হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (12908)


12908 - عن البراء بن عازب وسأله رجل من قيس: أفررتم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم حنين؟ فقال البراء: ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يفر، وكانت هوازن يومئذ رماة، وإنا لما حملنا عليهم انكشفوا، فأكببنا على الغنائم، فاستقبلونا بالسهام، ولقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم على بغلته البيضاء، وإن أبا سفيان بن الحارث آخذ بلجامها وهو يقول:

أنا النَّبِيّ لا كذب … أنا ابن عبد المطلب

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4317)، ومسلم في الجهاد والسير (1776: 80) كلاهما عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر غندر، حَدَّثَنَا شعبة، عن أبي إسحاق، قال: سمعت البراء، وسأله رجل من قيس، فذكره.




আল-বারা’ ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কায়স গোত্রের একজন লোক তাকে জিজ্ঞেস করল: আপনারা কি হুনাইনের দিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে পালিয়ে গিয়েছিলেন? তখন বারা’ বললেন: কিন্তু আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পালিয়ে যাননি। সেই দিন হাওয়াযিন গোত্রের লোকেরা ছিল তীরন্দাজ। আমরা যখন তাদের উপর আক্রমণ করলাম, তখন তারা ছত্রভঙ্গ হয়ে গেল। আর আমরা তখন গনীমতের মালের দিকে ঝুঁকে পড়লাম। তখন তারা তীর দিয়ে আমাদের আক্রমণ করল। আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার সাদা খচ্চরের উপর দেখেছি, আর আবু সুফিয়ান ইবনুল হারিস তার লাগাম ধরেছিলেন। তিনি তখন বলছিলেন:

আমিই সেই নবী, এতে কোনো মিথ্যা নেই, আমি আব্দুল মুত্তালিবের সন্তান।









আল-জামি` আল-কামিল (12909)


12909 - عن جندب بن سفيان: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في بعض المشاهد، وقد دميت إصبعه، فقال:

هل أنتِ إِلَّا إصبعٌ دميت … وفي سبيل الله ما لقيت

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2802)، ومسلم في الجهاد والسير (1796) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن الأسود بن قيس، عن جندب بن سفيان، فذكره.

وكذلك أنه أنشد بعض الأشعار لغيره مع الصّحابة.




জুনদুব ইবনু সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কোনো এক যুদ্ধে ছিলেন, তখন তাঁর আঙুলে আঘাত লেগে রক্ত ঝরছিল। তখন তিনি বললেন:

তুমি তো নও শুধু এক রক্তাক্ত আঙুল,
যা তুমি ভোগ করেছ, তা আল্লাহরই পথে।

অনুরূপভাবে তিনি সাহাবীদের সাথে অন্য কারো রচিত কিছু কবিতা আবৃত্তি করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12910)


12910 - عن البراء قال: رأيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم الخندق وهو ينقل التراب حتَّى وارى التراب شعر صدره - وكان رجلًا كثير الشعر - وهو يرتجز برجز عبد الله بن رواحة.

اللهم لولا أنت ما اهتدينا … ولا تصدقنا ولا صلينا

فأنزلن سكينة علينا … وثبت الأقدام إن لاقينا

إن الأعداء قد بغوا علينا … إذا أرادوا فتنة أبينا

يرفع بها صوته.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد (3034) - واللّفظ له -، ومسلم في الجهاد (125: 1803) كلاهما من طريق أبي إسحاق، عن البراء، فذكره.

وأمّا الروايات التي جاء فيها إنشاد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بعض الأشعار مع عدم إقامته لأوزانها فهي كلها
معلولة، والنبي صلى الله عليه وسلم كان أفصح العرب فمثلها لا تخفى عليه، ويبعد وقوعها منه صلى الله عليه وسلم.

والشعر إذا كان خاليا من الفواحش والمنكرات والدعوات الجاهليّة فلا بأس بإنشائه، وحفظه وإنشاده، بل هو محمود ومطلوب لغرس الفضائل في النفوس ومدح النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم والدعوة إلى الإسلام والدفاع عنه، وقد كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يحث الصّحابة على دفاعهم عن الإسلام بأشعارهم، وكان يستنشدهم، ويستمع إليهم.

والكلام على ذلك مبسوط في تفسير سورة الشعراء الآية [224 - 227].




বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি খন্দকের (যুদ্ধের) দিনে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি মাটি বহন করছিলেন, এমনকি মাটি তাঁর বুকের চুল ঢেকে দিয়েছিল—আর তিনি ছিলেন ঘন চুলের অধিকারী পুরুষ। আর তিনি আবদুল্লাহ ইবনু রাওয়াহার কবিতার চরণ আবৃত্তি করছিলেন:

"হে আল্লাহ! তুমি না থাকলে আমরা হেদায়াত পেতাম না, আর না আমরা দান-সদকা করতাম, আর না সালাত আদায় করতাম।
অতএব, আমাদের প্রতি প্রশান্তি অবতীর্ণ করুন, আর শত্রুর মোকাবিলা হলে আমাদের পা সুদৃঢ় করে দিন।
শত্রুরা আমাদের প্রতি বিদ্রোহ করেছে; তারা ফিতনা চাইলে আমরা তা প্রত্যাখ্যান করব।"

তিনি এতে তাঁর আওয়াজ উঁচু করে দিচ্ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12911)


12911 - عن ابن عباس أن العاصي بن وائل أخذ عظما من البطحاء، ففتّه بيده، ثمّ قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم: أيحيي الله تعالى هذا بعد ما أرى؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم، يميتك الله، ثمّ يحييك، ثمّ يدخلك جهنّم". قال: ونزلت الآيات من آخر.

صحيح: رواه ابن أبي حاتم - كما ذكره ابن كثير -، وابن جرير الطبريّ في تفسيره (19/ 487)، والحاكم (2/ 429) كلّهم من طرق عن هُشيم، أخبرنا أبو بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. وإسناده صحيح إِلَّا أن ابن جرير ذكره عن سعيد بن جبير مرسلًا، ولم يذكر ابن عباس، ولكن الحكم لمن وصل. وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشّيخين".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল-'আসী ইবনে ওয়ায়েল (মক্কার) উন্মুক্ত স্থান থেকে একটি হাড় হাতে নিলো, তারপর তা নিজের হাতে গুঁড়ো করে ফেললো। এরপর সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললো: "আল্লাহ তাআলা কি এটি জীবিত করবেন, যেমনটি আমি দেখছি (বা গুঁড়ো হয়ে যেতে দেখলাম)?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, আল্লাহ তোমাকে মৃত্যু দেবেন, এরপর তোমাকে জীবিত করবেন, এরপর তোমাকে জাহান্নামে প্রবেশ করাবেন।" (বর্ণনাকারী) বলেন: এই ঘটনার শেষে (এ সম্পর্কিত) কিছু আয়াত নাযিল হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (12912)


12912 - عن بسر بن جحاش القرشي أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بزق يومًا في كفه، فوضع عليها أصبعه، ثمّ قال:"قال الله: ابن آدم! أنى تعجزني، وقد خلقتك من مثل هذه، حتَّى إذا سويتك وعدّلتك، مشيتَ بين بردين وللأرض منك وئيد، فجمعتَ ومنعتَ، حتَّى إذا بلغت التراقي، قلتَ: أتصدّق، وأنى أوان الصّدقة".

صحيح: رواه ابن ماجة (2707)، وأحمد (17842) واللّفظ له، وصحّحه الحاكم (2/ 502) كلّهم من طرق عن حريز بن عثمان، عن عبد الرحمن بن ميسرة، عن جبير بن نفير، عن بسر بن جحاش القرشي، قال: فذكره.

وإسناه صحيح، وعبد الرحمن بن ميسرة الحضرمي الحمصي وثّقه ابن حبَّان والعجلي، وقال
أبو داود: شيوخ حريز كلّهم ثقات، وصحّحه ابن حجر في الإصابة (644).




বুসর ইবনু জাহহাশ আল-কুরাশী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন তাঁর হাতের তালুতে থুথু ফেললেন, অতঃপর তাতে তাঁর আঙুল রাখলেন এবং বললেন: আল্লাহ তাআলা বলেছেন: হে আদম সন্তান! তুমি কিভাবে আমাকে অপারগ করতে চাও, অথচ আমি তোমাকে এই (থুথুর/মাটির) মতো জিনিস থেকে সৃষ্টি করেছি? অবশেষে যখন আমি তোমাকে সুঠাম ও পরিপাটি করলাম, তুমি তখন দুটি চাদর পরে চলতে লাগলে এবং তোমার জন্য জমিনে ভারি শব্দ হতে থাকল। অতঃপর তুমি (সম্পদ) জমা করলে এবং (সৎপথে ব্যয় করা) থেকে বিরত থাকলে, অবশেষে যখন (প্রাণ) কণ্ঠনালীতে এসে পৌঁছল, তুমি বললে: আমি সাদাকা করব। অথচ এখন সাদাকা করার সময় কোথায়?









আল-জামি` আল-কামিল (12913)


12913 - عن حذيفة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"كان رجل ممن كان قبلكم يسيء الظن بعمله، فقال لأهله: إذا أنا مُت فخذوني، فذرّوني في البحر في يوم صائف، ففعلوا به، فجمعه الله، ثمّ قال: ما حملك على الذي صنعت؟ قال: ما حملني إِلَّا مخافتك فغفر له".

صحيح: رواه البخاريّ في الرّقاق (6480) عن عثمان بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا جرير، عن منصور، عن ربعي، عن حذيفة، فذكره.

قوله: {الَّذِي جَعَلَ لَكُمْ مِنَ الشَّجَرِ الْأَخْضَرِ نَارًا فَإِذَا أَنْتُمْ مِنْهُ تُوقِدُونَ} أي: الذي أخرج لكم من الشجر الأخضر الرطب نارًا محرقة.

ورُوي عن ابن عباس أنه قال: هما شجرتان يقال لأحدهما: المرْخُ، وللأخرى: العَفار، فمن أراد منهم النّار قطع منهما غصنين مثل السواكين وهما خضراوان يقطر منهما الماء، فَيَسحقُ المرخ على العفار، فيخرج منهما النّار بإذن الله عز وجل.

وذكر أن هذا النوع من الشجر كان ينبت في أرض الحجاز، وكان من أراد منهم قدح نار وليس معه زناد، فيأخذ منه عودين أخضرين، ويمدح أحدهما بالآخر، فتتولد النّار من بينهما كالزناد سواء.

ولكن حصول ذلك ليس مقتصرا على أرض الحجاز، فإن معظم الحرائق التي تحدث في الغابات تكون في الغالب من احتكاك الأشجار فيما بينها.

وقوله: {فَسُبْحَانَ الَّذِي بِيَدِهِ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ} هذا كقوله: {قُلْ مَنْ بِيَدِهِ مَلَكُوتُ كُلِّ شَيْءٍ} [المؤمنون: 88]، وقوله: {تَبَارَكَ الَّذِي بِيَدِهِ الْمُلْكُ} [الملك: 1]. فالملكوت والملك في معنى واحد، فهو مثل رحمة ورحموت، وجبر وجبروت ونحوها. وقد كان النبي صلى الله عليه وسلم يقول في ركوعه وسجوده:"سبحان ذي الجبروت والملكوت" كما جاء في الحديث.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতের মধ্যে একজন লোক ছিল, যে তার আমল সম্পর্কে খারাপ ধারণা করত (নিজের কৃতকর্মের বিষয়ে সংশয়ী ছিল)। সে তার পরিবারকে বলল: যখন আমি মারা যাব, তখন তোমরা আমাকে (পুড়িয়ে ছাই করে) নিও এবং গ্রীষ্মকালের একদিন সমুদ্রে ছড়িয়ে দিও। তারা তার সাথে তাই করল। অতঃপর আল্লাহ তাকে একত্রিত করলেন। তারপর আল্লাহ বললেন: তুমি যা করেছ, কিসে তোমাকে তা করতে উদ্বুদ্ধ করল? সে বলল: আপনার ভয় ছাড়া আর কিছুই আমাকে উদ্বুদ্ধ করেনি। ফলে তিনি তাকে ক্ষমা করে দিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (12914)


12914 - عن عوف بن مالك الأشجعي قال: قُمتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلةً، فقام، فقرأ سورة البقرة، لا يمر بآية رحمةٍ إِلَّا وقف، فسأل، ولا يمرّ بآية عذاب إِلَّا وقف، فتعوّذ. قال: ثمّ ركع بقدر قيامه يقول في ركوعه:"سبحان ذي الجبروت والملكوت والكبرياء والعظمة". ثمّ سجد بقدر قيامه، ثمّ قال في سجوده مثل ذلك، ثمّ قام، فقرأ بآل عمران، ثمّ قرأ سورة سورة.

حسن: رواه أبو داود (873)، والنسائي (1132)، والتِّرمذيّ في الشمائل (306) كلّهم من طريق معاوية بن صالح، عن عمرو بن قيس الكندي، يقول: سمعت عاصم بن حميد، يقول: سمعت عوف بن مالك يقول: فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن حميد - وهو السكوني - فإنه صدوق.




আওফ ইবনু মালিক আল-আশজা‘ঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে দাঁড়ালাম (সালাত আদায় করলাম)। তিনি দাঁড়িয়ে সূরা আল-বাক্বারাহ পড়লেন। তিনি যখনই কোনো রহমতের আয়াত অতিক্রম করতেন, তখনই থামতেন এবং আল্লাহর কাছে চাইতেন। আর যখনই কোনো আযাবের আয়াত অতিক্রম করতেন, তখনই থামতেন এবং (আল্লাহর কাছে) আশ্রয় প্রার্থনা করতেন। তিনি বলেন: এরপর তিনি দাঁড়ানোর সময়ের প্রায় সমান সময় ধরে রুকূ করলেন এবং রুকূতে বলছিলেন: "সুবহা-না যিল জাবারূতি ওয়াল মালাকূতি ওয়াল কিবরিয়া-ই ওয়াল 'আযামাহ" (মহাশক্তি, সার্বভৌমত্ব, শ্রেষ্ঠত্ব এবং মহত্ত্বের অধিকারী আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করছি)। এরপর তিনি দাঁড়ানোর সময়ের প্রায় সমান সময় ধরে সাজদাহ করলেন এবং সাজদাতেও অনুরূপ বললেন। এরপর তিনি দাঁড়িয়ে সূরা আল-ইমরান পাঠ করলেন, এরপর (অন্য) প্রতিটি সূরা পাঠ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12915)


12915 - عن جابر بن سمرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ألا تصفّون كما تصفّ الملائكة عند ربها؟" فقلنا: يا رسول الله! وكيف تصفّ الملائكة عند ربها؟ قال:"يتمون الصفوف الأُوَل، ويتراصّون في الصف".

صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (430) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن المسيب بن رافع، عن تميم بن طرفة، عن جابر بن سمرة، قال: فذكره.




জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কি সেইভাবে কাতারবদ্ধ হবে না, যেভাবে ফিরিশতাগণ তাঁদের প্রতিপালকের নিকট কাতারবদ্ধ হন?" আমরা বললাম, 'হে আল্লাহর রাসূল! ফিরিশতাগণ তাঁদের প্রতিপালকের নিকট কীভাবে কাতারবদ্ধ হন?' তিনি বললেন, "তাঁরা প্রথম কাতারগুলো পূর্ণ করেন এবং কাতারের মধ্যে ঘন হয়ে দাঁড়ান।"









আল-জামি` আল-কামিল (12916)


12916 - عن حذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فُضِّلنا على الناس بثلاث: جُعِلت صفوفنا كصفوف الملائكة، وجُعِلت لنا الأرض كلها مسجدا، وجعلت تربتها لنا طهورا إذا لم نجد الماء".

صحيح. رواه مسلم في المساجد (522) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا محمد بن فضيل، عن أبي مالك الأشجعيّ، عن ربعيّ، عن حذيفة، فذكره.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিনটি জিনিস দ্বারা আমাদেরকে অন্যান্য মানুষের উপর বিশেষ মর্যাদা দেওয়া হয়েছে: আমাদের কাতারগুলোকে ফেরেশতাদের কাতারগুলোর মতো বানানো হয়েছে, আমাদের জন্য সমস্ত পৃথিবীকেই সিজদার স্থান (মসজিদ) বানিয়ে দেওয়া হয়েছে এবং যখন আমরা পানি না পাই, তখন এর মাটি আমাদের জন্য পবিত্রতা অর্জনকারী বস্তু বানানো হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (12917)


12917 - عن ابن عباس قال: كان الجن يصعدون إلى السماء يسمعون الوحيّ، فإذا سمعوا الكلمة زادوا فيها تسعا، فأما الكلمة فتكون حقًّا، وأمّا ما زاد فيكون باطلا، فلمّا بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم منعوا مقاعدهم، فذكروا ذلك لإبليس، ولم تكن النجوم يرمى بها قبل ذلك، فقال لهم إبليس: ما هذا إِلَّا من أمر قد حدث في أرض، فبعث جنوده، فوجدوا رسول الله صلى الله عليه وسلم قائمًا يُصَلِّي بين جبلين - أراه قال - بمكة، فأتوه، فأخبروه، فقال: هذا الذي حدث في الأرض.
صحيح: رواه أحمد (1/ 274)، والتِّرمذيّ (3324) واللّفظ له، والنسائي في الكبرى (11562) كلّهم من طرق عن إسرائيل بن يونس بن أبي إسحاق، قال: حَدَّثَنَا أبو إسحاق، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، قال: فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".

وفي هذا المعنى أحاديث أخرى مذكورة في مواضعها.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জিনেরা আসমানের দিকে উঠে যেতো ওহি শোনার জন্য। তারা যখন একটি কথা শুনত, তখন তার সাথে আরও নয়টি (মিথ্যা কথা) যোগ করত। মূল কথাটি সত্য হতো, কিন্তু তারা যা যোগ করত তা মিথ্যা হতো। এরপর যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরিত হলেন, তখন তাদের (আসমানের) আসনগুলো থেকে তাদের বাধা দেওয়া হলো। তারা এ বিষয়টি ইবলিসকে জানাল। এর আগে নক্ষত্র দ্বারা তাদের নিক্ষেপ করা হতো না। তখন ইবলিস তাদের বলল: এটা পৃথিবীতে ঘটে যাওয়া কোনো নতুন ঘটনা ছাড়া আর কিছুই নয়। এরপর সে তার সৈন্যদের পাঠাল। তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মক্কাতে দুটি পাহাড়ের মাঝখানে সালাতে (নামাযে) দণ্ডায়মান অবস্থায় দেখতে পেল – (বর্ণনাকারী বলেন) আমার মনে হয় তিনি মক্কা বলেছিলেন। অতঃপর তারা তাঁর কাছে এলো এবং ইবলিসকে সে বিষয়ে জানাল। তখন ইবলিস বলল: পৃথিবীতে এই ঘটনাই ঘটেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (12918)


12918 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اُمِرتُ أن أقاتل الناس حتَّى يقولوا: لا إله إِلَّا الله، فمن قال: لا إله إِلَّا الله فقد عصم منّي ماله ونفسه إِلَّا بحقه، وحسابه على الله. وأنزل الله في كتابه، وذكر قومًا استكبروا، فقال: {إِنَّهُمْ كَانُوا إِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ يَسْتَكْبِرُونَ}.

حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (10/ 3210) عن أبي عبيد الله بن أخي ابن وهب، حَدَّثَنَا عميّ، حَدَّثَنَا اللّيث، عن ابن مسافر - يعني عبد الرحمن بن خالد -، عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي عبيد الله أحمد بن عبد الرحمن بن وهب المصريّ، ومن أجل عبد الرحمن بن خالد بن مسافر الفهميّ، فإنهما حسنا الحديث.

والحديث أصله في الصحيحين، فقد رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2946)، ومسلم في الإيمان (21) كلاهما من وجه عن ابن شهاب به إلى قوله:"وحسابه على الله" فقط، ولم يذكرا ما بعده.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি যেন মানুষের সাথে যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে। সুতরাং যে ব্যক্তি 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে আমার পক্ষ থেকে তার সম্পদ ও জীবনকে রক্ষা করে নিল, তবে ইসলামের হক (বিধান) ব্যতীত। আর তার হিসাব (বিচারের ভার) আল্লাহর উপর। আর আল্লাহ তাঁর কিতাবে অবতীর্ণ করেছেন এবং এমন এক সম্প্রদায়ের কথা উল্লেখ করেছেন যারা অহংকার করেছিল। অতঃপর তিনি বললেন: {নিশ্চয় তাদেরকে যখন বলা হত, আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই, তখন তারা অহংকার করত।}"









আল-জামি` আল-কামিল (12919)


12919 - عن مجاهد: أنّ الناس كانوا يطوفون بالبيت، وابن عباس جالس، معه مِحجن، فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:" {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ} [آل عمران: 102] ولو أنّ قطرة من الزقّوم قُطِرت لأمرّت على أهل الأرض عيشهم، فكيف من ليس له طعام إِلَّا الزقوم".

صحيح: رواه الترمذيّ (2585)، وابن ماجة (4326)، وأحمد (2735)، وصحّحه ابن حبَّان (7470)، والحاكم (2/ 294) كلّهم من طرق عن شعبة، قال: سمعت سليمان الأعمش، عن مجاهد، قال: فذكره. وإسناده صحيح.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন মানুষ কাবা শরীফ তাওয়াফ করছিলো, আর তিনি তাঁর লাঠি হাতে বসে ছিলেন, তখন তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হে ঈমানদারগণ! তোমরা আল্লাহকে ভয় করো যেমন ভয় করা উচিত, এবং তোমরা মুসলিম না হয়ে মৃত্যুবরণ করো না।” (সূরা আলে ইমরান: ১০২) যদি যাক্কুম (জাহান্নামের গাছ) থেকে একটি মাত্র ফোঁটা পৃথিবীতে পতিত হতো, তবে তা পৃথিবীর মানুষের জীবনকে তিক্ত করে দিত। তাহলে সেই ব্যক্তির অবস্থা কেমন হবে, যার একমাত্র খাদ্য হবে যাক্কুম?









আল-জামি` আল-কামিল (12920)


12920 - عن أبي هريرة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لم يكذب إبراهيم النَّبِيّ عليه السلام قطّ إِلَّا ثلاث كذبات: ثنتين في ذات الله قوله {إِنِّي سَقِيمٌ}، وقوله: {قَالَ بَلْ فَعَلَهُ كَبِيرُهُمْ هَذَا} [الأنبياء: 63]، وواحدة في شأن سارة، فإنه قدم أرض جبار، ومعه سارة، وكانت أحسن الناس، فقال لها: إن هذا الجبار إن يعلم أنك امرأتي يغلبني عليك، فإن سألك فأخبريه أنك أختي، فإنك أختي في الإسلام، فإني لا أعلم في الأرض مسلما غيري وغيرك، فلمّا دخل أرضه رآها بعض أهل الجبار، أتاه، فقال له: لقد قدم أرضك امرأة لا ينبغي لها أن تكون إِلَّا لك. فأرسل إليها، فأتى بها، فقام إبراهيم عليه السلام إلى الصّلاة، فلمّا دخلت عليه لم يتمالك أن بسط يده إليها، فقبضت يده قبضة شديدة، فقال لها: ادعي الله أن يطلق يدي ولا أضرك. ففعلت، فعاد، فقبضت أشد من القبضة الأولى، فقال لها مثل ذلك، ففعلت، فعاد، فقبضت أشد من القبضتين الأوّليين، فقال: ادعي الله أن يطلق يدي، فلك الله أن لا أضرك. ففعلت، وأطلقت يده، ودعا الذي جاء بها، فقال له: إنك إنّما أتيتني بشيطان، ولم تأتني بإنسان، فأخرجها من أرضي وأعطها هاجر. قال: فأقبلت تمشي، فلمّا رآها إبراهيم عليه السلام انصرف، فقال لها: مهيم، قالت: خيرًا كف الله يد الفاجر، وأخدم خادما".

قال أبو هريرة:"فتلك أمكم، يا بني ماء السماء".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3357، 3358)، ومسلم في الفضائل (2371: 154) كلاهما من طرق عن أيوب السختياني، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره، وهذا لفظ مسلم.



إِبْرَاهِيمَ (109) كَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (110) إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُؤْمِنِينَ (111) وَبَشَّرْنَاهُ بِإِسْحَاقَ نَبِيًّا مِنَ الصَّالِحِينَ (112) وَبَارَكْنَا عَلَيْهِ وَعَلَى إِسْحَاقَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِهِمَا مُحْسِنٌ وَظَالِمٌ لِنَفْسِهِ مُبِينٌ (113) وَلَقَدْ مَنَنَّا عَلَى مُوسَى وَهَارُونَ (114)}

قوله: {فَبَشَّرْنَاهُ بِغُلَامٍ حَلِيمٍ} هذا الغلام هو إسماعيل بن إبراهيم عليهما السلام، وقد ذهبت طائفة من أهل العلم إلى أن الذبيح هو إسحاق بن إبراهيم، ولكن الصواب أنه إسماعيل، وليس بإسحاق، وهو الذي يدل عليه النظم القرآني من وجوه كثيرة، وفيما يلي ذكرها:

1 - أن الملائكة لما بشّروا إبراهيم بإسحاق قالوا: {قَالُوا لَا تَوْجَلْ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ} [الحجر: 53]، وإسماعيل وصف بالحلم في الآية الكريمة، وهذا هو الوصف المناسب لهذا المقام.

2 - قال تعالى: {فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ السَّعْيَ} أي: كبَّر هذا الغلام وترعرع وصار يذهب ويمشي مع أبيه، وهذا يدل على أن ذلك الغلام الحليم الذبيح لم يكن كبيرا، وقد اتفق أهل الكتاب والمسلمون أن إسماعيل كان أكبر من إسحاق، وجاء في سفر التكوين ما يدل على ولادة إسماعيل قبل إسحاق بأربع عشرة سنة، فالظاهر أنها لما وقعت قصة الذبح لم يكن إسحاق ولد بعد.

3 - قال تعالى: {إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ} ولا شك أن الأمر بذبح الابن الأكبر الوحيد البكر أبلغ في الابتلاء والاختبار، وعزم إبراهيم على تنفيذه أبلغ في الامتثال والطاعة، وإسماعيل كان هو الأكبر والبكر من أولاد إبراهيم.

4 - قال تعالى: {وَبَشَّرْنَاهُ بِإِسْحَاقَ نَبِيًّا مِنَ الصَّالِحِينَ (112) وَبَارَكْنَا عَلَيْهِ وَعَلَى إِسْحَاقَ} وقال تعالى: {وَامْرَأَتُهُ قَائِمَةٌ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَاهَا بِإِسْحَاقَ وَمِنْ وَرَاءِ إِسْحَاقَ يَعْقُوبَ (71)} [هود: 71]، فالله عز وجل بشر إبراهيم بإسحاق، وذكر أنه يبارك عليهما، وأنه يولد في حياتهما ولد لإسحاق يكون اسمه يعقوب. فليس من المعقول أن يأمر الله بذبح إسحاق وهو صغير؛ لأن الله تعالى كان قد وعد إبراهيم بأن ابنه إسحاق سيكون له ولد ونسل وذرية.

5 - إن إسماعيل عليه السلام سكن في مكة، وشارك أباه في بناء الكعبة، قال تعالى: {وَإِذْ يَرْفَعُ إِبْرَاهِيمُ الْقَوَاعِدَ مِنَ الْبَيْتِ وَإِسْمَاعِيلُ رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا إِنَّكَ أَنْتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ} [البقرة: 127]. وقصة الذبح هذه كانت في منى كما أخبر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في أحاديثه، وأجمع على ذلك أهل الإسلام قاطبة.

وأمّا إسحاق فلم يرد في الكتاب والسنة ما يدل على مجيئه إلى مكة، وكذلك لم يذكر المؤرخون من المسلمين ومن أهل الكمَاب وغيرهم مجيء إسحاق إلى مكة طول حياته ولو مرة واحدة. ولذا من المستبعد جدّا أن يكون الذبيح إسحاق، بل هو إسماعيل قطعا بلا ريب للوجوه المذكورة، وقد بسطت هذه المسألة في مقالة مستقلة في كتابي:"دراسات في اليهود والمسيحية" ولا مانع من إيرادها هنا لأهميتها.

الذبيح هو إسماعيل: إن اليهود كعادتهم حرفوا حادثة الذبح ووضعوا اسم إسحاق عليه السّلام
في مكان الذبيح مع أن القرائن تدل على أنه إسماعيل.

وإليكم ما جاء في الإصحاح الثاني والعشرين من سفر التكوين:"وحدث بعد هذه الأمور أن الله امتحن إبراهيم، فقال له: يا إبراهيم، فقال: هأنذا، فقال: خذ ابنك وحيدك الذي تحبه إسحاق، واذهب إلى أرض المريا، وأسعده، هناك محرقة على أحد الجبال الذي أقول لك، فبكر إبراهيم صباحا، وشد على حماره، وأخذ اثنين من غلمانه معه، وإسحاق ابنه وشقق حطبا لمحرقة، وقام، وذهب إلى الموضع الذي قال الله له، وفي اليوم الثالث رفع إبراهيم عينيه، وأبصر الموضع من بعيد، فقال إبراهيم لغلاميه: اجلسا أنتما ههنا مع الحمار، وأمّا أنا والغلام فنذهب إلى هناك، ونسجد ثمّ نرجع إليكما، فأخذ إبراهيم حطب المحرقة، ووضعه على إسحاق ابنه، وأخذ بيده النّار والسكين، فذهبا كلاهما معا، وكلّم إسحاق إبراهيم أباه، وقال: يا أبي! فقال: هأنذا يا بني، فقال: هو ذا النّار والحطب، ولكن أين الخروف للمحرقة؟ فقال إبراهيم: الله يرى له الخروف للمحرقة يا بني! فذهبا كلاهما معا، فلمّا أتيا إلى الموضع الذي قال له الله بنى إبراهيم هنا المذبح، ورتب الحطب وربط إسحاق ابنه، ووضعه على المذبح فوق الحطب، ثمّ مدّ إبراهيم يده، وأخذ السكين ليذبح ابنه، فناداه ملاك الرب من السماء، وقال: إبراهيم! إبراهيم! فقال: هأنذا، فقال: لا تمد يدك إلى الغلام ولا تفعل به شيئًا، لأني الآن علمت أنك خائف الله، فلم تمسك ابنك وحيدك عني، فرفع إبراهيم عينيه، ونظر وإذا كبش وراءه ممسكا في الغابة بقرنيه، فذهب إبراهيم وأخذ الكبش وأصعقه محرقة عوضا عن ابنه، فدعا إبراهيم اسم ذلك الموضع"يهوه يراه" حتَّى أنه يقال اليوم في جبل الرب"يرى" ثمّ ذهب إبراهيم إلى بئر سبع وسكن فيه".

هذه هي قصة الذبح في التوراة المزعومة، وتستخرج من هذه القصة الأمور التالية:

1 - إن الله أمره أن يذبح ابنه الوحيد.

2 - إن هذا الابن كان محبوبا لإبراهيم.

3 - إن إبراهيم كان سكن بئر سبع قبل الذبح، وبعد الذبح.

4 - يبعد المذبح"مريا" من بئر سبع مسافة ثلاثة أيام.

وفي ضوء هذه النقاط إذا نظرنا إلى آل إبراهيم اتضح لنا بوضوح أن الابن الوحيد لإبراهيم هو"إسماعيل"، لأنه ولد قبل أخيه بأربعة عشر عاما كما جاء في التكوين:"فولدت هاجر لإبراهيم ابنا، ودعا إبرام اسم ابنه الذي ولدته هاجر إسماعيل، وكان إبرام ابن ست وثمانين سنة لما ولدت هاجر إسماعيل لإبرام، (16/ 15)،"وكان إبرام ابن مائة سنة حين ولد له إسحاق ابنه". (21/ 4).

فيفهم من هذا أن قصة الذبح كانت قبل ولادة إسحاق؛ لأن ابنه الوحيد البكر هو إسماعيل عليه السلام. وأن التوراة تنص على أن البكر هو الذي يقدم للذبائح سواء كان من الإنسان أو الحيوان، وهي شريعة مستمرة من آدم إلى موسى عليهما السلام، ففي سفر التكوين (4/ 4):"وقدم هابيل
أيضًا من أبكار غنمه ومن سمانها فنظر الرب إلى هابيل وقربانه".

هذا بموجب شريعة آدم وأولاده، وبقي هذا الحكم مستمرا إلى موسى عليه السلام، فإن البكر هو الذي يخصص لله، ويقدس كما جاء في سفر الخروج (13/ 1 - 2):"وحكم الرب موسى قائلًا: قدس لي كل بكر، وكل فاتح رحم، من بني إسرائيل من الناس ومن البهائم، إنه لي".

ولا شك أن نبي الله إسماعيل بكر أبيه هو الذي استحق هذا الشرف ليكون في خدمة الله.

الأمر الثاني: قوله: ابنك الوحيد الذي تحبه.

وهذا واضح وضوح الشّمس فإن حبّ إبراهيم لإسماعيل لا يحتاج إلى إقامة دليل، لأنه ولد بعد ما بلغ من العمر ستا وثمانين سنة، وكان من نتيجة دعائه، ولذا سماه"إسماعيل" من استجابة الله دعاءه - أو"سمع الله".

ولذلك لما بشّر بالابن الثاني وهو إسحاق عليه السلام لم يزد على قوله:"لله ليت إسماعيل يعيش أمامك". سفر التكوين (17/ 18).

ولما طلبت سارة من إبراهيم أن يفارق ابنه إسماعيل وأمه حزن إبراهيم من هذا الطلب:"ورأت سارة ابن هاجر المصرية الذي ولدته لإبراهيم نمزح. فقالت لإبراهيم: اطرد هذه الجارية وابنها؛ لأن ابن هذه الجارية لا يرث مع ابني إسحاق، فقبح الكلام جدًّا في عيني إبراهيم لسب ابنه. فقال الله لإبراهيم: لا تقبح في عينيك من أجل الغلام، ومن أجل جاريتك في كل ما تقول لك سارة اسمع قولها؛ لأنه لاسحاق يدعى لك نسل. وابن الجارية أيضًا سأجعله أمة؛ لأنه نسلك". سفر التكوين (21/ 9 - 13).

كأن الله هدّأ فؤاد إبراهيم بقوله: إنه سيجعل منه أمة وقد كان محزونا من طلب سارة مفارقة ابنه، وهو دليل على حبه له.

الأمر الثالث: إن إبراهيم كان يسكن بئر سبع عند ما أمر بذبح ابنه، ومنه أخذ ابنه، وذهب إلى"مريا".

تنص التوراة على أن إبراهيم أخذ هاجر وابنها إسماعيل، وتركهما في بئر سبع (التكوين: 21/ 14) وسكن إسماعيل مع أمه في برية فاران (التكوين: 21/ 21). إن صحَّ ما تقول التوراة فإن إبراهيم أخذ ابنه إسماعيل من بئر سبع، وذهب إلى"مريا".

ويبدو أن محرري التوراة لم يلاحظوا هذه الأمور، فاستعجلوا في إقحام اسم إسحاق عليه السلام في حادثة الذبح.

الأمر الرابع: ذهابه إلى"مريا" إذا نظرنا إلى موضع"مريا" واشتقاقه فهو في أصله"مروة" وأن التوراة تنص على أوصاف هذا الجبل بأنه بلوطة مورة (التكوين: 12/ 6). وفي النسخة العبرانية:"برية مورة" ولا شك أن المترجمين غيرو هذا الفظ من أصله"مروة" إلى"مرية"
و"مريا" و"موريا" و"مورة" و"مورءياه" إلى غير ذلك.

والأمر الذي لا خلاف فيه بين اليهود والنصارى أن الذبح كان جنب المعبد.

وهذه الأمور كلها تدل على أن ذلك كان في جوار بيت الله الحرام الذي يسمى الآن"مروة" والقرآن يقطع هذا النزاع بقوله: {رَبِّ هَبْ لِي مِنَ الصَّالِحِينَ (100) فَبَشَّرْنَاهُ بِغُلَامٍ حَلِيمٍ (101) فَلَمَّا بَلَغَ مَعَهُ السَّعْيَ قَالَ يَابُنَيَّ إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ فَانْظُرْ مَاذَا تَرَى قَالَ يَاأَبَتِ افْعَلْ مَا تُؤْمَرُ سَتَجِدُنِي إِنْ شَاءَ اللَّهُ مِنَ الصَّابِرِينَ (102) فَلَمَّا أَسْلَمَا وَتَلَّهُ لِلْجَبِينِ (103) وَنَادَيْنَاهُ أَنْ يَاإِبْرَاهِيمُ (104) قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا إِنَّا كَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (105) إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ (106) وَفَدَيْنَاهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ (107) وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآخِرِينَ (108) سَلَامٌ عَلَى إِبْرَاهِيمَ (109) كَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (110) إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُؤْمِنِينَ (111) وَبَشَّرْنَاهُ بِإِسْحَاقَ نَبِيًّا مِنَ الصَّالِحِينَ (112) وَبَارَكْنَا عَلَيْهِ وَعَلَى إِسْحَاقَ وَمِنْ ذُرِّيَّتِهِمَا مُحْسِنٌ وَظَالِمٌ لِنَفْسِهِ مُبِينٌ (113)}.

لأن البشارة الأولى كانت لإسماعيل كما أن البشارة الثانية هي لإسحاق. والموضع الذي حدثت فيه قصة الذبح كان بجوار بيت الله الحرام الذي يسمى"واديا غير ذي زرعا. وتتعارض نصوص التوراة بأن يكون إسحاق عليه السلام هو الذبيح، وذلك أن الله بشر إبراهيم بإسحاق، وذكر عقبه أن يباركه كما جاء في سفر التكوين (19/ 17):"ولكن عهدي أقيمه مع إسحاق الذي تلده لك سارة في هذا الوقت في السنة الآتية".

فهل من الممكن أن يخبر الله تعالى بأنه يقيم عهده مع إسحاق وهو لم يولد بعد، ثمّ يأمره بذبحه بعد ولادته، أو ليس فيه تناقض ظاهر؟ وأين يكون امتحان إبراهيم وقد علم سابقا أن إسحاق يكون أبا أمة عظيمة. بينما لم يعلم هذا عن إسماعيل إِلَّا بعد ولادة إسحاق - أي بعد حادثة الذبح.

ولا يقال: قد يكون إسماعيل توفي في حياة إبراهيم، فلم يبق من ولده الذي وصف بأنه"الوحيد" إِلَّا إسحاق، لأن إبراهيم مات عن إسماعيل وإسحاق، واشتركا في دفن أبيهما كما جاء في سفر التكوين (25/ 7 - 9):"عاش إبراهيم مائة سنة وخمسة وسبعين سنة، وأسلم روحه، ومات بشيبة صالحة، وشيخا وشبعان أياما، وانضم إلى قومه ودفنه إسحاق وإسماعيل في مغارة المكفيلة".

وأرى هذه القدر يكفي للتحقيق في الموضوع، والله الهادي إلى سواء السبيل.

وقوله: {قَالَ يَابُنَيَّ إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ} وفيه دليل على أن رؤيا الأنبياء وحي، ولذا جاء العمل بها، بخلاف غيرهم من الناس فإنه لا يجوز الإقدام على شيء بمجرد الرؤيا.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নবী ইবরাহীম (আলাইহিস সালাম) কখনো মিথ্যা বলেননি, তবে তিনটি [ক্ষেত্রে এমনটি ঘটেছিল, যদিও এগুলো উদ্দেশ্যগতভাবে আল্লাহর পক্ষ থেকে ছিল]: দু'টি ছিল আল্লাহর জন্য [আল্লাহর পথে]: তাঁর উক্তি {নিশ্চয়ই আমি পীড়িত/অসুস্থ} (ইন্নি সাকীম), এবং তাঁর উক্তি {তিনি বললেন, বরং এদের মধ্যে যে বড় সে-ই এটি করেছে} [সূরা আম্বিয়া: ৬৩]। আর একটি ছিল সারাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাপারে। তিনি এক অত্যাচারী শাসকের দেশে আগমন করেন, তার সাথে ছিলেন সারাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। সারাহ ছিলেন মানুষদের মধ্যে সবচেয়ে রূপসী। তিনি সারাহকে বললেন: যদি এই অত্যাচারী শাসক জানতে পারে যে তুমি আমার স্ত্রী, তাহলে সে আমার উপর তোমাকে জোর করে কেড়ে নিবে। তাই সে যদি তোমাকে জিজ্ঞাসা করে, তবে তুমি তাকে জানাবে যে তুমি আমার বোন। কেননা, তুমি ইসলামের দৃষ্টিতে আমার বোন। আমি পৃথিবীতে আমি আর তুমি ছাড়া অন্য কোনো মুসলিম আছে বলে জানি না। যখন তিনি সেই শাসকের এলাকায় প্রবেশ করলেন, তখন শাসকের কিছু লোক তাঁকে দেখতে পেল। তারা শাসকের কাছে এসে বলল: আপনার এলাকায় এমন একজন মহিলা এসেছেন, যিনি শুধু আপনার জন্যই যোগ্য। তখন সে সারাহর কাছে লোক পাঠাল এবং তাঁকে আনা হলো। ইবরাহীম (আলাইহিস সালাম) সালাতের জন্য দাঁড়িয়ে গেলেন। যখন সারাহ শাসকের কাছে প্রবেশ করলেন, তখন সে নিজেকে সামলাতে পারল না এবং সারাহর দিকে হাত বাড়াল। তখন সারাহর প্রার্থনায় তার হাত কঠিনভাবে আটকে গেল। তখন সে সারাহকে বলল: তুমি আল্লাহর কাছে দু’আ করো যেন তিনি আমার হাত মুক্ত করে দেন, আমি আর তোমার কোনো ক্ষতি করব না। সারাহ তা করলেন। সে আবার চেষ্টা করল, এবার প্রথমবারের চেয়েও শক্তভাবে তার হাত আটকে গেল। সে সারাহকে আগের মতোই বলল। সারাহ তা করলেন। সে তৃতীয়বার চেষ্টা করল, এবার প্রথম দু’বারের চেয়েও কঠিনভাবে তার হাত আটকে গেল। সে বলল: আল্লাহর কাছে দু’আ করো যেন তিনি আমার হাত মুক্ত করে দেন। আমি আল্লাহর কসম করে বলছি, আমি তোমার আর কোনো ক্ষতি করব না। সারাহ দু’আ করলেন এবং তার হাত মুক্ত হলো। সে তখন সেই লোকটিকে ডাকল, যে সারাহকে এনেছিল। সে তাকে বলল: তুমি আমার কাছে মানুষ আনোনি, এনেছ এক শয়তান! আমার দেশ থেকে তাকে বের করে দাও এবং হাজেরাকে তাকে উপহার দাও। রাবী বলেন: এরপর সারাহ হেঁটে ফিরছিলেন। ইবরাহীম (আলাইহিস সালাম) যখন তাঁকে আসতে দেখলেন, তখন জিজ্ঞাসা করলেন: 'কেমন খবর?' সারাহ বললেন: 'খায়ের (ভালো), আল্লাহ ফাসিকের (পাপীর) হাত প্রতিহত করেছেন এবং তিনি আমাকে একজন দাসীও উপহার দিয়েছেন।'"

আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "ওহে আসমানী পানির সন্তানগণ! ইনিই হলেন তোমাদের মা।"

এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী এটি বর্ণনা করেছেন আম্বিয়াদের হাদীসসমূহে (৩৩৫৭, ৩৩৫৮), এবং মুসলিম এটি বর্ণনা করেছেন ফাযাইল অধ্যায়ে (২৩৭১: ১৫৪)। উভয়ই আইয়ুব আস-সাখতিয়ানী, তিনি মুহাম্মাদ ইবনে সীরীন, তিনি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বিভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এটি মুসলিমের শব্দ।

***

{অতঃপর আমরা তাকে এক সহনশীল পুত্রের সুসংবাদ দিলাম} [সূরা সাফফাত: ১০১]। এই বালক হলেন ইসমাঈল ইবনে ইবরাহীম (আলাইহিমাস সালাম)। যদিও একদল আলেমের অভিমত এই যে, কুরবানিযোগ্য (যবিহ) পুত্র হলেন ইসহাক ইবনে ইবরাহীম, কিন্তু সঠিক অভিমত হলো, তিনি ইসমাঈল, ইসহাক নন। বহু দিক থেকে কুরআনের বর্ণনাভঙ্গি দ্বারা এটাই প্রমাণিত। নিচে সেগুলোর উল্লেখ করা হলো:

১. যখন ফেরেশতারা ইবরাহীমকে ইসহাকের সুসংবাদ দেন, তখন তারা বলেন: {তারা বলল, ভয় করো না, আমরা তোমাকে একজন জ্ঞানী ছেলের সুসংবাদ দিচ্ছি} [সূরা হিজর: ৫৩]। পক্ষান্তরে ইসমাঈলকে এই আয়াতে 'হালিম' (ধৈর্যশীল) গুণে ভূষিত করা হয়েছে, যা এই প্রসঙ্গের জন্য উপযুক্ত।

২. আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {অতঃপর যখন সে তার সাথে চলাফেরা করার বয়সে পৌঁছালো} অর্থাৎ, যখন এই বালকটি বড় হলো এবং পিতার সাথে হাঁটাচলা করতে শুরু করলো। এটি প্রমাণ করে যে সেই ধৈর্যশীল কুরবানিযোগ্য ছেলেটি বয়স্ক ছিল না। মুসলিম ও আহলে কিতাবগণ একমত যে ইসমাঈল ইসহাকের চেয়ে বড় ছিলেন, এবং তাওরাতের আদিপুস্তকে উল্লেখ আছে যে ইসমাঈল ইসহাকের ১৪ বছর আগে জন্মগ্রহণ করেছিলেন। সুতরাং, দৃশ্যত, যখন কোরবানির ঘটনা ঘটে, তখনো ইসহাকের জন্ম হয়নি।

৩. আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {নিশ্চয়ই এটি ছিল স্পষ্ট পরীক্ষা}। এতে কোনো সন্দেহ নেই যে প্রথম, একমাত্র ও জ্যেষ্ঠ সন্তানকে কোরবানির আদেশ ছিল সবচেয়ে বড় পরীক্ষা। ইবরাহীম (আঃ)-এর এই নির্দেশ বাস্তবায়নের সংকল্প ছিল আনুগত্যের সর্বোচ্চ প্রমাণ। আর ইসমাঈল ছিলেন ইবরাহীম (আঃ)-এর সন্তানদের মধ্যে জ্যেষ্ঠ ও প্রথমজাত।

৪. আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {আর আমরা তাকে সুসংবাদ দিলাম ইসহাকের, তিনি হবেন সৎকর্মশীলদের মধ্য থেকে একজন নবী} [১১২]। আল্লাহ ইবরাহীমকে ইসহাক (আঃ)-এর সুসংবাদ দেন এবং উল্লেখ করেন যে তিনি তাদের উপর বরকত দেবেন, এবং ইসহাকের জীবদ্দশাতেই তাঁর এক পুত্র জন্ম নেবে যার নাম হবে ইয়াকুব। তাই এটা যুক্তিযুক্ত নয় যে আল্লাহ ইসহাককে শিশু অবস্থায় জবেহ করার আদেশ দেবেন; কারণ আল্লাহ তাআলা আগেই প্রতিশ্রুতি দিয়েছিলেন যে তাঁর পুত্র ইসহাকের বংশধর ও প্রজন্ম থাকবে।

৫. ইসমাঈল (আঃ) মক্কায় বসবাস করতেন এবং তাঁর পিতাকে কাবা নির্মাণে সহায়তা করেছিলেন। আল্লাহ তাআলা বলেন: {আর যখন ইবরাহীম ও ইসমাঈল বাইতুল্লাহর ভিত্তি স্থাপন করছিল...} [সূরা বাকারা: ১২৭]। কোরবানির এই ঘটনা মিনার ছিল, যেমনটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাদীসে জানিয়েছেন এবং ইসলাম ধর্মাবলম্বীরা এ বিষয়ে সর্বসম্মতি পোষণ করে।
পক্ষান্তরে, ইসহাকের মক্কায় আগমনের কোনো প্রমাণ কুরআন বা সুন্নাহতে নেই। ঐতিহাসিকরা, মুসলিম বা আহলে কিতাব কেউই ইসহাকের মক্কায় আগমনের কথা একবারও উল্লেখ করেননি। এ কারণে ইসহাক কুরবানিযোগ্য ছিলেন—এমন সম্ভাবনা খুবই দূরবর্তী; বরং উল্লিখিত কারণসমূহের ভিত্তিতে তিনি নিঃসন্দেহে ইসমাঈল (আঃ) ছিলেন।

যবিহ (কুরবানিযোগ্য) পুত্র হলেন ইসমাঈল: ইহুদীরা তাদের স্বভাব অনুযায়ী কোরবানির ঘটনাকে বিকৃত করেছে এবং ইসহাক (আঃ)-এর নাম যবিহ-এর স্থানে যুক্ত করেছে, যদিও সমস্ত প্রমাণ ইসমাঈলের দিকে নির্দেশ করে।

তাওরাতের আদিপুস্তক, বাইশতম অধ্যায়ে যা এসেছে: "এইসব ঘটনার পর আল্লাহ ইবরাহীমকে পরীক্ষা করলেন, এবং বললেন: হে ইবরাহীম! সে বলল: এই তো আমি। তিনি বললেন: তোমার পুত্রকে নাও, তোমার একমাত্র পুত্রকে, যাকে তুমি ভালোবাসো, ইসহাককে, এবং মোরিয়া দেশে যাও এবং তাকে সেখানে একটি পর্বতের উপরে হোমবলিরূপে উৎসর্গ করো, যা আমি তোমাকে বলব।"

এই গল্প থেকে নিম্নলিখিত বিষয়গুলো জানা যায়:
১. আল্লাহ তাকে তাঁর একমাত্র পুত্রকে জবেহ করার আদেশ দিলেন।
২. এই পুত্রটি ইবরাহীমের কাছে প্রিয় ছিল।
৩. ইবরাহীম জবেহ করার আগে এবং পরেও বীরে সেবাতে (Beer-Sheba) বসবাস করতেন।
৪. জবেহ-এর স্থান ‘মরিয়া’ বীরে সেবা থেকে তিন দিনের দূরত্বে ছিল।

এই বিষয়গুলোর আলোকে ইবরাহীম (আঃ)-এর পরিবারের দিকে তাকালে পরিষ্কার হয় যে ইবরাহীমের একমাত্র পুত্র ছিলেন ইসমাঈল। কারণ তিনি তাঁর ছোট ভাই ইসহাকের ১৪ বছর আগে জন্মগ্রহণ করেছিলেন, যেমন আদিপুস্তকে এসেছে...
এ থেকে বোঝা যায় যে কোরবানির ঘটনা ইসহাকের জন্মের আগেই ঘটেছিল; কারণ তাঁর একমাত্র প্রথমজাত পুত্র ছিলেন ইসমাঈল (আঃ)। তাওরাতও জোর দিয়ে বলে যে প্রথমজাত সন্তানকেই কুরবানির জন্য পেশ করতে হবে, সে মানুষ হোক বা পশু, যা আদম (আঃ) থেকে মূসা (আঃ) পর্যন্ত চলমান শরিয়ত ছিল।
দ্বিতীয়ত: তাঁর উক্তি: "তোমার একমাত্র পুত্রকে, যাকে তুমি ভালোবাসো।" ইবরাহীমের কাছে ইসমাঈলের ভালোবাসা সূর্যের মতো স্পষ্ট। কারণ তিনি ছিয়াশি বছর বয়সে তাঁর প্রার্থনার ফলস্বরূপ জন্মগ্রহণ করেছিলেন, তাই তাঁর নাম রাখা হয়েছিল ‘ইসমাঈল’ (আল্লাহ শুনেছেন)।

তৃতীয়ত: ইসমাঈলকে কোরবানি করার আদেশ যখন আসে, তখন ইবরাহীম (আঃ) বীরে সেবাতে বসবাস করতেন। সেখান থেকেই তিনি তাঁর পুত্রকে নিয়ে ‘মরিয়া’তে গিয়েছিলেন। তাওরাত অনুসারে, ইবরাহীম হাজেরা এবং তাঁর পুত্র ইসমাঈলকে বীরে সেবাতে ছেড়ে এসেছিলেন এবং ইসমাঈল তাঁর মায়ের সাথে পারান মরুভূমিতে বাস করতেন। যদি তাওরাতের এই বর্ণনা সঠিক হয়, তবে ইবরাহীম তাঁর পুত্র ইসমাঈলকে বীরে সেবা থেকে নিয়ে মরিয়াতে গিয়েছিলেন। মনে হয় তাওরাতের সম্পাদকরা এই বিষয়গুলো লক্ষ্য করেননি এবং তাড়াহুড়ো করে ইসহাক (আঃ)-এর নাম কোরবানির ঘটনায় ঢুকিয়ে দিয়েছেন।

চতুর্থত: তাঁর ‘মরিয়া’তে যাওয়া: যদি আমরা 'মরিয়া' স্থানটির নাম এবং তার ব্যুৎপত্তির দিকে তাকাই, তবে এটি আসলে 'মারওয়া' (Marwah)। তাওরাত এই পাহাড়ের যে বর্ণনা দেয়, তা হলো 'মোরেরের দেবদারু' (بلوطة مورة)। ইব্রীয় সংস্করণ অনুযায়ী: 'মোরের মরুভূমি' (برية مورة)। এতে কোনো সন্দেহ নেই যে অনুবাদকরা এই শব্দটিকে এর মূল 'মারওয়া' থেকে পরিবর্তন করে 'মরিয়া', 'মোরিয়া', 'মোরা' এবং 'মোরিয়া' বানিয়েছে।
ইহুদি ও খ্রিস্টানদের মধ্যে এই বিষয়ে কোনো বিতর্ক নেই যে কোরবানি উপাসনার স্থানের পাশে হয়েছিল। এই সব বিষয়ই প্রমাণ করে যে ঘটনাটি বাইতুল্লাহিল হারামের কাছাকাছি ঘটেছিল, যাকে এখন 'মারওয়া' বলা হয়।

কুরআন এই বিতর্কটি মিটিয়ে দেয় যখন বলে: {হে আমার রব! আমাকে সৎকর্মশীলদের মধ্য থেকে এক সন্তান দান করুন। (১০০) অতঃপর আমরা তাকে এক সহনশীল পুত্রের সুসংবাদ দিলাম। (১০১) এরপর যখন সে তার সাথে চলাফেরা করার বয়সে পৌঁছালো, তখন সে বলল: হে আমার প্রিয় বৎস! আমি স্বপ্নে দেখেছি যে, আমি তোমাকে যবেহ করছি; এবার তুমি চিন্তা করে দেখো তোমার কী অভিমত। সে বলল: হে আমার আব্বা! আপনাকে যা আদেশ করা হয়েছে, আপনি তা-ই করুন। আল্লাহ চাহে তো আপনি আমাকে ধৈর্যশীলদের মধ্যে পাবেন। (১০২) অতঃপর যখন তারা উভয়ে আনুগত্য প্রকাশ করল এবং সে তাকে কাত করে শুইয়ে দিল। (১০৩) তখন আমরা তাকে ডাক দিলাম: হে ইবরাহীম! (১০৪) তুমি তো স্বপ্নকে সত্যে পরিণত করেছ। এভাবেই আমরা নেককারদের পুরস্কৃত করি। (১০৫) নিশ্চয়ই এটি ছিল স্পষ্ট পরীক্ষা। (১০৬) আর আমরা এক মহা কুরবানির বিনিময়ে তাকে মুক্ত করলাম। (১০৭) আর আমরা তার জন্য পরবর্তীদের মধ্যে এই ব্যবস্থা রাখলাম: (১০৮) ইবরাহীমের উপর শান্তি বর্ষিত হোক। (১০৯) এভাবেই আমরা নেককারদের পুরস্কৃত করি। (১১০) নিশ্চয়ই সে ছিল আমাদের মুমিন বান্দাদের অন্তর্ভুক্ত। (১১১) আর আমরা তাকে সুসংবাদ দিলাম ইসহাকের, তিনি হবেন সৎকর্মশীলদের মধ্য থেকে একজন নবী। (১১২) আর আমরা তাকে এবং ইসহাকের উপর বরকত দিলাম। আর তাদের বংশধরদের মধ্যে কতক হবে নেককার আর কতক হবে নিজেদের প্রতি স্পষ্ট যুলমকারী। (১১৩)}

কারণ প্রথম সুসংবাদটি ছিল ইসমাঈলের জন্য, যেমন দ্বিতীয় সুসংবাদটি ইসহাকের জন্য। আর কোরবানির ঘটনা যেখানে ঘটেছিল, তা ছিল বাইতুল্লাহিল হারামের পাশে, যাকে 'غير ذي زرع' (ফসলের অনুপযোগী উপত্যকা) বলা হয়।

তাওরাতের বক্তব্যও ইসহাক (আঃ) যবিহ হওয়ার ধারণার সাথে সাংঘর্ষিক। কারণ আল্লাহ ইবরাহীমকে ইসহাকের সুসংবাদ দেন এবং এর পরপরই উল্লেখ করেন যে তিনি তাকে বরকত দেবেন, যেমন আদিপুস্তক (১৭/১৯) এ এসেছে: "কিন্তু আমার মৈত্রী আমি ইসহাকের সাথে স্থাপন করব, যাকে সারাহ তোমার জন্য আগামী বছর এই নির্দিষ্ট সময়ে জন্ম দেবে।"

যে ইসহাক তখনও জন্ম নেননি, আল্লাহ কি তাঁর সাথে মৈত্রী স্থাপনের ঘোষণা দিয়ে তারপর তাকে জন্মাবার পরে যবেহ করার আদেশ দিতে পারেন? এতে কি স্পষ্ট বৈপরীত্য নেই? ইবরাহীমের পরীক্ষা কোথায় রইল, যখন তিনি আগেই জানতেন যে ইসহাক এক মহান জাতির পিতা হবেন? অথচ ইসমাঈলের ক্ষেত্রে তিনি ইসহাকের জন্মের পরেই (অর্থাৎ কোরবানির ঘটনার পরে) এটি জানতে পারেন।

আর এটা বলাও যুক্তিসঙ্গত নয় যে ইসমাঈল ইবরাহীমের জীবদ্দশায় মারা গিয়েছিলেন, তাই একমাত্র 'একক পুত্র' বলতে ইসহাককে বোঝানো হয়েছে। কারণ ইবরাহীম (আঃ) ইসমাঈল ও ইসহাক উভয়কেই রেখে মারা যান এবং তাঁর দুই পুত্রই তাঁকে দাফন করেন, যেমন আদিপুস্তক (২৫/৭-৯)-এ এসেছে: "ইবরাহীম একশত পঁচাত্তর বছর বেঁচেছিলেন... এবং তাঁর পুত্র ইসহাক ও ইসমাঈল তাকে মাকফেলার গুহায় দাফন করলেন।"

আমার মতে, এই বিষয়ে অনুসন্ধানের জন্য এই পরিমাণ তথ্যই যথেষ্ট। আল্লাহই সরল পথের দিশারী।

তাঁর উক্তি: {হে আমার প্রিয় বৎস! আমি স্বপ্নে দেখেছি যে, আমি তোমাকে যবেহ করছি}- এতে প্রমাণ মেলে যে নবীদের স্বপ্নও ওহী, তাই তা অনুযায়ী আমল করা ওয়াজিব। সাধারণ মানুষের স্বপ্নের ক্ষেত্রে এই বিধান প্রযোজ্য নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (12921)


12921 - عن ابن عباس قال: بِتُّ عند خالتي ميمونة ليلةً، فقام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من الليل، فلمّا كان في بعض الليل قام النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فتوضأ من شنٍّ معلّق وضوءا خفيفا، - يخففه عمرو ويقلّله -، وقام يصلي، فتوضأت نحوا مما توضأ، ثمّ جئت، فقمت عن يساره - وربما قال سفيان: عن شماله -، فحولّني، فجعلني عن يمينه، ثمّ صلّى ما شاء الله،
ثمّ اضطجع، فنام حتَّى نفخ، ثمّ أتاه المنادي، فآذنه بالصلاة، فقام معه إلى الصّلاة، فصلّى، ولم يتوضأ. قلنا لعمرو: إن ناسا يقولون: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم تنام عينه ولا ينام قلبه، قال عمرو: سمعت عبيد بن عمير يقول: رؤيا الأنبياء وحي، ثمّ قرأ: {إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ}.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الوضوء (138)، ومسلم في صلاة المسافرين (763: 186) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، قال: أخبرني كريب مولى ابن عباس، عن ابن عباس فذكره، واللّفظ للبخاريّ.

وقوله تعالى: {فَلَمَّا أَسْلَمَا وَتَلَّهُ لِلْجَبِينِ (103) وَنَادَيْنَاهُ أَنْ يَاإِبْرَاهِيمُ (104) قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا إِنَّا كَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (105) إِنَّ هَذَا لَهُوَ الْبَلَاءُ الْمُبِينُ (106) وَفَدَيْنَاهُ بِذِبْحٍ عَظِيمٍ (107)}.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে আমার খালা মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে রাত কাটালাম। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতের বেলা ঘুম থেকে উঠলেন। রাতের কিছু অংশ যখন গেল, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়ালেন এবং একটি ঝুলন্ত মশকের পানি দিয়ে হালকাভাবে ওযু করলেন—(বর্ণনাকারী আমর একে হালকা ও অল্প পানি দিয়ে সম্পন্ন হওয়া বুঝিয়েছেন)—এবং সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। অতঃপর আমিও তাঁর ওযুর মতোই ওযু করলাম। তারপর আমি এসে তাঁর বাম পাশে দাঁড়ালাম (বর্ণনাকারী সুফিয়ান কখনও কখনও ‘বাম পাশে’ শব্দ ব্যবহার করতেন)। তখন তিনি আমাকে ঘুরিয়ে তাঁর ডান পাশে দাঁড় করালেন। এরপর তিনি আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি শুয়ে পড়লেন এবং এমনভাবে ঘুমালেন যে তাঁর নাক ডাকার শব্দ শোনা গেল। এরপর মুয়াজ্জিন এসে তাঁকে সালাতের সময় হওয়ার খবর দিলেন। তখন তিনি তার সাথে সালাতের জন্য গেলেন এবং সালাত আদায় করলেন, কিন্তু নতুন করে ওযু করলেন না। আমরা (বর্ণনাকারী) আমরকে বললাম: কিছু লোক বলে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের চোখ ঘুমায় কিন্তু তাঁর কলব ঘুমায় না। আমর বললেন: আমি উবাইদ ইবনে উমায়েরকে বলতে শুনেছি, নবীদের স্বপ্ন ওহী। এরপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "আমি স্বপ্নে দেখেছি যে, আমি তোমাকে যবেহ করছি।" [সূরা সাফফাত: ১০২]









আল-জামি` আল-কামিল (12922)


12922 - عن أبي الطفيل قال: قلت لابن عباس: يزعم قومك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سعى بين الصفا والمروة، وأن ذلك سنة؟ قال: صدقوا، إن إبراهيم لما أمر بالمناسك، عرض له الشّيطان عند المسعى، فسابقه، فسبقه إبراهيم، ثمّ ذهب به جبريل إلى جمرة العقبة، فعرض له شيطان، - قال يونس: الشّيطان - فرماه بسبع حصيات، حتَّى ذهب، ثمّ عرض له عند الجمرة الوسطى، فرماه بسبع حصيات، قال: قد تله للجبين - قال يونس: وثم تلّه للجبين - وعلى إسماعيل قميص أبيض، وقال: يا أبت، إنه ليس لي ثوب تكفنني فيه غيره، فاخلعه حتَّى تكفنني فيه، فعالجه ليخلعه، فنودي من خلفه: {أَنْ يَاإِبْرَاهِيمُ (104) قَدْ صَدَّقْتَ الرُّؤْيَا} فالتفت إبراهيم، فإذا هو بكبش أبيض أقرن أعين.

قال ابن عباس: لقد رأيتنا نبيع هذا الضرب من الكباش، قال: ثمّ ذهب به جبريل إلى الجمرة القصوى، فعرض له الشّيطان، فرماه بسبع حصيات حتَّى ذهب، ثمّ ذهب به جبريل إلى منًى قال: هذا منًى. فذكر الحديث بطوله.

حسن: رواه أحمد (2707)، وأبو داود الطيالسي (2820)، - ومن طريقه البيهقيّ (5/ 153، 154) -، وأبو داود (1885) مختصرًا كلّهم من طريق حمّاد بن سلمة، عن أبي عاصم الغنوي، عن أبي الطفيل، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي عاصم الغنوي فإنه حسن الحديث.

والكلام عليه مبسوط في باب سبب رمي الجمرات في كناب المناسك.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু তুফাইল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: আপনার কওমের লোকেরা দাবি করে যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাফা ও মারওয়ার মধ্যে সায়ী করেছিলেন এবং এটা সুন্নাত?

তিনি বললেন: তারা সত্য বলেছে। যখন ইব্রাহিম (আঃ)-কে মানাসিক (হজ্জের অনুষ্ঠানাদি) পালনের নির্দেশ দেওয়া হলো, তখন ‘মাসআ’র (সায়ী করার স্থান) কাছে শয়তান তাঁর সামনে এল। সে (শয়তান) ইব্রাহিম (আঃ)-এর সাথে পাল্লা দিতে চাইল, কিন্তু ইব্রাহিম (আঃ) তাকে অতিক্রম করে গেলেন।

এরপর জিবরীল (আঃ) তাঁকে নিয়ে জামরাতুল আকাবার কাছে গেলেন। সেখানে শয়তান তাঁর সামনে উপস্থিত হলো। তখন তিনি সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে শয়তান চলে গেল। এরপর শয়তান তাঁর সামনে মধ্যবর্তী জামরার কাছে উপস্থিত হলো। তিনি সেখানেও সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন।

তিনি বললেন: এরপর তিনি তাঁকে (ইসমাইলকে) কপাল বরাবর শুইয়ে দিলেন। ইসমাইল (আঃ)-এর পরনে একটি সাদা জামা ছিল। তিনি বললেন: "হে আমার পিতা! এটি ছাড়া আমাকে কাফন দেওয়ার মতো আর কোনো কাপড় আমার নেই। তাই আপনি এটি খুলে ফেলুন, যাতে আপনি আমাকে এটার দ্বারা কাফন দিতে পারেন।" তখন তিনি (ইব্রাহিম আঃ) সেটি খোলার জন্য চেষ্টা করলেন, তখন তাঁর পিছন থেকে আহ্বান করা হলো: "হে ইব্রাহিম! তুমি তো স্বপ্নকে সত্যে পরিণত করেছ।" (সূরা সাফফাত ৩৭:১০৪) তখন ইব্রাহিম (আঃ) ফিরে তাকালেন। হঠাৎ তিনি দেখলেন, সেখানে সুন্দর চোখবিশিষ্ট, শিংওয়ালা একটি সাদা দুম্বা দাঁড়িয়ে আছে।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি দেখেছি, আমরা এই ধরনের দুম্বা বিক্রি করতাম।

তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: এরপর জিবরীল (আঃ) তাঁকে নিয়ে শেষ জামরার কাছে গেলেন। সেখানেও শয়তান তাঁর সামনে উপস্থিত হলো। তিনি তাকে সাতটি কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন, ফলে সে চলে গেল। এরপর জিবরীল (আঃ) তাঁকে মিনার দিকে নিয়ে গেলেন এবং বললেন: এটা মিনা। এরপর তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটি বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (12923)


12923 - عن صفية بنت شيبة قالت: أخبرتني امرأة من بني سليم ولّدت عامة أهل دارنا: أرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى عثمان بن طلحة، وقال مرة: إنها سألت عثمان بن طلحة: لم
دعاك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم؟ قال:"إنِّي كنت رأيت قرني الكبش حين دخلت البيت، فنسيت أن آمرك أن تخمرهما، فخمّرهما فإنه لا ينبغي أن يكون في البيت شيء يشغل المصلي".

قال سفيان:"لم تزل قرنا الكبش في البيت حتَّى احترق البيت فاحترقا".

صحيح: رواه أبو داود (2030)، وأحمد (16637) - والسياق له - من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، حَدَّثَنِي منصور، عن خاله مسافع، عن صفية بنت شيبة، فذكرته.

وإسناده صحيح، منصور هو ابن عبد الرحمن بن طلحة بن الحارث العبدري الحجبي المكي، وهو ابن صفية بنت شيبة، ومسافع هو ابن عبد الله بن شيبة بن عثمان الحجبي المكي.




উসমান ইবন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে লোক পাঠালেন। (বর্ণনাকারী) একবার বলেছেন: [সাফিয়াহ বিনত শায়বার কাছে বর্ণনাকারী] মহিলা উসমান ইবন তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করেছিলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে কেন ডেকেছিলেন? তিনি (উসমান) বললেন: “আমি যখন কা'বায় প্রবেশ করেছিলাম, তখন ভেড়ার শিং জোড়া দেখেছিলাম, কিন্তু আমি আপনাকে সেগুলো ঢেকে রাখার নির্দেশ দিতে ভুলে গিয়েছিলাম। তাই আপনি সে দুটি ঢেকে দিন। কারণ, ঘরের মধ্যে এমন কিছু থাকা উচিত নয় যা মুসল্লিকে (নামাজে) বিচলিত করে।”

সুফিয়ান বলেন: ভেড়ার শিং জোড়া কাবা ঘরের মধ্যে তখনও ছিল, যতক্ষণ না কাবা ঘর পুড়ে যায়, ফলে শিং জোড়াও পুড়ে গিয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (12924)


12924 - عن أبي هريرة قال: بينما يهودي يعرض سلعته، أعطي بها شيئًا كرهه، فقال: لا والذي اصطفى موسى على البشر، فسمعه رجل من الأنصار، فقام، فلطم وجهه، وقال: تقول والذي اصطفى موسى على البشر، والنبي صلى الله عليه وسلم بين أظهرنا، فذهب إليه، فقال: يا أبا القاسم! إن لي ذمة وعهدا، فما بال فلان لطم وجهي؟ فقال:"لم لطمت وجهه؟". فذكره، فغضب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم حتَّى رُئِي في وجهه، ثمّ قال:"لا تفضّلوا بين أنبياء الله، فإنه ينفخ في الصّور، فيصعق من في السموات ومن في الأرض إِلَّا من شاء الله، ثمّ ينفخ فيه أخرى، فأكون أول من بُعِث، فإذا موسى آخذ بالعرش، فلا أدري أحوسب بصعقته يوم الطور، أم بُعِث قبلي.

ولا أقول: إن أحدًا أفضل من يونس بن متّى".

متفق عليه: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3414، 3415)، ومسلم في الفضائل (2373) كلاهما من طريق عبد العزيز بن أبي سلمة، عن عبد الله بن الفضل الهاشمي، عن عبد الرحمن
الأعرج، عن أبي هريرة فذكره، واللّفظ للبخاريّ.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ইহুদি তার পণ্যদ্রব্য প্রদর্শন করছিল। তাকে এমন একটি দাম দেওয়া হলো যা সে অপছন্দ করল। তখন সে বলল: না, সেই সত্তার কসম, যিনি মূসাকে সমস্ত মানুষের উপর মনোনীত করেছেন। এক আনসারী সাহাবী তা শুনলেন। তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন এবং তার (ইহুদিটির) গালে চড় মারলেন এবং বললেন: তুমি বলছো, 'যিনি মূসাকে সমস্ত মানুষের উপর মনোনীত করেছেন', অথচ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের মাঝে উপস্থিত! লোকটি (ইহুদি) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেল এবং বলল: হে আবুল কাসিম! আমার তো নিরাপত্তা ও চুক্তি রয়েছে। তাহলে অমুক ব্যক্তি আমার গালে চড় মারল কেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কেন তার গালে চড় মারলে?" তখন সে (আনসারী) কারণটি উল্লেখ করল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ক্রুদ্ধ হলেন, এমনকি তাঁর চেহারায় (ক্রোধের চিহ্ন) দেখা গেল। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা আল্লাহর নবীদের মধ্যে তারতম্য করো না। কেননা শিঙায় ফুঁক দেওয়া হবে, ফলে আল্লাহ যার উপর ইচ্ছা করেন তারা ব্যতীত আসমান ও যমিনের সবাই বেহুঁশ হয়ে যাবে। অতঃপর দ্বিতীয়বার তাতে ফুঁক দেওয়া হবে। আমিই প্রথম ব্যক্তি হব যাকে পুনরুত্থিত করা হবে। তখন আমি দেখব, মূসা (আঃ) আরশের খুঁটি ধরে আছেন। আমি জানি না, তূর পর্বতের দিনের (বেহুঁশ হওয়ার) কারণে তাকে কি সেদিন (কিয়ামতের দিন) হিসাব থেকে অব্যাহতি দেওয়া হলো, নাকি তিনি আমার আগেই পুনরুত্থিত হয়েছেন। আর আমি এ কথাও বলছি না যে, ইউনুস ইবনু মাত্তা (আঃ)-এর চেয়ে কেউ উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (12925)


12925 - عن عبد الله بن مسعود، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقولنّ أحكم: إني خير من يونس بن متى".

وفي رواية:"ما ينبغي لأحد أن يكون خيرًا من يونس بن متى".

صحيح: رواه البخاريّ في أحاديث الأنبياء (3412) من طريق سفيان، قال: حَدَّثَنِي الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.

والرّواية الثانية أخرجها البخاريّ في التفسير (4804) عن قُتَيبة بن سعيد، حَدَّثَنَا جرير، عن الأعمش به.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন না বলে যে, আমি ইউনুস ইবনে মাত্তার চেয়ে উত্তম।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "কারো জন্য ইউনুস ইবনে মাত্তার চেয়ে উত্তম হওয়া উচিত নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (12926)


12926 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من قال: أنا خير من يونس بن متى، فقد كذب".

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4805) عن إبراهيم بن المنذر، حَدَّثَنَا محمد بن فليح، قال: حَدَّثَنِي أبي، عن هلال بن عليّ من بني عامر بن لؤي، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة، فذكره.

نُهينا عن ذلك حتَّى لا يكون فيه تنقيص له، وإلَّا فالنبي صلى الله عليه وسلم هو سيد الأنبياء والمرسلين، وقد فضّل الله بعضهم على بعض في قوله: {تِلْكَ الرُّسُلُ فَضَّلْنَا بَعْضَهُمْ عَلَى بَعْضٍ} [البقرة: 253].

قوله: {وَأَنْبَتْنَا عَلَيْهِ شَجَرَةً مِنْ يَقْطِينٍ} قوله: {يَقْطِينٍ} ما لا ساق له من النبات كالقثاء والبطيخ، والدباء لأنه كثير الأوراق.

وقوله: {وَأَنْبَتْنَا} أي عنده، فيستظل بورقته ويأكل من ثمره، وذلك من تدبير العليم الحكيم.

قوله: {وَأَرْسَلْنَاهُ إِلَى مِائَةِ أَلْفٍ أَوْ يَزِيدُونَ}.

أي أن عدد اليهود في الأسرى مائة ألف، والباقي من الآشوريين. وقيل: إنهم عشرون ألف، والنبي إذا بُعِثَ إلى قوم مختلطين فتكون دعوته إلى عبادة الله وحده ونبذ الشرك والكفر عامة للجميع؛ لأنه لا يجوز للنبي إقرار الناس على عبادة غير الله.

{فَآمَنُوا فَمَتَّعْنَاهُمْ إِلَى حِينٍ} أي لما رأوا آثار العذاب فآمنوا مع أن السنة الإلهية أن العذاب إذا جاء لا ينفع نفسا إيمانُها إِلَّا قوم يونس كما قال تعالى: {فَلَوْلَا كَانَتْ قَرْيَةٌ آمَنَتْ فَنَفَعَهَا إِيمَانُهَا إِلَّا قَوْمَ يُونُسَ لَمَّا آمَنُوا كَشَفْنَا عَنْهُمْ عَذَابَ الْخِزْيِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَمَتَّعْنَاهُمْ إِلَى حِينٍ (98)} [يونس: 98].

وسببه كما يقول المفسرون أنه خرج غاضبا قبل إتمام الحجة عليهم، وقبل أن يأذن الله له بالهجرة، فلمّا رأووا العذاب توجهوا إلى الله بالدعاء والاستغفار، فقبِلَ الله دعاءَهم وكشف عنهم العذاب.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি বলে, আমি ইউনুস ইবনে মাত্তা (আঃ)-এর চেয়ে উত্তম, সে মিথ্যা বলেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (12927)


12927 - عن أبي ذرّ: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سُئِل: أي الكلام أفضل؟ قال:"ما اصطفى الله لملائكته أو لعباده: سبحان الله وبحمده".

صحيح: رواه مسلم في الذكر والدعاء والتوبة (2731) عن زهير بن حرب، حَدَّثَنَا حبَّان بن هلال، حَدَّثَنَا وهيب، حَدَّثَنَا سعيد الجريري، عن أبي عبد الله الجسري، عن ابن الصَّامت، عن أبي ذرّ، فذكره.




আবূ যার্র (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল, কোন্ কথাটি সর্বোত্তম? তিনি বললেন: যা আল্লাহ তাঁর ফেরেশতাদের জন্য অথবা তাঁর বান্দাদের জন্য মনোনীত করেছেন: "সুবহানাল্লাহি ওয়া বিহামদিহি" (আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করি এবং তাঁর প্রশংসা করি)।