হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1341)


1341 - عن عائشة قالت: إن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا خرج من الغائط قال:"غفرانك".

حسن: رواه أبو داود (30) والترمذي (7) وابن ماجه (300) كلهم من طريق إسرائيل بن يونس، عن يوسف بن أبي بردة، عن أبيه، عن عائشة.

قال الترمذي:"حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث إسرائيل عن يوسف بن أبي بردة". وقال أيضًا:"ولا نعرف في هذا الباب إلا حديث عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم".

وإسناده حسن من أجل يوسف بن أبي بردة، ليس بذاك المشهور ولم يعرف فيه جرح وقد وثّقه العجلي وابن حبان.

وصحّح حديثه النّووي في الأذكار، والحافظ في نتائج الأفكار (1/ 214).

ووثقه أيضًا الذّهبي في الكاشف، فهو في أقل أحواله لا ينزل عن درجة"صدوق" وإن قال الحافظ ابن حجر في التقريب:"مقبول".

وقد صحّحه أيضًا ابن خزيمة (90)، وابن حبان (1444)، والحاكم (1/ 158)، كلّهم من هذا الوجه. قال الحاكم:"هذا حديث صحيح، فإنَّ يوسف بن أبي بردة من ثقات آل أبي موسى، ولم نجد أحدًا يطعن فيه، وقد ذكر سماع أبيه من عائشة رضي الله عنها ..

وأما قول الترمذي: إنه غريب؛ فلأجل انفراد إسرائيل به، وإسرائيل ثقة.

وقوله"غفرانك" أي: أسألك غفرانك.

قال الخطابي:"وقيل في تأويل ذلك وفي تعقيبه الخروج من الخلاء بهذا الدعاء قولان: أحدهما: أنه استغفر من تركهـ ذكر الله تعالى مدة لبثه على الخلاء، وكان لا يهجر ذكر الله إلا عند الحاجة، فكأنه رأى هجران الذكر في تلك الحالة تقصيرًا، وعدّه على نفسه ذنبًا، فتداركهـ بالاستغفار.

وقيل: معناه التوبة من تقصيره في شكر النعمة التي أنعم الله تعالى بها عليه، فأطعمه ثم هضمه، ثم سهل خروج الأذى منه، فرأى شكره قاصرا عن بلوغ حق هذه النعم، ففزع إلى الاستغفار منه" انتهى.
ولم يثبت في هذا الباب إلا حديث عائشة.

قال أبو حاتم الرازي: أصحّ ما في الباب حديث عائشة.

قلت: وهو كما قال، وأما حديث مالك بن أنس عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه إذا خرج من الخلاء قال:"الحمد لله الذي أذهب عنّي الأذى وعافاني" رواه ابن ماجه (301) من طريق إسماعيل بن مسلم، عن الحسن وقتادة، عن أنس.

فقد قال البوصيري في الزوائد: إسماعيل بن مسلم متفق على تضعيفه، والحديث بهذا اللفظ غير ثابت. انتهى.

قلت: إسماعيل بن مسلم هو: المكي أبو إسحاق، كان من البصرة، ثم سكن مكة، قال ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم وأبو زرعة: ضعيف الحديث، وقال النسائي: متروك.

وفي الباب أيضًا حديث أبي ذر، أخرجه ابن السني (21)، وفيه من لا يعرف، وحديث عبد الله بن عمر قال المنذري في مختصر سنن أبي داود: هذه الأحاديث أسانيدها ضعيفة، ولهذا قال أبو حاتم الرازي: أصح ما فيه حديث عائشة. انتهى




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন শৌচাগার থেকে বের হতেন, তখন তিনি বলতেন: "গূফরানাকা" (আমি আপনার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি)।









আল-জামি` আল-কামিল (1342)


1342 - عن عبد الله بن أرقم أنه كان يؤمُّ أصحابه، فحضرت الصلاة يومًا، فذهب لحاجته ثم رجع، فقال: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا أراد أحدكم الغائط فليبدأ به قبل الصلاة".

صحيح: رواه مالك في قصر الصلاة في السفر (49) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبد الله بن الأرقم، فذكر الحديث.

وفي السنن:"إذا أراد أحدكم الغائط، وأقيمت الصلاة، فليبدأ به"؛ أبو داود (88) والترمذي (142) والنسائي (2/ 110) وابن ماجه (616) كلهم من طريق هشام بن عروة به، قال الترمذي:"حدث عبد الله بن أرقم حسن صحيح". وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة (932)، وابن حبان (2071)، والحاكم (1/ 168) كلهم من هذا الوجه. وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.




আব্দুল্লাহ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর সাথীদের ইমামতি করতেন। একদিন নামাযের সময় উপস্থিত হলে তিনি তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজনে গেলেন এবং ফিরে এসে বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যখন তোমাদের কেউ শৌচকার্য (প্রাকৃতিক প্রয়োজন) সম্পন্ন করার ইচ্ছা করে, তখন সে যেন নামাযের আগে তা দিয়ে শুরু করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (1343)


1343 - عن عائشة قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا صلاة بحضرة الطعام، ولا وهو يُدافعه الأخْبثان".

صحيح: رواه مسلم في كتاب المساجد (560) عن يعقوب بن مجاهد، عن ابن أبي عتيق، قال: تحدثتُ أنا والقاسم عند عائشة حديثًا. وكان القاسم رجلًا لحَّانةً. وكان لأم ولد. فقالت له عائشة: ما لك لا تَحَدَّثُ كما يتحدثُ ابن أخي هذا؟ أَمَا إنِّي قد علمتُ من أين أُتِيت. هذا أدَّيته أُمُّه وأنت أدَّبتك أُمُّك. قال: فغضب القاسم وأضَبَّ عليها. فلما رأى مائدة عائشة قد أُتي بها قام.
قالت: أين؟ قال: أصلَّي. قالت: اجْلِسْ. قال: إنِّي أُصلَّي. قالت: اجْلِسْ غُدَرُ. إني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول. فذكرت الحديث.

ورواه أبو حَزْرة القاصُّ عن عبد الله بن أبي عتيق، عنها، عن النبي صلى الله عليه وسلم بمثله. وقوله:"لحانة" أي: كثير اللحن في كلامه.

قولُها:"اجلس غُدَر" بمعني غادر، ويقال في أسلوب النداء: فحسب يا غُدر للواحد، ويا آل غُدَر للجمع. والغَدْرُ تركُ الوفاء، وإنما قالت له: غُدر لأنَّه مأمور باحترامها لأنها أم المؤمنين، وعمته، وأكبر منه، وناصحة له، ومُؤدِّبة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "খাদ্য উপস্থিত থাকা অবস্থায় কোনো সালাত নেই, এবং সালাত নেই এমন অবস্থায় যখন কেউ দুটি অমেধ্য বস্তুকে (প্রস্রাব ও পায়খানা) প্রতিহত করতে থাকে।"

(এই হাদীসের বর্ণনাসূত্রে আরও এসেছে যে) ইবনু আবী আতিক বলেন: আমি এবং কাসিম আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে একটি বিষয়ে আলাপ করছিলাম। কাসিম এমন একজন লোক ছিলেন, যিনি তাঁর কথায় ভুল করতেন (لحَّانة)। তিনি ছিলেন উম্মু ওয়ালাদের (দাসী) পুত্র। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: কী হলো তোমার, তুমি তোমার এই ভাতিজার মতো করে কথা বলছো না কেন? আমি অবশ্যই জানি যে, তুমি কোত্থেকে এমন হচ্ছ। একে (ভাতিজাকে) তার মা ভালোভাবে শিখিয়েছেন, আর তোমাকে শিখিয়েছেন তোমার মা (দাসী)। বর্ণনাকারী বলেন: এতে কাসিম রাগান্বিত হলেন এবং আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি কিছুটা বিরক্ত হলেন। যখন তিনি দেখলেন যে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খাবারের দস্তরখান আনা হয়েছে, তখন তিনি উঠে দাঁড়ালেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: কোথায় যাচ্ছো? তিনি বললেন: আমি সালাত আদায় করব। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বসো। কাসিম বললেন: আমি সালাত আদায় করব। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বসো, হে বিশ্বাসঘাতক (গুদর)! আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি (এই বলে তিনি উক্ত হাদীসটি উল্লেখ করলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (1344)


1344 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يقوم أحدكم إلى الصلاة وبه أذى".

صحيح: رواه ابن ماجه (618) عن أبي بكر بن أبي شيبة، وهو في مصنفه (2/ 422) ثنا أبو أسامة، عن إدريس الأوْدي، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وصححه ابن حبان، فأخرجه في صحيحه (2072) من طريق إدريس بن يزيد الأودي به، ولفظه:"لا يُصلَّ أحدكم وهو يُدافِعه الأخبثان".

قال البوصيري في زوائد ابن ماجه: رجال إسناده ثقات.

قلت: وهو كما قال. وأبو أسامة هو: حماد بن أسامة القرشي مولاهم الكوفي، مشهور بكنيته، ثقة ثبت ربما دلس، كما قال الحافظ.

وإدريس هو ابن يزيد بن عبد الرحمن الأودي الزعافري، وثَّقه ابن معين والنسائي.

والحديث في مصنف ابن أبي شيبة (2/ 422).

وقوله"أذى" أي: حاجة للبول والبراز. كما جاء تفسيره في مسند الإمام أحمد (9697، 10094) من طريق دارد، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر مثله. وقال في آخر الحديث: يعني البول والغائط إلا أن داود - وهو ابن يزيد بن عبد الرحمن الأودي ضعيف، ضعفَّه الإمام أحمد وأبو داود والنسائي وغيرهم.

أما ما روي عن أبي هريرة بلفظ:"لا يحل لرجل يؤمن بالله واليوم الآخر أن يصلي وهو حقِن حتى يتخفف …" رواه أبو داود (91)، قال: حدثنا محمود بن خالد السُلمي، قال: حدثنا أحمد بن علي، قال: حدثنا ثور، عن يزيد بن شُريح الحضّرمي، عن أبي حيّ المؤذَّن، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحل لرجل يؤمن بالله واليوم الآخر أن يصلي وهو حَقِن حتى يتخفَّف، ثم ساق نحوه. (أي نحو حديث ثوبان الذي ذكره أبو داود قبله، وهو):"ولا يحلّ لرجل يؤمن بالله واليوم الآخر أن يؤُمَّ قومًا إلا بإذنهم، ولا يختصّ نفسه بدعوةٍ دونهم؛ فإن فعل فقد خانهم".

ففيه يزيد بن شريح الحضرمي، ذكره ابن حبان في الثقات، وقال الدارقطني: يعتبر به. وجعله الحافظ في مرتبة"مقبول" أي: حيث يتابع، وقد توبع فيما سبق متابعة قاصرة في الجزء الأول من الحديث.
ورُوي أيضًا عن ثوبان مثله، رواه أبو داود (90) والترمذي (357) كلاهما من طريق إسماعيل بن عياش، وابن ماجه (619) من طريق بقية كلاهما عن حبيب بن صالح، عن يزيد بن شريح، عن أبي حي المؤذن، عن ثوبان، ولفظه:"ثلاث لا يحل لأحد أن يفعلهُنَّ: لا يؤُمّ رجلٌ قومًا فيخصّ نفسه بالدعاء دونهم؛ فإن فعل فقد خانهم، ولا ينظر في قعر بيت قبل أن يستأذن؛ فإن فعل فقد دخل، ولا يصلي وهو حقِن حتى ينخفَّف".

وإسماعيل وبقية ضعيفان، وشريح مقبول، إلا أن الترمذي حسّنه.

قال الترمذي: وفي الباب أيضًا عن أبي أمامة.

قلت: حديث أبي أمامة رواه ابن ماجه (617) قال: حدثنا بشر بن آدم، ثنا زيد بن الحباب، ثنا معاوية بن صالح، عن السفر بن نُسير، عن يزيد بن شريح، عن أبي أمامة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى أن يصلي الرجل وهو حاقن.

قال البوصيري في زوائده: إسناده ضعيف؛ لضعف السفر، وكذا بشر بن آدم.

قلت: وهذه الأحاديث الثلاثة تدور كلّها على يزيد بن شُريح وهو غير مشهور بالحفظ والعدالة إلّا ما ذكره ابن حبان وهو متساهل في توثيق المجاهيل، ومع ذلك رواه على عدّة وجوه مما يدل على عدم ضبطه ويوجب التّوقف في قبول حديثه.

وفي الجملة الأولى من متنه وهي قوله:"لا يؤمّ رجل قومًا فيخصّ نفسه بالدّعاء دونهم فإن فعل فقد خانهم" نكارة؛ لأنها مخالفة لهدي النبيّ صلى الله عليه وسلم الذي كان يدعو بالإفراد كقوله:"اللهم باعد بيني وبين خطاياي كما باعدت بين المشرق والمغرب" الحديث.

وبهذا الحديث استدل ابن خزيمة في صحيحه (3/ 63) على ردّ هذه الجملة من الحديث. وحديث الباب يحرم الصّلاة في حالة مدافعة الأخبثين.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন এমন অবস্থায় সালাতে দাঁড়াবে না, যখন তার কষ্ট হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (1345)


1345 - عن ابن عباس: أن النبي صلى الله عليه وسلم قام من الليل، فقضى حاجته، ثم غسل وجهه، ويديه، ثم نام.

متفق عليه: أخرجه البخاري (6316)، ومسلم (304)، كلاهما من طريق سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن كريب، عن ابن عباس .. فذكر مثله. واللفظ لمسلم، أمَّا البخاري؛ فذكره في سياقٍ أطول، انظر كتاب الوضوء: باب أنَّ النوم ليس حدَثًا بل مَظِنَّة للحدث.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতের বেলায় (ঘুম থেকে) উঠলেন, অতঃপর তিনি তাঁর প্রয়োজন (শারীরিক) সারলেন। এরপর তিনি তাঁর মুখমণ্ডল ও দুই হাত ধুলেন, অতঃপর ঘুমিয়ে পড়লেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1346)


1346 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لولا أن أشقّ على أمتي لأمرتهم بالسواك".

متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (114)، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة.
ورواه البخاري في الجمعة (887) ومسلم في الطهارة (252)، من طرق عن سفيان، عن أبي الزناد به. واللفظ لمالك في الموطَّإ، وعند البخاري ومسلم زيادة:"عند كل صلاة أو مع كل صلاة"، وفي النسائي وابن ماجه:"مع الوضوء عند كل صلاة"، وعند أحمد:"مع كل وضوء".

وسيأتي حديث أبي هريرة بزيادة تأخير العشاء إلى نصف اللَّيلِ في كتاب الصلاة، باب وقت صلاة العشاء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যদি আমি আমার উম্মতের জন্য কষ্টকর মনে না করতাম, তবে অবশ্যই আমি তাদের মেসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (1347)


1347 - عن حذيفة بن اليمان قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا قام من الليل يَشُوص فاه بالسواك.

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (145) ومسلم في الطهارة (255). كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكر الحديث. وفي رواية حصين بن عبد الرحمن، عن أبي وائل عند مسلم:"إذا قام ليتهجَّد يشوص فاه بالسواك". والشوص: هو دلك الأسنان بالسواك عَرْضًا.




হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রাতে (ঘুম থেকে) উঠতেন, তখন তিনি মিসওয়াক দ্বারা তাঁর মুখ পরিষ্কার করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1348)


1348 - عن عائشة قالت: كُنّا نُعِدُّ له سواكهـ وطَهورَه، فيبعثه اللهُ ما شاء أن يبعثَه من اللّيل، فيتسوَّك ويتوضّأ ويُصلي تسع ركعات لا يجلسُ إلّا في الثّامنة".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين وقصرها (746) عن محمد بن المثنى العنزيّ، حدّثنا محمد بن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة، عن زرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام، عنها، وهو طرف من حديث طويل.

وهو في سنن أبي داود (56) من طريق بهز بن حكيم، عن زرارة بن أوفي، به، مختصر بلفظ:"أنّ النّبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يوضع له وضوؤُه وسواكهـ، فإذا قام من اللّيل تخلّى ثم استاك". كما سيأتي.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর) জন্য তাঁর মেসওয়াক ও অযু বা পবিত্রতার পানি প্রস্তুত করে রাখতাম। অতঃপর আল্লাহ রাতের যে অংশে তাঁকে জাগাতে চাইতেন, সে অংশে তিনি জেগে উঠতেন। অতঃপর তিনি মিসওয়াক করতেন এবং অযু করতেন। আর তিনি নয় রাকআত সালাত আদায় করতেন, তিনি অষ্টম রাকআত ছাড়া অন্য কোথাও বসতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1349)


1349 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا دخل بيته بدأ بالسواك.

وفي رواية: قال شريح: سألت عائشة قلت: بأي شيء كان يبدأ النبي صلى الله عليه وسلم إذا دخل بيته؟ قالت: بالسواك.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (253). من حديث مِسْعَر، عن المقدام بن شريح، عن أبيه، قال: سألت عائشة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘরে প্রবেশ করতেন, তখন মেসওয়াক করা দিয়ে শুরু করতেন।

অন্য এক বর্ণনায় (রাবী) শুরাইহ বলেন, আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘরে প্রবেশ করতেন, তখন প্রথমে কী করতেন? তিনি বললেন: মেসওয়াক।









আল-জামি` আল-কামিল (1350)


1350 - عن أبي موسى الأشعري قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يستنُّ بسواكٍ بيده، ويقول:"أعْ أعْ" والسواك في فيه، كأنه يتهوَّع.

متفق عليه: أخرجه البخاري في الوضوء (244)، واللفظ له، ومسلم في الطهارة (254)، كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن غيلان بن جرير، عن أبي بردّة، عن أبيه. ولفظ مسلم قال:"دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم وطرفُ السواك على لسانه".

وقوله:"يتهوع": من التهوع، وهو التقيؤ، يقال: (هاع يهوع هواعا) إذا تقيأ، والمراد به
هاهنا: إقلاع النخامة من أقصى الحلق، وإخراجها ليبصقها ويفعل ذلك من يريد أن يتقيَّأ.




আবূ মূসা আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, যখন তিনি তাঁর হাতে একটি মিসওয়াক নিয়ে দাঁত পরিষ্কার করছিলেন। মিসওয়াকটি তাঁর মুখে থাকা অবস্থায় তিনি 'আ' আ'' বলছিলেন, মনে হচ্ছিল যেন তিনি বমি করার চেষ্টা করছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1351)


1351 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لقد أكثرتُ عليكم في السواك".

صحيح: أخرجه البخاري في الجمعة (888)، عن أبي معمر، قال: حدَّثنا عبد الوارث، قال: حدَّثنا شعيب بن الحبحاب، حدَّثنا أنس .. فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে মিসওয়াক (ব্যবহারের) বিষয়ে খুব বেশি তাগিদ দিয়েছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (1352)


1352 - عن عبد الله بن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"أُراني في المنام أتسوَّك بسواك، فجاءني رجلان أحدهما أكبر من الآخَر، فناولت الأصغر منهما، فقيل لي: كبَّر، فدفعته إلى الأكبر منهما".

صحيح: رواه مسلم في الرؤيا (2271)، عن نصر بن علي الجهضمي، أخبرني أبي، حدَّثنا صخر بن جويرية، عن نافع، أنَّ عبد الله بن عمر حدَّثه به.

وعلقه البخاري في الوضوء (246) قائلا: وقال عفان، قال الحافظ: ووصله أبو عوانة في صحيحه عن محمد بن إسحاق الصغاني وغيره، عن عفان، وكذا أخرجه أبو نعيم والبيهقي من طريقه.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আমি স্বপ্নে দেখলাম যে আমি একটি মেসওয়াক দ্বারা মেসওয়াক করছি। অতঃপর আমার কাছে দুজন লোক এলো, তাদের একজন অন্যজনের চেয়ে বয়সে বড় ছিল। তখন আমি তাদের মধ্যে ছোটজনকে সেটি দিলাম। কিন্তু আমাকে বলা হলো: ‘বয়সে বড়জনকে দাও (অগ্রাধিকার দাও)।’ সুতরাং আমি তাদের দুজনের মধ্যে বয়সে বড়জনের হাতে সেটি দিয়ে দিলাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (1353)


1353 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يستنُّ، وعنده رجلان أحدهما أكبر من الآخر، فأوحى الله إليه في فضل السواك:"أن كبَّرْ": أعط السواك أكبرهما.

حسن: رواه أبو داود (50) قال: حدثنا محمد بن عيسى، حدثنا عَبْسَة بن عبد الواحد، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكر الحديث.

ورجال إسناده ثقات، وحسّنه الحافظ في الفتح (1/ 357).

قال أبو داود: قال أحمد بن حزم: قال أبو سعيد - وهو الأعرابي -: هذا مما تفرد به أهل المدينة.

وقوله"يستن" أي: يستاك، وأصله مأخوذ من السن، وهو إمرار الشيء الذي فيه حزونة على شيء آخر، ومنه المسن الذي يُشحذ به الحديد ونحوه، يريد أنه كان يدلك أسنانه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিসওয়াক করছিলেন। আর তাঁর কাছে দুজন লোক উপস্থিত ছিল, যাদের একজন অপরজনের চেয়ে বয়সে বড় ছিল। তখন আল্লাহ তা'আলা তাঁর প্রতি মিসওয়াকের ফযীলত সম্পর্কে এই মর্মে অহী নাযিল করলেন: "বড়কে প্রাধান্য দাও", অর্থাৎ তাদের দুজনের মধ্যে যিনি বয়সে বড়, তাঁকে মিসওয়াকটি দাও।









আল-জামি` আল-কামিল (1354)


1354 - عن عبد الله بن عباس أنه بات عند النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فقام نبي الله صلى الله عليه وسلم من آخر الليل، فخرج فنظر في السماء، ثم تلا هذه الآية في آل عمران: {إِنَّ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ} حتى بلغ {فَقِنَا عَذَابَ النَّارِ} [آل عمران 190، 191] ثم رجع إلى البيت فتسوّك وتوضأ، ثم قام فصلى، ثم اضطجع، ثم قام فخرج فنظر إلى السماء فتلا هذه الآية، ثم رجع فتسوك فتوضأ، ثم قام فصلى.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (256)، عن عبد بن حميد، حدثنا أبو نعيم، حدثنا إسماعيل بن مسلم، حدثنا أبو المتوكل، أنَّ ابن عباس حدَّثه .. فذكره.

ومنهم من اختصر بقوله:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي بالليل ركعتين ركعتين، ثم ينصرف فيستاك".

رواه ابن ماجه (288) وفيه سفيان بن وكيع شيخ ابن ماجه، اتهمه أبو زرعة بالكذب، ولكن
رواه الحاكم (1/ 145) بإسناد ليس فيه سفيان بن وكيع وصحّحه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক রাতে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে রাত্রিযাপন করেছিলেন। তখন শেষ রাতে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উঠলেন, অতঃপর বের হয়ে আকাশের দিকে তাকালেন, তারপর তিনি সূরা আলে ইমরানের এই আয়াতগুলো পাঠ করলেন: "নিশ্চয়ই আসমান ও যমীনের সৃষ্টিতে এবং রাত ও দিনের পরিবর্তনে..." [আল-ইমরান ১৯০] যতক্ষণ না তিনি "...সুতরাং আপনি আমাদেরকে জাহান্নামের আযাব থেকে রক্ষা করুন" [আল-ইমরান ১৯১] পর্যন্ত পৌঁছলেন। এরপর তিনি ঘরে ফিরে এলেন এবং মিসওয়াক করলেন ও উযূ করলেন, তারপর দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি শুয়ে পড়লেন। অতঃপর আবার উঠলেন, বের হয়ে আকাশের দিকে তাকালেন এবং সেই আয়াতটি পাঠ করলেন। এরপর ফিরে এসে মিসওয়াক করলেন ও উযূ করলেন, তারপর দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1355)


1355 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يوضع له وَضوءه وسواكهـ، فإذا قام من الليل تخلَّى ثم استاك.

حسن: أخرجه أبو داود (56)، عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا حمَّاد، أخبرنا بهز بن حكيم، عن زرارة بن أوفى، عن سعد بن هشام، عن عائشة فذكرته.

وإسناده حسن، ورجاله ثقات غير أن في الرواية الأولى: بهز بن حكيم، وهو صدوق.

وما رُوي عن عائشة بلفظ:"لا يرقد من ليل ولا نهار فيستيقظ إلا تسوك قبل أن يتوضأ". فهو ضعيف، رواه أبو داود (57) من طريق علي بن زيد بن جدعان، عن أمّ محمد، عن عائشة، به.

وفيه أم محمد، وهي أمية بنت عبد الله، وقيل: أمينة، امرأة زيد بن جُدعان والد علي بن زيد، تابعية، ولكن الراوي عنها علي بن زيد بن جدعان، وهو علي بن زيد بن عبد الله بن زهير بن عبد الله بن جدعان، والمعروف بعلي بن زيد بن جدعان، ينسب أبوه إلى جد جده، ضعيف، ولذا حُكِم على قوله: (من نهار) بأنَّه منكر.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য তাঁর উযূর পানি ও মিসওয়াক রাখা থাকত। যখন তিনি রাতে উঠতেন, তখন তিনি প্রয়োজন সেরে নিতেন এবং তারপর মিসওয়াক করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1356)


1356 - عن زيد بن خالد الجهني قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لولا أنْ أشُقَّ على أمتي لأمرتُهم بالسواك عند كل صلاة".

قال أبو سلمة: فرأيتُ زيدًا يجلس في المسجد، وإن السواك من أُذنه موضع القلم من أُذن الكاتب، فكلما قام إلى الصلاة استاك.

صحيح: رواه أبو داود (47) واللفظ له، والترمذي (23) والنسائي في الكبرى (3029) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن زيد بن خالد الجهني به. وزاد الترمذي من المرفوع:"ولأخّرتُ صلاة العشاء إلى ثلث الليل".

قال الترمذي: حسن صحيح.

قلت: بل هذا الإسناد ضعيف؛ لأجل محمد بن إسحاق، فإنَّه مدلس وقد عنعن، ولكن رواه الإمام أحمد (17048) من طريقين:

أحدهما: عن محمد بن فُضَيل، عن محمد بن إسحاق، به مثله.

والثاني: عن عبد الصمد، قال: حدَّثنا حرب - يعني ابن شدَّاد، عن يحيى، حدَّثنا أبو سلمة، عن زيد بن خالد .. فذكر مثله. وهذا إسناد صحيح. يحيى هو: ابن أبي كثير. وانظر هذا الحديث في كتاب الصلاة - باب وقت صلاة العشاء.

وأمَّا ما رُوي عن جابر بن عبد الله قال: كان السواك من أذن النبيِّ صلى الله عليه وسلم موضع القلم من أذن الكاتب. فهو ضعيف؛ رواه البيهقي (1/ 37) من طريق أبي القاسم سليمان بن أحمد الطبراني، ثنا
الحضرمي، ثنا عثمان بن أبي شيبة، ثنا يحيي بن يمان، عن سفيان، عن محمد بن إسحاق، عن أبي جعفر، عن جابر بن عبد الله فذكر مثله.

قال الطبراني:"رواه عن ابن إسحاق سفيان، ولم يروه عن سفيان إلا يحيى". قال البيهقي: ويحيى بن يمان ليس بالقوي عندهم، ويُشبه أن يكون غَلِط من حديث محمد بن إسحاق الأول إلى هذا" انتهى.

وقال ابن أبي حاتم في"العلل" (1/ 55): سئل أبو زرعة عن هذا الحديث فقال:"إنَّه وهم من يحيى بن يمان".

قلت: يحيى بن يمان هو العجلي الكوفي، قال أبو داود:"يخطئ في الأحاديث ويقلبها". وقال ابن عدي:"عامة ما يرويه غير محفوظ". وأمَّا النسائي؛ فقال:"ليس بالقوي".




যায়িদ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যদি আমার উম্মতের ওপর কষ্ট হওয়ার ভয় না করতাম, তাহলে আমি তাদেরকে প্রত্যেক সালাতের (নামাযের) সময় মিসওয়াক করার আদেশ দিতাম।”

আবূ সালামাহ বলেন: আমি যায়িদকে মসজিদে বসে থাকতে দেখেছি, আর তার মিসওয়াকটি তার কানে সে জায়গায় রাখা থাকত, যেখানে লেখকের কলম থাকে। যখনই তিনি সালাতের জন্য দাঁড়াতেন, তখনই মিসওয়াক করতেন।

সহীহ: আবূ দাঊদ (৪৭) হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, শব্দ তাঁরই। আর তিরমিযী (২৩), এবং নাসায়ী তাঁর আল-কুবরা (৩০২৯)-তে বর্ণনা করেছেন। তাঁরা সকলেই মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাকের সূত্রে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইব্রাহীম আত-তাইমী থেকে, তিনি আবূ সালামাহ ইবনু আব্দুর রহমান থেকে, তিনি যায়িদ ইবনু খালিদ আল-জুহানী থেকে এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। আর তিরমিযী মারফূ' (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি) হিসেবে যোগ করেছেন: “আর আমি ঈশার সালাতকে রাতের এক-তৃতীয়াংশ পর্যন্ত বিলম্বিত করতাম।”

তিরমিযী বলেন: হাসান সহীহ।

আমি (পর্যালোচক) বলি: বরং এই সনদটি দুর্বল; কারণ মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক মুদাল্লিস এবং তিনি ‘আন‘আনা পদ্ধতিতে বর্ণনা করেছেন। তবে ইমাম আহমাদ (১৭০৪৮) এটি দুটি সূত্রে বর্ণনা করেছেন:

প্রথমটি: মুহাম্মাদ ইবনু ফুযাইল থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে, অনুরূপভাবে।

দ্বিতীয়টি: আব্দুস সামাদ থেকে, তিনি বলেন: হারব – অর্থাৎ ইবনু শাদ্দাদ - আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি ইয়াহইয়া থেকে, তিনি বলেন: আবূ সালামাহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি যায়িদ ইবনু খালিদ থেকে... অতঃপর অনুরূপ বর্ণনা করেন। এই সনদটি সহীহ। ইয়াহইয়া হলেন: ইবনু আবী কাছীর। সালাত অধ্যায়ে – ঈশার সালাতের সময় পরিচ্ছেদটিতে এই হাদীসটি দেখুন।

আর জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, “নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মিসওয়াক তাঁর কানে সে জায়গায় রাখা থাকত, যেখানে লেখকের কানে কলম থাকে।” এটি দুর্বল; বাইহাক্বী (১/৩৭) এটি আবূ ক্বাসিম সুলাইমান ইবনু আহমাদ আত-ত্বাবারানীর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের নিকট আল-হাযরামী বর্ণনা করেছেন, তিনি উসমান ইবনু আবী শাইবাহ থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু ইয়ামান থেকে, তিনি সুফিয়ান থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে, তিনি আবূ জা‘ফার থেকে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

ত্বাবারানী বলেন: “ইবনু ইসহাক থেকে সুফিয়ান এটি বর্ণনা করেছেন, আর সুফিয়ান থেকে ইয়াহইয়া ব্যতীত অন্য কেউ বর্ণনা করেননি।” বাইহাক্বী বলেন: ইয়াহইয়া ইবনু ইয়ামানকে হাদীস বিশারদগণ শক্তিশালী মনে করেন না, এবং সম্ভবত তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাকের প্রথম হাদীস থেকে এই হাদীসে ভুল করেছেন। সমাপ্ত।

ইবনু আবী হাতিম তাঁর “আল-ইলাল” (১/৫৫)-তে বলেন: আবূ যুর‘আহকে এই হাদীসটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: “এটি ইয়াহইয়া ইবনু ইয়ামানের ভুল।”

আমি (পর্যালোচক) বলি: ইয়াহইয়া ইবনু ইয়ামান হলেন আল-ইজলী আল-কূফী। আবূ দাঊদ বলেন: “তিনি হাদীস বর্ণনায় ভুল করেন এবং উল্টে দেন।” ইবনু আদী বলেন: “তিনি যা বর্ণনা করেন, তার অধিকাংশই অসংরক্ষিত।” আর নাসায়ী বলেন: “তিনি শক্তিশালী নন।”









আল-জামি` আল-কামিল (1357)


1357 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"السواك مَطْهَرة للفم، مرضاة للرَّبّ".

صحيح: أخرجه النسائي (5) قال: أخبرنا حُميد بن مَسعدة البصري ومحمد بن عبد الأعلى، عن يزيد - وهو ابن زريع - قال: حدثني عبد الرحمن بن أبي عتيق، قال: حدثني أبي، قال: سمعتُ عائشة تحدث، فذكر الحديث.

ورجاله ثقات وإسناده صحيح. وعلّقه البخاري في الصحيح (4/ 158) - مع الفتح -، بصيغة الجزم. وصحَّحه ابن خزيمة (135)، وابن حبان (1067). وانظر:"المنة الكبرى" (1/ 121).

وابن أبي عتيق هو عبد الله بن محمد بن عبد الرحمن بن أبي بكر الصديق، ومحمد يكنى أبا عتيق، قال البيهقي (1/ 34):"وقد رواه عبد الرحمن بن عبد الله عن أبيه كذلك، وبين فيه سماع أبيه". ثم روى من طريقه، وأورد له أسانيد أخرى، وروى أحمد (7 و 62) وأبو يعلى (1/ 86 رقم 104) فجعلاه من مسند أبي بكر، والصواب أنه من مسند عائشة. انظر: العلل لابن أبي حاتم (1/ 12) وفتح الباري (4/ 158 - 159).

وروي مثل هذا عن ابن عباس وأنس، وفي إسنادهما ضعفاء. انظر:"مجمع الزوائد - 1/ 20".

وعن أبي أمامة عند ابن ماجه (289) وفيه علي بن يزيد الألهاني ضعفه ابن معين وغيره.

قوله"مَطهرة للفم مَرضاة للرب"، مطهرة: بفتح الميم وكسرها، لغتان ذكرهما ابن السكيت وآخرون، والكسر أشهر، وهو: كل إناء يتطهر به، شبّه السواك بها لأنه ينظف الفم، والطهارة: النظافة. ذكره النووي في شرح المهذب (1/ 268).

وأما ما رُوي عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لزمتُ السواك حتى خشيت أن يُدْرِدَني" ففيه اضطراب.

فقد رُوي عن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب على ثلاثة أوجه:

1 - رواه الطبراني في المعجم الأوسط (6522) من حديث ابن وهب قال: حدثنا يحيى بن
عبد الله بن سالم، عن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب، عن عائشة، فذكرت الحديث.

قال المنذري في الترغيب والترهيب (339):"رواه الطبراني في الأوسط، ورواته رواة الصحيح".

قلت: وهو كما قال إلّا أنّ فيه انقطاعًا؛ فإنّ عمرو بن أبي عمرو وهو مولى المطلب من المستبعد أن يدرك عائشة لأنّه توفي بعد (150 هـ).

2 - ورواه البيهقي في الكبري (7/ 49 - 50) من طريق ابن وهب - أيضًا - به.

فأدخل بين عمرو بن أبي عمرو وبين عائشة المطلب بن عبد الله. وفي سماعه من عائشة نظر. انظر: جامع التحصيل (774).

3 - ورواه إسماعيل بن جعفر في جزئه (363) عن عمرو، عن المطلب بن عبد الله، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا.

وبهذا يتبيّن أن عمرو بن أبي عمرو قد اضطرب في هذا الإسناد وإن كان من رجال الشيخين فقد وُصف بالاضطراب، وصفه بذلك الجوزجاني وغيره، وفي التقريب:"ثقة ربما وهم".

وقوله (يُدْرِد) من الدرد، وهو سقوط الأسنان.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “মিসওয়াক মুখের জন্য পবিত্রতা, আর রবের (আল্লাহর) সন্তুষ্টির মাধ্যম।”









আল-জামি` আল-কামিল (1358)


1358 - عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لولا أن أشق على أمتي لأمرتهم بالسواك مع كل صلاة".

صحيح: رواه أحمد (23486) قال: حدثنا يحيى بن سعيد (القطان) قال: سمعناه من الأعمش، حدثني عبد الله بن يسار، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.

إسناده صحيح، عبد الله بن يسار هو الجهني الكوفي، وثَّقه النسائي. وذكره ابن حبان في الثقات، وأما الرجل غير المسمى فلا يضر عدم تسميته؛ لأنه من الصحابة.




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমার উম্মতের উপর কষ্ট হবে এই ভয় না থাকলে, আমি তাদেরকে প্রত্যেক সালাতের (নামাজের) সাথে মেসওয়াক করার নির্দেশ দিতাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (1359)


1359 - عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لولا أن أشق على أمتي لأمرتهم بالسواك مع كل وضوء".

حسن: أخرجه الطبراني في الأوسط (2/ 138 رقم 1260) واللفظ له، وأحمد (1/ 120) في سياق أطول، كلاهما من طريق محمد بن إسحاق، قال: حدثني عمي عبد الرحمن بن يسار، عن عبد الله بن نافع، عن أبيه، عن علي بن أبي طالب، فذكره.

قال الطبراني:"لا يُروى هذا الحديث عن عليّ إلا بهذا الإسناد؛ تفرد به محمد بن إسحاق".

قلت: محمد بن إسحاق صدوق مدلس، إلا أنه قد صرح بالتحديث، فيكون إسناده حسنًا. وقد أورده الهيثمي في مجمع الزوائد (1/ 221) وحسّن إسناده. ورواه أيضًا أحمد (1/ 80) من طريق محمد بن إسحاق، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة. وعن عبيد الله بن أبي رافع،
عن أبيه، عن علي بن أبي طالب، نحو حديث الطبراني، إلا أن ابن إسحاق عنعن هنا، وهو مدلس، وعنعنته لا تؤثر ما دام ثبت فيه التصريح بالسماع من وجه آخر كما سبق.




আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমার উম্মতের জন্য কষ্টকর হওয়ার ভয় না থাকত, তবে আমি তাদের প্রত্যেক ওযুর সাথে মিসওয়াক করার আদেশ দিতাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (1360)


1360 - عن عبد الله بن حنظلة بن أبي عامر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أُمِر بالوضوء لكل صلاةٍ طاهرًا وغير طاهر، فلما شق ذلك عليه أمر بالسواك لكل صلاة.

فكان ابن عمر يرى أن به قوة؛ فكان لا يدع الوضوء لكل صلاة.

حسن: رواه أبو داود (48) قال: حدثنا محمد بن عوف الطائي، حدثنا أحمد بن خالد، حدثنا محمد بن إسحاق، عن محمد بن يحيى بن حبان، عن عبد الله بن عبد الله بن عمر قال: قلت: أرأيت توضُّؤَ ابن عمر لكل صلاة طاهرا وغير طاهر، عَمَّ ذاك؟ فقال: حدَّثَتْنيه أسماء بنت زيد بن الخطاب أن عبد الله بن حنظلة حدثَها، فذكر الحديث.

ورجاله ثقات، غير محمد بن إسحاق؛ فهو مدلس وقد جاء التصريح كما رواه الإمام أحمد في مسنده (5/ 225) عن يعقوب بن إبراهيم، قال: حدثنا أبي، عن محمد بن إسحاق، حدثني محمد بن يحيى بن حَبّان الأنصاري ثم المازني - مازن بني النجار - عن عبد الله بن عبد الله بن عمر، فذكر الحديث. إلا أنه قال فيه: عبد الله بن عمر - مصغرا وأبو داود أشار إلى رواية إبراهيم - وهو ابن سعد - عن محمد بن إسحاق بأن فيه عبيد الله - مصغرا.

قلت: ولا يضر هذا الخلاف؛ فكلاهما - عبد الله (مكبرا) وعبيدالله (مصغرا) - ثقتان من رجال الشيخين، وثقهما أبو زرعة والنسائي.

وأمَّا الأحاديث الواردة في فضل الصلوات التي يُتسوَّك لها على الصلوات التي لا يُتسوَّك لها سبعين ضعفًا أو خمسًا وسبعين ضعفًا؛ فكلُّها ضعيفةٌ، ولا يصحُّ منها شيءٌ، انظر:"البدر المنير" (2/ 13 - 22)،"والعلل المتناهية" (1/ 336). قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 68): أسانيدها معلولةٌ.




আব্দুল্লাহ ইবনু হানযালা ইবনু আবি আমির থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রত্যেক সালাতের জন্য ওযু করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল, তিনি পবিত্র থাকুন বা অপবিত্র। অতঃপর যখন এই বিষয়টি তাঁর জন্য কঠিন হয়ে পড়ল, তখন তিনি প্রত্যেক সালাতের জন্য মিসওয়াক করার নির্দেশ দিলেন।

ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মনে করতেন যে, এই নির্দেশ পালন করার মতো শক্তি তাঁর রয়েছে, তাই তিনি প্রত্যেক সালাতের জন্য ওযু করা ছাড়তেন না।