হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1228)


1228 - عن عروة بن الزّبير، قال: قالت عائشة: يا ابن أختي! بلغني أنّ عبد اللَّه بن عمرو مارٌّ بنا إلى الحجّ فالقَه فسائلْه فإنّه قد حمل عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم علمًا كثيرًا، قال: فلقيته فسألتُه عن أشياء يذكرها عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.

قال عروة: فكان فيما ذكر أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه لا ينتزع العلم من النّاس انتزاعًا، ولكن يقبض العلماء فيرفع العلم معهم، ويُبْقي في النّاس رؤوسًا جهالًا
يفتونهم بغير علم، فيَضلّون، ويُضلّون".

قال عروة: فلّما حدّثتُ عائشةَ بذلك، أعظمتْ ذلك، وأنكرته، قالت: أحدَّثَكَ أنه سمع النّبيّ صلى الله عليه وسلم يقول هذا؟ .

قال عروة: حتّى إذا كان قابلٌ، قالت له: إنّ ابن عمرو قد قدم فَالْقَه، ثم فاتحه حتّى تسأله عن الحديث الذي ذكره لك في العلم. قال: فلقيتهُ فسألُه، فذكره لي نحو ما حدّثني به في مرّته الأولى.

قال عروة: فلمّا أخبرتُها بذلك، قالت: ما أحسَبه إلّا قد صدق، أَراه لم يَزِدْ فيه شيئًا ولم يَنْقُصْ".

متفق عليه: رواه مسلم في العلم (2673) عن حرملة بن يحيى التّجيبيّ، أخبرنا عبد اللَّه بن وهب، حدّثني أبو شريح، أنّ أبا الأسود حدّثه عن عروة بن الزبير، قال (فذكره).

ورواه البخاريّ في الاعتصام بالكتاب والسنة (7307) عن سعيد بن تليد، حدّثني ابن وهب، حدّثني عبد الرحمن بن شريح وغيره بإسناده مختصرًا، وفيه: واللَّه لقد حفظ عبد اللَّه بن عمرو.

وقد رُوي هذا الحديث عن عائشة، فرواه البزّار (233 - كشف الأستار) عن أحمد بن منصور، ثنا عبد اللَّه بن صالح، ثنا اللّيث، عن يونس، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة، قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ اللَّه تبارك وتعالى لا ينزع العلم من النّاس انتزاعًا بعد أن يؤتيهم إيّاه، ولكن يذهب بالعلماء: وكلّما ذهب عالم ذهب بما معه من العلم حتّى يبقى من لا يعلم فيضلّوا ويُضلوا".

قال عقبه البزّار:"تفرّد به يونس، ورواه معمر، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عبد اللَّه بن عمرو".

قلت: هذه إشارة من البزّار رحمه الله إلى علّة هذا الحديث؛ فإنّ المعروف والمشهور أنّ عروة يروي هذا الحديث عن عبد اللَّه بن عمرو، وأنّه هو الذي حدّث به عائشة عن ابن عمرو، فأعظمتْ ذلك وأنكرته -كما سبق- فلو كان هذا الحديث عندها لما أنكرته، واللَّه أعلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি উরওয়াহ ইবনুয-যুবায়রকে লক্ষ্য করে বললেন, “হে আমার ভাগ্নে! আমি জানতে পেরেছি যে, আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হজ্জের উদ্দেশ্যে আমাদের এলাকা দিয়ে অতিক্রম করছেন। তুমি তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করো এবং তাঁকে প্রশ্ন করো। কারণ তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বহু জ্ঞান অর্জন করেছেন।”

উরওয়াহ বলেন, আমি তাঁর (আব্দুল্লাহ ইবনু আমর) সঙ্গে সাক্ষাৎ করলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত বহু বিষয়ে তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম।

উরওয়াহ বলেন, তিনি যে বিষয়গুলো বর্ণনা করেছিলেন, তার মধ্যে ছিল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তি: “নিশ্চয় আল্লাহ্‌ মানুষের কাছ থেকে জ্ঞানকে জোরপূর্বক তুলে নেন না; বরং তিনি আলেমদের (মৃত্যুর মাধ্যমে) উঠিয়ে নেওয়ার মাধ্যমে জ্ঞানকে তুলে নেন। ফলে তাঁদের সাথে জ্ঞানও উঠে যায়। আর মানুষের মধ্যে কিছু মূর্খ নেতাকে রেখে যান, যারা জ্ঞান ছাড়াই ফাতওয়া দেয়। ফলে তারা নিজেরা পথভ্রষ্ট হয় এবং অন্যকেও পথভ্রষ্ট করে।”

উরওয়াহ বলেন, এরপর যখন আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এই হাদীস বর্ণনা করলাম, তখন তিনি এটিকে খুব গুরুতর মনে করলেন এবং এর সত্যতা নিয়ে সন্দেহ প্রকাশ করলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “সে কি তোমাকে বলেছে যে, সে স্বয়ং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ কথা বলতে শুনেছে?”

উরওয়াহ বলেন, পরের বছর যখন এলো, তিনি আমাকে বললেন: “ইবনু আমর আবার এসেছেন, তুমি তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করো। এরপর এমনভাবে আলাপ শুরু করে দাও, যেন তুমি তাঁকে জ্ঞানের সেই হাদীসটি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতে পারো, যা তিনি তোমাকে বলেছিলেন।” উরওয়াহ বলেন, আমি তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করলাম এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি প্রথমবার যেমন বলেছিলেন, এবারও সেভাবেই আমাকে বর্ণনা করলেন।

উরওয়াহ বলেন, যখন আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ বিষয়টি জানালাম, তখন তিনি বললেন: “আমি মনে করি না যে, তিনি ভুল বলেছেন; তিনি সত্যই বলেছেন। আমার মনে হয়, তিনি এতে কিছু যোগও করেননি এবং কিছু বাদও দেননি।”









আল-জামি` আল-কামিল (1229)


1229 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يتقارب الزّمان ويقبض العلم، وتظهر الفتن، ويُلقى الشُّح، ويكثر الهرج". قالوا: وما الهرْج؟ قال:"القتل".

متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (85)، ومسلم أيضًا في العلم (157) كلاهما من طريق الزّهريّ، حدّثني حميد بن عبد الرحمن بن عوف، أنّ أبا هريرة قال (فذكره). واللّفظ لمسلم.

وفي لفظ البخاريّ: قيل: يا رسول اللَّه! وما الهَرْج؟ فقال هكذا بيده فحرَّفها، كأنّه يريد القتل.

ولذا بوَّب عليه البخاريّ: باب مَنْ أجاب الفتيا بإشارة الرّأس واليد.

وقد ورد تفسير"قبض العلم" على لسان عمر بن الخطّاب عند البزّار، فقد روى البزّار هذا الحديث (236 - كشف الأستار) من وجه آخر عن أبي هريرة، فذكر نحوه، وفي آخره: قال عمر
لما سمع أبا هريرة يأثره عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: قال:"أما إن قبض العلم ليس شيءُ ينزع من صدور الرّجال، ولكنَّه فناء العلماء".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সময় সংকুচিত হয়ে যাবে, ইলম (জ্ঞান) উঠিয়ে নেওয়া হবে, ফিতনা (বিপর্যয়) প্রকাশ পাবে, কার্পণ্য (বা: লোভ) ছড়িয়ে দেওয়া হবে এবং 'হার্জ' বেড়ে যাবে। সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন, 'হার্জ' কী? তিনি বললেন: হত্যা।

উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এই হাদীস বর্ণনা করতে শুনলেন, তখন তিনি বলেছিলেন: জেনে রাখো, ইলম উঠিয়ে নেওয়া মানে এই নয় যে তা মানুষের বুক থেকে ছিনিয়ে নেওয়া হবে; বরং (ইলম উঠিয়ে নেওয়ার অর্থ) হলো আলিমদের মৃত্যু।









আল-জামি` আল-কামিল (1230)


1230 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"تظهر الفتن، ويكثر الهرج، ويُرفع العلم". فلمّا سمع عمر أبا هريرة يقول:"يُرفع العلم". قال عمر: أما إنّه ليس يُنزع من صدور العلماء، ولكن يذهب العلماء.

صحيح: رواه الإمام أحمد (10231) عن وكيع، عن جعفر بن برقان، عن يزيد بن الأصمّ، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.

قال الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (1/ 202) بعد أن عزاه إلى البزّار أيضًا:"ورجاله رجال الصّحيح".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ফিতনা প্রকাশ পাবে, হারজ (রক্তপাত) বৃদ্ধি পাবে এবং ইলম (জ্ঞান) উঠিয়ে নেওয়া হবে।"

যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনলেন: "ইলম উঠিয়ে নেওয়া হবে।" তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সাবধান! নিশ্চয়ই তা (ইলম) আলিমদের বক্ষ থেকে ছিনিয়ে নেওয়া হবে না, বরং আলিমগণ (মৃত্যুর মাধ্যমে) চলে যাবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1231)


1231 - عن وعن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"سيأتي على أمّتي زمان يكثر القرّاء، ويقلُّ الفقهاء، ويقبض العلم، ويكثر الهرج". قالوا: وما الهرجُ؟ قال:"القتل بينكم، ثم يأتي بعد ذلك زمان يقرأ القرآن رجال لا يجاوز تراقيهم، ثم يأتي زمان يجادل المنافق المشركُ المؤمن".

حسن: رواه الطبرانيّ في الأوسط (مجمع البحرين - 273) عن بكر بن سهل، ثنا عبد اللَّه بن يوسف، ثنا ابن لهيعة، ثنا دراج، عن عبد الرحمن بن حُجيرة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

قال الطبرانيّ:"لم يرو عن ابن حجيرة إلّا درّاج، تفرّد به ابنُ لهيعة".

قلت: لم ينفرد به ابن لهيعة، فقد تابعه عمرو بن الحارث، أنّ درّاجًا أبا السّمح حدّثه، بإسناده مثله.

رواه الحاكم (4/ 457)، وابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (1043) كلاهما من طريق ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، بإسناده.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

قلت: إسناده حسن من أجل درّاج وهو ابن سمعان القرشيّ السّهميّ مولاهم المصريّ، مختلف فيه، فقال أحمد: حديثه منكر، وقال النسائي: ليس بالقوي، وقال في موضع آخر: منكر الحديث، وقال الدّارقطني: ضعيف، وقال في موضع آخر: متروك.

ولكن وثّقه ابن معين، وقال أبو داود: أحاديثه مستقيمة إلّا ما كان عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد. وأخرج ابن عدي في"الكامل" جملة من أحاديثه ولم يذكر فيها حديث الباب وقال: وأرجو أن أحاديثه بعد هذه التي أُنكرتْ عليه لا بأس بها، وذكره ابنُ حبان في الثقات.

وفي التقريب:"صدوق، في حديثه عن أبي الهيثم ضعف". وهنا يروي عن عبد الرحمن بن حجيرة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের উপর এমন এক সময় আসবে যখন ক্বারী (কুরআন তিলাওয়াতকারী) বৃদ্ধি পাবে, কিন্তু ফকীহ (ইসলামী আইনজ্ঞ) কমে যাবে, জ্ঞান (ইলম) উঠিয়ে নেওয়া হবে, এবং 'হারজ' বৃদ্ধি পাবে।" তারা জিজ্ঞেস করল: 'হারজ' কী? তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যেকার খুনোখুনি।" এরপর এমন সময় আসবে যখন কিছু লোক কুরআন পাঠ করবে যা তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। এরপর এমন সময় আসবে যখন মুনাফিক ও মুশরিকরা মু'মিনদের সাথে তর্ক-বিতর্ক করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (1232)


1232 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه لا ينزع العلم منكم بعدما أعطاكموه انتزاعًا، ولكن يقبض العلماء بعلمهم، ويبقى جهال، فيسألون فيفتون،
فيّضِلُّون ويُضلُّون".

حسن: رواه الطبرانيّ في الأوسط (مجمع البحرين - 334) عن مطلب، ثنا عبد اللَّه، حدّثني الليث، عن عمر بن السّائب، عن أسامة بن زيد، عن يعقوب بن الأشجّ، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

ومطلب هو ابن شعيب، ثقة من شيوخ الطّبرانيّ.

وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن صالح كاتب اللّيث فمختلف فيه، والخلاصة كما في التقريب:"صدوق كثير الغلط، ثبت في الكتابة". وشيخه وشيخ شيخه كلّهم صدوق.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদেরকে জ্ঞান দেওয়ার পর তা জোরপূর্বক ছিনিয়ে নেন না, বরং তিনি জ্ঞানীদেরকে তাদের জ্ঞানসহ উঠিয়ে নেওয়ার মাধ্যমে জ্ঞান তুলে নেন। ফলে মূর্খরা বাকি থাকবে, তাদের কাছে জিজ্ঞেস করা হবে এবং তারা ফাতওয়া দেবে, ফলে তারা নিজেরাও পথভ্রষ্ট হবে এবং অন্যদেরকেও পথভ্রষ্ট করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1233)


1233 - عن عوف بن مالك الأشجعيّ، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نظر إلى السماء يومًا، فقال:"هذا أوانُ يُرفعُ العلم". فقال رجلٌ من الأنصار يقال له: لبيد بن زياد: يا رسول اللَّه! يُرفعُ العلم، وقد أُثبِتَ ووعتْه القلوب؟ ! فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن كنتُ لأحسبُك من أفقه أهل المدينة". وذكر له ضلالة اليهود والنّصارى على ما في أيديهم من كتاب اللَّه. قال: فلقيتُ شدّاد بن أوْس، فحدّثتهُ بحديث عوف بن مالك، فقال: صدق عوفٌ، ألا أخبرُك بأوّل ذلك يرفع؟ قلت: بلى. قال: الخشوع، حتّى لا ترى خاشعًا.

صحيح: رواه النسائيّ في السنن الكبرى (5878) عن الربيع بن سليمان، ثنا عبد اللَّه بن وهب، قال: سمعت اللّيث بن سعد، يقول: حدّثني إبراهيم بن أبي عبلة، عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشيّ، عن جبير بن نفير، قال: حدّثني عوفُ بن مالك الأشجعي، فذكره. وإسناده صحيح.

وقد صحّحه ابن حبان (4572)، والحاكم (1/ 98 - 99) فروياه من طريق اللّيث بن سعد، بإسناده.

قال الحاكم بعد أن صحّح الحديث:"سمع جبير بن نفير الحديث منهما جميعًا (أي من عوف ابن مالك، وشدّاد بن أوس) ومن ثالث من الصّحابة وهو أبو الدّرداء".




আওফ ইবনে মালেক আল-আশজা'ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আকাশের দিকে তাকালেন এবং বললেন: "এই সেই সময়, যখন জ্ঞান তুলে নেওয়া হবে (উঠে যাবে)।" তখন আনসারদের মধ্য থেকে লাবীদ ইবনে যিয়াদ নামক এক ব্যক্তি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! জ্ঞান কি তুলে নেওয়া হবে, অথচ তা প্রতিষ্ঠিত হয়েছে এবং হৃদয় তা সংরক্ষণ করেছে?! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "আমি তো মনে করতাম, তুমি মদিনাবাসীদের মধ্যে সবচেয়ে জ্ঞানী (ফিকাহবিদ)দের একজন।" এবং তিনি তার কাছে ইয়াহুদী ও খ্রিস্টানদের পথভ্রষ্টতার কথা উল্লেখ করলেন—যা আল্লাহর কিতাব তাদের হাতে থাকা সত্ত্বেও ঘটেছে। (রাবী) বলেন: এরপর আমি শাদ্দাদ ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম এবং তাকে আওফ ইবনে মালেকের এই হাদীসটি শোনালাম। তিনি বললেন: আওফ সত্যই বলেছে। আমি কি তোমাকে বলে দেবো, সর্বপ্রথম কী জিনিস তুলে নেওয়া হবে? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: খুশু (বিনয়/একাগ্রতা), এমনকি তুমি একজন বিনয়ী ব্যক্তিও দেখতে পাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (1234)


1234 - عن أبي الدرداء قال: كنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فشخص ببصره إلى السّماء ثم قال:"هذا أوانُ يُختلسُ العلمُ من النّاس حتّى لا يقدروا منه على شيء". فقال زياد ابن لبيد الأنصاريّ: كيف يُختلس منّا وقد قرأنا القرآن؟ ! فواللَّه! لنُقرأنَّه ولنقرئنَّه نساءنا وأبناءَنا. فقال:"ثكلتك أمُّك يا زياد! إنْ كنتُ لأَعَدُّك من فقهاء أهل المدينة، هذه التّوراة والإنجيل عند اليهود والنّصارى فماذا تغني عنهم؟ !".

قال جبيرٌ: فلقيتُ عبادة بن الصّامت قلت: ألا تسمع إلى ما يقول أخوك أبو الدرداء؟ فأخبرته بالذي قال أبو الدرداء، قال: صدق أبو الدرداء إن شئت لأحدّثنَّك بأوّل عِلم يُرفع من النّاس: الخشوع يُوشِكُ أن تدخل مسجد جماعةٍ فلا ترى فيه رجلًا خاشعًا.
حسن: رواه الترمذيّ (2653) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، أخبرنا عبد اللَّه بن صالح، حدّثني معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه جبير بن نفير، عن أبي الدّرداء، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد اللَّه بن صالح، وهو كاتب الليث فإنه صدوق حسن الحديث، أما معاوية بن صالح، فقد قال فيه الحافظ:"صدوق له أوهام". كذا في القريب، لكنه ثقة في قول جمهور النّقّاد: لذا قال الترمذيّ عقب هذا الحديث:"هذا حديثٌ حسنٌ غريب، ومعاوية بن صالح ثقة عند أهل الحديث، ولا نعلم أحدًا تكلّم فيه غير يحيى بن سعيد القطّان، وقد روي عن معاوية ابن صالح نحو هذا. وروى بعضُهم هذا الحديث عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، عن عوف بن مالك عن النبي صلى الله عليه وسلم". انتهى كلام الترمذيّ.

وصحّحه الحاكم (1/ 99) فأخرجه من طريق عثمان بن سعيد الدارمي، ثنا عبد اللَّه بن صالح، به. . . ثم قال:"هذا إسناد صحيح من حديث البصريين".

ثم قال:"ولعلّ متوهّمًا أنّ جبير بن نفير رواه مرة عن عوف بن مالك الأشجعيّ، ومرّة عن أبي الدّرداء فيصير الحديث به معلولًا، وليس كذلك؛ فإنّ رواة الإسنادين جميعًا ثقات، وجبير بن نفير الحضرميّ من أكابر تابعي الشّام؛ فإذا صحّ الحديث عنه بالإسنادين جميعًا فقد ظهر أنّه سمعه. من الصّحابين جميعًا. . . .".

قلت: وهذا كلام جيدٌ مقبول، مبنيٌّ على قواعد أهل هذا الفنّ.

وقد رُوي هذا الحديث عن زياد بن لبيد أيضًا قال: ذكر النبيّ صلى الله عليه وسلم شيئًا فقال:"ذاك عند أوان ذهاب العلم". قلت: يا رسول اللَّه! وكف يذهب العلم، ونحن نقرأ القرآن، ونقرئه أبناءنا، ويُقرئُه أبناؤنا أبناءَهم إلى يوم القيامة؟ قال:"ثكلتك أمّك زياد! إنْ كنتُ لأراك من أفقه رجل بالمدينة، أوليس هذه اليهود والنّصارى يقرأون التّوراة والإنجيل لا يعملون بشيء مما فيهما".

رواه ابن ماجه (4048) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدّثنا وكيع، قال: حدّثنا الأعمش، عن سالم بن أبي الجعد، عن زياد بن لبيد، قال: فذكره.

ورواه الإمام أحمد (17473، 17919)، وأبو خيثمة في العلم (52)، والحاكم (3/ 590) كلّهم من طريق الأعمش، بإسناده، مثله.

قال الحاكم: صحيح على شرط الشّيخين.

قلت: فيه علّة وهي أنّ سالم بن أبي الجعد لم يسمع من زياد. قال البخاريّ في التاريخ الكبير (3/ 344):"لا أراه سمع من زياد"، وجزم الحافظ في الإصابة بأنه لم يلقه، فلعلّ هذه العلّة خفيت على الحاكم فصحّح الحديث. وأمّا الذّهبيّ فسكت عليه ولم يوافقه كعادته، فلعلّه شكّ في سماع سالم بن أبي الجعد من زياد، واللَّه تعالى أعلم.

وكذلك علّله البوصيريّ في"مصباح الزّجاجة" (3/ 253) بأنّ سالمًا بن أبي الجعد لم يسمع
من زياد، وقال:"رجاله ثقات إلّا أنّه منقطع".

ورواه الطبرانيّ في المعجم الكبير (5/ 306) من وجه آخر عن أبي طوالة، عن زياد بن لبيد، وفيه أيضًا انقطاع؛ فإنّ أبا طوالة لم يسمع من زياد كما قال الحافظ في الإصابة في ترجمة زياد بن لبيد الأنصاريّ (1/ 558).

وأمّا ما رُوي عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تعلّموا القرآن والفرائض، وعلّموا النّاس، فإنّي مقبوض".

فيه اضطراب كما قال الترمذيّ (2091)، ورواه عن عبد الأعلى بن واصل، حدّثنا محمد بن القاسم الأسدي، حدّثنا الفضل بن دلهم، حدّثنا عوف، عن شهر بن حوشب، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

قال الترمذيّ:"هذا حديث فيه اضطراب، وروى أبو أسامة هذا الحديث عن عوف، عن رجل، عن سليمان بن جابر، عن ابن مسعود، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم.

حدّثنا بذلك الحسين بن حريث، أخبرنا أبو أسامة، عن عوف، بهذا، بمعناه. ومحمد بن القاسم الأسديّ قد ضعّفه أحمد بن حنبل وغيره". انتهى كلام الترمذيّ.

قلت: ورواه ابن عبد البر في"جامع بيان العلم" (1029) من وجه آخر عن هوذة بن خليفة، حدّثنا عوف الأعرابيّ، بإسناده. وزاد بعد قوله:"إنّي مقبوض":"وإنّ العلم يُقبض، وتظهر الفتن، حتى يختلف الاثنان في الفريضة لا يجدان أحدًا يفصل بينهما".

وإسناده فيه رجل مبهم، وقد روى بعضهم عن عوف، عن سليمان بن جابر بدون إبهام الرّجل، فهو على كلّ حال منقطع مع الاضطراب كما قال الترمذيّ، وسليمان بن جابر الهجريّ مجهول.

ورواه ابن ماجه (4/ 79)، وابن عدي في"الكامل" (2/ 791) من وجه آخر عن أبي هريرة. وفيه حفص بن عمر بن أبي العطاف"ضعيف".

انظر للمزيد: التلخيص الحبير (4/ 79)، والمقاصد الحسنة (339).

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي أمامة مرفوعًا:"عليكم بهذا العلم قبل أن يقبض، وقبضُه أن يُرفع" وجمع بين إصبعيه الوسطى والتي تلي الإبهام هكذا ثم قال:"العالم والمتعلم شريكان في الأجر، ولا خير في سائر النّاس".

رواه ابن ماجه (228) عن هشام بن عمّار قال: حدّثنا صدقة بن خالد، قال: حدّثنا عثمان بن أبي عاتكة، عن علي بن زيد، عن القاسم، عن أبي أمامة، فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل علي بن زيد الألهانيّ، قال يحيى بن معين:"علي بن زيد، عن القاسم، عن أبي أمامة هي ضعاف كلّها".

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (22290)، والطبراني في الكبير (8/ 256) مطوّلًا.
وقد رُوي عن الحجاج بن أرطاة، عن الوليد بن أبي مالك، عن القاسم، عن أبي أمامة، مختصرًا. رواه الطبراني في الكبير (8/ 276). والحجاج بن أرطاة مدلّس.




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আকাশের দিকে চক্ষু তুলে তাকালেন এবং বললেন: "এটাই সেই সময়, যখন মানুষের কাছ থেকে ইলম (জ্ঞান) ছিনিয়ে নেওয়া হবে, এমনকি তারা এর সামান্য কিছুও আর অর্জন করতে পারবে না।" তখন যিয়াদ ইবন লাবীদ আল-আনসারী বললেন: "আমাদের কাছ থেকে কীভাবে ইলম ছিনিয়ে নেওয়া হবে, অথচ আমরা তো কুরআন পাঠ করছি! আল্লাহর শপথ! আমরা অবশ্যই এটি (কুরআন) পাঠ করব এবং আমাদের নারীদের ও সন্তানদেরকে তা পাঠ করাব।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার মাতা তোমাকে হারাক, হে যিয়াদ! আমি তো তোমাকে মদীনার ফকীহদের (আইনজ্ঞদের) অন্তর্ভুক্ত মনে করতাম। এই তো তাওরাত ও ইঞ্জিল ইয়াহুদী ও খ্রিস্টানদের কাছে বিদ্যমান; কিন্তু তা তাদের কী উপকারে আসে?!"

জুবাইর (ইবন নুফায়ের) বলেন: অতঃপর আমি উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করে বললাম, আপনার ভাই আবূ দারদা যা বলেছেন, তা কি আপনি শোনেননি? এরপর আমি তাকে আবূ দারদার কথাগুলো জানালাম। তিনি বললেন: আবূ দারদা সত্য বলেছেন। তুমি চাইলে আমি তোমাকে বলে দেব, মানুষের কাছ থেকে সর্বপ্রথম যে জ্ঞান উঠিয়ে নেওয়া হবে, তা হলো বিনয় (খুশু)। অচিরেই তুমি জামাআতের মসজিদে প্রবেশ করবে, কিন্তু সেখানে একজনও বিনয়ী (খাশে') লোককে দেখতে পাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (1235)


1235 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مَنْ أُفْيِتَي بغير علمٍ كان إثمُه على مَنْ أفتاه".

حسن: رواه أبو داود (3657) عن الحسن بن علي، حدّثنا أبو عبد الرحمن المقرئ، حدّثنا سعيد -يعني ابن أبي أيوب-، عن بكر بن عمرو، عن مسلم بن يسار -أبي عثمان-، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل بكر بن عمرو، فإنه صدوق حسن الحديث.

ورواه ابن ماجه (53) من وجه آخر عن مسلم بن يسار، به.

ورواه أبو داود عن سليمان بن داود، أخبرنا ابن وهب، حدّثني يحيى بن أيوب، عن بكر بن عمرو، عن عمرو بن أبي نُعيمة، عن أبي عثمان الطُنبُذي (وهو مسلم بن يسار) رضيع عبد الملك بن مروان، قال: سمعت أبا هريرة، فذكر نحوه. وزاد فيه:"ومن أشار على أخيه بأمر يعلم أنّ الرّشد في غيره فقد خانه".

وهذه الزّيادة ضعيفة، من أجل عمرو بن أبي نُعيمة، فإنه مجهول. وقال الدارقطنيّ:"مصري، مجهول يترك". وذكره ابن حبان في الثقات وقال:"يخطئ".

وبكر بن عمرو روي عن مسلم بن يسار كما قال المزيّ، وقيل: عن عمرو بن أبي نعيمة عنه. فالظّاهر أنّ زيادة عمرو بن أبي نُعيمة بين بكر بن عمرو ومسلم بن يسار يعتبر من المزيد في متصل الأسانيد؛ لأنّ أبا عبد الرحمن المقرئ أقام هذا الإسناد ومن طريقه الحاكم في المستدرك (1/ 126)، وصحّحه على شرط الشّيخين وقال:"ولا أعرف له علة". وقد كره السّلف الفتوى بغير علم.

قال عبد اللَّه بن عباس:"من أفتى بفتيا هو يعمي فيها كان إثمها عليه". انظر المدخل (186).

وعن ابن مسعود قال:"من كان عنده علم فليقلْ بعلمه، ومن لم يكن عنده علم فليقلْ: اللَّه أعلم، فإنّ اللَّه قال لنبيّه عليه السلام: {قُلْ مَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُتَكَلِّفِينَ} [سورة ص: 86]". انظر تخريجه في"المدخل" (797).

وقيل لابن المبارك:"متى يُفتي الرّجل؟ قال: إذا كان عالمًا بالأثر، بصيرًا بالرّأي". المدخل (187).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তিকে জ্ঞান ছাড়া ফাতওয়া দেওয়া হয়, তার গুনাহ ফাতওয়াদানকারীর উপর বর্তায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1236)


1236 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، قال: سمع النبيُّ صلى الله عليه وسلم قومًا يتدارؤون فقال:"إنّما هلك من كان قبلكم بهذا، ضربوا كتاب اللَّه بعضه ببعض، وإنّما نزل
كتاب اللَّه يصدِّق بعضه بعضًا، فلا تكذّبوا بعضه ببعض، فما علمتم منه فقولوا، وما جهلتم فكِلوه إلى عالمه".

حسن: رواه الإمام أحمد (6741) عن عبد الرزّاق - وهو في مصنفه (20367) قال: أخبرنا معمر، عن الزّهرّي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكر الحديث.

ومن هذا الطّريق رواه أيضًا البخاريّ في خلق أفعال العباد (218)، والبغويّ في شرح السنة (121)، والبيهقيّ في المدخل (789).

وإسناده حسن من أجل الكلام في عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.

وانظر للمزيد:"القدر".




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন কিছু লোককে শুনতে পেলেন যারা (ধর্মীয় বিষয়ে) তর্ক-বিতর্ক করছিল। তখন তিনি বললেন: "তোমাদের পূর্বের লোকেরা তো এর দ্বারাই ধ্বংস হয়েছিল; তারা আল্লাহর কিতাবের এক অংশকে অন্য অংশের বিরুদ্ধে ব্যবহার করত। অথচ আল্লাহর কিতাব তো নাযিল হয়েছে, যেন এর এক অংশ অন্য অংশকে সমর্থন করে। সুতরাং তোমরা এর এক অংশ দ্বারা অন্য অংশকে মিথ্যা সাব্যস্ত করো না। তোমরা এর যা জানো, তা বলো; আর যা জানো না, তা এর জ্ঞানী ব্যক্তির উপর ন্যস্ত করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (1237)


1237 - عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"المِراءُ في القرآن كفر".

صحيح: رواه أبو داود (4603) عن أحمد بن حنبل، حدّثنا يزيد -يعني ابن هارون-، أخبرنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (7508) عن يزيد، أخبرنا زكريا، عن سعد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، بلفظ:"جدالٌ في القرآن كفرٌ". وإسناده صحيح، رجاله رجال الصحيح.

وفي لفظ آخر عند أحمد (7989) أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نزل القرآن على سبعة أحرف، المِراء في القرآن كفر -ثلاث مرات- فما عرفتم منه فاعملوا، وما جهلتم منه فرُدّوه إلى عالمه".

رواه عن أنس بن عياض، حدّثني أبو حازم، عن أبي سلمة، قال: لا أعلمه إلّا عن أبي هريرة، فذكره. وهذا أيضًا إسناد صحيح، وصحّحه ابنُ حبان (74) من هذا الوجه.

ورواه البزار (كشف الأستار - 2313) من وجه آخر عن محمد بن عمرو، به وزاد فيه:"أُنزل القرآن على سبعة أحرف، والمراء في القرآن كفر".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরআন (এর আয়াত) নিয়ে তর্কে লিপ্ত হওয়া কুফর।"









আল-জামি` আল-কামিল (1238)


1238 - عن عائشة، قالت: تلا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في هذه الآية: {هُوَ الَّذِي أَنْزَلَ عَلَيْكَ الْكِتَابَ مِنْهُ آيَاتٌ مُحْكَمَاتٌ هُنَّ أُمُّ الْكِتَابِ وَأُخَرُ مُتَشَابِهَاتٌ فَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ زَيْغٌ فَيَتَّبِعُونَ مَا تَشَابَهَ مِنْهُ ابْتِغَاءَ الْفِتْنَةِ وَابْتِغَاءَ تَأْوِيلِهِ وَمَا يَعْلَمُ تَأْوِيلَهُ إِلَّا اللَّهُ وَالرَّاسِخُونَ فِي الْعِلْمِ يَقُولُونَ آمَنَّا بِهِ كُلٌّ مِنْ عِنْدِ رَبِّنَا وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ (7)} [سورة آل عمران: 7]، قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فإذا رأيت الذين يتبعون ما تشابه منه فأولئك الذين سمّى اللَّه فاحذروهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4547)، ومسلم في العلم (2665) كلاهما عن عبد اللَّه ابن مسلمة، حدّثنا يزيد بن إبراهيم التسْتريّ، عن ابن أبي مليكة، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "তিনিই সেই সত্তা যিনি তোমার প্রতি কিতাব নাযিল করেছেন, যার মধ্যে আছে সুস্পষ্ট আয়াতসমূহ—এগুলোই কিতাবের মূল, আর অন্যগুলো অস্পষ্ট (মুতাশাবিহাত)। যাদের মনে বক্রতা আছে, তারা ফিতনা সৃষ্টি এবং এর মনগড়া ব্যাখ্যা করার উদ্দেশ্যে অস্পষ্ট আয়াতগুলোর অনুসরণ করে। অথচ আল্লাহ ছাড়া এর সঠিক ব্যাখ্যা কেউ জানে না। আর যারা জ্ঞানে সুপ্রতিষ্ঠিত, তারা বলে, 'আমরা এতে বিশ্বাস স্থাপন করলাম, সবই আমাদের রবের নিকট থেকে এসেছে।' আর বিবেকবানগণ ছাড়া কেউ উপদেশ গ্রহণ করে না।" (সূরা আলে ইমরান, ৭)। তিনি বলেন, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সুতরাং যখন তুমি এমন লোকদের দেখবে যারা এর অস্পষ্ট আয়াতগুলোর অনুসরণ করে, তারাই ঐসব লোক যাদের নাম আল্লাহ (এই আয়াতে) উল্লেখ করেছেন; অতএব তোমরা তাদের সম্পর্কে সতর্ক হও।"









আল-জামি` আল-কামিল (1239)


1239 - عن جندب بن عبد اللَّه البجليّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اقرأوا القرآن ما ائتلفت عليه قلوبُكم، فإذا اختلفتم فيه فقوموا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5060)، ومسلم في العلم (2667) كلاهما من حديث أبي عمران الجوني، عن جندب بن عبد اللَّه البجليّ، فذكره.




জুন্দুব ইবনে আবদুল্লাহ আল-বাজালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কুরআন পাঠ করো যতক্ষণ পর্যন্ত তোমাদের অন্তর এতে ঐকমত্য পোষণ করে। কিন্তু যখন তোমরা এর মধ্যে মতভেদ শুরু করবে, তখন তোমরা উঠে যাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (1240)


1240 - عن عبد اللَّه بن مسعود، أنّه سمع رجلًا يقرأ آية، سمع النّبيَّ صلى الله عليه وسلم خلافها، فأخذت بيده، فانطلقت به إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"كلاكما محسن، فاقرآ" أكبر علمي قال:"فإنّ من كان قبلكم اختلفوا فأَهْلَكَهْمْ".

صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5062) عن سليمان بن حرب، حدّثنا شعبة، عن عبد الملك بن ميسرة، عن النزال بن سبرة، عن عبد اللَّه، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তিনি এক ব্যক্তিকে একটি আয়াত পড়তে শুনলেন, যা তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এর বিপরীত পড়তে শুনেছিলেন। তখন আমি তার হাত ধরলাম এবং তাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের দু'জনের কেউই ভুল করনি, বরং দু'জনই সুন্দর (সঠিক) পড়েছ। সুতরাং তোমরা দু'জনই পড়ো।" আমার জ্ঞান মতে, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমাদের পূর্ববর্তীরা মতভেদ করত, ফলে তারা ধ্বংস হয়ে গিয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (1241)


1241 - عن عبد اللَّه بن عمرو قال: هجّرتُ إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومًا قال: فسمع أصوات رجلين اختلفا في آية، فخرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يعرف في وجهه الغضب، فقال:"إنّما هلك من كان قبلكم باختلافهم في الكتاب".

صحيح: رواه مسلم في العلم (2666) عن أبي كامل فضيل بن حسين الجحدريّ، حدّثنا حماد ابن زيد، حدّثنا أبو عمران الجونيّ، قال: كتب إليَّ عبد اللَّه بن رباح الأنصاريّ، أنّ عبد اللَّه بن عمرو، قال: فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুই ব্যক্তির আওয়াজ শুনতে পেলেন যারা একটি আয়াত নিয়ে মতভেদ করছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন অবস্থায় বের হলেন যে তাঁর চেহারায় রাগের ছাপ স্পষ্ট ছিল। তিনি বললেন, “তোমাদের পূর্ববর্তী লোকেরা কিতাব (আল্লাহর গ্রন্থ) নিয়ে মতভেদ করার কারণেই ধ্বংস হয়েছিল।”









আল-জামি` আল-কামিল (1242)


1242 - عن أبي سعيد قال: كنّا جلوسًا على باب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نتذاكر، ينزع هذا بآية، وينزع هذا بأية، فخرج علينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كأنّما تفقّأ في وجهه حبُّ الزمان، فقال:"يا هؤلاء، أبهذا بُعْثتم؟ أم بهذا أُمرتم؟ لا ترجعوا بعدي كفّارًا يضرب بعضكم رقاب بعض".

حسن: رواه البزّار (كشف الأستار - 179)، والطبراني في كبيره (6/ 45) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن المبارك العيشيّ، ثنا سويد أبو حاتم، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد فذكر الحديث.

وإسناده حسن، عبد الرحمن بن المبارك، وشيخه سويد - وهو ابن إبراهيم أبو حاتم صدوقان، وبقية رجاله ثقات.

قوله:"ينزع هذا بآية" أي يستخرج منها معنى.

وقوله:"كأنّما تفقأ في وجهه حبُّ الرمان" أي تنشق، وهي كناية عن تغيّر ملامح وجهه صلى الله عليه وسلم وشدّة تأثّره من الغضب.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দরজায় বসে আলোচনা করছিলাম। এই ব্যক্তি একটি আয়াত দ্বারা দলীল পেশ করছিল এবং অন্য ব্যক্তি অন্য একটি আয়াত দ্বারা দলীল পেশ করছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট বের হয়ে আসলেন। দেখে মনে হচ্ছিল যেন তাঁর চেহারায় ডালিমের দানা ফেটে গেছে। অতঃপর তিনি বললেন: "হে লোক সকল, তোমাদের কি এর জন্য প্রেরণ করা হয়েছে? নাকি তোমাদেরকে এর জন্য আদেশ করা হয়েছে? তোমরা আমার পরে একে অপরের ঘাড়ে আঘাতকারী কাফিরদের মতো হয়ে যেও না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1243)


1243 - عن عبد اللَّه بن عمر أنّه سمع رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ محرِّمَ الحلالِ كمُحِلِّ الحرام".

حسن: رواه الطبرانيّ في الأوسط (مجمع البحرين - 268): ثنا موسى بن هارون، ثنا أبو موسى الأنصاريّ، ثنا عاصم بن عبد العزيز الأشجعيّ، عن الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذباب، عن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر، عن أبيه، فذكر الحديث.

قال الهيثميّ في"المجمع" (1/ 176):"رجاله رجال الصّحيح".

قلت: إسناده حسن، فيه عاصم بن عبد العزيز، والحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذباب، وقد قال الحافظ في كلٍّ منهما:"صدوق يهم" وبقية رجاله ثقات.

إلا أن أبا حاتم قال:"هذا حديث منكر".

قلت: لعله لتفرد عاصم وشيخه، وللحديث أسانيد أخرى وكلها معلولة.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় যে ব্যক্তি হালালকে হারাম করে সে ঐ ব্যক্তির মতো যে হারামকে হালাল করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1244)


1244 - عن أبي بن كعب، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"قام موسى عليه السلام خطيبًا في بني إسرائيل فسُئل: أيّ النّاس أعلم؟ فقال: أنا أعلم، فعتب اللَّه عليه، إذ لم يرد العلم إليه، فأوحى اللَّهُ إليه: أنّ عبدًا من عبادي بمجمع البحرين هو أعلم منك. قال: يا ربّ كيف به؟ فقيل له: احمل حوتًا في مكتل فإذا فقدته فهو ثَمَّ". فذكر الحديث بطوله في اجتماعه بالخضر إلى أن قال:"فانطلقا يمشيان على ساحل البحر، ليس لهما سفينة، فمرّتْ بهما سفينة فكلّموهم أن يحملوهما، فعُرف الخضر فحملوهما بغير نَول، فجاء عصفور فوقع على حرف السّفينة فنقر نقرة أو نقرتين في البحر، فقال الخضر: يا موسى! ما نقص علمي وعلمك من علم اللَّه إلّا كنقرة هذا العصفور في هذا البحر" فذكر الحديث بطوله.

متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (122)، ومسلم في الفضائل (2380) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، حدّثنا عمرو بن دينار، عن سعيد بن جبير، قال: قلت لابن عباس: إنّ نوفًا البكاليّ يزعم أنّ موسى عليه السلام صاحب بني إسرائيل ليس هو موسى صاحب الخضر عليه السلام! فقال: كذب عدّو اللَّه، سمعتُ أبي بن كعب يقول: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث بطوله)، وسيأتي في موضعه بكامله.




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: "মূসা (আঃ) বনী ইসরাঈলের মধ্যে দাঁড়িয়ে ভাষণ দিচ্ছিলেন। তখন তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: মানুষের মধ্যে কে সবচেয়ে বেশি জ্ঞানী? তিনি বললেন: আমিই সবচেয়ে বেশি জ্ঞানী। আল্লাহ তাঁর প্রতি অসন্তুষ্ট হলেন, কারণ তিনি জ্ঞানের উৎস আল্লাহকে উল্লেখ করেননি। অতঃপর আল্লাহ তাঁর প্রতি ওহী পাঠালেন: 'আমার বান্দাদের মধ্যে একজন বান্দা, যে দুই সমুদ্রের সঙ্গমস্থলে অবস্থান করছে, সে তোমার চেয়ে বেশি জ্ঞানী।' মূসা (আঃ) বললেন: 'হে আমার প্রতিপালক! আমি কীভাবে তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করব?' তাঁকে বলা হলো: 'আপনি একটি ঝুড়িতে একটি মাছ বহন করুন। যখন আপনি সেটি হারাবেন, তখন সেই স্থানেই তিনি আছেন।'

(এরপর বর্ণনাকারী আল-খিদরের সঙ্গে তাঁর সাক্ষাৎ সম্পর্কিত দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করলেন, যেখানে তিনি বলেছেন): 'এরপর তাঁরা দু'জন সমুদ্রের তীর ধরে হাঁটতে লাগলেন, তাঁদের সাথে কোনো নৌকা ছিল না। তখন একটি নৌকা তাঁদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। তাঁরা নৌকার আরোহীদের তাঁদেরকে বহন করার জন্য অনুরোধ করলেন। আল-খিদরকে চিনে ফেলার কারণে তারা বিনা ভাড়ায় তাঁদের দু'জনকে তুলে নিলো। অতঃপর একটি চড়ুই পাখি এসে নৌকার কিনারায় বসলো এবং সমুদ্রে এক বা দু'বার ঠোকর মারলো। তখন আল-খিদর বললেন: হে মূসা! আমার জ্ঞান এবং তোমার জ্ঞান আল্লাহর জ্ঞানের তুলনায় শুধু ততটুকুই, যতটুকু এই চড়ুই পাখিটি তার ঠোকরের মাধ্যমে এই সমুদ্র থেকে কমিয়েছে।' (এরপর বর্ণনাকারী দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করলেন)।"









আল-জামি` আল-কামিল (1245)


1245 - عن عمر بن الخطاب قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يظهر الإسلام حتى تخوض الخيلُ البحار، وحتّى يختلف التجّار في البحر، ثم يظهر قومٌ يقرأون القرآن يقولون: من أقرأ منا؟ من أفقه منا؟". ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هل في أولئك خير؟". قالوا: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"أولئك وقود النّار، أولئك منكم من هذه الأمّة".

حسن: رواه البزّار (كشف الأستار - 173) عن عبد اللَّه بن شبيب، ثنا إسحاق بن محمد الفروي، ثنا عبد اللَّه بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن جدّه، عن عمر، فذكر الحديث.

وهذا إسناد ضعيف، عبد اللَّه بن شبيب قال فيه الذهبي:"أخباريٌّ علّامة، لكنّه واه". وشيخه إسحاق بن محمد الفروي، قال فيه النسائيّ:"متروك"، وقال الدّارقطنيّ:"ضعيف".

وأمّا أبو حاتم: فقال:" كان صدوقًا"، وشيخه عبد اللَّه بن زيد بن أسلم مختلف فيه، فوثّقه الإمام أحمد، وضعّفه أبو زرعة والنّسائيّ، وفي التقريب:"صدوق فيه لين".

ولكن رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (6242) عن محمد بن علي الصّائغ، قال: نا خالد بن يزيد العُمَريّ، قال: ثنا عبد اللَّه بن زيد بن أسلم، به.

وقال الطبرانيّ:"لم يرو هذا الحديث عن عبد اللَّه بن زيد بن أسلم إلا خالد بن يزيد العمري".

وكأنّه لم يقف على إسناد البزّار، وفيه متابعة الفروي للعمري، فانحصرتْ العلّة في عبد اللَّه بن زيد بن أسلم وهو صدوق فيه لين، ولعله لذلك قال المنذريّ في الترغيب والترهيب (230):"رواه الطبراني والبزّار بإسناد لا بأس به".

وهذا أولى من قول الهيثمي في"المجمع" (1/ 186):"رواه الطبرانيّ في الأوسط، والبزار، ورجال البزار موثقون". فقوله:"موثقون". بعد التتبع تبين أنه يقصد به توثيق ابن حبان، وابن حبان أدخل عبد اللَّه بن شبيب بن خالد في"المجروحين" (576)، وقال فيه:"يقلب الأخبار ويسرقها، لا يجوز الاحتجاج به لكثرة ما خالف أقرانه في الروايات عن الأثبات".

ويشهد له الحديث الآتي وهو ما رواه البزار (كشف الأستار - 174)، وأبو يعلى (6698) كلاهما من حديث موسى بن عبيدة، عن محمد بن إبراهيم، عن ابن الهاد، عن العباس بن عبد المطلب، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكر نحوه.

ولكن فيه موسى بن عبيدة وهو الزّبذيّ ضعيف، وبه علّله الهيثميّ في"المجمع" (1/ 185 - 186)، والبوصيريّ في إتحاف المهرة.

وابن الهاد هو يزيد بن عبد اللَّه بن أسامة بن الهاد لم يدرك العباس.

ولكن رواه الطبرانيّ في"المعجم الكبير" (25/ 27 - 28) عن محمد بن نصر الصّائغ البغداديّ، ثنا إبراهيم بن حمزة الزبيريّ، ثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن يزيد بن الهاد، قال: حدّثتني هند بنت الحارث الخثعميّة امرأة عبد اللَّه بن شدّاد، عن أمّ الفضل وعبد اللَّه بن عباس، عن
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قام ليلة بمكة من اللّيل فقال:"اللهمّ هل بلّغت؟" ثلاث مرّات. فقام عمر بن الخطاب فقال: اللهم نعم، فحرصت ونصحت وجهدت. فأصبح فقال:"ليظهرن الإيمان حتى يرد الكفر إلى مواطنه، وليخاض البحار بالإسلام، وليأتين على النّاس زمان يتعلّمون فيه القرآن، فيعلّمونه ويقرؤونه، ثم يقولون: قد قرأنا وعلّمنا، فمن ذا الذي هو خير منا، فهل في أولئك من خير؟ قالوا: لا يا رسول اللَّه! ومن أولئك؟ قال:"أولئك منكم، وأولئك وقود النّار".

فجعل الحديث من مسند أمّ عبد اللَّه بن عباس وهي زوجة عباس بن عبد المطلب، ولعلّ هذا الخلط يعود إلى هند بنت الحارث فإنّها لم يوثقها أحد، وإنما ذكرها ابن حبان في الثقات (5/ 517). وقال الحافظ في التقريب:"مقبولة". أي عند المتابعة. وإني لم أجد لها متابعًا في مسند أم عبد اللَّه بن عباس، وإن كانت هي توبع في مسند عمر بن الخطاب، ولكن مخرجه يختلف عن مخرج حديث أمّ ابن عباس.

وأمّا قول الهيثمي في"المجمع" (1/ 189):"رواه الطبراني في الكبير، ورجاله ثقات إلّا أنّ هند بنت الحارث الخثعمية التابعية لم أرّ من وثّقها ولا جرّحها". فكأنّه خفى عليه ترجمتها في"الثقات" وإلّا فكتاب"الثقات" عمدة للهيثمي في توثيق الرجال.

والخلاصة: أن الحديث حسن بضم بعضه إلى بعض، وقد حضنه أيضًا الحافظ المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (231).




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলাম বিজয়ী হবে, এমনকি ঘোড়াগুলো সমুদ্রে পাড়ি জমাবে (বিজয়ীরা সমুদ্রে অভিযান চালাবে), এবং এমনকি ব্যবসায়ীরা সমুদ্রে (দূর-দূরান্তে) গিয়ে ব্যবসা করবে। অতঃপর এমন একদল লোকের আবির্ভাব ঘটবে যারা কুরআন পাঠ করবে এবং বলবে: আমাদের চেয়ে উত্তম পাঠক কে আছে? আমাদের চেয়ে বড় ফকীহ (ইসলামী আইনজ্ঞ) কে আছে?" অতঃপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাদের মধ্যে কি কোনো কল্যাণ আছে?" সাহাবীরা বললেন: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি (রাসূল) বললেন: "তারা হলো জাহান্নামের ইন্ধন। তারা তোমাদের থেকেই, তারা এই উম্মতেরই অন্তর্ভুক্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (1246)


1246 - عن علي بن أبي طالب، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"لا تكذبوا عليَّ، فإنّه مَنْ كذب عليَّ فلْيلج النّار".

صحيح: رواه البخاريّ في العلم (106)، ومسلم في المقدمة (1) كلاهما من طرق عن شعبة، عن منصور، عن ربعي بن حراش، أنّه سمع عليًّا، فذكره. واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم مثله إلّا في قوله:"فليلج النّار". فعند مسلم:"يلج النار".




আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "তোমরা আমার উপর মিথ্যা আরোপ করো না। কেননা, যে ব্যক্তি আমার উপর মিথ্যা আরোপ করবে, সে যেন জাহান্নামে প্রবেশ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1247)


1247 - عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"تَسمُّوا باسْمي ولا تكتنوا بكنيتي، ومن رآني في المنام فقد رآني، فإنّ الشّيطان لا يتمثّل في صورتي، ومن كذب عليَّ متعمِّدًا فليتبوّأ مقعده من النّار".

صحيح: رواه البخاريّ في العلم (110)، ومسلم في المقدمة (3) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن أبي حصين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. واللّفظ للبخاريّ أمّا مسلم فاكتفى بالجملة الأخيرة فقط.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা আমার নামে নিজেদের নাম রাখো, কিন্তু আমার কুনিয়াত (উপনাম) ব্যবহার করো না। আর যে আমাকে স্বপ্নে দেখল, সে (আসলেই) আমাকে দেখল। কেননা শয়তান আমার রূপে আসতে পারে না। আর যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার উপর মিথ্যারোপ করল, সে যেন জাহান্নামে তার ঠিকানা বানিয়ে নেয়।"