হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (12588)


12588 - عن عمرو بن العاص، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان إذا دخل المسجد قال:"أعوذ بالله العظيم، وبوجهه الكريم، وسلطانه القديم، من الشيطان الرجيم". قال: أقَط. قلت: نعم. قال:"فإذا قال ذلك قال الشيطان: حفظ مني سائر اليوم".
حسن: رواه أبو داود (466) عن إسماعيل بن بشر بن منصور، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، عن عبد الله بن المبارك، عن حيوة بن شُريح، قال: لقيت عقبة بن مسلم، فقلت له: بلغني أنك تحدث عن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان إذا دخل المسجد يقول: فذكره.

وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن بشر؛ فإنه حسن الحديث.

وقال النووي في"الخلاصة" (916):"وإسناده جيد".




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন মসজিদে প্রবেশ করতেন, তখন বলতেন: "আমি মহান আল্লাহর নিকট, তাঁর সম্মানিত চেহারার নিকট এবং তাঁর চিরন্তন কর্তৃত্বের নিকট বিতাড়িত শয়তান থেকে আশ্রয় চাই।" বর্ণনাকারী (রাবী) বললেন: শুধু কি এই? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: যখন কেউ এটি বলে, তখন শয়তান বলে: সে আমার থেকে সারা দিনের জন্য সুরক্ষিত হয়ে গেল।









আল-জামি` আল-কামিল (12589)


12589 - عن أبي اليسر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يدعو:"اللهم! إني أعوذ بك من الهدم، وأعوذ بك من التردي، وأعوذ بك من الغرق والحرق والهرم، وأعوذ بك أن يتخبطني الشيطان عند الموت، وأعوذ بك أن أموت في سبيلك مدبرا، وأعوذ بك أن أموت لديغا".

حسن: رواه أبو داود (1552 - 1553)، والنسائي (5531 - 5532)، وأحمد (15523) كلهم من طرق عن عبد الله بن سعيد بن أبي هند، عن صيفي مولى أفلح مولى أبي أيوب، عن أبي اليسر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل صيفي - وهو ابن زياد الأنصاري -، فإنه حسن الحديث.

والكلام عليه مبسوط في كتاب الأدعية والأذكار.




আবু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'আ করতেন: "হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট আশ্রয় চাই ধ্বংসস্তূপের নিচে চাপা পড়ে (মৃত্যু হওয়া) থেকে, আর আমি আপনার নিকট আশ্রয় চাই উঁচু স্থান থেকে পড়ে যাওয়া থেকে, আর আমি আপনার নিকট আশ্রয় চাই ডুবে যাওয়া, আগুনে পুড়ে যাওয়া এবং অতিশয় বার্ধক্য থেকে। আর আমি আপনার নিকট আশ্রয় চাই যে মৃত্যুর সময় শয়তান যেন আমাকে কাবু করে না ফেলে (পথভ্রষ্ট না করে)। আর আমি আপনার নিকট আশ্রয় চাই যে আমি যেন আপনার পথে (জিহাদে) পশ্চাদপসরণকারী অবস্থায় মারা না যাই। আর আমি আপনার নিকট আশ্রয় চাই যে বিষাক্ত কোনো প্রাণীর দংশনে আমার যেন মৃত্যু না হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (12590)


12590 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم حين أنزل عليه {وَأَنْذِرْ عَشِيرَتَكَ الْأَقْرَبِينَ} [سورة الشعراء: 214]"يا معشر قريش! اشتروا أنفسكم من الله، لا أغني عنكم من الله شيئا. يا بني عبد المطلب! لا أغني عنكم من الله شيئا. يا عباس بن عبد المطلب! لا أغني عنك من الله شيئا. يا صفية عمة رسول الله صلى الله عليه وسلم! لا أغني عنك من الله شيئا. يا فاطمة بنت رسول الله صلى الله عليه وسلم! سليني من مالي بما شئت، لا أغني عنك من الله شيئا".

متفق عليه: رواه البخارقي في الوصايا (2753)، ومسلم في الإيمان (206) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني سعيد بن المسيب وأبو سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর উপর আল্লাহ তা'আলার বাণী, "আর আপনি আপনার নিকটাত্মীয়দেরকে সতর্ক করুন" (সূরা আশ-শু'আরা: ২১৪) নাযিল হলো, তখন তিনি বললেন: "হে কুরাইশগণ! আল্লাহর নিকট (নেক আমলের মাধ্যমে) নিজেদেরকে ক্রয় করে নাও। আল্লাহর পক্ষ থেকে আমি তোমাদের কোনো উপকারে আসব না। হে আব্দুল মুত্তালিবের বংশধরেরা! আল্লাহর পক্ষ থেকে আমি তোমাদের কোনো উপকারে আসব না। হে আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব! আল্লাহর পক্ষ থেকে আমি তোমার কোনো উপকারে আসব না। হে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর ফুফু সাফিয়্যাহ! আল্লাহর পক্ষ থেকে আমি তোমার কোনো উপকারে আসব না। হে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কন্যা ফাতিমা! আমার সম্পদ থেকে তোমার যা ইচ্ছা চেয়ে নাও, কিন্তু আল্লাহর পক্ষ থেকে আমি তোমার কোনো উপকারে আসব না।"









আল-জামি` আল-কামিল (12591)


12591 - عن أبي هريرة قال: لما أنزلت هذه الآية: {وَأَنْذِرْ عَشِيرَتَكَ الْأَقْرَبِينَ} [سورة الشعراء: 214]، دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم قريشا، فاجتمعوا، فعمّ وخصّ، فقال:"يا بني كعب
ابن لؤي! أنقذوا أنفسكم من النار. يا بني مرة بن كعب! أنقذوا أنفسكم من النار. يا بني عبد شمس! أنقذوا أنفسكم من النار. يا بني عبد مناف! أنقذوا أنفسكم من النار. يا فاطمة! أنقذي نفسك من النار، فإني لا أملك لكم من الله شيئا غير أن لكم رحما سأبلّها ببلالها".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (204) من طرق عن جرير، عن عبد الملك بن عمير، عن موسى بن طلحة، عن أبي هريرة، فذكره.

سأبلّها ببلالها: بكسر الباء وفتحها، والبلل جمع بلال، وهو كل ما بلّ الحلق من ماء، أو لبن أو غيره، ومعنى الحديث: أي أصلكم في الدنيا، ولا أغني عنكم من الله شيئا. قاله السيوطي.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {وَأَنْذِرْ عَشِيرَتَكَ الْأَقْرَبِينَ} [সূরা আশ-শুআরা: ২১৪], তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশদের ডাকলেন। তারা একত্রিত হলো। তিনি সাধারণভাবে এবং বিশেষভাবে সম্বোধন করলেন। অতঃপর তিনি বললেন, "হে কা'ব ইবন লুয়াই গোত্রের লোকেরা! তোমরা নিজেদেরকে আগুন থেকে রক্ষা করো। হে মুররাহ ইবন কা'ব গোত্রের লোকেরা! তোমরা নিজেদেরকে আগুন থেকে রক্ষা করো। হে আবদ শামস গোত্রের লোকেরা! তোমরা নিজেদেরকে আগুন থেকে রক্ষা করো। হে আবদ মানাফ গোত্রের লোকেরা! তোমরা নিজেদেরকে আগুন থেকে রক্ষা করো। হে ফাতিমা! তুমি নিজেকে আগুন থেকে রক্ষা করো। কারণ আল্লাহর পক্ষ থেকে (তোমাদের ব্যাপারে) আমি কোনো কিছুর মালিক নই। তবে তোমাদের সঙ্গে আমার রক্তের সম্পর্ক রয়েছে, যা আমি অবশ্যই সিক্ত করব।"









আল-জামি` আল-কামিল (12592)


12592 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:" … ومن بطّأ به عملُه لم يُسرع به نسبه".

صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء (2699) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال: فذكره.

وأما ما روي عن النبي صلى الله عليه وسلم:"إن الأنساب يوم القيامة تنقطع غير نسبي وسببي". وفي رواية:"إن رحمي موصولة في الدنيا والآخرة".

فكلها معلولة سندا، ومنكرة متنا لمخالفتها للكتاب والسنة الصيحة.

وقال الشوكاني بعد أن ذكر الحديث مع قصة رجل، فقال:"في هذا المتن نكارة، لا تخفى على من له ممارسة لكلامه صلى الله عليه وسلم". الفوائد المجموعة (321).

وإن صحّ الحديث فيكون معناه: لا يبقى يوم القيامة سبب ولا نسب إلا نسبه وسببه، وهو الإيمان والقرآن والعمل الصالح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ...যার আমল তাকে পিছিয়ে দেয়, তার বংশ তাকে এগিয়ে দিতে পারবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (12593)


12593 - عن حنش بن عبد الله، أنّ رجلا مصابا مرّ به على ابن مسعود، فقرأ في أذنه: {أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَاكُمْ عَبَثًا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ (115) فَتَعَالَى اللَّهُ الْمَلِكُ الْحَقُّ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْكَرِيمِ} حتى ختم السورة، فبرأ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بماذا قرات في أذنه؟". فأخبره، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"والذي نفسى بيده! لو أنّ رجلا موقنا قرأها على جبل لزال".
حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (8/ 2513) عن بحر بن نصر الخولاني، ثنا ابن وهب، أخبرني ابن لهيعة، عن ابن هبيرة، عن حنش بن عبد الله، فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن لهيعة؛ فإن الراوي عنه عبد الله بن وهب. وهو ممن سمع منه قبل اختلاطه.

تنبيه: لقد وقع في مطبوعة تفسير ابن أبي حاتم، وتفسير ابن كثير"يحيى بن نصر الخولاني" والصواب أنه"بحر بن نصر الخولاني". فإنه شيخ ابن أبي حاتم، وشيخه ابن وهب.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জিনে আছরগ্রস্ত (বা মৃগী আক্রান্ত) এক ব্যক্তি তাঁর পাশ দিয়ে অতিক্রম করছিল। তখন তিনি তার কানে সূরা মু'মিনূনের এই আয়াতগুলো তিলাওয়াত করলেন: "তোমরা কি মনে করেছিলে যে, আমি তোমাদেরকে অনর্থক সৃষ্টি করেছি এবং তোমরা আমার দিকে প্রত্যাবর্তিত হবে না? (১১৫) সুতরাং মহামহিম আল্লাহ, যিনি প্রকৃত মালিক, তিনি সুমহান। তিনি ব্যতীত অন্য কোনো ইলাহ নেই; তিনি সম্মানিত আরশের অধিপতি।" (১১৬) এভাবে তিনি সূরাটি শেষ করলেন। ফলে লোকটি আরোগ্য লাভ করলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি তার কানে কী তিলাওয়াত করেছিলে?" তিনি তাঁকে সে সম্পর্কে জানালেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! যদি কোনো দৃঢ় বিশ্বাসী ব্যক্তি এই আয়াতগুলো কোনো পাহাড়ের উপর তিলাওয়াত করে, তবে তা-ও স্থানচ্যুত হয়ে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (12594)


12594 - عن إبراهيم بن الحارث التيمي قال: وجهنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في سرية، فأمرنا أن نقول إذا نحن أمسينا وأصبحنا: {أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَاكُمْ عَبَثًا} فقرأناها، فغنمنا، وسلمنا.

حسن: رواه أبو نعيم في معرفة الصحابة (728) عن أبي أحمد الغطريفي، ثنا زكريا الساجي، ثنا يزيد بن يوسف بن عمرو، ثنا خالد بن نزار، ثنا سفيان بن عيينة، عن محمد بن المنكدر، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبيه، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل خالد بن نزار، فإنه حسن الحديث.

وقال ابن حجر في الإصابة في ترجمة إبراهيم بن الحارث بن خالد التيمي:"إسناده لا بأس به".




ইব্ৰাহীম ইবনুল হারিথ আত-তাইমী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে একটি সামরিক অভিযানে (সারিয়্যা) প্রেরণ করলেন, অতঃপর তিনি আমাদেরকে আদেশ দিলেন যে, যখন আমরা সন্ধ্যায় উপনীত হব এবং যখন সকালে উপনীত হব, তখন যেন আমরা বলি: "তোমরা কি মনে করেছ যে, আমরা তোমাদেরকে এমনিই অনর্থক সৃষ্টি করেছি?" আমরা তা পাঠ করলাম। ফলে আমরা গণীমত লাভ করলাম এবং নিরাপদে থাকলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (12595)


12595 - عن * *




১২৫৯৫ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (12596)


12596 - عن أبي هريرة، وزيد بن خالد الجهني، أنهما أخبراه أن رجلين اختصما إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال أحدهما: يا رسول الله! اقض بيننا بكتاب الله، وقال الآخر - وهو أفقههما -: أجل، يا رسول الله! فاقض بيننا بكتاب الله، وائذن لي في أن أتكلم، قال:"تكلّم"، فقال: إن ابني كان عسيفا على هذا، فزنى بامرأته، فأخبروني أن على ابني الرجم، فافتديت منه بمائة شاة وبجارية لي. ثم إني سألت أهل العلم، فأخبروني: أن ما على ابني جلد مائة وتغريب عام، وأخبروني إنما الرجم على امرأته، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما والذي نفسي بيده، لأقضينّ بينكما بكتاب الله، أما غنمك وجاريتك فَرَدٌّ عليك". وجلد ابنه مائة، وغربه عاما، وأمر أنيسا الأسلمي أن يأتي امرأة الآخر،"فإن اعترفت، فارجمها"، فاعترفت، فرجمها.

متفق عليه: رواه مالك في الحدود (6) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة، وزيد بن خالد الجهني، فذكراه.

ورواه البخاري في الحدود (6842، 6843) من طريق مالك به مثله.

ورواه مسلم في الحدود (1698، 1697) من وجوه أخرى عن الزهري به.




আবু হুরাইরা ও যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা দুজন বর্ণনা করেন যে, দুজন লোক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে মামলা পেশ করল। তাদের একজন বলল, ‘ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি আমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করে দিন।’ অপর লোকটি— যে তাদের দু’জনের মধ্যে অধিক বিচক্ষণ ছিল— বলল, ‘ঠিক, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি আমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করে দিন এবং আমাকে কথা বলার অনুমতি দিন।’ তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘কথা বল।’ সে বলল, ‘আমার ছেলে এই লোকটির অধীনে মজুর ছিল। সে তার স্ত্রীর সাথে যিনা (ব্যভিচার) করেছে। তখন লোকেরা আমাকে জানাল যে, আমার ছেলের উপর রজমের বিধান প্রযোজ্য। তাই আমি তার পক্ষ থেকে একশ’ ছাগল ও আমার একটি দাসীর বিনিময়ে মুক্তিপণ দিলাম। অতঃপর আমি আলেমদের কাছে জানতে চাইলে তারা আমাকে জানালেন যে, আমার ছেলের উপর একশ’ দোররা ও এক বছরের নির্বাসন (তাগবীব-ই-আম) রয়েছে। আর তারা আমাকে জানালেন যে, কেবল তার (অপর লোকটির) স্ত্রীর উপরই রজম প্রযোজ্য হবে।’ তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, ‘শপথ সেই সত্তার, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! আমি অবশ্যই তোমাদের মাঝে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করব। তোমার ছাগল ও দাসী তোমাকে ফেরত দেওয়া হবে।’ অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার (অভিযুক্ত ব্যক্তির) ছেলেকে একশ’ দোররা মারলেন এবং এক বছরের জন্য নির্বাসিত করলেন। আর আনীস আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলেন, যেন সে অন্য লোকটির স্ত্রীর কাছে যায়। তিনি বললেন, ‘যদি সে স্বীকার করে, তবে তাকে রজম করো।’ অতঃপর সে (মহিলাটি) স্বীকার করল এবং আনীস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে রজম করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12597)


12597 - عن عبد الله بن عمرو قال: كان رجل يقال له مرثد بن أبي مرثد، وكان رجلا يحمل الأسرى من مكة حتى يأتي بهم المدينة، قال: وكانت امرأة بغيٌّ بمكة، يقال لها: عناق، وكانت صديقة له، وإنه كان وعد رجلا من أسارى مكة يحمله، قال:
فجئت حتى انتهيت إلى ظل حائط من حوائط مكة في ليلة مقمرة. قال: فجاءت عناق، فأبصرت سواد ظلي بجنب الحائط، فلما انتهت إلي عرفت، فقالت: مرثد؟ . فقلت: مرثد، فقالت: مرحبا وأهلا، هلمّ! فبِتْ عندنا الليلة. قال: قلت: حرم الله الزنا. قالت: يا أهل الخيام! هذا الرجل يحمل أسراكم. قال: فتبعني ثمانية، وسلكت الخندمة، فانتهيت إلى كهف أو غار، فدخلت، فجاؤوا حتى قاموا على رأسي، فبالوا، فظل بولهم على رأسي، وأعماهم الله عني، قال: ثم رجعوا، ورجعت إلى صاحبي، فحملته، وكان رجلا ثقيلا حتى انتهيت إلى الإذخر، ففككت عنه أكبُله، فجعلت أحمله، ويعينني حتى قدمت المدينة، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول الله أنكح عناقا؟ . فأمسك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم يردّ علي شيئا حتى نزلت: {الزَّانِي لَا يَنْكِحُ إِلَّا زَانِيَةً أَوْ مُشْرِكَةً وَالزَّانِيَةُ لَا يَنْكِحُهَا إِلَّا زَانٍ أَوْ مُشْرِكٌ وَحُرِّمَ ذَلِكَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ}، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا مرثد! الزاني لا ينكح إلا زانية أو مشركة، والزانية لا ينكحها إلا زان أو مشرك، فلا تنكحها".

حسن: رواه أبو داود (2051)، والترمذي (3177) واللفظ له، والنسائي (3228)، والحاكم (2/ 166) كلهم من طريق عبيد الله بن الأخنس، قال: أخبرني عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، فإنه حسن الحديث.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক ছিলেন, যার নাম ছিল মারসাদ ইবনে আবী মারসাদ। তিনি মক্কা থেকে বন্দীদের বহন করে মদীনায় নিয়ে আসতেন। তিনি বলেন: মক্কায় উনাক নামে একজন ব্যভিচারিণী নারী ছিল, যে ছিল তার বন্ধু। তিনি মক্কার বন্দীদের মধ্যে একজনকে বহন করে নিয়ে আসার প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলেন।

তিনি বলেন: আমি চাঁদনী রাতে মক্কার একটি দেয়ালের ছায়ায় পৌঁছলাম। উনাক এসে দেয়ালের পাশে আমার ছায়ার আভাস দেখতে পেল। সে যখন আমার কাছে এলো, আমাকে চিনতে পারল এবং জিজ্ঞেস করল: মারসাদ? আমি বললাম: মারসাদ। সে বলল: আপনাকে স্বাগতম। আসুন! আজ রাতে আমাদের কাছে থাকুন। তিনি বলেন: আমি বললাম: আল্লাহ তাআলা যিনাকে (ব্যভিচার) হারাম করেছেন।

সে (উনাক) বলল: হে তাঁবুতে অবস্থানকারীরা! এই লোকটি তোমাদের বন্দীদেরকে বহন করে নিয়ে যাচ্ছে। তিনি বলেন: আটজন লোক আমাকে অনুসরণ করল। আমি আল-খান্দামাহ পথ ধরে চললাম এবং একটি গুহা বা গর্তে পৌঁছলাম, আর তাতে প্রবেশ করলাম। তারা এসে আমার মাথার ওপরে দাঁড়াল এবং পেশাব করল। তাদের পেশাব আমার মাথায় পড়ল, কিন্তু আল্লাহ তাদের আমাকে দেখতে অন্ধ করে দিলেন। তিনি বলেন: এরপর তারা ফিরে গেল। আমি আমার সঙ্গীর কাছে ফিরে গেলাম এবং তাকে বহন করলাম। লোকটি বেশ ভারী ছিল। আমি ইজখির (এক প্রকার ঘাস বা স্থান) পর্যন্ত পৌঁছলাম। আমি তার বাঁধন খুলে দিলাম এবং তাকে বহন করতে লাগলাম, আর সেও আমাকে সাহায্য করল। অবশেষে আমি মদীনায় পৌঁছলাম। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি কি উনাককে বিবাহ করব?

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নীরব রইলেন এবং আমার কোনো জবাব দিলেন না, যতক্ষণ না এই আয়াতটি নাযিল হলো: "ব্যভিচারী পুরুষ ব্যভিচারিণী নারী বা মুশরিক নারী ছাড়া কাউকে বিবাহ করে না এবং ব্যভিচারিণী নারীকে ব্যভিচারী পুরুষ বা মুশরিক পুরুষ ছাড়া কেউ বিবাহ করে না। আর মুমিনদের জন্য তা হারাম করা হয়েছে।" (সূরা আন-নূর: ৩)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে মারসাদ! ব্যভিচারী পুরুষ ব্যভিচারিণী বা মুশরিক নারী ছাড়া কাউকে বিবাহ করে না, আর ব্যভিচারিণী নারীকে ব্যভিচারী পুরুষ বা মুশরিক পুরুষ ছাড়া কেউ বিবাহ করে না। সুতরাং তুমি তাকে বিবাহ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (12598)


12598 - عن شعبة مولى ابن عباس قال: سمعت ابن عباس ورجل سأله، فقال: إني كنت اُلِمُّ بامرأة آتي منها ما حرّم الله عز وجل عليّ، فرزقني الله من ذلك توبة، فاردتُ أن أتزوجها، فقال أناس: إن الزاني لا ينكح إلا زانية، فقال ابن عباس: ليس هذا في هذا، انكحها، فما كان من إثم فعليّ.

حسن: رواه ابن أبي شيبة في المصنف (17200)، وابن جرير في تفسيره (17/ 153)، وابن أبي حاتم في تفسيره (8/ 2521) كلهم من طريق ابن أبي ذئب قال: سمعت شعبة مولى ابن عباس، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل شعبة مولى ابن عباس، فإنه حسن الحديث.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শু'বাহ, ইবনু আব্বাসের আযাদকৃত গোলাম, বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শুনতে পেলাম যখন এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করছিল। লোকটি বলল: আমি এক মহিলার সাথে ব্যভিচারে লিপ্ত ছিলাম এবং তার সাথে এমন কাজ করতাম যা আল্লাহ তাআলা আমার জন্য হারাম করেছেন। অতঃপর আল্লাহ আমাকে এ থেকে তওবা করার তওফীক দিয়েছেন। এখন আমি তাকে বিবাহ করতে চাই। কিন্তু কিছু লোক বলল, 'ব্যভিচারী ব্যক্তি ব্যভিচারিণী ছাড়া কাউকে বিবাহ করতে পারে না।' ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই (হুকুম) এখানে প্রযোজ্য নয়। তুমি তাকে বিবাহ কর। এর ফলে যদি কোনো গুনাহ হয়, তবে তার দায়িত্ব আমার উপর।









আল-জামি` আল-কামিল (12599)


12599 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا ينكح الزاني المجلود إلا مثله".

حسن: رواه أبو داود (2052)، وأحمد (8300)، والحاكم (2/ 166)، وعنه البيهقي (7/ 156) كلهم من حديث عبد الوارث، عن حبيب المعلّم، عن عمرو بن شعيب، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، فإنه حسن الحديث.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قال الإمام أحمد: لا يصح العقد من الرجل العفيف على المرأة البغي ما دامت كذلك حتى تستتاب، فإن تابت صح العقد عليها، وإلا فلا، وكذلك لا يصح تزويج المرأة الحرة العفيفة بالرجل الفاجر المسافح حتى يتوب توبة صحيحة، وذلك لقوله تعالى: {وَحُرِّمَ ذَلِكَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ} ذكره ابن كثير في تفسيره.

والكلام على ذلك مبسوط في كتاب النكاح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যভিচারীকে বেত্রাঘাত করা হয়েছে, সে যেন তার সমকক্ষ ব্যতীত অন্য কাউকে বিবাহ না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (12600)


12600 - عن سهل بن سعد: أن عويمرا أتى عاصم بن عدي، وكان سيد بني عجلان، فقال: كيف تقولون في رجل وجد مع امرأته رجلا، أيقتله فتقتلونه، أم كيف يصنع؟ سل لي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فأتى عاصمٌ النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله! فكره رسول الله صلى الله عليه وسلم المسائل، وعابها، قال عويمر: والله لا أنتهي حتى أسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فجاء عويمر، فقال: يا رسول الله! رجل وجد مع امرأته رجلا، أيقتله، فتقتلونه أم كيف يصنع؟ . فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد أنزل الله القرآن فيك وفي صاحبتك". فأمرهما رسول الله صلى الله عليه وسلم بالملاعنة بما سمى الله في كتابه، فلاعنها، ثم قال: يا رسول الله! إن حبستها فقد ظلمتها، فطَلّقها. فكانت سنة لمن كان بعدهما في المتلاعنين، ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"انظروا، فإن جاءت به أسحم، أدعج العينين، عظيم الأليتين، خدلج الساقين، فلا أحسب عويمرا إلا قد صدق عليها، وإن جاءت به أحيمر، كأنه وحرة، فلا أحسب عويمرا إلا قد كذب عليها". فجاءت به على النعت الذي نعت به رسول الله صلى الله عليه وسلم من تصديق عويمر، فكان بعد ينسب إلى أمه.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4745)، ومسلم في اللعان (1492) كلاهما من طريق الزهري، عن سهل بن سعد، فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه، إلا أنه لم يذكر قوله صلى الله عليه وسلم:"انظروا، فإن جاءت به أسحم …" إلى آخره.

وزاد البخاري في رواية (4746):"وكانت حاملا، فأنكر حملها، وكان ابنها يدعى إليها، ثم
جرت السنة في الميراث أن يرثها، وترث منه ما فرض الله لها".




সহল ইবনে সাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

উওয়াইমির আসিম ইবনে আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলেন, যিনি ছিলেন বনী আজলানের নেতা। তিনি বললেন, "আপনারা সেই ব্যক্তির ব্যাপারে কী বলেন, যে তার স্ত্রীর সাথে অন্য কোনো পুরুষকে দেখতে পায়? সে কি তাকে হত্যা করবে, আর আপনারা এর বদলে তাকে হত্যা করবেন, নাকি সে কী করবে? আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আমার জন্য এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করুন।"

এরপর আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন, "ইয়া রাসূলুল্লাহ!" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই ধরনের প্রশ্ন করাকে অপছন্দ করলেন এবং এর সমালোচনা করলেন। উওয়াইমির বললেন, "আল্লাহর শপথ, আমি বিরত হব না, যতক্ষণ না আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করি।" অতঃপর উওয়াইমির এলেন এবং বললেন, "ইয়া রাসূলুল্লাহ! কোনো ব্যক্তি যদি তার স্ত্রীর সাথে অন্য কোনো পুরুষকে দেখতে পায়, সে কি তাকে হত্যা করবে, আর আপনারা এর বদলে তাকে হত্যা করবেন, নাকি সে কী করবে?"

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহ তোমার এবং তোমার স্ত্রীর ব্যাপারে কুরআন নাযিল করেছেন।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের দুজনকে লিয়ান (পারস্পরিক অভিশাপ) করার নির্দেশ দিলেন, যা আল্লাহ তাঁর কিতাবে উল্লেখ করেছেন। অতঃপর সে তার সাথে লিয়ান করল। এরপর সে বলল, "ইয়া রাসূলুল্লাহ! যদি আমি তাকে আটকে রাখি (স্ত্রী হিসেবে রাখি), তবে আমি তার প্রতি যুলুম করব।" সুতরাং সে তাকে তালাক দিয়ে দিল। পরবর্তীকালে মুতালি'আনীন (যারা লিয়ান করে) দের জন্য এটা নিয়মে পরিণত হলো।

এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা লক্ষ্য করো, যদি সে এমন কালো রঙের সন্তান প্রসব করে, যার চোখ দুটি বড় ও কালো, নিতম্ব স্থুল এবং পাণ্ডু (শক্ত মাংসল) পা বিশিষ্ট হয়, তবে আমি মনে করি উওয়াইমির তার ব্যাপারে সত্য বলেছে। আর যদি সে লালচে রঙের সন্তান প্রসব করে, যা গুই সাপের মতো (ক্ষুদ্র ও দুর্বল), তবে আমি মনে করি উওয়াইমির তার ব্যাপারে মিথ্যা বলেছে।"

অতঃপর সে ঠিক সেই বর্ণনানুযায়ী সন্তান প্রসব করল, যার মাধ্যমে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উওয়াইমিরকে সত্যবাদী বলে ঘোষণা করেছিলেন। এরপর থেকে সে তার মায়ের দিকে সম্পর্কিত হতো।

(সহীহ বুখারীর অন্য এক বর্ণনায় আরও এসেছে:) সে তখন গর্ভবতী ছিল, এবং উওয়াইমির তার গর্ভকে অস্বীকার করেছিলেন। আর সেই সন্তানকে তার মায়ের দিকেই ডাকা হতো। এরপর মীরাসের (উত্তরাধিকার) ক্ষেত্রে এই নিয়ম চালু হয় যে, সন্তানটি তার মায়ের উত্তরাধিকারী হবে এবং মাও সন্তানের সেই অংশের উত্তরাধিকারী হবেন যা আল্লাহ তার জন্য নির্ধারণ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12601)


12601 - عن ابن عباس: أن هلال بن أمية قذف امرأته عند النبي صلى الله عليه وسلم بشريك بن سحماء، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"البيّنة أو حد في ظهرك". فقال: يا رسول الله! إذا رأى أحدنا على امرأته رجلا، ينطلق يلتمس البينة؟ . فجعل النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"البيّنة، وإلا حدّ في ظهرك". فقال هلال: والذي بعثك بالحق، إني لصادق، فلينزلنّ الله ما يبرئ ظهري من الحد، فنزل جبريل، وأنزل عليه: {وَالَّذِينَ يَرْمُونَ أَزْوَاجَهُمْ}، فقرأ حتى بلغ {إِنْ كَانَ مِنَ الصَّادِقِينَ} فانصرف النبي صلى الله عليه وسلم، فأرسل إليها، فجاء هلال، فشهد، والنبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الله يعلم أن أحدكما كاذب، فهل منكما تائب؟". ثم قامت، فشهدت، فلما كانت عند الخامسة وقّفوها، وقالوا: إنها موجبة. قال ابن عباس: فتلكأت، ونكصت حتى ظننا أنها ترجع، ثم قالت: لا أفضح قومي سائر اليوم، فمضت، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أبصروها، فإن جاءت به أكحل العينين، سابغ الأليتين، خدلج الساقين، فهو لشريك بن سحماء". فجاءت به كذلك، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لولا ما مضى من كتاب الله لكان لي ولها شأن".

صحيح: رواه البخاري في التفسير (4747) عن محمد بن بشار، حدثنا ابن أبي عدي، عن هشام بن حسان، حدثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিলাল ইবনু উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তার স্ত্রী শারিক ইবনু সাহমার সাথে ব্যভিচারের অপবাদ দিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হয় প্রমাণ আনো, না হয় তোমার পিঠে হদ (শাস্তি) কার্যকর করা হবে।" হিলাল বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের মধ্যে কেউ যদি তার স্ত্রীর সাথে কোনো পুরুষকে দেখে, তবে কি সে প্রমাণ খুঁজতে যাবে? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারবার বলছিলেন: "প্রমাণ আনো, অন্যথায় তোমার পিঠে হদ কার্যকর হবে।" হিলাল তখন বললেন: ঐ সত্তার কসম, যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন! আমি অবশ্যই সত্যবাদী। আল্লাহ অবশ্যই এমন কিছু নাযিল করবেন যা আমার পিঠকে হদ থেকে মুক্ত করবে।

তখন জিবরাঈল (আঃ) এলেন এবং তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর এই আয়াত নাযিল করলেন: {وَالَّذِينَ يَرْمُونَ أَزْوَاجَهُمْ} [‘যারা তাদের স্ত্রীদের প্রতি অপবাদ আরোপ করে’...]। তিনি [নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম] তেলাওয়াত করলেন যতক্ষণ না তিনি পৌঁছলেন: {إِنْ كَانَ مِنَ الصَّادِقِينَ} [‘যদি সে সত্যবাদী হয়’] পর্যন্ত।

এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে গেলেন এবং তার স্ত্রীর কাছে লোক পাঠালেন (যেন সে আসে)। হিলাল এলেন এবং (চারবার) শপথ করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলছিলেন: "আল্লাহ জানেন যে তোমাদের দুজনের মধ্যে একজন অবশ্যই মিথ্যাবাদী। তোমাদের কেউ কি তওবা করবে?" অতঃপর স্ত্রী দাঁড়ালো এবং (চারবার) শপথ করল। যখন সে পঞ্চম শপথ করার জন্য প্রস্তুত হলো, তখন তারা তাকে থামালো এবং বলল: "এটি [পঞ্চম শপথ] শাস্তিকে আবশ্যককারী।"

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন সে ইতস্তত করল এবং পিছিয়ে গেল, এমনকি আমরা মনে করলাম যে সে ফিরে যাবে (শপথ করবে না)। কিন্তু এরপর সে বলল: "আমি আজ সারাদিন আমার কওমকে অপদস্থ করব না।" এরপর সে পঞ্চম শপথটি সম্পন্ন করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তাকে লক্ষ্য কর। যদি সে এমন সন্তান প্রসব করে, যার চোখ সুরমা লাগানো, নিতম্ব ভারী ও বিস্তৃত এবং পায়ের নলা মোটা, তবে সে শারিক ইবনু সাহমার সন্তান হবে।" অতঃপর সে ঠিক তেমনই সন্তান প্রসব করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি আল্লাহর কিতাবের পূর্বেকার বিধান কার্যকর না থাকত, তবে আমার জন্য এবং তার জন্য ভিন্ন ব্যবস্থা হতো।"









আল-জামি` আল-কামিল (12602)


12602 - عن ابن عمر: أن رجلا رمى امرأته، فانتفى من ولدها في زمان رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأمر بهما رسول الله صلى الله عليه وسلم، فتلاعنا كما قال الله، ثم قضى بالولد للمرأة، وفرّق بين المتلاعنين.

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4748)، ومسلم في اللعان (9: 1494) كلاهما من طريق عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم مختصر بهذا الإسناد.




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যমানায় এক ব্যক্তি তার স্ত্রীর প্রতি (ব্যভিচারের) অপবাদ দিয়েছিল এবং তার সন্তানের পিতৃত্ব অস্বীকার করেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদেরকে ডেকে আনলেন এবং আল্লাহ যেমন নির্দেশ দিয়েছেন, সে অনুযায়ী তারা লি'আন (শপথ ও অভিসম্পাত) করল। এরপর তিনি সন্তানকে মহিলার বলে ফয়সালা দিলেন এবং লি'আনকারী স্বামী-স্ত্রীর মাঝে বিচ্ছেদ ঘটিয়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12603)


12603 - عن المغيرة بن شعبة قال: قال سعد بن عبادة: لو رأيت رجلا مع امرأتي لضربته بالسيف، غير مصفح عنه. فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"أتعجبون من غيرة سعد، فوالله، لأنا أغير منه، والله أغير مني، من أجل غيرة الله حرّم الفواحش ما ظهر منها وما بطن، ولا شخص أغير من الله، ولا شخص أحب إليه العذر من الله، من أجل ذلك بعث الله المرسلين مبشرين ومنذرين، ولا شخص أحب إليه المدحة من الله، من أجل ذلك وعد الله الجنة".

متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6846)، ومسلم في اللعان (17: 1499) - واللفظ له -
كلاهما من طريق أبي عوانة، عن عبد الملك بن عمير، عن وراد - كاتب المغيرة -، عن المغيرة بن شعبة، قال: فذكره.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা’দ ইবনু উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি আমি আমার স্ত্রীর সাথে কোনো পুরুষকে দেখতে পাই, তবে তাকে তলোয়ারের ধারালো দিক দিয়ে আঘাত করব, বাঁকা দিক দিয়ে নয়। এই বিষয়টি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এর কাছে পৌঁছল। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা সা’দের আত্মমর্যাদাবোধ (গীরাত) দেখে বিস্মিত হচ্ছ? আল্লাহর কসম! আমি সা’দের চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাবোধ সম্পন্ন, আর আল্লাহ আমার চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাবোধ সম্পন্ন। আল্লাহর আত্মমর্যাদাবোধের কারণেই তিনি প্রকাশ্য ও গোপন সব প্রকার অশ্লীলতা হারাম করেছেন। আল্লাহর চেয়ে আত্মমর্যাদাবোধ সম্পন্ন আর কেউ নেই। আর আল্লাহর চেয়ে কৈফিয়ত (ওজর) গ্রহণ করা অন্য কারো কাছে অধিক প্রিয় নয়, একারণেই আল্লাহ রাসূলগণকে সুসংবাদদাতা ও সতর্ককারীরূপে প্রেরণ করেছেন। আর আল্লাহর চেয়ে প্রশংসা পছন্দ করেন এমন আর কেউ নেই, একারণেই আল্লাহ জান্নাতের ওয়াদা করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (12604)


12604 - عن أبي هريرة قال: قال سعد بن عبادة: يا رسول الله! لو وجدت مع أهلي رجلا لم أمسه حتى آتي بأربعة شهداء؟ . قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم". قال: كلا، والذي بعثك بالحق، إن كنت لأعاجله بالسيف قبل ذلك. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اسمعوا إلى ما يقول سيدكم، إنه لغيور، وأنا أغير منه، والله أغير مني".

صحيح: رواه مسلم في اللعان (1498: 16) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا خالد بن مخلد، عن سليمان بن بلال، حدثني سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা'দ ইবনু 'উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি আমি আমার স্ত্রীর সাথে কোনো পুরুষকে দেখতে পাই, তবে কি আমি চারজন সাক্ষী না আনা পর্যন্ত তাকে স্পর্শ (কিছু করা) করব না? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (সা'দ) বললেন, কক্ষনো নয়! সেই সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে প্রেরণ করেছেন, এর আগে আমি অবশ্যই তাকে তরবারি দিয়ে দ্রুত আক্রমণ করব। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের নেতার কথা শোনো! সে অত্যন্ত আত্মসম্মানবোধ সম্পন্ন (গাইয়ূর)। আর আমি তার চেয়েও বেশি আত্মসম্মানবোধ সম্পন্ন (গাইয়ূর)। আর আল্লাহ আমার চেয়েও বেশি আত্মসম্মানবোধ সম্পন্ন (গাইয়ূর)।"









আল-জামি` আল-কামিল (12605)


12605 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد سفرا أقرع بين أزواجه، فأيُّهن خرج سهمها، خرج بها رسول الله صلى الله عليه وسلم معه. قالت عائشة: فأقرع بيننا في غزوة غزاها، فخرج فيها سهمي، فخرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ما أنزل الحجاب، فكنت أُحمَل في هودجي، وأُنزَل فيه، فسرنا حتى إذا فرغ رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوته تلك، وقفل، دنونا من المدينة قافلين، آذدن ليلة بالرحيل، فقمت حين آذنوا بالرحيل، فمشيتُ حتى جاوزتُ الجيش. فلما قضيت شأني أقبلت إلى رحلي، فلمست صدري، فإذا عقد لي من جزع ظفار قد انقطع، فرجعت، فالتمست عقدي، فحبسني ابتغاؤه، قالت: وأقبل الرهط الذين كانوا يرحلوني، فاحتملوا هودجي، فرحلوه على بعيري الذي كنت أركب عليه، وهم يحسبون أني فيه، وكان النساء إذ ذاك خفافا لم يهبلن، ولم يغشهن اللحم، إنما يأكلن العلقة من الطعام، فلم يستنكر القوم خِفة الهودج حين رفعوه، وحملوه، وكنت جارية حديثة السن، فبعثوا الجمل، فساروا، ووجدت عقدي بعد ما استمر الجيش، فجئت منازلهم، وليس بها منهم داع ولا مجيب، فتيمّمت منزلي الذي كنت به، وظننت أنهم سيفقدوني، فيرجعودن إليّ، فبينا أنا جالسة في منزلي غلبتني عيني، فنمت، وكان صفوان بن المعطل السلمي ثم الذكواني من وراء الجيش، فأصبح عند منزلي، فرأى سواد إنسان نائم، فعرفني حين رآني، وكان رآني قبل الحجاب، فاستيقظت باسترجاعه حين عرفني، فخمرت وجهي بجلبابي، ووالله ما تكلمنا بكلمة، ولا سمعت منه كلمة غير استرجاعه، وهوى حتى أناخ راحلته، فوطئ
على يدها فقمت إليها، فركبتها، فانطلق يقود بي الراحلة حتى أتينا الجيش موغرين في نحر الظهيرة وهم نزول.

قالت: فهلك فيّ من هلك، وكان الذي تولى كبر الإفك عبد الله بن أبي ابن سلول. قال عروة: أُخبرت أنه كان يشاع، ويتحدث به عنده، فيُقِرُّه، ويستمعه ويستوشيه. وقال عروة أيضا: لم يسم من أهل الإفك أيضا إلا حسان بن ثابت ومسطح بن أثاثة وحمنة بنت جحش في ناس آخرين، لا علم لي بهم غير أنهم عصبة، كما قال الله تعالى، وإنّ كبر ذلك يقال له عبد الله بن أبي ابن سلول. قال عروة: كانت عائشة تكره أن يُسَبّ عندها حسان، وتقول إنه الذي قال:

فإن أبي ووالده وعرضي … لعرض محمد منكم وقاء

قالت عائشة: فقدمنا المدينة، فاشتكيت حين قدمت شهرا، والناس يفيضون في قول أصحاب الإفك، لا أشعر بشيء من ذلك، وهو يريبني في وجعي أني لا أعرف من رسول صلى الله عليه وسلم اللطف الذي كنت أرى منه حين أشتكي، إنما يدخل عليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فيسلم، ثم يقول:"كيف تيكم". ثم ينصرف، فذلك يريبني، ولا أشعر بالشّر حتى خرجت حين نقهت، فخرجت مع أم مسطح قِبَلَ المناصع، وكان متبرزّنا، وكنا لا نخرج إلا ليلا إلى ليل، وذلك قبل أن نتخذ الكُنُف قريبا من بيوتنا، قالت: وأمرنا أمر العرب الأُوَل في البرية قِبَلَ الغائط، وكنّا نتأذى بالكنف أن نتخذها عند بيوتنا، قالت: فانطلقت أنا وأم مسطح - وهي ابنة أبي رهم بن المطلب بن عبد مناف، وأمها بنت صخر بن عامر خالة أبي بكر الصديق، وابنها مسطح بن أثاثة بن عباد بن المطلب -، فأقبلت أنا وأم مسطح قِبَل بيتي حين فرغنا من شأننا، فعثرت أم مسطح في مرطها، فقالت: تعس مسطح. فقلت لها: بئس ما قلت! أتسبين رجلا شهد بدرا؟ فقالت: أي هنتاه! ولم تسمعي ما قال، قالت: وقلت: ما قال؟ . فأخبرتني بقول أهل الإفك، قالت: فازددت مرضا على مرضي، فلما رجعت إلى بيتي دخل عليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فسلّم، ثم قال:"كيف تيكم". فقلت له: أتأذن لي أن آتي أبويّ، قالت: وأريد أن أستيقن الخبر من قِبَلِهما. قالت: فأذن لي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت لأمي: يا أمتاه! ماذا يتحدث الناس؟ . قالت: يا بنية! هوِّني عليك، فوالله، لقلّما كانت امرأة قط وضيئة عند رجل يحبها لها ضرائر إلا كثرن عليها، قالت: فقلت: سبحان الله! أوَلقد تحدّث الناس بهذا. قالت: فبكيت تلك الليلة حتى أصبحت، لا
يرقأ لي دمع، ولا أكتحل بنوم، ثم أصبحت أبكي.

قالت: ودعا رسول الله صلى الله عليه وسلم عليّ بن أبي طالب، وأسامة بن زيد حين استلبث الوحي يسألهما، ويستشيرهما في فراق أهله، قالت: فأما أسامة، فأشار على رسول الله صلى الله عليه وسلم بالذي يعلم من براءة أهله، وبالذي يعلم لهم في نفسه، فقال أسامة: أهلك ولا نعلم إلا خيرا. وأمّا عليٌّ، فقال: يا رسول الله! لم يضيق الله عليك، والنساء سواها كثير، وسل الجارية تصدّقك. قالت: فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بريرة، فقال: أي بريرة!"هل رأيت من شيء يريبك؟". قالت له بريرة: والذي بعثك بالحق، ما رأيت عليها أمرا قط أَغمِصه، غير أنها جارية، حديثة السن، تنام عن عجين أهلها، فتأتي الداجن، فتأكله.

قالت: فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم من يومه، فاستعذر من عبد الله بن أبي وهو على المنبر، فقال:"يا معشر المسلمين! من يعذرني من رجل قد بلغني عنه أذاه في أهلي، والله ما علمت على أهلي إلا خيرا، ولقد ذكروا رجلا ما علمت عليه إلا خيرا، وما يدخل على أهلي إلا معي"، قالت: فقام سعد بن معاذ أخو بني عبد الأشهل، فقال: أنا، يا رسول الله! أعذرك، فإن كان من الأوس ضربت عنقه، وإن كان من إخواننا من الخزرج أمرتنا، ففعلنا أمرك. قالت: فقام رجل من الخزرج (وكانت أم حسان بنت عمه من فخذه) وهو سعد بن عبادة، وهو سيد الخزرج. قالت: وكان قبل ذلك رجلا صالحا، ولكن احتملته الحمية، فقال لسعد: كذبتَ لعمرُ الله لا تقتله، ولا تقدر على قتله، ولو كان من رهطك ما أحببت أن يقتل، فقام أسيد بن حضير - وهو ابن عم سعد -، فقال لسعد بن عبادة: كذبت لعمر الله لنقتلنّه، فإنك منافق تجادل عن المنافقين. قالت: فثار الحيان: الأوس والخزرج، حتى هموا أن يقتتلوا، ورسول الله صلى الله عليه وسلم قائم على المنبر، قالت: فلم يزل رسول الله صلى الله عليه وسلم يخفضهم حتى سكتوا، وسكت، قالت: فبكيت يومي ذلك كله لا يرقأ لي دمع، ولا أكتحل بنوم، قالت: وأصبح أبواي عندي، وقد بكيت ليلتين ويوما لا يرقأ لي دمع، ولا أكتحل بنوم حتى إني لأظن أن البكاء فالق كبدي، فبينا أبواي جالسان عندي وأنا أبكي، فاستأذنت عليّ امرأة من الأنصار، فأذنت لها، فجلست تبكي معي، قالت: فبينا نحن على ذلك دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم علينا، فسلّم، ثم جلس، قالت: ولم يجلس عندي منذ قيل ما قيل قبلها، وقد لبث شهرا لا يوحى إليه في شأني بشيء، قالت: فتشهد رسول الله صلى الله عليه وسلم -
حين جلس، ثم قال:"أما بعد؛ يا عائشة! إنه بلغني عنك كذا وكذا، فإن كنت بريئة، فسيبرئك الله، وإن كنت ألممت بذنب، فاستغفري الله، وتوبي إليه، فإن العبد إذا اعترف، ثم تاب تاب الله عليه". قالت: فلما قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم مقالته قلص دمعي حتى ما أحسّ منه قطرة، فقلت لأبي: أجب رسول الله صلى الله عليه وسلم عنّي فيما قال، فقال أبي: والله ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت لأمي: أجيبي رسول الله صلى الله عليه وسلم فيما قال، قالت أمي: والله ما أدري ما أقول لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت - وأنا جارية، حديثة السن، لا أقرأ من القرآن كثيرا -، إني والله! لقد علمتُ لقد سمعتم هذا الحديث حتى استقرّ في أنفسكم، وصدقتم به، فلئن قلت لكم: إني بريئة لا تصدّقوني، ولئن اعترفت لكم بأمر والله يعلم أني منه بريئة لتصدّقنِّي، فوالله لا أجد لي ولكم مثلا إلا أبا يوسف حين قال: {وَجَاءُوا عَلَى قَمِيصِهِ بِدَمٍ كَذِبٍ قَالَ بَلْ سَوَّلَتْ لَكُمْ أَنْفُسُكُمْ أَمْرًا فَصَبْرٌ جَمِيلٌ وَاللَّهُ الْمُسْتَعَانُ عَلَى مَا تَصِفُونَ} [سورة يوسف: 18]، ثم تحولت، واضطجعت على فراشي، والله يعلم أني حينئذ بريئة، وأن الله مبرئي ببراءتي، ولكن والله ما كنت أظن أن الله منزل في شأني وحيا يُتلى، لشأني في نفسي كان أحقر من أن يتكلم الله فيّ بأمر، ولكن كنت أرجو أن يرى رسول الله صلى الله عليه وسلم في النوم رؤيا يبرئني الله بها، فوالله ما رام رسول الله صلى الله عليه وسلم مجلسه، ولا خرج أحد من أهل البيت حتى أُنزِل عليه، فأخذه ما كان يأخذه من البرحاء حتى إنه ليتحدر منه من العرق مثل الجمان وهو في يوم شات، من ثقل القول الذي أنزل عليه. قالت: فسُرِّي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يضحك، فكانت أول كلمة تكلم بها أن قال:"يا عائشة! أما الله، فقد برّأك". قالت: فقالت لي أمي: قومي إليه، فقلت: والله لا أقوم إليه، فإني لا أحمد إلا الله عز وجل. قالت: وأنزل الله تعالى: {إِنَّ الَّذِينَ جَاءُوا بِالْإِفْكِ عُصْبَةٌ مِنْكُمْ} العشر الآيات. ثم أنزل الله هذا في براءتي. قال أبو بكر الصديق - وكان ينفق على مسطح بن أثاثة لقرابته منه وفقره -: والله لا أنفق على مسطح شيئا أبدا بعد الذي قال لعائشة ما قال، فأنزل الله: {وَلَا يَأْتَلِ أُولُو الْفَضْلِ مِنْكُمْ} - إلى قوله - {وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [سورة النور: 22] قال أبو بكر الصديق: بلى والله إني لأحب أن يغفر الله لي، فرجع إلى مسطح النفقة التي كان ينفق عليه. وقال: والله لا أنزعها منه أبدا.

قالت عائشة: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم سأل زينب بنت جحش عن أمري، فقال لزينب:"ماذا علمت أو رأيت؟" فقالت: يا رسول الله! أحمي سمعي وبصري، والله ما علمت
إلا خيرا. قالت عائشة: وهي التي كانت تساميني من أزواج النبي صلى الله عليه وسلم، فعصمها الله بالورع، قالت: وطفقت أختها حمنة تحارب لها، فهلكت فيمن هلك.

قال ابن شهاب: فهذا الذي بلغني من حديث هؤلاء الرهط.

ثم قال عروة: قالت عائشة: والله إن الرجل الذي قيل له ما قيل ليقول: سبحان الله! فوالذي نفسي بيده ما كشفت من كنف أنثى قط. قالت: ثم قُتِل بعد ذلك في سبيل الله.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4141)، ومسلم في التوبة (2770) كلاهما من طرق عن الزهري، قال: حدثني عروة بن الزبير، وسعيد بن المسيب، وعلقمة بن وقاص، وعبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: فذكرت الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সফরের ইচ্ছা করতেন, তখন তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে লটারি করতেন। যার নাম আসতো, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে সাথে নিয়ে সফর করতেন।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি যে যুদ্ধে অংশ নেন, তাতে আমাদের মাঝে লটারি করা হলো এবং আমার নাম এলো। পর্দা (হিজাব) অবতীর্ণ হওয়ার পর আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম। আমি আমার হাওদার ভেতরে থাকতাম এবং সেখানেই নামানো হতাম। আমরা চলতে থাকলাম। যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই যুদ্ধ শেষ করে ফিরছিলেন, তখন আমরা মদীনার কাছাকাছি প্রত্যাবর্তন করছিলাম। রাতের বেলা যখন কাফেলা রওয়ানা হওয়ার ঘোষণা দেওয়া হলো, তখন আমিও দাঁড়ালাম এবং রওয়ানার ঘোষণা শুনে হেঁটে হেঁটে আমি সৈন্যদল পার হয়ে গেলাম। যখন আমি আমার প্রয়োজন সম্পন্ন করলাম, তখন আমি আমার সওয়ারীর কাছে ফিরে এলাম। তখন আমি আমার বুক স্পর্শ করে দেখি যে, যফার শহরের তৈরি আমার পুঁতির মালাটি ছিঁড়ে গেছে। আমি ফিরে গেলাম এবং আমার হারটি খুঁজতে লাগলাম। হার খোঁজার কারণে আমি আটকা পড়লাম।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর যে দলটি আমাকে নিয়ে যেতো, তারা ফিরে এলো। তারা আমার হাওদা উঠিয়ে নিল এবং আমার সওয়ারীর উপর চাপিয়ে দিল, এই ভেবে যে আমি এর ভেতরেই আছি। সেসময় মহিলারা হালকা-পাতলা ছিলেন, তাদের শরীরে বেশি মাংস ছিল না এবং তারা সামান্য খাবার খেতেন। তাই যখন লোকেরা হাওদাটি উঠালো এবং বহন করলো, তখন তারা হাওদার হালকা হওয়াটা অস্বাভাবিক মনে করলো না। আর আমি ছিলাম অল্পবয়সী কিশোরী। তারা উটটিকে রওয়ানা করিয়ে দিল এবং তারা চলে গেল। সৈন্যদল চলে যাওয়ার পর আমি আমার হারটি খুঁজে পেলাম। আমি তাদের অবতরণ স্থানে এসে দেখলাম সেখানে তাদের কেউ নেই, কেউ ডাকছেও না, সাড়াও দিচ্ছে না। আমি আমার সেই স্থানে ফিরে গেলাম যেখানে আমি ছিলাম এবং ভাবলাম যে, তারা আমাকে খুঁজে না পেয়ে অবশ্যই আমার কাছে ফিরে আসবে।

আমি আমার অবতরণ স্থানে বসে থাকতেই আমার চোখে ঘুম এলো এবং আমি ঘুমিয়ে পড়লাম। সাফওয়ান ইবনু মুআত্তাল আস-সুলামী আয-যাকওয়ানী যিনি সেনাবাহিনীর পেছনে ছিলেন, তিনি ভোর হওয়ার সময় আমার স্থানে পৌঁছালেন। তিনি একজন ঘুমন্ত মানুষের কালো ছায়া দেখতে পেলেন। যখন তিনি আমাকে দেখলেন, তখন তিনি আমাকে চিনতে পারলেন। হিজাবের বিধান আসার আগে তিনি আমাকে দেখেছিলেন। তিনি যখন আমাকে চিনতে পারলেন, তখন তাঁর 'ইন্না লিল্লাহ' পড়ার শব্দে আমি জেগে উঠলাম। আমি আমার চাদর দিয়ে আমার মুখ ঢেকে নিলাম। আল্লাহর কসম! আমরা একটি শব্দও কথা বলিনি। তাঁর 'ইন্না লিল্লাহ' বলা ছাড়া আমি তাঁর কাছ থেকে আর কোনো শব্দ শুনিনি। তিনি এগিয়ে এলেন এবং তাঁর সওয়ারীকে বসালেন, এরপর তার পায়ের উপর পা রাখলেন। আমি উঠে গিয়ে তাতে আরোহণ করলাম। তিনি সওয়ারীর রশি ধরে হাঁকলেন যতক্ষণ না আমরা প্রচণ্ড গরমের দুপুরে সেনাবাহিনীর কাছে পৌঁছলাম, যখন তারা বিরতি নিয়েছিল।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অতঃপর যারা ধ্বংস হওয়ার, তারা আমার ব্যাপারে ধ্বংস হলো। অপবাদের (ইফ্কের) বড় অংশের নেতৃত্ব দিয়েছিল আবদুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূল। উরওয়া (রাবী) বলেন: আমাকে জানানো হয়েছে যে, তার কাছেই অপবাদের কথা ছড়ানো হতো এবং বলা হতো। সে তাতে সম্মতি দিতো, তা শুনতো ও তার সন্ধান করতো।

উরওয়া আরও বলেন: অপবাদ রটনাকারীদের মধ্যে কেবল হাসসান ইবনু সাবিত, মিসতাহ ইবনু উসাসা এবং হামনাহ বিনতে জাহাশ এর নাম উল্লেখ করা হয়েছে, এবং আরও কিছু লোক ছিল যাদের সম্পর্কে আমার জানা নেই, তবে তারা একটি দল ছিল যেমন আল্লাহ তা'আলা বলেছেন। আর এর বড় অংশের নেতৃত্ব আবদুল্লাহ ইবনু উবাই ইবনু সালূল দিয়েছিল। উরওয়া বলেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অপছন্দ করতেন যে তাঁর সামনে হাসসানকে গালি দেওয়া হোক। তিনি বলতেন, সে-ই সেই কবি, যে বলেছে: "নিশ্চয়ই আমার পিতা, তার পিতা ও আমার সম্মান, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সম্মানের জন্য তোমাদের থেকে রক্ষাকারী।"

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা মদীনায় পৌঁছলাম। পৌঁছানোর পর আমি এক মাস অসুস্থ থাকলাম। লোকেরা অপবাদ রটনাকারীদের কথা আলোচনা করছিল। আমি এর কিছুই জানতাম না। তবে আমার অসুস্থতার মধ্যে আমাকে একটি বিষয় সন্দেহজনক মনে হতো যে, অসুস্থতার সময় আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে যে স্নেহ-মমতা দেখতাম, তা আমি পাচ্ছিলাম না। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশ করে সালাম দিতেন, এরপর বলতেন: "কেমন আছো?" এরপর ফিরে যেতেন। এটাই আমাকে সন্দেহে ফেলেছিল। আমি এই খারাপ খবর কিছুই জানতাম না, যতক্ষণ না আমি আরোগ্য লাভের পর বের হলাম।

আমি উম্মু মিসতাহের সাথে মানাসি'র দিকে বের হলাম। এটি ছিল আমাদের পায়খানার স্থান। তখন আমাদের ঘরের কাছে শৌচাগার করার আগে আমরা কেবল রাতে বের হতাম। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা প্রথম দিকের আরবদের মতো খোলা জায়গায় মল-মূত্র ত্যাগ করতাম। আমরা ঘরের কাছে শৌচাগার তৈরি করা অপছন্দ করতাম। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি এবং উম্মু মিসতাহ—তিনি ছিলেন আবুল রুহম ইবনুল মুত্তালিব ইবনে আবদ মানাফের কন্যা এবং তাঁর মা ছিলেন সাখর ইবনে আমিরের কন্যা ও আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খালা, আর তাঁর ছেলে হলো মিসতাহ ইবনু উসাসা ইবনু উব্বাদ ইবনুল মুত্তালিব—আমরা আমাদের কাজ শেষ করে আমার ঘরের দিকে ফিরছিলাম। তখন উম্মু মিসতাহ তাঁর চাদরে হোঁচট খেলেন এবং বললেন: মিসতাহ ধ্বংস হোক! আমি তাঁকে বললাম: তুমি কত খারাপ কথা বললে! তুমি কি এমন ব্যক্তিকে গালি দিচ্ছো, যে বদরের যুদ্ধে অংশ নিয়েছে? তিনি বললেন: ওহ! তুমি কি শোনোনি সে কী বলেছে? আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: সে কী বলেছে? তখন তিনি আমাকে অপবাদ রটনাকারীদের কথা জানালেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এতে আমার অসুস্থতা আরো বেড়ে গেল।

আমি যখন আমার ঘরে ফিরে এলাম, তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশ করলেন, সালাম দিলেন, এরপর বললেন: "কেমন আছো?" আমি তাঁকে বললাম: আপনি কি আমাকে আমার বাবা-মার কাছে যাওয়ার অনুমতি দেবেন? আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁদের কাছ থেকে খবরটি নিশ্চিতভাবে জানতে চেয়েছিলাম। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অনুমতি দিলেন। আমি আমার আম্মাকে বললাম: আম্মাজান! লোকেরা কী বলাবলি করছে? তিনি বললেন: বেটি! তুমি নিজেকে হালকা করো। আল্লাহর কসম! খুব কমই এমন হয়েছে যে, কোনো সুন্দর মহিলাকে তার স্বামী ভালোবাসেন এবং তার সতীন থাকে, আর সতীনেরা তার বিরুদ্ধে বেশি কথা না ছড়ায়। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: সুবহানাল্লাহ! লোকেরা কি সত্যিই এই কথা আলোচনা করছে? আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেই রাত কাঁদতে কাঁদতে কাটিয়ে দিলাম, আমার চোখের জল থামলো না এবং আমি ঘুমাতে পারলাম না। এরপর সকালও করলাম কাঁদতে কাঁদতে।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: ওহী বিলম্বিত হওয়ার কারণে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারকে ত্যাগ করার বিষয়ে পরামর্শ ও জিজ্ঞাসা করার জন্য আলী ইবনু আবী তালিব এবং উসামা ইবনু যায়েদকে ডাকলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পরামর্শ দিলেন, যা তিনি তাঁর পরিবারের নির্দোষিতা সম্পর্কে জানতেন এবং যা তিনি তাদের সম্পর্কে জানতেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাঁরা আপনার পরিবার, তাঁদের সম্পর্কে আমরা ভালো ছাড়া কিছু জানি না। আর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহ আপনার জন্য সংকীর্ণতা সৃষ্টি করেননি। এছাড়া আরও অনেক নারী আছেন। আপনি খাদেমকে জিজ্ঞেস করুন, সে সত্য বলবে।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বারীরাকে ডাকলেন এবং বললেন: "হে বারীরা! তুমি কি তার মধ্যে সন্দেহজনক কিছু দেখেছো?" বারীরা তাঁকে বললেন: যিনি আপনাকে সত্য সহকারে পাঠিয়েছেন, তাঁর কসম! আমি তার মাঝে কখনো কোনো দোষের কিছু দেখিনি, তবে সে অল্পবয়সী বালিকা, সে তার পরিবারের আটা মাখা অবস্থায় ঘুমিয়ে যায়, আর গৃহপালিত ছাগল এসে তা খেয়ে ফেলে।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেদিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং মিম্বারে বসে আবদুল্লাহ ইবনু উবাইয়ের বিষয়ে সাহায্য চাইলেন। তিনি বললেন: "হে মুসলিম সমাজ! সেই ব্যক্তি সম্পর্কে তোমরা আমাকে কে সাহায্য করবে, যার কষ্ট আমাকে আমার পরিবার সম্পর্কে পৌঁছেছে? আল্লাহর কসম! আমি আমার পরিবার সম্পর্কে ভালো ছাড়া কিছুই জানি না। আর তারা এমন একজন লোকের নাম উল্লেখ করেছে, যার সম্পর্কেও আমি ভালো ছাড়া কিছুই জানি না। আর সে আমার পরিবারের কাছে আমার সাথেই প্রবেশ করে।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন বানী আবদুল আশহাল গোত্রের ভাই সা’দ ইবনু মুআয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনাকে সাহায্য করব। যদি সে আওস গোত্রের হয়, তাহলে আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেব। আর যদি সে আমাদের খাযরাজ গোত্রের ভাইদের হয়, তাহলে আপনি আমাদের নির্দেশ দিন, আমরা আপনার নির্দেশ পালন করব। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন খাযরাজ গোত্রের এক ব্যক্তি (যার গোত্রের চাচাতো বোন ছিলেন হাসসানের মা) দাঁড়ালেন, তিনি হলেন সা’দ ইবনু উবাদাহ, যিনি ছিলেন খাযরাজ গোত্রের সর্দার। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি এর আগে নেককার লোক ছিলেন, কিন্তু তাঁর গোত্রীয় অহমিকা তাঁকে পেয়ে বসলো। তিনি সা’দ ইবনু মুআযকে বললেন: আল্লাহর কসম, তুমি মিথ্যা বলেছো! তুমি তাকে হত্যা করতে পারবে না এবং তুমি তাকে হত্যা করার ক্ষমতাও রাখো না। যদি সে তোমার গোত্রের হতো, তাহলে তুমি তাকে হত্যা করতে পছন্দ করতে না। তখন উসাইদ ইবনু হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—যিনি সা’দ ইবনু মুআযের চাচাতো ভাই ছিলেন—দাঁড়িয়ে সা’দ ইবনু উবাদাহকে বললেন: আল্লাহর কসম! তুমি মিথ্যা বলেছো। আমরা অবশ্যই তাকে হত্যা করব। তুমি মুনাফিক, মুনাফিকদের পক্ষ হয়ে তর্ক করছো। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন দুই গোত্র (আওস ও খাযরাজ) উত্তেজিত হয়ে উঠলো এবং তারা লড়াই করার কাছাকাছি পৌঁছে গেল, অথচ আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে ছিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের শান্ত করতে থাকলেন, অবশেষে তারা শান্ত হলো, এবং তিনিও চুপ রইলেন।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেই দিন সারাদিন কাঁদলাম। আমার চোখের জল থামলো না এবং আমি ঘুমাতে পারলাম না। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার বাবা-মা আমার কাছে এলেন। আমি দু’রাত ও একদিন কাঁদলাম। আমার চোখের জল থামলো না, আর আমি ঘুমাতে পারলাম না। এমনকি আমার মনে হচ্ছিল যে, কান্নায় আমার কলিজা ফেটে যাবে। আমি কাঁদছিলাম এবং আমার বাবা-মা আমার কাছে বসা ছিলেন। তখন আনসারী এক মহিলা আমার কাছে আসার অনুমতি চাইলেন। আমি তাঁকে অনুমতি দিলাম। তিনি আমার পাশে বসে কাঁদতে লাগলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা যখন এই অবস্থায় ছিলাম, তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে প্রবেশ করলেন, সালাম দিলেন, এরপর বসলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: অপবাদের কথা বলা হওয়ার পর থেকে তিনি আর আমার কাছে বসেননি। আমার ব্যাপারে এক মাস ধরে তাঁর কাছে কোনো ওহী আসছিল না।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসে তাশাহহুদ (আল্লাহর প্রশংসা) পাঠ করলেন, এরপর বললেন: "আম্মা বা'দ (অতঃপর), হে আয়িশা! তোমার সম্পর্কে আমার কাছে এমন এমন কথা পৌঁছেছে। যদি তুমি নির্দোষ হও, তাহলে আল্লাহ তোমাকে নির্দোষ প্রমাণ করবেন। আর যদি তুমি কোনো গুনাহ করে থাকো, তাহলে আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাও এবং তাঁর কাছে তাওবা করো। কারণ বান্দা যখন স্বীকার করে এবং তাওবা করে, তখন আল্লাহ তার তাওবা কবুল করেন।"

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর কথা শেষ করলেন, তখন আমার চোখের জল শুকিয়ে গেল, এমনকি আমি এক ফোঁটা অশ্রুও অনুভব করলাম না। আমি আমার আব্বাকে বললাম: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বললেন, তার জবাব আপনি আমার পক্ষ থেকে দিন। আমার আব্বা বললেন: আল্লাহর কসম! আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী বলব, তা আমি জানি না। আমি আমার আম্মাকে বললাম: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যা বললেন, তার জবাব আপনি দিন। আমার আম্মা বললেন: আল্লাহর কসম! আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী বলব, তা আমি জানি না। তখন আমি বললাম—আমি ছিলাম অল্পবয়সী কিশোরী, কুরআন থেকে বেশি কিছু পড়া আমার জানা ছিল না— আল্লাহর কসম! আমি জানি, তোমরা এই কথা (অপবাদ) শুনেছো, এমনকি তা তোমাদের মনে গেঁথে গেছে এবং তোমরা তা বিশ্বাস করে ফেলেছো। এখন যদি আমি তোমাদের বলি যে আমি নির্দোষ, তাহলে তোমরা আমাকে বিশ্বাস করবে না। আর যদি আমি এমন কিছু স্বীকার করি, যা আল্লাহ জানেন যে আমি তা থেকে নির্দোষ, তাহলে তোমরা আমাকে বিশ্বাস করবে। আল্লাহর কসম! আমার ও তোমাদের অবস্থা ইউসুফ (আঃ)-এর পিতার মতো ছাড়া আর কিছু মনে হচ্ছে না, যখন তিনি বলেছিলেন: **"আর তারা তাঁর জামায় মিথ্যা রক্ত লাগিয়ে আনলো। তিনি বললেন: বরং তোমাদের মন তোমাদের জন্য একটি কাজ সহজ করে দিয়েছে। অতএব উত্তম ধৈর্য ধারণ করাই শ্রেয়। তোমরা যা বর্ণনা করছো, সে বিষয়ে আল্লাহই আমার একমাত্র ভরসাস্থল।" (সূরা ইউসুফ: ১৮)**। এরপর আমি পাশ ফিরে আমার বিছানায় শুয়ে পড়লাম।

আল্লাহ জানেন, তখন আমি অবশ্যই নির্দোষ ছিলাম, আর আল্লাহ আমার নির্দোষিতার কারণে আমাকে নির্দোষ প্রমাণিত করবেন। কিন্তু আল্লাহর কসম! আমার ব্যাপারে এমন ওহী নাযিল হবে, যা পঠিত হবে, তা আমি কল্পনাও করিনি। আমার নিজেকে এত নগণ্য মনে হয়েছিল যে, আল্লাহ আমার ব্যাপারে কোনো কথা বলবেন। বরং আমি আশা করেছিলাম যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বপ্নে কিছু দেখবেন, যার দ্বারা আল্লাহ আমাকে নির্দোষ প্রমাণিত করবেন। আল্লাহর কসম! আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বসার স্থান থেকে ওঠেননি এবং পরিবারের কেউ ঘর থেকে বের হননি, এমনকি তাঁর উপর ওহী নাযিল হলো। তাঁর উপর সেই অবস্থা চেপে বসলো যা ওহী আসার সময় তাঁকে পেতো। এমনকি শীতকালে হওয়া সত্ত্বেও মুক্তার দানার মতো ঘাম তাঁর থেকে ঝরে পড়তে লাগলো, সেই কঠিন বাণী যা তাঁর উপর নাযিল হচ্ছিল, তার ভারের কারণে।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই অবস্থা দূর হলো এবং তিনি হাসছিলেন। তাঁর প্রথম কথাটি ছিল এই: "হে আয়িশা! জেনে রাখো, আল্লাহ তোমাকে নির্দোষ ঘোষণা করেছেন।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমার আম্মা আমাকে বললেন: তুমি তাঁর দিকে ওঠো (তাঁর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করো)। আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমি তাঁর দিকে উঠব না। আমি তো কেবল আল্লাহরই প্রশংসা করি, যিনি পরাক্রমশালী ও মহিমান্বিত। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: **"নিশ্চয়ই যারা অপবাদ নিয়ে এসেছে, তারা তোমাদের মধ্যেরই একটি দল..."** (সূরা নূরের) দশটি আয়াত। এভাবে আল্লাহ আমার নির্দোষিতা বিষয়ে নাযিল করলেন।

আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—যিনি মিসতাহ ইবনু উসাসা-এর উপর তার আত্মীয়তা ও দরিদ্রতার কারণে খরচ করতেন—তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে মিসতাহ যা বলেছে, এরপর আমি তার উপর আর কখনো কিছুই খরচ করব না। তখন আল্লাহ নাযিল করলেন: **"আর তোমাদের মধ্যে যারা অনুগ্রহ ও প্রাচুর্যের অধিকারী, তারা যেন কসম না করে..."** —(আল্লাহর বাণী)— **"আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু" (সূরা নূর: ২২) পর্যন্ত**। আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই চাই যে, আল্লাহ আমাকে ক্ষমা করুন। এরপর তিনি মিসতাহ-কে সেই খরচ ফিরিয়ে দিলেন যা তিনি তাঁর উপর করতেন। আর বললেন: আল্লাহর কসম! আমি তা আর কখনো তার থেকে বন্ধ করব না।

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার বিষয়ে যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলেন। তিনি যায়নাবকে বললেন: "তুমি কী জানো অথবা কী দেখেছো?" তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আমার কান ও চোখকে হেফাজত করছি। আল্লাহর কসম! আমি ভালো ছাড়া কিছুই জানি না। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি ছিলেন নবীর স্ত্রীদের মধ্যে একমাত্র আমার প্রতিদ্বন্দী, তবে আল্লাহ তাঁকে পরহেজগারির কারণে রক্ষা করলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আর তার বোন হামনাহ তাঁর পক্ষ হয়ে লড়াই করতে লাগলো, ফলে ধ্বংসপ্রাপ্তদের মধ্যে সেও ধ্বংস হলো।

ইবনু শিহাব (রাবী) বলেন: এই দলটির হাদীস থেকে আমার কাছে এইটুকুই পৌঁছেছে।
এরপর উরওয়া (রাবী) বলেন: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আল্লাহর কসম! যে লোকটি (সাফওয়ান) সম্পর্কে অপবাদের কথা বলা হয়েছিল, সে বলতো: সুবহানাল্লাহ! যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! আমি কখনো কোনো নারীর পর্দা উন্মোচন করিনি (অর্থাৎ কোনো অবৈধ কাজে লিপ্ত হইনি)। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি আল্লাহর পথে শহীদ হন।









আল-জামি` আল-কামিল (12606)


12606 - عن عائشة قالت: لما نزل عذري قام النبي صلى الله عليه وسلم على المنبر، فذكر ذلك وتلا - تعني القرآن -، فلما نزل من المنبر، أمر بالرجلين والمرأة، فضربوا حدهم.

حسن: رواه أبو داود (4474)، والترمذي (3181)، وابن ماجه (2567)، وأحمد (24066)، والبيهقي في الدلائل (4/ 74) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته.

وصرّح ابن إسحاق عند البيهقي. وزاد: رموها بصفوان بن المعطل السلمي.

وصرّح النفيلي أن الرجلين هما حسان بن ثابت، ومسطح بن أثاثة. وقال: ويقولون: المرأة حمنة بنت جحش.

رواه أبو داود (4475) عن النفيلي، عن محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق بهذا الحديث، ولم يذكر عائشة، كما قال أبو داود.

وقد جاء التصريح بأسمائهم أيضا في حديث أبي هريرة الآتي.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমার পবিত্রতা (সম্পর্কে আয়াত) নাযিল হলো, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিম্বারের ওপর দাঁড়ালেন এবং সেই বিষয়টির উল্লেখ করলেন, আর তিনি তেলাওয়াত করলেন— অর্থাৎ কুরআন (এর আয়াত)। যখন তিনি মিম্বার থেকে নামলেন, তখন তিনি সেই দুজন পুরুষ ও একজন নারীর ব্যাপারে নির্দেশ দিলেন, অতঃপর তাদের ওপর হদ (নির্ধারিত শাস্তি) প্রয়োগ করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (12607)


12607 - عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد سفرا أقرع بين نسائه، فأصاب عائشة القرعة في غزوة بني المصطلق، فلما كان في جوف الليل انطلقت عائشة لحاجة، فانحلت قلادتها، فذهبت في طلبها، وكان مسطح يتيما لأبي بكر، وفي عياله. فلما رجعت عائشة لم تر العسكر، قال: وكان صفوان بن المعطل السلمي يتخلف من الناس، فيصيب القدح والجراب والإداوة، - أحسبه قال: - فيحمله، قال: فنظر، فإذا عائشة، فغطى - أحسبه قال: - وجهه عنها، ثم أدنى بعيره منها. قال: فانتهى إلى العسكر، فقالوا قولا - أو قالوا فيه - ثم ذكر الحديث حتى انتهى. قال:
وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجيء، فيقوم على الباب، فيقول:"كيف تيكم؟". حتى جاء يوما، فقال:"أبشري، يا عائشة! فقد أنزل الله عذرك". فقالت: بحمد الله لا بحمدك. قال: وأنزل في ذلك عشر آيات: {إِنَّ الَّذِينَ جَاءُوا بِالْإِفْكِ عُصْبَةٌ مِنْكُمْ} قال: فحدّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مسطح وحمنة وحسان.

حسن: رواه البزار (8011) واللفظ له، وأبو يعلى (307)، والطبراني في الكبير (23/ 129) كلهم من طريق عمرو بن خليفة البكراوي، ثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل عمرو بن خليفة البكراوي، وشيخه محمد بن عمرو - وهو ابن علقمة - فكلاهما حسن الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কোনো সফরে যেতে চাইতেন, তখন তাঁর স্ত্রীদের মাঝে লটারি করতেন। বনু মুসতালিকের যুদ্ধে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভাগে লটারি পড়েছিল। যখন রাতের মধ্যভাগ হলো, তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কোনো প্রয়োজনে বাইরে গেলেন। তাঁর হারটি খুলে গেল, তাই তিনি সেটি খুঁজতে গেলেন। আর মিসতাহ ছিলেন আবূ বকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একজন ইয়াতীম, যিনি তাঁর পরিবারের দায়িত্বে ছিলেন। যখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে এলেন, তখন তিনি সৈন্যদের দেখতে পেলেন না। তিনি বলেন, সাফওয়ান ইবনু মুআত্তাল আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকজনের পিছনে (বাকি) থাকতেন। তিনি পানি পান করার পাত্র, থলে ও চামড়ার মশ্‌ক পেতেন— আমার ধারণা, তিনি বলেছেন— অতঃপর তিনি তা বহন করতেন। তিনি বলেন: (সাফওয়ান) তাকিয়ে দেখলেন, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত। তিনি তার মুখমণ্ডল ঢেকে নিলেন— আমার ধারণা, তিনি বলেছেন— অতঃপর তিনি তাঁর উটটিকে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আনলেন। তিনি বলেন: (সাফওয়ান) যখন সৈন্যদের কাছে এসে পৌঁছলেন, তখন তারা কিছু কথা বলল— অথবা তিনি বললেন: তারা তাঁর সম্পর্কে কথা বলল— তারপর তিনি হাদীসটি শেষ পর্যন্ত বর্ণনা করলেন। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসতেন, আর দরজার কাছে দাঁড়িয়ে জিজ্ঞেস করতেন: "সে কেমন আছে?" একদিন তিনি আসলেন এবং বললেন: "সুসংবাদ গ্রহণ করো, হে আয়িশা! আল্লাহ তোমার ওজর (পবিত্রতা) নাযিল করেছেন।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আল্লাহর প্রশংসার সাথে, আপনার প্রশংসার সাথে নয়।" তিনি (আবূ হুরায়রা) বলেন: আর এ বিষয়ে দশটি আয়াত নাযিল হলো: {নিশ্চয় যারা অপবাদ (ইফ্‌ক) রটনা করেছে, তারা তোমাদেরই একদল...}। তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিসতাহ, হামনাহ ও হাসসানকে (অপবাদের) শাস্তি (হদ্দ্‌) প্রদান করলেন।