হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (13348)


13348 - عن الأشعث بن قيس قال: وُلِد لي غلامٌ، فبُشِّرْتُ به وأنا عند النبي صلى الله عليه وسلم فقلت: وددت لكم مكانه قصعة من خبز ولحم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن قلت ذاك، إنهم لَمَبْخَلَةٌ مَجْبَنَةٌ مَحْزَنَةٌ، وإنهم لَثمرة القلوب وقرة العين".
صحيح: رواه الحاكم (4/ 239) عن الحسن بن يعقوب، ثنا محمد بن إسحاق - هو الصغاني -، ثنا أبو عاصم، ثنا سفيان، عن الأعمش، عن خيثمة، عن الأشعث بن قيس، قال: فذكره. وإسناده صحيح. قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين".

تنبيه: وقع في مطبوعة المستدرك:"الحسن بن محمد بن إسحاق، ثنا أبو عاصم"، وصَوَّبْتُه من إتحاف المهرة (1/ 381).

قوله: {فَاتَّقُوا اللَّهَ مَا اسْتَطَعْتُمْ} أي من امتثال أوامره، واجتناب نواهيه، وقيد ذلك بالاستطاعة والقدرة، فهذه الآية تدل على أن كل واجب عجز عنه العبد أنه يسقط عنه، وأنه إذا قدر على بعض المأمور، وعجز عن بعضه فإنه يأتي بما يقدر عليه، ويسقط عنه ما عجز عنه.

وليس بين هذه الآية والآية التي في سورة آل عمران [102]: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ حَقَّ تُقَاتِهِ وَلَا تَمُوتُنَّ إِلَّا وَأَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (102)} مخالفة فإن حق التقوى هو أن يأتي العبد ما قدر عليه، ولا يتهاون فيه.




আশ'আছ ইবনু ক্বাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার একটি পুত্র সন্তান জন্মালো। আমি যখন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট ছিলাম, তখন আমাকে সেই সুসংবাদ দেওয়া হলো। আমি বললাম: আমি চাই, এর পরিবর্তে তোমাদের জন্য এক থালা রুটি ও গোশত থাকুক। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যদি তুমি এমনটি বলো, (তাহলে জেনে রাখো) তারা (সন্তানরা) অবশ্যই কৃপণতার কারণ, ভীরুতার কারণ এবং দুঃখের কারণ। তবে তারা নিঃসন্দেহে হৃদয়ের ফল এবং চোখের শীতলতা (প্রশান্তি)।"









আল-জামি` আল-কামিল (13349)


13349 - عن أبي هريرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ينزل الله في السماء الدنيا لشطر الليل، أو لثلث الليل الآخر، فيقول: من يدعوني فأستجيب له؟ أو يسألني فأعطيه؟ ثم يقول: من يقرض غير عديم ولا ظلوم؟".

وفي رواية:"ثم يبسط يديه تبارك وتعالى يقول: من يقرض غير عدوم ولا ظلوم؟".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (758: 171) عن حجاج بن الشاعر، حدثنا محاضر أبو المورِّع، حدثنا سعد بن سعيد، قال: أخبرني ابن مرجانة، قال: سمعت أبا هريرة، يقول: فذكره.

والرواية الثانية أخرجها مسلم عن هارون بن سعيد الأيلي، حدثنا ابن وهب، قال: أخبرني سليمان بن بلال، عن سعد بن سعيد به.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তা‘আলা রাতের অর্ধেক অতিবাহিত হওয়ার পর অথবা রাতের শেষ তৃতীয়াংশে দুনিয়ার আসমানে অবতরণ করেন এবং বলেন: 'কে আছে যে আমাকে ডাকবে আর আমি তার ডাকে সাড়া দেব? অথবা, কে আছে যে আমার কাছে চাইবে আর আমি তাকে দান করব?' অতঃপর তিনি বলেন: 'কে সেই সত্তাকে ঋণ দেবে যিনি নিঃস্বও নন এবং অত্যাচারীও নন?'"
অন্য বর্ণনায় এসেছে: "অতঃপর তিনি (আল্লাহ) বরকতময় ও সুমহান, তিনি তাঁর দু'হাত প্রসারিত করে বলেন: 'কে সেই সত্তাকে ঋণ দেবে যিনি নিঃস্বও নন এবং অত্যাচারীও নন?'"









আল-জামি` আল-কামিল (13350)


13350 - عن * *




১৩৩৫০ - অন * *









আল-জামি` আল-কামিল (13351)


13351 - عن عبد الله بن عمر أنه طلق امرأته وهي حائض، فذكر عمر لرسول الله صلى الله عليه وسلم، فتغَيَّظَ فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال:"ليراجعها، ثم يمسكها حتى تطهر، ثم تحيض فتطهر، فإن بدا له أن يطلقها فَلْيُطَلِّقْهَا طاهرا قبل أن يَمَسَّها، فتلك العدة كما أمر الله".

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4908) ومسلم في الطلاق (1471: 4) كلاهما من طريق ابن شهاب الزهري، قال: أخبرني سالم بن عبد الله، أن عبد الله بن عمر قال: فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর স্ত্রীকে হায়েয (মাসিক) অবস্থায় তালাক দিয়েছিলেন। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে বিষয়টি উল্লেখ করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এতে খুবই রাগান্বিত হলেন। এরপর তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যেন তাকে ফিরিয়ে নেয়। এরপর তাকে যেন নিজের কাছে রাখে, যতক্ষণ না সে পবিত্র হয়, অতঃপর আবার হায়েযগ্রস্ত হয় এবং আবার পবিত্র হয়। এরপর যদি তার তাকে তালাক দেওয়ার ইচ্ছা হয়, তবে যেন তাকে পবিত্রাবস্থায় স্পর্শ করার পূর্বে তালাক দেয়। এটাই হলো সেই ইদ্দত, যার আদেশ আল্লাহ দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (13352)


13352 - عن ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع عبد الرحمن بن أيمن مولى عزة يسأل ابن عمر - وأبو الزبير يسمع ذلك -: كيف ترى في رجل طلَّق امرأته حائضا؟ فقال: طلَّق ابن عمر امرأته وهي حائض على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فسأل عمر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: إن عبد الله بن عمر طلَّق امرأته وهي حائض. فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"ليراجعها". فردَّها وقال:"إذا طهرت فلْيُطَلِّقْ أو لِيُمْسِكْ". قال ابن عمر: وقرأ النبي صلى الله عليه وسلم: يا أيها النبي إذا طلقتم النساء فطلقوهن في قبل عدتهن.

صحيح: رواه مسلم في الطلاق (1471: 14) عن هارون بن عبد الله، حدثنا حجاج بن محمد، قال ابن جريج، فذكره.

وقوله:"طَلِّقُوهن في قُبُل عدتهن" هي قراءة شاذة، وكأنها تفسير من بعض الصحابة، وإلا فالقراءة المتواترة هي كما في المصحف.



الْآخِرِ وَمَنْ يَتَّقِ اللَّهَ يَجْعَلْ لَهُ مَخْرَجًا (2) وَيَرْزُقْهُ مِنْ حَيْثُ لَا يَحْتَسِبُ وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ إِنَّ اللَّهَ بَالِغُ أَمْرِهِ قَدْ جَعَلَ اللَّهُ لِكُلِّ شَيْءٍ قَدْرًا (3)}

قوله: {وَأَشْهِدُوا ذَوَيْ عَدْلٍ مِنْكُمْ} أي: أشهدوا على الرجعة إذا عزمتم عليها.




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবন জুরাইজ বলেন: আবু যুবাইর আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি আব্দুল রহমান ইবন আইমান, যিনি আযযা’র গোলাম ছিলেন, তাঁকে ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করতে শুনেছেন – আর আবু যুবাইরও তা শুনছিলেন – যে, ‘এমন ব্যক্তি সম্পর্কে আপনার অভিমত কী, যে তার স্ত্রীকে ঋতুমতী অবস্থায় তালাক দিয়েছে?’

তখন তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে ইবন উমর তার স্ত্রীকে ঋতুমতী অবস্থায় তালাক দিয়েছিলেন। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি (উমর) বললেন: আব্দুল্লাহ ইবন উমর তার স্ত্রীকে ঋতুমতী অবস্থায় তালাক দিয়েছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “সে যেন তাকে ফিরিয়ে নেয় (রাজা‘আত করে)।” অতঃপর সে তাকে ফিরিয়ে নিল। আর তিনি (নবী) বললেন: “যখন সে পবিত্র হবে, তখন সে তাকে তালাক দেবে অথবা রেখে দেবে।” ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঠ করলেন: “হে নবী! যখন তোমরা স্ত্রীদের তালাক দেবে, তখন তাদেরকে তাদের ইদ্দতের শুরুতেই তালাক দাও।”









আল-জামি` আল-কামিল (13353)


13353 - عن عمران بن حصين سئل عن الرجل يطلق امرأته، ثم يقع بها، ولم يُشْهِد على طلاقها، ولا على رجعتها، فقال: طلَّقْت لغير سنة، وراجعت لغير سنة، وأَشْهِدْ على طلاقها وعلى رجعتها، ولا تَعُدْ.

حسن: رواه أبو داود (2186) وابن ماجه (2025) كلاهما عن بشير بن هلال الصواف، قال: حدثنا جعفر بن سليمان الضبعي، عن يزيد الرشك، عن مطرف بن عبد الله بن الشخير، أن عمران بن حصين، فذكره.

وإسناده حسن من أجل جعفر بن سليمان الضبعي، فإنه حسن الحديث.

والكلام عليه مبسوط في كتاب الطلاق.

والأمر بالإشهاد هنا للندب، وهو كقوله تعالى: {وَأَشْهِدُوا إِذَا تَبَايَعْتُمْ} [البقرة: 282]، والإشهاد في المبايعة ليس بواجب، فكذلك لا يجب الإشهاد عند الرجعة أو العزم على الفراق.

وقوله: {وَمَنْ يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ} أي: أن الله يحميه ويكفيه، ولو عاداه الناس وخالفوه، وقد جاء في الحديث.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যে তার স্ত্রীকে তালাক দিয়েছে, অতঃপর তার সাথে সহবাস করেছে, কিন্তু সে তার তালাকের ব্যাপারে এবং তার (স্ত্রীকে) ফিরিয়ে নেওয়ার (রজ‘আতের) ব্যাপারে সাক্ষী রাখেনি। তিনি (ইমরান ইবনে হুসাইন) বললেন: তুমি সুন্নাহ পরিপন্থীভাবে তালাক দিয়েছ এবং সুন্নাহ পরিপন্থীভাবে তাকে ফিরিয়ে নিয়েছ। তোমার তালাকের উপর ও তাকে ফিরিয়ে নেওয়ার উপর সাক্ষী রাখো এবং ভবিষ্যতে এমন কাজ আর করো না।









আল-জামি` আল-কামিল (13354)


13354 - عن ابن عباس، قال: كنتُ خلفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم يومًا، فقال:"يا غلام! إنِّي أعلِّمُك كلماتٍ: احفظ الله يحفظك، احفظ الله تجده تُجاهك، إذا سألتَ فاسأل الله، وإذا استعنتَ فاستعن بالله، واعلم أنّ الأمَّة لو اجْتمعت على أن ينفعوك بشيء لم ينفعوك إلّا بشيء قد كتبه الله لك، ولو اجتمعوا على أن يضرّوك بشيء لم يضرّوك إلّا بشيء قد كتبه الله عليك، رُفعتِ الأقلام، وجفَّت الصُّحف".

حسن: رواه الترمذيّ (2516) عن أحمد بن محمد بن موسى، أخبرنا عبد الله بن المبارك، أخبرنا ليث بن سعد وابن لهيعة، عن قيس بن الحجاج، ح. وحدّثنا عبد الله بن عبد الرحمن، أخبرنا أبو الوليد، حدّثنا ليث بن سعد، حدّثني قيس بن الحجاج - المعنى واحد - عن حنش الصنعانيّ، عن ابن عباس، فذكره.

قال الترمذي:"حسن صحيح".

وابن لهيعة قد تُوبع، وقد رواه عنه ابن المبارك، كما رواه أيضًا ابنُ وهب عنه في القدر (28). ورواه الفريابي في القدر (153)، والبيهقيّ في القضاء والقدر (2/ 523) عن اللّيث وحده، بهذا الإسناد.

قلت: إسناده حسن من أجل قيس بن الحجاج - وهو الكلاعي السلفي -.
والكلام عليه مبسوط في كتاب الإيمان.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে ছিলাম, তখন তিনি বললেন: "হে বালক! আমি তোমাকে কয়েকটি গুরুত্বপূর্ণ কথা শিক্ষা দেব: তুমি আল্লাহকে (তাঁর আদেশ-নিষেধের মাধ্যমে) স্মরণ রাখো, আল্লাহ তোমাকে সংরক্ষণ করবেন। তুমি আল্লাহকে স্মরণ রাখো, তুমি তাঁকে তোমার সামনে পাবে। যখন তুমি কিছু চাইবে, তখন আল্লাহর কাছেই চাও; আর যখন তুমি সাহায্য চাইবে, তখন আল্লাহর কাছেই সাহায্য চাও। আর জেনে রাখো, যদি গোটা মানবজাতি একত্রিত হয়ে তোমার কোনো উপকার করতে চায়, তবুও তারা তোমার কোনো উপকার করতে পারবে না, কেবল ততটুকুই করতে পারবে যা আল্লাহ তোমার জন্য লিখে দিয়েছেন। আর যদি তারা একত্রিত হয়ে তোমার কোনো ক্ষতি করতে চায়, তবুও তারা তোমার কোনো ক্ষতি করতে পারবে না, কেবল ততটুকুই করতে পারবে যা আল্লাহ তোমার ওপর লিখে দিয়েছেন। কলম উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে এবং লিখিত ফলকসমূহ শুকিয়ে গেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (13355)


13355 - عن ابن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أصابته فاقة فأنزلها بالناس لم تُسَدَّ فاقته، ومن أنزلها بالله أوشك الله له بالغنى إما بموت عاجل أو غنى عاجل".

حسن: رواه أبو داود (1645) والترمذي (2327) كلاهما من طريق بشير بن سلمان، عن سيار أبي حمزة، عن طارق، عن ابن مسعود، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل سيار أبي حمزة.

والكلام عليه مبسوط في كتاب الزكاة.




ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যার উপর অভাব পতিত হয়, আর সে তা মানুষের কাছে পেশ করে, তার অভাব দূর হয় না। আর যে তা আল্লাহর কাছে পেশ করে, আল্লাহ দ্রুত তাকে সচ্ছলতা দান করেন—হয় দ্রুত মৃত্যুর মাধ্যমে অথবা দ্রুত ধন-সম্পদের মাধ্যমে।"









আল-জামি` আল-কামিল (13356)


13356 - عن أبي سلمة قال: جاء رجل إلى ابن عباس، وأبو هريرة جالس عنده فقال: أفْتِني في امرأة ولدت بعد زوجِها بأربعين ليلة؟ ، فقال ابن عباس: آخر الأجلين. قلت أنا: {وَأُولَاتُ الْأَحْمَالِ أَجَلُهُنَّ أَنْ يَضَعْنَ حَمْلَهُنَّ} قال أبو هريرة: أنا مع ابن أخي، يعني أبا سلمة، فأرسل ابن عباس غلامه كُريبًا إلى أم سلمة يسألها، فقالت: قُتِل زوجُ سُبَيْعة الأسلمية وهي حُبلى، فوضعت بعد موته بأربعين ليلة، فخُطِبتْ، فأنكحَها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وكان أبو السَّنابل فيمن خَطَبَها.

متفق عليه رواه البخاري في التفسير (4909) عن سعد بن حفص، حدثنا شيبان، عن يحيى، قال: أخبرني أبو سلمة، قال: فذكره.

ورواه مسلم في الطلاق (1485) من وجه آخر عن أبي سلمة به نحوه.




আবু সালামা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলো, তখন আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে বসা ছিলেন। সে জিজ্ঞেস করল: এমন এক স্ত্রীলোক সম্পর্কে আমাকে ফাতওয়া দিন, যে তার স্বামী মারা যাওয়ার চল্লিশ রাত পর সন্তান প্রসব করেছে? ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: দুই মেয়াদের দীর্ঘতম মেয়াদটি (তাকে মানতে হবে)। আমি (আবু সালামা) বললাম: (আল্লাহর বাণী হলো,) “আর গর্ভবতী নারীদের মেয়াদ হলো— তারা তাদের গর্ভধারণ শেষ করা পর্যন্ত (সন্তান প্রসব না করা পর্যন্ত)।” আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমার ভাতিজার সাথে আছি— অর্থাৎ আবু সালামা। তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর গোলাম কুরাইবকে উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট জিজ্ঞেস করার জন্য পাঠালেন। তিনি (উম্মু সালামা) বললেন: সুবাই’আহ আল-আসলামিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্বামী নিহত হন, তখন তিনি ছিলেন গর্ভবতী। তার স্বামীর মৃত্যুর চল্লিশ রাত পর তিনি সন্তান প্রসব করেন। এরপর তাকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়া হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বিয়ে দেন (বিবাহের অনুমতি দেন)। আবূস সানাবিল তাকে প্রস্তাবদাতাদের মধ্যে ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (13357)


13357 - عن محمد بن سيرين قال: جلست إلى مجلس فيه عُظْم من الأنصار، وفيهم عبد الرحمن بن أبي ليلى، فذكرتُ حديث عبد الله بن عتبة في شأن سُبيعة بنت الحارث. فقال عبد الرحمن: ولكن عمّه كان لا يقول ذلك، فقلت: إني لجريء إن كذبتُ على رجل في جانب الكوفة، ورفع صوته، قال: ثم خرجتُ، فلقيتُ مالك بن عامر أو مالك بن عوف. قلت: كيف كان قول ابن مسعود في المتوفى عنها زوجُها. وهي حامل؟ فقال: قال ابن مسعود: أتجعلون عليها التغليظَ، ولا تجعلون لها الرخصة؟ لنزلتْ سورةُ النساء القصرى بعد الطولى.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4532) عن حِبَّان، حدثنا عبد الله، أخبرنا عبد الله بن عون، عن محمد بن سيرين، قال: فذكره.

قوله:"القصرى بعد الطولى" أي البقرة.




মুহাম্মদ বিন সিরিন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এমন এক মজলিসে বসলাম যেখানে আনসারদের মধ্য থেকে গণ্যমান্য ব্যক্তিরা উপস্থিত ছিলেন, এবং তাদের মধ্যে ছিলেন আব্দুর রহমান ইবনু আবি লায়লা। সেখানে আমি সুবাইআ বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ব্যাপারে আব্দুল্লাহ ইবনু উতবার বর্ণিত হাদীসটি উল্লেখ করলাম। তখন আব্দুর রহমান বললেন: কিন্তু তার চাচা (ইবনু মাসউদ) তো তা বলতেন না। আমি বললাম: যদি আমি কুফার কোনো লোকের উপর মিথ্যা আরোপ করি, তবে আমি নিশ্চয়ই বড় সাহস দেখিয়েছি! আর তিনি (আব্দুর রহমান) তখন তার আওয়াজ উঁচু করলেন। মুহাম্মদ বিন সিরিন বলেন: এরপর আমি সেখান থেকে বের হলাম এবং মালিক ইবনু আমির অথবা মালিক ইবনু আওফ-এর সাথে দেখা করলাম। আমি জিজ্ঞাসা করলাম: যার স্বামী মারা গেছে এবং সে গর্ভবতী, তার ব্যাপারে ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য কী ছিল? তখন তিনি বললেন: ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: তোমরা কি তাদের জন্য কঠোরতা আরোপ করো, অথচ তাদের জন্য কোনো ছাড় (সুবিধা) দাও না? নিশ্চয়ই দীর্ঘ সূরা (আল-বাক্বারাহ্)-এর পরে ছোট সূরা নিসা (সূরাহ আত-ত্বলাক্বাহ) নাযিল হয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (13358)


13358 - عن محمد بن إبراهيم أن أبا سلمة حدَّثه - وكان بينه وبين قومه خصومة في أرض - وأنه دخل على عائشة فذكر ذلك لها. فقالت: يا أبا سلمة! اجتنب الأرض، فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من ظلم قيد شبر من الأرض طُوِّقَه من سبع أرضين".

متفق عليه: رواه البخاري في المظالم (2453)، ومسلم في المساقاة (1612) كلاهما من طريق يحيى بن أبي كثير، قال: حدثني محمد بن إبراهيم، فذكره، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.

وقوله: {يَتَنَزَّلُ الْأَمْرُ بَيْنَهُنَّ} أي الوحي والتدبير. قال قتادة: في كل أرض من أرضه وسماء من سمائه خلق من خلقه، وأمر من أمره وقضاء من قضائه.

وقوله: {لِتَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ وَأَنَّ اللَّهَ قَدْ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيْءٍ عِلْمًا} أي فلا يخفى عليه شيء.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ সালামাহর সঙ্গে তাঁর কওমের জমি সংক্রান্ত একটি বিবাদ চলছিল। তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে (এ বিষয়টি) উল্লেখ করলে তিনি বললেন: হে আবূ সালামাহ! তুমি ওই জমি এড়িয়ে চলো। কারণ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি এক বিঘত পরিমাণ জমিও যুলুম করে দখল করবে, কিয়ামতের দিন তাকে সাতটি জমিন দ্বারা বেষ্টন করে দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (13359)


13359 - عن * *



بَعْضٍ فَلَمَّا نَبَّأَهَا بِهِ قَالَتْ مَنْ أَنْبَأَكَ هَذَا قَالَ نَبَّأَنِيَ الْعَلِيمُ الْخَبِيرُ (3) إِنْ تَتُوبَا إِلَى اللَّهِ فَقَدْ صَغَتْ قُلُوبُكُمَا وَإِنْ تَظَاهَرَا عَلَيْهِ فَإِنَّ اللَّهَ هُوَ مَوْلَاهُ وَجِبْرِيلُ وَصَالِحُ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمَلَائِكَةُ بَعْدَ ذَلِكَ ظَهِيرٌ (4) عَسَى رَبُّهُ إِنْ طَلَّقَكُنَّ أَنْ يُبْدِلَهُ أَزْوَاجًا خَيْرًا مِنْكُنَّ مُسْلِمَاتٍ مُؤْمِنَاتٍ قَانِتَاتٍ تَائِبَاتٍ عَابِدَاتٍ سَائِحَاتٍ ثَيِّبَاتٍ وَأَبْكَارًا (5)}

تعددت أسباب نزول هذه الآية الكريمة، وأصحها شرب العسل عند زينب.




বর্ণিত আছে যে, ...কিছু অংশ প্রকাশ করে দিলেন। যখন তিনি তাকে তা অবহিত করলেন, তখন সে বলল, ‘কে আপনাকে এ সংবাদ দিল?’ তিনি বললেন, ‘আমাকে অবহিত করেছেন যিনি সর্বজ্ঞ, সর্ববিষয়ে অবহিত। (৩) যদি তোমরা উভয়ে আল্লাহর কাছে তওবা কর, তবে তোমাদের হৃদয় তাঁর প্রতি ঝুঁকে পড়েছে। আর যদি তোমরা তাঁর বিরুদ্ধে ষড়যন্ত্র কর, তবে আল্লাহ্ই তাঁর বন্ধু এবং জিবরীল ও সৎকর্মপরায়ণ মু'মিনগণ। আর এরপর ফেরেশতাগণও তাঁর সাহায্যকারী। (৪) যদি তিনি তোমাদেরকে তালাক দেন, তবে তাঁর রব তাঁকে তোমাদের পরিবর্তে এমন স্ত্রীগণ দিতে পারেন, যারা তোমাদের চেয়ে উত্তম—যারা হবে আত্মসমর্পণকারী, বিশ্বাসী, একান্ত অনুগত, তওবাকারী, ইবাদতকারী, রোযা পালনকারী, অকুমারী ও কুমারী। (৫)}

এই সম্মানিত আয়াতগুলোর নাযিলের কারণ বহু। সেগুলোর মধ্যে সবচেয়ে বিশুদ্ধ কারণ হলো: (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কর্তৃক) যায়নাবের ঘরে মধু পান করা।









আল-জামি` আল-কামিল (13360)


13360 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يمكث عند زينب ابنة جحش ويشرب عندها عسلا، فتواصيت أنا وحفصة أنَّ أيَّتَنا دخل عليها النبي صلى الله عليه وسلم فلتقل: إني أجد فيك ريح مغافير، أكلت مغافير؟ فدخل على إحداهما، فقالت له ذلك، فقال:"بل شربتُ عسلا عند زينب بنت جحش، ولن أعودَ له" فنزلت: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكَ} إلى {إِنْ تَتُوبَا إِلَى اللَّهِ} لعائشة وحفصة.

وفي رواية:"وقد حلفت لا تخبري بذلك أحدا".

متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5267)، ومسلم في الطلاق (1474) كلاهما من حديث حجاج بن محمد، عن ابن جريج، أخبرني عطاء، أنه سمع عبيد بن عمير، يخبر أنه سمع عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري ولفظ مسلم نحوه.

هذه القصة أصح من القصة التي تأتي بعدها.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়নাব বিনতে জাহশের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট অবস্থান করতেন এবং তাঁর কাছে মধু পান করতেন। তখন আমি এবং হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পরামর্শ করলাম যে, আমাদের মধ্যে যার কাছেই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করবেন, সে যেন বলে: "আমি আপনার নিকট মাগাফিরের গন্ধ পাচ্ছি। আপনি কি মাগাফির খেয়েছেন?" অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের দুজনের একজনের নিকট প্রবেশ করলেন, আর সে তাঁকে তাই বলল। তখন তিনি বললেন: "আসলে আমি যায়নাব বিনতে জাহশের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট মধু পান করেছি, আর আমি তা আর কখনো করব না।" তখন এই আয়াতগুলো নাযিল হলো: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكَ} (হে নবী! আল্লাহ আপনার জন্য যা হালাল করেছেন, তা আপনি কেন হারাম করছেন?) হতে {إِنْ تَتُوبَا إِلَى اللَّهِ} (যদি তোমরা উভয়ে আল্লাহর নিকট তাওবা কর) পর্যন্ত। এটি আয়িশা ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে উদ্দেশ্য করে (নাযিল হয়েছিল)। অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আর তিনি কসম করে বলেছিলেন, তুমি এ কথা কাউকে বলবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (13361)


13361 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحب العسل والحلواء، وكان إذا انصرف من العصر دخل على نسائه فيدنو من إحداهن، فدخل على حفصة بنت عمر فاحتبس أكثر ما كان يحتبس فغِرتُ فسألتُ عن ذلك، فقيل: أهدت لها امرأة من قومها عُكّةً من عسل، فسقت النبي صلى الله عليه وسلم منه شربة، فقلتُ: أما والله! لنحتالن له، فقلتُ لسودة بنت زمعة: إنه سيدنو منك، فإذا دنا منك فقولي: أكلتَ مغافير؟ فإنه سيقول لك: لا، فقولي له: ما هذه الريح التي أجد منك؟ فإنه سيقول لك: سقتني حفصة شربة عسل، فقولي له: جرست نحلة العرفط، وسأقولُ ذلك وقولي أنتِ يا صفية ذاك. قالت: تقول سودة فوالله! ما هو إلا أن قام على الباب فأردتُ أن أباديه بما أمرتني به فرقا منك، فلما دنا منها قالت له سودة: يا رسول الله أكلت مغافير؟ قال:"لا". قالت: فما هذه الريح التي أجد منك؟ قال:"سقتني حفصة شربة عسل" فقالت: جرست نحلة العرفط، فلما دار إلي قلت له نحو ذلك، فلما دار إلى صفية قالت له مثل ذلك، فلما دار إلى حفصة قالت: يا رسول الله! ألا أسقيك منه؟ قال:"لا حاجة لي فيه" قالت:
تقول سودة: والله! لقد حرَمناه، قلت لها: اسكتي.

متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5268) ومسلم في الطلاق (1474: 21) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: فذكرته، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.

قصة شرب العسل عند زينب كما مضى أصح من هذه القصة مع صحة إسناده، فلعل القصة انقلبت على بعض الرواة، لأن الله تعالى يقول: ، هما اثنتان لا ثلاثة، كما أن أزواج النبي صلى الله عليه وسلم كن في حزبين، فعائشة وحفصة وصفية وسودة في حزب، وزينب وأم سلمة والباقيات في حزب.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মধু ও মিষ্টি পছন্দ করতেন। তিনি আসরের সালাতের পর যখন (কাজ থেকে) ফিরতেন, তখন তাঁর স্ত্রীদের কাছে যেতেন এবং তাদের কারো কারো নিকটে আসতেন। (একদিন) তিনি হাফসাহ বিনতে উমারের নিকট প্রবেশ করলেন এবং সেখানে তিনি (অন্যান্য দিনের) চেয়ে বেশি সময় অবস্থান করলেন। এতে আমি ঈর্ষান্বিত হলাম এবং এর কারণ জানতে চাইলাম। আমাকে বলা হলো: তাঁর কওমের এক মহিলা তাঁকে মধুর একটি পাত্র উপহার দিয়েছে। তিনি (হাফসাহ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তা থেকে এক পানীয় (এক চুমুক) পান করিয়েছেন। আমি (তখন মনে মনে) বললাম: আল্লাহর কসম! আমরা অবশ্যই তাঁর জন্য একটি কৌশল অবলম্বন করব। আমি সাওদাহ বিনতে যাম‘আকে বললাম: তিনি শীঘ্রই তোমার কাছে আসবেন। যখন তিনি তোমার কাছে আসবেন, তখন তুমি তাঁকে বলবে: আপনি কি মাগাফীর (এক প্রকার দুর্গন্ধযুক্ত আঠা) খেয়েছেন? তখন তিনি তোমাকে বলবেন: না। তখন তুমি তাঁকে বলবে: আপনার কাছ থেকে আমি যে গন্ধ পাচ্ছি, তা কীসের? তখন তিনি তোমাকে বলবেন: হাফসাহ আমাকে এক চুমুক মধু পান করিয়েছে। তখন তুমি তাঁকে বলবে: সম্ভবত এর মৌমাছি ‘উরফুত’ (এক প্রকার দুর্গন্ধযুক্ত গাছ) থেকে খেয়েছে। আমিও তাঁকে এই কথা বলব এবং হে সাফিয়্যাহ! তুমিও তাঁকে এই কথা বলবে।

(আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বলেন, সাওদাহ বললেন: আল্লাহর কসম! তিনি দরজায় দাঁড়াতেই আমি তোমার নির্দেশের কারণে ভীত হয়ে তাকে দ্রুত তোমার বলা কথাটি বলতে চাইলাম। যখন তিনি সাওদাহর নিকটবর্তী হলেন, সাওদাহ তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি মাগাফীর খেয়েছেন? তিনি বললেন: “না।” সাওদাহ বললেন: আপনার কাছ থেকে আমি যে গন্ধ পাচ্ছি তা কীসের? তিনি বললেন: “হাফসাহ আমাকে এক চুমুক মধু পান করিয়েছে।” সাওদাহ বললেন: (সম্ভবত) এর মৌমাছি ‘উরফুত’ থেকে খেয়েছে। যখন তিনি আমার কাছে আসলেন, তখন আমিও তাঁকে একই রকম কথা বললাম। যখন তিনি সাফিয়্যাহর কাছে আসলেন, তখন তিনিও তাঁকে অনুরূপ কথা বললেন। এরপর যখন তিনি হাফসাহর নিকট গেলেন, হাফসাহ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি আপনাকে তা থেকে পান করাব না? তিনি বললেন: “আমার এতে কোনো প্রয়োজন নেই।” (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বলেন, সাওদাহ বললেন: আল্লাহর কসম! আমরা তাঁকে বঞ্চিত করে দিয়েছি। আমি তাকে বললাম: চুপ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (13362)


13362 - عن أنس قال: قال عمر: وافقت ربي في ثلاث. فقلت: يا رسول الله! لو اتخذنا من مقام إبراهيم مصلى، فنزلت: {وَاتَّخِذُوا مِنْ مَقَامِ إِبْرَاهِيمَ مُصَلًّى} [البقرة: 125] وآية الحجاب، قلت: يا رسول الله! لو أمرت نساءك أن يحتجبن، فإنه يكلمهن البر والفاجر، فنزلت آية الحجاب، واجتمع نساء النبي صلى الله عليه وسلم في الغيرة عليه، فقلت لهن: {عَسَى رَبُّهُ إِنْ طَلَّقَكُنَّ أَنْ يُبْدِلَهُ أَزْوَاجًا خَيْرًا مِنْكُنَّ} فنزلت هذه الآية.

صحيح: رواه البخاري في الصلاة (402) عن عمرو بن عون، ثنا هشيم، عن حميد، عن أنس قال: فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তিনটি বিষয়ে আমি আমার রবের সাথে ঐক্যমত পোষণ করেছিলাম। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আমরা মাকামে ইবরাহীমকে সালাতের স্থান হিসেবে গ্রহণ করতাম! তখন আয়াত নাযিল হলো: {তোমরা মাকামে ইবরাহীমকে সালাতের স্থান রূপে গ্রহণ করো।} [সূরা বাকারা: ১২৫]। (দ্বিতীয়ত,) পর্দার আয়াত। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আপনি আপনার স্ত্রীদেরকে পর্দার নির্দেশ দিতেন! কেননা তাদের সাথে নেককার ও পাপাচারী উভয়ই কথা বলে। তখন পর্দার আয়াত নাযিল হলো। আর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীগণ তাঁর প্রতি ঈর্ষান্বিত হয়ে একত্র হলেন, তখন আমি তাদেরকে বললাম: {যদি তিনি তোমাদেরকে তালাক দেন, তবে তার রব সম্ভবত তোমাদের চেয়ে উত্তম স্ত্রী তাঁকে দিবেন}। তখন এই আয়াত নাযিল হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (13363)


13363 - عن عبد الله بن عباس قال: مكثت سنة وأنا أريد أن أسأل عمر بن الخطاب عن آية، فما أستطيع أن أسأله هيبة له، حتى خرج حاجا، فخرجت معه، فلما رجع فكنا ببعض الطريق عدل إلى الأراك لحاجة له، فوقفت له حتى فرغ، ثم سرت معه، فقلت: يا أمير المؤمنين! من اللتان تظاهرتا على رسول الله صلى الله عليه وسلم من أزواجه؟ فقال: تلك حفصة وعائشة. قال: فقلت له: والله! إن كنت لأريد أن أسألك عن هذا منذ سنة فما أستطيع هيبة لك. قال: فلا تفعل، ما ظننت أن عندي من علم فسلني عنه، فإن كنت أعلمه أخبرتك. قال: وقال عمر: والله! إن كنا في الجاهلية ما نعد للنساء أمرا حتى أنزل الله تعالى فيهن ما أنزل، وقسم لهن ما قسم. قال: فبينما أنا في أمر أأتمره إذ قالت لي امرأتي: لو صنعت كذا وكذا، فقلت لها: وما لك أنت ولما ها هنا؟ وما تكلفك في أمر أريده؟ فقالت لي: عجبا لك يا ابن الخطاب! ما تريد أن تراجع أنت، وإن ابنتك لتراجع رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى يظل يومه غضبان. قال عمر: فآخذ ردائي ثم أخرج مكاني، حتى أدخل على حفصة، فقلت لها: يا بنية! إنك لتراجعين رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى يظل يومه غضبان. فقالت حفصة: والله! إنا لنراجعه. فقلت: تعلمين أني أحذرك عقوبة الله وغضب رسوله. يا بنية! لا يغرنك هذه التي قد أعجبها حسنها
وحب رسول الله صلى الله عليه وسلم إياها. ثم خرجت حتى أدخل على أم سلمة لقرابتي منها فكلمتها، فقالت لي أم سلمة: عجبا لك يا ابن الخطاب! قد دخلت في كل شيء، حتى تبتغي أن تدخل بين رسول الله صلى الله عليه وسلم وأزواجه. قال: فأخذتني أخذا كسرتني عن بعض ما كنت أجد، فخرجت من عندها، وكان لي صاحب من الأنصار، إذا غبت أتاني بالخبر، وإذا غاب كنت أنا آتيه بالخبر، ونحن حينئذ نتخوف ملكا من ملوك غسان، ذكر لنا أنه يريد أن يسير إلينا، فقد امتلأت صدورنا منه، فأتى صاحبي الأنصاري يدق الباب، وقال: افتح افتح. فقلت: جاء الغساني، فقال: أشد من ذلك، اعتزل رسول الله صلى الله عليه وسلم أزواجه. فقلت: رغم أنف حفصة وعائشة. ثم آخذ ثوبي فأخرج حتى جئت، فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم في مشربة له يُرتَقى إليها بعجلة، وغلام لرسول الله صلى الله عليه وسلم أسود على رأس الدرجة، فقلت: هذا عمر. فأذن لي. قال عمر: فقصصت على رسول الله صلى الله عليه وسلم هذا الحديث، فلما بلغت حديث أم سلمة تبسم رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإنه لعلى حصير ما بينه وبينه شيء، وتحت رأسه وسادة من أدم حشوها ليف، وإن عند رجليه قرظا مضبورا، وعند رأسه أهبا معلقة، فرأيت أثر الحصير في جنب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبكيت فقال:"ما يبكيك؟". فقلت: يا رسول الله! إن كسرى وقيصر فيما هما فيه، وأنت رسول الله؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أما ترضى أن تكون لهما الدنيا ولك الآخرة".

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4913) ومسلم في الطلاق (1479: 31) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، عن يحيى، أخبرني عبيد بن حنين، أنه سمع عبد الله بن عباس، يحدِّث، قال: فذكره، والسياق لمسلم. ومنها تحريم التسرية، وهي رواية مرجوحة.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক বছর যাবৎ অবস্থান করছিলাম, আর আমি চাইছিলাম যে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি আয়াত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করব। কিন্তু তাঁর প্রতি শ্রদ্ধার কারণে আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করতে পারছিলাম না। অবশেষে তিনি হজ্জে বের হলেন, আমি তাঁর সাথে বের হলাম। যখন তিনি ফিরলেন, আর আমরা পথে কিছুটা দূরত্ব অতিক্রম করেছি, তখন তিনি তার প্রয়োজন পূরণের জন্য আরাক (পী'লু গাছ)-এর দিকে সরে গেলেন। আমি তাঁর জন্য অপেক্ষা করলাম যতক্ষণ না তিনি অবসর হলেন। তারপর আমি তাঁর সাথে চলতে শুরু করলাম এবং বললাম: হে আমীরুল মুমিনীন! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর স্ত্রীদের মধ্যে কোন দুজন তাঁর বিরুদ্ধে একাট্টা হয়েছিলেন? তিনি বললেন: তারা হলেন হাফসা ও আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁকে বললাম: আল্লাহর কসম! আমি এক বছর ধরে আপনাকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করতে চাচ্ছিলাম, কিন্তু আপনার প্রতি শ্রদ্ধার কারণে পারছিলাম না। তিনি বললেন: এমন করো না। আমার কাছে কোনো জ্ঞান আছে বলে তোমার মনে হলে, সে সম্পর্কে আমাকে জিজ্ঞাসা করো। যদি আমি তা জানি, তবে তোমাকে জানাব।

উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! জাহিলিয়াতের যুগে আমরা নারীদের কোনো গুরুত্বই দিতাম না, যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা তাদের সম্পর্কে যা অবতীর্ণ করার তা অবতীর্ণ করলেন এবং তাদের জন্য যা নির্ধারণ করার তা নির্ধারণ করলেন।

তিনি (উমার) বললেন: আমি কোনো বিষয়ে পরামর্শ করছিলাম, এমন সময় আমার স্ত্রী আমাকে বললেন: যদি আপনি এমনটি করতেন! আমি তাকে বললাম: এর সাথে তোমার কী সম্পর্ক? আমি যে বিষয়টি চাইছি, তাতে তোমার হস্তক্ষেপ কেন? সে বলল: আপনার জন্য অবাক লাগে, হে ইবনুল খাত্তাব! আপনি চান না যে আপনার সাথে কেউ তর্ক করুক, অথচ আপনার মেয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে তর্ক করে, এমনকি সারাদিন তিনি রাগান্বিত থাকেন।

উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমি আমার চাদর নিলাম এবং তৎক্ষণাৎ বের হয়ে গেলাম, এমনকি আমি হাফসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে প্রবেশ করলাম। আমি তাকে বললাম: হে আমার মেয়ে! তুমি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে তর্ক করো, যার ফলে তিনি সারাদিন রাগান্বিত থাকেন? হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমরা অবশ্যই তাঁর সাথে তর্ক করি। আমি বললাম: তুমি জানো যে আমি তোমাকে আল্লাহর শাস্তি ও তাঁর রাসূলের রাগ সম্পর্কে সতর্ক করছি। হে আমার মেয়ে! যার সৌন্দর্য এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর ভালোবাসা তাকে মুগ্ধ করেছে, সে যেন তোমাকে প্রতারিত না করে।

তারপর আমি বের হলাম এবং উম্মু সালামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম, কারণ তিনি আমার নিকটাত্মীয়া ছিলেন। আমি তাঁর সাথে কথা বললাম। তখন উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: আপনার জন্য অবাক লাগে, হে ইবনুল খাত্তাব! আপনি সব বিষয়ে হস্তক্ষেপ করেছেন, এমনকি এখন আপনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এবং তাঁর স্ত্রীদের মাঝেও হস্তক্ষেপ করতে চাইছেন?

তিনি (উম্মু সালামাহ্) এমনভাবে আমাকে ধরলেন যে তিনি আমার কিছুটা দম্ভ চূর্ণ করে দিলেন। আমি তাঁর কাছ থেকে বের হলাম। আমার একজন আনসার সাথী ছিল। আমি অনুপস্থিত থাকলে সে আমাকে খবর দিত, আর সে অনুপস্থিত থাকলে আমি তাকে খবর দিতাম। আমরা তখন গাসসান গোত্রের বাদশাহদের একজনের আক্রমণের ভয়ে ছিলাম। আমাদের কাছে খবর এসেছিল যে সে আমাদের দিকে অগ্রসর হতে চায়। তাই আমাদের মন তার ভয়ে পূর্ণ ছিল। তখন আমার আনসারী সাথী এসে দরজায় আঘাত করতে লাগল এবং বলল: দরজা খুলুন, খুলুন। আমি বললাম: গাসসানী এসে গেছে নাকি? সে বলল: তার থেকেও কঠিন কিছু! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর স্ত্রীদের থেকে আলাদা হয়ে গেছেন। আমি বললাম: হাফসা ও আয়িশার নাক ধূলায় মলিন হোক।

তারপর আমি আমার কাপড় নিলাম এবং বের হলাম, এমনকি সেখানে পৌঁছলাম। দেখলাম রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর একটি মাশ্‌রুবাহ (উঁচু ঘর)-এর মধ্যে আছেন, যেখানে মই দিয়ে উঠতে হয়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর একজন কালো বালক খাদেম সিঁড়ির মাথায় ছিল। খাদেম বলল: ইনি উমার। অতঃপর সে আমাকে অনুমতি দিল। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এই হাদিসটি বর্ণনা করলাম। যখন আমি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা বলা শেষ করলাম, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মৃদু হাসলেন।

আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি চাটাইয়ের উপর শুয়ে ছিলেন, যার মাঝে আর তাঁর মাঝে কিছু ছিল না। তাঁর মাথার নিচে চামড়ার একটি বালিশ ছিল, যা খেজুরের ছাল (আঁশ) দিয়ে ভরা ছিল। তাঁর পায়ের কাছে কিছু চামড়া স্তূপ করা ছিল এবং মাথার কাছে ঝুলানো কিছু চামড়া ছিল। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর পার্শ্বদেশে চাটাইয়ের দাগ দেখলাম। তখন আমি কেঁদে উঠলাম। তিনি বললেন: "তোমাকে কিসে কাঁদাচ্ছে?" আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! কিসরা (পারস্য সম্রাট) ও কাইসার (রোম সম্রাট) তাদের ভোগ-বিলাসের মধ্যে রয়েছে, আর আপনি আল্লাহর রাসূল? তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, তাদের জন্য দুনিয়া এবং তোমার জন্য আখিরাত?"।









আল-জামি` আল-কামিল (13364)


13364 - عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كانت له أمة يطأها، فلم تزل به عائشة وحفصة حتى حرَّمها على نفسه، فأنزل الله عز وجل: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ}.

صحيح: رواه النسائي (3959) عن إبراهيم بن يونس بن محمد حرمي - هو لقبه - قال: ثنا أبي، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت عن أنس، فذكره.

وإسناده صحيح، والأمة هي مارية القبطية أم إبراهيم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন দাসী ছিলেন, যার সাথে তিনি সহবাস করতেন। কিন্তু আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে (রাসূলুল্লাহকে) এত পীড়াপীড়ি করতে থাকলেন যে, তিনি তাকে নিজের জন্য হারাম করে নিলেন। তখন আল্লাহ তা‘আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "হে নবী! আল্লাহ আপনার জন্য যা হালাল করেছেন, তা আপনি কেন হারাম করছেন?"









আল-জামি` আল-কামিল (13365)


13365 - عن عمر قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم لحفصة:"لا تخبري أحدا، وإن أم إبراهيم عليَّ حرام" فقالت: أتحرِّم ما أحل الله لك؟ قال:"فوالله! لا أقربها" قال: فلم يقربها حتى أخبرت عائشة. قال: فأنزل الله: {قَدْ فَرَضَ اللَّهُ لَكُمْ تَحِلَّةَ أَيْمَانِكُمْ}.

حسن: رواه الهيثم بن كليب في مسنده - كما ذكره ابن كثير في تفسيره - عن أبي قلابة عبد
الملك بن محمد الرقاشي، حدثنا مسلم بن إبراهيم، حدثنا جرير بن حازم، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، عن عمر، قال: فذكره.

ورواه الضياء في المختارة (189) من طريق الهيثم بن كليب الشاشي به نحوه.

وإسناده حسن من أجل أبي قلابة عبد الملك بن محمد الرقاشي، فإنه حسن الحديث.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তুমি কাউকে এ কথা জানাবে না, আর নিশ্চয়ই উম্মু ইবরাহীম (মারিয়া কিবতিয়া) আমার জন্য হারাম।" তখন হাফসা বললেন: আল্লাহ আপনার জন্য যা হালাল করেছেন, আপনি কি তা হারাম করছেন? তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি তার নিকটবর্তী হব না।" বর্ণনাকারী বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নিকটবর্তী হলেন না, যতক্ষণ না হাফসা বিষয়টি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জানালেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াত নাযিল করলেন: {ক্বাদ ফারাদাল্লাহু লাকুম তাহিল্লাতা আইমানিকুম} - "আল্লাহ তোমাদের কসমের কাফফারা দেওয়ার বিধান দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (13366)


13366 - عن ابن عباس: {يَاأَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَا أَحَلَّ اللَّهُ لَكَ} قال: نزلت هذه في سُرِّيَّته.

حسن: رواه البزار (4946) واللفظ له، والطبراني في الكبير (11/ 86) كلاهما من طرق، عن عبد الله بن رجاء، عن إسرائيل، عن مسلم - وهو ابن عمران البطين -، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن رجاء وهو الغُداني، فإنه حسن الحديث.

والخلاصة فيه لا يمنع أن تكون هذه الأسباب جميعا سببا لنزول آية التحريم. وبه قال بعض المفسرين. وإنْ كان أصحها: شرب العسل عند زينب من حديث حجاج بن محمد، عن ابن جريج، كما سبق.

قال النسائي: إسناد حديث حجاج صحيح جيد غاية.

وقال الأصيلي: حديث حجاج أصح.

وهو أولى بظاهر الكتاب، وأكمل فائدة، قاله القاضي. انظر: شرح مسلم للنووي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ‘‘হে নবী! আল্লাহ আপনার জন্য যা হালাল করেছেন, আপনি কেন তা হারাম করছেন?’’ তিনি বলেন, এটি (এই আয়াত) তাঁর দাসীর (বা বাঁদির) ব্যাপারে নাযিল হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (13367)


13367 - عن ابن عباس قال: إذا حرَّم الرجل عليه امرأته، فهي يمين يكفِّرها، وقال: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} [الأحزاب: 21]

متفق عليه: رواه البخاري في الطلاق (5266) ومسلم في الطلاق (1473: 19) كلاهما من طريق معاوية - يعني ابن سلام -، عن يحيى بن أبي كثير، أن يعلى بن حكيم، أخبره أن سعيد بن جبير، أخبره أنه سمع ابن عباس، قال: فذكره، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন কোনো ব্যক্তি তার স্ত্রীকে নিজের জন্য হারাম করে নেয়, তখন তা একটি শপথ (ইয়ামিন), যার কাফফারা তাকে আদায় করতে হবে। তিনি আরও বললেন: "নিশ্চয় তোমাদের জন্য রয়েছে আল্লাহর রাসূলের মধ্যে উত্তম আদর্শ।" [সূরা আল-আহযাব: ২১]