আল-জামি` আল-কামিল
1361 - عن ابن مسعود أنه كان يجتَنِي سِواكًا من الأراك، وكان دقيق الساقين، فجعلتِ الريحُ تكفَؤه، فضحك القوم منه. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مِمَّ تضحكون؟" قالوا: يا نبيَّ الله! من دقة ساقيه. فقال:"والذي نفسي بيده! لهما أثقلُ في الميزان من أُحُد".
حسن: رواه أحمد (3991) وأبو يعلي (5310) والبزار - كشف الأستار - (2678) والطبراني في الكبير (8452) كلهم من طريق عاصم، عن زِرّ بن حُبيش عن ابن مسعود فذكره. وصحَّحه ابن حبَّان (7069) فرواه من هذا الوجه.
وإسناده حسن لأجل عاصم وهو: ابن أبي النجود مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وللحديث طرق أخرى لعلي أذكرها في كتاب الفضائل، قال الهيثمي في"المجمع" (9/ 289):
"رواه أحمد وأبو يعلى والبزار والطبراني من طرق … وأمثل طرقها فيه عاصم بن أبي النجود، وهو حسن الحديث على ضعفه، وبقية رجال أحمد وأبي يعلى رجال الصحيح".
ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আরাক (গাছ) থেকে মিসওয়াক সংগ্রহ করছিলেন। আর তাঁর পায়ের গোছা ছিল চিকন (বা সরু)। বাতাস তাঁকে টলিয়ে দিচ্ছিল। তখন উপস্থিত লোকেরা তাঁকে দেখে হেসে উঠল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা কিসের জন্য হাসছো?" তারা বলল, হে আল্লাহর নবী! তাঁর পায়ের গোছার সরুতার কারণে। তিনি বললেন, "যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! কিয়ামতের পাল্লায় এই দুটি (পা) উহুদ পাহাড়ের চেয়েও বেশি ভারী হবে।"
1362 - عن معاوية بن قرة، عن أبيه أن عبد الله بن مسعود رقي في شجرة يجتني منها سِواكًا، فوضع رجليه عليها، فضحك أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم … ثم بقية الحديث مثله.
حسن: رواه البزار - الكشف (2677) والطبراني في الكبير (19/ رقم 59) كلاهما من طريق سهل بن حماد أبي عتاب الدلال، ثنا شعبة، عن معاوية بن قرة فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (9/ 289)، رجالهما رجال الصحيح، وصححه الحاكم (3/ 317).
وهو كما قالوا فإنَّ رجال الإسناد رجال الصحيح إلا أن سهل بن حماد مع كونه من رجال مسلم مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
কুররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি গাছ থেকে মিসওয়াক কাটার জন্য তাতে আরোহণ করেছিলেন। যখন তিনি তাতে নিজের পা রাখলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ হেসে দিলেন... এরপর বাকি হাদীসও অনুরূপ।
1363 - عن علي بن أبي طالب يقول: أمر النبي صلى الله عليه وسلم ابن مسعود فصعد على شجرة، أمره أن يأتيه منها بشيء، فنظر أصحابه إلى ساق عبد الله بن مسعود حين صَعِد الشجرة … فذكر بقية الحديث مثله.
حسن: رواه أحمد (920) وأبو يعلى (539) والطبراني (8516) كلهم من طريق مغيرة، عن أم موسى قال: سمعت عليًّا فذكر مثله.
وأم موسى كانت سُرِّيَّة لعلي، لم يرو عنها غير مغيرة بن مقسم الضبي، ووثَّقها العجلي، وقال الدارقطني: حديثها مستقيم يخرج اعتبارًا، قال الهيثمي في"المجمع" (9/ 288 - 289): رجالهم رجال الصحيح غير أم موسى وهي ثقة - وعزاه للثلاثة.
وأمَّا ما رُوي عن أبي خيرةَ الصُّباحي، قال: كنت في الوفد الذين أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم، من عبد القيس، فزودنا الأراك نستاك به. فقلنا يا رسول الله! عندنا الجريد، ولكنَّا نقبل كرامتك وعطيتك. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهمَّ اغفر لعبد القيس إذ أسلموا طائعين غير مُكرهين، إذ قعد قومي لم يُسلموا إلَّا خزايا موتورين". فهو ضعيف، رواه البخاري في"التاريخ الكبير" (9/ 28) قال: قال خليفة بن خياط: حدَّثنا عون بن كهمس، قال: نا داود بن المساور، عن مقاتل بن همام، عن أبي خيرة الصُّباحي فذكر مثله.
ورواه الطبراني في"الكبير" (22/ 368 - 369) من طريق عون بن كهمس به.
وأخرجه أبو أحمد الحاكم في"الأسامي والكنى" (4/ 362) من جهة البخاري مختصرًا. قال الهيثمي في"المجمع" (2/ 100) بعد أن عزاه إلى الطبراني في"الكبير":"إسناده حسن".
قلت: فيه عون بن كهمس،"مقبول" كما في التقريب، وقد توبع؛ إلَّا أنَّ في طريقه من لا يُعرف، رواه الطبراني من وجه آخر من طريق محمد بن حمران بن عبد العزيز القيسي، ثنا داود بن المساور به، وفيه: كنت في الوفد الذين أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكنَّا أربعين رجلًا، فنهانا عن الدباء،
والحنتم، والنقير، والمزفَّت. قال: ثمَّ أمرنا بأراك، فقال:"استاكوا بهذا". قلنا: يا رسول الله! إنَّ عندنا العُشب، ونحن نجترئ به. فرفع يديه فدعا.
قال الهيثمي في"المجمع" (5/ 62) بعد أن عزاه إلى الطبراني:"فيه جماعة لم أعرفهم". ومقاتل بن همام ترجمه ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (8/ 351) ولم يقل فيه شيئًا، فهو في عداد المجهولين.
قال ابن ماكولا:"ليس يُروى لأبي خيرةَ هذا سوى حديثٍ واحد، ولا روي عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم من قبيلة صُباح غيره"."الإكمال" (2/ 31/ 5/ 210).
إن كان كما قال، ففيه مجاهيل ومن لا يُعرف إلَّا في هذا الحديث.
وأمَّا ما رُوي في الاستياك بالأصبع؛ فلم يثبت منه شيء، وأشهره حديث أنسٍ مرفوعًا:"يجزئ من السواك الأصابع". رواه ابن عدي في"الكامل" (7/ 29) ومن طريقه البيهقي في سننه (1/ 40) من حديث عيسى بن شعيب، عن عبد الحكم القسملي، عن أنس فذكره. والقسملي هذا قال فيه البخاري:"منكر الحديث". قال البيهقي: وقد رواه عيسى بن شعيب بإسناد آخر عن أنس.
ثمَّ رواه من طريقه، (أي من طريق عيسى بن شعيب)، عن ابن المثنى، عن النضر بن أنس، عن أبيه، فذكر الحديث.
وقال: تفرد عيسى بالإسنادين جميعًا. والمحفوظ: من حديث ابن المثنى.
وكذلك لا يصح ما روي عن عائشة، وكثير بن عبد الله بن عمرو بن عوف المزني وغيرهما إلَّا أنَّ بعض أهل العلم فسروا ما جاء في الطرق الصحيحة"أنَّه كان يشوص فاه بالسواك" أي أنَّه يشوص بالأصبع لما جاء عن عثمان أنَّه إذا توضَّأ يشوص فاه بأصبعه. ذكره أبو عبيد في"الطهور" (298) وفي إسناده الزبير بن عبد الله مولى آل عمر تكلَّم فيه ابن عدي وغيره.
আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইবনে মাসউদকে আদেশ করলেন। তিনি একটি গাছের উপর আরোহণ করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে সে গাছ থেকে কিছু নিয়ে আসতে বলেছিলেন। যখন তিনি গাছে আরোহণ করলেন, তখন তাঁর সাহাবীগণ আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদের পায়ের গোছা দেখতে পেলেন…। অতঃপর অবশিষ্ট হাদীস অনুরূপ উল্লেখ করা হয়েছে।
1364 - عن عائشة قالت: دخل عبد الرحمن بن أبي بكر ومعه سواك يستنُّ به، فنظر إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت له: أعطني هذا السواك يا عبد الرحمن، فأعطانيه، فقصمتُه، ثم مضغتُه، فأعطيته رسولَ الله صلى الله عليه وسلم فاستنَّ به، وهو مستند إلى صدري.
صحيح: رواه البخاري في الجمعة (890) عن إسماعيل، قال: حدَّثني سليمان بن بلال، قال: قال هشام بن عروة: أخبرني أبي، عن عائشة فذكرت مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুর রহমান ইবনু আবী বকর প্রবেশ করলেন। তার সাথে ছিল একটি মিসওয়াক যা দিয়ে তিনি দাঁত মাজছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে তাকালেন। আমি (আব্দুর রহমানকে) বললাম: হে আব্দুর রহমান, আমাকে এই মিসওয়াকটি দাও। অতঃপর তিনি তা আমাকে দিলেন। আমি সেটিকে ভেঙে টুকরা করলাম, তারপর (নরম করার জন্য) চিবিয়ে নিলাম। এরপর আমি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিলাম। তিনি তখন আমার বুকের উপর হেলান দিয়ে ছিলেন এবং তা দিয়ে মিসওয়াক করলেন।
1365 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا توضأ أحدكم فليجعل في أنفه ماءً، ثم لينْثِر، ومن استجمر فليوتر".
متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (2)، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة .. فذكره.
ومن طريقه أخرجه البخاري في الوضوء (162) وجمعه بحديث"وإذا استيقظ أحدكم من نومه فليغسل يده قبل أن يدخلها في وضوئه، فإن أحدكم لا يدري أين باتت يده"؛ لأجل اتحاد السند.
ورواه مسلم في الطهارة (237)، من وجه آخر عن سفيان، عن أبي الزناد، عنه.
ورواه مالك أيضًا عن ابن شهاب، عن أبي إدريس الخولاني، عن أبي هريرة، ولفظه:"من توضأ فلينتثر، ومن استجمر فليوتر".
ومن هذا الطريق رواه مسلم أيضًا.
ورواه البخاري (161) من طريق يونس، عن الزهري به مثله.
ورواه أيضًا مسلم من طريق يونس، إلا أنه قرن أبا هريرة بأبي سعيد.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ ওযু করে, সে যেন তার নাকে পানি প্রবেশ করায়, এরপর তা ঝেড়ে ফেলে। আর যে ব্যক্তি শৌচকার্যের জন্য ঢিলা (বা অনুরূপ বস্তু) ব্যবহার করে, সে যেন বিজোড় সংখ্যা ব্যবহার করে।"
1366 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا استجمر أحدكم فليوتر".
صحيحٌ: رواه مسلم في الطهارة (239). من طريق عبد الرزاق، نا ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكر الحديث.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ ইসতিজমার (পেশাব-পায়খানার পর ঢিলা বা কঙ্কর দ্বারা পবিত্রতা অর্জন) করে, তখন সে যেন বিজোড় সংখ্যায় (ঢিলা/কঙ্কর) ব্যবহার করে।"
1367 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الاستجمار تَوٌّ، ورمي الجمار تَوٌّ، والسّعي بين الصَّفا والمروة تَوٌّ، والطّواف توٌّ، وإذا استجمر أحدُكم فلْيستجمر بتوٌّ".
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1300) عن سلمة بن شبيب، حدّثنا الحسن بن أعين، حدثنا مَعْقل (وهو ابن عبيد الله الجزريّ)، عن أبي الزّبير، عن جابر، فذكره.
وقوله:"تَوٌّ" التّوُّ: الوتر والفرد، جاء توًّا أي: فردًا، والتّوُّ: هو الحبل يُفتل طاقة واحدة لا يجعل له قوة مبرمة، والجمع: أتواء
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইস্তিঞ্জা (পাথর দ্বারা পবিত্রতা অর্জন) বেজোড় (সংখ্যায়), জামারায় পাথর নিক্ষেপ বেজোড় (সংখ্যায়), সাফা ও মারওয়ার মাঝে সা'ঈ বেজোড় (সংখ্যায়), এবং তাওয়াফ বেজোড় (সংখ্যায়)। আর যখন তোমাদের কেউ ইস্তিঞ্জা করে (পাথর ব্যবহার করে), তখন সে যেন বেজোড় সংখ্যায় তা করে।"
1368 - عن سلمة بن قيس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا توضأت فانْتَثِر، وإذا استجمرت فأوتِر".
صحيح: رواه الترمذي (27) والنسائي (89) وابن ماجه (406) كلهم من حديث منصور، عن هلال بن يساف، عن سلمة بن قيس به. ورجاله ثقات، وصحَّحه ابن حبَّان (1436).
ومنصور هو ابن المعتمِر بن عبد الله السهمي أبو عثَّاب - بمثلثة ثقيلة ثم موحدة - الكوفي، قال أبو حاتم: ثقة. وقال العجلي: كوفي ثقة ثبت في الحديث، كان أثبت أهل الكوفة، وكأنَّ حديثه القِدْحُ لا يختلف فيه أحد، متعبد رجل صالح، أُكره على القضاء شهرين، وكان فيه تشيع قليل ولم يكن يغالي، وهو من رجال الجماعة.
قال الترمذي: حديث سلمة بن قيس حديث حسن صحيح.
قوله"فانتثر" أي: أدخل الماء في الأنف ثم ادفعه ليخرج ما فيه، والنثرة: الخيشوم.
وفي الباب حديث عبد الله بن زيد بن عاصم في صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم. وحديث عاصم بن لقيط بن صَبِرة في باب تخليل الأصابع في الوضوء.
সালামাহ ইবনু ক্বাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা উযু করবে, তখন (নাকে পানি দিয়ে) নাসিকা ঝেড়ে ফেলো। আর যখন তোমরা ইস্তিঞ্জা (ঢিলা) ব্যবহার করবে, তখন বেজোড় সংখ্যায় করো।"
1369 - عن سلمان الفارسي أنَّه: قيل له: قد علَّمكم نبيُّكم كلَّ شيءٍ حتى الخِراءة؟ قال: فقال: أجل! لقد نهانا أن نستقبل القبلة بغائط، أو بول، أو أن نستنجي باليمين، أو أن نستنجي بأقل من ثلاثة أحجار، أو أن نستنجي برجيع أو بعظم.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (262) من طريق الأعمش، عن إبراهيم، عن عبد الرحمن بن يزيد، عن سلمان .. فذكر الحديث.
وفي رواية: قال بعض المشركين وهم يستهزئون: إني أرى صاحبكم يعلمكم كل شيء، حتى الخِراءة! فقال: أجل! ثم ذكر الحديث.
والخراءة: قال الخطابي: مكسورة الخاء ممدودة الألف: التخلي والقعود للحاجة، قال: وأكثر الرواة يفتحون الخاء، ولا يمدون الألف.
وقال الجوهري في الصحاح:"الخَراءة" بالفتح والمد.
সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তোমাদেরকে সবকিছুই শিক্ষা দিয়েছেন, এমনকি পায়খানার পদ্ধতি পর্যন্ত? তিনি বললেন: হ্যাঁ! তিনি আমাদেরকে নিষেধ করেছেন যে, আমরা যেন মল-মূত্র ত্যাগের সময় কিবলাকে সামনে না করি, অথবা যেন ডান হাত দ্বারা ইসতিনজা (শৌচকার্য) না করি, অথবা যেন তিনটির কম পাথর দ্বারা ইসতিনজা না করি, অথবা যেন গোবর বা হাড় দ্বারা ইসতিনজা না করি।
1370 - عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا شرب أحدكم فلا يتنفَّس في الإناء، وإذا أتي أحدكم الخلاء فلا يمسَّ ذكره بيمينه، ولا يتمسح بيمينه".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (153) ومسلم في الطهارة (267) كلاهما من طريق يحيى بن أبي كثير، عن عبد الله بن أبي قتادة به مثله.
وفي رواية عند مسلم:"وأن يستطيب بيمينه".
وقوله"ولا يتمسح بيمينه" أي: لا يستنجي.
আবু কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ পান করলে সে যেন পাত্রের মধ্যে শ্বাস-প্রশ্বাস না ফেলে। আর তোমাদের কেউ যখন শৌচাগারে যায়, সে যেন তার পুরুষাঙ্গ ডান হাত দিয়ে স্পর্শ না করে এবং ডান হাত দিয়ে যেন শৌচকার্য না করে।"
1371 - عن حفصة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يجعل يمينه لطعامه وشرابه وثيابه، ويجعل شماله لما سوى ذلك.
حسن: رواه أبو داود (32) عن محمد بن آدم بن سليمان المصيصي، حدثنا ابن أبي زائدة، قال: حدثني أبو أيوب - يعني الإفريقي - عن عاصم، عن المسيب بن رافع ومعبد، أن حارثة بن وهب الخزاعي قال: حدثتني حفصة، فذكرته.
وصحَّحه ابن حبان (5227) والحاكم (4/ 109)، وقال:"هذا حديث صحيح، ولم يخرجاه". وتعقَّبه الذهبي فقال:"في سنده مجهولٌ". ولم يتبين لي من المراد به في قوله هذا؟ فإنَّ رجاله كلهم
معروفون، من ثقة إلى صدوق، غير أبي أيوب الإفريقي - وهو عبد الله بن علي الإفريقي، فإن أبا زرعة ليَّنه فقال:"في حديثه نكارة، ليس بالمتين". ولكن قال ابن معين:"ليس به بأس". فمثله لا ينزل حديثه عن درجة الحسن إذا لم يخالف.
وعاصم هو: ابن بهدلة أبو بكر المقرئ، صدوق له أوهام.
وأما ما روي عن عائشة رضي الله عنها قالت: كانت يد رسول الله صلى الله عليه وسلم اليُمني لطهوره وطعامه، وكانت يده اليُسرى لخلائه، وما كان من أذىً.
فهو منقطع رواه أبو داود (33) قال: حدثنا أبو توبة الربيع بن نافع، حدثني عيسى بن يونس، عن ابن أبي عروبة، عن أبي معشر، عن إبراهيم، عنها.
أبو معشر، وهو: زياد بن كليب الحنظلي، تكلم فيه أبو حاتم، ووثقه غيره.
وإبراهيم هو: ابن يزيد النخعي الفقه لم يسمع من عائشة، لأنه ولد عام 46 هـ وماتت عائشة عام 57 هـ على الصحيح.
হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ডান হাতকে খাবার, পানীয় এবং পোশাকের জন্য ব্যবহার করতেন এবং তাঁর বাম হাতকে এর বাইরে অন্যান্য কাজের জন্য ব্যবহার করতেন।
1372 - عن عبد الله بن مسعود قال: أتى النبيُّ صلى الله عليه وسلم الغائطَ، فأمرني أن آتيه بثلاثة أحجارٍ، فوجدت حجرين، والتمست الثالثَ فلم أجده، فأخذت روثة فأتيته بها، فأخذ الحجرين وألقى الروثة، وقال:"هذا رِكس".
صحيح: رواه البخاري في الوضوء (156)، عن أبي نعيم، قال: حدَّثنا زهير، عن أبي إسحاق، قال: ليس أبو عبيدة ذكره ولكن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، أنَّه سمع عبد الله يقول: فذكر الحديث.
قال البخاري: وقال إبراهيم بن يوسف: عن أبيه، عن أبي إسحاق: حدَّثني عبد الرحمن. انتهى.
قوله (رِكس): هي في لغة (رجس) بالجيم، وهو النجس، قال أبو عبيد: هو شبيه بالرجيع، يقال: ركستُ الشيء وأركستُه: إذا رددته. وقال النسائي (42): الركس: طعام الجن.
وفي رواية عند النسائي (39):"نهى أن يستطيب أحدكم بعظم أو روث".
وفي إسناده أبو عثمان بن سَنَّة الخُزاعي الراوي عن ابن مسعود،"مقبول" لأنه توبع.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শৌচাগারে গেলেন। এরপর তিনি আমাকে তিনটি পাথর নিয়ে আসতে আদেশ দিলেন। আমি দুটি পাথর খুঁজে পেলাম এবং তৃতীয়টি খুঁজতে লাগলাম, কিন্তু তা পেলাম না। তাই আমি একটি শুকনো গোবর নিয়ে তাঁর কাছে আসলাম। তিনি দুটি পাথর নিলেন এবং গোবরটি ফেলে দিলেন, আর বললেন: "এটা রিকস।"
1373 - عن علقمة قال: سألت ابن مسعود فقلت: هل شهد أحدٌ منكم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة الجنِّ؟ قال: لا. ولكنّا كُنَّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلةٍ، ففقدناه، فالتمسناه في الأودية والشعاب، فقلنا: استطير، أو اغتيل! قال: فبتنا بِشر ليلة بات بها قومٌ. فلما أصبحنا إذا هو جاءٍ من قِبَل حراء. قال: فقلنا: يا رسول الله! فقدناك فطلبناك فلم نجدك فبتنا بِشر ليلة بات بها قومٌ. فقال:"أتاني داعي الجنِّ، فذهبت معه،
فقرأت عليهم القرآن". قال: فانطلَقَ بنا فأرانا آثارهم وآثار نيرانهم. وسألوه الزاد. فقال:"لَكم كلُّ عظمٍ ذُكر اسم الله عليه يقع في أيديكم أوفر ما يكون لحمًا. وكلُّ بعرة علفٌ لدوابكم". فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فلا تستنجوا بهما؛ فإنَّهما طعام إخوانكم".
صحيح: رواه مسلم في الصلاة (450)، عن محمد بن المثنى، حدَّثنا عبد الأعلى، عن داود، عن عامر، قال: سألت علقمة: هل كان ابن مسعود شهد مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة الجنِّ؟ قال: فقال علقمة .. فذكر مثله.
ورواه من رواية إسماعيل بن إبراهيم ابن علية عن داود بن أبي هند بهذا الإسناد إلى قوله:"وآثار نيرانهم".
قال الشعبي:"وسألوه الزاد، وكانوا من جن الجزيرة، إلى آخر الحديث، من قول الشعبي مفصلًا من حديث عبد الله".
وساقه من وجه آخر (151) عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله، عن النبي صلى الله عليه وسلم إلى قوله:"وآثار نيرانهم" ولم يذكر ما بعده.
قال الدارقطني:"يرويه داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله، رواه عنه جماعة من الكوفيين والبصريين، فأما البصريون: فجعلوا قوله:"وسألوه الزاد" إلى آخر الحديث من قول الشعبي مرسلًا، وأما يحيى بن أبي زائدة وغيره من الكوفيين فأدرجوه في حديث ابن مسعود عن النبي صلى الله عليه وسلم، والصحيح: قول من فصله، فإنه من كلام الشعبي مرسلًا".
والحديث رواه الترمذي (18) عن هناد، حدثنا حفص بن غياث، عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله بن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تستنجوا بالروث ولا بالعظام، فإنه زاد إخوانكم من الجن".
قال:"وقد روي هذا الحديث إسماعيل بن إبراهيم وغيره، عن داود بن أبي هند، عن الشعبي، عن علقمة، عن عبد الله أنه كان مع النبي صلى الله عليه وسلم ليلة الجن"، الحديث بطوله، فقال الشعبي: إن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تستنجوا بالروث ولا بالعظام، فإنه زاد إخوانكم من الجن".
وقال:"وكأن رواية إسماعيل أصح من رواية حفص بن غياث".
قلت: وقد رجح مسلم رواية عبد الأعلى، عن داود، على رواية إسماعيل ابن علية وغيره لأنه صدر الحديث برواية عبد الأعلى، ثم قول الدارقطني، والصحيح من قول الشعبي، فإن الشعبي لا يقول مثل هذا من عند نفسه، فإنه لا بد قد وقف على المرفوع إلا أنه اختصر المسند، فيكون قوله في حكم المرفوع، فرجع الأمر إلى ترجيح ما رواه مسلم مرفوعًا.
ولحديث ابن مسعود طرق أخرى مرفوعة تقوي ما ذهب إليه مسلم، وسيأتي ذكر بعضها في
كتاب بدء الخلق.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আলকামা বলেন, আমি ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: তোমাদের মধ্যে কেউ কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জ্বীনের রাতে উপস্থিত ছিল? তিনি বললেন: না। কিন্তু এক রাতে আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম, তখন আমরা তাঁকে খুঁজে পাচ্ছিলাম না। আমরা তাঁকে উপত্যকা ও গিরিপথসমূহে খুঁজে ফিরলাম। আমরা বললাম: তাঁকে হয়তো বা জিনে উঠিয়ে নিয়ে গেছে, অথবা তাঁকে হত্যা করা হয়েছে! তিনি বললেন: এরপর আমরা খুব খারাপ অবস্থায় রাত কাটালাম, যেমন খারাপ রাতে কোনো কাওম রাত কাটাতে পারে। যখন সকাল হলো, তিনি হেরা পাহাড়ের দিক থেকে আসলেন। তখন আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনাকে খুঁজে পাচ্ছিলাম না এবং আপনাকে অনেক খুঁজেছি, কিন্তু পাইনি। আর আমরা খুবই খারাপ রাতে রাত কাটালাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমার নিকট জ্বীনের একজন আহ্বানকারী এসেছিল, তাই আমি তার সাথে গিয়েছিলাম এবং আমি তাদের সামনে কুরআন তিলাওয়াত করেছিলাম।” তিনি (ইবনে মাসঊদ) বললেন: এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে গেলেন এবং তাদের (জ্বীনদের) পদচিহ্ন ও তাদের আগুনের চিহ্ন দেখালেন। আর তারা তাঁর নিকট খাবার চাইল। তখন তিনি বললেন: “আল্লাহর নাম নেওয়া হয়েছে এমন প্রতিটি হাড় তোমাদের জন্য, যা তোমাদের হাতে পড়বে তা হবে সর্বাধিক মাংসে পূর্ণ। আর প্রতিটি গোবর বা শুকনো বিষ্ঠা তোমাদের জন্তুদের জন্য খাদ্য।” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সুতরাং তোমরা ঐ দু'টি দিয়ে ইস্তিঞ্জা করো না; কেননা এগুলি তোমাদের ভাইদের (জ্বীনদের) খাদ্য।”
1374 - عن أبي هريرة قال: اتبعتُ النبي صلى الله عليه وسلم وخرج لحاجته، فكان لا يلتفتُ، فدنوتُ منه، فقال:"ابغني أحجارا أستنفضُ بها - أو نحوه - ولا تأْتِني بعظم ولا روث". فأتيته بأحجار بطرف ثيابي فوضعتُها إلى جنْبه وأعرضتُ عنه، فلما قضى أتْبعَه بهِنَّ.
صحيح: رواه البخاري في كتاب الطهارة مختصرًا (155)، ورواه في كتاب المناقب، باب ذكر الجن (3860)، من طريق عمرو بن يحيى بن سعيد، قال: أخبرني جدِّي، (أي سعيد بن عمرو بن سعيد بن أبي العاص) عن أبي هريرة. وفيه قال أبو هريرة: فقلت: ما بال العظم والروثة؟ فقال:"هما طعام الجن، وإنه أتاني وفد من جن نصيبين، ونعم الجن، فسألوني الزاد، فدعوت الله أن لا يمروا بعظْم ولا بروثةٍ إلا وجدوا عليها طعامًا".
وزاد الدارقطني (1/ 56) بإسناد آخر عن أبي حازم، عن أبي هريرة: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم نهى أن يستنجى بعظم أو روثٍ، وقال:"إنَّهما لا يُطهِّران". وقال عقبه الدارقطني:"إسناده صحيح".
لكن تكلّم ابن عدي في أحد رواته، وهو سلمة بن رجاء الذي يروي عن الحسن بن فرات، عن أبيه، عن أبي حازم به. قال ابن عدي:"لا أعلم رواه عن فرات غير ابنه الحسن، وعن الحسن سلمة بن رجاء، ولسلمة بن رجاء غير ما ذكرت من الحديث، وأحاديثه أفراد وغرائب، ويحدِّث عن قومٍ بأحاديث لا يُتابع عليها". انتهى
وقوله"أستنفض بها" من الاستنفاض، وهو إزالة الأذى والاستنجاء، وأصل النفض: الحركة والإزالة، (نفضتُ الثوب) إذا أزَلتَ غباره عنه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অনুসরণ করলাম। তিনি তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজন পূরণের জন্য বের হলেন। তিনি (পেছনে) ফিরে তাকাচ্ছিলেন না। আমি তাঁর কাছে গেলাম। তখন তিনি বললেন: "আমার জন্য কিছু পাথর খুঁজে আনো, যা দিয়ে আমি পরিষ্কার হতে পারি – অথবা অনুরূপ কিছু – কিন্তু আমার কাছে কোনো হাড্ডি বা গোবর এনো না।" অতঃপর আমি আমার কাপড়ের কোণায় করে কিছু পাথর এনে তাঁর পাশে রাখলাম এবং তাঁর থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলাম। যখন তিনি (প্রয়োজন) সেরে নিলেন, তখন তিনি সেগুলো দ্বারা (শৌচকার্য) করলেন।
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম: "হাড্ডি ও গোবরে কী হলো (কেন নিষেধ করলেন)?" তিনি বললেন: "এগুলো হলো জিনদের খাদ্য। একবার নসীবাইনের উত্তম জিনদের একটি প্রতিনিধিদল আমার কাছে এসেছিল। তারা আমার কাছে খাদ্য চেয়েছিল। তখন আমি আল্লাহর কাছে দু'আ করলাম যে, তারা যেন কোনো হাড্ডি বা গোবরের কাছ দিয়ে না যায়, কিন্তু তার উপর যেন খাবার খুঁজে পায়।"
ইমাম দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) অন্য এক সূত্রে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাড্ডি বা গোবর দ্বারা ইস্তিঞ্জা (শৌচকার্য) করতে নিষেধ করেছেন এবং বলেছেন: "নিশ্চয়ই এই দুটো পবিত্র করে না।"
1375 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُتمسَّح بعظمٍ أو بيعرٍ.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (263) عن أبي الزبير أنه سمع جابرا يقول، فذكر الحديث.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হাড় অথবা গোবর দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করতে নিষেধ করেছেন।
1376 - عن شيبان القِتْباني أن مسلمة بن مُخَلَّد استعمل رُويفع بن ثابت على أسفل الأرض، قال شيبان: فسرنا معه من كُوم شريك إلى عَلْقَماءَ، أو من علقماءَ إلى كوم شريك - يريد عِلْقَام - فقال رويفع: إن كان أحدنا في زمن رسول الله صلى الله عليه وسلم ليأخذ نِضْوَ أخيه على أن له النصف مما يغنم ولنا النصف، وإن كان أحدنا ليطير له النصل والريش، وللآخر القدح، ثم قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا رُويفع! لعل الحياة ستطول بك بعدي، فأَخبرِ الناس أنه من عقد لحيته، أو تقلد وَتَرًا، أو استنجي برجيع دابة أو عظمٍ فإن محمدا منه بريء".
حسن: أخرجه أبو داود (36) عن عَيَّاش بن عباس القِتْباني، أن شُيَيْم بن بَيْتان أخبره، عن شَيبان القِتْباني، فذكر الحديث.
وشيبان - وهو ابن أمية، يكنى أبا حذيفة، كما قال أبو داود وسكت عنه - وقال الحافظ في التقريب:"مجهول"، وقال في تهذيب التهذيب:"روى عنه شُيَيم بن بيتان وبكر بن سوادة".
وعلى هذا فهو على شرط ابن حبان، إلا أنه لم يذكره في الثقات على قاعدته في توثيق المجاهيل، كما لم يذكره أيضًا في المجروحين.
ولكن رواه النسائي (5067) عن عياش بن عباس القتباني، أن شُيَيم بن بينان حدثه أنه سمع رويفع بن ثابت يقول، فذكر الجزء المرفوع.
وشُيَيْم بن بيتان قد صحّ سماعه من رويفع، ووثقه ابن معين وغيره، فصحّ الإسناد بدون شيبان القتباني، فلعله سمع منه أولًا، ثم سمع من رويفع مباشرة، إلا أن البزار قال في"مسنده":"شُيَيْم غير مشهور" ذكره الحافظ في تهذيب التهذيب في ترجمته.
ثم روى أبو داود رواية ثانية من حديث عبد الله بن عمرو، قال: حدثنا يزيد بن خالد، ثنا مفضل عن عيّاش، أن شُيَيْم بن بيتان أخبره بهذا الحديث أيضًا عن أبي سالم الجيشاني، عن عبد الله بن عمرو، يذكر ذلك وهو معه مرابطٌ بِحصن باب أليون.
وقد حكم بعض أهل العلم على الحديث بالاضطراب؛ لأجل الخلاف في الإسناد؛ فإنه مرة جُعل الحديث من مسند رويفع بن ثابت، وأخرى من مسند عبد الله بن عمرو، ثم الراوي عن رويفع مرة شيبان بن أمية، وأخرى شُيَيْم بن بيتان.
ويمكن دفع هذا الاضطراب بأن يجعل الحديث من مسندي رويفع وعبد الله، ثم أن شُيَيْم سمع أولًا من شيبان فروى عنه عن رويفع، ثم سمع مباشرة عن رويفع فروى عنه، كما في رواية النسائي، وأحمد (4/ 108).
فإن شُيَيْم ثقة لا يحكم عليه بالاضطراب ما أمكن الجمع.
ضبط الأسماء وشرح الأماكن:
- حصن أليون: على جبل بالفسطاط. قاله أبو داود.
- القِتْباني - بكسر القاف وسكون المثناة الفرقانية ونون - نسبة إلى قتبان بن رومان.
- شُيَيْم - بضم أوله وفتح تحتانيته وسكون مثلها مصغرا، وقيل: بكسر أوله، ابن بيتان، بلفظ تثنية بيت.
- ومُخلَّد - على وزن محمد - ومسلمة بن مخلد الأنصاري الزرقي، كان واليا على مصر أيام معاوية، قال البخاري: كان له صحبة، مات سنة 62 هـ، وكانت ولايته على مصر وإفريقية ست عشرة سنة.
- وقوله (استعمل) أي: جعل رويفع بن ثابت عاملًا وأميرًا على أسفل الأرض، أي: أرض مصر، وهو الوجه البحري، وقيل: الغربي.
- كُوم شريك: وشريك هو ابن سمي المرادي الغطيفي، صحابي، شهد فتح مصر، وإنما
أضيف له كوم إذ إن عمرو بن العاص لما سار لفتح الإسكندرية، وشريك على مقدمته خرج عليهم جمع عظيم من الروم، فخافهم على أصحابه، فلجأ إلى الكوم ودافعهم، وهو في طريق الإسكندرية.
- علقماء - بفتح العين وسكون اللام ثم القاف مفتوحة - موضع من أسفل ديار مصر.
- وقوله (أو من علقماء إلى كوم شريك): هذا شك من شيبان، والمراد به: أنّ ابتداء السير كان من كوم شريك أو من علقماء، وعلى كل تقدير فمن أحد الموضعين كان ابتداء السير، وإلى الآخر انتهاؤه.
- قوله (يريد علقام): وهو موضع آخر غير علقماء، ويقال له: كوم علقام.
- والنضو: البعير المهزول، يقال: بعير نضو، وناقة نضو ونضوة، وهو الذي أنفاه العمل وهزله الكدّ والجهد. وفي هذا حجة لمن أجاز أن يعطي الرجل فرسه أو بعيره على شطر ما يصيبه المستأجر من الغنيمة.
- وقوله (وإن كان أحدنا ليطير له النصل) أي: يصيبه في القسمة، يقال: (طار لفلان النصف، ولفلان الثلث) إذا وقع له ذلك في القسمة.
- والقدح: خشب السهم قبل أن يراش ويركب فيه النصل.
وغرض رويفع رضي الله عنه من هذا الكلام بيان حال ابتداء الإسلام بأنه كان إذ ذاك خفيفا، وفيه إعلام بأنه كان قديم الإسلام
- وقوله صلى الله عليه وسلم:"أخبر الناس أنه من عقد لحيته" قال الخطابي: يفسر ذلك على وجهين: أحدهما: ما كانوا يفعلونه من ذلك في الحروب؛ كانوا في الجاهلية يعقدون لحاهم، وذلك من زيّ الأعاجم، يفتلونها ويعقدونها.
وقيل معناه: معالجة الشعر ليتعقد ويتجعد، وذلك من فعل أهل التوضيع والتأنيث. انتهى.
- وقوله عليه الصلاة السلام:"أو تقلد وَتَرًا" وهو: خيط فيه تعويذ، أو خرزات لدفع العين، والحفظ عن الآفات، كانوا يعلقونها على رقبة الولد والفرس، فأبطل النبي صلى الله عليه وسلم ذلك من فعلهم ونهاهم عنه.
وقال أبو عبيدة: الأشبه أنه نهى عن تقليد الخيل أوتار القسي، نُهُوا عن ذلك إما لاعتقادهم أن تقليدها بذلك يدفع عنها العين، أو مخافة اختناقها به، لا سيما عند شدة الركض، بدليل ما روي أنه صلى الله عليه وسلم أمر بقطع الأوتار عن أعناق الخيل.
- وقوله:"فإن محمدًا منه بريء" من باب الوعيد والمبالغة في الزجر الشديد.
রুইফা‘ বিন সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শায়বান আল-কিত্ববানী থেকে বর্ণিত যে, মাসলামাহ ইবনে মুখাল্লাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রুইফা‘ বিন সাবিতকে নিম্ন অঞ্চলের শাসক হিসেবে নিযুক্ত করেন। শায়বান বলেন: আমরা তাঁর সাথে কুম শারিক থেকে আলক্বামা পর্যন্ত, অথবা আলক্বামা থেকে কুম শারিক পর্যন্ত—অর্থাৎ আলক্বামের দিকে—সফর করেছিলাম। অতঃপর রুইফা‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে আমাদের কেউ কেউ তার অপর ভাইয়ের দুর্বল উট নিত এই শর্তে যে, যুদ্ধে যা গনীমত পাওয়া যেত তার অর্ধেক সে পেত এবং বাকি অর্ধেক আমরা পেতাম। আর আমাদের কেউ কেউ (বণ্টনে) তীরফলক ও পালক পেত, এবং অন্যজন পেত তীরের কাষ্ঠখণ্ড। এরপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বলেছেন: “হে রুইফা‘! সম্ভবত আমার পরে তোমার জীবন দীর্ঘ হবে। অতএব তুমি লোকদের জানিয়ে দাও যে, যে ব্যক্তি তার দাড়িকে পেঁচিয়ে রাখল (বা বাঁধল), অথবা যে তাগা বা ধনুকের রজ্জু পরিধান করল, অথবা যে কোনো পশুর গোবর বা হাড় দিয়ে ইস্তিনজা করল, তবে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুক্ত।”
1377 - عن أنس بن مالك يقول: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا خرج لحاجته أجيء أنا وغلام معنا
إداوة من ماء. يعني يستنجي به.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (150) واللفظ له، ومسلم في الطهارة (271) كلاهما من طريق شعبة عن أبي معاذ - وهو عطاء بن أبي ميمونة - أنه سمع أنس بن مالك يقول، فذكر الحديث. ولفظ مسلم: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدخل الخلاءَ، فأحمل أنا وغلام نحوي إداوةً من ماءٍ وعَنَزةً، فيستنجي بالماء.
وفي حديث غير شعبة عند مسلم: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل حائطا، وتبعه غلام معه ميضأةً، هو أصغرنا، فوضعها عند سِدْرةٍ، فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم حاجته، فخرج علينا وقد استنجى بالماء. وفي رواية عنده: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يتبرز لحاجته، فآتيه بالماء فيتغسَّلُ به.
شرح المفردات:
"عنَزة" يعني عصا طويلة في أسفلها زجّ، ويقال رمح صغير.
"ميضأة" هو الإناء الذي يتوضأ به كالركوة والإبريق وشبههما.
"سِدرة" شجرة النبق.
"يتبرز" معناه يأتي البراز، وهو المكان الواسع الطاهر من الأرض؛ ليخلو لحاجته ويبعد عن أعين الناظرين.
"فيتغسَّلُ به" معناه يستنجي به، ويغسل محل الاستنجاء.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন প্রয়োজন সারতে যেতেন, তখন আমি এবং আমাদের সঙ্গে থাকা একটি বালক পানির একটি পাত্র (ইদাওয়াহ) নিয়ে আসতাম। অর্থাৎ তিনি তা দ্বারা ইসতিনজা (পবিত্রতা অর্জন) করতেন।
1378 - عن عائشة قالت: مُرْنَ أزواجَكنَّ أن يستطيبوا بالماء؛ فإني - أسْتَحْيِيهم منه، فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يفعلُه.
صحيح: رواه الترمذي (19) والنسائي (46) كلاهما عن قتيبة، قال: حدثنا أبو عوانة، عن قتادة، عن معاذة، عنها.
قال الترمذي:"حسن صحيح". وصححه أيضًا ابن حبان (1443).
قلت: وهو كما قال؛ فإن إسناده صحيح.
أبو عوانة هو: وضاح بن عبد الله اليشكري، مشهور بكنيته، ثقة ثبت.
ومعاذة هي: بنت عبد الله العدوية أم الصهباء البصرية، ثقة فاضلة.
وقولها:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعله" أي: فهو أولى وأحسن، ولم يرد أن الاكتفاء بالأحجار لا يجوز، وكانت رضي الله عنها تستحيي أن تأمر الرجال بذلك فأوعزت إلى النساء أن يأمرن أزواجهن أن يستنجوا بالماء
وأما ما روي عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نزلت في أهل قُباء: {فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ} [سورة التوبة 108] قال: كانوا يستنجون بالماء؛ فنزلت فيهم هذه
الآية" فهو حديث ضعيف، رواه أبو داود (44) والترمذي (3100) وابن ماجه (357) كلهم من طريق معاوية بن هشام، عن يونس بن الحارث، عن إبراهيم بن أبي ميمونة، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قال الترمذي: غريب من هذا الوجه.
قلت: فيه علتان: يونس بن الحارث الثقفي الطائفي ضعيف، وإبراهيم بن أبي ميمونة مجهول الحال. انظر للمزيد:"المنة الكبري" (1/ 91).
ومنها حديث عُويم بن ساعدة بمعناه وفيه ضعف، وسيأتي تخريجه كاملًا في كتاب التفسير إن شاء الله تعالى.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা তোমাদের স্বামীদের আদেশ করো যেন তারা পানি দ্বারা ইস্তিঞ্জা (শৌচকার্য) করে; কারণ আমি তাদের এ বিষয়ে বলতে লজ্জা বোধ করি। নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এটি করতেন।
1379 - عن عائشة أن أزواج النبي صلى الله عليه وسلم كنّ يخرجن بالليل إذا تبرَّزْن إلى المناصِع - وهو صَعيد أفْيَحُ - فكان عمر يقول للنبي صلى الله عليه وسلم: احجُبْ نساءَك، فلم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعل، فخرجت سَودةُ بن زَمْعة زوج النبي صلى الله عليه وسلم ليلةً من الليالي عِشاءً، وكانت امرأةً طويلةً، فناداها عمر: ألا قد عرفناكِ يا سَودةُ! حِرصًا على أن يُنْزلَ الحجابُ؛ فأنزل الله آية الحجاب.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (146) ومسلم في السلام (2170/ 18) كلاهما من حديث ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة فذكرت الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর স্ত্রীগণ রাতে প্রাকৃতিক প্রয়োজন সারতে মানাসি নামক স্থানে যেতেন—যা ছিল এক প্রশস্ত উন্মুক্ত স্থান। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতেন: আপনার স্ত্রীদেরকে পর্দার ব্যবস্থা করুন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তা করতেন না। এরপর এক রাতে ইশার সময় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর স্ত্রী সাওদা বিনত যাম‘আ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন। তিনি ছিলেন দীর্ঘাঙ্গী মহিলা। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তাঁকে ডেকে বললেন: হে সাওদা, আমরা তোমাকে চিনে ফেলেছি! (তিনি এমনটি বলেছিলেন) এ কারণে যে, যেন পর্দার আয়াত নাযিল হয়। ফলে আল্লাহ পর্দার আয়াত নাযিল করলেন।
1380 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"قد أُذِن أن تخرجْنَ في حاجتكن". قال هشام: يعني البراز.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (147) هكذا مختصرا عن زكريا قال: حدثنا أبو أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرت الحديث. ورواه في التفسير (4795) مفصلا بالإسناد السابق، - وزكريا هو: ابن يحيى - قالت فيه عائشة: خرجَتْ سودة بعد ما ضُرب الحجابُ لحاجتها، وكانت امرأة جسيمة لا تخفى على من يعرفها، فرآها عمر بن الخطاب فقال: يا سَودة! أما والله! ما تَخْفَينَ علينا؛ فانظري كيف تَخْرُجين، قالت: فانكفأتْ راجعة، ورسول الله صلى الله عليه وسلم في بيتي، وإنه ليتعشَّى وفي يده عَرُقٌ، فدخلت فقالت: يا رسول الله! إني خرجتُ لبعض حاجتي، فقال لي عمر كذا وكذا، قالت: فأوحى الله إليه، ثم رفع عنه، وإن العرْق في يده ما وضعه، فقال:"إنه قد أُذِن لكُنّ أن تخرجْن لحاجتكنّ".
ورواه أيضًا مسلم في السلام (2170/ 17) عن أبي بكر بن أبي شيبة وأبي كريب قالا: حدثنا أبو أسامة به مثله، وفيه:"وكانت امرأة جسيمة تفرعُ النساء جسمًا". ومعني تفرع: تطول؛ يقال:
فرعتُ القومَ، أي: طُلتُهم. والعَرْق: هو العظم الذي عليه بقية لحم.
وظاهر رواية هشام يخالف رواية ابن شهاب؛ فإن في رواية هشام وقعت القصة بعد نزول الحجاب، وفي رواية ابن شهاب قبل نزول الحجاب، فالجواب: لعل القصة وقعت مرتين لغرضين مختلفين، رواهما عروةُ في مجلسين مختلفين، فروى كل من هشام وابن شهاب ما سمع منه.
وقوله صلى الله عليه وسلم:"إنه قد أُذن لكنَّ أن تخرجْنَ لحاجتكنّ" أي: لم يفرض بناء الكنف في البيوت حتى يُمنعن من الخروج؛ لأن الخروج لحاجة الإنسان لا يحتاج إلى الإذن، فلما بُنيت الكُنُفُ في البيوت مُنِعن من الخروج إلا لحاجة؛ ففي حديث عبد الله بن عمر:"ارتقيت فوق ظهر يت حفصة لبعض حاجتي فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقضي حاجته مستدبر القبلة ومستقبل الشام" دليل على بناء الأخلية في البيوت.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন পর্দার বিধান নাযিল হলো, তখন সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর প্রয়োজনে বাইরে গেলেন। তিনি ছিলেন দীর্ঘদেহী মহিলা, ফলে যারা তাঁকে চিনত তাদের থেকে লুকানো তাঁর পক্ষে সম্ভব ছিল না। উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে দেখে বললেন, “হে সাওদা! আল্লাহর কসম! আপনি আমাদের থেকে লুকাবেন না; সুতরাং দেখুন, আপনি কীভাবে বের হচ্ছেন।”
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফিরে এলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আমার ঘরে রাতের খাবার খাচ্ছিলেন এবং তাঁর হাতে ছিল একটি ‘আরক্ব’ (মাংসযুক্ত হাড়)। সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে প্রবেশ করে বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল! আমি আমার কোনো প্রয়োজনে বাইরে গিয়েছিলাম, তখন উমার আমাকে এমন এমন কথা বলেছেন।”
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর তাঁর প্রতি অহী নাযিল হলো। যখন অহীর অবস্থা দূর হলো, তখনো তাঁর হাতে সেই ‘আরক্ব’ (মাংসযুক্ত হাড়) ছিল, তিনি তা নিচে রাখেননি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমাদের প্রয়োজনে (প্রাকৃতিক ডাকে সাড়া দিতে) বাইরে যাওয়ার অনুমতি দেওয়া হয়েছে।”