হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (12468)


12468 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا يدخل أحد الجنة إلا أري مقعده من النار، لو أساء، ليزداد شكرا، ولا يدخل النار أحد إلا أري مقعده من الجنة، لو أحسن، ليكون عليه حسرة".

صحيح: رواه البخاري في الرقاق (6569) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، حدثنا أبو الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، قال: فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জান্নাতে প্রবেশকারী কোনো ব্যক্তিকেই তার জাহান্নামের স্থানটি দেখানো ছাড়া প্রবেশ করানো হবে না (যদি সে মন্দ কাজ করত), যাতে সে আরও বেশি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে। আর জাহান্নামে প্রবেশকারী কোনো ব্যক্তিকেই তার জান্নাতের স্থানটি দেখানো ছাড়া প্রবেশ করানো হবে না (যদি সে ভালো কাজ করত), যাতে তা তার জন্য আফসোসের কারণ হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (12469)


12469 - عن جابر يقول: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن بين الرجل وبين الشرك والكفر ترك الصلاة".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (82) من طريق أبي سفيان وأبي الزبير كليهما عن جابر فذكره.

وقيل معناها: أخّروها عن وقتها، وهو مروي عن ابن مسعود وغيره.

وفي الباب ما روي عن أبي سعيد الخدري يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يكون خلف من بعد ستين سنة، أضاعوا الصلاة، واتبعوا الشهوات، فسوف يلقون غيا، ثم يكون خلف يقرؤون
القرآن، لا يعدو تراقيهم، ويقرأ القرآن ثلاثة: مؤمن، ومنافق، وفاجر". قال بشير: فقلت للوليد: ما هؤلاء الثلاثة. فقال: المنافق كافر به، والفاجر يتأكل به، والمؤمن يؤمن به.

رواه أحمد (11340)، وابن حبان (755)، والحاكم (2/ 374) كلهم من طريق أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد المقرئ، حدثنا حيوة بن شريح، أخبرني بشير بن أبي عمرو الخولاني، أن الوليد بن قيس، حدثه أنه سمع أبا سعيد الخدري، يقول: فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح رواته حجازيون وشاميون أثبات".

قلت: في إسناده الوليد بن قيس التجيبي لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في الثقات، ولذا قال الحافظ ابن حجر:"مقبول" أي إذا توبع، ولم أجد له متابعا فهو لين الحديث.




জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি এবং শিরক ও কুফরের মধ্যে পার্থক্যকারী হলো সালাত (নামাজ) ছেড়ে দেওয়া।"

এই অধ্যায়ে আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "ষাট বছর পর এমন বংশধর আসবে, যারা সালাত নষ্ট করবে এবং প্রবৃত্তির (কামনার) অনুসরণ করবে। অচিরেই তারা 'গাইয়্যুন' (অশুভ পরিণতি) লাভ করবে। এরপর এমন এক বংশধর আসবে যারা কুরআন তিলাওয়াত করবে, যা তাদের কণ্ঠনালী অতিক্রম করবে না। আর কুরআন তিলাওয়াত করবে তিন প্রকারের লোক: মুমিন, মুনাফিক ও ফাজির (পাপী)।" বশীর (রাবী) বলেন, আমি ওয়ালীদকে বললাম: এই তিনজন কারা? তিনি বললেন: মুনাফিক হলো—যে কুরআনকে অস্বীকার করে, ফাজির হলো—যে এর মাধ্যমে জীবিকা নির্বাহ করে, আর মুমিন হলো—যে এর প্রতি বিশ্বাস স্থাপন করে।









আল-জামি` আল-কামিল (12470)


12470 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لجبريل:"ما يمنعك أن تزورنا أكثر مما تزورنا؟ فنزلت: {وَمَا نَتَنَزَّلُ إِلَّا بِأَمْرِ رَبِّكَ لَهُ مَا بَيْنَ أَيْدِينَا وَمَا خَلْفَنَا}.

صحيح: رواه البخاري في التفسير (4731) عن أبي نعيم، حدثنا عمر بن ذر، قال: سمعت أبي، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিবরীলকে বললেন, "আপনি আমাদেরকে এখন যতটুকু দেখা দেন, তার চেয়ে বেশি দেখতে আসতে কিসে আপনাকে বাধা দেয়?" তখন (এই আয়াতে কারীমাটি) নাযিল হলো: {আর আমরা আপনার রবের নির্দেশ ছাড়া অবতীর্ণ হই না। যা আমাদের সামনে আছে এবং যা আমাদের পেছনে আছে, সবই তাঁর (আল্লাহর)।}









আল-জামি` আল-কামিল (12471)


12471 - عن أبي الدرداء قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أحل الله في كتابه فهو حلال، وما حرّم فهو حرام، وما سكت عنه فهو عافية، فاقبلوا من الله عافيته، فإن الله لم يكن نسيا، ثم تلا هذه الآية {وَمَا كَانَ رَبُّكَ نَسِيًّا}.

حسن: رواه الدارقطني (2066)، والحاكم (2/ 375)، - وعنه البيهقي (10/ 12) - والبزار (4087) كلهم من طريق عاصم بن رجاء بن حيوة، عن أبيه، عن أبي الدرداء، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن رجاء؛ فإنه حسن الحديث.

وقال البزار:"إسناده صالح". وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وقال الهيثمي في المجمع (1/ 171):"إسناده حسن، ورجاله موثقون".




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাঁর কিতাবে যা হালাল করেছেন, তা হালাল; আর যা হারাম করেছেন, তা হারাম; এবং যে বিষয়ে তিনি নীরব থেকেছেন, তা ক্ষমা বা অব্যাহতি (আফিয়াহ); সুতরাং তোমরা আল্লাহর এই অব্যাহতি গ্রহণ করো। নিশ্চয় আল্লাহ বিস্মৃত হন না।" এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: {আর আপনার প্রতিপালক তো বিস্মৃত হন না}।









আল-জামি` আল-কামিল (12472)


12472 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قال الله: كذبني ابن آدم ولم يكن له ذلك، وشتمني ولم يكن له ذلك، فأما تكذيبه إياي: فقوله: لن يعيدني كما بدأني. وليس أول الخلق بأهون عليّ من إعادته، وأما شتمه إياي: فقوله: اتخذ الله ولدا. وأنا الأحد الصمد لم ألد، ولم أولد، ولم يكن لي كفوا أحد".

صحيح: رواه البخاري في التفسير (4974) عن أبي اليمان، حدثنا شعيب، حدثنا أبو الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: আদম সন্তান আমাকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করেছে, অথচ তার এ কাজ করা উচিত হয়নি। আর সে আমাকে গালি দিয়েছে, অথচ তার এ কাজ করা উচিত হয়নি। আমাকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করার কারণ হল— তার এ কথা বলা যে, আল্লাহ আমাকে পুনরায় সৃষ্টি করতে পারবেন না, যেমন প্রথমে সৃষ্টি করেছেন। অথচ প্রথম সৃষ্টি আমার কাছে পুনরায় সৃষ্টির চেয়ে সহজসাধ্য নয়। আর আমাকে গালি দেওয়ার কারণ হল— তার এ কথা বলা যে, আল্লাহ সন্তান গ্রহণ করেছেন। অথচ আমি একক, স্বয়ংসম্পূর্ণ (আস-সামাদ)। আমি কাউকে জন্ম দেইনি এবং আমাকেও জন্ম দেওয়া হয়নি এবং আমার সমকক্ষ কেউ নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (12473)


12473 - عن جابر بن عبد الله يقول: أخبرتني أم مبشر، أنها سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول عند حفصة:"لا يدخل النار - إن شاء الله - من أصحاب الشجرة أحد الذين بايعوا تحتها". قالت: بلى، يا رسول الله. فانتهرها، فقالت حفصة: {وَإِنْ مِنْكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا} فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"قد قال الله عز وجل: {ثُمَّ نُنَجِّي الَّذِينَ اتَّقَوْا وَنَذَرُ الظَّالِمِينَ فِيهَا جِثِيًّا (72)}.
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2496) عن هارون بن عبد الله، حدثنا حجاج بن محمد، قال: قال ابن جريج: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكره.

وأم مبشر هي: زوجة زيد بن حارثة.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উম্মু মুবাশশির আমাকে জানিয়েছেন যে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বলতে শুনেছেন: "ইনশাআল্লাহ, গাছের নিচে বায়াত গ্রহণকারী সাহাবীদের মধ্যে কেউ জাহান্নামে প্রবেশ করবে না।" তিনি (উম্মু মুবাশশির) বললেন: অবশ্যই (প্রবেশ করবে), হে আল্লাহর রাসূল। তখন তিনি তাকে ধমক দিলেন। অতঃপর হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: (আল্লাহ তাআলার বাণী) "আর তোমাদের মধ্যে কেউই এমন নেই, যে তার কাছে (জাহান্নামের কাছে) উপস্থিত হবে না।" (সূরা মারইয়াম: ৭১) তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ তাআলা তো বলেছেন: "অতঃপর আমি মুত্তাকীদেরকে উদ্ধার করব এবং যালিমদেরকে সেখানে নতজানু অবস্থায় ছেড়ে দেব।" (সূরা মারইয়াম: ৭২)









আল-জামি` আল-কামিল (12474)


12474 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يخلص المؤمنون من النار، فيحسبون على قنطرة بين الجنة والنار، فيقتص لبعضهم من بعض مظالمُ كانت بينهم في الدنيا حتى إذا هُذّبوا ونُقّوا أذن لهم في دخول الجنة، فوالذي نفسُ محمد بيده، لأحدُهم أهدى بمنزله في الجنة منه بمنزله كان في الدنيا".

صحيح: رواه البخاري في الرقاق (6535) عن الصلت بن محمد، حدثنا يزيد بن زريع، {وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ} [الحجر: 47] قال: حدثنا سعيد، عن قتادة، عن أبي المتوكل الناجي، أن أبا سعيد قال: فذكره.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনগণ জাহান্নাম থেকে মুক্তি লাভ করবে, অতঃপর তাদের জান্নাত ও জাহান্নামের মধ্যবর্তী স্থানে অবস্থিত একটি পুলের উপর আটকে রাখা হবে। সেখানে দুনিয়াতে তাদের মধ্যে সংঘটিত হওয়া পরস্পর জুলুমসমূহের বদলা নেওয়া হবে। অবশেষে যখন তারা পরিশোধিত ও পরিচ্ছন্ন হয়ে যাবে, তখন তাদের জান্নাতে প্রবেশের অনুমতি দেওয়া হবে। যে সত্তার হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, তাঁর শপথ! নিশ্চয়ই তাদের প্রত্যেকে তার জান্নাতের ঘরের পথ তার দুনিয়ার ঘরের পথের চেয়েও বেশি ভালো করে চিনে নেবে।









আল-জামি` আল-কামিল (12475)


12475 - عن عبد الله بن مسعود: {وَإِنْ مِنْكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا} قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يرد الناس النار كلهم، ثم يصدرون عنها بأعمالهم".

حسن: رواه الترمذي (3159)، وأحمد (4141) - واللفظ له -، والحاكم (2/ 375) كلهم من طريق إسرائيل، عن السدي، عن مرة، عن عبد الله، فذكره.

وإسناده حسن من أجل السدي وهو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة، وهو حسن الحديث إذا لم يتبين خطؤه.

لكن رواه شعبة عن السدي به موقوفا كما عند الترمذي (3165)، وأحمد (4128)، ثم أسند عبد الرحمن بن مهدي أنه قال: قلت لشعبة: إن إسرائيل حدثني عن السدي، عن مرة، عن عبد الله عن النبي صلى الله عليه وسلم فقال شعبة: وقد سمعته من السدي مرفوعا، ولكني أدعه عمدا" اهـ.

يعني الأصل أنه مرفوع إلا أن شعبة احتاط في رفعه.

والمعنى الثاني: الورود بمعنى العبور على الصراط الذي هو على متن جهنم، فلا بد من المرور عليه لكل من يدخل الجنة، وبه قال بعض أهل العلم منهم النووي، وبه فسّره شيخ الإسلام ابن تيمية كما في الفتاوى (4/ 279)، واستدل بحديث رواه مسلم (191: 316) عن جابر بأنه المرور على الصراط، ثم قال: والصراط هو الجسر، فلا بد من المرور عليه لكل من يدخل الجنة، ومن كان صغيرا في الدنيا ومن لم يكن. انتهى.

وحديث مسلم مخرج بكامله في موضعه.

وذهب بعض أهل العلم إلى أن المراد بالدخول هنا هم الكفار وحدَهم دون المؤمنين نظرا لسياق الآية فقد سبق ذكر الكفار والشياطين في قوله تعالى: {فَوَرَبِّكَ لَنَحْشُرَنَّهُمْ وَالشَّيَاطِينَ ثُمَّ
لَنُحْضِرَنَّهُمْ حَوْلَ جَهَنَّمَ جِثِيًّا (68) ثُمَّ لَنَنْزِعَنَّ مِنْ كُلِّ شِيعَةٍ أَيُّهُمْ أَشَدُّ عَلَى الرَّحْمَنِ عِتِيًّا (69) ثُمَّ لَنَحْنُ أَعْلَمُ بِالَّذِينَ هُمْ أَوْلَى بِهَا صِلِيًّا (70) وَإِنْ مِنْكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا كَانَ عَلَى رَبِّكَ حَتْمًا مَقْضِيًّا (71) ثُمَّ نُنَجِّي الَّذِينَ اتَّقَوْا وَنَذَرُ الظَّالِمِينَ فِيهَا جِثِيًّا (72)} [سورة مريم: 68 - 72].

وهذا المعنى روي عن ابن عباس كما رواه ابن جرير في تفسيره (15/ 596) عن ابن المثنى قال: ثنا أبو داود، ثنا شعبة قال: أخبرني عبد الله بن السائب عن رجل سمع ابن عباس يقرؤها {وَإِنْ مِنْكُمْ إِلَّا وَارِدُهَا} وإن منهم يعني الكفار قال: لا يردها مؤمن. انتهى.

قلت: أولا: إسناده ضعيف فإن في إسناده رجلا مجهولا لم يسمّ.

وثانيا: قراءة ابن عباس"وإن منهم" بدلا قراءة شاذة.

وثالثا: لا تؤيده الأحاديث والآثار الواردة في هذا الباب.

ورابعا: قوله تعالى: {ثُمَّ نُنَجِّي الَّذِينَ اتَّقَوْا} والمعلوم أن"ثم" للترتيب فهل المنجون المنقّون يكونون من بينهم يعني الكفار؟ وهذا أمر مستنكر لا يقول به أحد. والله أعلم بالصواب.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী— {আর তোমাদের মধ্যে এমন কেউই নেই, যে এর (জাহান্নামের) উপর দিয়ে অতিক্রম করবে না}— প্রসঙ্গে তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “সকল মানুষই জাহান্নামে প্রবেশ করবে (বা এর ধারে যাবে), অতঃপর তারা তাদের নিজ নিজ আমল অনুযায়ী তা থেকে ফিরে আসবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (12476)


12476 - عن خباب قال: كنت رجلا قينا، وكان لي على العاص بن وائل دين، فأتيته أتقاضاه، فقال لي: لا أقضيك حتى تكفر بمحمد. قال: قلت: لن أكفر به حتى تموت، ثم تبعث. قال: وإني لمبعوث من بعد الموت، فسوف أقضيك إذا رجعت إلى مال وولد. قال: فنزلت: {أَفَرَأَيْتَ الَّذِي كَفَرَ بِآيَاتِنَا وَقَالَ لأُوتَيَنَّ مَالًا وَوَلَدًا (77) أَطَّلَعَ الْغَيْبَ أَمِ اتَّخَذَ عِنْدَ الرَّحْمَنِ عَهْدًا (78) كَلَّا سَنَكْتُبُ مَا يَقُولُ وَنَمُدُّ لَهُ مِنَ الْعَذَابِ مَدًّا (79) وَنَرِثُهُ مَا يَقُولُ وَيَأْتِينَا فَرْدًا (80)}.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4735)، ومسلم في صفة القيامة والجنة والنار (2795) كلاهما من طريق وكيع، عن الأعمش، عن أبي الضحى، عن مسروق، عن خباب، قال: فذكره، واللفظ للبخاري ولفظ مسلم نحوه.




খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একজন কর্মকার (কামার) ছিলাম। আস ইবনে ওয়াইলের কাছে আমার কিছু পাওনা ছিল। আমি তার কাছে গেলাম তা পরিশোধের দাবি জানাতে। সে আমাকে বলল: আমি তোমাকে তোমার পাওনা পরিশোধ করব না, যতক্ষণ না তুমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি কুফরি (অবিশ্বাস) করো। খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: আপনি মরে যাওয়ার এবং তারপর পুনরায় উত্থিত হওয়ার আগ পর্যন্ত আমি তাঁর প্রতি কখনও কুফরি করব না। সে বলল: মৃত্যুর পরেও কি আমাকে আবার জীবিত করা হবে? যদি আমি ধন-সম্পদ ও সন্তান-সন্তুতির কাছে ফিরে যাই, তাহলে আমি তোমাকে তোমার পাওনা শোধ করে দেব। তিনি (খাব্বাব) বলেন: তখন এই আয়াতগুলো নাযিল হয়: "আপনি কি তাকে লক্ষ্য করেননি, যে আমার নিদর্শনসমূহকে অস্বীকার করে এবং বলে, আমাকে ধন-সম্পদ ও সন্তান-সন্ততি দেওয়া হবে? (৭৭) সে কি অদৃশ্য বিষয় জেনে ফেলেছে, না আল্লাহর কাছ থেকে কোনো অঙ্গীকার গ্রহণ করেছে? (৭৮) কক্ষনো নয়, সে যা বলে, আমি তা লিপিবদ্ধ করব এবং তার জন্য শাস্তিকে বহুগুণে বাড়িয়ে দেব। (৭৯) আর সে যা বলছে, তার উত্তরাধিকারী হব আমি এবং সে আমার কাছে আসবে একাকী।" (সূরা মারয়াম ১৯: ৭৭-৮০)









আল-জামি` আল-কামিল (12477)


12477 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله إذا أحبّ عبدا دعا جبريل،
فقال: إني أُحبُ فلانا، فأحبه. فيحبّه جبريل، ثم ينادي في السماء، فيقول: إن الله يحب فلانا، فأحبوه. فيحبه أهل السماء. ثم يوضع له القبول في الأرض. وإذا أبغض عبدا دعا جبريل، فيقول: إني أبغض فلانا، فأبغضه. قال: فيبغضه جبريل، ثم ينادي في أهل السماء: إن الله يبغض فلانا، فأبغضوه، فيبغضونه، ثم توضع له البغضاء في الأرض".

متفق عليه: رواه مسلم في البر والصلة (2637) عن زهير بن حرب، حدثنا جرير، عن سهيل، عن أبيه (هو أبو صالح)، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاري في التوحيد (7485) من وجه آخر عن أبي صالح، غير أنه لم يذكر جزء البغض، وكذلك رواه البخاري (3209، 6040) من طرق أخرى عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن أبي هريرة مقتصرا على الجزء الأول من الحديث فقط.

وبمعناه ما روي عن أبي أمامة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن المقة من الله - قال شريك: هي المحبة والصيت من السماء - فإذا أحب الله عبدا، قال لجبريل: إني أحب فلانا، فينادي جبريل: إن الله يمق، يعني: يحب فلانا، فأحبوه - أرى شريكا قد قال: فينزل له المحبة في الأرض - وإذا أبغض عبدا قال لجبريل:"إني أبغض فلانا، فأبغضه". قال: فينادي جبريل: إن ربكم يبغض فلانا، فأبغضوه" قال: أُرى شريكا قد قال: فيُجرَي له البغض في الأرض.

رواه أحمد (22270، 22271) - واللفظ له - والطبراني في الكبير (8/ 141)، والأوسط (3639) من طرق عن شريك، عن محمد بن سعد الأنصاري، عن أبي ظبية، عن أبي أمامة قال: فذكره.

وشريك هو ابن عبد الله النخعي القاضي، وهو سيئ الحفظ.

وفي الباب ما روي عن ثوبان، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن العبد ليلتمس مرضاة الله، فلا يزال بذلك، فيقول الله لجبريل: إن فلانا عبدي يلتمس أن يرضيني، ألا وإن رحمتي عليه، فيقول جبريل: رحمة الله على فلان. ويقولها حملة العرش، ويقولها من حولهم حتى يقولها أهل السماوات السبع، ثم تهبط له إلى الأرض".

رواه أحمد (22401) عن محمد بن بكر، أخبرنا ميمون، حدثنا محمد بن عباد، عن ثوبان، فذكره.

ورواه الطبراني في الأوسط (1262) من وجه آخر عن ميمون بن عجلان الثقفي، عن محمد بن عباد به، ولكن ميمون بن عجلان الثقفي ضعيف.

وقال الحافظ ابن حجر:"وميمون هذا أظنه عطاء بن عجلان أحد الضعفاء". لسان الميزان (6/ 141).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ যখন কোনো বান্দাকে ভালোবাসেন, তখন তিনি জিবরীলকে ডাকেন এবং বলেন: 'আমি অমুককে ভালোবাসি, সুতরাং তুমিও তাকে ভালোবাসো।' তখন জিবরীল তাকে ভালোবাসেন। এরপর তিনি আসমানে ঘোষণা করেন, তিনি বলেন: 'আল্লাহ অমুককে ভালোবাসেন, সুতরাং তোমরাও তাকে ভালোবাসো।' ফলে আসমানের অধিবাসীরাও তাকে ভালোবাসে। এরপর পৃথিবীতে তার জন্য গ্রহণযোগ্যতা (কবুলিয়াত) স্থাপন করা হয়। আর যখন তিনি কোনো বান্দাকে ঘৃণা করেন, তখন জিবরীলকে ডাকেন এবং বলেন: 'আমি অমুককে ঘৃণা করি, সুতরাং তুমিও তাকে ঘৃণা করো।' বর্ণনাকারী বলেন: তখন জিবরীলও তাকে ঘৃণা করেন। এরপর তিনি আসমানের অধিবাসীদের মধ্যে ঘোষণা করেন: 'নিশ্চয় আল্লাহ অমুককে ঘৃণা করেন, সুতরাং তোমরাও তাকে ঘৃণা করো।' তখন তারাও তাকে ঘৃণা করে। এরপর পৃথিবীতে তার জন্য ঘৃণা স্থাপন করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (12478)


12478 - عن أبي أمامة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اسم الله الأعظم الذي إذا دعي به أجاب في ثلاث سور من القرآن: في البقرة، وآل عمران، وطه".

حسن: رواه الطحاوي في شرح المشكل (176)، والطبراني في الكبير (8/ 282)، والحاكم (1/ 505 - 506) كلهم من طريق الوليد بن مسلم، حدثني عبد الله بن العلاء بن زبر، حدثنا القاسم بن عبد الرحمن، عن أبي أمامة فذكره.

واللفظ للطبراني، وزاد الحاكم: قال القاسم: فالتمستُها فوجدت في سورة البقرة آية الكرسي {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ} وفي سورة آل عمران {الم (1) اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ (2)} وفي سورة طه {وَعَنَتِ الْوُجُوهُ لِلْحَيِّ الْقَيُّومِ}.

وإسناده حسن من أجل القاسم بن عبد الرحمن فإنه حسن الحديث.

والكلام عليه مبسوط في كتاب الأذكار.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর মহান নামটি (ইসমূল আ'যম), যা দ্বারা প্রার্থনা করা হলে তিনি সাড়া দেন, তা কুরআনের তিনটি সূরায় রয়েছে: সূরা আল-বাকারা, সূরা আলে ইমরান এবং সূরা ত্বহা।" কাসিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: অতঃপর আমি তা অনুসন্ধান করে সূরা বাকারায় পেলাম আয়াতুল কুরসীর মধ্যে: {اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ}, সূরা আলে ইমরানে: {الم (1) اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ (2)}, এবং সূরা ত্বহা-তে: {وَعَنَتِ الْوُجُوهُ لِلْحَيِّ الْقَيُّومِ}।









আল-জামি` আল-কামিল (12479)


12479 - عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من نسي صلاة، فليصل إذا ذكرها، لا كفارة لها إلا ذلك" {وَأَقِمِ الصَّلَاةَ لِذِكْرِي (14)}.

متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (597)، ومسلم في المساجد (684) كلاهما من طريق همام، عن قتادة، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি সালাত (নামায) আদায় করতে ভুলে যায়, সে যখনই স্মরণ করবে, তখনই যেন তা আদায় করে নেয়। এর কাফফারা (প্রায়শ্চিত্ত) শুধু এটাই।" [আর আমাকে স্মরণ করার জন্য সালাত কায়েম করো (সূরা ত্বহা ২০:১৪)]।









আল-জামি` আল-কামিল (12480)


12480 - عن أبي هريرة قال: كان النبي بارزا يوما للناس، فأتاه جبريل، فقال: ما الإيمان؟ قال:"الإيمان أن تؤمن بالله، وملائكته، وبلقائه، ورسله، وتؤمن بالبعث" قال: ما الإسلام؟ قال:"الإسلام أن تعبد الله ولا تشرك به، وتقيم الصلاة، وتؤدي الزكاة المفروضة، وتصوم رمضان". قال: ما الإحسان؟ قال:"أن تعبد الله كأنك
تراه، فإن لم تكن تراه، فإنه يراك". قال: متى الساعة؟ قال:"ما المسئول عنها بأعلم من السائل، وسأخبرك عن أشراطها إذا ولدت الأمة ربها، وإذا تطاول رعاة الإبل البهم في البنيان، في خمس لا يعلمهن إلا الله". ثم تلا النبي صلى الله عليه وسلم: {إِنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ (34)} الآية. ثم أدبر، فقال:"ردوه". فلم يروا شيئا. فقال:"هذا جبريل، جاء يعلّم الناس دينهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (50)، ومسلم في الإيمان (9) كلاهما من حديث إسماعيل بن إبراهيم بن عُليَّة، أخبرنا أبو حيان التيمي، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكره. ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষের মাঝে উন্মুক্তভাবে বসে ছিলেন। তখন তাঁর কাছে জিবরীল (আঃ) এলেন এবং বললেন: ঈমান কী? তিনি (নবী) বললেন: ঈমান হলো, তুমি আল্লাহ্‌র প্রতি, তাঁর ফেরেশতাগণের প্রতি, তাঁর সাথে সাক্ষাৎ হওয়ার প্রতি, তাঁর রাসূলগণের প্রতি ঈমান আনবে এবং পুনরুত্থানের প্রতিও ঈমান আনবে।

তিনি (জিবরীল) বললেন: ইসলাম কী? তিনি বললেন: ইসলাম হলো, তুমি আল্লাহ্‌র ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না, সালাত প্রতিষ্ঠা করবে, ফরয যাকাত আদায় করবে এবং রমযানের সাওম পালন করবে।

তিনি বললেন: ইহসান কী? তিনি বললেন: (ইহসান হলো) তুমি এমনভাবে আল্লাহ্‌র ইবাদত করবে যেন তুমি তাঁকে দেখছো; যদি তুমি তাঁকে দেখতে না পাও, তবে (মনে রাখবে) তিনি তোমাকে দেখছেন।

তিনি বললেন: কিয়ামত কখন হবে? তিনি বললেন: এই বিষয়ে যাকে জিজ্ঞাসা করা হচ্ছে, তিনি জিজ্ঞাসা কারীর চেয়ে বেশি জানেন না। তবে আমি তোমাকে তার আলামত (নিদর্শন) সম্পর্কে জানাচ্ছি: যখন দাসী তার প্রভুকে জন্ম দেবে, আর যখন কালো উট পালের রাখালরা সুউচ্চ দালান নির্মাণে একে অপরের সাথে প্রতিযোগিতা করবে— সেই পাঁচটি বিষয়ের মধ্যে, যা আল্লাহ ছাড়া অন্য কেউ জানে না।

এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্‌র কাছেই রয়েছে কিয়ামতের জ্ঞান, তিনিই বৃষ্টি বর্ষণ করেন এবং তিনিই জানেন যা গর্ভাশয়ে রয়েছে। আর কেউ জানে না আগামীকাল সে কী অর্জন করবে এবং কেউ জানে না কোন মাটিতে তার মৃত্যু ঘটবে। নিশ্চয় আল্লাহ সর্বজ্ঞ, সর্ববিষয়ে অবহিত।" (সূরা লুকমান, ৩১:৩৪)।

এরপর তিনি (জিবরীল) চলে গেলেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তাকে ফিরিয়ে আনো। কিন্তু তারা কিছুই দেখতে পেল না। তখন তিনি বললেন: ইনি ছিলেন জিবরীল। তিনি তোমাদেরকে তোমাদের দীন শেখানোর জন্য এসেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12481)


12481 - عن سالم بن عبد الله بن عمر يقول: يا أهل العراق! ما أسألكم عن الصغيرة، وأركبكم للكبيرة، سمعت أبي عبد الله بن عمر يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الفتنة تجيء من ها هنا". وأومأ بيده نحو المشرق:"من حيث يطلع قرنا الشيطان". وأنتم يضرب بعضكم رقاب بعض، وإنما قتل موسى الذي قتل من آل فرعون خطأ، فقال الله عز وجل له: {وَقَتَلْتَ نَفْسًا فَنَجَّيْنَاكَ مِنَ الْغَمِّ وَفَتَنَّاكَ فُتُونًا}.

صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (50: 2905) من طرق عن ابن فُضَيل، عن أبيه، قال: سمعت سالم بن عبد الله بن عمر، يقول: فذكره.

وقوله: {وَفَتَنَّاكَ فُتُونًا} أي: أن موسى عليه السلام وقع في محنة بعد محنة خلصه الله منها، فقد حملت به أمه في السنة التي كان فرعون يذبح الأطفال، وألقي في البحر في التابوت، وخاف على نفسه لما قتل القبطي وغيرها من المحن التي وقع فيها موسى عليه السلام، وخرج منها سالما بنصر الله وتوفيقه له.

وأما حديث ابن عباس الطويل الذي ذكره كثير من المفسرين فهو موقوف، وفي متنه غرابة، وأكثره مأخوذ من الإسرائيليات، كما قال الحافظ ابن كثير، وهذا لفظه:

قال سعيد بن جبير:"سألت عبد الله بن عباس عن قول الله عز وجل لموسى عليه السلام:
{وَفَتَنَّاكَ فُتُونًا}، فسألته عن الفتون ما هو؟ قال: استأنف النهار يا ابن جبير! فإن لها حديثا طويلا، فلما أصبحت غدوت على ابن عباس؛ لأنتجز منه ما وعدني من حديث الفتون، فقال: تذاكر فرعون وجلساؤه ما كان الله عز وجل وعد إبراهيم عليه السلام أن يجعل في ذريته أنبياء وملوكا، فقال بعضهم: إن بني إسرائيل ينتظرون ذلك ما يشكون فيه، وكانوا يظنون أنه يوسف بن يعقوب عليهما السلام، فلما هلك قالوا: ليس هكذا كان وعد إبراهيم عليه السلام، فقال فرعون: فكيف ترون؟ فائتمروا وأجمعوا أمرهم على أن يبعث رجالا معهم الشفار يطوفون في بني إسرائيل، فلا يجدون مولودا ذكرا إلا ذبحوه، ففعلوا ذلك، فلما رأوا أن الكبار من بني إسرائيل يموتون بآجالهم، والصغار يذبحون قالوا: توشكون أن تفنوا بني إسرائيل، فتصيروا أن تباشروا من الأعمال والخدمة الذي كانوا يكفونكم، فاقتلوا عاما كل مولود ذكر، فيقل نباتهم، ودعوا عاما، فلا تقتلوا منهم أحدا، فينشأ الصغار مكان من يموت من الكبار، فإنهم لن يكثروا بمن تستحيون منهم، فتخافوا مكاثرتهم إياكم، ولن يفنوا بمن تقتلون، وتحتاجون إليهم، فأجمعوا أمرهم على ذلك.

فحملت أم موسى بهارون في العام الذي لا يذبح فيه الغلمان، فولدته علانية آمنة، فلما كان من قابل حملت بموسى، فوقع في قلبها الهم والحزن، وذلك من الفتون، يا ابن جبير! ما دخل عليه في بطن أمه مما يراد به، فأوحى الله جل ذكره إليها أن {وَلَا تَخَافِي وَلَا تَحْزَنِي إِنَّا رَادُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ الْمُرْسَلِينَ (7)} [سورة القصص: 7]، فأمرها إذا ولدت أن تجعله في تابوت، وتلقيه في اليم، فلما ولدت فعلت ذلك، فلما توارى عنها ابنها أتاها الشيطان، فقالت في نفسها: ما فعلت بابني؟ . لو ذبح عندي، فواريته، وكفنته، كان أحبّ إليّ أن ألقيه إلى دواب البحر وحيتانه، فانتهى الماء به حتى أوفى به عند فرضة مستقى جواري امرأة فرعون، فلما رأينه أخذنه، فهممن أن يفتحن التابوت، فقال بعضهن: إن في هذا مالا، وإنا إن فتحناه لم تصدقنا امرأة الملك بما وجدنا فيه، فحملنه كهيئته لم يخرجن منه شيئا حتى دفعنه إليها، فلما فتحته رأت فيه غلاما، فألقي عليها منه محبة لم يلق منها على أحد قط {وَأَصْبَحَ فُؤَادُ أُمِّ مُوسَى فَارِغًا} [سورة القصص: 10] من ذكر كل شيء إلا من ذكر موسى، فلما سمع الذباحون بأمره أقبلوا بشفارهم إلى امرأة فرعون ليذبحوه، وذلك من الفتون، يا ابن جبير! فقالت لهم: أقروه، فإن هذا الواحد لا يزيد في بني إسرائيل، حتى آتي فرعون، فأستوهبه منه، فإن وهبه لي كنتم قد أحسنتم وأجملتم، وإن أمر بذبحه لم ألمكم، فأتت فرعون، فقالت: {قُرَّتُ عَيْنٍ لِي وَلَكَ} [سورة القصص: 9]، فقال فرعون: يكون لك، فأما لي، فلا حاجة لي، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"والذي يحلف به، لو أقر فرعون أن يكون له قرة عين، كما أقرت امرأته لهداه الله كما هداها، ولكن الله حرمه ذلك".

فأرسلت إلى من حولها إلى كل امرأة لها لبن تختار له ظئرا، فجعل كلما أخذته امرأة منهن لترضعه لم يقبل على ثديها، حتى أشفقت امرأة فرعون أن يمتنع من اللبن، فيموت، فأحزنها ذلك، فأمرت به، فأخرج إلى السوق ومجمع الناس، ترجو أن تجد له ظئرا تأخذه منها، فلم يقبل،
فأصبحت أم موسى والها، فقالت لأخته: قُصّي أثره واطلبيه، هل تسمعين له ذكرا؟ . أحي ابني أم أكلته الدواب؟ . ونسيت ما كان الله وعدها فيه، فبصرت به أخته عن جنب، والجنب: أن يسمو بصر الإنسان إلى الشيء البعيد، وهو إلى ناحية لا يشعر به، فقالت من الفرح حين أعياهم الظؤورات: {هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَى أَهْلِ بَيْتٍ يَكْفُلُونَهُ لَكُمْ وَهُمْ لَهُ نَاصِحُونَ (12)} [سورة القصص: 12]، فأخذوها، فقالوا: ما يدريك ما نصحهم؟ هل تعرفونه؟ حتى شكوا في ذلك، وذلك من الفتون، يا ابن جبير! فقالت: نصيحتهم له، وشفقتهم عليه، رغبتهم في صهر الملك ورجاء منفعة الملك، فأرسلوها، فانطلقت إلى أمها، فأخبرتها الخبر، فجاءت أمه، فلما وضعته في حجرها ثوى إلى ثديها، فمصه حتى امتلأ جنباه ريا، وانطلق البشراء إلى امرأة فرعون يبشرونها أن قد وجدنا لابنك ظئرا، فأرسلت إليها، فأتت بها وبه، فلما رأت ما يصنع قالت: امكثي ترضعي ابني هذا، فإني لم أحب شيئا حبه قط، قالت أم موسى: لا أستطيع أن أدع بيتي وولدي فيضيع، فإن طابت نفسك أن تعطينيه، فأذهب به إلى بيتي، فيكون معي، لا آلوه خيرا فعلت، فإني غير تاركة بيتي وولدي، وذكرت أم موسى ما كان الله وعدها، فتعاسرت على امرأة فرعون، وأيقنت أن الله منجز موعوده، فرجعت إلى بيتها من يومها، فأنبته الله نباتا حسنا، وحفظ لما قد قضى فيه، فلم يزل بنو إسرائيل وهم في ناحية القرية ممتنعين من السخرة والظلم ما كان فيهم.

فلما ترعرع قالت امرأة فرعون لأم موسى: أزيريني ابني، فوعدتها يوما تزيرها إياه فيه، وقالت امرأة فرعون لخازنها وقهارمتها: لا يبقين أحد منكم إلا استقبل ابني اليوم بهدية وكرامة، لأرى ذلك فيه، وأنا باعثة أمينا يحصي كل ما يصنع كل إنسان منكم، فلم تزل الهدايا والكرامة والنحل تستقبله من حين خرج من بيت أمه إلى أن دخل على امرأة فرعون، فلما دخل عليها نحلته وأكرمته، وفرحت به، ونحلت أمه بحسن أثرها عليه، ثم قالت: لآتين فرعون فلينحلنه وليكرمنه، فلما دخلت به عليه جعله في حجره، فتناول موسى لحية فرعون، فمدها إلى الأرض، قال الغواة من أعداء الله لفرعون: ألا ترى ما وعد الله إبراهيم نبيه، إنه زعم أن يربك ويعلوك ويصرعك؟ . فأرسل إلى الذباحين ليذبحوه، وذلك من الفتون، يا ابن جبير! بعد كل بلاء ابتلي به وأريد به فتونا، فجاءت امرأة فرعون تسعى إلى فرعون، فقالت: ما بدا لك في هذا الغلام الذي وهبته لي؟ . فقال: ألا ترينه، إنه يزعم سيصرعني ويعلوني، قالت: اجعل بيني وبينك أمرا يعرف فيه الحق، ائت بجمرتين ولؤلؤتين، فقرّبهن إليه، فإن بطش باللؤلؤ واجتنب الجمرتين عرفت أنه يعقل، وإن تناول الجمرتين، ولم يرد اللؤلؤتين علمت أن أحدا لا يؤثر الجمرتين على اللؤلؤتين، وهو يعقل، فقرّب ذلك إليه، فتناول الجمرتين، فنزعوهما منه مخافة أن يحرقا يديه، فقالت المرأة: ألا ترى؟ . فصرفه الله عنه بعد ما كان قد همّ به، وكان الله بالغا فيه أمره.

فلما بلغ أشده، وكان من الرجال لم يكن أحد من آل فرعون يخلص إلى أحد من بني إسرائيل معه بظلم ولا سخرة، حتى امتنعوا كل الامتناع، فبينما موسى عليه السلام يمشي في ناحية المدينة،
إذا هو برجلين يقتتلان، أحدهما فرعوني والآخر إسرائيلي، فاستغاثه الإسرائيلي على الفرعوني، فغضب موسى عليه السلام غضبا شديدا؛ لأنه تناوله، وهو يعلم منزله من بني إسرائيل، وحفظه لهم، لا يعلم الناس إلا أنما ذلك من الرضاع إلا أم موسى، إلا أن يكون الله سبحانه أطلع موسى عليه السلام من ذلك على ما لم يطلع عليه غيره، ووكز موسى الفرعوني، فقتله، وليس يراهما أحد إلا الله عز وجل والإسرائيلي، فقال موسى حين قتل الرجل: {هَذَا مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ إِنَّهُ عَدُوٌّ مُضِلٌّ مُبِينٌ (15)} [سورة القصص: 15]، ثم قال: {رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَغَفَرَ لَهُ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ (16)} [سورة القصص: 16]، فأصبح في المدينة خائفا يترقب الأخبار، فأتي فرعون فقيل له: إن بني إسرائيل قتلوا رجلا من آل فرعون، فخذ لنا بحقك، ولا ترخص لهم، فقال: ابغوني قاتله من شهد عليه، فإن الملك وإن كان صفوه مع قومه لا يستقيم له أن يقيد بغير بينة ولا ثبت، فاطلبوا لي علم ذلك آخذ لكم بحقكم، فبينما هم يطوفون لا يجدون ثبتا، إذا موسى من الغد قد رأى ذلك الإسرائيلي يقاتل رجلا من آل فرعون آخر، فاستغاثه الإسرائيلي على الفرعوني، فصادف موسى قد ندم على ما كان منه، وكره الذي رأى، فغضب الإسرائيلي، وهو يريد أن يبطش بالفرعوني، فقال للإسرائيلي لما فعل أمس واليوم: {إِنَّكَ لَغَوِيٌّ مُبِينٌ (18)} [سورة القصص: 18]، فنظر الإسرائيلي إلى موسى عليه السلام، بعدما قال له ما قال، فإذ هو غضبان كغضبه بالأمس الذي قتل فيه الفرعوني، فخاف أن يكون بعدما قال له: {إِنَّكَ لَغَوِيٌّ مُبِينٌ (18)} أن يكون إياه أراد، ولم يكن أراده، وإنما أراد الفرعوني، فخاف الإسرائيلي، وقال: {يَامُوسَى أَتُرِيدُ أَنْ تَقْتُلَنِي كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًا بِالْأَمْسِ} وإنما قال له مخافة أن يكون إياه أراد موسى ليقتله، فتتاركا، وانطلق الفرعوني، فأخبرهم بما سمع من الإسرائيلي من الخبر حين يقول: {يَامُوسَى أَتُرِيدُ أَنْ تَقْتُلَنِي كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًا بِالْأَمْسِ} [سورة القصص: 19]، فأرسل فرعون الذباحين؛ ليقتلوا موسى، فأخذ رسل فرعون الطريق الأعظم يمشون على هيئتهم يطلبون موسى، وهم لا يخافون أن يفوتهم، فجاء رجل من شيعة موسى من أقصى المدينة، فاختصر طريقا حتى سبقهم إلى موسى، فأخبره الخبر، وذلك من الفتون، يا ابن جبير؟ .

فخرج موسى متوجها نحو مدين لم يلق بلاء قبل ذلك، وليس له علم إلا حسن ظنه بربه تعالى، فإنه قال: {عَسَى رَبِّي أَنْ يَهْدِيَنِي سَوَاءَ السَّبِيلِ (22) وَلَمَّا وَرَدَ مَاءَ مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةً مِنَ النَّاسِ يَسْقُونَ وَوَجَدَ مِنْ دُونِهِمُ امْرَأَتَيْنِ تَذُودَانِ} [سورة القصص: 22، 23]، يعني بذلك حابستين عنهما، فقال لهما: ما خطبكما معتزلتين لا تسقيان مع الناس؟ . فقالتا: ليس لنا قوة نزاحم القوم، وإنما ننتظر فضول حياضهم، فسقى لهما، فجعل يغترف في الدلو ماء كثيرا، حتى كان أول الرعاء، وانصرفتا بغنمهما إلى أبيهما، وانصرف موسى عليه السلام، فاستظل بشجرة، وقال: {رَبِّ إِنِّي لِمَا أَنْزَلْتَ إِلَيَّ مِنْ خَيْرٍ فَقِيرٌ (24)} [سورة القصص: 24]، واستنكر أبوهما سرعة صدورهما بغنمهما حفلا بطانا، فقال: إن لكما اليوم لشأنا، فأخبرتاه بما صنع موسى، فأمر إحداهما أن تدعوه، فأتت موسى فدعته، فلما كلمه، {قَالَ لَا تَخَفْ نَجَوْتَ مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (25)} [سورة القصص: 25]، ليس
لفرعون ولا لقومه علينا سلطان، ولسنا في مملكته، فقالت إحداهما: {يَاأَبَتِ اسْتَأْجِرْهُ إِنَّ خَيْرَ مَنِ اسْتَأْجَرْتَ الْقَوِيُّ الْأَمِينُ (26)} [سورة القصص: 26] فاحتملته الغيرة على أن قال لها: ما يدريك؟ ما قوته وما أمانته؟ قالت: أما قوته، فما رأيت منه في الدلو حين سقى لنا لم أر رجلا قط أقوى في ذلك السقي منه، وأما الأمانة فإنه نظر إلي حين أقبلت إليه، وشخصت له، فلما علم أني امرأة صوب رأسه فلم يرفعه حتى بلغته رسالتك، ثم قال لي: امشي خلفي، وانعتي لي الطريق، فلم يفعل هذا الأمر إلا وهو أمين، فسري عن أبيها وصدّقها، وظن به الذي قالت، فقال له: هل لك {أَنْ أُنْكِحَكَ إِحْدَى ابْنَتَيَّ هَاتَيْنِ عَلَى أَنْ تَأْجُرَنِي ثَمَانِيَ حِجَجٍ فَإِنْ أَتْمَمْتَ عَشْرًا فَمِنْ عِنْدِكَ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أَشُقَّ عَلَيْكَ سَتَجِدُنِي إِنْ شَاءَ اللَّهُ مِنَ الصَّالِحِينَ} [سورة القصص: 27]، ففعل، فكانت على نبي الله موسى ثماني سنين واجبة، وكانت سنتان عدة منه، فقضى الله عنه عدته، فأتمها عشرا.

قال سعيد: فلقيني رجل من أهل النصرانية من علمائهم، قال: هل تدري أي الأجلين قضى موسى؟ قلت: لا، وأنا يومئذ لا أدري، فلقيت ابن عباس، فذكرت ذلك له، فقال: أما علمت أن ثمانيا كانت على نبي الله واجبة، لم يكن نبي الله صلى الله عليه وسلم لينقص منها شيئا، وتعلم أن الله كان قاضيا عن موسى عدته التي وعده، فإنه قضى عشر سنين، فلقيت النصراني، فأخبرته ذلك، فقال: الذي سألته، فأخبرك أعلم منك بذلك، قلت: أجل وأولى.

فلما سار موسى بأهله كان من أمر الناس والعصا ويده ما قص الله عليك في القرآن، فشكا إلى الله سبحانه ما يتخوف من آل فرعون في القتيل، وعقدة لسانه، فإنه كان في لسانه عقدة تمنعه من كثير الكلام، وسأل ربه أن يعينه بأخيه هارون، يكون له ردءا، ويتكلم عنه بكثير مما لا يفصح به لسانه، فآتاه الله سؤله وحل عقدة من لسانه، وأوحى الله إلى هارون وأمره أن يلقاه، فاندفع موسى بعصاه حتى لقي هارون عليه السلام، فانطلقا جميعا إلى فرعون، فأقاما على بابه حينا لا يؤذن لهما، ثم أذن لهما بعد حجاب شديد، فقالا: {إِنَّا رَسُولَا رَبِّكَ} [سورة طه: 47]، قال: فمن ربكما؟ فأخبراه بالذي قص الله عليك في القرآن، قال: فما تريدان؟ . وذكره القتيل، فاعتذر بما قد سمعت قال: أريد أن تؤمن بالله وترسل معي بني إسرائيل، فأبى عليه، وقال: ائت بآية إن كنت من الصادقين، فألقى عصاه، فإذا هي حية عظيمة، فاغرة فاها، مسرعة إلى فرعون، فلما رآها فرعون قاصدة إليه خافها، فاقتحم عن سريره، واستغاث بموسى أن يكفها عنه، ففعل، ثم أخرج يده من جيبه، فرآها بيضاء من غير سوء، يعني من غير برص، ثم ردها، فعادت إلى لونها الأول، فاستشار الملأ حوله فيما رأى، فقالوا له: هذان ساحران يريدان أن يخرجاكم من أرضكم بسحرهما ويذهبا بطريقتكم المثلى يعني ملكهم الذي هم فيه والعيش، فأبوا على موسى أن يعطوه شيئا مما طلب، وقالوا له: اجمع لهما السحرة، فإنهم بأرضك كثير حتى يغلب سحرك سحرهما، فأرسل في المدائن، فحشر له كل ساحر متعالم، فلما أتوا فرعون قالوا: بم يعمل هذا الساحر؟ قالوا: يعمل بالحيات، قالوا: فلا، والله ما أحد في الأرض يعمل بالسحر بالحيات والحبال والعصي الذي
نعمل، وما أجرنا إن نحن غلبنا؟ . قال لهم: أنتم أقاربي وخاصتي، وأنا صانع إليكم كل شيء أحببتم، فتواعدوا يوم الزينة، أن يحشر الناس ضحى، قال سعيد: فحدثني ابن عباس أن يوم الزينة اليوم الذي أظهر الله فيه موسى على فرعون والسحرة، هو يوم عاشوراء.

فلما اجتمعوا في صعيد، قال الناس بعضهم لبعض: انطلقوا، فلنحضر هذا الأمر، لعلنا نتبع السحرة إن كانوا هم الغالبين، يعنون موسى وهارون، استهزاء بهما، فقالوا: يا موسى، - لقدرتهم بسحرهم -: {إِمَّا أَنْ تُلْقِيَ وَإِمَّا أَنْ نَكُونَ نَحْنُ الْمُلْقِينَ (115)} [سورة الأعراف: 115]، {قَالَ بَلْ أَلْقُوا} [سورة طه: 66]، {فَأَلْقَوْا حِبَالَهُمْ وَعِصِيَّهُمْ وَقَالُوا بِعِزَّةِ فِرْعَوْنَ إِنَّا لَنَحْنُ الْغَالِبُونَ (44)} [الشعراء: 44]، فرأى موسى من سحرهم ما أوجس في نفسه خيفة، فأوحى الله إليه: أن ألقِ عصاك، فلما ألقاها صارت ثعبانا عظيما، فاغرة فاها، فجعلت العصا تلبس بالحبال حتى صارت جرزا على الثعبان تدخل فيه، حتى ما أبقت عصا ولا حبلا إلا ابتلعته، فلما عرف السحرة ذلك قالوا: لو كان هذا سحرا لم يبلغ من سحرنا كل هذا، ولكنه أمر من الله، آمنا بالله وبما جاء به موسى، ونتوب إلى الله مما كنا عليه، فكسر الله ظهر فرعون في ذلك الموطن وأتباعه، وظهر الحق {فَوَقَعَ الْحَقُّ وَبَطَلَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (118) فَغُلِبُوا هُنَالِكَ وَانْقَلَبُوا صَاغِرِينَ (119)} [سورة الأعراف: 118، 119]، وامرأة فرعون بارزة تدعو الله بالنصر لموسى على فرعون وأشياعه، فمن رآها من آل فرعون ظن أنها إنما ابتذلت للشفقة على فرعون وأشياعه، وإنما كان حزنها وهمها لموسى.

فلما طال مكث موسى بمواعد فرعون الكاذبة، كلما جاءه بآية، وعده عندها أن يرسل معه بني إسرائيل، فإذا مضت أخلف موعده، وقال: هل يستطيع ربك أن يصنع غير هذا؟ . فأرسل الله عز وجل على قومه {الطُّوفَانَ وَالْجَرَادَ وَالْقُمَّلَ وَالضَّفَادِعَ وَالدَّمَ آيَاتٍ مُفَصَّلَاتٍ} [سورة الأعراف: 133] كل ذلك يشكو إلى موسى، ويطلب إليه أن يكفها عنه، ويوافقه على أن يرسل معه بني إسرائيل، فإذا كف ذلك عنه أخلف موعده، ونكث عهده، حتى أمر موسى بالخروج بقومه، فخرج بهم ليلا.

فلما أصبح فرعون، فرأى أنهم قد مضوا أرسل في المدائن حاشرين، فتبعه بجنود عظيمة كثيرة، وأوحى الله تعالى إلى البحر: إذا ضربك عبدي موسى بعصاه، فانفرق اثنتي عشرة فرقة حتى يجاوز موسى ومن معه، ثم التق على من بقي بعد من فرعون وأشياعه، فنسي موسى أن يضرب البحر بالعصا، فانتهى إلى البحر، وله قصيف مخافة أن يضربه موسى بعصاه، وهو غافل فيصير عاصيا لله، فلما تراءى الجمعان تقاربا، قال قوم موسى: {إِنَّا لَمُدْرَكُونَ (61)} [سورة الشعراء: 61]، افعل ما أمرك به ربك، فإنه لم يكذب، ولم تكذب، قال: وعدني ربي إذا أتيت البحر انفرق اثنتي عشرة فرقة حتى أجاوزه، ثم ذكر بعد ذلك العصا، فضرب البحر بعصاه حين دنا أوائل جند فرعون من أواخر جند موسى، فانفرق البحر كما أمره ربه، وكما وعد موسى، فلما أن جاز موسى وأصحابه كلهم البحر، ودخل فرعون وأصحابه، التقى عليهم البحر كما أمر، فلما جاوز موسى البحر قال أصحابه: إنا نخاف ألا يكون فرعون غرق، ولا نؤمن بهلاكه، فدعا ربه، فأخرجه له ببدنه حتى
استيقنوا هلاكه.

ثم مروا بعد ذلك {عَلَى قَوْمٍ يَعْكُفُونَ عَلَى أَصْنَامٍ لَهُمْ قَالُوا يَامُوسَى اجْعَلْ لَنَا إِلَهًا كَمَا لَهُمْ آلِهَةٌ قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ (138) إِنَّ هَؤُلَاءِ مُتَبَّرٌ مَا هُمْ فِيهِ وَبَاطِلٌ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (139)} [سورة الأعراف: 138، 139]، قد رأيتم من العبر، وسمعتم ما يكفيكم، ومضى، فأنزلهم موسى منزلا، وقال لهم: أطيعوا هارون، فإني قد استخلفته عليكم، فإني ذاهب إلى ربي، وأجلهم ثلاثين يوما أن يرجع إليهم فيها.

فلما أتى ربه أراد أن يكلمه في ثلاثين يوما، وقد صامهن ليلهن ونهارهن، وكره أن يكلم ربه، وريح فيه ريح فم الصائم، فتناول موسى من نبات الأرض شيئا، فمضغه، فقال له ربه حين أتاه: لم أفطرت؟ . وهو أعلم بالذي كان، قال: يا رب، إني كرهت أن أكلمك إلا وفمي طيب الريح، قال: أوما علمت يا موسى، أن ريح فم الصائم أطيب من ريح المسك؟ . ارجع، فصم عشرا، ثم ائتني، ففعل موسى عليه السلام ما أمره به، فلما رأى قوم موسى أنه لم يرجع إليهم في الأجل ساءهم ذلك، وكان هارون قد خطبهم، وقال: إنكم خرجتم من مصر، ولقوم فرعون عندكم عواري وودائع، ولكم فيهم مثل ذلك، وأنا أرى أن تحتسبوا ما لكم عندهم، ولا أحل لكم وديعة استودعتموها ولا عارية، ولسنا برادين إليهم شيئا من ذلك، ولا ممسكيه لأنفسنا، فحفر حفيرا، وأمر كل قوم عندهم من ذلك من متاع أو حلية أن يقذفوه في ذلك الحفير، ثم أوقد عليه النار، فأخرجه، فقال: لا يكون لنا ولا لهم.

وكان السامري من قوم يعبدون البقر، جيران لبني إسرائيل، ولم يكن من بني إسرائيل، فاحتمل مع موسى وبني إسرائيل حين احتملوا، فقضي له أن رأى أثرا، فأخذ منه قبضة، فمر بهارون، فقال له هارون عليه السلام: يا سامري، ألا تلقي ما في يدك؟ وهو قابض عليه لا يراه أحد طوال ذلك، فقال: هذه قبضة من أثر الرسول الذي جاوز بكم البحر، فلا ألقيها بشيء إلا أن تدعو الله إذا ألقيت أن يكون ما أريد، فألقاها ودعا له هارون، فقال: أريد أن تكون عجلا، فاجتمع ما كان في الحفرة من متاع أو حلية أو نحاس أو حديد، فصار عجلا أجوف ليس فيه روح له خوار، قال ابن عباس: لا والله، ما كان له صوت قط، إنما كانت الريح تدخل من دبره، وتخرج من فيه، فكان ذلك الصوت من ذلك.

فتفرق بنو إسرائيل فرقا، فقالت فرقة: يا سامري، ما هذا وأنت أعلم به؟ قال: هذا ربكم، ولكن موسى أضل الطريق، فقالت فرقة: لا نكذب بهذا حتى يرجع إلينا موسى، فإن كان ربنا لم نكن ضيعناه، وعجزنا فيه حين رأينا، وإن لم يكن ربنا، فإنا نتبع قول موسى، وقالت فرقة: هذا عمل الشيطان، وليس بربنا، ولن نؤمن به ولا نصدق، وأشرب فرقة في قلوبهم الصدق بما قال السامري في العجل، وأعلنوا التكذيب به، فقال لهم هارون: {يَاقَوْمِ إِنَّمَا فُتِنْتُمْ بِهِ وَإِنَّ رَبَّكُمُ الرَّحْمَنُ} [طه: 90] قالوا: فما بال موسى، وعدنا ثلاثين يوما، ثم أخلفنا؟ . هذه أربعون قد مضت، فقال سفهاؤهم: أخطأ ربه، فهو يطلبه ويتبعه، فلما كلم الله موسى عليه السلام، وقال له ما قال، أخبره بما لقي قومه من بعده، {فَرَجَعَ مُوسَى إِلَى قَوْمِهِ غَضْبَانَ أَسِفًا} [طه: 86] فرجع موسى إلى قومه
غضبان أسفا، قال لهم ما سمعتم في القرآن، وأخذ برأس أخيه يجرّه إليه، وألقى الألواح من الغضب، ثم إنه عذر أخاه بعذره واستغفر له، فانصرف إلى السامري، فقال له: ما حملك على ما صنعت؟ قال: قبضت قبضة من أثر الرسول، وفطنت إليها، وعميت عليكم، فقذفتها {وَكَذَلِكَ سَوَّلَتْ لِي نَفْسِي (96) قَالَ فَاذْهَبْ فَإِنَّ لَكَ فِي الْحَيَاةِ أَنْ تَقُولَ لَا مِسَاسَ وَإِنَّ لَكَ مَوْعِدًا لَنْ تُخْلَفَهُ وَانْظُرْ إِلَى إِلَهِكَ الَّذِي ظَلْتَ عَلَيْهِ عَاكِفًا لَنُحَرِّقَنَّهُ ثُمَّ لَنَنْسِفَنَّهُ فِي الْيَمِّ نَسْفًا (97)} [سورة طه: 96، 97]، ولو كان إلها لم نخلص إلى ذلك منه.

فاستيقن بنو إسرائيل بالفتنة، واغتبط الذين كان رأيهم فيه مثل رأي هارون، فقالوا لجماعتهم: يا موسى، سل لنا ربك أن يفتح لنا باب توبة نصنعها، فيكفر عنا ما عملنا، فاختار موسى قومه سبعين رجلا لذلك، لا يألوا الخير، خيار بني إسرائيل ومن لم يشرك في العجل، فانطلق بهم يسأل لهم التوبة، فرجفت بهم الأرض، واستحيا نبي الله صلى الله عليه وسلم من قومه ومن وفده حين فعل بهم ما فعل، فقال: {لَوْ شِئْتَ أَهْلَكْتَهُمْ مِنْ قَبْلُ وَإِيَّايَ أَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ السُّفَهَاءُ مِنَّا} [سورة الأعراف: 155]، وفيهم من كان الله اطلع منه على ما أشرب قلبه من حب العجل وإيمان به، فلذلك رجفت بهم الأرض، فقال: {وَرَحْمَتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍ فَسَأَكْتُبُهَا لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَالَّذِينَ هُمْ بِآيَاتِنَا يُؤْمِنُونَ (156) الَّذِينَ يَتَّبِعُونَ الرَّسُولَ النَّبِيَّ الْأُمِّيَّ الَّذِي يَجِدُونَهُ مَكْتُوبًا عِنْدَهُمْ فِي التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ} [سورة الأعراف: 156، 157]، فقال: يا رب، سألتك التوبة لقومي، فقلت: إن رحمتي كتبتها لقوم غير قومي، فليتك أخرتني حتى تخرجني في أمة ذلك الرجل المرحومة، فقال له: إن توبتهم أن يقتل كل رجل منهم كل من لقي من والد وولد، فيقتله بالسيف لا يبالي من قتل في ذلك الموطن، ويأتي أولئك الذين كان خفي على موسى وهارون، واطلع الله من ذنوبهم، فاعترفوا بها، وفعلوا ما أمروا، وغفر الله للقاتل والمقتول.

ثم سار بهم موسى صلى الله عليه وسلم متوجها نحو الأرض المقدسة، وأخذ الألواح بعدما سكت عنه الغضب، فأمرهم بالذي أمر به أن يبلغهم من الوظائف، فثقل ذلك عليهم، وأبوا أن يقروا بها، فنتق الله عليهم الجبل كأنه ظلة، ودنا منهم حتى خافوا أن يقع عليهم، فأخذوا الكتاب بأيمانهم، وهم مصطفون ينظرون إلى الجبل والكتاب بأيديهم، وهم من وراء الجبل مخافة أن يقع عليهم، ثم مضوا حتى أتوا الأرض المقدسة، فوجدوا مدينة فيها قوم جبارون، خلقهم خلق منكر، وذكر من ثمارهم أمرا عجيبا من عظمها، فقالوا: {قَالُوا يَامُوسَى إِنَّ فِيهَا قَوْمًا جَبَّارِينَ} لا طاقة لنا بهم، ولا ندخلها ما داموا فيها، {فَإِنْ يَخْرُجُوا مِنْهَا فَإِنَّا دَاخِلُونَ (22) قَالَ رَجُلَانِ مِنَ الَّذِينَ يَخَافُونَ} [سورة المائدة: 22، 23]، قيل ليزيد: هكذا قرأه؟ . قال: نعم، من الجبارين: آمنا بموسى وخرجا إليه، فقالوا: نحن أعلم بقومنا، إن كنتم إنما تخافون ما رأيتم من أجسامهم وعددهم، فإنهم لا قلوب لهم، ولا منعة عندهم، فادخلوا عليهم الباب، فإذا دخلتموه فإنكم غالبون، ويقول أناس: إنهما من قوم موسى، فقال الذين يخافون بنو إسرائيل: {قَالُوا يَامُوسَى إِنَّا لَنْ نَدْخُلَهَا أَبَدًا مَا دَامُوا فِيهَا فَاذْهَبْ أَنْتَ
وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ (24)} [سورة المائدة: 24]، فأغضبوا موسى عليه السلام، فدعا عليهم وسماهم فاسقين، ولم يدع عليهم قبل ذلك، لما رأى منهم من المعصية وإساءتهم، حتى كان يومئذ، فاستجاب الله تعالى له، وسماهم كما سماهم موسى: فاسقين، فحرمها عليهم أربعين سنة يتيهون في الأرض، يصبحون كل يوم، فيسيرون ليس لهم قرار، ثم ظلل عليهم الغمام في التيه، وأنزل عليهم المن والسلوى، وجعل لهم ثيابا لا تبلي ولا تتسخ، وجعل بين أظهرهم حجرا مربعا، وأمر موسى، فضربه بعصاه، فانفجرت منه اثنتا عشرة عينا، في كل ناحية ثلاثة أعين، وأعلم كل سبط عينهم التي يشربون منها، فلا يرتحلون من منقلة، إلا وجدوا ذلك الحجر بالمكان الذي كان فيه بالأمس.

رفع ابن عباس هذا الحديث إلى النبي صلى الله عليه وسلم، وصدق ذلك عندي أن معاوية سمع ابن عباس حدث هذا الحديث، فأنكر عليه أن يكون الفرعوني الذي أفشى على موسى أمر القتيل الذي قتل، فقال: كيف يفشي عليه ولم يكن علم به ولا ظهر عليه إلا الإسرائيلي الذي حضر ذلك؟ . فغضب ابن عباس، فأخذ بيد معاوية، فانطلق به إلى سعد بن مالك الزهري، فقال له: يا أبا إسحاق، هل تذكر يوما حدثنا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم عن قتيل موسى الذي قتل من آل فرعون؟ آلإسرائيلي أفشى عليه أم الفرعوني؟ قال: إنما أفشى عليه الفرعوني ما سمع من الإسرائيلي شهد على ذلك وحضره.

رواه النسائي في الكبرى (11263)، وأبو يعلى (2618)، وابن جرير في تفسيره (16/ 64 - 69)، والطحاوي في شرح المشكل (66) مختصرا - كلهم من طرق عن يزيد بن هارون، أنا أصبغ بن زيد، أنا القاسم بن أبي أيوب، حدثنا سعيد بن جبير قال: سألت عبد الله بن عباس، فذكره.

وقال الهيثمي في"المجمع" (7/ 56):"رواه أبو يعلى، ورجاله رجال الصحيح، غير أصبغ بن زيد، والقاسم بن أبي أيوب، وهما ثقتان".

قلت: ولكن المتن فيه نكارة، ولعل ابن عباس أخذ بعضه عن النبي صلى الله عليه وسلم، والبعض الآخر عن كعب الأحبار وغيره، وإليه يشير كلام الحافظ ابن كثير في البداية والنهاية (2/ 196):

"الأشبه والله أعلم أنه موقوف، وكونه مرفوعا فيه نظر. وغالبه متلقى من الإسرائيليات. وفيه شيء يسير مصرح برفعه في أثناء الكلام. وفي بعض ما فيه نظر ونكارة، والأغلب أنه من كلام كعب الأحبار، وقد سمعت شيخنا الحافظ أبا الحجاج المزي يقول ذلك أيضا، والله أعلم" اهـ.




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর পুত্র সালেম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমর বলেন: "হে ইরাকবাসী! তোমরা ছোটখাটো বিষয়ে কতো কম জিজ্ঞাসা করো, আর কতো বেশি বড় বড় পাপ কাজ করো! আমি আমার পিতা আব্দুল্লাহ ইবনু উমরকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: 'নিশ্চয়ই ফিতনা এদিক থেকে আসবে।'" আর তিনি তাঁর হাত দিয়ে পূর্ব দিকে ইশারা করলেন: "যেখান থেকে শয়তানের দু'টি শিং উদিত হয়। আর তোমরা একে অপরের ঘাড় কাটছো। অথচ মূসা (আঃ) ফেরাউনের গোত্রের যে লোকটিকে হত্যা করেছিলেন, তা ভুলবশতই ছিল। এরপর আল্লাহ তা‘আলা তাঁকে বলেন: {আর তুমি এক ব্যক্তিকে হত্যা করেছিলে, ফলে আমরা তোমাকে দুশ্চিন্তা থেকে মুক্তি দিয়েছিলাম এবং বিভিন্ন পরীক্ষার মাধ্যমে তোমাকে পরীক্ষা করেছিলাম।}" [সূরা ত্ব-হা: ৪০]

[এটি সহীহ: মুসলিম এটিকে ফিতান অধ্যায়ে (৫0: ২৯০৫) বর্ণনা করেছেন। আর এরপরে মুসা (আঃ)-এর পরীক্ষা সংক্রান্ত ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দীর্ঘ বর্ণনাটি মাওকুফ (সাহাবীর উক্তি)। এটি নিম্নরূপ:]

সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আল্লাহর বাণী: {وَفَتَنَّاكَ فُتُونًا} [আর আমরা তোমাকে বিভিন্ন পরীক্ষার মাধ্যমে পরীক্ষা করেছিলাম] সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। আমি তাঁকে 'ফুতূন' (পরীক্ষা) কী সে সম্পর্কে জানতে চাইলে তিনি বললেন: "হে ইবনু জুবাইর! দিনের শুরু থেকে নতুন করে শুরু করো, কারণ এর একটি দীর্ঘ কাহিনী রয়েছে।" পরদিন সকালে আমি ইবনু আব্বাসের কাছে গেলাম আমার কাছে 'ফুতূন'-এর যে প্রতিশ্রুতি তিনি দিয়েছিলেন, তা জানার জন্য। তিনি বললেন:

ফেরাউন ও তার পারিষদবর্গ আলোচনা করছিল যে, আল্লাহ তা‘আলা ইব্রাহীম (আঃ)-কে ওয়াদা করেছিলেন যে, তিনি তাঁর বংশধরের মধ্যে নবী ও রাজা সৃষ্টি করবেন। তাদের কেউ কেউ বলল: বনী ইসরাঈলরা এ অপেক্ষাতেই আছে, তারা এতে কোনো সন্দেহ করে না। তারা মনে করত যে, সম্ভবত ইউসুফ ইবনু ইয়া‘কূব (আঃ)ই সেই ব্যক্তি। ইউসুফ (আঃ) মারা গেলে তারা বলল: ইব্রাহীম (আঃ)-কে দেওয়া ওয়াদা এমন ছিল না। তখন ফেরাউন বলল: তোমরা কী মনে করো? তারা পরামর্শ করে স্থির করল যে, তারা বনী ইসরাঈলের মধ্যে লোক পাঠাবে, যাদের কাছে থাকবে ছুরি। তারা বনী ইসরাঈলের নবজাতক পুত্রসন্তানদের যেখানেই পাবে, সেখানেই হত্যা করবে।

তারা এটাই করতে লাগল। যখন তারা দেখল যে বনী ইসরাঈলের বয়স্করা তাদের স্বাভাবিক আয়ুষ্কালে মারা যাচ্ছে এবং ছোটদের হত্যা করা হচ্ছে, তখন তারা বলল: তোমরা শীঘ্রই বনী ইসরাঈলকে শেষ করে দেবে, তখন তোমাদেরকেই ঐ সব কাজ ও খেদমত করতে হবে যা তারা তোমাদের পক্ষ থেকে আঞ্জাম দিত। সুতরাং এক বছর সব নবজাতক পুত্রসন্তানকে হত্যা করো, যাতে তাদের বংশবৃদ্ধি কমে যায়, আর এক বছর ছেড়ে দাও, যাতে বয়স্কদের মৃত্যুর পর শিশুরা তাদের স্থান নিতে পারে। কারণ যাদের তোমরা জীবিত রাখবে, তাদের দ্বারা তাদের সংখ্যা এতো বাড়বে না যে তোমরা তাদের আধিক্যের কারণে ভয় পাবে। আবার যাদের হত্যা করবে, তাদের দ্বারা তারা একেবারে শেষও হয়ে যাবে না যে তোমাদের তাদের প্রয়োজন হবে। এ বিষয়ে তারা একমত হলো।

মূসার জননী হারূণকে সেই বছর গর্ভে ধারণ করলেন যখন ছেলেদেরকে হত্যা করা হতো না। তাই তিনি প্রকাশ্যে নির্ভয়ে তাঁকে প্রসব করলেন। পরবর্তী বছর যখন তিনি মূসাকে গর্ভে ধারণ করলেন, তখন তাঁর মনে ভয় ও চিন্তা সৃষ্টি হলো। হে ইবনু জুবাইর! মূসার মায়ের পেটে থাকা অবস্থায় যা ইচ্ছা করা হয়েছিল, সেটাই প্রথম পরীক্ষা (ফুতূন)। তখন আল্লাহ তা‘আলা তাঁর প্রতি অহী করলেন: {তুমি ভয় করো না এবং দুঃখও করো না। আমরা অবশ্যই তাকে তোমার কাছে ফিরিয়ে দেব এবং তাকে রাসূলদের অন্তর্ভুক্ত করব।} [সূরা কাসাস: ৭] অতঃপর তিনি যখন জন্ম দিলেন, তখন তাঁকে একটি সিন্দুকে রেখে নীল নদে ফেলে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন। তিনি তাই করলেন।

যখন তাঁর পুত্র তাঁর দৃষ্টির আড়াল হয়ে গেল, তখন শয়তান তাঁর কাছে এলো। তিনি মনে মনে বললেন: আমি আমার ছেলের সাথে কী করলাম! যদি সে আমার কাছে যবেহ হতো, তবে আমি তাকে দাফন ও কাফন দিতে পারতাম, কিন্তু তাকে সমুদ্রের জন্তু ও হাঙরের মুখে ছেড়ে দেওয়ার চেয়ে সেটাই আমার কাছে শ্রেয় ছিল। এরপর সেই সিন্দুকটি ভাসতে ভাসতে ফেরাউনের স্ত্রীর দাসীদের পানি তোলার ঘাটে এসে থামল। তারা সিন্দুকটি দেখে তা তুলে নিল। তারা সিন্দুকটি খোলার ইচ্ছা করল। তাদের কেউ কেউ বলল: এর মধ্যে নিশ্চয়ই ধন-সম্পদ আছে। যদি আমরা তা খুলি, তবে এতে যা পাবো, তা রাজপত্নীর কাছে সত্য বলে জানালে তিনি হয়তো বিশ্বাস করবেন না। তাই তারা সেটা ঐভাবেই রাখল এবং কোনো কিছু বের না করেই ফেরাউনের স্ত্রীর হাতে তুলে দিল। যখন তিনি সিন্দুকটি খুললেন, তখন একটি শিশু দেখতে পেলেন। তাঁর মনে সেই শিশুর প্রতি এমন মহব্বত সৃষ্টি হলো, যা কারো প্রতি হয়নি। {আর মূসার জননীর অন্তর অন্য সব কিছু থেকে খালি হয়ে গেল।} [সূরা কাসাস: ১০] মূসার চিন্তা ছাড়া আর কিছুই তাতে রইল না।

যখন ঘাতকরা শিশুর খবর জানতে পারল, তখন তারা তাঁকে হত্যা করার জন্য নিজেদের ছুরি নিয়ে ফেরাউনের স্ত্রীর কাছে ছুটে এলো। হে ইবনু জুবাইর! এটাও ছিল পরীক্ষার অংশ। তিনি তাদেরকে বললেন: তোমরা ওকে ছেড়ে দাও। বনী ইসরাঈলের সংখ্যায় এই একটি ছেলে বাড়লে কিছু আসে যায় না। আমি ফেরাউনের কাছে গিয়ে তার থেকে ওকে চেয়ে নেব। যদি সে আমাকে দান করে, তবে তোমরা ভালো ও উত্তম কাজ করলে। আর যদি সে তাকে হত্যার নির্দেশ দেয়, তবে আমি তোমাদের কোনো দোষ দেব না। এরপর তিনি ফেরাউনের কাছে এলেন এবং বললেন: {এ শিশুটি আমার ও আপনার চোখের শীতলতা।} [সূরা কাসাস: ৯] ফেরাউন বলল: সে তোমার চোখের শীতলতা হতে পারে, কিন্তু আমার কোনো প্রয়োজন নেই। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যাঁর নামে শপথ করা হয়, সেই সত্তার শপথ! যদি ফেরাউন তার স্ত্রীর মতোই এই শিশুকে চোখের শীতলতা হিসেবে মেনে নিত, তবে আল্লাহ তাকেও হেদায়াত দিতেন, যেমন তার স্ত্রীকে হেদায়াত দিয়েছেন। কিন্তু আল্লাহ তাকে তা থেকে বঞ্চিত করলেন।"

এরপর তিনি আশেপাশে এমন সব মহিলার কাছে লোক পাঠালেন, যাদের স্তনে দুধ ছিল, যাতে মূসার জন্য একজন ধাত্রী নির্বাচন করা যায়। যখনই কোনো মহিলা তাকে দুধ পান করানোর জন্য নিতেন, সে তার স্তন গ্রহণ করত না। ফেরাউনের স্ত্রী ভয় পেলেন যে, শিশুটি দুধ পান না করলে মারা যাবে। এতে তিনি চিন্তিত হয়ে পড়লেন। তিনি নির্দেশ দিলেন, যেন শিশুটিকে বাজারে ও লোকসমাগমের স্থানে নিয়ে যাওয়া হয়। এই আশায় যে, হয়তো এমন কোনো ধাত্রী পাওয়া যাবে যার দুধ সে গ্রহণ করবে। কিন্তু সে কারো স্তনই গ্রহণ করল না।

মূসার জননী তখন চিন্তিত হয়ে পড়লেন। তিনি তাঁর বোনকে বললেন: ওর পথ অনুসরণ করো, খোঁজ করো, ওর কোনো খবর শুনতে পাও কি? আমার ছেলে কি জীবিত আছে, নাকি পশু-জানোয়াররা তাকে খেয়ে ফেলেছে?—তিনি ভুলে গিয়েছিলেন যে আল্লাহ তাঁকে কী ওয়াদা করেছিলেন। তার বোন দূর থেকে তাকে দেখল। যখন দুধ পান করানোর জন্য বহু ধাত্রী এনে ব্যর্থ হলো, তখন সে আনন্দে বলে উঠল: {আমি কি তোমাদেরকে এমন একটি পরিবারের সন্ধান দেব যারা তোমাদের জন্য তার ভরণ-পোষণ করবে এবং যারা তার হিতাকাঙ্ক্ষী?} [সূরা কাসাস: ১২] তারা তাঁকে ধরে ফেলল এবং বলল: তুমি তাদের হিতাকাঙ্ক্ষা সম্পর্কে কীভাবে জানো? তুমি কি তাদেরকে চেনো? তারা সন্দেহ করল। হে ইবনু জুবাইর! এটাও ছিল পরীক্ষার অংশ। তখন তিনি বললেন: তার প্রতি তাদের শুভাকাঙ্ক্ষা ও মমতা হলো এই যে, তারা রাজার সাথে আত্মীয়তা এবং রাজার অনুগ্রহ পাওয়ার আকাঙ্ক্ষা রাখে।

তখন তারা তাকে ছেড়ে দিল। সে তার মায়ের কাছে গিয়ে সব খবর জানাল। তাঁর মা এলেন। যখন তিনি মূসাকে কোলে রাখলেন, তখন সে তাঁর স্তনের দিকে মনোনিবেশ করল এবং এমনভাবে পান করল যে তাঁর উভয় পাশ দুধে ভরে গেল। সুসংবাদদাতারা ফেরাউনের স্ত্রীর কাছে ছুটে গিয়ে সুসংবাদ দিল যে, আপনার সন্তানের জন্য আমরা ধাত্রী পেয়েছি। তিনি লোক পাঠিয়ে তাঁকে ও মূসাকে নিয়ে এলেন। যখন তিনি দেখলেন যে মূসা কীভাবে দুধ পান করছে, তখন তিনি বললেন: তুমি এখানে থেকে আমার এই পুত্রকে দুধ পান করাও। আমি কোনো কিছুকে এতোটা ভালোবাসিনি, যতটা ওকে বাসি। মূসার জননী বললেন: আমার পক্ষে আমার ঘর ও সন্তানদের ছেড়ে এখানে থাকা সম্ভব নয়, তাহলে তারা নষ্ট হয়ে যাবে। যদি আপনি চান যে আমি তাকে আমার ঘরে নিয়ে যাই এবং আমার সাথেই রাখি, তবে আমি তার কল্যাণ থেকে এক মুহূর্তের জন্যও বিরত হবো না। কারণ আমি আমার ঘর ও সন্তানদের ছেড়ে যেতে পারছি না। মূসার জননী আল্লাহর ওয়াদার কথা স্মরণ করলেন, তাই তিনি ফেরাউনের স্ত্রীর কাছে কঠিন শর্ত করলেন এবং নিশ্চিত হলেন যে আল্লাহ তাঁর ওয়াদা পূর্ণ করবেন। অতঃপর তিনি সেদিনই নিজ গৃহে ফিরে গেলেন। আল্লাহ তাকে উত্তমভাবে লালন-পালন করলেন এবং তার জন্য যে ফয়সালা ছিল, তা রক্ষা করলেন। বনী ইসরাঈল যতক্ষণ তাঁর কাছে ছিল, ততক্ষণ তারা গ্রামের এক কোণে দাসত্ব ও অত্যাচার থেকে মুক্ত ছিল।

যখন মূসা (আঃ) বড় হলেন, তখন ফেরাউনের স্ত্রী মূসার মাকে বললেন: আমাকে আমার ছেলেকে দেখাতে এসো। তিনি একদিন তাকে দেখানোর ওয়াদা করলেন। ফেরাউনের স্ত্রী তার কোষাধ্যক্ষ ও তত্ত্বাবধায়কদের বললেন: আমার ছেলেকে অভ্যর্থনা জানানোর জন্য তোমাদের কেউ যেন কোনো উপহার ও সম্মান দেখাতে বাকি না রাখে। আমি দেখতে চাই, এবং আমি একজন আমীন পাঠাচ্ছি, যে তোমাদের প্রত্যেকের কাজ গণনা করবে। মূসা (আঃ) যখন তার মায়ের ঘর থেকে বের হয়ে ফেরাউনের স্ত্রীর কাছে পৌঁছলেন, সেই সময় পর্যন্ত একের পর এক উপহার, সম্মান ও পুরস্কার আসতে থাকল। যখন তিনি তার কাছে প্রবেশ করলেন, তখন সেও তাকে পুরস্কৃত ও সম্মানিত করল এবং খুব খুশি হলো। তার মায়ের প্রতি তার ভালো প্রভাবের জন্য পুরস্কার দিল। এরপর সে বলল: আমি ফেরাউনের কাছে যাব, যাতে সেও তাকে উপহার ও সম্মান দেয়।

যখন সে তাকে নিয়ে ফেরাউনের কাছে প্রবেশ করল, ফেরাউন তাকে কোলে নিল। মূসা (আঃ) ফেরাউনের দাড়ি ধরে তা মাটিতে টেনে আনলেন। আল্লাহর শত্রু ভ্রান্তরা ফেরাউনকে বলল: আপনি কি দেখছেন না, আপনার নবী ইব্রাহীমকে আল্লাহ যা ওয়াদা করেছেন, এ সেই-ই, যে আপনাকে পরাজিত করবে ও আপনার উপর কর্তৃত্ব করবে? তখন ফেরাউন তাকে যবেহ করার জন্য জল্লাদদের কাছে লোক পাঠাল। হে ইবনু জুবাইর! প্রত্যেক পরীক্ষার (বালা) পর এটিও ছিল সেই ফিতনা, যা তার জন্য চাওয়া হয়েছিল।

তখন ফেরাউনের স্ত্রী দ্রুত ফেরাউনের কাছে এলেন এবং বললেন: যে ছেলেটিকে আপনি আমাকে দান করেছিলেন, তার ব্যাপারে আপনার কী মনে এলো? সে বলল: তুমি কি দেখছো না? সে তো মনে করে যে সে আমাকে পরাভূত করবে এবং আমার উপর কর্তৃত্ব করবে। তিনি বললেন: আমার ও আপনার মধ্যে এমন একটি বিষয় স্থির করুন, যার দ্বারা সত্য প্রমাণিত হবে। আপনি দু'টি জ্বলন্ত অঙ্গার ও দু'টি মুক্তা আনুন এবং তার কাছে দিন। যদি সে মুক্তা দুটি স্পর্শ করে এবং অঙ্গার দুটি থেকে দূরে থাকে, তবে বুঝবেন যে তার জ্ঞান আছে। আর যদি সে অঙ্গার দুটি নেয় এবং মুক্তা দুটিকে প্রত্যাখ্যান করে, তবে বুঝবেন যে জ্ঞান থাকা সত্ত্বেও কেউ অঙ্গারের চেয়ে মুক্তাকে অগ্রাধিকার দেয় না।

তখন তা আনা হলো। মূসা (আঃ) অঙ্গার দুটি তুলে নিলেন। তাঁর হাত পুড়ে যাওয়ার ভয়ে তারা তা সরিয়ে নিল। স্ত্রী বললেন: আপনি দেখছেন তো? আল্লাহ তা‘আলা তাকে যা করার ইচ্ছা করেছিলেন, তা থেকে তাকে বিরত রাখলেন। আল্লাহ তাঁর ফয়সালা বাস্তবায়নকারী ছিলেন।

যখন মূসা (আঃ) যৌবনে পদার্পণ করলেন এবং পুরুষদের মধ্যে গণ্য হলেন, তখন ফেরাউনের পরিবারের কেউই বনী ইসরাঈলের কারো প্রতি অন্যায় বা দাসত্ব চাপিয়ে দেওয়ার সুযোগ পেত না। তারা পূর্ণ সুরক্ষা লাভ করল। একদিন মূসা (আঃ) শহরের এক প্রান্তে হেঁটে যাচ্ছিলেন, এমন সময় তিনি দেখলেন যে দু'জন লোক মারামারি করছে, তাদের একজন ছিল ফেরাউনের গোত্রের, আর অন্যজন বনী ইসরাঈলের। ইসরাঈলী লোকটি ফেরাউনের গোত্রের লোকটির বিরুদ্ধে মূসা (আঃ)-এর কাছে সাহায্য চাইল। মূসা (আঃ) প্রচণ্ড ক্রুদ্ধ হলেন, কারণ লোকটি ইসরাঈলীকে আক্রমণ করেছিল। মূসা (আঃ) বনী ইসরাঈলের মধ্যে তাঁর মর্যাদা এবং তাদের প্রতি তাঁর সুরক্ষার কথা জানতেন। কেবল মূসার মা ছাড়া মানুষ এটুকু জানতো না যে তিনি তাদেরই একজন—তবে আল্লাহ হয়তো মূসা (আঃ)-কে এমন কিছু জানিয়েছিলেন যা অন্য কাউকে জানাননি।

মূসা (আঃ) ফেরাউনের গোত্রের লোকটিকে ঘুষি মারলেন, ফলে সে মারা গেল। সে সময় আল্লাহ তা‘আলা এবং ইসরাঈলী লোকটি ছাড়া আর কেউ তাদের দেখেনি। লোকটি মারা গেলে মূসা (আঃ) বললেন: {এটি শয়তানের কাজ; নিশ্চয়ই সে সুস্পষ্ট পথভ্রষ্টকারী শত্রু।} [সূরা কাসাস: ১৫] অতঃপর তিনি বললেন: {হে আমার রব! আমি আমার নিজের প্রতি যুলুম করেছি, অতএব আপনি আমাকে ক্ষমা করুন। ফলে তিনি তাকে ক্ষমা করলেন। নিশ্চয়ই তিনি ক্ষমাশীল, দয়ালু।} [সূরা কাসাস: ১৬]

পরদিন সকালে তিনি শহরে ভীত অবস্থায় খবর জানার প্রতীক্ষায় রইলেন। ফেরাউনের কাছে খবর গেল এবং বলা হলো: বনী ইসরাঈল ফেরাউনের গোত্রের এক ব্যক্তিকে হত্যা করেছে। আপনি আমাদের অধিকার নিন এবং তাদেরকে রেহাই দেবেন না। ফেরাউন বলল: তোমরা হত্যাকারীকে এবং এর সাক্ষী খুঁজে আনো। কেননা, একজন রাজার পক্ষে, যদিও তার জাতি উত্তম হয়, কোনো প্রমাণ বা সাক্ষী ছাড়া প্রতিশোধ নেওয়া ঠিক নয়। তোমরা আমাকে এর তথ্য দাও, আমি তোমাদের জন্য তোমাদের অধিকার নেব।

তারা চারদিকে ঘুরতে লাগল, কিন্তু কোনো প্রমাণ পেল না। পরদিন মূসা (আঃ) সেই ইসরাঈলী লোকটিকে ফেরাউনের গোত্রের আরেকজনের সাথে মারামারি করতে দেখলেন। ইসরাঈলী লোকটি ফেরাউনের গোত্রের লোকটির বিরুদ্ধে মূসা (আঃ)-এর কাছে সাহায্য চাইল। মূসা (আঃ) গতকালের ঘটনার জন্য অনুতপ্ত ছিলেন এবং তিনি যা দেখলেন, তা অপছন্দ করলেন। তিনি ইসরাঈলী লোকটির প্রতি ক্রুদ্ধ হলেন। যখন তিনি ফেরাউনের গোত্রের লোকটির উপর আঘাত করতে উদ্যত হলেন, তখন ইসরাঈলীকে গতকাল ও আজকের কাজের জন্য বললেন: {নিশ্চয়ই তুমি তো এক স্পষ্ট পথভ্রষ্টকারী।} [সূরা কাসাস: ১৮] ইসরাঈলী লোকটি মূসা (আঃ)-এর এই কথা শোনার পর দেখল যে তিনি ঠিক গতকালের মতো রাগান্বিত হয়ে আছেন, যখন তিনি ফেরাউনের গোত্রের লোকটিকে হত্যা করেছিলেন। সে ভয় পেল যে, {নিশ্চয়ই তুমি তো এক স্পষ্ট পথভ্রষ্টকারী} বলে মূসা তাকেই বোঝাননি তো! যদিও মূসা তাকে উদ্দেশ্য করেননি, বরং তিনি ফেরাউনের গোত্রের লোকটিকে উদ্দেশ্য করেছিলেন। ইসরাঈলী লোকটি ভীত হয়ে বলল: {হে মূসা! গতকাল তুমি যেমন এক ব্যক্তিকে হত্যা করেছিলে, তেমনি কি আজ আমাকেও হত্যা করতে চাও?} [সূরা কাসাস: ১৯] মূসা তাকে হত্যা করতে চাননি বলে তারা উভয়ই বিরত হলো।

ফেরাউনের গোত্রের লোকটি গিয়ে ইসরাঈলীর মুখ থেকে শোনা খবর তাদের জানাল, যখন সে বলছিল: {হে মূসা! গতকাল তুমি যেমন এক ব্যক্তিকে হত্যা করেছিলে, তেমনি কি আজ আমাকেও হত্যা করতে চাও?} [সূরা কাসাস: ১৯] তখন ফেরাউন মূসাকে হত্যা করার জন্য জল্লাদ পাঠাল। ফেরাউনের দূতরা প্রধান সড়ক ধরে তাদের স্বাভাবিক ভঙ্গিতে মূসাকে খুঁজতে বের হলো, তারা ভয় পেল না যে তিনি তাদের হাত থেকে পালিয়ে যাবেন।

তখন মূসা (আঃ)-এর অনুসারী এক ব্যক্তি শহরের দূর প্রান্ত থেকে দ্রুত একটি সংক্ষিপ্ত পথ ধরে তাদের আগে মূসার কাছে পৌঁছে তাঁকে এই খবর দিলেন। হে ইবনু জুবাইর! এটাও ছিল ফিতনা বা পরীক্ষার অংশ।

অতঃপর মূসা (আঃ) মাদায়ানের দিকে রওনা হলেন। এর আগে তিনি এমন কোনো পরীক্ষা বা কষ্টের সম্মুখীন হননি। আল্লাহর প্রতি তাঁর সুধারণা ছাড়া তাঁর আর কোনো জ্ঞান ছিল না। তিনি বললেন: {আশা করা যায়, আমার রব আমাকে সরল পথ দেখাবেন।} [সূরা কাসাস: ২২]

{আর যখন তিনি মাদায়ানের জলাশয়ের কাছে পৌঁছলেন, তখন তিনি সেখানে একদল লোককে দেখলেন, তারা তাদের পশুদেরকে পানি পান করাচ্ছে। আর তাদের থেকে কিছুটা দূরে তিনি দু'জন নারীকে দেখলেন, যারা তাদের পশুপালকে আটকে রেখেছিল।} [সূরা কাসাস: ২২-২৩] অর্থাৎ, তারা লোকদের থেকে নিজেদেরকে দূরে রেখেছিল। তিনি তাদেরকে বললেন: তোমরা এভাবে আলাদা থেকে কেন পানি পান করাচ্ছো না? তারা বলল: আমাদের এত শক্তি নেই যে আমরা পুরুষদের সাথে ভিড় করি, আর আমরা লোকদের পাত্রে পানি পান করানোর পর অবশিষ্ট পানির জন্য অপেক্ষা করি। তখন তিনি তাদের জন্য পানি পান করালেন। তিনি বালতিতে প্রচুর পানি তুললেন, এমনকি রাখালদের মধ্যে তিনিই প্রথম পানি পান করালেন।

তারা তাদের পশুপাল নিয়ে তাদের পিতার কাছে ফিরে গেল। আর মূসা (আঃ) একটি গাছের নিচে বিশ্রাম নিলেন এবং বললেন: {হে আমার রব! নিশ্চয়ই আপনি আমার প্রতি যে কল্যাণ অবতীর্ণ করবেন, আমি তার মুখাপেক্ষী।} [সূরা কাসাস: ২৪] তাদের পিতা দেখল যে তাদের পশুপাল আজ তাড়াতাড়ি ও তৃপ্ত হয়ে ফিরে এসেছে। তিনি বললেন: আজ তোমাদের ব্যাপার কী? তারা মূসা (আঃ) যা করেছেন, তা তাকে জানাল। তখন তিনি তাদের একজনকে মূসা (আঃ)-কে ডেকে আনার নির্দেশ দিলেন। সে মূসার কাছে এলো এবং তাঁকে ডাকল। মূসা (আঃ) যখন তার সাথে কথা বললেন, তিনি বললেন: {ভয় করো না, তুমি যালিমদের কাছ থেকে রক্ষা পেয়েছ।} [সূরা কাসাস: ২৫] ফেরাউন বা তার কওমের কোনো কর্তৃত্ব আমাদের উপর নেই, আর আমরা তার সাম্রাজ্যের মধ্যে নেই। তখন তাদের একজন বলল: {হে আমার পিতা! আপনি একে মজুরি দিয়ে রাখুন। নিশ্চয়ই আপনি যাদের মজুরি দেবেন, তাদের মধ্যে উত্তম হলো শক্তিশালী, বিশ্বস্ত ব্যক্তি।} [সূরা কাসাস: ২৬]

তার পিতা তার কথায় ঈর্ষান্বিত হয়ে বললেন: তুমি তার শক্তি ও বিশ্বস্ততা সম্পর্কে কীভাবে জানলে? সে বলল: তার শক্তি সম্পর্কে আমি দেখেছি, সে যখন আমাদের জন্য পানি পান করাল, তখন সে বালতিতে প্রচুর পানি তুলল, আমি এর আগে কাউকে এত শক্তিশালী দেখিনি। আর বিশ্বস্ততা হলো, আমি যখন তার কাছে এলাম এবং সে আমার দিকে তাকাল, সে যখন জানল যে আমি একজন নারী, তখন সে মাথা নিচু করে নিল এবং আপনার বার্তা পৌঁছানো পর্যন্ত মাথা তোলেনি। এরপর সে আমাকে বলল: তুমি আমার পিছনে হাঁটো এবং আমাকে পথ দেখাও। যে এই কাজটি করেছে, সে অবশ্যই বিশ্বস্ত। এতে তার পিতা শান্ত হলেন এবং তার কথা বিশ্বাস করলেন, এবং তিনি মূসা (আঃ) সম্পর্কে যা বলেছিলেন, তা নিশ্চিত করলেন।

অতঃপর তিনি মূসাকে বললেন: {আমি চাই আমার এই কন্যাদ্বয়ের একজনকে তোমার সাথে বিয়ে দিতে, এই শর্তে যে, তুমি আট বছর আমার কাজ করবে। তবে যদি তুমি দশ বছর পূর্ণ করো, তবে তা তোমার পক্ষ থেকে (অতিরিক্ত)। আর আমি তোমাকে কষ্ট দিতে চাই না। ইনশাআল্লাহ তুমি আমাকে সৎকর্মশীলদের অন্তর্ভুক্ত পাবে।} [সূরা কাসাস: ২৭] মূসা (আঃ) এতে সম্মত হলেন। নবী মূসা (আঃ)-এর উপর আট বছর কাজ করা ওয়াজিব ছিল, আর বাকি দু’বছর ছিল তাঁর পক্ষ থেকে স্বেচ্ছায় পূর্ণ করা। আল্লাহ তাঁর জন্য সেই ওয়াদা পূর্ণ করে দিলেন, ফলে তিনি দশ বছর পূর্ণ করলেন।

সাঈদ ইবনু জুবাইর বলেন: খ্রিস্টানদের এক পণ্ডিত আমার সাথে দেখা করে জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কি জানো, মূসা (আঃ) কোন্ সময়কালটি পূর্ণ করেছিলেন? আমি বললাম: না (তখন আমি জানতাম না)। এরপর আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দেখা করলাম এবং তাঁকে এই কথা জানালাম। তিনি বললেন: তুমি কি জানো না যে আট বছর নবী (আঃ)-এর উপর ওয়াজিব ছিল? আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কখনও তাতে কমতি করেননি। তুমি জানো যে, আল্লাহ মূসা (আঃ)-এর পক্ষ থেকে তাঁর ওয়াদাকৃত অতিরিক্ত সময়কাল পূর্ণ করিয়েছিলেন। তাই তিনি দশ বছর পূর্ণ করেছিলেন। আমি সেই খ্রিস্টান পণ্ডিতের সাথে সাক্ষাৎ করে তাকে এই কথা জানালাম। সে বলল: যাকে তুমি জিজ্ঞাসা করেছ এবং যিনি তোমাকে খবর দিয়েছেন, তিনি তোমার চেয়ে এ বিষয়ে বেশি জানেন। আমি বললাম: হ্যাঁ, অবশ্যই তিনি উপযুক্ত।

এরপর মূসা (আঃ) যখন তাঁর পরিবার নিয়ে রওনা হলেন, তখন আল্লাহ তা‘আলা তাঁর ব্যাপারে এবং তাঁর লাঠি ও হাত সম্পর্কে যা কিছু কুরআনে বর্ণনা করেছেন, তাই ঘটল। তিনি আল্লাহ তা‘আলার কাছে ফেরাউনের গোত্রের সেই নিহত ব্যক্তির ব্যাপারে তাঁর যে ভয় ছিল এবং তাঁর মুখের জড়তা (عقدة لسانه) নিয়ে অভিযোগ করলেন, কারণ তাঁর জিহ্বায় একটি জড়তা ছিল যা তাঁকে অনেক কথা স্পষ্ট করে বলতে বাধা দিত। তিনি তাঁর রবের কাছে চাইলেন যেন তাঁর ভাই হারূণকে দিয়ে তাঁকে সাহায্য করেন, যাতে হারূণ তাঁর জন্য সাহায্যকারী হন এবং মূসা যা স্পষ্ট করতে না পারেন, তা হারূণ বলে দিতে পারেন। আল্লাহ তাঁর প্রার্থনা কবুল করলেন এবং তাঁর জিহ্বার জড়তা দূর করে দিলেন।

আল্লাহ হারূণ (আঃ)-এর প্রতি অহী করলেন এবং তাঁকে মূসা (আঃ)-এর সাথে দেখা করার নির্দেশ দিলেন। মূসা (আঃ) তাঁর লাঠি নিয়ে দ্রুত এগিয়ে চললেন, অবশেষে তিনি হারূণ (আঃ)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলেন। তাঁরা দু'জন একসাথে ফেরাউনের কাছে গেলেন এবং তার দরজায় কিছুক্ষণ দাঁড়িয়ে রইলেন, কিন্তু তাদের অনুমতি দেওয়া হলো না। দীর্ঘ অপেক্ষার পর তাদেরকে কঠিন পর্দার আড়াল থেকে অনুমতি দেওয়া হলো। তাঁরা বললেন: {আমরা তোমার রবের রাসূল।} [সূরা ত্ব-হা: ৪৭] ফেরাউন বলল: তোমাদের রব কে? তাঁরা আল্লাহ তা‘আলা কুরআনে যা বর্ণনা করেছেন, তা তাকে জানালেন। সে বলল: তোমরা কী চাও?

ফেরাউন সেই হত্যার কথা স্মরণ করাল। মূসা (আঃ) যে ওযর পেশ করেছিলেন, তা তো আপনারা শুনেছেন। মূসা (আঃ) বললেন: আমি চাই তুমি আল্লাহর প্রতি ঈমান আনো এবং বনী ইসরাঈলকে আমার সাথে পাঠিয়ে দাও। সে অস্বীকার করল এবং বলল: যদি তুমি সত্যবাদী হও, তবে কোনো নিদর্শন আনো।

তখন তিনি তাঁর লাঠি নিক্ষেপ করলেন, তৎক্ষণাৎ তা এক বিরাট সাপ হয়ে গেল, যা তার মুখ হাঁ করে দ্রুত ফেরাউনের দিকে ছুটে যেতে লাগল। ফেরাউন যখন দেখল যে সাপটি তাকে লক্ষ্য করে আসছে, তখন সে ভীত হয়ে সিংহাসন থেকে লাফিয়ে পড়ল এবং মূসা (আঃ)-এর কাছে কাকুতি-মিনতি করল যেন তিনি সেটিকে ফিরিয়ে নেন। মূসা (আঃ) তাই করলেন। এরপর তিনি তাঁর হাত তাঁর বুক পকেট থেকে বের করলেন, দেখা গেল তা শুভ্র ধবধবে, কোনো ধরনের রোগ (যেমন ধবল বা কুষ্ঠ) ছাড়াই। এরপর তিনি তা ফিরিয়ে নিলেন, তখন তা পূর্বের রূপে ফিরে এলো।

ফেরাউন তার চারপাশের নেতাদের সাথে পরামর্শ করল তারা যা দেখেছে সে বিষয়ে। তারা বলল: এই দু'জন জাদুকর। তারা তাদের জাদু দ্বারা তোমাদেরকে তোমাদের দেশ থেকে বের করে দিতে চায় এবং তোমাদের উত্তম জীবন পদ্ধতি (অর্থাৎ তাদের রাজত্ব ও ভোগ-বিলাস) দূর করে দিতে চায়। তারা মূসা (আঃ)-কে তাঁর চাওয়া মতো কিছুই দিতে অস্বীকার করল এবং বলল: তুমি তাদের জন্য জাদুকরদেরকে একত্র করো। তোমার দেশে তাদের সংখ্যা অনেক, যাতে তোমার জাদু তাদের জাদু থেকে বিজয়ী হয়। তখন সে বিভিন্ন শহরে লোক পাঠাল এবং সব জ্ঞানী জাদুকরকে একত্র করল। যখন তারা ফেরাউনের কাছে এলো, তারা জিজ্ঞাসা করল: এই জাদুকর কী দিয়ে কাজ করে? তারা বলল: সে সাপ দিয়ে কাজ করে। জাদুকররা বলল: আল্লাহর কসম! দড়ি ও লাঠি দিয়ে জাদু করার মতো জাদুকর পৃথিবীতে আর কেউ নেই, যেমনটা আমরা করি। আমরা যদি বিজয়ী হই, তবে আমাদের জন্য পুরস্কার কী? ফেরাউন বলল: তোমরা আমার আত্মীয় ও ঘনিষ্ঠজন হবে, আর তোমরা যা চাইবে, আমি তাই করব।

তখন তারা ‘যীনাত’ (সাজসজ্জার) দিনের ওয়াদা করল, যেদিন সকালে লোকেদের একত্র করা হবে। সাঈদ বলেন: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে বর্ণনা করেছেন যে, ‘যীনাত’-এর দিন (যেদিন আল্লাহ মূসাকে ফেরাউন ও জাদুকরদের উপর বিজয় দান করেছিলেন) ছিল আশুরার দিন।

যখন তারা ময়দানে একত্র হলো, তখন লোকেরা একে অপরের সাথে বলাবলি করতে লাগল: চলো, এই ঘটনা দেখতে যাই, যদি জাদুকররা বিজয়ী হয়, তবে হয়তো আমরা তাদের অনুসরণ করব—তারা মূসা ও হারূণকে উপহাস করে এ কথা বলছিল।

জাদুকররা তাদের জাদুর ক্ষমতার ওপর ভরসা করে মূসা (আঃ)-কে বলল: {হে মূসা! হয় তুমি নিক্ষেপ করো, না হয় আমরাই প্রথম নিক্ষেপকারী হব।} [সূরা আরাফ: ১১৫] মূসা (আঃ) বললেন: {বরং তোমরাই নিক্ষেপ করো।} [সূরা ত্ব-হা: ৬৬] {অতঃপর তারা তাদের দড়ি ও লাঠিগুলো নিক্ষেপ করল এবং বলল: ফেরাউনের ইজ্জতের কসম! আমরাই বিজয়ী হব।} [সূরা শুআরা: ৪৪] মূসা (আঃ) তাদের জাদুতে কিছু ভয় অনুভব করলেন। তখন আল্লাহ তাঁর প্রতি অহী করলেন: তুমি তোমার লাঠি নিক্ষেপ করো।

যখন তিনি লাঠি নিক্ষেপ করলেন, তা এক বিশাল অজগরে রূপান্তরিত হলো, যা মুখ হাঁ করে দিল। লাঠিটি তখন দড়িগুলোকে জড়াতে লাগল, এমনকি সাপটির পেটে দড়িগুলো মোটা লাঠির মতো জমা হলো। সে কোনো লাঠি বা দড়ি বাকি রাখল না, সবই গিলে ফেলল। যখন জাদুকররা তা দেখল, তারা বলল: যদি এটা জাদু হতো, তবে আমাদের জাদু পর্যন্ত পৌঁছতো না। এ তো আল্লাহর পক্ষ থেকে ব্যাপার। আমরা আল্লাহ এবং মূসা যা এনেছেন, তাতে ঈমান আনলাম এবং আমরা যা করছিলাম, তা থেকে আল্লাহর কাছে তাওবা করছি।

এই স্থানে আল্লাহ ফেরাউন ও তার অনুসারীদের মেরুদণ্ড ভেঙে দিলেন। সত্য প্রতিষ্ঠিত হলো। {ফলে সত্য প্রতিষ্ঠিত হলো এবং তারা যা করছিল, তা বাতিল হয়ে গেল। সেখানে তারা পরাজিত হলো এবং লাঞ্ছিত হয়ে ফিরে গেল।} [সূরা আরাফ: ১১৮-১১৯] ফেরাউনের স্ত্রীও প্রকাশ্যে মূসার জন্য আল্লাহর কাছে বিজয়ের দু‘আ করছিলেন। ফেরাউনের গোত্রের যারা তাঁকে দেখছিল, তারা ভাবছিল যে তিনি হয়তো ফেরাউন ও তার অনুসারীদের প্রতি সহানুভূতি দেখাচ্ছেন, অথচ তাঁর দুঃখ ও চিন্তা ছিল মূসা (আঃ)-এর জন্য।

যখন মূসা (আঃ)-এর মিথ্যা প্রতিশ্রুতির কারণে ফেরাউনের কাছে তাঁর অবস্থান দীর্ঘ হলো—যখনই তিনি কোনো নিদর্শন নিয়ে আসতেন, ফেরাউন প্রতিশ্রুতি দিত যে সে বনী ইসরাঈলকে তাঁর সাথে পাঠিয়ে দেবে, কিন্তু যখন নিদর্শন কেটে যেত, সে তার ওয়াদা ভঙ্গ করত এবং বলত: তোমার রব কি এর চেয়ে ভিন্ন কিছু করতে পারেন না?—তখন আল্লাহ তা‘আলা তাদের কওমের উপর {প্লাবন, পঙ্গপাল, উকুন, ব্যাঙ ও রক্তের} [সূরা আরাফ: ১৩৩] মতো সুস্পষ্ট নিদর্শনসমূহ পাঠালেন। এই সবকটি আপদই তারা মূসা (আঃ)-এর কাছে অভিযোগ করত এবং তাঁকে অনুরোধ করত যেন এগুলো তাদের উপর থেকে তুলে নেওয়া হয়, আর তারা তাঁর সাথে বনী ইসরাঈলকে পাঠিয়ে দিতে সম্মত হতো। কিন্তু যখন তা তুলে নেওয়া হতো, সে তার ওয়াদা ও চুক্তি ভঙ্গ করত। অবশেষে মূসা (আঃ)-কে তাঁর কওমকে নিয়ে রাতে বের হওয়ার নির্দেশ দেওয়া হলো।

সকালে যখন ফেরাউন দেখল যে তারা চলে গেছে, তখন সে বিভিন্ন শহরে লোক জড়ো করার জন্য পাঠাল। সে বিশাল সৈন্যবাহিনী নিয়ে তাদের পিছু ধাওয়া করল।

আল্লাহ তা‘আলা সাগরের প্রতি অহী করলেন: যখন আমার বান্দা মূসা তার লাঠি দ্বারা তোমাকে আঘাত করবে, তখন তুমি বারো ভাগে বিভক্ত হয়ে যাবে, যাতে মূসা ও তাঁর সঙ্গীরা পার হতে পারে। এরপর ফেরাউন ও তার অনুসারীরা পার হওয়ার পর, তাদের উপর মিলিত হয়ে যাবে। মূসা (আঃ) লাঠি দ্বারা সাগরে আঘাত করতে ভুলে গেলেন। তিনি সাগরের কাছে পৌঁছলেন। সাগর তখন গর্জন করছিল, এই ভয়ে যে মূসা (আঃ) যদি লাঠি দিয়ে আঘাত করেন, আর সে যদি গাফেল থাকে, তাহলে সে আল্লাহর অবাধ্য হবে।

যখন দুই দল কাছাকাছি হলো, মূসা (আঃ)-এর কওমের লোকেরা বলল: {নিশ্চয়ই আমরা তো ধরা পড়ে গেলাম।} [সূরা শুআরা: ৬১] তারা বলল: আপনার রব আপনাকে যা নির্দেশ দিয়েছেন, তা করুন। নিশ্চয়ই তিনি মিথ্যা বলেন না, আর আপনিও মিথ্যা বলেন না। মূসা (আঃ) বললেন: আমার রব আমার সাথে ওয়াদা করেছেন যে, যখন আমি সাগরের কাছে পৌঁছব, তখন তা বারো ভাগে বিভক্ত হয়ে যাবে, যাতে আমি পার হতে পারি। এরপর তিনি লাঠির কথা স্মরণ করলেন। ফেরাউনের সেনাবাহিনীর অগ্রভাগ যখন মূসা (আঃ)-এর সেনাবাহিনীর শেষভাগের কাছাকাছি পৌঁছল, তখন তিনি সাগরে লাঠি দ্বারা আঘাত করলেন। সাগর তাঁর রবের নির্দেশমতো এবং মূসা (আঃ)-কে দেওয়া ওয়াদা অনুযায়ী বিভক্ত হয়ে গেল।

যখন মূসা (আঃ) ও তাঁর সব সঙ্গী সাগর পার হয়ে গেলেন, আর ফেরাউন ও তার সঙ্গীরা ভেতরে প্রবেশ করল, তখন আল্লাহ তা‘আলার নির্দেশমতো সাগর তাদের উপর মিলিত হয়ে গেল। মূসা (আঃ) যখন সাগর পার হলেন, তখন তাঁর সঙ্গীরা বলল: আমরা ভয় পাচ্ছি যে ফেরাউন হয়তো ডুবে মরেনি, তার ধ্বংসের ব্যাপারে আমরা নিশ্চিত হতে পারছি না। তখন মূসা (আঃ) তাঁর রবের কাছে দু‘আ করলেন। আল্লাহ তার দেহ বের করে দিলেন, যাতে তারা তার ধ্বংসের ব্যাপারে নিশ্চিত হতে পারে।

এরপর তারা এমন এক কওমের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন, {যারা তাদের মূর্তিগুলোর উপাসনায় রত ছিল। তারা বলল: হে মূসা! আমাদের জন্য এমন এক ইলাহ তৈরি করে দিন, যেমন তাদের ইলাহ রয়েছে। তিনি বললেন: তোমরা তো এক মূর্খ কওম। নিশ্চয়ই এরা যা নিয়ে আছে, তা ধ্বংস হবে এবং তারা যা করত, তা বাতিল।} [সূরা আরাফ: ১৩৮-১৩৯] তিনি বললেন: তোমরা তো নিদর্শন দেখেছ এবং এমন কথা শুনেছ যা তোমাদের জন্য যথেষ্ট।

অতঃপর মূসা (আঃ) তাদের এক স্থানে নামালেন এবং বললেন: তোমরা হারূণের আনুগত্য করো, কারণ আমি তাকে তোমাদের উপর আমার স্থলাভিষিক্ত করেছি। আমি আমার রবের কাছে যাচ্ছি। তিনি তাদেরকে ত্রিশ দিনের সময় দিলেন, যার মধ্যে তিনি ফিরে আসবেন।

তিনি যখন তাঁর রবের কাছে এলেন, তখন ত্রিশ দিনে তাঁর সাথে কথা বলতে চাইলেন। তিনি রাত-দিন রোযা রেখেছিলেন। তিনি পছন্দ করলেন না যে রোযাদারের মুখের গন্ধ থাকা অবস্থায় তিনি তাঁর রবের সাথে কথা বলবেন। তাই মূসা (আঃ) মাটি থেকে কিছু উদ্ভিদ তুলে চিবালেন। যখন তিনি আল্লাহর কাছে এলেন, তখন আল্লাহ তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি কেন ইফতার করলে?—যদিও তিনি সবই জানতেন। মূসা বললেন: হে রব! আমি পছন্দ করিনি যে আমার মুখ থেকে উত্তম সুগন্ধ ছাড়া আপনার সাথে কথা বলি। আল্লাহ বললেন: হে মূসা! তুমি কি জানো না যে, রোযাদারের মুখের গন্ধ কস্তুরীর সুগন্ধির চেয়েও উত্তম? ফিরে যাও, আরও দশ দিন রোযা রাখো, তারপর আমার কাছে এসো।

মূসা (আঃ) তাঁর রবের নির্দেশ পালন করলেন। যখন মূসা (আঃ)-এর কওম দেখল যে তিনি নির্দিষ্ট সময়ের মধ্যে ফিরে এলেন না, তখন তারা দুঃখিত হলো। হারূণ (আঃ) তাদেরকে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: তোমরা মিসর থেকে বের হয়ে এসেছ, আর ফেরাউনের কওমের কাছে তোমাদের কিছু অস্থায়ী ধার করা জিনিসপত্র ও আমানত রয়েছে, আর তাদেরও তোমাদের কাছে অনুরূপ রয়েছে। আমার মনে হয়, তোমরা তোমাদের দাবিগুলো তাদের কাছে ছেড়ে দাও। আমি তোমাদের সেই আমানত বা ধার করা জিনিসগুলো হালাল মনে করি না যা তোমাদের কাছে জমা রাখা হয়েছে। আমরা এগুলো তাদেরকেও ফিরিয়ে দেব না এবং নিজেদের জন্যও রাখব না।

অতঃপর তিনি একটি গর্ত খুঁড়লেন এবং প্রতিটি কওমের লোকদেরকে নির্দেশ দিলেন যে, তাদের কাছে গয়না বা অন্যান্য যা কিছু আছে, তা যেন সেই গর্তে ফেলে দেয়। এরপর তিনি তাতে আগুন জ্বালালেন এবং তা বের করে বললেন: এগুলো আমাদেরও নয়, তাদেরও নয়।

সামেরী ছিল বনী ইসরাঈলের প্রতিবেশীর এক কওমের লোক, যারা গরু পূজা করত। সে বনী ইসরাঈলের অন্তর্ভুক্ত ছিল না। সে মূসা ও বনী ইসরাঈলের সাথে এসেছিল যখন তারা বের হয়েছিল। ঘটনাক্রমে সে এমন একটি নিদর্শন দেখল, ফলে সে তা থেকে এক মুঠো মাটি নিয়ে নিল। সে হারূণ (আঃ)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। হারূণ (আঃ) তাকে বললেন: হে সামেরী! তোমার হাতে যা আছে, তা ফেলো না কেন? সে তা ধরে রেখেছিল এবং কেউ তা দেখতে পাচ্ছিল না। সে বলল: এটা সেই রাসূলের (জিবরাঈল) পদচিহ্নের এক মুঠো মাটি, যিনি তোমাদেরকে সাগর পার করে নিয়ে গেছেন। আমি এটা ততক্ষণ ফেলব না, যতক্ষণ না আপনি দু‘আ করেন যে, আমি যা চাই, তা যেন হয়। সে তা নিক্ষেপ করল এবং হারূণ (আঃ) তার জন্য দু‘আ করলেন। সে বলল: আমি চাই এটি যেন একটি বাছুর হয়ে যায়। তখন গর্তে থাকা গয়না, বা অন্যান্য জিনিসপত্র বা লোহা-তামা—সব এক বাছুরের রূপ ধারণ করল, যা ভেতর থেকে ফাঁপা ছিল এবং তাতে কোনো রূহ ছিল না, তবে তার হাম্বারব ছিল।

ইবনু আব্বাস (রাদ্









আল-জামি` আল-কামিল (12482)


12482 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"التقى آدم وموسى، فقال موسى لآدم: أنت الذي أشقيت الناس، وأخرجتهم من الجنة؟ . قال له آدم: أنت الذي اصطفاك الله برسالته، واصطفاك لنفسه، وأنزل عليك التوراة؟ . قال: نعم. قال: فوجدتها كتب علي قبل أن يخلقني، قال: نعم. فحجّ آدمُ موسى".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4736)، ومسلم في القدر (15: 2652) كلاهما من طريق محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره. واللفظ للبخاري، ولم يسق مسلم لفظه بهذا الإسناد، وإنما أحال على إسناد قبله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আদম (আঃ) এবং মূসা (আঃ)-এর মধ্যে কথোপকথন হলো। অতঃপর মূসা (আঃ) আদম (আঃ)-কে বললেন: আপনিই সেই ব্যক্তি, যিনি মানুষকে দুর্দশাগ্রস্ত করেছেন এবং তাদের জান্নাত থেকে বহিষ্কার করেছেন? আদম (আঃ) তাঁকে বললেন: আপনি কি সেই ব্যক্তি নন, যাকে আল্লাহ তাঁর রিসালাতের জন্য মনোনীত করেছেন, নিজের জন্য নির্বাচন করেছেন এবং আপনার উপর তাওরাত কিতাব নাযিল করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আদম (আঃ) বললেন: আপনি কি তাতে এটা পাননি যে, আমার সৃষ্টির আগেই এটি আমার উপর লিখে রাখা হয়েছিল? তিনি (মূসা) বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর আদম (আঃ) মূসা (আঃ)-এর বিরুদ্ধে প্রমাণ পেশ করে জয়লাভ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12483)


12483 - عن أبي سفيان بن حرب في حديث طويل في قصة هرقل، قال: ثم دعا بكتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي بعث به دحية إلى عظيم بصرى، فدفعه إلى هرقل، فقرأه، فإذا فيه:"بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ. من محمد عبد الله ورسوله إلى هرقل عظيم الروم، سلام على من اتبع الهدى، أما بعد؛ فإني أدعوك بدعاية الإسلام، أسلم تسلم، يؤتك الله أجرك مرتين …" الحديث.

متفق عليه: رواه البخاري في بدء الوحي (7)، ومسلم في الجهاد (1773: 74) كلاهما من طريق الزهري، أخبرني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، أن عبد الله بن عباس أخبره أن أبا سفيان بن حرب أخبره، فذكره.




আবূ সুফিয়ান ইবনে হারব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, দীর্ঘ এক হাদীসে হিরাক্লিয়াসের ঘটনা প্রসঙ্গে তিনি বলেন, এরপর (হিরাক্লিয়াস) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই চিঠিটি আনতে বললেন, যা তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিহিয়ার মাধ্যমে বুসরার মহান শাসকের কাছে পাঠিয়েছিলেন। তারপর তা হিরাক্লিয়াসের কাছে দেওয়া হলে তিনি তা পড়লেন। তাতে লেখা ছিল: “বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ হতে রোমের প্রধান হিরাক্লিয়াসের প্রতি। যারা হেদায়েতের অনুসারী, তাদের প্রতি শান্তি বর্ষিত হোক। অতঃপর, আমি তোমাকে ইসলামের দাওয়াত দিচ্ছি। তুমি ইসলাম গ্রহণ করো, শান্তিতে থাকবে। আল্লাহ তোমাকে দ্বিগুণ প্রতিদান দেবেন..." (এরপর হাদীসের বাকি অংশ আছে)।









আল-জামি` আল-কামিল (12484)


12484 - عن أبي سعيد، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما أهل النار الذين هم أهلها، فإنهم لا يموتون فيها، ولا يحيون، ولكن ناس أصابتهم النار بذنوبهم (أو قال: بخطاياهم)، فأماتهم إماتة حتى إذا كانوا فحما أُذِن بالشفاعة، فجيء بهم ضبائر ضبائر، فبثوا على أنهار الجنة، ثم قيل: يا أهل الجنة! أفيضوا عليهم. فينبتون نبات الحبة تكون في حميل السيل". فقال رجل من القوم: كأنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان بالبادية.

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (185) عن نصر بن علي الجهضمي، عن بشر - يعني ابن المفضل -، عن أبي مسلمة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد فذكره.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিন্তু যারা জাহান্নামের স্থায়ী অধিবাসী, তারা সেখানে মরবেও না এবং জীবিতও থাকবে না। তবে কিছু লোক, যাদেরকে তাদের গুনাহের কারণে (অথবা তিনি বলেছেন: তাদের ভুলের কারণে) আগুন স্পর্শ করেছে, আল্লাহ তাদেরকে এক ধরনের মৃত্যু দেবেন (বা সম্পূর্ণভাবে নিস্তেজ করে দেবেন), যতক্ষণ না তারা কয়লায় পরিণত হবে। এরপর সুপারিশের অনুমতি দেওয়া হবে। তখন তাদেরকে স্তূপ স্তূপ করে আনা হবে এবং জান্নাতের নদীগুলোর ওপর ছড়িয়ে দেওয়া হবে। এরপর বলা হবে: হে জান্নাতের অধিবাসীরা! তোমরা তাদের ওপর পানি ঢালো। তখন তারা এমনভাবে সতেজ হয়ে উঠবে, যেমন বৃষ্টির স্রোতের বয়ে আনা কাদার মধ্যে শস্যদানা জন্মায়। উপস্থিত লোকদের মধ্যে একজন বললেন: মনে হয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেন মরুভূমিতে ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12485)


12485 - عن أبي سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن أهل الجنة يتراءون أهل الغرف من فوقهم كما يتراءون الكوكب الدّرِّي الغابر في الأفق من المشرق أو المغرب،
لتفاضل ما بينهم". قالوا: يا رسول الله، تلك منازل الأنبياء، لا يبلغها غيرهم، قال:"بلى، والذي نفسي بيده، رجال آمنوا بالله وصدقوا المرسلين".

متفق عليه: رواه البخاري في بدء الخلق (3256)، ومسلم في الجنة وصفة نعيمها وأهلها (2831) كلاهما من طريق مالك بن أنس، عن صفوان بن سليم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “জান্নাতবাসীরা তাদের উপরের বালাখানার (বিশেষ কক্ষের) অধিবাসীদেরকে এমনভাবে দেখতে পাবে, যেমন তোমরা পূর্ব বা পশ্চিম দিগন্তে অস্তমিত উজ্জ্বল দ্যুতিময় তারকা দেখতে পাও—তাদের মর্যাদার পার্থক্যের কারণে।” তারা বলল, “হে আল্লাহর রাসূল! ওগুলো তো শুধু নবীদেরই আবাসস্থল, অন্যরা সেখানে পৌঁছতে পারবে না।” তিনি বললেন: “হ্যাঁ (তারাও পৌঁছবে)। যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! (তারা হলো) সেসব পুরুষ, যারা আল্লাহ্‌র প্রতি ঈমান এনেছে এবং রাসূলদেরকে সত্য বলে মেনে নিয়েছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (12486)


12486 - عن عبادة بن الصامت، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"في الجنة مائة درجة، ما بين كل درجتين كما بين السماء والأرض، والفردوس أعلاها درجة، ومنها تفجر أنهار الجنة الأربعة، ومن فوقها يكون العرش، فإذا سألتم الله، فسلوه الفردوس".

صحيح: رواه الترمذي (2531) عن عبد الله بن عبد الرحمن، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا همام، حدثنا زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن عبادة بن الصامت فذكره.

والحديث رواه الإمام أحمد (22695) عن يزيد بن هارون به، وفيه:"ما بين كل درجتين مسيرة مائة عام".

واللفظ الذي ساقه الترمذي رواه أحمد عن عفان بن مسلم، عن همام به.

ومن طريقه رواه أيضا ابن خزيمة في"التوحيد" (184)، والحاكم (1/ 80). وقال:"إسناده صحيح".




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জান্নাতে রয়েছে একশতটি স্তর (বা মর্যাদা), প্রত্যেক দুটি স্তরের মধ্যবর্তী দূরত্ব হলো আসমান ও যমীনের মধ্যবর্তী দূরত্বের ন্যায়। আর আল-ফিরদাউস হলো সেগুলোর মধ্যে সর্বোচ্চ স্তর, তা থেকেই জান্নাতের চারটি নহর প্রবাহিত হয়। আর এর উপরেই রয়েছে আরশ। সুতরাং তোমরা যখন আল্লাহর কাছে চাইবে, তখন ফিরদাউস চেয়ে নাও।









আল-জামি` আল-কামিল (12487)


12487 - عن ابن عباس قال: لما قدم رسول الله صلى الله عليه وسلم المدينة، واليهود تصوم عاشوراء، فسألهم، فقالوا: هذا اليوم الذي ظهر فيه موسى على فرعون، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"نحن أولى بموسى منهم فصوموه".

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4837)، ومسلم في الصيام (1130) كلاهما من طريق أبي بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনায় আগমন করলেন, আর ইহুদিরা আশুরার দিন রোযা রাখত, তখন তিনি তাদের জিজ্ঞাসা করলেন। তারা বলল: এই সেই দিন, যেদিন মূসা (আঃ) ফিরআউনের উপর বিজয়ী হয়েছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমরা তাদের চেয়ে মূসার অধিক নিকটবর্তী, সুতরাং তোমরা এই দিনে রোযা রাখো।"