হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (12528)


12528 - عن عائشة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تُحشَرون حفاة عراة غرلا". قالت عائشة: فقلت: يا رسول الله! الرجال والنساء ينظر بعضهم إلى بعض. فقال:"الأمر أشد من أن يهمهم ذاك".

متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6527)، ومسلم في كتاب الجنة (2859) كلاهما من طريق حاتم بن أبي صغيرة، عن عبد الله بن أبي مليكة قال: حدثني القاسم بن محمد بن أبي بكر، أن عائشة قالت: فذكرت الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদেরকে খালি পায়ে, বস্ত্রহীন এবং খতনাবিহীন অবস্থায় একত্রিত করা হবে।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! পুরুষ ও নারী কি একে অপরের দিকে তাকাবে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পরিস্থিতি এর চেয়েও গুরুতর হবে যে, তাদের সেদিকে খেয়াল করার সুযোগ থাকবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (12529)


12529 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الله عز وجل وكّل بالرّحم ملكا يقول: يا رب نطفة، يا رب علقة، يا رب مضغة. فإذا أراد أن يقضي خلقه قال: أذكر أم أنثى؟ شقي أم سعيد؟ ، فما الرزق والأجل؟ فيكتب في بطن أمه".

متفق عليه: رواه البخاري في القدر (6595)، ومسلم في القدر (2646) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن عبيد الله بن أبي بكر، عن أنس فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা মাতৃগর্ভের জন্য একজন ফেরেশতা নিযুক্ত করেছেন। তিনি (ফেরেশতা) বলেন, হে রব, (এটি) শুক্রবিন্দু। হে রব, (এটি) জমাট রক্ত। হে রব, (এটি) মাংসপিণ্ড। অতঃপর আল্লাহ যখন তার সৃষ্টিকে পূর্ণতা দিতে চান, তখন (ফেরেশতা) জিজ্ঞেস করেন, পুরুষ না নারী? সে কি সৌভাগ্যবান হবে না দুর্ভাগ্যবান? তার রিযিক ও আয়ুষ্কাল কী? তখন তা তার মায়ের পেটে লিখে দেওয়া হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (12530)


12530 - عن عبد الله بن مسعود، حدثنا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو الصادق المصدوق، قال:"إن أحدكم يُجمع خلقه في بطن أمه أربعين يوما، ثم يكون علقة مثل ذلك، ثم يكون مضغة مثل ذلك، ثم يبعث الله ملكا، فيؤمر بأربع كلمات، ويقال له: اكتب عمله، ورزقه، وأجله، وشقي أو سعيد. ثم ينفخ فيه الروح …" الحديث.
متفق عليه: رواه البخاري في القدر (6594)، ومسلم في كتاب القدر (2643) كلاهما من طريق الأعمش، عن زيد بن وهب، قال: عبد الله، فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.

وفي هذا المعنى أحاديث أخرى ذكرت في كتاب الإيمان.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, আর তিনি ছিলেন সত্যবাদী ও সত্য বলে স্বীকৃত, তিনি বলেছেন: তোমাদের প্রত্যেকের সৃষ্টি তার মাতৃগর্ভে চল্লিশ দিন পর্যন্ত একত্রিত করা হয়। অতঃপর অনুরূপ চল্লিশ দিন জমাট রক্তপিণ্ড (আলাকা) রূপে থাকে। অতঃপর অনুরূপ চল্লিশ দিন মাংসপিণ্ড (মুদগাহ) রূপে থাকে। অতঃপর আল্লাহ একজন ফেরেশতা প্রেরণ করেন। তাকে চারটি বিষয় লেখার নির্দেশ দেওয়া হয়। তাকে বলা হয়: তার আমল, তার রিযিক, তার আয়ুষ্কাল এবং সে দুর্ভাগা হবে না ভাগ্যবান, তা লিখে দাও। অতঃপর তার মধ্যে রূহ ফুঁকে দেওয়া হয়... (শেষ পর্যন্ত)।









আল-জামি` আল-কামিল (12531)


12531 - عن ابن عباس قال: {وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَعْبُدُ اللَّهَ عَلَى حَرْفٍ} قال:"كان الرجل يقدم المدينة، فإن ولدت امرأته غلاما، ونتجت خيله، قال: هذا دين صالح. وإن لم تلد امرأته، ولم تنتج خيله، قال: هذا دين سوء".

صحيح: رواه البخاري في التفسير (4742) عن إبراهيم بن الحارث، حدثنا يحيى بن أبي بكر، حدثنا إسرائيل، عن أبي حصين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি [আল্লাহর বাণী] সম্পর্কে বলেন: {আর মানুষের মধ্যে এমনও আছে যারা আল্লাহর ইবাদত করে দ্বিধার সাথে}। তিনি বলেন: কোনো ব্যক্তি মদিনায় আসত। যদি তার স্ত্রী একটি পুত্রসন্তান জন্ম দিত এবং তার ঘোড়া বাচ্চা দিত, তখন সে বলত: এটি (ইসলাম) একটি ভালো ধর্ম। আর যদি তার স্ত্রী সন্তান জন্ম না দিত এবং তার ঘোড়া বাচ্চা না দিত, তখন সে বলত: এটি একটি খারাপ ধর্ম।









আল-জামি` আল-কামিল (12532)


12532 - عن ابن عباس، قال: كان ناس من الأعراب يأتون النبي صلى الله عليه وسلم، فيسلمون، فإذا رجعوا إلى بلادهم، فإن وجدوا عام غيث وعام خصب وعام ولاد حسن، قالوا: إن ديننا هذا صالح، فتمسكوا به، وإن وجدوا عام جدوبة وعام ولاد سوء وعام قحط، قالوا: ما في ديننا هذا خير، فأنزل الله.

حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره - كما في تفسير ابن كثير (5/ 400) - والضياء في المختارة (10/ 118 - 119) كلاهما من طريق أحمد بن عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد بن عثمان، حدثني أبي، عن أبيه، عن أشعث بن إسحاق القمي، عن جعفر بن أبي المغيرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل أحمد بن عبد الرحمن، وعبد الله بن سعد، وأشعث بن إسحاق، وجعفر بن أبي المغيرة، فكلهم حسن الحديث.



صَلَاتَهُ وَتَسْبِيحَهُ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِمَا يَفْعَلُونَ} [سورة النور: 41].

وقد جاء في الحديث الصحيح أن الشمس تجري حتى تنتهي إلى مستقرها تحت العرش، فتخر ساجدة لله عز وجل.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিছু বেদুঈন (আরব উপজাতি) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসত এবং ইসলাম গ্রহণ করত। অতঃপর তারা যখন তাদের নিজ দেশে ফিরে যেত, তখন যদি তারা এমন বছর পেত যখন প্রচুর বৃষ্টি হয়েছে, ফসল ভালো হয়েছে এবং জন্মহার ভালো হয়েছে, তখন তারা বলত: 'নিশ্চয়ই আমাদের এই দ্বীন ভালো, সুতরাং তোমরা এটিকে দৃঢ়ভাবে ধরে রাখো।' আর যদি তারা এমন বছর পেত যখন খরা হয়েছে, জন্মহার খারাপ হয়েছে এবং দুর্ভিক্ষ দেখা দিয়েছে, তখন তারা বলত: 'আমাদের এই দ্বীনের মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই।' তখন আল্লাহ নাযিল করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12533)


12533 - عن أبي ذر: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال يوما:"أتدرون أين تذهب هذه الشمس؟". قالوا: الله ورسوله أعلم. قال:"إن هذه تجري حتى تنتهي إلى مستقرها تحت العرش، فتخرّ ساجدة، ولا تزال كذلك حتى يقال لها: ارتفعي، ارجعي من حيث جئت، فترجع، فتصبح طالعة من مطلعها، ثم تجري حتى تنتهي إلى مستقرها تحت العرش، فتخر ساجدة، ولا تزال كذلك حتى يقال لها: ارتفعي، ارجعي من حيث جئت، فترجع، فتصبح طالعة من مطلعها، ثم تجري لا يستنكر الناس منها شيئا حتى تنتهي إلى مستقرها ذاك تحت العرش، فيقال لها: ارتفعي، أصبحي طالعة من مغربك، فتصبح طالعة من مغربها". فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أتدرون متى ذاكم ذاك؟ حين لا ينفع نفسا إيمانها لم تكن آمنت من قبل أو كسبت في إيمانها خيرا".

متفق عليه: رواه البخاري في بدء الخلق (3199)، ومسلم في الإيمان (250: 159) كلاهما من طريق إبراهيم بن يزيد التيمي، عن أبيه، عن أبي ذر، فذكره. وهذا لفظ مسلم، وساقه البخاري مختصرا.

وفي لفظ لمسلم:"فإنها تذهب، فتستأذن في السجود، فيؤذن لها، وكأنها قد قيل لها: ارجعي من حيث جئت، فتطلع من مغربها". قال: ثم قرأ في قراءة عبد الله {وَذَلِكَ مُسْتَقَرٌ لَّهَا} [سورة يس: 38].

وهذه الآية من آيات السجدة، وقد جاء في الصحيح:




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন বললেন: 'তোমরা কি জানো, এই সূর্যটি কোথায় যায়?' তারা বললেন: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: 'নিশ্চয়ই এটি (সূর্য) চলতে থাকে যতক্ষণ না এটি আরশের নিচে তার নির্দিষ্ট গন্তব্যে পৌঁছায়। অতঃপর এটি সিজদায় লুটিয়ে পড়ে। এটি ঐভাবে থাকতে থাকে, যতক্ষণ না তাকে বলা হয়: তুমি উঠে যাও, যেখান থেকে এসেছ সেখানে ফিরে যাও। তখন এটি ফিরে আসে এবং এর উদয়স্থল থেকে উদিত হয়। এরপর আবার চলতে থাকে যতক্ষণ না আরশের নিচে তার নির্দিষ্ট গন্তব্যে পৌঁছায়। অতঃপর এটি সিজদায় লুটিয়ে পড়ে। এটি ঐভাবে থাকতে থাকে, যতক্ষণ না তাকে বলা হয়: তুমি উঠে যাও, যেখান থেকে এসেছ সেখানে ফিরে যাও। তখন এটি ফিরে আসে এবং এর উদয়স্থল থেকে উদিত হয়। এরপর এটি চলতে থাকে, যার মধ্যে মানুষ কোনো অস্বাভাবিকতা দেখতে পায় না, যতক্ষণ না এটি আরশের নিচে সেই নির্দিষ্ট গন্তব্যে পৌঁছায়। তখন তাকে বলা হয়: তুমি উঠে যাও, তোমার অস্তাচল থেকে উদিত হও। ফলে এটি তার অস্তাচল থেকেই উদিত হয়।' অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'তোমরা কি জানো, কখন তা হবে? তখন, যখন কোনো ব্যক্তির সেই ঈমান উপকারে আসবে না, যা সে আগে করেনি অথবা সে তার ঈমানের সাথে কোনো ভালো কাজ করেনি।'

মুসলিম শরীফের অন্য একটি বর্ণনায় আছে: 'এটি (সূর্য) চলে যায় এবং সিজদা করার অনুমতি চায়। তখন তাকে অনুমতি দেওয়া হয়। এমন মনে হবে যেন তাকে বলা হয়েছে: তুমি যেখান থেকে এসেছ সেখান থেকেই ফিরে যাও, তখন এটি এর অস্তাচল থেকে উদিত হয়।' রাবী বলেন: এরপর তিনি আব্দুল্লাহর কিরাআত অনুযায়ী এই আয়াতটি পাঠ করলেন: *‘এবং তা-ই হচ্ছে তার গন্তব্যস্থল।’* (সূরা ইয়াসীন: ৩৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (12534)


12534 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قرأ ابن آدم السجدة، فسجد، اعتزل الشيطان يبكي، يقول: يا ويله! أُمِر ابن آدم بالسجود، فسجد، فله الجنة، وأُمِرتُ بالسجود، فأبيت، فَلي النارُ".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (81) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আদম সন্তান সিজদার আয়াত তিলাওয়াত করে এবং সিজদা করে, তখন শয়তান কাঁদতে কাঁদতে একপাশে সরে যায় এবং বলতে থাকে: হায় আফসোস আমার! আদম সন্তানকে সিজদার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল, তখন সে সিজদা করেছে, ফলে তার জন্য জান্নাত। আর আমাকেও সিজদার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল, কিন্তু আমি অস্বীকার করেছি, ফলে আমার জন্য জাহান্নাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (12535)


12535 - عن قيس بن عباد قال: سمعت أبا ذر يقسم قسما: إن {هَذَانِ خَصْمَانِ اخْتَصَمُوا فِي
رَبِّهِمْ} إنها نزلت في الذين برزوا يوم بدر: حمزة وعلي وعبيدة بن الحارث، وعتبة وشيبة ابنا ربيعة والوليد بن عتبة.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4743)، ومسلم في التفسير (3033) كلاهما من طريق هشيم، عن أبي هاشم، عن أبي مجلز، عن قيس بن عُبَاد، قال: فذكره. واللفظ لمسلم.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কায়স ইবনু উবাদ বলেন: আমি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শপথ করে বলতে শুনেছি যে, নিশ্চয়ই 'এরা দুই পক্ষ, যারা তাদের রবের ব্যাপারে বিতর্কে লিপ্ত হয়েছে' (সূরা হাজ্জ, আয়াত ১৯)— এই আয়াতটি সেইসব লোক সম্পর্কে অবতীর্ণ হয়েছে, যারা বদর যুদ্ধের দিন মল্লযুদ্ধে অবতীর্ণ হয়েছিল: হামযাহ, আলী ও উবাইদাহ ইবনু হারিস, আর উতবাহ ও শাইবাহ ইবনু রাবী'আহ এবং ওয়ালীদ ইবনু উতবাহ।









আল-জামি` আল-কামিল (12536)


12536 - عن علي بن أبي طالب أنه قال: أنا أول من يجثو بين يدي الرحمن للخصومة يوم القيامة. وقال قيس بن عباد: وفيهم أنزلت: {هَذَانِ خَصْمَانِ اخْتَصَمُوا فِي رَبِّهِمْ} قال: هم الذين تبارزوا يوم بدر: حمزة، وعلي، وعبيدة، أو أبو عبيدة بن الحارث، وشيبة بن ربيعة، وعتبة، والوليد بن عتبة.

وفي رواية: قال علي: فينا نزلت هذه الآية: {هَذَانِ خَصْمَانِ … }.

صحيح: رواه البخاري في المغازي (3965) عن محمد بن عبد الله الرقاشي، حدثنا معتمر (وهو ابن سليمان)، قال: سمعت أبي (وهو سليمان التيمي) يقول: حدثنا أبو مجلز (وهو لاحق بن حميد) عن قيس بن عباد، عن علي بن أبي طالب فذكره.

والرواية الثانية رواها البخاري (3967) من طريق يوسف بن يعقوب، عن سليمان التيمي به.

قوله:"يجثو": بالجيم والمثلثة أي يقعد على ركبتيه مخاصما، والمراد بهذه الأولية تقييده بالمجاهدين من هذه الأمة؛ لأن المبارزة المذكورة أول مبارزة وقعت في الإسلام.

وقوله: {يُصَبُّ مِنْ فَوْقِ رُءُوسِهِمُ الْحَمِيمُ (19)} {يُصْهَرُ بِهِ مَا فِي بُطُونِهِمْ وَالْجُلُودُ}.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, কিয়ামতের দিন আমিই প্রথম ব্যক্তি, যে বিচার বা বিবাদের জন্য দয়াময়ের (আল্লাহর) সামনে নতজানু হবে। কায়েস ইবনু উবাদ বলেছেন, তাদের ব্যাপারেই এই আয়াত নাযিল হয়েছে: "এই দুই বিবদমান দল তাদের প্রতিপালক সম্বন্ধে বিতর্ক করেছে..."। তিনি বলেন, তারা হলেন ঐ সকল লোক যারা বদর যুদ্ধের দিন একক লড়াই করেছিলেন: হামযা, আলী, উবাইদা অথবা আবূ উবাইদা ইবনু হারিস এবং শাইবা ইবনু রাবী‘আহ, উতবাহ ও ওয়ালীদ ইবনু উতবাহ।

অপর এক বর্ণনায় এসেছে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমাদের ব্যাপারেই এই আয়াত নাযিল হয়েছিল: "এই দুই বিবদমান দল..."।









আল-জামি` আল-কামিল (12537)


12537 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الحميم لَيُصبُّ على رؤوسهم، فينفذ الحميم حتى يخلص إلى جوفه، فيسلتُ ما في جوفه حتى يمرق من قدميه، وهو الصهر، ثم يعاد كما كان".

حسن: رواه الترمذي (2582)، وأحمد (8864)، والحاكم (2/ 387) كلهم من طريق عبد الله بن المبارك، أخبرنا سعيد بن يزيد، عن أبي السمح، عن ابن حُجيرة، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب، وابن حجيرة هو عبد الرحمن بن حجيرة المصري" اهـ. وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في أبي السمح، وهو دراج بن سمعان، وهو حسن الحديث في غير أبي الهيثم.

وهذا من حديثه عن غير أبي الهيثم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: "নিশ্চয়ই উত্তপ্ত পানি (হামিম) তাদের মাথার উপর ঢেলে দেওয়া হবে। ফলে সেই উত্তপ্ত পানি ভেতরে প্রবেশ করে তার পেট পর্যন্ত পৌঁছে যাবে। এরপর তা তার পেটের ভেতরের সবকিছু বের করে দেবে, যতক্ষণ না তা তার দু’পা দিয়ে বেরিয়ে যায়। আর এটাই হলো গলানো। এরপর তাকে পুনরায় আগের মতো ফিরিয়ে আনা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (12538)


12538 - عن أبي حازم قال: كنت خلف أبي هريرة، وهو يتوضأ للصلاة، فكان يمدّ يده حتى تبلغ إبطه، فقلت له: يا أبا هريرة، ما هذا الوضوء؟ فقال: يا بني فَرُّوخ! أنتم ها هنا؟ لو علمت أنكم ها هنا ما توضأت هذا الوضوء، سمعت خليلي صلى الله عليه وسلم يقول:"تبلغ الحلية من المؤمن حيث يبلغ الوضوء".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (250) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا خلف، عن أبي مالك الأشجعي، عن أبي حازم، فذكره.

وقوله: {وَلِبَاسُهُمْ فِيهَا حَرِيرٌ} أي: لباس أهل الجحة يكون من الحرير، من الإستبراق والسندس ونحوها. كما قال تعالى: {عَالِيَهُمْ ثِيَابُ سُنْدُسٍ خُضْرٌ وَإِسْتَبْرَقٌ وَحُلُّوا أَسَاوِرَ مِنْ فِضَّةٍ وَسَقَاهُمْ رَبُّهُمْ شَرَابًا طَهُورًا} [سورة الإنسان: 21] وهذا للمؤمنين في الآخرة، وليس لهم أن يلبسوه في الدنيا، وأما الكفار فيلبسون الحرير والديباج في الدنيا، فيحرمون في الآخرة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু হাযিম বলেন, আমি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পেছনে ছিলাম, যখন তিনি সালাতের জন্য উযু করছিলেন। তিনি তার হাত এতদূর পর্যন্ত প্রসারিত করছিলেন যে তা বগল পর্যন্ত পৌঁছে যাচ্ছিল। আমি তাকে বললাম: হে আবু হুরায়রা! এ কেমন উযু? তিনি বললেন: হে ফাররুখের পুত্র! তোমরাও এখানে আছো? আমি যদি জানতাম তোমরা এখানে আছো, তবে আমি এমনভাবে উযু করতাম না। আমি আমার বন্ধু (নবী) (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “মুমিনের অলংকার (জান্নাতে) ততটুকু পর্যন্ত পৌঁছবে যতটুকু পর্যন্ত উযুর পানি পৌঁছবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (12539)


12539 - عن عبد الرحمن بن أبي ليلى: أنهم كانوا عند حذيفة، فاستسقى، فسقاه مجوسي. فلما وضع القدح في يده رماه به، وقال: لولا أني نهيته غير مرة ولا مرتين، كأنه يقول لم أفعل هذا، ولكني سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تلبسوا الحرير ولا الديباج، ولا تشربوا في آنية الذهب والفضة، ولا تأكلوا في صحافها، فإنها لهم في الدنيا ولنا في الآخرة".

متفق عليه: رواه البخاري في الأطعمة (5426)، ومسلم في اللباس (2067) كلاهما من طريق مجاهد، قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي ليلى، فذكره. واللفظ للبخاري، ولم يسق مسلم لفظه بهذا الإسناد، وإنما أحال على لفظ إسناد قبله.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা (বর্ণনাকারীগণ) একদা তাঁর কাছে ছিলেন। তিনি পানি চাইলেন। তখন একজন অগ্নিপূজক (মাজুসী) তাঁকে পানি পান করালো। যখন সে পেয়ালাটি তাঁর হাতে রাখল, তিনি সেটি ছুঁড়ে ফেলে দিলেন এবং বললেন: যদি আমি তাকে একবার বা দুইবারের বেশি নিষেধ না করতাম [তবে আমি এমন করতাম না]। তিনি আরও বললেন, কিন্তু আমি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "তোমরা রেশমি কাপড় এবং নকশা করা রেশমি কাপড় (দিবাজ) পরিধান করবে না, স্বর্ণ ও রৌপ্যের পাত্রে পান করবে না এবং সেগুলোর থালাবাসনে খাবার খাবে না। কেননা এইগুলি (স্বর্ণ-রৌপ্যের পাত্র) দুনিয়াতে তাদের (কাফিরদের) জন্য এবং আখেরাতে আমাদের জন্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (12540)


12540 - عن ابن عباس: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أبغض الناس إلى الله ثلاثة: ملحد في الحرم، ومبتغ في الإسلام سنة الجاهلية، ومطلب دم امرئ بغير حق ليهريق دمه".
صحيح: رواه البخاري في الديات (6882) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن عبد الله بن أبي حسين، حدثنا نافع بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

وروي عن عبد الله بن مسعود في قوله: {وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ} قال:"لو أن رجلا همَّ فيه بإلحاد، وهو بعدن أبين، لأذاقه الله عز وجل عذابا أليما". روي مرفوعا وموقوفا.

فأما المرفوع فرواه أحمد (4071)، والبزار - كشف الأستار (2236)، وأبو يعلى (5384)، وصحّحه الحاكم (2/ 388) كلهم من طريق يزيد بن هارون، أخبرنا شعبة، عن السدي، أنه سمع عبد الله، فذكره.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وكان شعبة يقول:"ورفعه - يعني شيخه - ولا أرفعه لك".

فكان شعبة يرويه عن شيخه السدي مرفوعا، ولكنه كان يرى الوقف، ولذا إذا حدّث لم يرفعه.

وكذا رواه أيضا سفيان الثوري، عن السدي - وهو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة - به موقوفا. ذكره الدارقطني في علله (5/ 269).

ورواه أيضا سفيان، عن زبيد، عن مرة، عن ابن مسعود موقوفا. رواه الحاكم (2/ 387).

فاتفق شعبة وسفيان على وقفه، وإن كان شعبة يروي عن شيخه مرفوعا، وأما هو فكان يرفعه.

ولذا رجّح الحافظ ابن كثير وغيره أن الوقف أصح.

وروي نحوه أيضا عن الضحاك بن مزاحم في قوله: قال: إن الرجل ليهُمُّ بالخطيئة بمكة وهو في بلد آخر ولم يعملها فتكتب عليه. رواه ابن جرير في تفسيره (16/ 50




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহর কাছে মানুষের মধ্যে সবচেয়ে ঘৃণিত তিন জন: এক. যে হারামের (পবিত্র সীমানার) মধ্যে সীমালঙ্ঘন বা ধর্মদ্রোহিতা করে; দুই. যে ইসলামের মধ্যে জাহেলিয়াতের রীতি-নীতি চালু করতে চায়; এবং তিন. যে অন্যায়ভাবে কোনো ব্যক্তির রক্ত ঝরাতে (বা হত্যা করতে) চায়।









আল-জামি` আল-কামিল (12541)


12541 - عن ابن عباس قال: أول ما اتخذ النساء المنطق من قبل أم إسماعيل اتخذت منطقا لتعفي أثرها على سارة، ثم جاء بها إبراهيم وبابنها إسماعيل وهي ترضعه، حتى وضعهما عند البيت عند دوحة فوق زمزم في أعلى المسجد، وليس بمكة يومئذ أحد، وليس بها ماء فوضعهما هنالك، ووضع عندهما جرابا فيه تمر وسقاء فيه ماء، ثم قفّى إبراهيم منطلقا فتبعته أم إسماعيل فقالت: يا إبراهيم أين تذهب وتتركنا بهذا الوادي الذي ليس فيه إنس ولا شيء؟ فقالت له ذلك مرارا، وجعل لا يلتفت إليها، فقالت له: آلله الذي أمرك بهذا؟ قال: نعم. قالت: إذن لا يضيعنا، ثم رجعت. فانطلق
إبراهيم حتى إذا كان عند الثنية حيث لا يرونه استقبل بوجهه البيت ثم دعا بهؤلاء الكلمات ورفع يديه فقال: {رَبَّنَا إِنِّي أَسْكَنْتُ مِنْ ذُرِّيَّتِي بِوَادٍ غَيْرِ ذِي زَرْعٍ} حتى بلغ {يَشْكُرُونَ} [سورة إبراهيم: 37] وجعلت أم إسماعيل ترضع إسماعيل وتشرب من ذلك الماء، حتى إذا نفد ما في السقاء عطشت وعطش ابنها، وجعلت تنظر إليه يتلوى - أو قال: يتلبط - فانطلقت كراهية أن تنظر إليه، فوجدت الصفا أقرب جبل في الأرض يليها، فقامت عليه، ثم استقبلت الوادي تنظر هل ترى أحدا فلم تر أحدا، فهبطت من الصفا، حتى إذا بلغت الوادي رفعت طرف درعها، ثم سعت سعي الإنسان المجهود حتى جاوزت الوادي، ثم أتت المروة فقامت عليها ونظرت هل ترى أحدا، فلم تر أحدا، ففعلت ذلك سبع مرات، قال ابن عباس: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"فذلك سعي الناس بينهما" فلما أشرفت على المروة سمعت صوتا فقالت: صَهٍ - تريد نفسها - ثم تسمعت فسمعت أيضا فقالت: قد أسمعت إن كان عندك غواث، فإذا هي بالملك عند موضع زمزم، فبحث بعقبه - أو قال: بجناحه - حتى ظهر الماء، فجعلت تحوضه وتقول بيدها هكذا، وجعلت تغرف من الماء في سقائها وهو يفور بعد ما تغرف.

قال ابن عباس: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يرحم الله أم إسماعيل لو تركت زمزم - أو قال: لو لم تغرف من الماء لكانت زمزم عينا معينا" قال: فشربت وأرضعت ولدها، فقال لها الملك: لا تخافوا الضيعة، فإن ها هنا بيت الله يبني هذا الغلام وأبوه، وإن الله لا يضيع أهله، وكان البيت مرتفعا من الأرض كالرابية، تأتيه السيول فتأخذ عن يمينه وشماله، فكانت كذلك حتى مرت بهم رفقة من جرهم - أو أهل بيت من جرهم - مقبلين من طريق كداء، فنزلوا في أسفل مكة، فرأوا طائرا عائفا فقالوا: إن هذا الطائر ليدور على ماء لعهدُنا بهذا الوادي وما فيه ماء، فأرسلوا جريا - أو جريين - فإذا هم بالماء، فرجعوا فأخبروهم بالماء، فأقبلوا قال: وأم إسماعيل عند الماء - فقالوا: أتأذنين لنا أن ننزل عندك؟ فقالت: نعم، ولكن لا حق لكم في الماء. قالوا: نعم. قال ابن عباس: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"فألفى ذلك أم إسماعيل وهي تحب الإنس" فنزلوا وأرسلوا إلى أهليهم فنزلوا معهم، حتى إذا كان بها أهل أبيات منهم، وشبَّ الغلام وتعلم العربية منهم، وأنفسهم وأعجبهم حين شبَّ، فلما أدرك زوجوه امرأة منهم. وماتت أم إسماعيل، فجاء إبراهيم بعدما تزوج إسماعيل يطالع تركته، فلم يجد إسماعيل فسأل امرأته عنه فقالت: خرج يبتغي لنا، ثم سألها عن عيشهم وهيئتهم
فقالت: نحن بشرٍّ، نحن في ضيق وشدة، فشكت إليه. قال: فإذا جاء زوجك فاقرئي عليه السلام وقولي له يغير عتبة بابه.

فلما جاء إسماعيل كأنه آنس شيئا فقال: هل جاءكم من أحد؟ قالت: نعم جاءنا شيخ كذا وكذا، فسألنا عنك فأخبرته، وسألني كيف عيشنا، فأخبرته أنا في جهد وشدة، قال: فهل أوصاك بشيء؟ قالت: نعم، أمرني أن أقرأ عليك السلام، ويقول: غيِّرْ عتبة بابك. قال: ذاك أبي، وقد أمرني أن أفارقك، الحقي بأهلك فطلقها وتزوج منهم أخرى، فلبث عنهم إبراهيم ما شاء الله، ثم أتاهم بعد فلم يجده، فدخل على امرأته فسألها عنه فقالت: خرج يبتغي لنا. قال: كيف أنتم؟ وسألها عن عيشهم وهيئتهم فقالت: نحن بخير وسعة، وأثنت على الله. فقال: ما طعامكم؟ قالت: اللحم. قال: فما شرابكم؟ قالت: الماء. قال: اللهم بارك لهم في اللحم والماء. قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ولم يكن لهم يومئذ حب ولو كان لهم دعا لهم فيه" قال: فهما لا يخلو عليهما أحد بغير مكة إلا لم يوافقاه. قال: فإذا جاء زوجك فاقرئي عليه السلام، ومريه يثبت عتبة بابه، فلما جاء إسماعيل قال: هل أتاكم من أحد؟ قالت: نعم، أتانا شيخ حسن الهيئة، وأثنت عليه فسألني عنك فأخبرته، فسألني كيف عيشنا؟ فأخبرته أنا بخير، قال: فأوصاك بشيء؟ قالت: نعم، هو يقرأ عليك السلام، ويأمرك أن تثبت عتبة بابك. قال: ذاك أبي وأنت العتبة، أمرني أن أمسكك.

ثم لبث عنهم ما شاء الله، ثم جاء بعد ذلك وإسماعيل يبري نبلا له تحت دوحة قريبا من زمزم، فلما رآه قام إليه، فصنعا كما يصنع الوالد بالولد والولد بالوالد ثم قال: يا إسماعيل إن الله أمرني بأمر. قال: فاصنع ما أمرك ربك، قال: وتعينني؟ قال: وأعينك. قال: فإن الله أمرني أن أبني ها هنا بيتا، - وأشار إلى أكمة مرتفعة على ما حولها - قال: فعند ذلك رفعا القواعد من البيت، فجعل إسماعيل يأتي بالحجارة، وإبراهيم يبني، حتى إذا ارتفع البناء جاء بهذا الحجر فوضعه له، فقام عليه وهو يبني، وإسماعيل يناوله الحجارة، وهما يقولان: {رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ} [البقرة: 127] قال: فجعلا يبنيان حتى يدورا حول البيت وهما يقولان: {رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ}.

صحيح: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3364) عن عبد الله بن محمد حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب السختياني وكثير بن كثير بن المطلب بن أبي وداعة يزيد أحدهما على
الآخر، عن سعيد بن جبير، قال ابن عباس فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: প্রথম যে মহিলা তাঁর আঁচল ব্যবহার করেছিলেন, তিনি ছিলেন ইসমাঈল (আঃ)-এর মাতা। তিনি সারাহ্ (আঃ)-এর দৃষ্টি থেকে তাঁর পদচিহ্ন মুছে ফেলার জন্য আঁচল তৈরি করেছিলেন। এরপর ইব্‌রাহীম (আঃ) তাঁকে এবং তাঁর দুগ্ধপোষ্য পুত্র ইসমাঈল (আঃ)-কে সঙ্গে করে নিয়ে আসলেন এবং তাঁদেরকে কা'বার পাশে যমযম কূয়ার উপরের একটি বড় গাছের নিচে মসজিদের উঁচু স্থানে রেখে গেলেন। সেই সময় মাক্কায় কেউ থাকত না এবং সেখানে কোনো পানিও ছিল না। ইব্‌রাহীম (আঃ) তাঁদেরকে সেখানেই রাখলেন এবং তাঁদের পাশে খেজুর ভর্তি একটি থলে ও একটি পানির মশক রেখে গেলেন। এরপর ইব্‌রাহীম (আঃ) ফিরে চলে যেতে শুরু করলেন। ইসমাঈল (আঃ)-এর মা তাঁর পেছন পেছন চললেন এবং বললেন, হে ইব্‌রাহীম! আপনি আমাদেরকে এমন এক উপত্যকায় রেখে যাচ্ছেন কেন, যেখানে কোনো মানুষ বা অন্য কিছু নেই? তিনি তাঁকে বার বার এ কথা বললেন, কিন্তু ইব্‌রাহীম (আঃ) তাঁর দিকে ফিরে তাকালেন না। তখন তিনি বললেন, আল্লাহ্ কি আপনাকে এটার আদেশ করেছেন? তিনি বললেন, হ্যাঁ। হাজেরা (আঃ) বললেন, তবে তিনি আমাদেরকে বিনষ্ট করবেন না। এরপর তিনি ফিরে আসলেন।

ইব্‌রাহীম (আঃ) এগিয়ে গেলেন, যখন তিনি এমন এক গিরিপথের কাছে পৌঁছলেন, যেখান থেকে তাঁরা তাঁকে দেখতে পাচ্ছিলেন না, তখন তিনি কা'বার দিকে মুখ করে হাত তুলে এই কথাগুলো বলে দু‘আ করলেন: (ভাবার্থ) "হে আমাদের রব! নিশ্চয় আমি আমার বংশধরদের এক অংশকে ফসলবিহীন উপত্যকায় তোমার পবিত্র ঘরের নিকট বসতি স্থাপন করালাম, যাতে তারা সালাত প্রতিষ্ঠিত করে। অতএব তুমি কিছু মানুষের মনকে তাদের দিকে ধাবিত কর এবং তাদেরকে ফল-ফসল দ্বারা রিযক দাও, যাতে তারা কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে।" [সূরা ইব্রাহীম: ৩৭] - শেষ পর্যন্ত।

ইসমাঈল (আঃ)-এর মা ইসমাঈল (আঃ)-কে দুধ পান করাতে এবং সেই পানি পান করতে লাগলেন। অবশেষে মশকের পানি শেষ হয়ে গেলে তিনি পিপাসার্ত হলেন এবং তাঁর শিশু পুত্রটিও পিপাসার্ত হলো। তিনি তাঁর দিকে তাকাতে লাগলেন, দেখলেন, শিশুটি ছটফট করছে (বা নড়াচড়া করছে)। শিশুটির দিকে তাকিয়ে থাকতে ভালো না লাগায় তিনি চলে গেলেন। তিনি দেখলেন, সাফা পাহাড় তাঁর নিকটবর্তী। তিনি তার উপর দাঁড়ালেন এবং উপত্যকার দিকে মুখ করে তাকালেন, কাউকে দেখতে পান কি না? কিন্তু তিনি কাউকে দেখতে পেলেন না। এরপর তিনি সাফা থেকে নামলেন এবং যখন উপত্যকায় পৌঁছলেন, তখন তিনি তাঁর চাদরের কোণ তুলে নিলেন। এরপর তিনি প্রাণপণ চেষ্টা করে দৌড়ালেন। এভাবে উপত্যকা পার হয়ে তিনি মারওয়ায় এলেন এবং তার উপর দাঁড়িয়ে তাকালেন, কাউকে দেখতে পান কি না? কিন্তু তিনি কাউকে দেখতে পেলেন না। তিনি এভাবে সাতবার করলেন। ইব্‌নু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এ কারণেই মানুষ এ দু'টি পাহাড়ের মধ্যে সা‘ঈ করে থাকে।

যখন তিনি মারওয়া পাহাড়ে পৌঁছলেন, তখন তিনি একটি আওয়াজ শুনতে পেলেন। তিনি নিজেকে উদ্দেশ্য করে বললেন: থামো! এরপর মনোযোগ দিলেন। তিনি আবার শব্দ শুনতে পেলেন। তিনি বললেন: তুমি তো আমার কণ্ঠ শুনেছো, যদি তোমার কাছে সাহায্যকারী কেউ থাকে (তবে সাহায্য করো)। তখন তিনি দেখলেন, যমযমের স্থানে ফেরেশতা উপস্থিত। ফেরেশতা তাঁর গোড়ালি দিয়ে (কিংবা তাঁর ডানা দিয়ে) আঘাত করলেন। সঙ্গে সঙ্গে পানি বের হতে শুরু করল। হাজেরা (আঃ) হাত দিয়ে চারদিকে বেড়া দিতে লাগলেন এবং ইশারায় বলতে লাগলেন: এভাবে, এভাবে। আর তিনি তাঁর মশকে পানি ভরে নিতে লাগলেন, অথচ পানি উপচে পড়তেছিল।

ইব্‌নু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ্ ইসমাঈল (আঃ)-এর মায়ের প্রতি দয়া করুন। তিনি যদি যমযমকে সেভাবে ছেড়ে দিতেন (অথবা: যদি তিনি পানি তুলে না নিতেন), তবে যমযম একটি প্রবাহিত ঝর্ণা হতো। তিনি পানি পান করলেন এবং তাঁর শিশু পুত্রকে দুধ পান করালেন। ফেরেশতা তাঁকে বললেন: তোমরা বিনাশের ভয় করো না। কারণ এখানে আল্লাহর ঘর রয়েছে, এই শিশু এবং তার পিতা তা নির্মাণ করবেন। নিশ্চয় আল্লাহ্ তাঁর বান্দাদেরকে নষ্ট করেন না। সেই ঘরটি মাটির উপর স্তূপের মতো উঁচু ছিল। বন্যা এলে তার ডানে ও বামে সরে যেত। তিনি এভাবেই ছিলেন, একদা জুহ্‌রুম গোত্রের একদল লোক বা এক পরিবার কাদ্দার পথ ধরে আসার সময় তাঁদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। তারা মক্কার নিম্নাংশে অবতরণ করল। তারা উড়তে থাকা কিছু পাখি দেখতে পেল এবং বলল: এই পাখিগুলো অবশ্যই পানির উপর উড়ছে। আমাদের জানা মতে এই উপত্যকায় কোনো পানি ছিল না। তখন তারা একজন বা দু'জনকে দৌড়িয়ে পাঠাল। তারা দেখল, সেখানে সত্যিই পানি রয়েছে। তারা ফিরে এসে তাদেরকে পানি সম্পর্কে খবর দিল। তখন তারা সেখানে আগমন করল। ইব্‌নু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: ইসমাঈল (আঃ)-এর মা পানির কাছেই ছিলেন। তারা বলল: আপনি কি আমাদেরকে আপনার কাছে অবস্থান করার অনুমতি দেবেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তবে পানির উপর তোমাদের কোনো অধিকার থাকবে না। তারা বলল: হ্যাঁ। ইব্‌নু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ইসমাঈল (আঃ)-এর মা (হাজেরা) মানব সংস্পর্শ পছন্দ করতেন, তাই এটি তাঁর ভালো লাগল।

এরপর তারা সেখানে বসবাস করতে লাগল এবং তাদের পরিবারের কাছে লোক পাঠাল। তারাও তাদের সঙ্গে এসে বসতি স্থাপন করল। এভাবে সেখানে তাদের কিছু পরিবারের লোক বসবাস করতে লাগল। শিশুটি বড় হয়ে তাদের থেকে আরবী ভাষা শিখল। যুবক হওয়ার পর তারা তাকে খুবই পছন্দ করল এবং তার প্রতি মুগ্ধ হলো। যখন সে বয়োপ্রাপ্ত হলো, তখন তারা তাদের গোত্রের এক মহিলার সঙ্গে তার বিয়ে দিল। এরপর ইসমাঈল (আঃ)-এর মা ইন্তেকাল করলেন। ইসমাঈল (আঃ)-এর বিয়ের পর ইব্‌রাহীম (আঃ) তাঁর ফেলে যাওয়া সম্পদ দেখতে আসলেন, কিন্তু তিনি ইসমাঈল (আঃ)-কে পেলেন না। তিনি তাঁর স্ত্রীর কাছে ইসমাঈল (আঃ) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: তিনি আমাদের জন্য জীবিকা অন্বেষণে বের হয়েছেন। এরপর তিনি তাঁদের জীবনযাপন ও অবস্থা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। স্ত্রী বললেন: আমরা কষ্টে আছি, আমরা অভাব ও সংকটে রয়েছি। এভাবে তিনি তাঁর কাছে অভাবের কথা বললেন।

ইব্‌রাহীম (আঃ) বললেন: যখন তোমার স্বামী ফিরে আসবে, তখন তাঁকে আমার পক্ষ থেকে সালাম বলবে এবং বলবে, সে যেন তার দরজার চৌকাঠ পরিবর্তন করে ফেলে। এরপর ইসমাঈল (আঃ) ফিরে এলে যেন কিছু অনুভব করলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমাদের কাছে কি কেউ এসেছিল? স্ত্রী বললেন: হ্যাঁ, একজন বৃদ্ধ এসেছিলেন, দেখতে এমন এমন। তিনি আপনার সম্পর্কে আমাদের জিজ্ঞেস করলেন, আমি তাঁকে খবর দিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, আমাদের জীবনযাপন কেমন চলছে। আমি তাঁকে বললাম, আমরা কঠোর অভাব ও কষ্টে আছি। ইসমাঈল (আঃ) জিজ্ঞেস করলেন: তিনি কি তোমাকে কোনো উপদেশ দিয়েছেন? স্ত্রী বললেন: হ্যাঁ, তিনি আমাকে আপনার প্রতি আমার পক্ষ থেকে সালাম জানাতে আদেশ করেছেন এবং বলেছেন: তুমি তোমার দরজার চৌকাঠ পরিবর্তন করে ফেলো। ইসমাঈল (আঃ) বললেন: তিনি আমার পিতা। তিনি আমাকে তোমাকে আলাদা করতে আদেশ করেছেন। তুমি তোমার পরিবারে চলে যাও। এরপর তিনি তাকে তালাক দিলেন।

এরপর তিনি তাদের মধ্য থেকে আরেকজনকে বিবাহ করলেন। আল্লাহ্ যতদিন চাইলেন, ইব্‌রাহীম (আঃ) তাদের থেকে দূরে রইলেন। এরপর তিনি তাদের কাছে এলেন, কিন্তু ইসমাঈল (আঃ)-কে পেলেন না। তিনি তাঁর স্ত্রীর কাছে গেলেন এবং তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। স্ত্রী বললেন: তিনি আমাদের জন্য জীবিকা অন্বেষণে বের হয়েছেন। ইব্‌রাহীম (আঃ) জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা কেমন আছো? তিনি তাঁদের জীবনযাপন ও অবস্থা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। স্ত্রী বললেন: আমরা ভালো ও সচ্ছলভাবে আছি এবং তিনি আল্লাহ্‌র প্রশংসা করলেন। তিনি বললেন: তোমাদের খাদ্য কী? স্ত্রী বললেন: গোশত। তিনি বললেন: তোমাদের পানীয় কী? স্ত্রী বললেন: পানি। ইব্‌রাহীম (আঃ) দু‘আ করলেন: হে আল্লাহ্! তুমি তাদের জন্য গোশত ও পানিতে বরকত দাও। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: সেই সময় তাদের কাছে কোনো শস্যদানা ছিল না। যদি থাকত, তবে তিনি সে জন্যও দু‘আ করতেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: গোশত ও পানি ছাড়া মক্কার বাইরে কেউ এ দু'টি গ্রহণ করলে সে তা হজম করতে পারবে না (অর্থাৎ মক্কাবাসীর জন্য এটিই উপযুক্ত খাদ্য)।

ইব্‌রাহীম (আঃ) বললেন: যখন তোমার স্বামী ফিরে আসবে, তখন তাঁকে আমার পক্ষ থেকে সালাম বলবে এবং তাকে আদেশ করবে, সে যেন তার দরজার চৌকাঠ ঠিক রাখে। এরপর ইসমাঈল (আঃ) ফিরে এলে জিজ্ঞেস করলেন: তোমাদের কাছে কি কেউ এসেছিল? স্ত্রী বললেন: হ্যাঁ, একজন সুদর্শন বৃদ্ধ আমাদের কাছে এসেছিলেন। তিনি তাঁর প্রশংসা করলেন। তিনি আপনার সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন, আমি তাঁকে খবর দিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, আমাদের জীবনযাপন কেমন চলছে? আমি তাঁকে বললাম, আমরা ভালো আছি। ইসমাঈল (আঃ) জিজ্ঞেস করলেন: তিনি কি তোমাকে কোনো উপদেশ দিয়েছেন? স্ত্রী বললেন: হ্যাঁ, তিনি আপনার প্রতি সালাম দিয়েছেন এবং আদেশ করেছেন, আপনি যেন আপনার দরজার চৌকাঠ ঠিক রাখেন। ইসমাঈল (আঃ) বললেন: তিনি আমার পিতা। আর তুমিই সেই চৌকাঠ। তিনি আমাকে আদেশ করেছেন, যেন আমি তোমাকে ধরে রাখি।

এরপর আল্লাহ্ যতদিন চাইলেন, তিনি তাদের থেকে দূরে রইলেন। এরপর তিনি আবার আসলেন। দেখলেন, ইসমাঈল (আঃ) যমযমের কাছে একটি বড় গাছের নিচে নিজের তীরগুলো ধার করছেন। ইসমাঈল (আঃ) তাঁকে দেখামাত্র উঠে দাঁড়ালেন। পিতা-পুত্র যেমন করে, তাঁরা দু'জন সেভাবে করলেন। এরপর ইব্‌রাহীম (আঃ) বললেন: হে ইসমাঈল! আল্লাহ্ আমাকে একটি কাজের আদেশ করেছেন। ইসমাঈল (আঃ) বললেন: আপনার রব আপনাকে যা আদেশ করেছেন, আপনি তা করুন। ইব্‌রাহীম (আঃ) বললেন: তুমি কি আমাকে সাহায্য করবে? ইসমাঈল (আঃ) বললেন: আমি অবশ্যই আপনাকে সাহায্য করব। ইব্‌রাহীম (আঃ) বললেন: আল্লাহ্ আমাকে এই স্থানে একটি ঘর নির্মাণ করতে আদেশ করেছেন।— তিনি তার আশেপাশের স্থান থেকে উঁচু একটি ঢিবির দিকে ইঙ্গিত করলেন। — বর্ণনাকারী বলেন: তখন তাঁরা কা'বার ভিত্তি স্থাপন শুরু করলেন। ইসমাঈল (আঃ) পাথর এনে দিতেন এবং ইব্‌রাহীম (আঃ) নির্মাণ করতেন। যখন দেয়াল উঁচু হয়ে গেল, তখন তিনি এই পাথরটি (মাকামে ইব্রাহীম) নিয়ে এসে তাঁর জন্য রাখলেন। তিনি তার উপর দাঁড়িয়ে নির্মাণ করতেন, আর ইসমাঈল (আঃ) তাঁকে পাথর এগিয়ে দিতেন। আর তাঁরা দু'জন বলছিলেন: (ভাবার্থ) "হে আমাদের রব! আমাদের পক্ষ থেকে কবুল করুন। নিশ্চয় আপনি সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ।" [সূরা আল-বাকারা: ১২৭] বর্ণনাকারী বলেন: তাঁরা দু'জন নির্মাণ করতে লাগলেন, এমনকি তাঁরা কা'বার চারপাশে ঘুরতে লাগলেন এবং বলছিলেন: (ভাবার্থ) "হে আমাদের রব! আমাদের পক্ষ থেকে কবুল করুন। নিশ্চয় আপনি সর্বশ্রোতা, সর্বজ্ঞ।"









আল-জামি` আল-কামিল (12542)


12542 - عن أبي ذر قال: قلت: يا رسول الله! أي مسجد وضع في الأرض أوّل؟ قال:"المسجد الحرام" قال: قلت: ثم أي؟ قال:"المسجد الأقصى" قلت: كم كان بينهما؟ قال:"أربعون سنة. ثم أينما أدركتك الصلاة بعدُ، فصلّه، فإن الفضل فيه".

متفق عليه: رواه البخاري في أحاديث الأنبياء (3366)، ومسلم في المساجد (520) كلاهما من حديث عبد الواحد، عن الأعمش، حدثنا إبراهيم التيمي، عن أبيه، قال: سمعت أبا ذر، فذكره.

انظر شرح الحديث في تفسير سورة الإسراء.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! পৃথিবীতে সর্বপ্রথম কোন মসজিদটি স্থাপন করা হয়েছিল?' তিনি বললেন, "আল-মাসজিদুল হারাম।" আমি বললাম, 'এরপর কোনটি?' তিনি বললেন, "আল-মাসজিদুল আকসা।" আমি বললাম, 'এতদুভয়ের মাঝে সময়ের ব্যবধান কত ছিল?' তিনি বললেন, "চল্লিশ বছর। এরপর যখনই যেখানে তোমার সালাতের সময় হয়, সেখানেই সালাত আদায় করে নাও, কেননা এর মধ্যেই কল্যাণ (ফজিলত) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (12543)


12543 - عن ابن عمر قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يركب راحلته بذي الحليفة، ثم يُهِلُّ حتى تستوي به قائمة.

متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1514)، ومسلم في الحج (29: 1187) كلاهما من طريق ابن وهب، عن يونس، عن ابن شهاب، أن سالم بن عبد الله أخبره، أن عبد الله بن عمر، قال: فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যুল হুলাইফায় তাঁর সওয়ারীতে আরোহণ করতে দেখেছি। অতঃপর যখন সেটি তাঁকে নিয়ে সোজা হয়ে দাঁড়িয়েছে, তখন তিনি তালবিয়া পাঠ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12544)


12544 - عن جابر بن عبد الله قال في حديث طويل عن حجة النبي صلى الله عليه وسلم وفيه: فصلى رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد، ثم ركب القصواء، حتى إذا استوت به ناقته على البيداء نظرت إلى مد بصري بين يديه، من راكب وماش، وعن يمينه مثل ذلك، وعن يساره مثل ذلك، ومن خلفه مثل ذلك …" الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طرق عن حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره بطوله.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বিদায় হজ্জ সম্পর্কিত এক দীর্ঘ হাদীসে বলেছেন, যার মধ্যে আছে: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদে সালাত আদায় করলেন, তারপর তিনি তাঁর উটনী 'আল-কাসওয়া'-এর পিঠে আরোহণ করলেন, অবশেষে যখন উটনীটি তাঁকে নিয়ে বায়দা’ নামক স্থানে সোজা হয়ে দাঁড়ালো, তখন আমি তাঁর সামনে আমার দৃষ্টিসীমা পর্যন্ত তাকিয়ে দেখলাম, সেখানে আরোহী ও পদযাত্রী উভয়ই ছিল। তাঁর ডানদিকেও অনুরূপ ছিল, বামদিকেও অনুরূপ ছিল এবং তাঁর পিছনেও অনুরূপ ছিল...।









আল-জামি` আল-কামিল (12545)


12545 - عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"ما العمل في أيام العشر أفضل من
العمل في هذه" قالوا: ولا الجهاد؟ قال:"ولا الجهاد، إلا رجل خرج يخاطر بنفسه وماله، فلم يرجع بشيء".

صحيح: رواه البخاري في العيدين (969) عن محمد بن عرعرة، قال: حدثنا شعبة، عن سليمان، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই দশ দিনের (যিলহজ্বের প্রথম দশ দিন) আমলের চেয়ে উত্তম অন্য কোনো আমল নেই।" সাহাবীগণ জিজ্ঞেস করলেন: জিহাদও কি নয়? তিনি বললেন: "জিহাদও নয়। তবে সেই ব্যক্তি (উত্তম) যে নিজের জীবন ও সম্পদ ঝুঁকিতে নিয়ে জিহাদে বের হয়েছে এবং কিছুই নিয়ে ফিরে আসেনি (শহীদ হয়ে গেছে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (12546)


12546 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من أيام أعظم عند الله، ولا العمل فيهن أحبّ إلى الله من هذه الأيام، فأكثروا فيها من التهليل والتحميد". يعني أيام العشر.

صحيح: رواه أبو عوانة في"مسنده" (3024) عن أبي يحيى عبد الله بن أحمد بن أبي ميسرة، حدثنا عبد الحميد بن غزوان البصري، حدثنا أبو عوانة، عن موسى بن أبي عائشة، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده صحيح، وموسى بن أبي عائشة ثقة من رجال الجماعة.

ورواه أحمد (5446)، وعبد بن حميد (807) كلاهما من حديث أبي عوانة، حدثنا يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد به مثله.

ويزيد بن أبي زياد هو الهاشمي مولاهم ضعيف، ولكنه توبع في الإسناد الأول.

وقوله: {فَكُلُوا مِنْهَا} أي: كلوا من الهدي والأضاحي، وقد ثبت في الصحيح أن النبي صلى الله عليه وسلم لما نحر هديه أمر من كل بدنة ببضعة، فطبخت، فأكل من لحمها، وشرب من مرقها.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহর কাছে কোনো দিনই এই দিনগুলোর (যুলহাজ্জাহর প্রথম দশ দিনের) চেয়ে মহান নয়, এবং এই দিনগুলোতে কৃত আমলের চেয়ে প্রিয় কোনো আমলও তাঁর কাছে নেই। সুতরাং তোমরা এই দিনগুলোতে তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ বলা) ও তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ বলা) বেশি বেশি করো।









আল-জামি` আল-কামিল (12547)


12547 - عن جابر بن عبد الله، قال: ثم انصرف إلى المنحر، فنحر ثلاثا وستين بيده، ثم أعطى عليا، فنحر ما غبر، وأشركه في هديه، ثم أمر من كل بدنة ببضعة، فجعلت في قدر، فطبخت، فأكلا من لحمها، وشربا من مرقها … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين بن أبي طالب، عن أبيه، عن جابر، فذكره في الحديث الطويل في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীস্থল অভিমুখে গেলেন, এবং নিজ হাতে তেষট্টিটি (উট) কুরবানী করলেন। এরপর তিনি আলীকে (বাকিগুলি) দিলেন, আর আলী অবশিষ্টগুলি কুরবানী করলেন। এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (আলীকে) তাঁর কুরবানীর পশুর (হাদী) মধ্যে অংশীদার করলেন। এরপর তিনি নির্দেশ দিলেন যেন প্রতিটি উট থেকে এক টুকরা করে মাংস নিয়ে তা পাতিলে রাখা হয় এবং রান্না করা হয়। অতঃপর তাঁরা (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ও আলী) সেই মাংস খেলেন এবং এর ঝোল পান করলেন...।