى الله عليه وسلم بالمدينة … الحديث.

صحيح: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3906) فقال: قال ابن شهاب: فأخبرني عروة بن الزبير، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لقي الزبير ....

وهذا موصول بالإسناد الذي قبله (3095) وهو: عن يحيى بن بكير، حدثنا الليث، عن عقيل، قال ابن شهاب: فأخبرني عروة بن الزبير، أن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: فذكرت قصة الهجرة بطولها.

ولذا قال الحافظ ابن حجر في فتح الباري (7/ 243):"هو متصل إلى ابن شهاب بالإسناد المذكور أولا".

ورواه عبد الرزاق (5/ 359) فقال: قال معمر: قال الزهري: أخبرني عروة بن الزبير أنه لقي الزبير … فذكر قصة الهجرة بطولها.

فالظاهر أنه سمع هذه القصة من عائشة ومن الزبير.

وقيل: إنه المسجد الذي في المدينة كما جاء في الصحيح أيضا:




উরওয়াহ ইবন যুবাইর থেকে বর্ণিত, তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) হিজরতের ঘটনার প্রসঙ্গে তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু আমর ইবন আওফের মধ্যে দশের অধিক (বযু‘) রাত অবস্থান করেন এবং তিনি সেই মসজিদ প্রতিষ্ঠা করেন যা আল্লাহভীতির (তাকওয়ার) উপর প্রতিষ্ঠিত ছিল। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে সালাত আদায় করেন। অতঃপর তিনি তাঁর বাহনে আরোহণ করলেন এবং পথ চলতে লাগলেন। লোকেরা তাঁর সাথে হেঁটে যাচ্ছিল। অবশেষে উটটি মদিনায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদের নিকট বসে পড়লো...। (হাদিসের অবশিষ্ট অংশ)।









আল-জামি` আল-কামিল (12272)


12272 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن قال: مر بي عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري، قال: قلت له: كيف سمعت أباك يذكر في المسجد الذي أسس على التقوى؟ قال: قال أبي: دخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيت بعض نسائه، فقلت: يا رسول الله! أي المسجدين الذي أسس على التقوى، قال: فأخذ كفا من حصباء، فضرب به الأرض، ثم قال:"هو مسجدكم هذا" - لمسجد المدينة - قال: فقلت: أشهد أني سمعت أباك هكذا يذكره.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1398) عن محمد بن حاتم، حدثنا يحيى بن سعيد، عن حميد
الخراط، قال: سمعت أبا سلمة بن عبد الرحمن، قال: فذكره.




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু সালামাহ ইবনু আব্দুর রহমান বলেন, আব্দুর রহমান ইবনু আবি সাঈদ আল-খুদরি আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। আমি তাকে বললাম: তাকওয়ার ভিত্তিতে প্রতিষ্ঠিত মসজিদ (Masjid al-Taqwa) সম্পর্কে আপনার পিতাকে কী বলতে শুনেছেন? তিনি বললেন: আমার পিতা বলেছেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো এক স্ত্রীর ঘরে প্রবেশ করলাম। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! কোন মসজিদটি তাকওয়ার ভিত্তিতে প্রতিষ্ঠিত? বর্ণনাকারী বলেন: তখন তিনি এক মুষ্টি নুড়ি পাথর নিলেন, তারপর তা দিয়ে মাটিতে আঘাত করলেন এবং বললেন: “সেটি হলো তোমাদের এই মসজিদ।” – (তিনি মদীনার মসজিদের দিকে ইঙ্গিত করলেন)। (আবু সালামাহ বলেন:) আমি বললাম: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি আপনার পিতাকে ঠিক এভাবেই তা বর্ণনা করতে শুনেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (12273)


12273 - عن سهل بن سعد قال: اختلف رجلان على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد الذي أسِّس على التقوى، فقال أحدهما:"هو مسجد الرسول"، وقال الآخر:"هو مسجد قباء"، فأتيا النبي صلى الله عليه وسلم، فسألاه، فقال:"هو مسجدي هذا".

حسن: رواه أحمد (22805)، وابن حبان (1604)، والطبراني في الكبير (6/ 254) كلهم من حديث وكيع، حدثنا ربيعة بن عثمان التيمي، حدثني عمران بن أبي أنس، عن سهل بن سعد قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل ربيعة بن عثمان التيمي فإنه حسن الحديث.

والجمع بينهما ممكن بأن يقال: إن المسجد الذي أسّس على التقوى - إذا قيّد بالأولية - فهو مسجد قباء؛ لأنه بني قبل مسجد المدينة ببضعة عشر يوما. وإذا أطلق المسجد الذي أسس على التقوى فهو مسجد المدينة.

وقد ذهب إلى الجمع بهذا أو نحوه كثير من أهل العلم.

قوله: {فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ}.

روي عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نزلت في أهل قباء {فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ} قال: كانوا يستنجون بالماء؛ فنزلت فيهم هذه الآية".

رواه أبو داود (44)، والترمذي (3100)، وابن ماجه (357) كلهم من طريق معاوية بن هشام، عن يونس بن الحارث، عن إبراهيم بن أبي ميمونة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

قال الترمذي:"غريب من هذا الوجه".

قلت: فيه علتان: يونس بن الحارث الثقفي الطائفي ضعيف. وإبراهيم بن أبي ميمونة مجهول الحال. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 91).

وروي عن عويم بن ساعدة الأنصاري أن النبي صلى الله عليه وسلم أتاهم في مسجد قُباء، فقال:"إن الله تبارك وتعالى قد أحسن عليكم الثناء في الطهور في قصة مسجدكم، فما هذا الطهور الذي تطهرون به؟" قالوا: والله يا رسول الله! ما نعلم شيئا إلا أنه كان لنا جيران من اليهود، فكانوا يغسلون أدبارهم من الغائط، فغسلنا كما غسلوا.

رواه أحمد (15485)، وابن خزيمة (83)، والطبراني في الكبير (17/ 348)، والحاكم (1/ 155) كلهم من طريق أبي أويس، ثنا شرحبيل، عن عُويم بن ساعدة فذكره.

قال الهيثمي في المجمع (1/ 212):"رواه أحمد والطبراني في الثلاثة، وفيه شرحبيل بن سعد، ضعّفه مالك، وابن معين، وأبو زرعة، ووثّقه ابن حبان".

قلت: أبو أويس هو: عبد الله بن عبد الله بن أويس بن مالك، قريب مالك وصهره، مختلف
فيه، والخلاصة فيه أنه صدوق يهم كما في التقريب، وشرحبيل بن سعد قال فيه النسائي:"ضعيف". وذكره ابن حبان في الثقات، والخلاصة فيه كما في التقريب:"صدوق اختلط آخره" كما في سماعه من عويم نظر؛ لأن عويما مات في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم، ويقال: في خلافة عمر."تهذيب التهذيب" (2/ 158).

وله شواهد أخرى عن ابن عباس، وأبي أمامة، ومحمد بن عبد الله بن سلام، ولا يسلم منها شيء، فمن نظر إلى مجموع هذه الشواهد جعل الحديث صحيحا، أو حسنا، وليس من هذه الشواهد شيء على شرطي.




সহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে দুজন লোক সেই মসজিদটি নিয়ে মতভেদ করল যা তাকওয়ার (খোদাভীতির) উপর ভিত্তি করে নির্মিত হয়েছিল। তাদের একজন বলল: 'এটি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদ।' আর অন্যজন বলল: 'এটি কুবাহ মসজিদ।' তখন তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে জিজ্ঞাসা করল। তিনি বললেন: 'এটি আমার এই মসজিদটি (অর্থাৎ মসজিদে নববী)।'









আল-জামি` আল-কামিল (12274)


12274 - عن أبي أمامة أن رجلا قال: يا رسول الله، ائذن لي بالسياحة، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن سياحة أمتي الجهاد في سبيل الله".

حسن: رواه أبو داود (2486)، والحاكم (2/ 73)، والبيهقي (9/ 161) من طريق محمد بن عثمان التنوخي أبي الجماهر، حدثنا الهيثم بن حميد، أخبرني العلاء بن الحارث، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة فذكره.

وإسناده حسن من أجل القاسم أبي عبد الرحمن، فإنه مختلف فيه، والأقرب أنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে পর্যটনের (সিয়াহাহ) অনুমতি দিন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় আমার উম্মতের পর্যটন (সিয়াহাহ) হলো আল্লাহর পথে জিহাদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (12275)


12275 - عن المسيب بن حزن قال: لما حضرت أبا طالب الوفاة جاءه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فوجد عنده أبا جهل، وعبد الله بن أبي أمية بن المغيرة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عم! قل: لا إله إلا الله. كلمة أشهد لك بها عند الله" فقال أبو جهل وعبد الله بن أبي أمية: يا أبا طالب! أترغب عن ملة عبد المطلب؟ فلم يزل رسول الله صلى الله عليه وسلم يعرضها عليه، ويعيد له تلك المقالة، حتى قال أبو طالب آخر ما كلمهم: هو على ملة عبد المطلب. وأبى أن يقول: لا إله إلا الله. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما والله لأستغفرن لك ما لم أنه عنك" فأنزل الله عز وجل: {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَى مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ}
وأنزل الله تعالى في أبي طالب، فقال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: {إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ} [سورة القصص: 56].

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4675)، ومسلم في الإيمان (24) كلاهما من طريق ابن شهاب، قال: أخبرني سعيد بن المسيب، عن أبيه فذكره. واللفظ لمسلم ولفظ البخاري مختصر.




মুসাইয়্যাব ইবনে হাযন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবু তালিবের মৃত্যুর সময় উপস্থিত হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কাছে এলেন। তিনি তাঁর কাছে আবু জাহল এবং আব্দুল্লাহ ইবনু আবী উমায়্যা ইবনুল মুগীরাহকে দেখতে পেলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “হে চাচা! আপনি বলুন: লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)। এই একটি বাক্য, যার দ্বারা আমি আল্লাহর কাছে আপনার জন্য সাক্ষ্য দিতে পারব।”

তখন আবু জাহল ও আব্দুল্লাহ ইবনু আবী উমায়্যা বলল, “হে আবু তালিব! আপনি কি আব্দুল মুত্তালিবের ধর্মাদর্শ থেকে মুখ ফিরিয়ে নিবেন?” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে বারবার বাক্যটি পেশ করতে থাকলেন। আর তারা দুজন (আবু জাহল ও আব্দুল্লাহ ইবনু আবী উমায়্যা) বারবার সেই একই কথা বলতে থাকল। অবশেষে আবু তালিব তাদের সাথে শেষ কথা বলার সময় বললেন: “তিনি আব্দুল মুত্তালিবের ধর্মাদর্শের ওপরই আছেন।” আর তিনি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলতে অস্বীকার করলেন।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “আল্লাহর কসম! যতক্ষণ না আমাকে আপনার জন্য ক্ষমা চাইতে নিষেধ করা হয়, ততক্ষণ আমি আপনার জন্য ক্ষমা চাইতে থাকব।” তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: “নবী ও মুমিনদের জন্য উচিত নয় যে তারা মুশরিকদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করবে, যদিও তারা তাদের নিকটাত্মীয় হয়, যখন তাদের কাছে সুস্পষ্ট হয়ে গেছে যে তারা জাহান্নামের অধিবাসী।”

আর আল্লাহ তা‘আলা আবু তালিবের ব্যাপারে নাযিল করলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: “নিশ্চয়ই আপনি যাকে ভালোবাসেন, তাকে সৎপথে আনতে পারবেন না। বরং আল্লাহই যাকে ইচ্ছা সৎপথে আনেন। আর তিনিই সৎপথপ্রাপ্তদের সম্পর্কে অধিক অবগত।” [সূরা কাসাস: ৫৬]









আল-জামি` আল-কামিল (12276)


12276 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعمّه عند الموت:"قل لا إله إلا الله، أشهد لك بها يوم القيامة"، قال: لولا أن تُعيّرني قريشٌ يقولون: إنما حمله على ذلك الجزعُ لأقررتُ بها عينيك، فأنزل الله تعالى: {إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَنْ يَشَاءُ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ (56)} [القصص: 56].

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (25: 42) عن محمد بن حاتم بن ميمون، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا يزيد بن كيسان، عن أبي حازم الأشجعي، عن أبي هريرة قال: فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মৃত্যুকালীন সময়ে তাঁর চাচাকে বললেন: “আপনি বলুন, ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই)। কিয়ামতের দিন আমি এর দ্বারা আপনার জন্য সাক্ষ্য দেব।” তিনি (চাচা) বললেন: “যদি কুরাইশরা আমাকে উপহাস না করতো—তারা বলতো, কেবল মৃত্যুর ভীতিই তাকে এটার দিকে ধাবিত করেছে—তাহলে আমি নিশ্চয়ই এর দ্বারা আপনার চোখ শীতল করতাম।” অতঃপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {নিশ্চয়ই আপনি যাকে ভালোবাসেন, তাকে সৎপথে আনতে পারবেন না; বরং আল্লাহ যাকে ইচ্ছা সৎপথে আনয়ন করেন। আর সৎপথপ্রাপ্তদের সম্পর্কে তিনিই অধিক জানেন।} [সূরা আল-কাসাস: ৫৬]।









আল-জামি` আল-কামিল (12277)


12277 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استأذنت ربي أن أستغفر لأمي فلم يأذن لي، واستأذنته أن أزور قبرها، فأذن لي".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (976) من طرق عن مروان بن معاوية، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، قال: فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি আমার রবের কাছে আমার মায়ের জন্য ক্ষমা প্রার্থনার অনুমতি চেয়েছিলাম, কিন্তু তিনি আমাকে অনুমতি দেননি। আর আমি তাঁর কাছে তাঁর (মায়ের) কবর যিয়ারত করার অনুমতি চাইলে তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (12278)


12278 - عن عبد الله بن عباس قال: كانوا يستغفرون لهم حتى نزلت هذه الآية، فلما نزلت أمسكوا عن الاستغفار لأمواتهم، ولم ينهوا أن يستغفروا للأحياء حتى يموتوا، ثم أنزل الله: {وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ} الآية. يعني استغفر له ما كان حيًا، فلما مات أمسك عن الاستغفار.

حسن: رواه ابن جرير في تفسيره (12/ 23 - 24)، وابن أبي حاتم في تفسيره (6/ 1893) كلاهما من حديث عبد الله بن صالح، قال: حدثنا معاوية بن صالح، عن علي بن أبي طلحة، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل علي بن أبي طلحة، وهو وإن كان يرسل عن ابن عباس، ولكن الواسطة معروف وهو صدوق في نفسه، وكذلك فيه عبد الله بن صالح كاتب الليث حسن الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা (মুসলিমগণ) তাদের (মুশরিক আত্মীয়স্বজনদের) জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতেন, যতক্ষণ না এই আয়াতটি নাযিল হলো। যখন এটি নাযিল হলো, তখন তারা তাদের মৃতদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করা থেকে বিরত থাকলেন। তবে জীবিতদের জন্য (মুশরিকদের) ক্ষমা প্রার্থনা করা থেকে তাদেরকে নিষেধ করা হয়নি যতক্ষণ না তারা মারা যায়। এরপর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: {আর ইব্রাহীমের তার পিতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা...} আয়াতটি। এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, তিনি (ইব্রাহীম আঃ) তার পিতা জীবিত থাকাকালীন তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেছিলেন, কিন্তু যখন তিনি মারা গেলেন, তখন ক্ষমা চাওয়া থেকে বিরত থাকলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12279)


12279 - عن علي قال: سمعت رجلا يستغفر لأبويه، وهما مشركان، فقلت:"أتستغفر لهما وهما مشركان. فقال: أو لم يستغفر إبراهيم لأبيه، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت ذلك له فنزلت: {وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَنْ مَوْعِدَةٍ وَعَدَهَا إِيَّاهُ}.

حسن: رواه الترمذي (3101)، والنسائي (2036) وأحمد (1085)، والحاكم (2/ 335) كلهم من حديث سفيان، عن أبي إسحاق، عن أبي الخليل، عن علي بن أبي طالب فذكره.
قال الترمذي:"حديث حسن". وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: أبو الخليل هو عبد الله بن الخليل، أو ابن أبي الخليل الحضرمي الكوفي، قال ابن سعد:"كان قليل الحديث، ووثقه ابن حبان، وروى عنه جمع، فيُحسن حديثه في الشواهد، وأما إذا انفرد، فينظر فيه.

وقوله: {وَعَدَهَا إِيَّاهُ} أي أباه، وذلك أن إبراهيم عليه السلام وعد أباه أن يستغفر له رجاء إسلامه، وكان استغفاره في حال شرك أبيه {فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ أَنَّهُ عَدُوٌّ لِلَّهِ تَبَرَّأَ مِنْهُ إِنَّ إِبْرَاهِيمَ لأَوَّاهٌ حَلِيمٌ}، وذلك بعد موته على الكفر، وقد جاء في الصحيح:




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক ব্যক্তিকে তার পিতামাতার জন্য ইস্তিগফার (ক্ষমা প্রার্থনা) করতে শুনলাম, অথচ তারা ছিল মুশরিক। আমি তাকে বললাম: "তুমি কি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করছো, অথচ তারা মুশরিক?" সে বলল: "ইবরাহীম (আঃ) কি তাঁর পিতার জন্য ক্ষমা চাননি?" এরপর আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং বিষয়টি তাঁর নিকট উল্লেখ করলাম। ফলে এই আয়াতটি নাযিল হলো: {আর ইবরাহীমের তাঁর পিতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা ছিল কেবল এক প্রতিশ্রুতির কারণে, যা তিনি তাকে দিয়েছিলেন।}









আল-জামি` আল-কামিল (12280)


12280 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يلقى إبراهيم أباه آزر يوم القيامة وعلى وجه آزر قترة وغبرة، فيقول له إبراهيم: ألم أقل لك: لا تعصني فيقول أبوه: فاليوم لا أعصيك. فيقول إبراهيم: يا رب إنك وعدتني أن لا تخزيني يوم يبعثون، فأي خزي أخزى من أبي الأبعد؟ فيقول الله تعالى: إني حرمت الجنة على الكافرين. ثم يقال: يا إبراهيم ما تحت رجليك؟ فينظر فإذا هو بذبخٍ ملتطخ، فيؤخذ بقوائمه فيلقى في النار".

صحيح: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3350) عن إسماعيل بن عبد الله قال: أخبرني أخي عبد الحميد، عن ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ইবরাহীম (আঃ) কিয়ামতের দিন তার পিতা আযরের সাথে সাক্ষাৎ করবেন, যখন আযরের চেহারা মলিন ও ধূলিধূসরিত থাকবে। ইবরাহীম (আঃ) তাকে বলবেন: আমি কি তোমাকে বলিনি যে, আমার অবাধ্যতা করো না? তার পিতা বলবে: আজ আমি তোমার অবাধ্যতা করব না। তখন ইবরাহীম (আঃ) বলবেন: হে আমার প্রতিপালক! তুমি আমাকে প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলে যে, পুনরুত্থানের দিন আমাকে অপমানিত করবে না। আমার এই দূরবর্তী পিতার (দুর্গতির) চেয়ে আর কিসের অপমান বেশি হতে পারে? তখন আল্লাহ তা'আলা বলবেন: নিশ্চয় আমি কাফেরদের জন্য জান্নাত হারাম করে দিয়েছি। এরপর বলা হবে: হে ইবরাহীম! তোমার পায়ের নিচে কী আছে? তিনি তখন দৃষ্টি দেবেন এবং দেখবেন যে, তা একটি মলমিশ্রিত জঘন্য প্রাণীতে (বা রক্তমাখা পশুর রূপে) রূপান্তরিত। অতঃপর সেটির পা ধরে টেনে নিয়ে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (12281)


12281 - عن عبد الله بن عباس، أنه قيل لعمر بن الخطاب: حدِّثنا من شأن العسرة، قال: خرجنا إلى تبوك في قيظ شديد، فنزلنا منزلا أصابنا فيه عطش، حتى ظننا أن رقابنا ستنقطع، حتى أن الرجل ليذهب فيلتمس الماء، فلا يرجع حتى نظن أن رقبته
ستنقطع، حتى أن الرجل لينحر بعيره، فيعصر فرثه، فيشربه، ويجعل ما بقي على كبده، فقال أبو بكر الصديق: يا رسول الله! قد عودك الله في الدعاء خيرًا، فادع لنا، فقال:"أتحب ذلك؟" قال: نعم، فرفع يديه صلى الله عليه وسلم، فلم يرجعهما، حتى أظلت سحابة، فسكبت، فملؤوا ما معهم، ثم ذهبنا ننظر، فلم نجدها جاوزت العسكر.

صحيح: رواه ابن حبان (1383)، والبزار - كشف الأستار (1841)، والحاكم (1/ 159)، والبيهقي في الدلائل (5/ 231) كلهم من حديث ابن وهب، قال: أخبرنا عمرو بن الحارث، عن سعد بن أبي هلال، عن عتبة بن أبي عتبة، عن نافع بن جبير، عن عبد الله بن عباس فذكره.

وإسناده صحيح.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

تنبيه: سقط من إسناد ابن حبان"عتبة بن أبي عتبة".

وقوله: {ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ} كرر ذكر التوبة بعد أن ذكر في أول الآية: {لَقَدْ تَابَ اللَّهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ} فذكر التوبة في أول الآية للنبي صلى الله عليه وسلم لجميع أصحابه الذين خرجوا في غزوة العسرة، وذكر التوبة الثانية للذين أرادوا التخلف والانصراف لشدة الساعة ثم مضوا ولم يتخلفوا.

وقوله: {إِنَّهُ بِهِمْ رَءُوفٌ رَحِيمٌ} ختم الله بهذه البشرى للجميع الذين خرجوا في غزوة العسرة بأنه سبحانه وتعالى قبل توبتهم، ومن تاب الله عليه لم يعذبه أبدا.

وقوله: {وَعَلَى الثَّلَاثَةِ الَّذِينَ خُلِّفُوا} هم كعب بن مالك، ومرارة بن ربيع العمري، وهلال بن أمية الواقفي، وتفصيل قصتهم في الحديث الآتي:




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলা হয়েছিল: আপনি (গাযওয়াতুল) 'উসরার (কষ্টের অভিযানের) ঘটনা আমাদের কাছে বর্ণনা করুন। তিনি বললেন: আমরা কঠিন গরমে তাবুকের উদ্দেশ্যে বের হলাম। অতঃপর আমরা এমন এক স্থানে অবতরণ করলাম যেখানে আমরা তীব্র তৃষ্ণার শিকার হলাম, এমনকি আমরা ধারণা করছিলাম যে আমাদের ঘাড় ছিন্ন হয়ে যাবে (তৃষ্ণায় প্রাণ বেরিয়ে যাবে)। এমনকি কোনো ব্যক্তি পানি খুঁজতে গেলে সে ফিরে আসত না, যতক্ষণ না আমরা ধারণা করতাম যে তার ঘাড়ও ছিন্ন হয়ে যাবে (সে মারা যাবে)। এমনকি কেউ কেউ নিজের উট যবেহ করে তার গোবর নিংড়ে নিত, আর তা পান করত, এবং যা অবশিষ্ট থাকত তা তার কলিজার উপর রাখত। তখন আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আপনাকে দো‘আয় কল্যাণকর ফল লাভে অভ্যস্ত করেছেন, সুতরাং আপনি আমাদের জন্য দো‘আ করুন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এটা পছন্দ করো?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর দু'হাত তুললেন এবং মেঘ এসে ছায়া দেওয়া পর্যন্ত এবং বৃষ্টিপাত হওয়া পর্যন্ত তিনি হাত নামালেন না। ফলে তারা তাদের সাথে থাকা সব পাত্র ভরে নিল। অতঃপর আমরা গিয়ে দেখলাম, মেঘটি আমাদের শিবির অতিক্রম করেনি।









আল-জামি` আল-কামিল (12282)


12282 - عن كعب بن مالك قال: لَمْ أَتَخَلَّفْ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي غَزْوَةٍ غَزَاهَا إِلَّا فِي غَزْوَةِ تَبُوكَ، غَيْرَ أَنِّي كُنْتُ تَخَلَّفْتُ فِي غَزْوَةِ بَدْرٍ، وَلَمْ يُعَاتِبْ أَحَدًا تَخَلَّفَ عَنْهَا، إِنَّمَا خَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُرِيدُ عِيرَ قُرَيْشٍ، حَتَّى جَمَعَ اللَّهُ بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ عَدُوِّهِمْ عَلَى غَيْرِ مِيعَادٍ. وَلَقَدْ شَهِدْتُ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لَيْلَةَ الْعَقَبَةِ حِينَ تَوَاثَقْنَا عَلَى الإسْلَامِ، وَمَا أُحِبُّ أَنَّ لِي بِهَا مَشْهَدَ بَدْرٍ، وَإِنْ كَانَتْ بَدْرٌ أَذْكَرَ فِي النَّاسِ مِنْهَا، كَانَ مِنْ خَبَرِي أَنِّي لَمْ أَكُنْ قَطُّ أَقْوَى وَلَا أَيْسَرَ حِينَ تَخَلَّفْتُ عَنْهُ فِي تِلْكَ الْغَزْوَةِ، وَاللَّهِ مَا اجْتَمَعَتْ عِنْدِي قَبْلَهُ رَاحِلَتَانِ قَطُّ حَتَّى جَمَعْتُهُمَا فِي تِلْكَ الْغَزْوَةِ، وَلَمْ يَكُنْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُرِيدُ غَزْوَةً إِلَّا وَرَّى بِغَيْرِهَا، حَتَّى كَانَتْ تِلْكَ الْغَزْوَةُ، غَزَاهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي حَرٍّ شَدِيدٍ، وَاسْتَقْبَلَ سَفَرًا بَعِيدًا وَمَفَازًا وَعَدُوًّا كَثِيرًا، فَجَلَّى لِلْمُسْلِمِينَ أَمْرَهُمْ لِيَتَأَهَّبُوا أُهْبَةَ غَزْوِهِمْ، فَأَخْبَرَهُمْ بِوَجْهِهِ الَّذِي يُرِيدُ، وَالْمُسْلِمُونَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم كَثِيرٌ، وَلَا
يَجْمَعُهُمْ كِتَابٌ حَافِظٌ - يُرِيدُ الدِّيوَانَ -. قَالَ كَعْبٌ: فَمَا رَجُلٌ يُرِيدُ أَنْ يَتَغَيَّبَ إِلَّا ظَنَّ أَنْ سَيَخْفى لَهُ، مَا لَمْ يَنْزِلْ فِيهِ وَحْيُ اللَّهِ، وَغَزَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم تِلْكَ الْغَزْوَةَ حِينَ طَابَتِ الثِّمَارُ وَالظِّلَالُ، وَتَجَهَّزَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَالْمُسْلِمُونَ مَعَهُ، فَطَفِقْتُ أَغْدُو لِكَيْ أَتَجَهَّزَ مَعَهُمْ، فَأَرْجِعُ وَلَمْ أَقْضِ شَيْئًا، فَأَقُولُ فِي نَفْسِي: أَنَا قَادِرٌ عَلَيْهِ. فَلَمْ يَزَلْ يَتَمَادَى بِي حَتَّى اشْتَدَّ بِالنَّاسِ الْجِدُّ، فَأَصْبَحَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَالْمُسْلِمُونَ مَعَهُ وَلَمْ أَقْضِ مِنْ جَهَازِي شَيْئًا، فَقُلْتُ: أَتَجَهَّزُ بَعْدَهُ بِيَوْمٍ أَوْ يَوْمَيْنِ ثُمَّ أَلْحَقُهُمْ، فَغَدَوْتُ بَعْدَ أَنْ فَصَلُوا لأَتَجَهَّزَ، فَرَجَعْتُ وَلَمْ أَقْضِ شَيْئًا، ثُمَّ غَدَوْتُ ثُمَّ رَجَعْتُ وَلَمْ أَقْضِ شَيْئًا، فَلَمْ يَزَلْ بِي حَتَّى أَسْرَعُوا وَتَفَارَطَ الْغَزْوُ، وَهَمَمْتُ أَنْ أَرْتَحِلَ فَأُدْرِكَهُمْ، وَلَيْتَنِي فَعَلْتُ، فَلَمْ يُقَدَّرْ لِي ذَلِكَ، فَكُنْتُ إِذَا خَرَجْتُ فِي النَّاسِ بَعْدَ خُرُوجِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَطُفْتُ فِيهِمْ، أَحْزَنَنِي أَنِّي لَا أَرَى إِلَّا رَجُلًا مَغْمُوصًا عَلَيْهِ النِّفَاقُ، أَوْ رَجُلًا مِمَّنْ عَذَرَ اللَّهُ مِنَ الضُّعَفَاءِ، وَلَمْ يَذْكُرْنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حَتى بَلَغَ تَبُوكَ، فَقَالَ وَهْوَ جَالِسٌ فِي الْقَوْمِ بِتَبُوكَ:"مَا فَعَلَ كَعْبٌ؟" فَقَالَ رَجُلٌ مِنْ بَنِي سَلِمَةَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، حَبَسَهُ بُرْدَاهُ وَنَظَرُهُ فِي عِطْفِهِ. فَقَالَ مُعَاذُ بْنُ جَبَلٍ: بِئْسَ مَا قُلْتَ، وَاللَّهِ يَا رَسُولَ اللَّهِ، مَا عَلِمْنَا عَلَيْهِ إِلَّا خَيْرًا. فَسَكَتَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم. قَالَ كَعْبُ بْنُ مَالِكٍ: فَلَمَّا بَلَغَنِي أَنَّهُ تَوَجَّهَ قَافِلًا حَضَرَنِي هَمِّي، وَطَفِقْتُ أَتَذَكَّرُ الْكَذِبَ وَأَقُولُ: بِمَاذَا أَخْرُجُ مِنْ سَخَطِهِ غَدًا وَاسْتَعَنْتُ عَلَى ذَلِكَ بِكُلِّ ذِي رَأْيٍ مِنْ أَهْلِي، فَلَمَّا قِيلَ: إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ أَظَلَّ قَادِمًا زَاحَ عَنِّي الْبَاطِلُ، وَعَرَفْتُ أَنِّي لَنْ أَخْرُجَ مِنْهُ أَبَدًا بِشَيْءٍ فِيهِ كَذِبٌ، فَأَجْمَعْتُ صِدْقَهُ، وَأَصْبَحَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَادِمًا، وَكَانَ إِذَا قَدِمَ مِنْ سَفَرٍ بَدَأَ بِالْمَسْجِدِ فَيَرْكَعُ فِيهِ رَكْعَتَيْنِ ثُمَّ جَلَسَ لِلنَّاسِ، فَلَمَّا فَعَلَ ذَلِكَ جَاءَهُ الْمُخَلَّفُونَ، فَطَفِقُوا يَعْتَذِرُونَ إِلَيْهِ، وَيَحْلِفُونَ لَهُ، وَكَانُوا بِضْعَةً وَثَمَانِينَ رَجُلًا فَقَبِلَ مِنْهُمْ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَانِيَتَهُمْ، وَبَايَعَهُمْ وَاسْتَغْفَرَ لَهُمْ، وَوَكَلَ سَرَائِرَهُمْ إِلَى اللَّهِ، فَجِئْتُهُ فَلَمَّا سَلَّمْتُ عَلَيْهِ تبَسَّمَ تَبَسُّمَ الْمُغْضَبِ، ثُمَّ قَالَ:"تَعَالَ" فَجِئْتُ أَمْشِي حَتَّى جَلَسْتُ بَيْنَ يَدَيْهِ، فَقَالَ لِي:"مَا خَلَّفَكَ؟ أَلَمْ تَكُنْ قَدِ ابْتَعْتَ ظَهْرَكَ" فَقُلْتُ: بَلَى، إِنِّي وَاللهِ لَوْ جَلَسْتُ عِنْدَ غَيْرِكَ مِنْ أَهْلِ الدُّنْيَا، لَرَأَيْتُ أَنْ سَأَخْرُجُ مِنْ سَخَطِهِ بِعُذْرٍ، وَلَقَدْ أُعْطِيتُ جَدَلًا، وَلَكِنِّي وَاللَّهِ لَقَدْ عَلِمْتُ لَئِنْ حَدَّثْتُكَ الْيَوْمَ حَدِيثَ كَذِبٍ تَرْضى بهِ عَنِّي لَيُوشِكَنَّ اللَّهُ أَنْ يُسْخِطَكَ عَلَيَّ، وَلَئِنْ حَدَّثْتُكَ حَدِيثَ صِدْقٍ تَجِدُ عَلَيَّ فِيهِ إِنِّي لأرْجُو فِيهِ عَفْوَ اللَّهِ، لَا وَاللَّهِ مَا كَانَ لِي مِنْ عُذْرٍ، وَاللَّهِ مَا كُنْتُ قَطُّ أَقْوَى
وَلَا أَيْسَرَ مِنِّي حِينَ تَخَلَّفْتُ عَنْكَ. فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"أَمَّا هَذَا فَقَدْ صَدَقَ، فَقُمْ حَتَّى يَقْضيَ اللَّهُ فِيكَ" فَقُمْتُ، وَثَارَ رِجَالٌ مِنْ بَنِي سَلِمَةَ فَاتَّبَعُونِي، فَقَالُوا لِي: وَاللَّهِ مَا عَلِمْنَاكَ كُنْتَ أَذْنَبْتَ ذَنْبًا قَبْلَ هَذَا، وَلَقَدْ عَجَزْتَ أَنْ لَا تَكُونَ اعْتَذَرْتَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِمَا اعْتَذَرَ إِلَيْهِ الْمُتَخَلِّفُونَ، قَدْ كَانَ كَافِيَكَ ذَنْبَكَ اسْتِغْفَارُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لَكَ، فَوَاللَّهِ مَا زَالُوا يُؤَنِّبُونِي حَتَّى أَرَدْتُ أَنْ أَرْجِعَ فَأُكَذِّبُ نَفْسِي، ثُمَّ قُلْتُ لَهُمْ: هَلْ لَقِيَ هَذَا مَعِي أَحَدٌ؟ قَالُوا: نَعَمْ، رَجُلَانِ قَالَا مِثْلَ مَا قُلْتَ، فَقِيلَ لَهُمَا مِثْلُ مَا قِيلَ لَكَ. فَقُلْتُ: مَنْ هُمَا؟ قَالُوا: مُرَارَةُ بْنُ الرَّبِيعِ الْعَمْرِيُّ وَهِلَالُ بْنُ أُمَيَّةَ الْوَاقِفِيُّ. فَذَكَرُوا لِي رَجُلَيْنِ صَالِحَيْنِ قَدْ شَهِدَا بَدْرًا فِيهِمَا إِسْوَةٌ، فَمَضيْتُ حِينَ ذَكَرُوهُمَا لِي، وَنَهَى رَسُول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الْمُسْلِمِينَ عَنْ كَلَامِنَا أَيُّهَا الثَّلَاثَةُ مِنْ بَيْنِ مَنْ تَخَلَّفَ عَنْهُ، فَاجْتَنَبَنَا النَّاسُ وَتَغَيَّرُوا لَنَا، حَتَّى تَنَكَّرَتْ فِي نَفْسِي الأَرْضُ، فَمَا هِيَ الَّتِي أَعْرِفُ، فَلَبِثْنَا عَلَى ذَلِكَ خَمْسِينَ لَيْلَةً، فَأَمَّا صَاحِبَايَ فَاسْتَكَانَا وَقَعَدَا فِي بُيُوتِهِمَا يَبْكِيَانِ، وَأَمَّا أَنَا فَكُنْتُ أَشَبَّ الْقَوْمِ وَأَجْلَدَهُمْ، فَكُنْتُ أَخْرُجُ فَأَشْهَدُ الصلَاةَ مَعَ الْمُسْلِمِينَ، وَأَطُوفُ فِي الأَسْوَاقِ، وَلَا يُكَلِّمُنِي أَحَدٌ، وَآتِي رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأُسَلِّمُ عَلَيْهِ وَهْوَ فِي مَجْلِسِهِ بَعْدَ الصَّلَاةِ، فَأَقُولُ فِي نَفْسِي: هَلْ حَرَّكَ شَفَتَيْهِ بِرَدِّ السَّلَامِ عَلَيَّ أَمْ لَا؟ ثُمَّ أُصَلِّي قَرِيبًا مِنْهُ، فَأُسَارِقُهُ النَّظَرَ، فَإِذَا أَقْبَلْتُ عَلَى صَلَاتِي أَقْبَلَ إِلَيَّ، وَإذَا الْتَفَتُّ نَحْوَهُ أَعْرَضَ عَنِّي، حَتَّى إِذَا طَالَ عَلَيَّ ذَلِكَ مِنْ جَفْوَةِ النَّاسِ مَشَيْتُ حَتَّى تَسَوَّرْتُ جِدَارَ حَائِطِ أَبِي قَتَادَةَ وَهْوَ ابْنُ عَمِّي وَأَحَبُّ النَّاسِ إِلَيَّ، فَسَلَّمْتُ عَلَيْهِ، فَوَاللَّهِ مَا رَدَّ عَلَيَّ السَّلَامَ، فَقُلْتُ: يَا أَبَا قَتَادَةَ، أَنْشُدُكَ بِاللَّهِ هَلْ تَعْلَمُنِي أُحِبُّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَسَكَتَ، فَعُدْتُ لَهُ فَنَشَدْتُهُ فَسَكَتَ، فَعُدْتُ لَهُ فَنَشدْتُهُ. فَقَال: اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ. فَفَاضتْ عَيْنَايَ وَتَوَلَّيْتُ حَتَّى تَسَوَّرْتُ الْجِدَارَ، قَال: فَبَيْنَا أَنَا أَمْشِي بِسُوقِ الْمَدِينَةِ إِذَا نَبَطِيٌّ مِنْ أَنْبَاطِ أَهْلِ الشَّامِ مِمَّنْ قَدِمَ بِالطَّعَامِ يَبِيعُهُ بِالْمَدِينَةِ يَقُولُ: مَنْ يَدُلُّ عَلَى كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ؟ فَطَفِقَ النَّاسُ يُشِيرُونَ لَهُ، حَتَّى إِذَا جَاءَنِي دَفَعَ إِلَيَّ كِتَابًا مِنْ مَلِكِ غَسَّانَ، فَإِذَا فِيهِ: أَمَّا بَعْدُ فَإِنَّهُ قَدْ بَلَغَنِي أَنَّ صَاحِبَكَ قَدْ جَفَاكَ، وَلَمْ يَجْعَلْكَ اللَّهُ بِدَارِ هَوَانٍ وَلَا مَضْيَعَةٍ، فَالْحَقْ بِنَا نُوَاسِكَ. فَقُلْتُ لَمَّا قَرَاتُهَا: وَهَذَا أَيْضًا مِنَ الْبَلَاءِ. فَتَيَمَّمْتُ بِهَا التَّنُّورَ فَسَجَرْتُهُ بِهَا، حَتَّى إِذَا مَضَتْ أَرْبَعُونَ لَيْلَةً مِنَ الْخَمْسِينَ، إِذَا رَسُولُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَأْتِينِي فَقَالَ: إِنَّ رَسُولَ صلى الله عليه وسلم يَأْمُرُكَ أَنْ تَعْتَزِلَ امْرَأَتَكَ، فَقُلْتُ: أُطَلّقُهَا أَمْ مَاذَا أَفْعَلُ؟ قَالَ: لَا بَلِ
اعْتَزِلْهَا وَلَا تَقْرَبْهَا. وَأَرْسَلَ إِلَى صَاحِبَيَّ مِثْلَ ذَلِكَ، فَقُلْتُ لامْرَأَتِي: الْحَقِي بِأَهْلِكِ فَتَكُونِي عِنْدَهُمْ حَتَّى يَقْضِيَ اللَّهُ فِي هَذَا الأَمْرِ. قَالَ كَعْبٌ: فَجَاءَتِ امْرَأَةُ هِلَالِ بْنِ أُمَيَّةَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنَّ هِلَالَ بْنَ أُمَيَّةَ شَيْخٌ ضَائِعٌ لَيْسَ لَهُ خَادِمٌ فَهَلْ تَكْرَهُ أَنْ أَخْدُمَهُ؟ قَالَ:"لَا وَلَكِنْ لَا يَقْرَبْكِ" قَالَتْ: إِنَّهُ وَاللَّهِ مَا بِهِ حَرَكَةٌ إِلَى شيءٍ، وَاللَّهِ مَا زَالَ يَبْكِي مُنْذُ كَانَ مِنْ أَمْرِهِ مَا كَانَ إِلَى يَوْمِهِ هَذَا. فَقَالَ لِي بَعْضُ أَهْلِي لَوِ اسْتَأْذَنْتَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي امْرَأَتِكَ كَمَا أَذِنَ لامْرَأَةِ هِلَالِ بْنِ أُمَيَّةَ أَنْ تَخْدُمَهُ، فَقُلْتُ: وَاللَّهِ لَا أَسْتَاذِنُ فِيهَا رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، وَمَا يُدْرِينِي مَا يَقُولُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا اسْتَأذَنْتُهُ فِيهَا وَأَنَا رَجُلٌ شَابٌّ. فَلَبِثْتُ بَعْدَ ذَلِكَ عَشْرَ لَيَالٍ حَتَّى كَمَلَتْ لَنَا خَمْسُونَ لَيْلَةً مِنْ حِينِ نَهَى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَنْ كَلَامِنَا، فَلَمَّا صلَّيْتُ صَلَاةَ الْفَجْرِ صُبْحَ خَمْسِينَ لَيْلَةً، وَأَنَا عَلَى ظَهْرِ بَيْتٍ مِنْ بُيُوتِنَا، فَبَيْنَا أَنَا جَالِسٌ عَلَى الْحَالِ الَّتِي ذَكَرَ اللَّهُ، قَدْ ضَاقَتْ عَلَيَّ نَفْسِي، وَضَاقَتْ عَلَيَّ الأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ، سَمِعْتُ صَوْتَ صَارخٍ أَوْفَى عَلَى جَبَلِ سَلْعٍ بِأَعْلَى صَوْتِهِ: يَا كَعْبُ بْنَ مَالِكٍ، أَبْشِرْ. قَالَ: فَخَرَرْتُ سَاجِدًا، وَعَرَفْتُ أَنْ قَدْ جَاءَ فَرَجٌ، وَآذَنَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِتَوْبَةِ اللَّهِ عَلَيْنَا حِينَ صَلَّى صَلَاةَ الْفَجْرِ، فَذَهَبَ النَّاسُ يُبَشِّرُونَنَا، وَذَهَبَ قِبَلَ صَاحِبَيَّ مُبَشِّرُونَ، وَرَكَضَ إِلَيَّ رَجُلٌ فَرَسًا، وَسَعَى سَاعٍ مِنْ أَسْلَمَ فَأَوْفَى عَلَى الْجَبَلِ وَكَانَ الصَّوْتُ أَسْرَعَ مِنَ الْفَرَسِ، فَلَمَّا جَاءَنِي الَّذِي سَمِعْتُ صَوْتَهُ يُبَشِّرُنِي نَزَعْتُ لَهُ ثَوْبَيَّ، فَكَسَوْتُهُ إِيَّاهُمَا بِبُشْرَاهُ، وَاللهِ مَا أَمْلِكُ غَيْرَهُمَا يَوْمَئِذٍ، وَاسْتَعَرْتُ ثَوْبَيْنِ فَلَبِسْتُهُمَا، وَانْطَلَقْتُ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَيَتَلَقَّانِي النَّاسُ فَوْجًا فَوْجًا يُهَنُّونِي بِالتَّوْبَةِ، يَقُولُونَ: لِتَهْنِكَ تَوْبَةُ اللَّهِ عَلَيْكَ. قَالَ كَعْبٌ: حَتَّى دَخَلْتُ الْمَسْجِدَ، فَإِذَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم جَالِسٌ حَوْلَهُ النَّاسُ، فَقَامَ إِلَيَّ طَلْحَةُ بْنُ عُبَيْدِ اللَّهِ يُهَرْوِلُ حَتَّى صَافَحَنِي وَهَنَّانِي، وَاللَّهِ مَا قَامَ إِلَيَّ رَجُلٌ مِنَ الْمُهَاجِرِينَ غَيْرُهُ، وَلَا أَنْسَاهَا لِطَلْحَةَ، قَالَ كَعْبٌ: فَلَمَّا سَلَّمْتُ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَهْوَ يَبْرُقُ وَجْهُهُ مِنَ السُّرُورِ:"أَبْشِرْ بِخَيْرِ يَوْمٍ مَرَّ عَلَيْكَ مُنْذُ وَلَدَتْكَ أُمُّكَ" قَالَ: قُلْتُ: أَمِنْ عِنْدِكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ أَمْ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ؟ قَالَ:"لَا، بَلْ مِنْ عِنْدِ اللَّهِ". وَكَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا سُرَّ اسْتَنَارَ وَجْهُهُ حَتَّى كَأَنَّهُ قِطْعَةُ قَمَرٍ، وَكُنَّا نَعْرِفُ ذَلِكَ مِنْهُ، فَلَمَّا جَلَسْتُ بَيْنَ يَدَيْهِ قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنَّ مِنْ تَوْبَتِي أَنْ أَنْخَلِعَ مِنْ مَالِي صدَقَةً إِلَى اللَّهِ وَإلَى رَسُولِه. قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"أَمْسِكْ عَلَيْكَ بَعْضَ مَالِكَ فَهُوَ خَيْرٌ لَكَ" قُلْتُ: فَإِنِّي أُمْسِكُ سَهْمِي
الَّذِي بِخَيْبَرَ، فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنَّ اللَّهَ إِنَّمَا نَجَّانِي بِالصِّدْقِ، وَإنَّ مِنْ تَوْبَتِي أَنْ لَا أُحَدِّثَ إِلَّا صِدْقًا مَا بَقِيتُ، فَوَاللَّهِ مَا أَعْلَمُ أَحَدًا مِنَ الْمُسْلِمِينَ أَبْلَاهُ اللَّهُ فِي صِدْقِ الْحَدِيثِ مُنْذُ ذَكَرْتُ ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَحْسَنَ مِمَّا أَبْلَانِي، مَا تَعَمَّدْتُ مُنْذُ ذَكَرْتُ ذَلِكَ لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِلَى يَوْمِي هَذَا كَذِبًا، وَإِنِّي لأَرْجُو أَنْ يَحْفَظَنِي اللَّهُ فِيمَا بَقِيتُ وَأَنْزَلَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ صلى الله عليه وسلم {لَقَدْ تَابَ اللَّهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِرِينَ} إِلَى قَوْلِهِ {وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ} [سورة التوبة: 119] فَوَاللَّهِ مَا أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيَّ مِنْ نِعْمَةٍ قَطُّ بَعْدَ أَنْ هَدَانِي لِلإسْلَامِ أَعْظَمَ فِي نَفْسِي مِنْ صِدْقِي لِرَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَنْ لَا أَكُونَ كَذَبْتُهُ، فَأَهْلِكَ كَمَا هَلَكَ الَّذِينَ كَذَبُوا، فَإِنَّ اللَّهَ قَالَ لِلَّذِينَ كَذَبُوا حِينَ أَنْزَلَ الْوَحْيَ شَرَّ مَا قَالَ لأَحَدٍ، فَقَالَ تبارك وتعالى {سَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَكُمْ إِذَا انْقَلَبْتُمْ} إِلَى قَوْلِه. {فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَرْضَى عَنِ الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ} [التوبة: 95 - 96] قَالَ كَعْبٌ: وَكُنَّا تَخَلَّفْنَا أَيُّهَا الثَّلَاثَةُ عَنْ أَمْرِ أُولَئِكَ الَّذِينَ قَبِلَ مِنْهُمْ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ حَلَفُوا لَهُ، فَبَايَعَهُمْ وَاسْتَغْفَرَ لَهُمْ وَأَرْجَأَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَمْرَنَا حَتَّى قَضَى اللَّهُ فِيهِ، فَبِذَلِكَ قَالَ اللَّهُ: {وَعَلَى الثَّلَاثَةِ الَّذِينَ خُلِّفُوا} وَلَيْسَ الَّذِي ذَكَرَ اللَّهُ مِمَّا خُلِّفْنَا عَنِ الْغَزْوِ، إِنَّمَا هُوَ تَخْلِيفُهُ إِيَّانَا وَإرْجَاؤُهُ أَمْرَنَا عَمَّنْ حَلَفَ لَهُ وَاعْتَذَرَ إِلَيْهِ، فَقَبِلَ مِنْهُ.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4418) ومسلم في التوبة (53: 2769) كلاهما من طريق ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن كعب، أن عبد الله بن كعب قال: سمعت كعب بن مالك يقول: فذكره.




কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যতগুলো যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছেন, আমি তাবুক যুদ্ধ ছাড়া অন্য কোনো যুদ্ধ থেকে পিছিয়ে থাকিনি। তবে আমি বদর যুদ্ধেও অনুপস্থিত ছিলাম, কিন্তু যারা সেই যুদ্ধে অনুপস্থিত ছিল, তাদের কাউকে তিনি তিরস্কার করেননি। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মূলত কুরাইশদের বাণিজ্য কাফেলার খোঁজে বের হয়েছিলেন, কিন্তু আল্লাহ তাদের ও শত্রুদের মধ্যে কোনো পূর্ব-নির্ধারিত ঘোষণা ছাড়াই মুখোমুখি করিয়ে দেন।

আর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আকাবার রাতে উপস্থিত ছিলাম, যখন আমরা ইসলামের উপর শপথ গ্রহণ করেছিলাম। বদর যুদ্ধে উপস্থিত থাকার চেয়েও (যদিও বদর জনসাধারণের মাঝে বেশি প্রসিদ্ধ), আমি এই আকাবার রাতের উপস্থিতিকে বেশি পছন্দ করি।

আমার ঘটনাটি ছিল এই যে, আমি যখন তাবুক যুদ্ধ থেকে অনুপস্থিত থাকি, তখন আমি কখনোই এর চেয়ে বেশি শক্তিশালী বা সচ্ছল ছিলাম না। আল্লাহর কসম! আমার কাছে এর আগে কখনও একসাথে দু'টি বাহন ছিল না, কিন্তু সেই যুদ্ধের জন্য আমি দু'টি বাহন জোগাড় করেছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো যুদ্ধের উদ্দেশ্যে বের হতে চাইলে, তিনি তার গন্তব্য সম্পর্কে ভিন্ন কিছু বলতেন, যতক্ষণ না এই তাবুক যুদ্ধের সময় এলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই যুদ্ধটি কঠোর গরমের মধ্যে পরিচালনা করেন এবং এটি ছিল দীর্ঘ সফর, মরুভূমি এবং বহু শত্রুর সম্মুখীন হওয়ার অভিযান। তাই তিনি মুসলিমদের সামনে তাদের লক্ষ্য স্পষ্ট করে দেন, যাতে তারা যুদ্ধের পূর্ণ প্রস্তুতি নিতে পারে। তিনি তাদেরকে সেই পথের কথা জানালেন, যেদিকে তিনি যেতে চান। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মুসলিমদের সংখ্যা ছিল অনেক, আর তাদের একত্রিত করার জন্য কোনো রেজিস্টার ছিল না (অর্থাৎ তাদের সংখ্যায় এত বেশি ছিল যে তাদের হিসাব রাখা হতো না)।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যে ব্যক্তি অনুপস্থিত থাকতে চাইত, সে ভাবত যে তার অনুপস্থিতি গোপন থাকবে, যদি না আল্লাহ তার ব্যাপারে ওহী নাযিল করেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই যুদ্ধটি এমন সময় পরিচালনা করেন যখন ফল পেকেছিল এবং শীতল ছায়া ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথে মুসলিমগণ প্রস্তুতির কাজ গুছিয়ে নিচ্ছিলেন। আমিও তাদের সাথে প্রস্তুতি নেওয়ার উদ্দেশ্যে সকালে যেতাম, কিন্তু কিছু না গুছিয়েই ফিরে আসতাম। আমি নিজেকে বলতাম: আমি তো এটা পরে গুছিয়ে নিতে পারব। এভাবে আমি টালবাহানা করতে থাকলাম, যতক্ষণ না লোকদের প্রস্তুতি জোরদার হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথে মুসলিমরা সকালে যাত্রা শুরু করলেন, আর আমার প্রস্তুতির কিছুই গুছানো হলো না। আমি বললাম: আমি তাদের চলে যাওয়ার পর এক বা দুই দিনের মধ্যে প্রস্তুতি নেব এবং তাদের সাথে মিলিত হবো। তারা চলে যাওয়ার পর প্রস্তুতি নিতে গেলাম, কিন্তু কিছুই গুছাতে পারলাম না। এরপর আবার গেলাম, আবার ফিরে এলাম, কিছুই গুছানো হলো না। এভাবে আমার দেরি হতে থাকল এবং অভিযান অনেক দূর এগিয়ে গেল। আমি একসময় রওনা হয়ে তাদের ধরার সংকল্প করলাম। যদি আমি তা করতাম! কিন্তু তা আমার ভাগ্যে ছিল না।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলে যাওয়ার পর যখন আমি লোকজনের মাঝে বের হতাম এবং তাদের সাথে চলাফেরা করতাম, তখন আমার দুঃখ হতো এই দেখে যে, আমি কেবল এমন লোককেই দেখছি যাদের মুনাফিক হিসেবে অভিযুক্ত করা হয়েছে, অথবা এমন দুর্বলদের দেখছি যাদেরকে আল্লাহ অজুহাত দিয়েছেন।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুকে না পৌঁছানো পর্যন্ত আমাকে স্মরণ করেননি। তাবুকে তিনি লোকদের সাথে বসা অবস্থায় জিজ্ঞেস করলেন, "কা'ব কী করল?" বনী সালামা গোত্রের এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল, তার দুটি চাদর এবং নিজের সৌন্দর্যের দিকে দৃষ্টি তাকে আটকে রেখেছে। মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি খারাপ কথা বলেছ! আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল, আমরা তার সম্পর্কে শুধু ভালোই জানি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব রইলেন।

কা'ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আমার কাছে পৌঁছাল যে তিনি ফিরে আসার উদ্দেশ্যে রওনা হয়েছেন, তখন আমার দুশ্চিন্তা বেড়ে গেল। আমি মিথ্যা বলার কথা ভাবতে লাগলাম এবং মনে মনে বললাম: আগামীকাল আমি কোন অজুহাত দিয়ে তার ক্রোধ থেকে মুক্তি পাব? এই বিষয়ে আমি আমার পরিবারের অভিজ্ঞতাসম্পন্ন প্রত্যেকের সাহায্য চাইলাম। যখন বলা হলো যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করছেন, তখন আমার মন থেকে মিথ্যা ধারণা দূরীভূত হলো এবং আমি বুঝলাম যে মিথ্যার মাধ্যমে আমি কখনোই এই বিপদ থেকে বাঁচতে পারব না। তাই আমি সত্য বলার সিদ্ধান্ত নিলাম।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সকালে আগমন করলেন। তিনি যখন সফর থেকে আসতেন, তখন প্রথমে মসজিদে যেতেন এবং সেখানে দু'রাকাআত সালাত আদায় করতেন। এরপর মানুষের সাথে বসার জন্য তিনি অপেক্ষা করতেন। তিনি যখন এমনটি করলেন, তখন অনুপস্থিত থাকা লোকেরা এসে তাঁর কাছে ওজর পেশ করতে লাগল এবং তাঁর সামনে কসম করতে লাগল। তারা ছিল আশি জনের কিছু বেশি লোক। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের প্রকাশ্য বক্তব্য গ্রহণ করলেন, তাদের বায়আত নিলেন এবং তাদের জন্য ক্ষমা চাইলেন, আর তাদের ভেতরের অবস্থা আল্লাহর কাছে সোপর্দ করলেন।

আমি তাঁর কাছে গেলাম। যখন আমি তাঁকে সালাম দিলাম, তিনি রাগান্বিতের মতো হাসি দিলেন। এরপর বললেন: "সামনে এসো।" আমি হেঁটে তাঁর সামনে এসে বসলাম। তিনি আমাকে বললেন: "তুমি কেন পেছনে রইলে? তুমি কি তোমার বাহন ক্রয় করোনি?" আমি বললাম: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল। আল্লাহর কসম! আমি যদি দুনিয়ার অন্য কারো সামনে বসে থাকতাম, তবে আমি মনে করতাম কোনো অজুহাত দেখিয়ে তার ক্রোধ থেকে মুক্তি পাব। আমাকে বিতর্ক করার ক্ষমতাও দেওয়া হয়েছে। কিন্তু আল্লাহর কসম, আমি যদি আজ আপনার কাছে মিথ্যা কথা বলি, আর আপনি তাতে সন্তুষ্ট হন, তবে অচিরেই আল্লাহ আপনার মাধ্যমে আমার উপর অসন্তুষ্ট হবেন। আর যদি আমি আপনার কাছে সত্য কথা বলি, যদিও আপনি তাতে আমার উপর রাগ করেন, তবে আমি এতে আল্লাহর ক্ষমা পাওয়ার আশা রাখি। আল্লাহর কসম! আমার কোনো ওজর ছিল না। আল্লাহর কসম! যখন আমি আপনার কাছ থেকে অনুপস্থিত রইলাম, তখন আমি এর চেয়ে বেশি শক্তিশালী বা সচ্ছল ছিলাম না।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এ ব্যক্তি সত্য বলেছে। ওঠো, যতক্ষণ না আল্লাহ তোমার ব্যাপারে ফয়সালা দেন।" আমি উঠে দাঁড়ালাম। বনী সালামা গোত্রের কয়েকজন লোক ছুটে এলো এবং আমার পিছু নিল। তারা আমাকে বলল: আল্লাহর কসম! এর আগে তুমি কোনো গুনাহ করেছ বলে আমরা জানি না। তুমি কেন অনুপস্থিতদের মতো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ওজর পেশ করলে না? তোমার জন্য তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ইস্তেগফারই যথেষ্ট ছিল। আল্লাহর কসম! তারা আমাকে এত তিরস্কার করতে লাগল যে, আমি প্রায় ফিরে গিয়ে নিজেকে মিথ্যাবাদী ঘোষণা করতে চেয়েছিলাম। এরপর আমি তাদের বললাম: আমার সাথে কি অন্য কারো এমনটা হয়েছে? তারা বলল: হ্যাঁ, দু'জন লোক তোমার মতোই বলেছে এবং তাদেরকেও তোমার মতোই বলা হয়েছে। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: তারা কারা? তারা বলল: মুরারা ইবনু রাবী আল-আমরী এবং হিলাল ইবনু উমাইয়া আল-ওয়াকিফী। তারা আমার কাছে দুজন ভালো মানুষের নাম বলল, যারা বদর যুদ্ধেও উপস্থিত ছিলেন, যাদের মধ্যে আমার জন্য অনুসরণীয় দৃষ্টান্ত ছিল। যখন তারা তাদের নাম বলল, তখন আমি চলতে থাকলাম।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন অন্য অনুপস্থিতদের মধ্য থেকে কেবল আমাদের তিনজনের সাথে কথা বলতে মুসলিমদের নিষেধ করলেন। ফলে লোকজন আমাদের এড়িয়ে চলতে লাগল এবং আমাদের সাথে তাদের ব্যবহার বদলে গেল। এমনকি আমার কাছে পৃথিবীটাই অচেনা মনে হতে লাগল—যা আমি চিনতাম, তা আর নেই। আমরা এই অবস্থায় পঞ্চাশ রাত কাটালাম। আমার অন্য দুই সাথী তো হতাশ হয়ে বাড়িতে বসে কাঁদতে লাগলেন। কিন্তু আমি ছিলাম দলের মধ্যে অপেক্ষাকৃত যুবক ও শক্তিশালী। আমি বের হতাম এবং মুসলিমদের সাথে সালাতে উপস্থিত হতাম, বাজারে ঘুরতাম, কিন্তু কেউ আমার সাথে কথা বলত না। সালাতের পর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মজলিসে গিয়ে তাঁকে সালাম দিতাম, আর মনে মনে ভাবতাম: আমার সালামের উত্তরে কি তিনি ঠোঁট নাড়ালেন, নাকি না? এরপর আমি তাঁর কাছেই সালাত আদায় করতাম এবং আড়চোখে তাঁকে দেখতাম। আমি যখন সালাতে মনোযোগ দিতাম, তখন তিনি আমার দিকে তাকাতেন; আর যখন আমি তাঁর দিকে ফিরতাম, তখন তিনি আমার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিতেন। যখন মানুষের এই নির্জনতা আমার কাছে খুব দীর্ঘ মনে হলো, তখন আমি হেঁটে গেলাম এবং আমার চাচাতো ভাই ও আমার কাছে সর্বাধিক প্রিয় ব্যক্তি আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাগানের প্রাচীর টপকে ভেতরে গেলাম। আমি তাঁকে সালাম দিলাম। আল্লাহর কসম! তিনি আমার সালামের উত্তর দিলেন না। আমি বললাম: হে আবূ কাতাদা! আল্লাহর দোহাই দিয়ে তোমাকে জিজ্ঞাসা করছি, তুমি কি জানো না যে আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসি? তিনি চুপ রইলেন। আমি আবার তাকে আল্লাহর দোহাই দিয়ে জিজ্ঞাসা করলাম, তিনি চুপ রইলেন। আমি তৃতীয়বার তাকে আল্লাহর দোহাই দিয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। এতে আমার চোখ থেকে অশ্রু ঝরে পড়ল। আমি ফিরে আসলাম এবং দেয়াল টপকে বেরিয়ে গেলাম।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি মদীনার বাজারে হাঁটছিলাম, এমন সময় সিরিয়ার নাবাতী কৃষকদের মধ্যে একজন (যে খাদ্যশস্য বিক্রি করার জন্য মদীনায় এসেছিল) বলল: কা'ব ইবনে মালিককে কে দেখিয়ে দেবে? লোকেরা তার দিকে ইশারা করতে লাগল। সে আমার কাছে এলে গাসসানের রাজার পক্ষ থেকে একটি চিঠি দিল। তাতে লেখা ছিল: "এর পর, আমাকে জানানো হয়েছে যে তোমার সাথী (নবী) তোমার সাথে খারাপ ব্যবহার করেছেন। আল্লাহ তোমাকে লাঞ্ছনার বা নষ্ট হওয়ার দেশে রাখেননি। তুমি আমাদের সাথে যোগ দাও, আমরা তোমার প্রতি সহানুভূতি দেখাব।" চিঠিটি পড়ার পর আমি বললাম: এটাও একটি পরীক্ষা। আমি চিঠিটি নিয়ে চুলার দিকে গেলাম এবং তা দিয়ে চুলা ধরিয়ে দিলাম।

এভাবে যখন পঞ্চাশ রাতের মধ্যে চল্লিশ রাত পার হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন দূত আমার কাছে এসে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাকে নির্দেশ দিচ্ছেন যেন তুমি তোমার স্ত্রীর থেকে আলাদা থাকো। আমি বললাম: আমি কি তাকে তালাক দেব, নাকি কী করব? তিনি বললেন: না, বরং তার থেকে দূরে থাকো এবং তার কাছে যেয়ো না। তিনি আমার অন্য দুই সাথীর কাছেও একই বার্তা পাঠালেন। আমি আমার স্ত্রীকে বললাম: তুমি তোমার পরিবারের কাছে চলে যাও এবং আল্লাহর পক্ষ থেকে এই বিষয়ে কোনো ফয়সালা না হওয়া পর্যন্ত তাদের কাছেই থাকো।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: হিলাল ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! হিলাল ইবনু উমাইয়া একজন বৃদ্ধ, নিঃস্ব ব্যক্তি, তার কোনো খাদেম নেই। আমি কি তার সেবা করতে পারি, আপনি কি এটা অপছন্দ করেন? তিনি বললেন: "না, তবে সে যেন তোমার কাছে না আসে।" স্ত্রী বললেন: আল্লাহর কসম! তার কোনো কিছুর দিকে যাওয়ার শক্তিই নেই। আল্লাহর কসম, যেদিন থেকে তার এই ঘটনা ঘটেছে, সেদিন থেকে আজ পর্যন্ত তিনি কেবল কাঁদছেন। আমার পরিবারের কেউ কেউ আমাকে বলল: তুমিও তোমার স্ত্রীর ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাও না কেন, যেমন হিলাল ইবনু উমাইয়ার স্ত্রীকে তার সেবা করার অনুমতি দেওয়া হয়েছে? আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমি তার ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি চাইব না। আমি একজন যুবক, আর আমি জানি না যে আমি অনুমতি চাইলে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী বলবেন।

এরপর আমরা আরও দশ রাত কাটালাম। এভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আমাদের সাথে কথা বলা নিষেধ করার পর আমাদের জন্য পঞ্চাশ রাত পূর্ণ হলো। যখন পঞ্চাশ রাতের ফজরের সালাত আদায় করলাম, তখন আমি আমাদের একটি বাড়ির ছাদে বসা ছিলাম, ঠিক সেই অবস্থায় যা আল্লাহ বর্ণনা করেছেন—আমার মন আমার জন্য সংকুচিত হয়ে গিয়েছিল এবং প্রশস্ত পৃথিবীও আমার কাছে সংকীর্ণ হয়ে এসেছিল। এমন সময় আমি সাল'আ পর্বতের উপর থেকে সর্বোচ্চ স্বরে চিৎকার করে একজন ঘোষণাকারীর আওয়াজ শুনতে পেলাম: "হে কা'ব ইবনে মালিক, সুসংবাদ গ্রহণ করো!"

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সিজদায় পড়ে গেলাম এবং বুঝতে পারলাম যে মুক্তি এসেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত আদায়ের পর আমাদের উপর আল্লাহর তওবা কবুল হওয়ার কথা ঘোষণা করেছিলেন। লোকজন আমাদের সুসংবাদ দেওয়ার জন্য ছুটতে লাগল। আমার অন্য দুই সাথীর কাছেও সুসংবাদদাতারা গেল। আমার দিকে একজন ঘোড়ায় চড়ে দ্রুত এলো, আর আসলাম গোত্রের একজন দৌড়বিদ পাহাড়ের উপর উঠল। সেই দৌড়বিদের আওয়াজ ঘোড়ার চেয়েও দ্রুত আমার কাছে পৌঁছাল। যখন সুসংবাদদাতা, যার আওয়াজ আমি শুনেছিলাম, আমার কাছে পৌঁছাল, আমি তাকে সুসংবাদের বিনিময়ে আমার গায়ের দুটি পোশাক খুলে দিলাম। আল্লাহর কসম! সেদিন আমার কাছে ঐ দুটি ছাড়া আর কিছুই ছিল না। আমি দুটো কাপড় ধার করে পরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে চললাম। দলে দলে লোকজন আমাকে অভিনন্দন জানাতে লাগল এবং বলতে লাগল: আপনার উপর আল্লাহর তওবা কবুল হওয়ায় আপনাকে অভিনন্দন।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম। দেখলাম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে আছেন এবং মানুষজন তাঁকে ঘিরে আছে। তখন তালহা ইবনু উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত ছুটে এসে আমার সাথে মুসাফাহা করলেন এবং আমাকে অভিনন্দন জানালেন। আল্লাহর কসম! মুহাজিরদের মধ্যে তিনি ছাড়া আর কেউ আমার জন্য ওঠেননি। আমি তালহার এই কাজ ভুলব না।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সালাম দিলাম, তখন তিনি আনন্দের সাথে হাস্যোজ্জ্বল মুখে বললেন: "তোমার মা তোমাকে জন্ম দেওয়ার পর থেকে আজ পর্যন্ত তোমার জীবনে অতিবাহিত হওয়া শ্রেষ্ঠতম দিনের সুসংবাদ গ্রহণ করো।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, এটি কি আপনার পক্ষ থেকে, নাকি আল্লাহর পক্ষ থেকে? তিনি বললেন: "না, বরং এটি আল্লাহর পক্ষ থেকে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আনন্দিত হতেন, তখন তাঁর মুখমণ্ডল উজ্জ্বল হয়ে উঠত, যেন তা চাঁদের একটি টুকরা। আমরা তাঁর এই আনন্দ বুঝতে পারতাম।

যখন আমি তাঁর সামনে বসলাম, বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আমার তওবার অংশ হিসেবে আমি আমার সমস্ত সম্পদ আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলের উদ্দেশ্যে সাদাকা করে দিতে চাই। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার কিছু সম্পদ নিজের জন্য রেখে দাও, এটাই তোমার জন্য উত্তম।" আমি বললাম: তাহলে আমি খায়বারের আমার অংশটি রেখে দিলাম। এরপর আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল, আল্লাহ আমাকে কেবল সত্যের মাধ্যমেই মুক্তি দিয়েছেন। আমার তওবার অংশ হলো, যতদিন আমি জীবিত থাকব, ততদিন শুধু সত্য কথাই বলব। আল্লাহর কসম! যখন থেকে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এই অঙ্গীকার করেছি, তখন থেকে আমি জানি না যে আল্লাহ আমাকে সত্য কথা বলার ক্ষেত্রে অন্য কোনো মুসলিমের চেয়ে খারাপ পরীক্ষা করেছেন। যেদিন থেকে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এই কথা বলেছি, সেদিন থেকে আজ পর্যন্ত আমি স্বেচ্ছায় মিথ্যা বলিনি। আর আমি আশা করি, বাকি জীবনে আল্লাহ আমাকে রক্ষা করবেন।

আর আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর নাযিল করলেন: "অবশ্যই আল্লাহ ক্ষমা করেছেন নবীকে, মুহাজিরগণকে এবং আনসারগণকে..." [সূরা আত-তওবা: ১১৭] থেকে আল্লাহর বাণী: "...এবং সত্যবাদীদের সাথে থাকো।" [সূরা আত-তওবা: ১১৯] পর্যন্ত।

আল্লাহর কসম! ইসলাম গ্রহণের পর আল্লাহ আমার উপর যে নেয়ামত করেছেন, তার মধ্যে আমার কাছে এর চেয়ে বড় নেয়ামত আর কিছু নেই যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে সত্য কথা বলেছিলাম এবং মিথ্যা বলিনি, ফলে মিথ্যাবাদীদের মতো আমি ধ্বংস হইনি। কারণ মিথ্যাবাদীরা যখন মিথ্যা বলল, তখন আল্লাহ ওহী নাযিল করে তাদের সম্পর্কে সবচেয়ে খারাপ কথা বলেছিলেন। আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "যখন তোমরা তাদের কাছে ফিরে আসবে, তখন তারা তোমাদের কাছে আল্লাহর নামে কসম করবে..." [সূরা আত-তওবা: ৯৫] থেকে তাঁর বাণী: "...কেননা আল্লাহ ফাসিক সম্প্রদায়কে পছন্দ করেন না।" [সূরা আত-তওবা: ৯৬] পর্যন্ত।

কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা তিনজন ঐসব লোকের বিষয় থেকে পিছিয়ে ছিলাম, যাদের শপথ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গ্রহণ করেছিলেন, তাদের বায়আত নিয়েছিলেন এবং তাদের জন্য ক্ষমা চেয়েছিলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের বিষয়টি মুলতবি রেখেছিলেন, যতক্ষণ না আল্লাহ সে বিষয়ে ফয়সালা দেন। এজন্যই আল্লাহ বলেছেন: "আর ঐ তিনজনের উপরও (আল্লাহ দয়াপরবশ হয়েছেন) যাদেরকে পেছনে রাখা হয়েছিল।" [সূরা আত-তওবা: ১১৮] আল্লাহ এখানে যাদের পিছিয়ে থাকার কথা বলেছেন, তা যুদ্ধ থেকে পিছিয়ে থাকা নয়; বরং যাদের শপথ গ্রহণ করা হয়েছে ও যাদের ওজর কবুল করা হয়েছে, তাদের তুলনায় আমাদের বিষয়টি মুলতবি রাখা হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (12283)


12283 - عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الصدق يهدي إلى البر، وإن البر يهدي إلى الجنة، وإن الرجل ليصدق حتى يكون صديقا، وإن الكذب يهدي إلى الفجور، وإن الفجور يهدي إلى النار، وإن الرجل ليكذب، حتى يكتب عند الله كذابا".

متفق عليه: رواه البخاري في الأدب (6094)، ومسلم في البر والصلة (2607) كلاهما عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن عبد الله، فذكره. واللفظ للبخاري ولفظ مسلم نحوه.

وقوله: {مَعَ الصَّادِقِينَ} أولهم النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه الذين خرجوا إلى غزوة تبوك، ثم هو عام لجميع الصادقين الذين قبلوا الحق واستقاموا عليه، وأما الكاذب فلا يصلح للمصاحبة.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই সত্যবাদিতা পুণ্যের দিকে পরিচালিত করে, আর নিশ্চয়ই পুণ্য জান্নাতের দিকে পরিচালিত করে। আর মানুষ সর্বদা সত্য বলতে থাকে, একপর্যায়ে সে সিদ্দীক (মহাসত্যবাদী) হয়ে যায়। আর নিশ্চয়ই মিথ্যা অশ্লীলতার (পাপকাজের) দিকে পরিচালিত করে, আর নিশ্চয়ই অশ্লীলতা (পাপকাজ) জাহান্নামের দিকে পরিচালিত করে। আর মানুষ সর্বদা মিথ্যা বলতে থাকে, একপর্যায়ে আল্লাহর কাছে তাকে মিথ্যাবাদী হিসাবে লেখা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (12284)


12284 - عن جابر قال: سرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة بطن بواط، وهو يطلب المجدي بن عمرو الجهني، وكان الناضح يعتقبه منا الخمسة والستة، والسبعة، فدارت عقبة رجل من الأنصار على ناضح له، فأناخه، فركبه، ثم بعثه، فتلدّن عليه بعض التلدن، فقال له: شأ، لعنك الله. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من هذا اللاعن بعيره؟" قال: أنا يا رسول الله. قال:"انزل عنه، فلا تصحبنا بملعون، لا تدعوا على أنفسكم، ولا تدعوا على أولادكم، ولا تدعوا على أموالكم، لا توافقوا من الله ساعة يسأل فيها عطاء، فيستجيب لكم".

صحيح: رواه مسلم في الزهد (3009) من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن يعقوب بن مجاهد أبي حزرة، عن عبادة بن الوليد بن عبادة بن الصامت قال: خرجت أنا وأبي نطلب العلم في هذا الحي من الأنصار قبل أن يهلكوا، فكان أول من لقينا أبا اليسر صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث. ثم قال:"ثم مضينا حتى أتينا جابر بن عبد الله في مسجده … فذكر الحديث.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বাতন বুওয়াত নামক যুদ্ধে গেলাম। তিনি আল-মাজদী ইবনু আমর আল-জুহানীকে খুঁজছিলেন। তখন আমাদের পাঁচ, ছয় বা সাত জন মিলে পালাক্রমে একটি সেচকার্যে ব্যবহৃত উট ব্যবহার করতাম। এমন সময় একজন আনসারী ব্যক্তির পালা তার সেচকার্যে ব্যবহৃত উটের ওপর এলো। সে উটটিকে বসাল, তারপর তার ওপর আরোহণ করল এবং তাকে চালনা করল। কিন্তু উটটি কিছুটা আলস্য দেখাল। তখন সে তাকে বলল: ‘শা’ (যা এক ধরনের শব্দ করে উটকে তাড়া দেওয়া হয়), আল্লাহ্ তোকে লা’নত (অভিসম্পাত) করুন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এই লোকটি কে, যে তার উটকে অভিসম্পাত করছে?” লোকটি বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি তার উপর থেকে নেমে পড়ো। অভিশাপগ্রস্ত কোনো কিছু যেন আমাদের সঙ্গী না হয়। তোমরা নিজেদের উপর বদদোয়া (অভিশাপ) করো না, তোমাদের সন্তানদের উপর বদদোয়া করো না এবং তোমাদের সম্পদের উপরও বদদোয়া করো না। কারণ, তোমরা আল্লাহর কাছ থেকে এমন কোনো সময় পেতে পারো যখন বান্দা যা কিছু প্রার্থনা করে, আল্লাহ্ তা কবুল করে নেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (12285)


12285 - عن صهيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عجبا لأمر المؤمن، إن أمره كله خير، وليس ذاك لأحد إلا للمؤمن، إن أصابته سراء شكر، فكان خيرا له، وإن أصابته ضراء
صبر فكان خيرا له".

صحيح: رواه مسلم في الزهد (2999) من طرق عن سليمان بن المغيرة، حدثنا ثابت، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن صهيب فذكره.




সুহাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনের বিষয়টি কতই না আশ্চর্যজনক! তার সকল কাজই উত্তম (কল্যাণকর)। আর এটা মুমিন ব্যতীত অন্য কারো জন্য নয়। যদি তার সুখ-স্বাচ্ছন্দ্য লাভ হয়, সে শুকরিয়া আদায় করে, ফলে তা তার জন্য কল্যাণকর হয়। আর যদি তার কোনো কষ্ট বা ক্ষতি হয়, সে ধৈর্য ধারণ করে, ফলে তা তার জন্য কল্যাণকর হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (12286)


12286 - عن أبي الدرداء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من يوم طلعت شمسه، إلا وكّل بجنبتيها ملكان، يناديان نداء يسمعه خلق الله كلهم غير الثقلين: يا أيها الناس، هلموا إلى ربكم، إن ما قل وكفى خير مما كثر وألهى. ولا آبت الشمس إلا وكّل بجنبتيها ملكان يناديان نداء يسمعه خلق الله كلهم غير الثقلين: اللهم أعط منفقا خلفا، وأعط
ممسكا تلفا"، وأنزل الله تعالى في ذلك قرآنا في قول الملكين: يا أيها الناس، هلموا إلى ربكم في سورة يونس: {وَاللَّهُ يَدْعُو إِلَى دَارِ السَّلَامِ وَيَهْدِي مَنْ يَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ}، وأنزل في قولهما: اللهم أعط منفقا خلفا، وأعط ممسكا تلفا: {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى (1) وَالنَّهَارِ إِذَا تَجَلَّى (2) وَمَا خَلَقَ الذَّكَرَ وَالْأُنْثَى (3)} [سورة الليل: 1 - 10].

حسن: رواه أحمد (21721)، وابن حبان (686، 3329)، والحاكم (2/ 444 - 445) كلهم من طريق قتادة، قال: حدثنا خليد بن عبد الله العصري مولى أبي الدرداء، عن أبي الدرداء، فذكره.

وإسناده حسن من أجل خليد بن عبد الله العصري، فإنه حسن الحديث.




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এমন কোনো দিন নেই যেদিন সূর্য উদিত হয়, কিন্তু তার দুই পাশে দুজন ফেরেশতা নিযুক্ত থাকেন, যারা এমনভাবে আহ্বান করেন যা জ্বিন ও মানুষ ব্যতীত আল্লাহ্‌র সমস্ত সৃষ্টি শুনতে পায়: 'হে মানবমণ্ডলী! তোমরা তোমাদের প্রতিপালকের দিকে ফিরে আসো (তাঁর আদেশের সাড়াদান করো)। যা কম এবং যথেষ্ট, তা সেই জিনিস অপেক্ষা উত্তম যা বেশি এবং (আল্লাহর স্মরণ থেকে) গাফেল করে দেয়।' সূর্য যখন অস্ত যায়, তখনও তার দুই পাশে দুজন ফেরেশতা নিযুক্ত থাকেন, যারা এমনভাবে আহ্বান করেন যা জ্বিন ও মানুষ ব্যতীত আল্লাহ্‌র সমস্ত সৃষ্টি শুনতে পায়: 'হে আল্লাহ! ব্যয়কারীকে বিনিময় (বা প্রতিস্থাপন) দান করুন, আর কৃপণকে বিনাশ (ক্ষতি) দান করুন'।" আর আল্লাহ তা‘আলা ফেরেশতাদ্বয়ের 'হে মানবমণ্ডলী! তোমরা তোমাদের প্রতিপালকের দিকে ফিরে আসো'—এই বাণীর সমর্থনে সূরা ইউনুসে এই আয়াত নাযিল করেছেন: {وَاللَّهُ يَدْعُو إِلَى دَارِ السَّلَامِ وَيَهْدِي مَنْ يَشَاءُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ} (অর্থ: আল্লাহ শান্তির আবাসের দিকে আহবান করেন এবং যাকে ইচ্ছা সরল পথের দিকে পরিচালিত করেন)। আর ফেরেশতাদ্বয়ের 'হে আল্লাহ! ব্যয়কারীকে বিনিময় দান করুন, আর কৃপণকে বিনাশ দান করুন'—এই বাণীর সমর্থনে আল্লাহ নাযিল করেছেন: {وَاللَّيْلِ إِذَا يَغْشَى (1) وَالنَّهَارِ إِذَا تَجَلَّى (2) وَمَا خَلَقَ الذَّكَرَ وَالْأُنْثَى (3)} [সূরা লাইল: ১-৩]।









আল-জামি` আল-কামিল (12287)


12287 - عن جابر بن عبد الله يقول: جاءت ملائكة إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وهو نائم، فقال بعضهم: إنه نائم. وقال بعضهم: إن العين نائمة، والقلب يقظان. فقالوا: إن لصاحبكم هذا مثلا، فاضربوا له مثلا. فقال بعضهم: إنه نائم. وقال بعضهم: إن العين نائمة والقلب يقظان. فقالوا: مثله كمثل رجل بنى دارا، وجعل فيها مأدبة وبعث داعيا، فمن أجاب الداعي دخل الدار، وأكل من المأدبة، ومن لم يجب الداعي لم يدخل الدار، ولم يأكل من المأدبة. فقالوا: أولوها له يفقهها، فقال بعضهم: إنه نائم. وقال بعضهم: إن العين نائمة والقلب يقظان. فقالوا: فالدار الجنة، والداعي محمد صلى الله عليه وسلم، فمن أطاع محمدا صلى الله عليه وسلم فقد أطاع الله، ومن عصى محمدا صلى الله عليه وسلم فقد عصى الله، ومحمد صلى الله عليه وسلم فرق بين الناس.

صحيح: رواه البخاري في الاعتصام (7281) عن محمد بن عبادة، أخبرنا يزيد، حدثنا سليمان بن حيان، حدثنا سعيد بن ميناء، سمعت جابرا يقول: فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ঘুমাচ্ছিলেন, তখন তাঁর কাছে ফেরেশতারা আগমন করলেন। তাদের কেউ কেউ বলল: তিনি তো ঘুমন্ত। আবার কেউ কেউ বলল: চোখ ঘুমন্ত হলেও অন্তর জাগ্রত। তারা বলল: তোমাদের এই সাথীর জন্য একটি উপমা রয়েছে, তোমরা তাঁর জন্য সেই উপমাটি দাও। তাদের কেউ কেউ বলল: তিনি তো ঘুমন্ত। আবার কেউ কেউ বলল: চোখ ঘুমন্ত হলেও অন্তর জাগ্রত। তারা বলল: তাঁর উপমা হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি ঘর নির্মাণ করল এবং তাতে খাবারের আয়োজন করল, আর একজন আহ্বানকারী পাঠাল। যে ব্যক্তি আহ্বানকারীর ডাকে সাড়া দেবে, সে ঘরে প্রবেশ করবে এবং সেই খাবার থেকে খাবে। আর যে ব্যক্তি আহ্বানকারীর ডাকে সাড়া দেবে না, সে ঘরে প্রবেশ করবে না এবং সেই খাবার থেকেও খাবে না। তারা বলল: এর ব্যাখ্যা দাও, যাতে তিনি এটি বুঝতে পারেন। তাদের কেউ কেউ বলল: তিনি তো ঘুমন্ত। আবার কেউ কেউ বলল: চোখ ঘুমন্ত হলেও অন্তর জাগ্রত। তারা বলল: তাহলে ঘরটি হলো জান্নাত, আর আহ্বানকারী হলেন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। সুতরাং, যে ব্যক্তি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আনুগত্য করল, সে আল্লাহরই আনুগত্য করল। আর যে ব্যক্তি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অবাধ্য হলো, সে আল্লাহরই অবাধ্য হলো। আর মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হলেন মানুষের মাঝে (সত্য ও মিথ্যার) পার্থক্যকারী।