হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1301)


1301 - عن أبي تميمة عن جندب بن عبد اللَّه الأزديّ صاحب النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال: انطلقتُ أنا وهو إلى البصرة، حتّى أتينا مكانًا يقال له: بيت المسكين، وهو من البصرة على مثل الثَّوِيَّة من الكوفة، فقال: هل كنت تدارس أحدًا القرآن؟ قلت: نعم، قال: فإذا أتينا البصرة، فأتني بهم، فأتيته بصالح بن مسرح، وبأبي بلال، ونَجدة، ونافع بن الأزرق، وهم في نفسي يومئذ من أفاضل أهل البصرة، فأنشأ يحدِّثني عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال جندب: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مثلُ العالم الذي يعلِّمُ النَّاسَ الخيرَ وينسى نفسه، كمثل السِّراج يُضيء للنّاس ويُحْرق نفسه". وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يَحُولَنَّ بين أحدِكم وبين الجنّة وهو ينظر إلى أبوابها مِلْءُ كَفٍّ مِنْ دم مُسلمٍ أَهْراقَهُ ظُلْمًا". قال: فتكلّم القومُ، فذكروا الأمر بالمعروف والنّهي عن المنكر، - وهو ساكت يستمع منهم، ثم قال: لم أرَ كاليوم قطّ أحقّ بالنّجاة إن كانوا صادقين".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (1681) من طريق هشام بن عمار، عن علي بن سليمان الكلبي، حدثني الأعمش، عن أبي تميمة، عن جندب بن عبد اللَّه الأزديّ، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل علي بن سليمان الكلبي، ذكره ابن حبان في الثقات، وقال أبو حاتم: ما أرى بحديثه بأسًا، صالح الحديث، ليس بالمشهور.

وقد جاء عن عمر بن الخطاب أمير المؤمنين أنه قال:"يُفسد الزّمان ثلاثة: أئمّة مضلّون، وجدال منافق بالقرآن -والقرآن حقّ-، وزلّة العالم". انظر تخريجه في"المدخل" (833).

وعن ابن عباس، قال:"ويل للأتباع من عثرات العالم، قيل: وكيف ذلك يا ابن عباس؟ قال: يقول العالم الشيء برأيه، فيلقى من هو أعلم منه برسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منه فيخبره ويرجع، ويقضي الأتباع بما حكم"."المدخل" (836).

وعن أبي الدّرداء قال:"إنّي لآمركم بالأمر، وما أفعله، ولكن لعلّ اللَّه أن يأجرني فيه". المدخل (838).

وأنشأ ابنُ عيينة يقول:

خذ بعلمي وإن قصرتُ في عملي … ينفعك علمي ولا يضرُّك تقصيري

وعن ابن عباس قال:"خذ الحكمة ممن سمعت، فإنّ الرّجل يتكلّم بالحكمة وليس بالحكيم، فتكون كالرمية خرجت من غير رامٍ"."المدخل" (843).

وعن سعيد بن أبي بردة، قال:"كان يقال: الحكمة ضالّة المؤمن يأخذها حيث وجدها".
"المدخل" (844).

وروي مرفوعًا ولا يصح، رواه الترمذيّ (2687)، وابن ماجه (4169) كلاهما من طريق عبد اللَّه بن نمير، عن إبراهيم بن الفضل، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، مرفوعًا، ولفظه:"الحكمة ضالّة المؤمن، فحيث وجدها فهو أحقُّ بها".

قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه، وإبراهيم بن الفضل المخزوميّ ضعيف في الحديث".

قلت: وهو كما قال فإنّ إبراهيم بن الفضل المخزوميّ المدنيّ أبو إسحاق، ويقال: إبراهيم بن إسحاق، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وقال الدّارقطنيّ:"متروك"، واعتمده الحافظ في التقريب.




জুনদুব ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আযদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এবং তিনি (আবূ তাইমাহ) বসরা অভিমুখে রওনা হলাম, এমনকি আমরা এমন একটি জায়গায় পৌঁছলাম, যার নাম 'বাইতুল মিসকীন'। এটি বসরা থেকে কুফার 'আস-সাওয়িয়াহ'-এর মতো দূরত্বে অবস্থিত। তিনি (আবূ তাইমাহ) বললেন: তুমি কি কারো সাথে কুরআন অধ্যয়ন (মুদারাসা) করতে? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: যখন আমরা বসরা পৌঁছব, তখন তুমি তাদেরকে আমার কাছে নিয়ে আসবে। অতঃপর আমি তাদের নিয়ে আসলাম—সালিহ ইবনু মাসরাহ, আবূ বেলাল, নাজ্জাদা এবং নাফি ইবনু আল-আযরাক। সেদিন তারা আমার দৃষ্টিতে বসরাবাসীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। অতঃপর তিনি আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করা শুরু করলেন। জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে আলেম মানুষকে কল্যাণের শিক্ষা দেয়, কিন্তু নিজেকে ভুলে যায়, তার দৃষ্টান্ত হলো প্রদীপের মতো—যা মানুষকে আলো দেয় কিন্তু নিজেকে দগ্ধ করে।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যেন জান্নাত ও তার দরজাসমূহ দেখাকালীন সময়েও এমন এক মুসলিমের এক অঞ্জলি (এক আজলা) পরিমাণ রক্তের কারণে জান্নাত থেকে বঞ্চিত না হয়, যা সে অন্যায়ভাবে ঝরিয়েছে।" তিনি বলেন: অতঃপর সেই লোকেরা কথা বলা শুরু করল এবং সৎ কাজের আদেশ ও অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করার বিষয়ে আলোচনা করল—আর তিনি (আবূ তাইমাহ) নীরব থেকে তাদের কথা শুনছিলেন। এরপর তিনি বললেন: আজকের দিনের মতো আমি আর কখনো কাউকে মুক্তি পাওয়ার এত উপযুক্ত দেখিনি—যদি তারা সত্যবাদী হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (1302)


1302 - عن المغيرة بن أبي بردة أنه سمع أبا هريرة يقول: جاء رجل إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه! إنا نركبُ البحْرَ، ونَحْمِلُ معنا القَليلَ من الماء، فإن توضَّأنا به عَطِشْنا، أفنتوضَّأُ به؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هو الطَّهور ماؤه، الحِلُّ ميتتُه".

صحيح: رواه مالك في الطهارة (12) عن صفوان بن سُليم، عن سعيد بن سلمة -من آل بني الأزرق- عن المغيرة بن أبي بُرْدة -وهو من بني عبد الدار- فذكر الحديث. ومن طريق مالك رواه أبو داود (83) والترمذي (69) والنسائي (59) وابن ماجه (386).

وكون بعض الرواة أدخلوا بين المغيرة بن أبي بردة وأبي هريرة (أبا بردة) لا يضر بصحة الحديث؛ فإن المغيرة بن أبي بردة صرَّح بأنه سمع من أبي هريرة.

صححه البخاري فيما حكي عنه الترمذيّ في العلل (1/ 136)، قال الترمذيّ: قلت: هُشيم يقول في هذا الحديث:"المغيرة بن أبي برزة"، فقال البخاري: وهم فيه، وإنما هو المغيرة بن أبي بردة، وهُشيم بهم في الإسناد، وهو في المقطعات أحفظ".

أما الترمذيّ نفسه فقال: حسن صحيح. وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (1/ 59) وابن حبان (1243) وقال الحاكم (1/ 140 - 142):"هو أصل صدَّر به مالك كتاب الموطأ، وتداوله فقهاء الإسلام من عصره إلى وقتنا هذا".

كذا قال وليس كذلك بل مالك صدّر كتابه بحديث جبريل في وقوت الصّلاة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, “হে আল্লাহর রাসূল! আমরা সমুদ্রযাত্রা করি এবং আমাদের সাথে সামান্য পানি বহন করি। যদি আমরা তা দিয়ে ওযু করি, তবে আমরা পিপাসার্ত হয়ে যাব। আমরা কি তা দিয়ে ওযু করব?” তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “এর (সমুদ্রের) পানি পবিত্রকারী এবং এর মৃত প্রাণী হালাল।”









আল-জামি` আল-কামিল (1303)


1303 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم سُئل عن ماء البحر، فقال:"هو الطَّهور ماؤه، الحل ميتَتُه".

حسن: رواه ابن ماجه (388)، قال: حدّثنا محمد بن يحيى، ثنا أحمد بن حنبل، ثنا أبو القاسم بن أبي الزّناد، قال: حدثني إسحاق بن حازم، عن عبد اللَّه -وهو ابن مِقْسم- عن جابر، فذكر الحديث.

إسناده حسن؛ رجاله ثقات غير أبي القاسم بن أبي الزّناد، فهو ليس به بأس، وإسحاق بن حازم صدوق.

وقال الحافظ أبو علي بن السكن: حديث جابر أصحّ ما روي في هذا الباب، وأخرجه في سننه"الصّحاح المأثورة"، انظر:"تحفة المحتاج" (1/ 136 برقم 3)"التلخيص" (1/ 11).

والحديث في مسند الإمام أحمد (3/ 373) ومن طريقه رواه أيضًا ابن خزيمة (112) وابن حبان (1244).
وأخرجه أيضًا الحاكم (1/ 143) شاهدا لحديث أبي هريرة، ولكن من طريق ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر مثله. وأبو الزبير مدلس وقد عنعن.

وفي الباب عن علي بن أبي طالب رواه الدارقطني (1/ 35) والحاكم (1/ 142) وسكت عليه الحاكم.

قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 12): من طريق أهل البيت وفي إسناده من لا يُعرف.

وعن أنس بن مالك رواه عبد الرزراق (320) والدارقطني (1/ 35) عن الثوري، عن أبان بن أبي عياش، عن أنس قال الدارقطني: أبان متروك.

وعن ابن عباس رواه الدارقطني والحاكم، وصحَّح الدارقطني وقفه.

وعن عبد اللَّه بن عمرو، رواه الدارقطني والحاكم من جهة عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده وسكت عليه الحاكم: وهو من طريق المثنى، عن عمرو بن شعيب قال الحافظ: والمثنى ضعيف.

ومن حديث أبي بكر الصديق رواه الدارقطني، وفي سنده عبد العزيز بن عمران وهو ابن أبي ثابت. قال الذهبي: مجمع على ضعفه.

وله طريق آخر إلا أنه موقوف.

ومن حديث ابن الفراس رواه ابن ماجه.

قال الترمذيّ: سألت محمدًا عنه فقال: هذا مرسل، لم يدرك ابن الفراس النبي صلى الله عليه وسلم والفراس له صحبة. قال الحافظ:"فعلى هذا كأنه سقط من الرواية: عن أبيه، أو أن قوله: ابن - زيادة، فقد ذكر الإمام البخاري أن مسلم بن مخشي لم يدرك الفراس نفسه، وإنما يروى عن ابنه، وإن الابن ليس له صحبة. وقد رواه البيهقي من طريق شيخ شيخ ابن ماجه - يحيى بن بكير، عن الليث، عن جعفر بن ربيعة، عن مسلم بن مخشي أنه حدثه أن الفراس قال: كنت أصيد. . فهذا السياق مجود، وهو على رأي البخاري مرسل" انظر للمزيد: نصب الراية (1/ 99).

وأما حديث ابن مسعود في الوضوء بالنبيذ فلم يصح، وهو ما رواه أبو داود (84) والترمذي (88) وابن ماجه (384) أن النبي صلى الله عليه وسلم قال له ليلة الجن:"ما في إداوتك؟" قال: نبيذ. قال:"تمر طيبة وماء طهور" فإن مداره على أبي زيد، عن ابن مسعود، وهو رجل مجهول عند أهل الحديث، لا تعرف له رواية غير هذا الحديث كما قال الترمذيّ، وقال البخاري:"أبو زيد الذي روى حديث ابن مسعود رجل مجهول، لا يُعرف بصحبة عبد اللَّه".

وقال ابن عبد البر:"أبو زيد مولى عمرو بن حريث مجهول عندهم، لا يعرف، وحديثه عن ابن مسعود في الوضوء بالنبيذ منكر لا أصل له، ولا رواه من يوثق به، ولا يثبت".

قلت: وقد روى مسلم (450) بإسناده عن ابن مسعود قال:"لم أكن مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة الجن، ووددت أني كنت معه".
وروي أيضًا عن ابن عباس قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"النبيذ وضوء لمن لم يجد الماء" وهو حديث منكر، رواه الدارقطني (1/ 75) والبيهقي (1/ 12) من حديث المسيب بن واضح، نا مبشر ابن إسماعيل، عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

قال البيهقي في السنن الكبري (1/ 11):"هذا حديث مختلف فيه على المسيب بن واضح، وهو واهم فيه في موضعين: في ذكر ابن عباس، وفي ذكر النبي صلى الله عليه وسلم، والمحفوظ من قول عكرمة غير مرفوع"، انتهى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সমুদ্রের পানি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল। তিনি বললেন: এর পানি পবিত্রকারী (তাহূর), এবং এর মৃত প্রাণী হালাল।









আল-জামি` আল-কামিল (1304)


1304 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استيقظ أحدكم من نومه فليغسل يده قبل أن يُدخلها في وضوئه؛ فإن أحدكم لا يدري أين بانت يدُه".

متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (9) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في الوضوء (162) من طريق مالك، به. إلا أنّه جمع هذا الحديث مع حديث:"إذا توضأ أحدكم فليجعل في أنفه ثم لينثر، ومن استجمر فليوتر"، ولعله لاتحاد سندهما، وأما مالك ففرَّقه، وكذا مسلم؛ فإنه رواه في الطهارة (278) من طريق المغيرة الحِزامي، عن أبي الزّناد عنه به، ورواه أيضًا من طرق أخرى عن أبي هريرة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ ঘুম থেকে জাগে, তখন সে যেন ওযুর পাত্রে হাত প্রবেশ করানোর পূর্বে তা ধুয়ে নেয়; কারণ তোমাদের কেউ জানে না যে তার হাত কোথায় রাত্রিযাপন করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1305)


1305 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: سئل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الماء وما ينوبه من الدواب والسباع، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا كان الماء قلتين لم يحمل الخبَث".

صحيح: رواه أبو داود (63، 64) والترمذي (67)، والنسائي (52) وابن ماجه (517) كلّهم عن محمد بن جعفر بن الزبير، عن عبد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر، عن أبيه عبد اللَّه بن عمر، إلا الترمذيّ فإنه قال: عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عمر.

وإسناده صحيح، وصحّحه أيضًا ابن خزيمة (92)، وابن حبان (1249)، والحاكم (1/ 132 - 133) وقال: صحيح على شرط الشّيخين، فقد احتجاج بجميع رواته ولم يخرجاه وأظنّهما -واللَّه أعلم- لم يخرجاه لخلاف فيه على أبي أسامة، عن الوليد بن كثير. انتهى

وعبيد اللَّه المصغَّر وعبد اللَّه المكبر كلاهما ثقتان، يرويان عن أبيهما عبد اللَّه بن عمر، كنية عبيد اللَّه أبو بكر، وهو شقيق سالم، وكنية عبد اللَّه أبو عبد الرحمن المدني، توفي عبيد اللَّه سنة 106 هـ، وتوفي عبد اللَّه سنة 105 هـ.

انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 278).

وقوله: (ينوبه) إذا تردد إليه مرة بعد مرة، ونوبة بعد نوبة، مِن ناب المكان وانتابه.
والقُلّة: إناء للعرب كالجرة الكبيرة، وقد قدرها الفقهاء مائتين وخمسين رطلا إلى ثلاثمائة.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পানি এবং তাতে যেসব গৃহপালিত ও হিংস্র জন্তু আসে, সে সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন পানি দুই কুল্লাহ পরিমাণ হবে, তখন তা কোনো নাপাকি গ্রহণ করবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1306)


1306 - عن ابن عباس قال: اغتسل بعضُ أزواج النبي صلى الله عليه وسلم في جَفْنةٍ، فجاء النبي صلى الله عليه وسلم ليتوضّأَ منها -أو يغتسلَ- فقالت له: يا رسول اللَّه! إني كنت جنبًا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الماء لا يُجْنِبُ".

حسن: رواه أبو داود (68) والترمذي (65) والنسائي (325) وابن ماجه (370، 371) كلّهم من طريق سماك بن حرب، عن عكرمة، عن ابن عباس.

قال الترمذيّ: حسن صحيح.

قلت: إسناده حسن لأجل سماك بن حرب، وقد أعِلَّ بأنه كان يقبل التلقين، ولكن رواه ابن خزيمة (91)، من طريق شعبة عنه، وهو لا يحمل عن مشايخه إلا صحيح حديثهم. وصحَّحه أيضًا ابن حبان (1242)، والحاكم (1/ 159) كلاهما من هذا الوجه، وقال الحاكم:"هذا حديث صحيحٌ في الطهارة ولم يُخرجاه، ولا يُحفظ له علَّة". والجَفْنةُ: القصعة الكبيرة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের মধ্যে কেউ একজন একটি বড় পাত্রে গোসল করলেন। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে ওযু করতে অথবা গোসল করতে আসলেন। তখন তিনি তাঁকে বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তো জুনুবী (নাপাক) ছিলাম।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "নিশ্চয়ই পানি নাপাক হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1307)


1307 - عن أبي سعيد الخدري قال: قيل يا رسول اللَّه! أنتوضأ من بئر بضاعة، وهي بئر يُطرح فيها الحيضُ ولحوم الكلاب والنَّتْنُ؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الماء طهور لا يُنَجِّسه شيء".

حسن: رواه أبو داود (66) والترمذي (66) والنسائي (326) كلّهم من طريق الوليد بن كثير، عن محمد بن كعب القُرَظي، عن عبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن رافع، عن أبي سعيد الخدري.

قال أبو سعيد في رواية عند النسائي: مررت بالنبي صلى الله عليه وسلم وهو يتوضأ من بئر بضاعة، فقلت: أتتوضأ منها وهي يطرح فيها ما يكره من النَّتْن؟ فقال:"الماء لا ينجسه شيء".

قال الترمذيّ: حديث حسن، وقد جوّد أبو أسامة هذا الحديث؛ فلم يرو أحد حديث أبي سعيد في بئر بضاعة أحسن مما روى أبو أسامة (عن الوليد بن كثير)، وقد رُوي هذا الحديث من غير وجه عن أبي سعيد. انتهى.

قلت: إسناده حسن لغيره ورجاله ثقات غير عبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن رافع؛ فلم يوثقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات (5/ 71).

ولكن للحديث طرق أخرى كما قال الترمذيّ، منها ما رواه أبو داود (67) من طريق محمد بن إسحاق، عن سليط بن أيوب، عن عبيد اللَّه بن عبد الرحمن بن رافع الأنصاري ثم العدوي، عن أبي سعيد الخدري قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو يقال له: إنه يُستقى لك من بئر بضاعة، وهي بئر يلقى فيها لحومُ الكلاب والمحايِض وعِذَر النّاس، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن الماء طهور لا ينجسه شيء".

محمد بن إسحاق مدلس، وقد عنعن، وسليط بن أيوب ذكره ابن حبان في الثقات (6/ 430)
وقال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة.

ورواه النسائي (328) من طريق مطرف بن طريف، عن خالد بن أبي نوف، عن سليط، عن ابن أبي سعيد الخدري، عن أبيه قال: مررت بالنبي صلى الله عليه وسلم وهو يتوضأ من بئر بضاعة، فقلت: أتتوضأ منها وهي يطرح فيها ما يكره من النتن؟ فقال:"الماء لا ينجسه شيء".

وفيه خالد بن أبي نوف، ذكره ابن حبان في الثقات (6/ 264) وقال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة.

وللحديث أسانيد أخرى كلها معلولة؛ ولذا نقل ابن الجوزي عن الدارقطني أنّه قال:"إنّه ليس بثابت". وتعقَّبه النووي في الخُلاصة (1/ 65) فقال: حسَّنه الترمذيّ، وفي بعض النسخ:"حسن صحيح" وقال الإمام أحمد بن حنبل:"هو صحيح" وكذا قال آخرون، وقولهم مقدَّمٌ على قول الدارقطني:"إنَّه غير ثابت". انتهى.

وكذلك صحَّحه أيضًا يحيى بن معين، وأبو محمد بن حزم كما في"التلخيص الحبير" (1/ 13).

وأمّا قول الدارقطني:"إنّه ليس بثابتٍ" فيقول الحافظ:"ولم نر ذلك في العلل له ولا في السنن" انتهى.

قلت: قاله الدّارقطني في حديث أبي هريرة في العلل (8/ 157).

ثم إن صحَّ هذا الحديث المطلق فهو مقيد بحديث ابن عمر السابق، وهو أن يكون الماء قلتين فأكثر ما لم يتغيّر لونه أو طعمه أو ريحه، فهو طاهر بالإجماع كما حكاه ابن المنذر في كتابه"الإجماع" (ص 33).

وأمّا الأحاديث الواردة عن ثوبان، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"الماء طهور إلّا ما غلب على طعمه أو ريحه". رواه الدّارقطني وغيره، فهو ضعيف.

وكذلك ما روي عن أبي أمامة عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الماء لا ينجسه شيء إلّا ما غلب على طعمه وريحه ولونه".

رواه ابن ماجه (521) وغيره، فهو ضعيف أيضًا.

وكذلك لا يصح ما روي عن جابر بن عبد اللَّه، رواه ابن ماجه (520) وفيه طريف بن شهاب أجمعوا على تضعيفه.

وفي الباب ما رُوي عن سهل بن سعد السّاعديّ قال:"سقيتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بيدي من بضاعة".

رواه الإمام أحمد (22860) عن حسين بن محمد، حدّثنا الفضيل -يعني ابن سليمان-، حدّثنا محمد بن أبي يحيى، عن أمّه، قالت: سمعت سهل بن سعد يقول (فذكر الحديث).

ورواه الدّارقطنيّ (48) من وجه آخر عن فضيل بن سليمان النّميريّ، عن أبي حازم، عن سهل ابن سعد، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الماء لا ينجسه شيء".

وإسناده ضعيف من أجل الكلام في فضيل بن سليمان النميريّ، فقد ضعّفه ابن معين والنسائي،
وقال أبو زرعة: لين الحديث، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ليس بالقوي.

قلت: روى له الجماعة وكان علي بن المديني مع تعنته في الرجال روي عنه، فلعله انتقى من حديثه.

ولا تنفعه متابعة حاتم بن إسماعيل لاضطرابه في إسناده فقد رواه أبو يعلى (7519)، والطبرانيّ في الكبير (6026)، والبيهقيّ في السنن (1/ 259)، وفي المعرفة (1823) كلّهم من طرق عن حاتم بن إسماعيل، عن محمد بن أبي يحيى، عن أبيه، قال: دخلتُ على سهل بن سعد السّاعدي في نسوة فقال:"لو أني أسقيكم من بضاعة لكرهتم ذلك، وقد -واللَّه- سقيتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بيدي منها".

قال البيهقي: هذا إسناد حسن موصول.

ولكن رواه الطحاوي في شرحه (4) من هذا الطريق وقال:"عن أمه" بدلا من"أبيه" وهو موافق لما رواه الفضيل بن سليمان عند الإمام أحمد، وأمُّه لا تعرف من هي وما حالها، فكيف يكون إسناده حسنًا مع اضطرابه في الإسناد والمتن.

وله إسناد آخر أضعف من هذا وهو ما رواه القاسم بن أصبغ في"مصنفه" قال: ثنا محمد بن وضاح، ثنا عبد الصمد بن أبي سكينة الحلبي بحلب، ثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل بن سعد، قال: قالوا: يا رسول اللَّه! إنك تتوضأ من بئر بضاعة، وفيها ما يُنجي الناسُ والمحائض والخبث، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الماء لا ينجسه شيء".

وقال محمد بن عبد الملك بن أيمن في مستخرجه على سنن أبي داود: حدّثنا محمد بن وضاح به، قال ابن وضاح: لقيت ابن أبي سكينة بحلب، فذكره. وقال قاسم بن أصبغ: هذا من أحسن شيء في بئر بضاعة، وقال ابن حزم: عبد الصمد ثقة مشهور، قال قاسم: ويروى عن سهل بن سعد في بئر بضاعة من طرق هذا خيرها، فاعلم ذلك. انتهى كلام ابن القطّان.

وقال الحافظ: ابن أبي سكينة الذي زعم ابن حزم أنه مشهور، قال ابن عبد البر وغير واحد: إنه مجهول، ولم نجد عنه راويا إلا محمد بن وضاح. انتهى.

انظر: التلخيص الحبير (1/ 13).

قلت: وهو كما قال فإنّي لم أقف على ترجمته في الكتب المتداولة، فكيف يكون مثله مشهورًا؟ ! .

فائدة:

قال الشافعي: كانت بئر بضاعة كبيرة واسعة، وكان يطرح فيها من الأنجاس ما لا يغير لها لونًا ولا طعمًا ولا يظهر له ريح.

وقال أبو داود: سمعت قتيبة بن سعيد قال: سألت قيم بئر بضاعة عن عُمُقِها قال: أكثر ما يكون فيها الماء إلى العانة، قلت: فإذا نقص؟ قال: دون العورة. قال أبو داود: وقدرت أنا بئر بضاعة
بردائي مددته عليها ثم ذرعته، فإذا عرضها ستة أذرع، وسألت الذي فتح لي البستان فأدخلني إليه: هل غير بناؤها عما كانت عليه؟ قال: لا. ورأيت فيها ماءً متغير اللون. انتهى

قلت: لعل ذلك لطول المكث وعدم الاستعمال به.

وقوله: يطرح فيها الحيض ولحم الكلاب والنتن، قال الخطابيّ في"معالم السنن" (1/ 73): قد يتوهم كثير من النّاس إذا سمع هذا الحديث أن هذا كان منهم عادة، وأنهم كانوا يأتون هذا الفعل قصدا وتعمدا، وهذا ما لا يجوز أن يُظن بذمي، بل بوثني، فضلا عن مسلم، ولم يزل من عادة النّاس قديما وحديثا، مسلمهم وكافرهم تَنْزيه المياه وصونها عن النجاسات، فكيف يظن بأهل ذلك الزمان -وهم أعلى طبقات أهل الدين، وأفضل جماعة المسلمين، والماء في بلادهم أعز، والحاجة إليه أمسّ- أن يكون هذا صنيعهم بالماء وامتهانهم له، وقد لعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من تغوّط في موارد الماء ومشارعه، فكيف من اتخذ عيون الماء ومنابعه رصدًا للأنجاس ومطرحا للأقذار؟ ! هذا ما لا يليق بحالهم، وإنما كان هذا من أجل أن هذه البئر موضعها في حَدور من الأرض، وأن السيول كانت تكسح هذه الأقذار من الطرق والأفنية، وتحملها فتلقيها فيها، وكان الماء لكثرته لا يؤثر فيه وقوع هذه الأشياء، ولا يغيره، فسألوا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن شأنها. . .




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বলা হলো, ‘হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি বুদা'আ কূপের পানি দ্বারা উযু করব? এটি এমন একটি কূপ, যেখানে হায়েজ (মাসিকের কাপড়), কুকুরের গোশত এবং দুর্গন্ধযুক্ত জিনিসপত্র ফেলা হয়।’ তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “পানি হলো পবিত্রকারী (পবিত্র), কোনো কিছুই এটিকে অপবিত্র করতে পারে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (1308)


1308 - عن أبي هريرة قال: لقيني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأنا جنب، فأخذ بيدي فمشيتُ معه حتى قعد، فانسللت فأتيت الرحل فاغتسلت، ثم جئت وهو قاعد، فقال:"أين كنت يا أبا هريرة؟"، فقلت له، فقال:"سبحان اللَّه يا أبا هريرة! إن المؤمن لا ينجُس".

متفق عليه: رواه البخاري (285)، واللّفظ له، ومسلم في الحيض (371)، كلاهما عن أبي رافع، عن أبي هريرة فذكر الحديث.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে এমন অবস্থায় দেখা করলেন যখন আমি জুনুবী (নাপাক) ছিলাম। তিনি আমার হাত ধরলেন এবং আমি তাঁর সাথে হাঁটতে লাগলাম যতক্ষণ না তিনি বসে পড়লেন। তখন আমি আস্তে সরে পড়লাম এবং আমার বাসস্থানে এসে গোসল করলাম। এরপর আমি এলাম, আর তিনি তখনও বসে ছিলেন। তিনি বললেন, "হে আবূ হুরাইরাহ! তুমি কোথায় ছিলে?" আমি তাঁকে কারণ জানালাম। তিনি বললেন, "সুবহানাল্লাহ, হে আবূ হুরাইরাহ! নিশ্চয়ই মু'মিন অপবিত্র হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1309)


1309 - عن حذيفة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لقيه وهو جنب، فحاد عنه، فاغتسل، ثم جاء فقال: كنت جُنبًا، قال صلى الله عليه وسلم:"إن المسلم لا ينجس".

صحيح: رواه مسلم في الحيض (372). عن أبي بكر بن أبي شيبة وأبي كريب قالا: حدّثنا وكيع، عن مِسْعَرٍ، عن وَاصِل، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكر الحديث.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলেন এমন অবস্থায় যখন তিনি জুনুবী ছিলেন। তখন তিনি (হুযাইফা) তাঁর থেকে দূরে সরে গেলেন, গোসল করলেন, অতঃপর ফিরে এসে বললেন: "আমি জুনুবী ছিলাম।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই মুসলিম কখনও নাপাক হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (1310)


1310 - عن عبد اللَّه بن زيد قال: أتى رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأخرجنا له ماءً في تَوْرٍ من صُفْر، فتوضأ، فغسل وجهه ثلاثا، ويديه مرتين مرتين، ومسح برأسه فأقبل به وأدبر، وغسل رجليه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الوضوء (197) ومسلم في الطهارة (235: 18) كلاهما من
حديث عبد اللَّه بن زيد بن عاصم، واللّفظ للبخاريّ، وهذا مختصر من حديث طويل في صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم. انظر: كتاب الوضوء.

والصُّفْر هو: النحاس. والتور -بفتح المثناة-: شبه الطست، وقيل: هو الطست.

وفي الباب عن زينب بنت جحش أنه كان لها مِخْضب من صُفر، قالت: كنتُ أُرَجَّل رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فيه.

رواه ابن ماجه (472) قال: حدّثنا يعقوب بن حميد بن كاسب، ثنا عبد العزيز بن محمد الدراوردي، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن إبراهيم بن محمد بن عبد اللَّه بن جحش، عن أبيه، عن زينب بنت جحش، فذكر الحديث.

قال البوصيري في زوائده: إسناده صحيح، ورجاله ثقات.

قُلت: ليس كما قال؛ فإنّ عبد العزيز بن محمد الدّراورديّ يغلط في أحاديث عبد اللَّه بن عمر العمريّ المكبّر الضّعيف، فيجعلها عن عبيد اللَّه بن عمر المصغّر الثّقة، قال الإمام أحمد: ربما قلب حديث عبد اللَّه بن عمر يرويها عن عبد اللَّه بن عمر.

وقال أيضًا: ما حدّث عن عبيد اللَّه بن عمر فهو عن عبد اللَّه بن عمر.

وقال النسائي: حديثه عن عبيد اللَّه منكر.

وهذا هو الصّحيح فإنّ هذا الحديث هو عن عبد اللَّه بن عمر العمري، رواه الإمام أحمد (26852) عن حماد بن خالد، عنه، عن إبراهيم بن محمد، عن أبيه، عن زينب بنت جحش، فذكرتْ نحوه.

قال الدّارقطنيّ في العلل 15/ 382: لا أعلم رواه عن عبيد اللَّه غير الدراورديّ. ثم ذكر الاختلاف فيه على الدراوردي، وعلي عبد اللَّه بن عمر العمريّ ثم قال: والحديث شديد الاضطراب. اهـ.




আব্দুল্লাহ ইবন যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করলেন। তখন আমরা তাঁর জন্য পিতলের একটি 'তওর' (পাত্র বিশেষ)-এ পানি বের করে আনলাম। অতঃপর তিনি উযু করলেন। তিনি তাঁর মুখমণ্ডল তিনবার ধুলেন, তাঁর দুই হাত দুইবার করে ধুলেন, আর তাঁর মাথা মাসাহ করলেন— তিনি তা সামনে থেকে পিছনে এবং পিছন থেকে সামনে নিলেন, এবং তাঁর দুই পা ধুলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1311)


1311 - عن أبي هريرة أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إذا شرب الكلب في إناء أحدكم فليغسله سبع مرات".

متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (35) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

ومن طريقه البخاري في الوضوء (172) ومسلم في الطهارة (279).

وفي رواية عند مسلم من طريق علي بن مسهر، نا الأعمش، عن أبي رزين وأبي صالح، عن أبي هريرة"فليرقه"، ورواه من طريق إسماعيل بن زكريا، عن الأعمش بهذا الإسناد، ولم يقل:"فليرقه".

قال النسائي (1/ 53): لا أعلم أحدا تابع عَلِيَّ بن مسهر على قوله:"فليرقه".
وفي رواية عنده -أي عند مسلم-:"أُولاهُنَّ بالتراب".

وفي رواية عند أبي داود (73) من طريق محمد بن سيرين، عن أبي هريرة مثله، وزاد:"السابعة بالتراب"، قال أبو داود: وأما أبو صالح وأبو رزين والأعرج وثابت الأحنف وهمام بن منبه وأبو السدي عبد الرحمن رووه عن أبي هريرة ولم يذكروا التراب. فيكون ذكر التراب في المرة السابعة شاذا، والمحفوظ:"أولاهن"، وهو الذي رواه مسلم من طريق محمد بن سيرين، فالظاهر أن الذي زاده يكون من بعده. وانظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 237).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি তোমাদের কারো পাত্রে কুকুর পান করে, তবে সে যেন তা সাতবার ধৌত করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1312)


1312 - عن عبد اللَّه بنُ المُغفَّل قال: أمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بقتل الكلاب، ثم قال:"ما بالُهم وبالُ الكلاب؟"، ثم رخَّصَ في كلب الصيدِ وكلب الغَنَم، وقال:"إذا وَلَغَ الكلبُ في الإناءِ فاغْسِلُوه سبعَ مرات، وعَفِّرُوه الثامنةَ في التراب".

وفي رواية: ورخص في كلب الغنم والصيد والزرع.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (280). من طريق شعبة، عن أبي التيَّاح. سمع مُطَرِّفَ بن عبد اللَّه يحدث عن ابن المُغَفَّل فذكر الحديث.

قوله (عَفِّروه): من العَفَر -بفتحتين- وهو وجه الأرض، ويطلق على التراب، وعفرت الإناء عفرا: دلكته بالعفر.




আব্দুল্লাহ ইবনু মুগাফফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুকুর হত্যা করার নির্দেশ দিয়েছিলেন। এরপর তিনি বললেন: "তাদের (মানুষের) এবং কুকুরের কী হয়েছে?" এরপর তিনি শিকারের কুকুর ও পালের (মেষ/বকরীর) কুকুরের অনুমতি দিলেন। আর তিনি বললেন: "যখন কুকুর কোনো পাত্রে মুখ দেবে (জিহ্বা দেবে), তখন তোমরা তা সাতবার ধৌত করবে এবং অষ্টমবারে মাটি দ্বারা মেজে পরিষ্কার করবে।"

অপর এক বর্ণনায়: তিনি পালের কুকুর, শিকারের কুকুর এবং শস্যক্ষেত্রের কুকুরের অনুমতি দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1313)


1313 - عن عمران بن حصين، قال:"شربنا ونحن أربعون رجلًا عِطاشٌ، من مزادة امرأة مشركةٍ، وغسَّلنا صاحبنا (الجنب)".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3571)، ومسلمٌ في المساجدِ (682)، كلاهما من حديث سلْم بن زريرٍ، قال: سمعت أبا رجاء العُطاردي، قال: حدَّثنا عمران بن حصين. . فذكر الحديث، في حديثٍ طويلٍ، سيأتي بتمامه في دلائل النبوَّةِ.

وأمّا المشهور في كتب الفقهِ، وكتب الحديث الجامعة لأدلَّة الأحكام، كالمنتقى لمجد الدين ابن تيمية، والمحرر لابن عبد الهادي، وبلوغ المرام للحافظ ابن حجر: أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه توضَّؤوا من مَزادة امرأةٍ مشركة. فلم أجده بهذا اللفظِ، والظاهر أنَّهم أخذوا بالمعنى. .

وقوله:"المزادة" بفتح الميم والزاي: قِربة كبيرة، يزاد فيها جلدٌ من غيرها.

أمَّا بقيَّة أحاديثِ الأواني من الذهب والفضَّة وغيرهما، فستأتي في كتاب الأطعمة والأشربة -إن شاء اللَّه تعالى-.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা পান করেছিলাম, যখন আমরা চল্লিশ জন লোক পিপাসার্ত ছিলাম, একজন মুশরিক মহিলার মশক (পানির থলি) থেকে; এবং আমরা আমাদের সাথীকে (যার উপর গোসল ফরজ ছিল) গোসল করালাম।









আল-জামি` আল-কামিল (1314)


1314 - عن حُميدة بنت أبي عُبَيدة بن فروة، عن خالتها كَبْشةَ بنت كعب بن مالك، وكانت تحت ابن أبي قتادة الأنصاري، أنها أخبرتْها أن أبا قتادةَ دخل عليها فسَكَبتُ
له وضوءًا، فجاءت هِرّةٌ لتشرب منه، فأصغى لها الإناء حتى شربتْ، قالت كَبْشةُ: فرآني أنظر إليه، فقال: أتَعْجَبين يا ابنةَ أخي؟ قالت: فقلت: نعم، فقال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنها ليستْ بنجسٍ؛ إنما هي من الطوافين عليكم أو الطوافات".

حسن: رواه مالك في الطهارة (13) عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن حُميدة بنت أبي عبيدة، فذكرت الحديث.

وعن مالك رواه أبو داود (75) والترمذي (92) والنسائي (68) وابن ماجه (367).

قال الترمذيّ:"حسن صحيح".

قلت: رجاله ثقات، رجال الشيخين غير حُميدة بنت أبي عُبيدة ذكرها ابن حبان في الثقات، وتصحيح الترمذيّ للحديث دليل على توثيقه إياها، ونقل الحافظ في التلخيص تصحيحه أيضًا عن البخاري والدارقطني والعقيلي.

قال البيهقي (1/ 245) قال أبو عيسى: سألت محمدًا يعني البخاري عن هذا الحديث فقال: جوَّد مالك بن أنس هذا الحديث، وروايته أصح من رواية غيره.

قال البيهقي: وقد رواه حسين المعلم بقريب من رواية مالك، ثم رواه من طريقه ومن طريق همام بن يحيى كلاهما عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أم يحيى، عن خالتها بنت كعب (وكانت عند عبد اللَّه بن أبي قتادة) فذكر الحديث. وذكر له طرقًا أخرى ثم قال: وكل ذلك شاهد لصحة رواية مالك. انتهى.

قلت: ورواه أيضًا ابن خزيمة في صحيحه (104)، وابن حبان (1299)، والحاكم في المستدرك (1/ 160) من طريق مالك.

قال الحاكم:"صحيح لم يخرجاه، على أنهما على ما أصَّلاه في تركه غير أنهما قد شهدا جميعًا لمالك بن أنس أنه الحكم في حديث المدنيين، وهذا الحديث مما صحّحه مالك، واحتج به في الموطأ". انتهى.

وللحديث شاهد عن عائشة رواه أبو داود وابن ماجه والدارقطني والبيهقي وغيرهم إلا أنه لا يخلو طريق منها من ضعيف أو مجهول.

هذا هو الصحيح الثابت في طهارة سؤر الهِرّة.

وأما ما روي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"يُغسل الإناء إذا ولغ الكلب فيه سبع مرات، وإذا ولغت الهرُ غُسل مرة" فهو ضعيف؛ فإن ذكر ولوغ الهِرّ موقوف على أبي هريرة، فقد رواه أبو داود (72) عن مسدد، عن المغيرة بن سليمان، (ح) وعن محمد بن عبيد، ثنا حماد بن زيد، جميعًا عن أيوب، عن محمد بن سيرين، عن أبي هريرة، ولم يرفعاه، وزاد:"وإذا ولغ الهر غسل مرة"، وذلك بعد أن رواه عن أحمد بن يونس، ثنا زائدة في حديث هشام، عن محمد بن سيرين، عنه مرفوعا في
ولوغ الكلب في إناء أحدكم، كما رواه مسلم وغيره، وسبق ذلك في الباب الذي قبل هذا.

ورواه الترمذيّ (91) عن سوّار بن عبد اللَّه العنبري، ثنا المعتمر بن سليمان، به مرفوعا، وقال: ورُوِي هذا الحديث من غير وجه عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحو هذا، ولم يذكر فيه:"إذا ولغتْ فيه الهرةُ غُسِل مرةً".

وقال البيهقي في"معرفة السنن والآثار" (1/ 311) بعد أن أخرج الحديث من طريق أبي داود، عن مسدد:"وأما حديث محمد بن سيرين، عن أبي هريرة:"إذا ولغ الهر غسل مرة" فقد أدرجه بعض الرواة في حديثه عن النبي صلى الله عليه وسلم في ولوغ الكلب، ووهموا فيه، والصحيح أنه في ولوغ الكلب مرفوع، وفي الهر موقوف".




আবু কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হুমাইদাহ বিনতে আবি উবাইদাহ বিন ফারওয়া তাঁর খালা কাবশাহ বিনতে কা’ব ইবনে মালিক (যিনি আবু কাতাদাহ আল-আনসারীর পুত্রের স্ত্রী ছিলেন) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, কাবশাহ তাঁকে জানিয়েছেন যে, একদা আবু কাতাদাহ তাঁর কাছে এলেন। তিনি (কাবশাহ) তাঁর জন্য অযুর পানি ঢেলে দিলেন। অতঃপর একটি বিড়াল সেই পানি পান করার জন্য এলো। তিনি বিড়ালটির জন্য পাত্রটি ঝুঁকিয়ে ধরলেন, যাতে সেটি পান করতে পারে। কাবশাহ বলেন: তিনি আমাকে তাঁর দিকে তাকিয়ে থাকতে দেখলেন। তিনি বললেন, "ওহে ভাতিজি, তুমি কি অবাক হচ্ছো?" কাবশাহ বলেন: আমি বললাম, "হ্যাঁ।" তখন তিনি বললেন, "নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'এটি (বিড়াল) অপবিত্র নয়। নিশ্চয়ই এটি তোমাদের আশেপাশে ঘোরাফেরা করা প্রাণীসমূহের অন্তর্ভুক্ত।'"









আল-জামি` আল-কামিল (1315)


1315 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الفطرة خمس، أو خمس من الفطرة: الختان، والاستحداد، وتقليم الأظفار، ونتف الإبط، وقص الشارب".

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5889، 5891، 6297) ومسلم في الطهارة (257). كلاهما من حديث ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وقوله:"الاستحداد" معناه حلق العانة، وسُمِّي استحدادًا لاستعمال الحديدة. وهي الموسى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ফিতরাতের (স্বভাবগত পবিত্রতার) কাজ হলো পাঁচটি, অথবা পাঁচটি বিষয় ফিতরাতের অন্তর্ভুক্ত: খতনা করা, ইস্তিহদাদ (নাভির নিচে লোম পরিষ্কার করা), নখ কাটা, বগলের লোম উপড়ে ফেলা এবং গোঁফ খাটো করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (1316)


1316 - عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"خالفوا المشركين؛ وفِّروا اللِّحَى، واحفوا الشوارب".

وكان ابن عمر إذا حجّ أو اعتمر قبض على لحيته، فما فضل أخذه.

وفي رواية:"أنهكوا الشوارب، وأعفوا اللحى".

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5892، 5893) واللّفظ له، ومسلم في الطهارة (259) وفيه:"أحفوا الشوارب، وأعفوا اللحى" وفي لفظ:"أحفوا الشوارب، وأوفوا اللحى"، وفي لفظ عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه أمر بإحفاء الشوارب وإعفاء اللحية.

ولم يذكر مسلم أن ابن عمر إذا حجّ أو اعتمر قبض على لحيته فما زاد أخذه.

رواه البخاري بالإسناد السابق.

وأخرجه أيضًا مالك في الموطأ في الحج (187) عن نافع، أن عبد اللَّه بن عمر كان إذا حلق في حج أو عمرةٍ أخذ من لحيته وشاربه.

وإحفاء الشارب معناه: أن يؤخذ منه حتى يحفى ويرق، وقد يكون أيضًا معناه: الاستقصاء في أخذه، من قولك: (أحفيت في المسألة) إذا استقصيت فيها، أفاده الخطابي.

وسوف يأتي من حديث أبي هريرة:"جزُّوا الشوارب". والجزُّ هو قطع الصوف من الخروف،
ولا يكون فيه الاستقصاء، أو الاستئصال؛ ولذا ذهب كثير من السلف إلى منع الحلق والاستئصال منهم الإمام مالك، كان يرى تأديب من حلقه. فالمختار هو القص حتى يبدو طرف الشفة، أو الإحفاء. وقد قيل للإمام أحمد: ترى للرجل يأخذ شاربه ويحفيه، أم كيف يأخذه؟ قال: إن أحفاه فلا بأس، وإن أخذه قصًّا فلا بأس.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা মুশরিকদের বিরোধিতা করো; দাড়ি পূর্ণ রাখো এবং গোঁফ ছোট করো (বা কামিয়ে ফেলো)।"

আর ইবনু উমর যখন হজ বা ওমরাহ করতেন, তখন তিনি তার দাড়ি মুষ্টিবদ্ধ করে ধরতেন এবং মুষ্টির অতিরিক্ত অংশ কেটে নিতেন।

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "তোমরা গোঁফ খুব বেশি ছোট করো (বা ছেঁটে ফেলো) এবং দাড়ি ছেড়ে দাও (লম্বা রাখো)।"

হাদিসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। এটি বুখারী (৫892, ৫893) ও মুসলিম (২৫৯) বর্ণনা করেছেন। মুসলিমের এক বর্ণনায় রয়েছে: "তোমরা গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি ছেড়ে দাও।" অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: "তোমরা গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি পূর্ণ রাখো।" এবং এক বর্ণনায় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গোঁফ ছোট করা এবং দাড়ি ছেড়ে দেওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন।

তবে মুসলিম এই বিষয়টি উল্লেখ করেননি যে, ইবনু উমর যখন হজ বা ওমরাহ করতেন, তখন তিনি তার দাড়ি মুষ্টিবদ্ধ করে ধরতেন এবং যা বেশি হতো তা কেটে নিতেন।

ইমাম মালিকও তাঁর মুওয়াত্ত্বা গ্রন্থে (হজ ১৮৭) নাফে' থেকে বর্ণনা করেছেন যে, আব্দুল্লাহ ইবনু উমর হজ বা ওমরাহর জন্য মাথা মুণ্ডন করার সময় তাঁর দাড়ি ও গোঁফ থেকে কিছু অংশ কেটে নিতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1317)


1317 - عن عائشة قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"عشْر من الفطرة: قص الشارب، وإعفاء اللحية، والسواك، واستنشاق الماء، وقص الأظفار، وغسل البراجم، ونتف الإبط، وحلق العانة، وانتقاص الماء".

قال زكريا: قال مصعب: ونسيتُ العاشرة، إلا أن تكون المضمضة.

زاد ابن قتيبة: قال وكيع: انقاص الماء يعني الاستنجاء.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (261). من حديث وكيع، عن زكريا بن أبي زائدة، عن مصعب بن شيبة، عن طلق بن حبيب، عن عبد اللَّه بن الزبير، عن عائشة فذكرت الحديث.

قلت: هذا الحديث أخرجه أيضًا أحمد (6/ 137) وأصحاب السنن: أبو داود (53) والترمذي (2906) وابن ماجه (293) والنسائي (5040) وقال النسائي بعد أن أخرج الحديث عن إسحاق بن إبراهيم، عن وكيع به مثله. ثم رواه من طريق المعتمر بن سليمان التيمي، عن أبيه سليمان التيمي قال: سمعتُ طلقًا يذكر عشرة من الفطرة، وكذلك رواه من طريق أبي عوانة، عن أبي بشر جعفر بن إياس عن طلق بن حبيب قال: عشرة من السنة ثم قال: حديث سليمان التيمي وجعفر بن إياس أشبه بالصواب من حديث مصعب بن شيبة. ومصعب بن شيبة منكر الحديث". انتهى.

وممن تكلم في هذا الحديث أيضًا الدارقطني في العلل 14/ 89 فرجَّح رواية سليمان التيمي وجعفر بن إياس على رواية مصعب بن شيبة قائلًا: هما أثبت من مصعب بن شيبة، وأصح حديثًا.

ونقل عن أحمد أنه قال: معصب بن شيبة أحاديثه مناكير منها: عشرة من الفطرة.

قال تقي الدين ابن دقيق العيد في الإمام: ولم يلتفت مسلم إلى هذه العلة، لأن مصعبًا عنده ثقة، والثقة إذا وصل حديثًا يقدم وصله على الإرسال". انظر:"نصب الراية" (1/ 76).

وزاد السيوطي في تعليقه على سنن النسائي بعد أن نقل قول تقي الدين. قال: وقد يقال في تقوية رواية مصعب أن تثبته في الفرق بين ما حفظه، وبين ما شك فيه جهة مقوية لعدم الغفلة، ومن لا يُتَّهم بالكذب، إذا ظهر منه ما يدل على التثبت قَوِيتْ روايتُه. وأيضًا لروايته شاهدٌ صحيح مرفوع في كثير من هذا العدد من حديث أبي هريرة أخرجه الشيخان. انتهى.

وقوله:"البراجم" جمع برُجمة، وهي عقد الأصابع ومفاصلها كلها.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দশটি বিষয় ফিতরাতের (স্বাভাবিক প্রকৃতির) অন্তর্ভুক্ত: গোঁফ খাটো করা, দাড়ি লম্বা রাখা (ছাড় দেওয়া), মিসওয়াক করা, নাকে পানি দেওয়া, নখ কাটা, আঙুলের গিঁটগুলো (ব্রাজিম) ধৌত করা, বগলের চুল উপড়ে ফেলা, নাভির নিচের চুল মুণ্ডন করা, এবং পানি দ্বারা পবিত্রতা অর্জন করা।"

যাকারিয়া বলেন, মুসআব বলেছেন: আমি দশম বিষয়টি ভুলে গিয়েছি, সম্ভবত তা হলো কুলি করা (মজমজাহ)।

ইবনু কুতাইবাহ অতিরিক্ত বর্ণনা করেন যে, ওয়াকী’ বলেছেন: ইনতিকাসুল মা (পানি দ্বারা পবিত্রতা অর্জন করা) মানে হলো ইস্তিঞ্জা (শৌচকার্য)।









আল-জামি` আল-কামিল (1318)


1318 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"جُزّوا الشواربَ وأرخُوا اللِّحى؛
خالِفُوا المجوس".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (260). من حديث العلاء بن عبد الرحمن بن يعقوب مولى الحُرَقَةِ، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وقوله:"أرخوا" و"أعفوا" و"أوفوا" معناها: توفيرها.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি বড় করো; তোমরা অগ্নি উপাসকদের (মাগিয়ানদের) বিরোধিতা করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (1319)


1319 - عن أنس قال: وُقِّت لنا في قص الشارب، وتقليم الأظفار، ونتف الإبط، وحلق العانة؛ أن لا تترك أكثر من أربعين يومًا.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (258)، من حديث أبي عمران الجونيِّ، عن أنس فذكر الحديث. وحكمه مرفوع، وقد جاء التصريح بذلك في رواية أبي داود (4200) بقوله:"وقَّتَ لنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. . .".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, মোচ ছোট করা, নখ কাটা, বগলের লোম উপড়ানো এবং নাভির নিচের লোম পরিষ্কার করার জন্য আমাদের সময় নির্ধারণ করে দেওয়া হয়েছিল যে, এগুলো যেন চল্লিশ দিনের বেশি ছাড়া না হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (1320)


1320 - عن المغيرة بن شعبة، قال: ضِفتُ النبي -وفي رواية بالنبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلةٍ، فأمر بجنبٍ فشُوي. قال: فأخذ الشفرة، فجعل يجزُّ لي بها منه. قال: فجاء بلالٌ يؤْذِنه بالصلاة، فألقى الشفرة، وقال:"ما له؟ تربت يداه!" قال المغيرة: وكان شاربي وفَي فقصَّه لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على سواكٍ، أو قال:"أقصُّه لك على سواك".

حسن: رواه أبو داود (188) والترمذي في الشمائل (159) كلاهما من طريق مسعر، عن أبي صخر جامع بن شداد، عن المغيرة بن عبد اللَّه (اليشكري) عن المغيرة بن شعبة فذكر الحديث. واللّفظ لأبي داود، ولفظ الترمذيّ مختصر، ومن هذا الطريق رواه أيضًا الإمام أحمد (18212). وإسناده حسنٌ؛ لأجل المغيرة بن عبد اللَّه اليشكري؛ فهو حسن الحديث، وانظر المزيد من التفصيل في كتاب الوضوء، باب ترك الوضوء مما مسَّته النّار.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মেহমান হলাম—অন্য বর্ণনায় রয়েছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট। তিনি (খাদ্যের জন্য) একটি পশুর পার্শ্বদেশ (গোশত) ভাজার নির্দেশ দিলেন। তিনি (মুগীরাহ) বলেন: এরপর তিনি ছুরি নিলেন এবং তা দিয়ে আমার জন্য তা থেকে কেটে কেটে দিতে লাগলেন। মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এ সময় বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন, তাঁকে সালাতের খবর দিতে। তখন তিনি ছুরিটি ফেলে দিলেন এবং বললেন: "তার কী হলো? তার দু'হাত ধুলায় ধূসরিত হোক!" মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার গোঁফ বড় ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মিসওয়াকের উপরে রেখে আমার জন্য তা ছোট করে দিলেন। অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমার জন্য একটি মিসওয়াকের উপরে তা ছোট করে দেব।"