হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1288)


1288 - عن خباب، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ بني إسرائيل لما هلكوا قصُّوا".

حسن: رواه الطّبرانيّ في كبيره (3705) من طريقين، عن أبي أحمد الزّبيريّ، ثنا سفيان، عن الأجلح، عن عبد اللَّه بن أبي الهذيل، عن خباب، فذكر الحديث.

ورواه أبو نعيم في الحلية (4/ 362) من هذا الوجه ثم قال:"غريب من حديث الأجلح والثوريّ، تفرّد به أبو أحمد".

قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله رجال مسلم غير الأجلح، وهو ابن عبد اللَّه بن حجية، وهو شيعي صدوق اللهجة.

قوله:"لما هلكوا قصوا". قال ابن الأثير:"أي اتّكلوا على القول وتركوا العمل، فكان ذلك سبب هلاكهم أو بالعكس: لما هلكوا بترك العمل أخلدوا إلى القصص".




খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় বনী ইসরাঈল যখন ধ্বংস হলো, তখন তারা কেবল গল্প-কাহিনী বলতে শুরু করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (1289)


1289 - عن الحارث بن معاوية الكنديّ أنّه ركب إلى عمر بن الخطّاب يسأله عن ثلاث خلال، قال: فقدم المدينة، فسأله عمر: ما أقدمك؟ قال: لأسألك عن ثلاث خلال. قال: وما هنّ؟ قال: ربما كنت أنا والمرأة في بناء ضيّق، فتحضرُ الصّلاة، فإنْ صلّيت أنا وهيّ، كانت بحذائيّ، وإن صلَّتْ خلفي، خرجتْ من البناء، فقال عمر: تستُر بينك وبينها بثوب، ثم تصلّي بحذائك إن شئت. وعن الرّكعتين بعد العصر؟ فقال: نهاني عنهما رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال: وعن القَصَص، فإنَّهم أرادوني على القَصَص. فقال: ما شئت، كأنّه كره أن يمنعه، قال: إنّما أردتُ أن أنتهي إلى قولِك. قال: أخشى عليك أن تَقُصَّ فترتفع عليهم في نفسك، ثم تقصّ فترتفع، حتّى يخيّل إليك أنّك فوقهم بمنزلة الثُّرَيَّا، فيضعك اللَّه تحت أقدامهم يوم القيامة بقدر ذلك.

حسن: رواه أحمد (111) عن أبي المغيرة، ثنا صفوان، ثنا عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن الحارث بن معاوية الكندي، فذكره.

قال الهيثميّ:"الحارث بن معاوية الكندي وثقه ابن حبان، وروى عنه غير واحد، وبقية رجاله رجال الصّحيح".
قلت: إسناده حن من أجل الحارث بن معاوية، وقد قال الحافظ في"تعجيل المنفعة":"الذي يظهر أنه من المخضرمين".

قلت: وبقية رجاله ثقات، واللَّه أعلم.




হারিস ইবনে মুয়াবিয়া আল-কিন্দি থেকে বর্ণিত যে, তিনি তিনটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞেস করার জন্য উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে সওয়ার হয়ে গেলেন। তিনি (হারিস) বলেন: আমি মদিনায় পৌঁছলে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: কিসে তোমাকে এখানে নিয়ে এসেছে? তিনি বললেন: আপনাকে তিনটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞেস করার জন্য। তিনি বললেন: সেগুলো কী?

তিনি বললেন: কখনো কখনো আমি ও আমার স্ত্রী সংকীর্ণ একটি ঘরে থাকি, আর তখন সালাতের সময় হয়ে যায়। যদি আমি ও সে একসাথে সালাত আদায় করি, তবে সে আমার একেবারে পাশে থাকে। আর যদি সে আমার পিছনে সালাত আদায় করে, তবে তাকে ঘর থেকে বাইরে চলে যেতে হয়।

তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি তোমার ও তার মাঝে একটি কাপড় দিয়ে আড়াল করে নাও। তারপর যদি চাও, সে তোমার পাশে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতে পারে।

(হারিস জিজ্ঞেস করলেন) আর আসরের পরের দুই রাকআত সম্পর্কে? তিনি (উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এই দুই রাকআত আদায় করতে নিষেধ করেছেন।

তিনি (হারিস) বললেন: আর কাসাস (ওয়াজ বা গল্প বলা) সম্পর্কে, কেননা লোকেরা আমাকে কাসাস বলার জন্য চাচ্ছে।

তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমার যা ইচ্ছা। মনে হলো যেন তিনি তাকে (কাসাস বলতে) বারণ করতে অপছন্দ করলেন।

তিনি (হারিস) বললেন: আমি তো শুধু আপনার কথার উপর আমল করতে চেয়েছিলাম।

উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আশঙ্কা করি যে, তুমি ওয়াজ করবে এবং এর ফলে তোমার মনে তাদের (শ্রোতাদের) চেয়ে নিজেকে উঁচু মনে হবে, অতঃপর তুমি আবার ওয়াজ করবে এবং আরও উঁচু মনে করবে, এমনকি তোমার মনে হবে যে তুমি তাদের উপরে ছায়াপথের (সুরাইয়া) তারকার মতো স্থানে পৌঁছে গেছ। ফলে আল্লাহ তা'আলা কিয়ামতের দিন ঐ পরিমাণেই তোমাকে তাদের পায়ের নিচে নিক্ষেপ করবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1290)


1290 - عن أبي صالح سعيد بن عبد الرحمن الغفاريّ، أنّ سليم بن عنَزٍ التُّجيبيّ كان يقصُّ على النّاس وهو قائم، فقال له صلة بن الحارث الغفاريّ -وهو من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم: واللَّهِ ما تركنا عهدَ نبيِّنا، ولا قطعنا أرحامنا حتّى قمت أنت وأصحابُك بين أظهرنا.

حسن: رواه الطّبرانيّ في كبيره (7404) عن بشر بن موسى، ثنا أبو عبد الرحمن المقرئ، عن حيوة بن شريح، حدّثني الحارث بن شداد الصنعانيّ، أنّ أبا صالح سعيد بن عبد الرحمن الغفاري أخبره، فذكره.

قال الهيثميّ:"إسناده حسن".




আবূ সালিহ সাঈদ ইবনু আবদুর রহমান আল-গিফারী থেকে বর্ণিত, সালীম ইবনু আনাজ আত-তুজীবী দাঁড়িয়ে লোকদেরকে উপদেশ দিচ্ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের একজন সিলাহ ইবনু হারিস আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: "আল্লাহর কসম! আমরা আমাদের নবীর অঙ্গীকার/নির্দেশ ত্যাগ করিনি এবং আমাদের আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করিনি—যতক্ষণ না তুমি ও তোমার সাথীরা আমাদের সামনে এসে দাঁড়িয়েছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (1291)


1291 - عن الأسود بن هلال، عن عبد اللَّه، قال:"ذكروا له رجلًا يقصّ، فجاء فجلس في القوم، فسمعته يقول: سبحان اللَّه -كذا وكذا- فلمّا سمع ذلك قام، فقال: ألا تسمعوا؟ فلمّا نظروا إليه. قال: إنّكم لأهْدى من محمّد صلى الله عليه وسلم وأصحابه؟ إنّكم لمتمسِّكون بطَرَف ضلالة".

صحيح: رواه الطبرانيّ في الكبير (8639) عن علي بن عبد العزيز، ثنا أبو غسان مالك بن إسماعيل، ثنا إسرائيل، عن الأشعث بن أبي الشّعثاء، عن الأسود بن هلال، فذكره. وإسناده صحيح، رجاله ثقات رجال الشّيخين إِلَّا شيخ الطّبرانيّ وهو ثقة.

قلت: والرجل المبهم الذي كان يقصّ وهو عمرو بن زرارة.

فقد رواه الطبرانيّ في كبيره (86537) من وجه آخر عن أبي إسحاق، عن عمرو بن زرارة، قال: وقف علي عبد اللَّه، وأنا أقصُّ في المسجد، فقال: يا عمرو! لقد ابتدعتم بدعة ضلالة، أو إنكم لأهدى من محمّد صلى الله عليه وسلم وأصحابه. ولقد رأيتهم تفرّقوا عني حتّى رأيت مكاني ما فيه أحد.

أمَّا ما رُوي عن عمرو بن دينار، أنّ تميمًا الدّاريّ استأذن عمر في القَصَص، فأبى أن يأذن له، ثم استأذنه فأبى أن يأذن له، ثم استأذنه، فقال: إن شئت. . . وأشار بيده - يعني الذبحَ". فهو منقطع.

رواه الطبرانيّ في الكبير (1249) عن محمد بن عبد اللَّه الحضرميّ، ثنا أحمد بن يونس، ثنا سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار.

ورجال إسناده ثقات إِلَّا أنّ عمرو بن دينار لم يسمع من عمر، واللَّه أعلم.

وكذلك ما رُوي عن السّائب بن يزيد، أنه قال:"لم يقصّ على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ولا أبي بكر، وعمر حتّى كان أوّل من قصَّ تميمٌ الدَّاريّ، واستأذن عمر رضي الله عنه، فأذن له فقصّ
قائمًا". فإنه ضعيف.

رواه الطبرانيّ في"المعجم الكبير" (6656) من طريق بقية بن الوليد، عن الزبيديّ، عن الزّهريّ، عن السائب. وبقية مدلّس وقد عنعن.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর সামনে এমন একজন লোকের কথা আলোচনা করা হলো, যে (মসজিদে) ওয়াজ নসিহত করত। অতঃপর তিনি এসে লোকজনের মাঝে বসলেন। আমি তাকে (ওয়াজকারীকে) বলতে শুনলাম: সুবহানাল্লাহ—এই এই কথা। যখন তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ) তা শুনলেন, তখন তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন এবং বললেন: তোমরা কি শোনো না? যখন তারা তাঁর দিকে তাকাল, তিনি বললেন: তোমরা কি মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীদের চেয়েও অধিক সঠিক পথের অনুসারী? নিশ্চয়ই তোমরা এক ভ্রষ্টতার পথ ধরে আছো।









আল-জামি` আল-কামিল (1292)


1292 - عن جابر، قال: نسخَ عمر كتابًا من التوراة بالعربية، فجاء به إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فجعل يقرأ ووجه رسول اللَّه لا يتغيّر صلى الله عليه وسلم، فقال رجل من الأنصار: ويحك يا ابن الخطّاب! ألا ترى وجه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"لا تسألوا أهل الكتاب عن شيء، فإنَّهم لن يهدوكم وقد ضلّوا، وإنَّكم إما أن تكذِّبوا بحق، أو تصدِّقوا بباطل، واللَّه! لو كان موسى بين أظهركم ما حلّ له إِلَّا أن يتبعني".

حسن: رواه البزّار - (كشف الأستار - 124) -، عن عبد الواحد بن غياث، أنا حمّاد بن زيد، ثنا خالد، حدّثني عامر، ثنا جابر، فذكره.

وإسناده حسن، رجاله ثقات غير خالد وهو ابن سعيد بن سلمة المخزوميّ -المشهور بالفأفاء- فهو صدوق.

وتابعه في هذا الحديث مجالد بن سعيد وهو الحديث الآتي:




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাওরাতের একটি গ্রন্থ আরবিতে নকল করলেন। এরপর তা নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলেন এবং তা পাঠ করতে লাগলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারায় কোনো পরিবর্তন আসছিল না। তখন আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বললেন: তোমার দুর্ভোগ হোক, হে ইবনুল খাত্তাব! তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা দেখতে পাচ্ছ না? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা আহলে কিতাবদের (গ্রন্থধারীদের) কাছে কোনো কিছু জিজ্ঞাসা করো না। কারণ তারা তোমাদের কখনো পথ দেখাতে পারবে না, অথচ তারা নিজেরা পথভ্রষ্ট হয়ে আছে। আর (যদি জিজ্ঞাসা করো), তাহলে তোমরা হয় সত্যকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করবে, নতুবা মিথ্যাকে সত্য বলে মেনে নেবে। আল্লাহর কসম! যদি মূসা (আঃ) তোমাদের মাঝেও থাকতেন, তাহলে আমার অনুসরণ করা ছাড়া তার জন্য অন্য কিছু বৈধ হতো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1293)


1293 - عن جابر بن عبد اللَّه، أن عمر بن الخطّاب، أتى النبيّ صلى الله عليه وسلم بكتاب أصابه من بعض أهل الكتب، فقرأه على النبيّ صلى الله عليه وسلم فغضب وقال:"أمتهوكون فيها يا ابن الخطّاب! والذي نفسي بيده! لقد جئتكم بها بيضاء نقية، لا تسألوهم عن شيء فيخبروكم بحق فتكذبوا به، أو بباطل فتصدقوا به، والذي نفسي بيده! لو أن موسى كان حيا، ما وسعه إِلَّا أن يتبعني".

حسن: رواه الإمام أحمد (15156)، وابن أبي شيبة (26949)، والبزّار -كشف الأستار- (124)، كلّهم من طرق عن هشيم بن بشير، أخبرنا مجالد، عن الشعبيّ، عن جابر بن عبد اللَّه فذكره. والسياق لأحمد.

ورواه أحمد (14631)، وأبو يعلى (2135) كلاهما من طريق حمّاد بن زيد، عن مجالد به المرفوع فقط.

وإسناده حسن من أجل مجالد بن سعيد فإنه -وإنْ كان لين الحديث- فقد قال ابن مهدي:"حديث مجالد عند الأحداث وأبي أسامة ليس بشيء، ولكن حديث شعبة، وحماد بن زيد، وهشيم وهؤلاء القدماء".

يعني أنه تغير حفظه في آخر عمره، يعني هؤلاء رووا عنه قبل تغيره.
وقال ابن عدي:"له عن الشعبيّ، عن جابر أحاديث صالحة".

قلت: وهذا الحديث مما رواه هشيم، وحماد بن زيد، عن مجالد، ومجالد رواه عن الشعبيّ، عن جابر، فالظاهر أنه مستقيم.

وفي معناه ما روي عن أبي الدّرداء قال: جاء عمر بجوامع من التوراة، فقال: يا رسول اللَّه أخذتها من أخ لي من بني زريق، فتغير وجه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال عبد اللَّه بن زيد الذي أري النداء: أمسخ اللَّه عقلك؟ ألا ترى الذي بوجه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فقال عمر: رضينا باللَّه ربا، وبالإسلام دينا، وبمحمد نبيا، وبالقرآن إماما، فسُرّي عن وجه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وقال:"والذي نفسي بيده، لو كان موسى بين أظهركم ما وسعه إِلَّا اتباعيّ، ثم لو كان بين أظهركم ثم تبعتموه لضللتم ضلالًا بعيدًا، أنتم حظي من الأمم، وأنا حظكم من الأنبياء".

رواه الطبرانيّ في الكبير - كما في جامع المسانيد والسنن (11171) عن محمد بن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا منجاب بن الحارث، حدّثنا أبو عامر العقديّ، عن سفيان (هو الثوري)، عن أبي إسحاق، عن أبي حبيبة، عن أبي الدّرداء فذكره.

وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 174):"رواه الطبرانيّ في الكبير، وفيه أبو عامر القاسم بن محمد الأسديّ، ولم أر من ترجمه، وبقية رجاله موثقون".

قلت: ترجمه ابنُ أبي حاتم في الجرح والتعديل (7/ 119)، وفيه أبو حبيبة هو الطائيّ، لا يُعرف له راو غير أبي إسحاق، ولم أجد من وثقه إِلَّا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا. ووقع في مطبوعة مجمع الزوائد"أبو عامر القاسم بن محمد الأسدي" لكن في مطبوعة جامع المسانيد"أبو عامر العقدي".

فإن كان الأمر كما في جامع المسانيد ففي الرواة عن الثوري: أبو عامر العقدي واسمه عبد الملك بن عمرو البصريّ، وهو ثقة. واللَّه أعلم.

وفي الباب أحاديث أخرى في أسانيدها مقال.

وثبت عن ابن عباس في الصحيح أنه قال: كيف تسألون أهل الكتاب عن شيء وكتابكم الذي أنزل على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أحدث تقرؤونه محضا لم يشب وقد حدثكم أن أهل الكتاب بدلوا كتاب اللَّه، وغيروه، وكتبوا بأيديهم الكتاب، وقالوا هو من عند اللَّه ليشتروا به ثمنًا قليلا ألا ينهاكم ما جاءكم من العلم عن مسألتهم؟ لا واللَّه ما رأينا منهم رجلًا يسألكم عن الذي أنزل عليكم.

رواه البخاريّ في الاعتصام (7363) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا إبراهيم، أخبرنا ابن شهاب، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه، أن ابن عباس قال: فذكره.

وثبت عن حميد بن عبد الرحمن أيضًا في الصّحيح أنه سمع معاوية يحدث رهطا من قريش بالمدينة وذكر كعب الأحبار فقال: إن كان من أصدق هؤلاء المحدثين الذين يتحدثون عن أهل الكتاب
وإن كنا -مع ذلك- لنبلو عليه الكذب.

رواه البخاريّ في الاعتصام (7361) قال: وقال أبو اليمان: أخبرنا شعيب، عن الزّهريّ، أخبرني حميد بن عبد الرحمن فذكره.

يحمل هذا النهي للاهتداء بكتب أهل الكتاب والملل الأخرى، وأمّا النظر فيها للنقد وبيان فسادها فهو مباح، بل قد يكون واجبا على من يتصدى من العلماء الراسخين لبيان تزييف هذه الملل والديانات، وعليه جرى عمل السلف من القرن الأوّل إلى يومنا هذا كما بينت ذلك في كتابي:"دراسات في اليهودية والمسيحية وأديان الهند".




জাবের ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আহলে কিতাবদের কাছ থেকে পাওয়া একটি কিতাব নিয়ে এলেন। তিনি তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পাঠ করলেন। তখন তিনি (নবী) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: "হে খাত্তাবের পুত্র! তোমরা কি এর (দ্বীনের) ব্যাপারে দ্বিধাগ্রস্ত? যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! আমি তো তোমাদের নিকট শুভ্র ও নিষ্কলুষ (পবিত্র) দ্বীন নিয়ে এসেছি। তোমরা তাদের (আহলে কিতাবদের) নিকট কোনো কিছু জিজ্ঞাসা করো না। কারণ, তারা যদি তোমাদেরকে কোনো সত্য খবর দেয়, তবে তোমরা সেটাকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করবে; অথবা যদি কোনো মিথ্যা খবর দেয়, তবে তোমরা সেটাকে সত্য বলে বিশ্বাস করবে। যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! যদি মুসা (আঃ) জীবিত থাকতেন, তবে আমার অনুসরণ করা ব্যতীত তাঁর অন্য কোনো উপায় থাকত না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1294)


1294 - عن ابن عباس، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من اقتبس علمًا من النجوم اقتبس شعبة من السّحر زاد ما زاد".

صحيح: رواه أبو داود (3905)، وابن ماجه (3726) من طريق يحيى بن سعيد، عن عبد اللَّه بن الأخنس، عن الوليد بن عبد اللَّه، عن يونس بن ماهك، عن ابن عباس، فذكر الحديث. وإسناده صحيح.

وعبيد اللَّه بن الأخنس، ثقة في قول جمهور الأئمّة كأحمد بن حنبل، وابن معين، وأبي داود، والنسائيّ، وقد احتجّ به الشيخان في الصّحيح، وكذا أخرج له بقية أصحاب الكتب السّتة.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি জ্যোতির্বিদ্যা থেকে কোনো জ্ঞান আহরণ করল, সে যাদুর একটি শাখা আহরণ করল। সে যত বাড়াবে (পাপ) তত বাড়বে।”









আল-জামি` আল-কামিল (1295)


1295 - عن عبد اللَّه، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هلك المتنطِّعون". قالها ثلاثًا.

صحيح: رواه مسلم في العلم (2670) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا حفص بن غياث، ويحيى بن سعيد، عن ابن جريج، عن سلمان بن عتيق، عن طلق بن حيب، عن الأحنف بن قيس، عن عبد اللَّه، فذكر الحديث.

والمتنطّعون: هم الغالون المجاوزون الحدود في أقوالهم وأفعالهم.

وفي الباب ما رُوي عن معاوية:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم نهى عن الأغلوطات".

رواه أبو داود (3656) عن إبراهيم بن موسى الرازيّ، عن عيسى بن يونس، عن الأوزاعيّ، عن عبد اللَّه بن سعد، عن الصنابحيّ، عن معاوية، فذكره.

وعبد اللَّه بن سعد هو ابن فروة البجلي مولاهم الدّمشقيّ لم يوثقه أحد، وإنّما ذكره ابن حبان في الثّقات وقال:"يخطئ". وقال أبو حاتم:"مجهول".

ومن طريقه رواه الإمام أحمد (5/ 435)، والطَّبرانيّ في الكبير (19/ 982)، والخطيب في"الفقيه والمتفقه" (635)، والبيهقي في"المدخل" (304).

و"الأغلوطات" قال الأوزاعيّ: شِداد المسائل وصِعابها.
وقال الخطّابي:"نهى أن يُعترض العلماء بصعاب المسائل التي يكثر فيها الغلط، ليُستنزلوا بها، ويسقط رأيهم فيها، وفيه كراهية التّعمق والتّكلف لما لا حاجة بالإنسان إليه من المسألة، ووجوب التوقف عما لا علم للمسؤول به".

انظر: معالم السنن، وغريب الحديث (1/ 354) له.




আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ধ্বংস হোক বাড়াবাড়ি বা সীমালঙ্ঘনকারীরা।" তিনি কথাটি তিনবার বললেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1296)


1296 - عن أسامة بن زيد، قال: قيل له: ألا تدخلُ على عثمان فتُكلِّمَه؟ فقال: أترونَ أنِّي لا أُكلِّمه إِلَّا أُسمِعُكم؟ واللَّه! لقد كلَّمْتُه فيما بيني وبينه، ما دون أن أفتتَح أمرًا لا أُحبُّ أن أكونَ أوّل مَنْ فتحه، ولا أقول لأحد يكون عليَّ أميرًا: إنّه خير النّاس بعد ما سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"يؤتى بالرّجل يوم القيامة، فيلقى في النّار، فتندلق أقتاب بطنه، فيدور بها كما يدور الحمار بالرَّحى، فيجتمعُ إليه أهل النّار. فيقولون: يا فلان! مالك؟ ألم تكنْ تأمرُ بالمعروف وتنهى عن المنكر، فيقول: بلى قد كنتُ آمرُ بالمعروف ولا آتيه، وأنْهى عن المنْكر وآتيه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3267)، ومسلم في الزّهد والرّقائق (2989) كلاهما من طريق الأعمش، عن شقيق، عن أسامة بن زيد، فذكره.

قوله:"فتندلق أقتاب بطنه". أقتاب: جمع قِتْب -بكسر القاف وسكون المثناة- وهي الأمعاء، واندلاقها خروجها بسرعة.




উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (উসামা) বলেন, তাঁকে (উসামাকে) বলা হলো: আপনি কি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গিয়ে তাঁর সাথে কথা বলবেন না? তিনি বললেন: তোমরা কি মনে করো, আমি কেবল তোমাদের শোনানোর জন্যই তাঁর সাথে কথা বলবো? আল্লাহর কসম! আমি আমার ও তাঁর (উসমানের) মধ্যকার বিষয়ে তাঁর সাথে কথা বলেছি। তবে (আমি এমন কোনো কাজ করবো না) যা আমি শুরু করতে চাই না এবং আমি চাই না যে আমিই প্রথম তা শুরু করি। আর আমি এমন কোনো ব্যক্তিকে উত্তম বলব না, যিনি আমার উপর আমির হয়েছেন, (এমনটা বলব না) যখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কিয়ামতের দিন এক ব্যক্তিকে আনা হবে এবং তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে। ফলে তার নাড়িভুঁড়ি বের হয়ে ঝুলে পড়বে এবং সে তার চারপাশে এমনভাবে ঘুরতে থাকবে, যেমন গাধা যাঁতার চারপাশে ঘুরে। তখন জাহান্নামের বাসিন্দারা তার কাছে এসে জড়ো হবে। তারা বলবে: হে অমুক! তোমার কী হয়েছে? তুমি কি (দুনিয়াতে) ভালো কাজের আদেশ দিতে না এবং খারাপ কাজ থেকে নিষেধ করতে না? তখন সে বলবে: হ্যাঁ, আমি ভালো কাজের আদেশ দিতাম, কিন্তু নিজে তা করতাম না এবং আমি খারাপ কাজ থেকে নিষেধ করতাম, কিন্তু নিজেই তা করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1297)


1297 - عن زيد بن أرقم، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يقول:"اللَّهُمَّ! إنّي أعوذ بك من علم لا ينفع، ومن قلبٍ لا يخشع، ومن نفسٍ لا تشبع، ومن دعوةٍ لا يستجاب لها".

صحيح: رواه مسلم في الذّكر والدّعاء (3722) من حديث أبي معاوية، عن عاصم، عن عبد اللَّه بن
الحارث، وعن أبي عثمان النّهديّ، عن زيد بن أرقم، فذكره في حديث أطول، وسيأتي في موضعه.




যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট এমন জ্ঞান থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করি, যা কোনো উপকারে আসে না, এবং এমন অন্তর থেকে, যা বিনয়ী হয় না, এবং এমন আত্মা (নফস) থেকে, যা তৃপ্ত হয় না, এবং এমন দুআ থেকে, যা কবুল করা হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1298)


1298 - عن أبي برزة الأسلميّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تزولُ قدما عبدٍ يوم القيامة حتّى يُسأل عن عمره فيما أفناه، وعن علمه فيما فعل، وعن ماله من أين اكتسبه وفيما أنفقه، وعن جسمه فيما أبلاه".

حسن: رواه الترمذيّ (2417) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، أخبرنا الأسود بن عامر، حدّثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن سعيد بن عبد اللَّه بن جريج، عن أبي برزة الأسلميّ، فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".

وفي معناه ما رُوي عن ابن مسعود مرفوعًا:"لا تزول قدما ابن آدم يوم القيامة من عند ربِّه حتّى يُسأل عن خمس: عن عمره فيم أفناه، وعن شبابه فيم أبلاه، وعن ماله من أين اكتسبه، وفيم أنفقه، وماذا عمل فيما علم".

رواه الترمذيّ (2416) عن حُميد بن مسعدة، حدّثنا حصين بن نُمير أبو مِحْصن، حدّثنا حسين ابن قيس الرّحبيّ، حدّثنا عطاء بن أبي رباح، عن ابن عمر، عن ابن مسعود، فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث ابن مسعود، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم إِلَّا من حديث الحسين بن قيس، والحسين يضعّف في الحديث من قبل حفظه".




আবূ বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেয়ামতের দিন কোনো বান্দার দু’টি পা সরতে পারবে না, যতক্ষণ পর্যন্ত তাকে চারটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা না হবে: তার জীবনকাল সম্পর্কে, কীভাবে সে তা অতিবাহিত করেছে; তার জ্ঞান সম্পর্কে, সে তাতে কী করেছে; তার সম্পদ সম্পর্কে, কোথা থেকে সে তা উপার্জন করেছে এবং কিসে তা খরচ করেছে; এবং তার শরীর সম্পর্কে, কীভাবে সে এটিকে জীর্ণ করেছে (ব্যবহার করেছে)।”









আল-জামি` আল-কামিল (1299)


1299 - عن أسامة بن زيد، قال: سمعتُ رسول اللَّه يقول:"يؤتى بالرّجل الذي كان يطاع في معصية اللَّه، فيُقْذف في النّار، فتندلِقُ به أقتابه، فيستدير فيها كما يستديرُ الحمار في الرَّحى، فيأتي عليه أهلُ طاعته من النّاس فيقولون: أيْ فُلُ! أين ما كنتَ تأمرُنا به؟ فيقول: إنّي كنتُ آمرُكم بأمر وأخالفُكم إلى غيره".

حسن: رواه أحمد (21794) عن عبد الصمد، ثنا حمّاد، عن عاصم، عن أبي وائل، قال: قيل لأسامة بن زيد، فذكره. وإسناده حسن من أجل عاصم -وهو ابن أبي النّجود- فإنّه صدوق، وباقي رجاله ثقات. ورواه الحاكم (4/ 89) من هذا الوجه، وصحّحه.




উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "সেই ব্যক্তিকে আনা হবে, যার আনুগত্য করা হতো আল্লাহর অবাধ্যতার কাজে, অতঃপর তাকে আগুনে নিক্ষেপ করা হবে। তখন তার নাড়িভুঁড়ি বের হয়ে যাবে। সে তাতে ঘুরতে থাকবে, যেমন গাধা জাঁতার মধ্যে ঘোরে। তার অনুসারী মানুষজন তার কাছে এসে বলবে: ওহে অমুক! তুমি আমাদের যে কাজের নির্দেশ দিতে, তা কোথায়? সে বলবে: আমি তোমাদেরকে এক কাজের নির্দেশ দিতাম, কিন্তু আমি নিজেই তার বিপরীত করতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1300)


1300 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مررتُ ليلة أُسري بي على قومٍ تُقرض شفاههم بمقاريض من نار، قال: قلت: من هؤلاء؟ قالوا: خطباء من أهل الدُّنيا ممّن كانوا يأمرون النّاس بالبر، وينسون أنفسهم وهم يتلون الكتاب، أفلا يعقلون".

صحيح: رواه أحمد (12211) عن وكيع، حدّثنا حمّاد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أنس، فذكر الحديث.

وهذا إسناد ضعيف؛ لضعف علي بن زيد، وهو ابن جُدعان، لكنّه متابع.

فرواه أبو يعلى (4069) من طريق معتمر بن سليمان.
وأبو نعيم في الحلية (8/ 172) من طريق ابن المبارك كلاهما عن سليمان التيميّ، عن أنس، والإسنادان صحيحان. ورواه ابن حبان (53) من وجه آخر عن أنس، وصحّحه.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি ইসরার (ঊর্ধ্বগমনের) রাতে এমন এক সম্প্রদায়ের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, যাদের ঠোঁট আগুনের কাঁচি দ্বারা কাটা হচ্ছিল। আমি বললাম: এরা কারা? তারা বলল: এরা হলো দুনিয়ার সেসব বক্তা (খুতাবা), যারা মানুষকে সৎকাজের আদেশ দিত, কিন্তু নিজেদের ভুলে থাকত, অথচ তারা কিতাব পাঠ করত। তারা কি তবে বোঝে না?"









আল-জামি` আল-কামিল (1301)


1301 - عن أبي تميمة عن جندب بن عبد اللَّه الأزديّ صاحب النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال: انطلقتُ أنا وهو إلى البصرة، حتّى أتينا مكانًا يقال له: بيت المسكين، وهو من البصرة على مثل الثَّوِيَّة من الكوفة، فقال: هل كنت تدارس أحدًا القرآن؟ قلت: نعم، قال: فإذا أتينا البصرة، فأتني بهم، فأتيته بصالح بن مسرح، وبأبي بلال، ونَجدة، ونافع بن الأزرق، وهم في نفسي يومئذ من أفاضل أهل البصرة، فأنشأ يحدِّثني عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال جندب: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مثلُ العالم الذي يعلِّمُ النَّاسَ الخيرَ وينسى نفسه، كمثل السِّراج يُضيء للنّاس ويُحْرق نفسه". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يَحُولَنَّ بين أحدِكم وبين الجنّة وهو ينظر إلى أبوابها مِلْءُ كَفٍّ مِنْ دم مُسلمٍ أَهْراقَهُ ظُلْمًا". قال: فتكلّم القومُ، فذكروا الأمر بالمعروف والنّهي عن المنكر، - وهو ساكت يستمع منهم، ثم قال: لم أرَ كاليوم قطّ أحقّ بالنّجاة إن كانوا صادقين".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (1681) من طريق هشام بن عمار، عن علي بن سليمان الكلبي، حدثني الأعمش، عن أبي تميمة، عن جندب بن عبد اللَّه الأزديّ، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل علي بن سليمان الكلبي، ذكره ابن حبان في الثقات، وقال أبو حاتم: ما أرى بحديثه بأسًا، صالح الحديث، ليس بالمشهور.

وقد جاء عن عمر بن الخطاب أمير المؤمنين أنه قال:"يُفسد الزّمان ثلاثة: أئمّة مضلّون، وجدال منافق بالقرآن -والقرآن حقّ-، وزلّة العالم". انظر تخريجه في"المدخل" (833).

وعن ابن عباس، قال:"ويل للأتباع من عثرات العالم، قيل: وكيف ذلك يا ابن عباس؟ قال: يقول العالم الشيء برأيه، فيلقى من هو أعلم منه برسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منه فيخبره ويرجع، ويقضي الأتباع بما حكم"."المدخل" (836).

وعن أبي الدّرداء قال:"إنّي لآمركم بالأمر، وما أفعله، ولكن لعلّ اللَّه أن يأجرني فيه". المدخل (838).

وأنشأ ابنُ عيينة يقول:

خذ بعلمي وإن قصرتُ في عملي … ينفعك علمي ولا يضرُّك تقصيري

وعن ابن عباس قال:"خذ الحكمة ممن سمعت، فإنّ الرّجل يتكلّم بالحكمة وليس بالحكيم، فتكون كالرمية خرجت من غير رامٍ"."المدخل" (843).

وعن سعيد بن أبي بردة، قال:"كان يقال: الحكمة ضالّة المؤمن يأخذها حيث وجدها".
"المدخل" (844).

وروي مرفوعًا ولا يصح، رواه الترمذيّ (2687)، وابن ماجه (4169) كلاهما من طريق عبد اللَّه بن نمير، عن إبراهيم بن الفضل، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، مرفوعًا، ولفظه:"الحكمة ضالّة المؤمن، فحيث وجدها فهو أحقُّ بها".

قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه، وإبراهيم بن الفضل المخزوميّ ضعيف في الحديث".

قلت: وهو كما قال فإنّ إبراهيم بن الفضل المخزوميّ المدنيّ أبو إسحاق، ويقال: إبراهيم بن إسحاق، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وقال الدّارقطنيّ:"متروك"، واعتمده الحافظ في التقريب.




জুনদুব ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আযদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এবং তিনি (আবূ তাইমাহ) বসরা অভিমুখে রওনা হলাম, এমনকি আমরা এমন একটি জায়গায় পৌঁছলাম, যার নাম 'বাইতুল মিসকীন'। এটি বসরা থেকে কুফার 'আস-সাওয়িয়াহ'-এর মতো দূরত্বে অবস্থিত। তিনি (আবূ তাইমাহ) বললেন: তুমি কি কারো সাথে কুরআন অধ্যয়ন (মুদারাসা) করতে? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: যখন আমরা বসরা পৌঁছব, তখন তুমি তাদেরকে আমার কাছে নিয়ে আসবে। অতঃপর আমি তাদের নিয়ে আসলাম—সালিহ ইবনু মাসরাহ, আবূ বেলাল, নাজ্জাদা এবং নাফি ইবনু আল-আযরাক। সেদিন তারা আমার দৃষ্টিতে বসরাবাসীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। অতঃপর তিনি আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করা শুরু করলেন। জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে আলেম মানুষকে কল্যাণের শিক্ষা দেয়, কিন্তু নিজেকে ভুলে যায়, তার দৃষ্টান্ত হলো প্রদীপের মতো—যা মানুষকে আলো দেয় কিন্তু নিজেকে দগ্ধ করে।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যেন জান্নাত ও তার দরজাসমূহ দেখাকালীন সময়েও এমন এক মুসলিমের এক অঞ্জলি (এক আজলা) পরিমাণ রক্তের কারণে জান্নাত থেকে বঞ্চিত না হয়, যা সে অন্যায়ভাবে ঝরিয়েছে।" তিনি বলেন: অতঃপর সেই লোকেরা কথা বলা শুরু করল এবং সৎ কাজের আদেশ ও অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করার বিষয়ে আলোচনা করল—আর তিনি (আবূ তাইমাহ) নীরব থেকে তাদের কথা শুনছিলেন। এরপর তিনি বললেন: আজকের দিনের মতো আমি আর কখনো কাউকে মুক্তি পাওয়ার এত উপযুক্ত দেখিনি—যদি তারা সত্যবাদী হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (1302)


1302 - عن المغيرة بن أبي بردة أنه سمع أبا هريرة يقول: جاء رجل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه! إنا نركبُ البحْرَ، ونَحْمِلُ معنا القَليلَ من الماء، فإن توضَّأنا به عَطِشْنا، أفنتوضَّأُ به؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هو الطَّهور ماؤه، الحِلُّ ميتتُه".

صحيح: رواه مالك في الطهارة (12) عن صفوان بن سُليم، عن سعيد بن سلمة -من آل بني الأزرق- عن المغيرة بن أبي بُرْدة -وهو من بني عبد الدار- فذكر الحديث. ومن طريق مالك رواه أبو داود (83) والترمذي (69) والنسائي (59) وابن ماجه (386).

وكون بعض الرواة أدخلوا بين المغيرة بن أبي بردة وأبي هريرة (أبا بردة) لا يضر بصحة الحديث؛ فإن المغيرة بن أبي بردة صرَّح بأنه سمع من أبي هريرة.

صححه البخاري فيما حكي عنه الترمذيّ في العلل (1/ 136)، قال الترمذيّ: قلت: هُشيم يقول في هذا الحديث:"المغيرة بن أبي برزة"، فقال البخاري: وهم فيه، وإنما هو المغيرة بن أبي بردة، وهُشيم بهم في الإسناد، وهو في المقطعات أحفظ".

أما الترمذيّ نفسه فقال: حسن صحيح. وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1/ 59) وابن حبان (1243) وقال الحاكم (1/ 140 - 142):"هو أصل صدَّر به مالك كتاب الموطأ، وتداوله فقهاء الإسلام من عصره إلى وقتنا هذا".

كذا قال وليس كذلك بل مالك صدّر كتابه بحديث جبريل في وقوت الصّلاة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, “হে আল্লাহর রাসূল! আমরা সমুদ্রযাত্রা করি এবং আমাদের সাথে সামান্য পানি বহন করি। যদি আমরা তা দিয়ে ওযু করি, তবে আমরা পিপাসার্ত হয়ে যাব। আমরা কি তা দিয়ে ওযু করব?” তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “এর (সমুদ্রের) পানি পবিত্রকারী এবং এর মৃত প্রাণী হালাল।”









আল-জামি` আল-কামিল (1303)


1303 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم سُئل عن ماء البحر، فقال:"هو الطَّهور ماؤه، الحل ميتَتُه".

حسن: رواه ابن ماجه (388)، قال: حدّثنا محمد بن يحيى، ثنا أحمد بن حنبل، ثنا أبو القاسم بن أبي الزّناد، قال: حدثني إسحاق بن حازم، عن عبد اللَّه -وهو ابن مِقْسم- عن جابر، فذكر الحديث.

إسناده حسن؛ رجاله ثقات غير أبي القاسم بن أبي الزّناد، فهو ليس به بأس، وإسحاق بن حازم صدوق.

وقال الحافظ أبو علي بن السكن: حديث جابر أصحّ ما روي في هذا الباب، وأخرجه في سننه"الصّحاح المأثورة"، انظر:"تحفة المحتاج" (1/ 136 برقم 3)"التلخيص" (1/ 11).

والحديث في مسند الإمام أحمد (3/ 373) ومن طريقه رواه أيضًا ابن خزيمة (112) وابن حبان (1244).
وأخرجه أيضًا الحاكم (1/ 143) شاهدا لحديث أبي هريرة، ولكن من طريق ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر مثله. وأبو الزبير مدلس وقد عنعن.

وفي الباب عن علي بن أبي طالب رواه الدارقطني (1/ 35) والحاكم (1/ 142) وسكت عليه الحاكم.

قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 12): من طريق أهل البيت وفي إسناده من لا يُعرف.

وعن أنس بن مالك رواه عبد الرزراق (320) والدارقطني (1/ 35) عن الثوري، عن أبان بن أبي عياش، عن أنس قال الدارقطني: أبان متروك.

وعن ابن عباس رواه الدارقطني والحاكم، وصحَّح الدارقطني وقفه.

وعن عبد اللَّه بن عمرو، رواه الدارقطني والحاكم من جهة عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده وسكت عليه الحاكم: وهو من طريق المثنى، عن عمرو بن شعيب قال الحافظ: والمثنى ضعيف.

ومن حديث أبي بكر الصديق رواه الدارقطني، وفي سنده عبد العزيز بن عمران وهو ابن أبي ثابت. قال الذهبي: مجمع على ضعفه.

وله طريق آخر إلا أنه موقوف.

ومن حديث ابن الفراس رواه ابن ماجه.

قال الترمذيّ: سألت محمدًا عنه فقال: هذا مرسل، لم يدرك ابن الفراس النبي صلى الله عليه وسلم والفراس له صحبة. قال الحافظ:"فعلى هذا كأنه سقط من الرواية: عن أبيه، أو أن قوله: ابن - زيادة، فقد ذكر الإمام البخاري أن مسلم بن مخشي لم يدرك الفراس نفسه، وإنما يروى عن ابنه، وإن الابن ليس له صحبة. وقد رواه البيهقي من طريق شيخ شيخ ابن ماجه - يحيى بن بكير، عن الليث، عن جعفر بن ربيعة، عن مسلم بن مخشي أنه حدثه أن الفراس قال: كنت أصيد. . فهذا السياق مجود، وهو على رأي البخاري مرسل" انظر للمزيد: نصب الراية (1/ 99).

وأما حديث ابن مسعود في الوضوء بالنبيذ فلم يصح، وهو ما رواه أبو داود (84) والترمذي (88) وابن ماجه (384) أن النبي صلى الله عليه وسلم قال له ليلة الجن:"ما في إداوتك؟" قال: نبيذ. قال:"تمر طيبة وماء طهور" فإن مداره على أبي زيد، عن ابن مسعود، وهو رجل مجهول عند أهل الحديث، لا تعرف له رواية غير هذا الحديث كما قال الترمذيّ، وقال البخاري:"أبو زيد الذي روى حديث ابن مسعود رجل مجهول، لا يُعرف بصحبة عبد اللَّه".

وقال ابن عبد البر:"أبو زيد مولى عمرو بن حريث مجهول عندهم، لا يعرف، وحديثه عن ابن مسعود في الوضوء بالنبيذ منكر لا أصل له، ولا رواه من يوثق به، ولا يثبت".

قلت: وقد روى مسلم (450) بإسناده عن ابن مسعود قال:"لم أكن مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة الجن، ووددت أني كنت معه".
وروي أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"النبيذ وضوء لمن لم يجد الماء" وهو حديث منكر، رواه الدارقطني (1/ 75) والبيهقي (1/ 12) من حديث المسيب بن واضح، نا مبشر ابن إسماعيل، عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

قال البيهقي في السنن الكبري (1/ 11):"هذا حديث مختلف فيه على المسيب بن واضح، وهو واهم فيه في موضعين: في ذكر ابن عباس، وفي ذكر النبي صلى الله عليه وسلم، والمحفوظ من قول عكرمة غير مرفوع"، انتهى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সমুদ্রের পানি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল। তিনি বললেন: এর পানি পবিত্রকারী (তাহূর), এবং এর মৃত প্রাণী হালাল।









আল-জামি` আল-কামিল (1304)


1304 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استيقظ أحدكم من نومه فليغسل يده قبل أن يُدخلها في وضوئه؛ فإن أحدكم لا يدري أين بانت يدُه".

متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (9) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في الوضوء (162) من طريق مالك، به. إلا أنّه جمع هذا الحديث مع حديث:"إذا توضأ أحدكم فليجعل في أنفه ثم لينثر، ومن استجمر فليوتر"، ولعله لاتحاد سندهما، وأما مالك ففرَّقه، وكذا مسلم؛ فإنه رواه في الطهارة (278) من طريق المغيرة الحِزامي، عن أبي الزّناد عنه به، ورواه أيضًا من طرق أخرى عن أبي هريرة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ ঘুম থেকে জাগে, তখন সে যেন ওযুর পাত্রে হাত প্রবেশ করানোর পূর্বে তা ধুয়ে নেয়; কারণ তোমাদের কেউ জানে না যে তার হাত কোথায় রাত্রিযাপন করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1305)


1305 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الماء وما ينوبه من الدواب والسباع، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا كان الماء قلتين لم يحمل الخبَث".

صحيح: رواه أبو داود (63، 64) والترمذي (67)، والنسائي (52) وابن ماجه (517) كلّهم عن محمد بن جعفر بن الزبير، عن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر، عن أبيه عبد اللَّه بن عمر، إلا الترمذيّ فإنه قال: عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر.

وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (92)، وابن حبان (1249)، والحاكم (1/ 132 - 133) وقال: صحيح على شرط الشّيخين، فقد احتجاج بجميع رواته ولم يخرجاه وأظنّهما -واللَّه أعلم- لم يخرجاه لخلاف فيه على أبي أسامة، عن الوليد بن كثير. انتهى

وعبيد اللَّه المصغَّر وعبد اللَّه المكبر كلاهما ثقتان، يرويان عن أبيهما عبد اللَّه بن عمر، كنية عبيد اللَّه أبو بكر، وهو شقيق سالم، وكنية عبد اللَّه أبو عبد الرحمن المدني، توفي عبيد اللَّه سنة 106 هـ، وتوفي عبد اللَّه سنة 105 هـ.

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 278).

وقوله: (ينوبه) إذا تردد إليه مرة بعد مرة، ونوبة بعد نوبة، مِن ناب المكان وانتابه.
والقُلّة: إناء للعرب كالجرة الكبيرة، وقد قدرها الفقهاء مائتين وخمسين رطلا إلى ثلاثمائة.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পানি এবং তাতে যেসব গৃহপালিত ও হিংস্র জন্তু আসে, সে সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন পানি দুই কুল্লাহ পরিমাণ হবে, তখন তা কোনো নাপাকি গ্রহণ করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1306)


1306 - عن ابن عباس قال: اغتسل بعضُ أزواج النبي صلى الله عليه وسلم في جَفْنةٍ، فجاء النبي صلى الله عليه وسلم ليتوضّأَ منها -أو يغتسلَ- فقالت له: يا رسول اللَّه! إني كنت جنبًا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الماء لا يُجْنِبُ".

حسن: رواه أبو داود (68) والترمذي (65) والنسائي (325) وابن ماجه (370، 371) كلّهم من طريق سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس.

قال الترمذيّ: حسن صحيح.

قلت: إسناده حسن لأجل سماك بن حرب، وقد أعِلَّ بأنه كان يقبل التلقين، ولكن رواه ابن خزيمة (91)، من طريق شعبة عنه، وهو لا يحمل عن مشايخه إلا صحيح حديثهم. وصحَّحه أيضًا ابن حبان (1242)، والحاكم (1/ 159) كلاهما من هذا الوجه، وقال الحاكم:"هذا حديث صحيحٌ في الطهارة ولم يُخرجاه، ولا يُحفظ له علَّة". والجَفْنةُ: القصعة الكبيرة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে কেউ একজন একটি বড় পাত্রে গোসল করলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে ওযু করতে অথবা গোসল করতে আসলেন। তখন তিনি তাঁকে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তো জুনুবী (নাপাক) ছিলাম।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই পানি নাপাক হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1307)


1307 - عن أبي سعيد الخدري قال: قيل يا رسول اللَّه! أنتوضأ من بئر بضاعة، وهي بئر يُطرح فيها الحيضُ ولحوم الكلاب والنَّتْنُ؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الماء طهور لا يُنَجِّسه شيء".

حسن: رواه أبو داود (66) والترمذي (66) والنسائي (326) كلّهم من طريق الوليد بن كثير، عن محمد بن كعب القُرَظي، عن عبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن رافع، عن أبي سعيد الخدري.

قال أبو سعيد في رواية عند النسائي: مررت بالنبي صلى الله عليه وسلم وهو يتوضأ من بئر بضاعة، فقلت: أتتوضأ منها وهي يطرح فيها ما يكره من النَّتْن؟ فقال:"الماء لا ينجسه شيء".

قال الترمذيّ: حديث حسن، وقد جوّد أبو أسامة هذا الحديث؛ فلم يرو أحد حديث أبي سعيد في بئر بضاعة أحسن مما روى أبو أسامة (عن الوليد بن كثير)، وقد رُوي هذا الحديث من غير وجه عن أبي سعيد. انتهى.

قلت: إسناده حسن لغيره ورجاله ثقات غير عبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن رافع؛ فلم يوثقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 71).

ولكن للحديث طرق أخرى كما قال الترمذيّ، منها ما رواه أبو داود (67) من طريق محمد بن إسحاق، عن سليط بن أيوب، عن عبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن رافع الأنصاري ثم العدوي، عن أبي سعيد الخدري قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو يقال له: إنه يُستقى لك من بئر بضاعة، وهي بئر يلقى فيها لحومُ الكلاب والمحايِض وعِذَر النّاس، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الماء طهور لا ينجسه شيء".

محمد بن إسحاق مدلس، وقد عنعن، وسليط بن أيوب ذكره ابن حبان في الثقات (6/ 430)
وقال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة.

ورواه النسائي (328) من طريق مطرف بن طريف، عن خالد بن أبي نوف، عن سليط، عن ابن أبي سعيد الخدري، عن أبيه قال: مررت بالنبي صلى الله عليه وسلم وهو يتوضأ من بئر بضاعة، فقلت: أتتوضأ منها وهي يطرح فيها ما يكره من النتن؟ فقال:"الماء لا ينجسه شيء".

وفيه خالد بن أبي نوف، ذكره ابن حبان في الثقات (6/ 264) وقال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة.

وللحديث أسانيد أخرى كلها معلولة؛ ولذا نقل ابن الجوزي عن الدارقطني أنّه قال:"إنّه ليس بثابت". وتعقَّبه النووي في الخُلاصة (1/ 65) فقال: حسَّنه الترمذيّ، وفي بعض النسخ:"حسن صحيح" وقال الإمام أحمد بن حنبل:"هو صحيح" وكذا قال آخرون، وقولهم مقدَّمٌ على قول الدارقطني:"إنَّه غير ثابت". انتهى.

وكذلك صحَّحه أيضًا يحيى بن معين، وأبو محمد بن حزم كما في"التلخيص الحبير" (1/ 13).

وأمّا قول الدارقطني:"إنّه ليس بثابتٍ" فيقول الحافظ:"ولم نر ذلك في العلل له ولا في السنن" انتهى.

قلت: قاله الدّارقطني في حديث أبي هريرة في العلل (8/ 157).

ثم إن صحَّ هذا الحديث المطلق فهو مقيد بحديث ابن عمر السابق، وهو أن يكون الماء قلتين فأكثر ما لم يتغيّر لونه أو طعمه أو ريحه، فهو طاهر بالإجماع كما حكاه ابن المنذر في كتابه"الإجماع" (ص 33).

وأمّا الأحاديث الواردة عن ثوبان، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"الماء طهور إلّا ما غلب على طعمه أو ريحه". رواه الدّارقطني وغيره، فهو ضعيف.

وكذلك ما روي عن أبي أمامة عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الماء لا ينجسه شيء إلّا ما غلب على طعمه وريحه ولونه".

رواه ابن ماجه (521) وغيره، فهو ضعيف أيضًا.

وكذلك لا يصح ما روي عن جابر بن عبد اللَّه، رواه ابن ماجه (520) وفيه طريف بن شهاب أجمعوا على تضعيفه.

وفي الباب ما رُوي عن سهل بن سعد السّاعديّ قال:"سقيتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بيدي من بضاعة".

رواه الإمام أحمد (22860) عن حسين بن محمد، حدّثنا الفضيل -يعني ابن سليمان-، حدّثنا محمد بن أبي يحيى، عن أمّه، قالت: سمعت سهل بن سعد يقول (فذكر الحديث).

ورواه الدّارقطنيّ (48) من وجه آخر عن فضيل بن سليمان النّميريّ، عن أبي حازم، عن سهل ابن سعد، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الماء لا ينجسه شيء".

وإسناده ضعيف من أجل الكلام في فضيل بن سليمان النميريّ، فقد ضعّفه ابن معين والنسائي،
وقال أبو زرعة: لين الحديث، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ليس بالقوي.

قلت: روى له الجماعة وكان علي بن المديني مع تعنته في الرجال روي عنه، فلعله انتقى من حديثه.

ولا تنفعه متابعة حاتم بن إسماعيل لاضطرابه في إسناده فقد رواه أبو يعلى (7519)، والطبرانيّ في الكبير (6026)، والبيهقيّ في السنن (1/ 259)، وفي المعرفة (1823) كلّهم من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن محمد بن أبي يحيى، عن أبيه، قال: دخلتُ على سهل بن سعد السّاعدي في نسوة فقال:"لو أني أسقيكم من بضاعة لكرهتم ذلك، وقد -واللَّه- سقيتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بيدي منها".

قال البيهقي: هذا إسناد حسن موصول.

ولكن رواه الطحاوي في شرحه (4) من هذا الطريق وقال:"عن أمه" بدلا من"أبيه" وهو موافق لما رواه الفضيل بن سليمان عند الإمام أحمد، وأمُّه لا تعرف من هي وما حالها، فكيف يكون إسناده حسنًا مع اضطرابه في الإسناد والمتن.

وله إسناد آخر أضعف من هذا وهو ما رواه القاسم بن أصبغ في"مصنفه" قال: ثنا محمد بن وضاح، ثنا عبد الصمد بن أبي سكينة الحلبي بحلب، ثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد، قال: قالوا: يا رسول اللَّه! إنك تتوضأ من بئر بضاعة، وفيها ما يُنجي الناسُ والمحائض والخبث، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الماء لا ينجسه شيء".

وقال محمد بن عبد الملك بن أيمن في مستخرجه على سنن أبي داود: حدّثنا محمد بن وضاح به، قال ابن وضاح: لقيت ابن أبي سكينة بحلب، فذكره. وقال قاسم بن أصبغ: هذا من أحسن شيء في بئر بضاعة، وقال ابن حزم: عبد الصمد ثقة مشهور، قال قاسم: ويروى عن سهل بن سعد في بئر بضاعة من طرق هذا خيرها، فاعلم ذلك. انتهى كلام ابن القطّان.

وقال الحافظ: ابن أبي سكينة الذي زعم ابن حزم أنه مشهور، قال ابن عبد البر وغير واحد: إنه مجهول، ولم نجد عنه راويا إلا محمد بن وضاح. انتهى.

انظر: التلخيص الحبير (1/ 13).

قلت: وهو كما قال فإنّي لم أقف على ترجمته في الكتب المتداولة، فكيف يكون مثله مشهورًا؟ ! .

فائدة:

قال الشافعي: كانت بئر بضاعة كبيرة واسعة، وكان يطرح فيها من الأنجاس ما لا يغير لها لونًا ولا طعمًا ولا يظهر له ريح.

وقال أبو داود: سمعت قتيبة بن سعيد قال: سألت قيم بئر بضاعة عن عُمُقِها قال: أكثر ما يكون فيها الماء إلى العانة، قلت: فإذا نقص؟ قال: دون العورة. قال أبو داود: وقدرت أنا بئر بضاعة
بردائي مددته عليها ثم ذرعته، فإذا عرضها ستة أذرع، وسألت الذي فتح لي البستان فأدخلني إليه: هل غير بناؤها عما كانت عليه؟ قال: لا. ورأيت فيها ماءً متغير اللون. انتهى

قلت: لعل ذلك لطول المكث وعدم الاستعمال به.

وقوله: يطرح فيها الحيض ولحم الكلاب والنتن، قال الخطابيّ في"معالم السنن" (1/ 73): قد يتوهم كثير من النّاس إذا سمع هذا الحديث أن هذا كان منهم عادة، وأنهم كانوا يأتون هذا الفعل قصدا وتعمدا، وهذا ما لا يجوز أن يُظن بذمي، بل بوثني، فضلا عن مسلم، ولم يزل من عادة النّاس قديما وحديثا، مسلمهم وكافرهم تَنْزيه المياه وصونها عن النجاسات، فكيف يظن بأهل ذلك الزمان -وهم أعلى طبقات أهل الدين، وأفضل جماعة المسلمين، والماء في بلادهم أعز، والحاجة إليه أمسّ- أن يكون هذا صنيعهم بالماء وامتهانهم له، وقد لعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من تغوّط في موارد الماء ومشارعه، فكيف من اتخذ عيون الماء ومنابعه رصدًا للأنجاس ومطرحا للأقذار؟ ! هذا ما لا يليق بحالهم، وإنما كان هذا من أجل أن هذه البئر موضعها في حَدور من الأرض، وأن السيول كانت تكسح هذه الأقذار من الطرق والأفنية، وتحملها فتلقيها فيها، وكان الماء لكثرته لا يؤثر فيه وقوع هذه الأشياء، ولا يغيره، فسألوا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن شأنها. . .




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বলা হলো, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি বুদা'আ কূপের পানি দ্বারা উযু করব? এটি এমন একটি কূপ, যেখানে হায়েজ (মাসিকের কাপড়), কুকুরের গোশত এবং দুর্গন্ধযুক্ত জিনিসপত্র ফেলা হয়।’ তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “পানি হলো পবিত্রকারী (পবিত্র), কোনো কিছুই এটিকে অপবিত্র করতে পারে না।”