আল-জামি` আল-কামিল
13568 - عن محمود بن لبيد، قال: لما نزلت: {أَلْهَاكُمُ التَّكَاثُرُ} فقرأها حتى بلغ {ثُمَّ لَتُسْأَلُنَّ يَوْمَئِذٍ عَنِ النَّعِيمِ} قالوا: يا رسول الله! عن أي نعيم نُسْأل؟ وإنما هما الأسودان الماء والتمر، وسيوفنا على رقابنا، والعدو حاضر، فعن أي نعيم نُسْأل؟ قال:"إن ذلك سيكون".
حسن: رواه أحمد (23640) عن يزيد بن هارون، وابن أبي شيبة (35486) عن محمد بن بشر، وهناد بن السري في الزهد (768) عن عبدة بن سليمان، والبيهقي في الشعب (4278) من طريق أبي أسامة حماد بن سلمة، أربعتهم (يزيد، محمد بن بشر، عبدة وأبو أسامة) عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن صفوان بن سليم، عن محمود بن لبيد، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة فإنه حسن الحديث.
وكلا الحديثين عن محمد بن عمرو بن علقمة محفوظان، أعني حديث الزبير بن العوام وحديث محمود بن لبيد.
মাহমুদ ইবনে লাবীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন (কুরআনের আয়াত) {তোমাদেরকে মোহাচ্ছন্ন করে রেখেছে প্রাচুর্যের প্রতিযোগিতা} নাযিল হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা পাঠ করলেন এবং যখন তিনি এ পর্যন্ত পৌঁছলেন: {এরপর অবশ্যই সেদিন তোমাদেরকে ভোগ-বিলাস (নেয়ামত) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হবে।} তখন সাহাবীরা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কোন নেয়ামত সম্পর্কে আমাদের জিজ্ঞেস করা হবে? আমাদের কাছে তো শুধু দুটি কালো জিনিস—পানি ও খেজুর—রয়েছে। আর আমাদের তলোয়ার আমাদের ঘাড়ে (অর্থাৎ সর্বদা যুদ্ধাবস্থায়) এবং শত্রুও উপস্থিত। তাহলে আমরা কোন নেয়ামত সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হব? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তা (সেই নেয়ামত) ভবিষ্যতে আসবে।"
13569 - عن جابر بن عبد الله قال: قتل أبي يوم أحد، وترك حديقتين، وليهودي عليه تمر، وتمر اليهودي يستوعب ما في الحديقتين، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هل لك أن تأخذ العام بعضا، وتؤخر بعضا إلى قابل؟" فأبى، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا حضر الجداد فآذني" قال: فآذنته، فجاء النبي صلى الله عليه وسلم وأبو بكر وعمر، فجعلنا نَجُدُّ، ويكال له من أسفل النخل، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو بالبركة، حتى أوفيناه جميع حقه من أصغر الحديقتين - فيما يحسب عمار - ثم أتيناهم برطب وماء، فأكلوا وشربوا، ثم قال:"هذا من النعيم الذي تسألون عنه".
صحيح: رواه النسائي (3639) وأحمد (15206) - واللفظ له -، وأبو يعلى (2161) وصحّحه ابن حبان (3411) كلهم من طريق حماد بن سلمة، عن عمار بن أبي عمار، عن جابر بن عبد الله، قال: فذكره. وإسناده صحيح.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার পিতা উহুদের যুদ্ধে শহীদ হন। তিনি দুটি বাগান রেখে গিয়েছিলেন, আর এক ইহুদীর কাছে (তাঁর পাওনা) খেজুর ছিল। সেই ইহুদীর পাওনা খেজুর এত বেশি ছিল যে তা দুটি বাগানের সব ফলকে গ্রাস করত (অর্থাৎ, দুটি বাগানের ফলের চেয়েও তার পাওনা বেশি ছিল)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি এই বছর কিছু পরিমাণ নিয়ে নেবে এবং বাকিটা আগামী বছরের জন্য বাকি রাখবে?" কিন্তু সে (ইহূদী) অস্বীকার করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন খেজুর পাড়ার সময় হবে, তখন আমাকে জানিয়ো।" তিনি (জাবির) বললেন: আমি তাঁকে জানালাম। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন। আমরা খেজুর পাড়তে লাগলাম এবং নিচু গাছের দিক থেকে তাকে (ইহূদীকে) পরিমাপ করে দেওয়া হতে থাকলো, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বরকতের জন্য দু'আ করছিলেন। এমনকি আমরা ছোট বাগানটি থেকেই তার সমস্ত হক (পাওনা) পুরোপুরি পরিশোধ করে দিলাম – যেমনটা আম্মার মনে করতেন। এরপর আমরা তাঁদের জন্য তাজা খেজুর ও পানি নিয়ে আসলাম। তাঁরা খেলেন এবং পান করলেন। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এগুলো সেই নেয়ামতের অন্তর্ভুক্ত, যা সম্পর্কে তোমাদের জিজ্ঞাসা করা হবে।"
13570 - عن أبي هريرة قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات يوم أو ليلة فإذا هو بأبي بكر
وعمر، فقال:"ما أخرجكما من بيوتكما هذه الساعة؟" قالا: الجوع يا رسول الله!
قال:"وأنا والذي نفسي بيده لأخرجني الذي أخرجكما قوموا". فقاموا معه، فأتى رجلا من الأنصار، فإذا هو ليس في بيته، فلما رأته المرأةُ قالت: مرحبا وأهلا. فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أين فلان؟"، قالت: ذهب يستعذب لنا من الماء، إذ جاء الأنصاري فنظر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وصاحبيه، ثم قال: الحمد لله ما أحد اليوم أكرم أضيافا مني، قال: فانطلق، فجاءهم بعذقٍ، فيه بُسرٌ وتمرٌ ورطبٌ. فقال: كلوا من هذه، وأخذ المدية، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إياك والحلوب". فذبح لهم فأكلوا من الشاة، ومن ذلك العذق وشربوا، فلما أن شبعوا ورووا قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر وعمر:"والذي نفسي بيده! لتسألن عن هذا النعيم يوم القيامة، أخرجكم من بيوتكم الجوع، ثم لم ترجعوا حتى أصابكم هذا النعيم".
وفي رواية:"لا تذبحنَّ ذاتَ دُرٍّ".
صحيح: رواه مسلم في الأشربة (2038: 140) عن أبي بكر بن أبي شيبة، ثنا خلف بن خليفة، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একদিন অথবা এক রাতে বের হলেন। হঠাৎ তিনি আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে পেলেন। তিনি বললেন, "এই সময়ে কিসের কারণে তোমরা তোমাদের ঘর থেকে বের হয়েছ?" তারা উভয়ে বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! ক্ষুধা।" তিনি বললেন, "যার হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! তোমাদের যা বের করে এনেছে, আমাকেও তাই বের করে এনেছে। তোমরা ওঠো।"
অতঃপর তারা তাঁর সঙ্গে উঠলেন। তিনি আনসারদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তির বাড়িতে এলেন। কিন্তু তিনি (বাড়ির মালিক) বাড়িতে ছিলেন না। যখন তাঁর স্ত্রী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখলেন, তখন বললেন, "মারহাবা ও স্বাগতম।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন, "অমুক কোথায়?" তিনি বললেন, "আমাদের জন্য সুমিষ্ট পানি আনতে গেছেন।"
এমন সময় আনসারী লোকটি এসে পড়লেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও তাঁর দুই সঙ্গীর দিকে তাকালেন। অতঃপর বললেন, "আলহামদুলিল্লাহ (সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর)! আজ আমার চেয়ে উত্তম মেহমান আর কারো নেই।" বর্ণনাকারী বলেন, এরপর সে গেল এবং তাদের জন্য খেজুরের একটি ছড়া নিয়ে এলো, যাতে কাঁচা (বুসর), পাকা (তামর) ও আধাপাকা (রুতাব) খেজুর ছিল। সে বলল, "তোমরা এগুলো খাও।" এরপর সে একটি ছুরি নিল।
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন, "দুধেল পশু যবেহ করা থেকে সাবধান!" অতঃপর সে তাদের জন্য একটি বকরী যবেহ করল। তারা সেই বকরীর গোশত ও ঐ ছড়া থেকে খেলেন এবং পান করলেন।
যখন তারা তৃপ্ত হলেন ও পেট ভরে পান করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন, "যার হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! কিয়ামতের দিন তোমাদেরকে এই নিয়ামত সম্পর্কে অবশ্যই জিজ্ঞাসা করা হবে। ক্ষুধা তোমাদেরকে ঘর থেকে বের করে এনেছিল, এরপর তোমরা ঘরে ফিরে গেলে না, যতক্ষণ না এই নিয়ামত লাভ করলে।"
অন্য বর্ণনায় আছে: "দুধেল পশু যবেহ করো না।"
13571 - عن أبي عسيب قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلا فمَرَّ بي، فدعاني إليه فخرجت، ثم مرَّ بأبي بكر فدعاه فخرج إليه، ثم مرَّ بعمر فدعاه فخرج إليه، فانطلق حتى دخل حائطا لبعض الأنصار، فقال لصاحب الحائط:"أطعمنا بسرا" فجاء بعذق فوضعه فأكل رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه، ثم دعا بماء بارد فشرب، فقال:"لتسألن عن هذا يوم القيامة" قال: فأخذ عمر العذق، فضرب به الأرض، حتى تناثر البسر قبك رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال: يا رسول الله! أإنا لمسؤولون عن هذا يوم القيامة؟ قال:"نعم إلا من ثلاث: خرقة كف بها الرجل عورته، أو كسرة سد بها جوعته، أو جحر يتدخل فيه من الحر والقر".
حسن: رواه أحمد (20678) عن سريج (هو ابن النعمان)، حدثنا حشرج، عن أبي نصيرة (واسمه مسلم بن عبيد)، عن أبي عسيب مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وإسناده حسن من أجل حشرج وهو ابن نباتة الأشجعي، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يكن في حديثه ما ينكر، وحديثه هذا له شواهد كثيرة.
وفي الحديث إشارة إلى أن الحياة لا تستقيم إلا بثلاثة أشياء: وهي اللباس والطعام والسكن.
আবু উসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের বেলা বের হলেন এবং আমার পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন। তিনি আমাকে তাঁর দিকে আহ্বান করলেন, তখন আমি বের হলাম। এরপর তিনি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে গেলেন, তাকেও আহ্বান করলেন, তিনিও তাঁর কাছে গেলেন। এরপর তিনি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে গেলেন, তাকেও আহ্বান করলেন, তিনিও তাঁর কাছে গেলেন। অতঃপর তারা চলতে থাকলেন এবং আনসারদের কারো একটি বাগানে প্রবেশ করলেন। তিনি বাগানের মালিককে বললেন: "আমাদেরকে কিছু কাঁচা খেজুর (বসর) খেতে দাও।" তখন সে এক কাঁদি খেজুর এনে রাখল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ তা খেলেন। এরপর তিনি ঠাণ্ডা পানি চাইলেন এবং পান করলেন। তখন তিনি বললেন: "কিয়ামতের দিন অবশ্যই তোমাদেরকে এসব সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হবে।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খেজুরের কাঁদিটি নিলেন এবং জমিনে এমনভাবে আঘাত করলেন যে কাঁচা খেজুরগুলো (বসর) ছড়িয়ে পড়ল। এরপর তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! কিয়ামতের দিন কি আমাদের এসব বিষয়েও জবাবদিহি করতে হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, তবে তিনটি জিনিস ছাড়া: (১) একটি কাপড় যা দ্বারা মানুষ তার সতরকে আবৃত করে, অথবা (২) এক টুকরো খাবার যা দ্বারা সে তার ক্ষুধা নিবারণ করে, অথবা (৩) এমন একটি আশ্রয়স্থল যেখানে সে গরম ও শীত থেকে প্রবেশ করে।"
13572 - عن ابن عباس، قال: خرج أبو بكر بالهاجرة إلى المسجد، فسمع بذلك عمر، فقال: يا أبا بكر! ما أخرجك هذه الساعة؟ قال: ما أخرجني إلا ما أجد من حاقِّ الجوع، قال: وأنا - والله - ما أخرجني غيره، فبينما هما كذلك، إذ خرج عليهما النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"ما أخرجكما هذه الساعة؟" قالا: والله! ما أخرجنا إلا ما نجد في بطوننا من حاقِّ الجوع، قال:"وأنا والذي نفسي بيده! ما أخرجني غيره، فقوما".
فانطلقوا حتى أتوا باب أبي أيوب الأنصاري، وكان أبو أيوب يدخر لرسول الله صلى الله عليه وسلم طعاما أو لبنًا، فأبطأ عنه يومئذ، فلم يأت لحينه، فأطعمه لأهله، وانطلق إلى نخله يعمل فيه، فلما انتهوا إلى الباب، خرجت امرأته، فقالت: مرحبا بنبي الله صلى الله عليه وسلم وبمن معه، فقال لها نبي الله صلى الله عليه وسلم:"فأين أبو أيوب؟" فسمعه وهو يعمل في نخل له، فجاء يشتد، فقال: مرحبا بنبي الله صلى الله عليه وسلم وبمن معه، يا نبي الله! ليس بالحين الذي كنت تجيء فيه، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"صدقت" قال: فانطلق، فقطع عذقًا من النخل فيه من كل التمر والرطب والبسر، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ما أردت إلى هذا، ألا جنيت لنا من تمره؟" فقال: يا نبي الله! أحببت أن تأكل من تمره ورطبه وبسره، ولأذبحنّ لك مع هذا. قال:"إن ذبحت، فلا تذبحن ذات در"، فأخذ عناقًا أو جديًا، فذبحه، وقال لامرأته: اخبزي واعجني لنا وأنت أعلم بالخبز، فأخذ الجدي، فطبخه وشوى نصفه.
فلما أدرك الطعام، وضع بين يدي النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه، فأخذ من الجدي، فجعله في رغيف، فقال:"يا أبا أيوب! أبلغ بهذا فاطمة، فإنها لم تصب مثل هذا منذ أيام"، فذهب به أبو أيوب إلى فاطمة، فلما أكلوا وشبعوا، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"خبز ولحم وتمر وبسر ورطب" ودمعت عيناه،"والذي نفسي بيده! إن هذا لهو النعيم الذي تسألون عنه، قال الله جل وعلا: {ثُمَّ لَتُسْأَلُنَّ يَوْمَئِذٍ عَنِ النَّعِيمِ}، فهذا النعيم الذي تسألون عنه يوم القيامة" فكبر ذلك على أصحابه، فقال:"بل إذا أصبتم مثل هذا، فضربتم بأيديكم، فقولوا: بسم الله، وإذا شبعتم، فقولوا: الحمد لله الذي هو أشبعنا، وأنعم علينا وأفضل، فإن هذا كفاف بها".
فلما نهض، قال لأبي أيوب"ائتنا غدًا"، وكان لا يأتي إليه أحد معروفًا إلا أحب أن يجازية، قال: وأن أبا أيوب لي يسمع ذلك، فقال عمر: إن النبي صلى الله عليه وسلم أمرك أن تأتيه غدًا، فأتاه من الغد، فأعطاه وليدته، فقال:"يا أبا أيوب! استوص بها خيرًا، فإنا لم نرى إلا خيرًا ما دامت عندنا"، فلما جاء بها أبو أيوب من عند رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: لا
أجد لوصية رسول الله صلى الله عليه وسلم خيرًا من أن أعتقها، فأعتقها.
حسن: رواه ابن حبان (5216) والطبراني في الصغير (185) كلاهما من طريق علي بن خشرم، قال: أخبرنا الفضل بن موسى، عن عبد الله بن كيسان، قال: حدثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن كيسان، وهو المروزي، فإنه حسن الحديث، إلا في رواية ابنه عنه، فإنه يتقى منه، كما قال ابن حبان في الثقات (7/ 33) إلا أن في بعض ألفاظه غرابة، وقد اعترف ابن حبان في أول إسناده بأنه خبر غريب.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দুপুরে (প্রচণ্ড গরমে) আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদের দিকে বের হলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা শুনে জিজ্ঞেস করলেন: হে আবূ বাকর! এই সময়ে আপনাকে কী বের করেছে? তিনি বললেন: আমার মধ্যে যে তীব্র ক্ষুধা অনুভব করছি, তা ছাড়া আর কিছুই আমাকে বের করেনি। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, আমাকেও তা ছাড়া আর কিছুই বের করেনি।
তারা যখন এ অবস্থায় ছিলেন, তখন তাদের সামনে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বের হলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: "এই সময়ে তোমাদের কী বের করেছে?" তারা উভয়ে বললেন: আল্লাহর কসম! পেটের মধ্যে যে তীব্র ক্ষুধা অনুভব করছি, তা ছাড়া আর কিছুই আমাদের বের করেনি। তিনি বললেন: "যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! আমাকেও তা ছাড়া আর কিছুই বের করেনি। ওঠো।"
অতঃপর তারা চললেন এবং আবূ আইয়্যুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দরজায় পৌঁছালেন। আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর জন্য কিছু খাবার অথবা দুধ সংরক্ষণ করে রাখতেন। কিন্তু সেদিন তিনি তা দিতে দেরি করলেন এবং নির্দিষ্ট সময়ে পৌঁছাতে পারলেন না। তাই তিনি সেটি তাঁর পরিবারের লোকদের খাইয়ে দিলেন এবং নিজেই তার খেজুরের বাগানে কাজ করতে চলে গেলেন।
যখন তারা দরজায় পৌঁছালেন, তখন তাঁর স্ত্রী বাইরে এলেন এবং বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথীদেরকে স্বাগতম। আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "আবূ আইয়্যুব কোথায়?" আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন তাঁর খেজুরের বাগানে কাজ করছিলেন এবং (তাঁদের কথা) শুনতে পেলেন। তিনি দ্রুত ছুটে এলেন এবং বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাথীদেরকে স্বাগতম। হে আল্লাহর নবী! আপনি তো এমন সময় আসেননি, যেই সময়ে সাধারণত আপনি আসেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি সত্য বলেছ।"
আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত গেলেন এবং খেজুর গাছের এমন একটি ছড়া কেটে আনলেন, যাতে সব ধরনের খেজুর— পাকা খেজুর, অর্ধপাকা নরম খেজুর এবং কাঁচা খেজুর— সবই ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কেন এটা করলে? তুমি কি শুধু পাকা খেজুর এনে দিলেই পারতে না?" তিনি বললেন: হে আল্লাহর নবী! আমি চাইলাম, আপনি পাকা, অর্ধপাকা নরম এবং কাঁচা— সব ধরনের খেজুরই খাবেন। আর এর সাথে আমি আপনার জন্য একটি পশুও যবেহ করব। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি যবেহ করো, তবে দুধেল পশু যবেহ করো না।" অতঃপর তিনি একটি বকরীর বাচ্চা বা মেষশাবক নিলেন এবং তা যবেহ করলেন।
তিনি তার স্ত্রীকে বললেন: তুমি আমাদের জন্য রুটি বানাও এবং আটা মাখো, রুটি বানানোর ব্যাপারে তুমিই অধিক জানো। আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই মেষশাবকটি নিলেন, তার অর্ধেক রান্না করলেন এবং অর্ধেকটা কাবাব করলেন।
খাবার প্রস্তুত হলে তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীদের সামনে পরিবেশন করা হলো। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মেষশাবকের কিছু অংশ রুটির মধ্যে রাখলেন এবং বললেন: "হে আবূ আইয়্যুব! এটা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছাও। সে গত কয়েক দিন এমন খাবার পায়নি।" আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে দিয়ে এলেন।
যখন তারা আহার করলেন এবং তৃপ্ত হলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "রুটি, মাংস, পাকা খেজুর, কাঁচা খেজুর এবং অর্ধপাকা নরম খেজুর!" এই কথা বলার সময় তাঁর দু’চোখ অশ্রুসিক্ত হয়ে উঠল। তিনি বললেন: "যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! নিশ্চয়ই এটি সেই নেয়ামত (সুখ-স্বাচ্ছন্দ্য) যার সম্পর্কে তোমাদের জিজ্ঞাসা করা হবে। আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {ثُمَّ لَتُسْأَلُنَّ يَوْمَئِذٍ عَنِ النَّعِيمِ} (অতঃপর অবশ্যই সেদিন তোমরা নেয়ামত সম্পর্কে জিজ্ঞাসিত হবে)। কিয়ামতের দিন তোমাদেরকে এই নেয়ামত সম্পর্কেই জিজ্ঞাসা করা হবে।"
এই কথাটি সাহাবীদের কাছে খুব কঠিন মনে হলো। তখন তিনি বললেন: "বরং যখন তোমরা এমন খাবার লাভ করবে এবং এতে হাত দেবে, তখন 'বিসমিল্লাহ' বলবে। আর যখন তৃপ্ত হবে, তখন বলবে: 'আলহামদু লিল্লাহিল্লাযী হুওয়া আশবা'আনা, ওয়া আন'আমা আলাইনা ওয়া আফদাল' (সেই আল্লাহর প্রশংসা, যিনি আমাদের তৃপ্ত করেছেন এবং আমাদের প্রতি নেয়ামত ও অনুগ্রহ করেছেন)। কেননা এই বাক্যগুলোই এর ক্ষতিপূরণ বা কাফফারা হয়ে যাবে।"
যখন তিনি উঠলেন, তখন আবূ আইয়্যুবকে বললেন: "আগামীকাল আমাদের কাছে এসো।" (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কারো থেকে কোনো ভালো আচরণ পেলে, তিনি তার প্রতিদান দিতে পছন্দ করতেন। আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যেন এই কথাটি শুনতে পাচ্ছিলেন। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে আগামীকাল তাঁর কাছে যেতে আদেশ করেছেন।
পরদিন আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে গেলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে একটি দাসী দান করলেন এবং বললেন: "হে আবূ আইয়্যুব! এর সাথে ভালো ব্যবহারের ওসিয়ত করছি। যতক্ষণ সে আমাদের কাছে ছিল, আমরা তার মধ্যে কেবল ভালোই দেখেছি।" আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে দাসীটিকে নিয়ে এলেন, তখন তিনি বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই ওসিয়তের চেয়ে উত্তম আর কিছু আমি দেখি না, যে আমি তাকে মুক্ত করে দেব। অতঃপর তিনি তাকে মুক্ত করে দিলেন।
13573 - عن * *
وقوله: {وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ} استثنى من الخسران: الذين آمنوا وعملوا الصالحات، وبقي حكم الخسران متحققا في غير المؤمنين على مرّ الدهور إلى يوم القيامة.
وهذه مناسبة للقسم بالعصر، أي: الدهر.
وقوله: التواصي بالحق من الأعمال الصالحة، وقد يلحقه الأذى والمشقة كما حصلت للأنبياء عليهم السلام، ومن على طريقتهم في الدعوة والتبليغ، فأمروا بالتواصي بالصبر، لأن الصبر مفتاح النجاح، ولذا أمر الله تعالى في سورة البقرة [45]: {وَاسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ}.
رويَ عن أبي مدينة الدارمي - وكانت له صحبة - قال: كان الرجلان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم: إذا التقيا لم يفترقا حتى يقرأ أحدهما على الآخر {وَالْعَصْرِ (1) إِنَّ الْإِنْسَانَ لَفِي خُسْر}، ثم يسلّم أحدهما على الآخر.
قال علي بن المديني: اسم أبي مدينة عبد الله بن حصن.
رواه الطبراني في الأوسط (5120) عن محمد بن هشام المستملي، حدثنا عبيد الله بن عائشة، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أبي مدينة الدارمي قال: فذكره.
قال الهيثمي في المجمع (10/ 307):"رواه الطبراني في الأوسط، ورجاله رجال الصحيح غير ابن عائشة وهو ثقة".
وهو كما قال إلا ان أبا مدينة الدارمي واسمه كما قال علي بن المديني عبد الله بن حصن، هو من التابعين من يكنى بهذه الكنية واسمه واسم أبيه مثله إلا أنه ينسب إلى سدوس، ذكره البخاري، وابن أبي حاتم، وابن حبان، والله أعلم بالصواب. والأمر لا يخرج من كون هذا العمل منقولا من الصحابي أو التابعي، وليس فيه شيء مرفوعا، وهو ليس على شرط الجامع الكامل.
আবূ মাদীনাহ আদ-দারিমী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আল্লাহর বাণী: {وَتَوَاصَوْا بِالْحَقِّ وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ} (আর তারা পরস্পরকে সত্যের উপদেশ দেয় এবং পরস্পরকে ধৈর্যের উপদেশ দেয়) এর মাধ্যমে আল্লাহ্ তা'আলা ক্ষতিগ্রস্থদের থেকে সেই মু'মিন ও সৎকর্মশীলদের ব্যতিক্রম করেছেন। এই ক্ষতিগ্রস্থতার বিধান সকল যুগে কিয়ামত পর্যন্ত অবিশ্বাসী (গাইরুল মু'মিনীন)-দের ক্ষেত্রে প্রতিষ্ঠিত থাকবে। আর এটি আসর (যুগের) কসমের সাথে সম্পর্কিত।
হকের (সত্যের) উপদেশ দেওয়া সৎকর্মের অন্তর্ভুক্ত। এতে কষ্ট ও অসুবিধা আসতে পারে, যেমনটি নবীদের (আলাইহিমুস সালাম)-এর ক্ষেত্রে এবং তাঁদের দাওয়াত ও প্রচারের পথের অনুসারীদের ক্ষেত্রে ঘটেছিল। তাই তাঁদেরকে ধৈর্যের উপদেশ দিতে বলা হয়েছে, কারণ ধৈর্য সফলতার চাবিকাঠি। এই কারণে আল্লাহ্ তা'আলা সূরা বাকারার [৪৫] আয়াতে নির্দেশ দিয়েছেন: {وَاسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ} (তোমরা ধৈর্য ও সালাতের মাধ্যমে সাহায্য চাও)।
আবূ মাদীনাহ আদ-দারিমী—যিনি সাহাবীর মর্যাদা লাভ করেছিলেন—থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্যে যখন দুজন লোক সাক্ষাৎ করতেন, তখন তারা একজন অন্যজনের কাছে {وَالْعَصْرِ (১) إِنَّ الْإِنْسَانَ لَفِي خُسْر} (১. সময়ের কসম, ২. নিশ্চয় মানুষ ক্ষতির মধ্যে রয়েছে) পাঠ না করা পর্যন্ত বিচ্ছিন্ন হতেন না। এরপর তারা একে অপরের প্রতি সালাম করতেন।
13574 - عن * *
ووصف النار بأنها"موقدة" يفيد بأنها لا تزال مشتعلة غير خامدة.
وقوله: {الَّتِي تَطَّلِعُ عَلَى الْأَفْئِدَةِ} أي: تحرقهم إلى الأفئدة، وهم أحياء.
وقوله: {إِنَّهَا عَلَيْهِمْ مُؤْصَدَةٌ} يجوز أن تكون الصفة الثالثة لنار الله. وموصدة اسم مفعول من أوصد الباب إذا أغلقه غلقا محكما ومطبقا.
وقوله: {فِي عَمَدٍ مُمَدَّدَةٍ} في بمعنى الباء، أي: موصدة بعمد ممددة، قاله ابن مسعود، وهي في قراءته {بعمد ممددة}. وقال ابن عباس: إن العمد الممددة إغلال في أعناقهم. وكل هذه الأوصاف تفيد شدة الإغلاظ عليهم.
আর জাহান্নামকে 'মুওক্বাদাহ' (প্রজ্বলিত) বলে বর্ণনা করার দ্বারা এটাই প্রমাণিত হয় যে, তা সর্বদা জ্বলন্ত থাকবে, কখনো নিভে যাবে না।
আর আল্লাহর বাণী: {যা হৃদয় পর্যন্ত পৌঁছে যাবে} অর্থাৎ: তা তাদেরকে হৃদপিণ্ড পর্যন্ত জ্বালিয়ে দেবে, অথচ তারা জীবিত থাকবে।
আর আল্লাহর বাণী: {নিশ্চয়ই তা তাদের উপর বন্ধ করে দেওয়া হবে (মু'সাদাহ)} এটা আল্লাহর আগুনের তৃতীয় গুণ হতে পারে। 'মু'সাদাহ' শব্দটি 'আওস্বাদাল বাব' (দরজা বন্ধ করা) হতে ইসমে মাফঊল (কর্মবাচক বিশেষ্য), যার অর্থ হলো মজবুত ও দৃঢ়ভাবে বন্ধ করে দেওয়া।
আর আল্লাহর বাণী: {দীর্ঘায়িত খুঁটিসমূহে} এখানে 'ফি' (মধ্যে) শব্দটি 'বা' (দ্বারা/সঙ্গে) অর্থে ব্যবহৃত হয়েছে, অর্থাৎ দীর্ঘায়িত খুঁটি দ্বারা বন্ধ করে দেওয়া হবে। ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একথা বলেছেন, আর তাঁর কিরাআতে (পাঠ) ছিল {দীর্ঘায়িত খুঁটিসমূহ দ্বারা}। আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: দীর্ঘায়িত খুঁটিসমূহ হলো তাদের গলায় শিকল (বেড়ি)। আর এই সমস্ত বর্ণনা তাদের উপর কঠোরতা আরোপের তীব্রতাকেই প্রকাশ করে।
13575 - عن * *
وقال لترجمانه: قل له: ما حاجتك؟ فقال للترجمان: إن حاجتي أن يرد علي الملك مائتي بعير أصابها لي، فقال أبرهة لترجمانه: قل له: لقد كنت أعجبتني حين رأيتك، ثم قد زهدت فيك حين كلمتني، أتكلمني في مائتي بعير أصبتها لك، وتترك بيتا هو دينك ودين آبائك قد جئت لهدمه، لا تكلمني فيه؟ ! فقال له عبد المطلب: إني أنا رب الإبل، وإن للبيت ربا سيمنعه. قال: ما كان ليمتنع مني! قال: أنت وذاك.
فلما أراد أبرهة وجيشه دخول مكة أرسل الله عليهم طيرا من البحر مثل الخطاطيف والبلسان مع كل طائر منها ثلاثة أحجار يحملها: حجر في منقاره، وحجران في رجليه، أمثال الحمص والعدس، لا تصيب منهم أحدا إلا هلك، فهلك معظم الجيش، وأدبر الباقون، وكان ممن أصاب أبرهة نفسه، فخرجوا به حتى قدموا صنعاء، وهو مثل فرخ الطائر، فما مات حتى صدع صدره عن قلبه.
وغنم قريش مالا كثيرا من أسلابهم.
هكذا كفى الله أهل مكة أمر عدوهم، وكان ذلك في شهر المحرم الموافق شهر فبراير سنة 570 م.
وبعد هذه الحادثة العظيمة بخمسين يوما ولد سيد البشر محمد بن عبد الله صلوات الله وسلامه عليه في أصح أقوال أهل العلم.
قوله: {أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِأَصْحَابِ الْفِيلِ} الخطاب للنبي صلى الله عليه وسلم، وقد تواترت الأخبار عن قصة أصحاب الفيل عند أهل مكة، وبقيت بعض آثارها شاهدة عليها، والنبي صلى الله عليه وسلم خاطب قريشا بهذه القصة.
وقوله: {أَلَمْ يَجْعَلْ كَيْدَهُمْ فِي تَضْلِيلٍ} أي: إن ربك هو الذي أبطل ما أرادوا مع قوتهم وبأسهم، وفيه تطمين للنبي صلى الله عليه وسلم بأن الله قادر على كل شيء، وقد جاء في الصحيح.
এবং সে তার দোভাষীকে বলল: তাকে বলো, তোমার প্রয়োজন কী? তখন সে (আব্দুল মুত্তালিব) দোভাষীকে বলল: আমার প্রয়োজন হলো, রাজা আমার জন্য জব্দ করা দুইশত উট যেন আমাকে ফেরত দেন। তখন আব্রাহা তার দোভাষীকে বলল: তাকে বলো, আমি তোমাকে দেখে মুগ্ধ হয়েছিলাম, কিন্তু যখন তুমি আমার সাথে কথা বললে, তখন আমি তোমার প্রতি আগ্রহ হারিয়ে ফেললাম। তুমি আমার সাথে এমন ২০০ উট নিয়ে কথা বলছো যা আমি তোমার জন্য জব্দ করেছি, অথচ তুমি এমন একটি ঘর (কাবা) ছেড়ে দিচ্ছো যা তোমার এবং তোমার পূর্বপুরুষদের ধর্ম, আর আমি সেটাকে ধ্বংস করতে এসেছি—তুমি তা নিয়ে আমার সাথে কথা বলছো না?! তখন আব্দুল মুত্তালিব তাকে বললেন: আমি হলাম উটের মালিক, আর এই ঘরের (বাইত) একজন রব (প্রভু) আছেন, যিনি একে রক্ষা করবেন। সে বলল: এটা আমার থেকে রক্ষা পেতে পারবে না! আব্দুল মুত্তালিব বললেন: তুমি এবং তোমার কাজ।
এরপর যখন আব্রাহা ও তার সেনাবাহিনী মক্কায় প্রবেশ করতে চাইল, আল্লাহ তাদের ওপর সমুদ্র থেকে একধরনের পাখি পাঠালেন—যা ছিল খাতাতিফ (Swift) এবং বালসান (Stork/Hawk) পাখির মতো। এই পাখিগুলোর প্রত্যেকটির সাথে তিনটি করে পাথর ছিল, যা তারা বহন করছিল: একটি তাদের ঠোঁটে এবং দুটি তাদের পায়ে। পাথরগুলো ছিল মটর বা মসুর ডালের মতো। তাদের মধ্যে যার উপরেই এই পাথর আঘাত করত, সে-ই ধ্বংস হয়ে যেত। ফলে সেনাবাহিনীর অধিকাংশই ধ্বংস হয়ে গেল এবং অবশিষ্টরা পলায়ন করল। আব্রাহাও ছিল তাদের মধ্যে, যাদেরকে পাথর আঘাত করেছিল। তারা তাকে (আব্রাহাকে) নিয়ে বেরিয়ে গেল যতক্ষণ না সান'আয় পৌঁছাল। তখন সে পাখির বাচ্চার মতো দুর্বল হয়ে পড়েছিল। সে ততক্ষণ পর্যন্ত মরেনি যতক্ষণ না তার বুক ফেটে হৃদয় বের হয়ে আসে।
আর কুরাইশরা তাদের (শত্রুদের) ফেলে যাওয়া জিনিসপত্র থেকে প্রচুর সম্পদ লাভ করল।
এভাবেই আল্লাহ মক্কাবাসীর পক্ষ থেকে তাদের শত্রুর বিষয়টিকে যথেষ্ট (সমাধান) করে দিয়েছিলেন। এই ঘটনাটি ছিল মুহাররম মাসে, যা খ্রিস্টীয় ৫৭০ সালের ফেব্রুয়ারি মাস।
আহলে ইলমের (জ্ঞানীদের) বিশুদ্ধতম মত অনুযায়ী, এই মহা ঘটনার পঞ্চাশ দিন পর মানবজাতির নেতা মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্মগ্রহণ করেন।
আল্লাহর বাণী: {আপনি কি দেখেননি, আপনার রব হস্তীওয়ালাদের সাথে কীরূপ আচরণ করেছেন?}—এই সম্বোধনটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে করা হয়েছে। বস্তুত হস্তীওয়ালাদের এই ঘটনাটি সম্পর্কে মক্কাবাসীর নিকট ক্রমাগত খবর পৌঁছেছিল এবং এর কিছু নিদর্শন তখনও বিদ্যমান ছিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরাইশদের সাথে এই ঘটনা নিয়েই কথা বলেছিলেন।
আর তাঁর বাণী: {তিনি কি তাদের চক্রান্ত ব্যর্থ করে দেননি?}—এর অর্থ হলো: তাদের শক্তি ও প্রতাপ থাকা সত্ত্বেও আপনার রবই তাদের উদ্দেশ্যকে বাতিল করে দিয়েছিলেন। আর এতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য আশ্বাস ছিল যে, আল্লাহ সবকিছুর উপর ক্ষমতাবান। আর এ কথা সহীহ বর্ণনায় এসেছে।
13576 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن الله حبس عن مكة الفيل، وسلَّط عليهم رسول الله صلى الله عليه وسلم والمؤمنين".
متفق عليه: رواه البخاري في العلم (112) ومسلم في الحج (1355: 448) كلاهما من حديث شيبان، عن يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره في سياق طويل، كما هو مذكور في فتح مكة.
وقوله: {وَأَرْسَلَ عَلَيْهِمْ طَيْرًا أَبَابِيلَ} أبابيل هو اسم جمع لا واحد له من لفظه، ومعناه جماعات.
وقوله: {تَرْمِيهِمْ بِحِجَارَةٍ مِنْ سِجِّيلٍ} السجيل: هو شديد الصلب، هو حجر أصله من طين، وهو مثل قوله تعالى في سورة هود: {وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهَا حِجَارَةً مِنْ سِجِّيلٍ مَنْضُودٍ}، [82] أي: ليست حجرا صخريا، ولكنها طين متحجر مخلوق لعذابهم، لأن هذا الحجر كان إذا وقع على أحدهم خرج به الجدري، مع أن الجدري لم يكن معروفا في مكة قبل ذلك، والحجر الصخري لا يمرض مرض الجدري.
وقوله: {فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍ مَأْكُولٍ} العصف هو: ورق الزرع، والعصف إذا دخلته البهائم فأكلته، وداسته بأرجلها، وطرحته على الأرض بعد أن كان أخضر يانعا، هذا تمثيل لحال أصحاب
الفيل، كيف صاروا متساقطين على الأرض بعد أن كانوا أقوياء.
وقال ابن عباس: العصف: القشرة التي تكون على الحبة كالغلاف على الحنطة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা মক্কা থেকে হাতিকে (হাতির বাহিনীকে) প্রতিহত করেছিলেন এবং তাদের উপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) ও মুমিনদের কর্তৃত্ব প্রদান করেছিলেন।"
আল্লাহ তাআলার বাণী: {وَأَرْسَلَ عَلَيْهِمْ طَيْرًا أَبَابِيلَ} (আর তিনি তাদের উপর ঝাঁকে ঝাঁকে পাখি প্রেরণ করলেন) – এখানে 'আবাবীল' হলো একটি বহুবচন নাম, যার নিজস্ব শব্দ থেকে কোনো একবচন নেই। এর অর্থ হলো 'দলসমূহ' বা 'ঝাঁকসমূহ'।
আল্লাহ তাআলার বাণী: {تَرْمِيهِمْ بِحِجَارَةٍ مِنْ سِجِّيلٍ} (যারা তাদের উপর কঙ্কর নিক্ষেপ করছিল 'সিজ্জীল' পাথর দ্বারা) – 'আস-সিজ্জীল' হলো অত্যন্ত কঠিন বস্তু। এটি এমন পাথর যার উৎস মাটি। এটি সূরা হূদের আল্লাহ তাআলার বাণীর মতোই: {وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهَا حِجَارَةً مِنْ سِجِّيلٍ مَنْضُودٍ} [৮২] (এবং আমরা তাতে স্তরে স্তরে সজ্জিত সিজ্জীলের পাথর বর্ষণ করলাম)। অর্থাৎ, এটি পাথরের শিলা ছিল না, বরং তাদের শাস্তির জন্য সৃষ্ট শক্ত মাটির ঢেলা ছিল। কারণ এই পাথর যখন তাদের কারো উপর পড়ত, তখন তার দেহে বসন্ত রোগ দেখা দিত, যদিও মক্কায় এর আগে বসন্ত রোগ পরিচিত ছিল না। আর পাথরের শিলা বসন্ত রোগের মতো রোগ সৃষ্টি করে না।
আল্লাহ তাআলার বাণী: {فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍ مَأْكُولٍ} (অতঃপর তিনি তাদের ভক্ষিত শস্যের ভূষির ন্যায় করে দিলেন) – 'আল-আসফ' (ভূষি) হলো ফসলের পাতা। 'আল-আসফ' হলো যখন গবাদি পশু তাতে প্রবেশ করে এবং তা ভক্ষণ করে, নিজেদের পা দিয়ে মাড়িয়ে দেয় এবং সবুজ ও সতেজ থাকার পরেও তা জমিনে ফেলে রাখে। এটি ছিলো আসহাবুল ফীলের (হাতির বাহিনীর) অবস্থার উদাহরণ, কিভাবে শক্তিশালী থাকা সত্ত্বেও তারা জমিনে পতিত হয়ে গেলো।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: 'আল-আসফ' হলো শস্যের সেই খোসা যা গমের আবরণের মতো দানার উপর থাকে।
13577 - عن عائشة قالت: لقد رأيت قائد الفيل وسائسه بمكة أعميين مقعدين يستطعمان.
حسن: رواه ابن إسحاق، قال: حدثنا عبد الله بن أبي بكر، عن عمرة بنت عبد الرحمن بن أسعد بن زرارة، عن عائشة، فذكرته. السيرة لابن هشام (1/ 57).
ومن طريقه رواه البزار - كشف الأستار (2/ 48).
وإسناده حسن من أجل تصريح ابن إسحاق.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মক্কায় হাতির সেনাপতি ও তার চালককে অন্ধ ও পঙ্গু অবস্থায় ভিক্ষা করতে দেখেছি।
13578 - عن * *
১৩৫৭৮ - থেকে **
13579 - عن الزبير قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خص الله قريشا بسبع خصال: فضَّلهم بأنهم عبدوا الله عشر سنين، لا يعبده إلا قرشي، وفضَّلهم بأنه نصرهم يوم الفيل وهم مشركون، وفضَّلهم بأنه نزلت فيهم سورة من القرآن لم يدخل فيهم غيرهم، {لإِيلَافِ قُرَيْشٍ}، فضَّلهم بأن فيهم النبوة، والخلافة، والحجابة، والسقاية".
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (9169) عن مصعب (وهو ابن إبراهيم بن حمزة الزبيري)، حدثني أبي، قال: حدثنا عبد الله بن مصعب بن ثابت بن عبد الله بن الزبير، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن الزبير، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد الله بن مصعب بن الزبير، فهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ.
قال فيه أبو حاتم:"هو شيخ بابة عبد الرحمن بن أبي الزناد"، وذكره ابن حبان في الثقات، ولكن ضعَّفه ابن معين، ومثله يستشهد به، وقد روي أيضا عن أم هانئ مثله، رواه الحاكم (2/
536) عن بكر بن محمد بن حمدان الصيرفي، ثنا أحمد بن عبيد الله النرسي، ثنا يعقوب بن محمد الزهري، ثنا إبراهيم بن محمد بن ثابت بن شرحبيل، حدثني عثمان بن عبد الله بن أبي عتيق، عن سعيد بن عمرو بن جعدة بن هبيرة، عن أبيه، عن جدته أم هانئ، فذكرته.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وتعقبه الذهبي فقال:"يعقوب ضعيف، وإبراهيم صاحب مناكير، هذا أنكرها".
قلت: يعقوب بن محمد الزهري مختلف فيه.
وإبراهيم بن محمد قال فيه أبو حاتم: صدوق، وذكره ابن حبان في الثقات، فمثله لا بأس به في الاستشهاد.
وقوله:"فضَّلهم بأنهم عبدوا الله عشر سنين، لا يعبده إلا قرشي"، أي: عشر سنين من بعثة النبي صلى الله عليه وسلم إلى بيعة العقبة التي كانت بعدها، يعني غالب من دخل في هذه الفترة في الإسلام كانوا من قبيلة قريش.
قوله: {لإِيلَافِ قُرَيْشٍ} أي: لائتلافهم واجتماعهم في بلدهم، وتقديم المجرور للاهتمام به، وقريش هو لقب جد النبي صلى الله عليه وسلم الأعلى، وهو فهر بن مالك بن النضر بن كنانة على قول الجمهور.
فيكون نظم الكلام لهذه السورة: ليعبد قريش رب هذا البيت الذي أطعمهم من جوع وآمنهم من خوف لإيلافهم رحلة الشتاء والصيف.
وكانت لقريش رحلتان: إحداهما إلى اليمن، وهي: رحلة الشتاء، والأخرى إلى الشام، وهي: رحلة الصيف.
أي: أنكم في هاتين الرحلتين لا تخافون الهلاك، لأنكم من سكان البلد الحرام، والناس يحترمونكم لعظمته عندهم. ولذا وجب عليكم أن تعبدوا الله وحده وتشكروه، ولا تشركوا به أحدا.
যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “আল্লাহ তাআলা কুরাইশদেরকে সাতটি বিশেষ বৈশিষ্ট্যের দ্বারা সম্মানিত করেছেন: (১) তাদেরকে সম্মানিত করেছেন এই কারণে যে, তারা দশ বছর আল্লাহর ইবাদত করেছে, যখন কুরাইশী ছাড়া কেউ তাঁর ইবাদত করত না। (২) তাদেরকে সম্মানিত করেছেন এই কারণে যে, যখন তারা মুশরিক ছিল, তখনো আল্লাহ তাআলা তাদের ফীলের (হাতির) দিনে সাহায্য করেছিলেন। (৩) তাদেরকে সম্মানিত করেছেন এই কারণে যে, তাদের সম্পর্কে কুরআনে একটি সম্পূর্ণ সূরা নাযিল হয়েছে, যার মধ্যে তারা ছাড়া অন্য কেউ প্রবেশ করেনি, আর তা হলো {لإِيلَافِ قُرَيْشٍ} (সূরা কুরাইশ)। (৪, ৫, ৬, ৭) তাদেরকে সম্মানিত করেছেন এই কারণে যে, তাদের মাঝে নবুওয়াত, খিলাফত, হিজাবাহ (কাবা ঘরের তত্ত্বাবধান) এবং সিকায়াহ (হাজীদের পানি পান করানোর ব্যবস্থা) বিদ্যমান রয়েছে।”
13580 - عن أسماء بنت يزيد عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:" {لإِيلَافِ قُرَيْشٍ (1) إِيلَافِهِمْ رِحْلَةَ الشِّتَاءِ وَالصَّيْفِ}، ويحكم يا قريش! اعبدوا رب هذا البيت الذي أطعمكم من جوع، وآمنكم من خوف".
حسن: رواه أحمد (27607) والطبراني في الكبير (24/ 178، 177) وابن جرير في تفسيره (24/ 647) والحاكم (2/ 256) كلهم من طرق عن شهر بن حوشب، عن أسماء بنت يزيد، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب غير أنه حسن الحديث إذا لم يكن في حديثه نكارة.
وقال الحاكم:"هذا حديث غريب عال في هذا الباب، والشيخان لا يحتجان بشهر بن حوشب".
وهو كما قال، لأنه مختلف فيه، كما بينت، غير أنه حسن الحديث عندي إذا لم يرو ما ينكر عليه، ولم يثبت وهمه.
আসমা বিনতে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরাইশদের আসক্তির জন্য, তাদের আসক্তির জন্য, শীত ও গ্রীষ্মের ভ্রমণের প্রতি।" ধিক তোমাদের, হে কুরাইশগণ! তোমরা এই গৃহের রবের ইবাদত করো, যিনি তোমাদেরকে ক্ষুধায় আহার দিয়েছেন এবং ভয় হতে তোমাদেরকে নিরাপত্তা দিয়েছেন।
13581 - عن أنس بن مالك قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"تلك صلاة المنافق، يجلس يرقب الشمس، حتى إذا كانت بين قرني الشيطان، قام فنقرها أربعا، لا يذكر الله فيها إلا قليلا".
صحيح: رواه مسلم في المساجد (622) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء بن عبد الرحمن، أنه دخل على أنس بن مالك، في داره بالبصرة، فذكره.
وقوله: {الَّذِينَ هُمْ عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ} ولم يقل في صلاتهم ساهون.
قال عطاء بن دينار:"والحمد لله الذي قال: {عَنْ صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ} ولم يقل في صلاتهم ساهون".
وقوله: {الَّذِينَ هُمْ يُرَاءُونَ} أي: يعملون عملا ليراه الناس، وليس لله عز وجل، وهو وصف آخر للمنافقين، كما جاء في سورة النساء: {وَإِذَا قَامُوا إِلَى الصَّلَاةِ قَامُوا كُسَالَى يُرَاءُونَ النَّاسَ} [142]
أي: إن صلَّاها صلَّاها رياء، وإن فاتته لا يندم.
وقوله: {وَيَمْنَعُونَ الْمَاعُونَ} من الصدقة والزكاة والعارية، لأن الماعون يطلق على الإعانة بالمال.
ويطلق الماعون على القلة أيضا: مثل الماء والملح والنار، وهذا وصف آخر للمنافقين الذين يبخلون من إعانة الآخرين حتى بالماء والملح والنار.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এটি হলো মুনাফিকের সালাত। সে বসে সূর্যের অপেক্ষা করতে থাকে, অবশেষে যখন সূর্য শয়তানের দুই শিংয়ের মাঝখানে চলে আসে (অর্থাৎ, মাকরূহ ওয়াক্তে), তখন সে উঠে দ্রুত চারটি (রাকাত) ঠোকর মেরে আদায় করে নেয়। সে তাতে আল্লাহকে খুব কমই স্মরণ করে।"
13582 - عن * *
১৩৫৮২ - ... থেকে ...
13583 - عن أنس قال: لما عرج بالنبي صلى الله عليه وسلم إلى السماء، قال:"أتيت على نهر، حافتاه قباب اللؤلؤ مجوفا، فقلت: ما هذا يا جبريل؟ قال: هذا الكوثر".
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4964) عن آدم؛ حدثنا شيبان؛ حدثنا قتادة، عن أنس، قال: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আসমানে আরোহণ করানো হয়, তখন তিনি বলেন: "আমি একটি নহরের (নদীর) কাছে গেলাম, যার উভয় তীর ফাঁপা মুক্তোর গম্বুজের মতো ছিল। তখন আমি বললাম: হে জিবরীল, এটা কী? তিনি বললেন: এটি হল কাওসার।"
13584 - عن أنس قال: بينا رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات يوم بين أظهرنا إذ أغْفى إغفاءةً، ثم رفع رأسه مبتسمًا، فقلنا: ما أضحكك يا رسول الله؟ قال:"أنزلت عليّ آنفًا سورة". فقرأ: {بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ (1) فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ (2) إِنَّ شَانِئَكَ هُوَ الْأَبْتَرُ (3)}. ثم قال:"أتدرون ما الكوثر؟". فقلنا: الله ورسوله أعلم. قال:"فإنّه نهر وعدنيه ربّي عز وجل، عليه خير كثير، هو حوض ترد عليه أمّتي يوم القيامة، آنيته عدد النّجوم، فيختلج العبد منهم. فأقول: ربّ! إنّه من أمّتي. فيقول: ما تدري ما أحدثت بعدك".
صحيح: رواه مسلم في الصّلاة (400) من طرق عن علي بن مسهر، عن المختار، عن
أنس، فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের মাঝে উপস্থিত ছিলেন, হঠাৎ তিনি তন্দ্রাচ্ছন্ন হয়ে গেলেন। এরপর তিনি মুচকি হেসে মাথা তুললেন। আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! কী আপনাকে হাসালো? তিনি বললেন: এইমাত্র আমার উপর একটি সূরা নাযিল করা হয়েছে। এরপর তিনি পাঠ করলেন: {বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম} (১) নিঃসন্দেহে আমরা আপনাকে কাউসার দান করেছি। (২) অতএব, আপনার রবের জন্য সালাত আদায় করুন এবং কুরবানী করুন। (৩) নিশ্চয় আপনার প্রতি বিদ্বেষ পোষণকারীই হল নির্বংশ। এরপর তিনি বললেন: তোমরা কি জানো কাউসার কী? আমরা বললাম: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: এটি একটি নহর (নদী), যার ওয়াদা আমার মহান রব আমাকে দিয়েছেন, তাতে রয়েছে প্রচুর কল্যাণ। এটি একটি হাউজ (জলাধার), যাতে আমার উম্মত ক্বিয়ামতের দিন আসবে। এর পাত্রসমূহ তারকারাজির ন্যায় অসংখ্য হবে। তখন তাদের মধ্য থেকে এক বান্দাকে (হাউজের কাছ থেকে) সরিয়ে নেওয়া হবে। আমি বলব: হে আমার রব! এ তো আমার উম্মতের লোক। তিনি (আল্লাহ) বলবেন: তুমি জানো না, তোমার পরে তারা কী সব নতুন কাজ করেছে।
13585 - عن أبي عبيدة، عن عائشة، قال: سألتها عن قوله تعالى: {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ} قالتْ: هو نهر أعطيه نبيّكم صلى الله عليه وسلم، شاطئاه عليه دُرّ مجوّف، آنيته كعدد النّجوم.
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4965) عن خالد بن يزيد الكاهليّ، حدّثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن أبي عبيدة، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। বর্ণনাকারী তাঁকে আল্লাহ তাআলার বাণী— {إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ} (নিশ্চয় আমি আপনাকে আল-কাউসার দান করেছি) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বলেন: এটি একটি নহর, যা তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দান করা হয়েছে। এর দুই তীরে রয়েছে ফাঁপা মুক্তা। এর পানপাত্রগুলো তারকারাজির সংখ্যার ন্যায়।
13586 - عن ابن عباس قال في الكوثر: هو الخير الذي أعطاه الله إياه.
قال أبو بشر: قلت لسعيد بن جبير: فإن الناس يزعمون أنه نهر في الجنة؟ فقال سعيد: النهر الذي في الجنة من الخير الذي أعطاه الله إياه.
صحيح: رواه البخاري في التفسير (4966) عن يعقوب بن إبراهيم، حدثنا هشيم، حدثنا أبو بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
قوله: {فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَانْحَرْ} أي: شكرا لله الذي أعطاك الكوثر، وانحر: أي: البدن لتأكل أنت وأهلك، وتقسم على الفقراء والمساكين، والمراد منه الضحايا يوم عيد النحر.
وقد استنبط بعض الفقهاء فقالوا: المراد هنا بالصلاة صلاة العيد، والمراد بالنحر الضحايا، فتكون الضحية بعد الصلاة.
وقوله: {إِنَّ شَانِئَكَ هُوَ الْأَبْتَرُ} الأبتر: هو المقطوع بعضه، وغلب على المقطوع ذنبه من الدواب، ثم استعمل لكل من له البنون والبنات، ثم مات البنون وبقي البنات.
وقوله: {إِنَّ شَانِئَكَ} فاعل من الشناءة، وهي البغض والعداوة، أي: إن مبغضك يا محمد، ومبغض ما جئت به من الهدى والحق والبرهان هو الأبتر الأذل المنقطع ذكره.
وهي نزلت في جماعة من كفار مكة، لما قالوا للنبي صلى الله عليه وسلم: دعوه فإنه رجل أبتر، لا عقب له، إذا مات انقطع ذكره، فرد الله تعالى عليهم بقوله: {إِنَّ شَانِئَكَ هُوَ الْأَبْتَرُ} وقد صار كما قال الله تعالى، فقد انقطع خبر أبي لهب وأبي جهل وغيرهما من صناديد قريش، وأبقى الله ذكره صلى الله عليه وسلم في السماء: {إِنَّ اللَّهَ وَمَلَائِكَتَهُ يُصَلُّونَ عَلَى النَّبِيِّ} كما أبقى ذكره في الأرض: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا صَلُّوا عَلَيْهِ وَسَلِّمُوا تَسْلِيمًا}، فصار ذكره صلى الله عليه وسلم على رؤوس الأشهاد، ما تمر لمحة من لمحات إلا يذكر اسمه بصوت عال في أرجاء المعمورة:"وأشهد أن محمدا رسول الله" وقد جعل الله شريعته باقية إلى يوم الحشر والمعاد.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাউসার (আল-কাউছার) সম্পর্কে বলেছেন: তা হলো সেই কল্যাণ, যা আল্লাহ তাঁকে (নবীকে) দান করেছেন।
আবূ বিশর বলেন, আমি সাঈদ ইবনে জুবাইরকে জিজ্ঞাসা করলাম: লোকেরা তো ধারণা করে যে এটি জান্নাতের একটি নদী? সাঈদ (সাঈদ ইবনে জুবাইর) বললেন: জান্নাতের সেই নদীটিও সেই কল্যাণেরই অংশ, যা আল্লাহ তাঁকে (নবীকে) দান করেছেন।
[এই বর্ণনাটি সহীহ, বুখারীতে তাফসীর অধ্যায়ে (হাদীস নং ৪৯৬৬) ইয়াকুব ইবনে ইবরাহীম সূত্রে, তিনি হুশাইম থেকে, তিনি আবূ বিশর থেকে, তিনি সাঈদ ইবনে জুবাইর থেকে, তিনি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।]
আল্লাহর বাণী: "সুতরাং আপনি আপনার রবের উদ্দেশ্যেই সালাত আদায় করুন এবং কুরবানি করুন।" (আল-কাউছার: ২) এর অর্থ হলো: আল্লাহ আপনাকে আল-কাউছার দান করার কৃতজ্ঞতাস্বরূপ, আপনি কুরবানি করুন—অর্থাৎ উট বা গরু যবেহ করুন—যাতে আপনি ও আপনার পরিবার তা খেতে পারেন এবং দরিদ্র ও অভাবগ্রস্তদের মধ্যে তা বণ্টন করতে পারেন। এখানে উদ্দেশ্য হলো ঈদুল আযহার দিনে কুরবানি করা।
কিছু ফকীহ্ (ইসলামী আইনজ্ঞ) এই আয়াত থেকে সিদ্ধান্ত নিয়েছেন যে এখানে 'সালাত' দ্বারা ঈদের সালাত উদ্দেশ্য, এবং 'কুরবানি' দ্বারা কুরবানির পশু উদ্দেশ্য। সুতরাং কুরবানি হবে সালাতের পর।
আর আল্লাহর বাণী: "নিশ্চয় আপনার নিন্দুকই হলো লেজকাটা, নির্বংশ (আল-আবতার)।" (আল-কাউছার: ৩)। 'আল-আবতার' (الأبتر) অর্থ হলো যার কিছু অংশ বিচ্ছিন্ন করা হয়েছে। এটি সাধারণত সেই পশুর জন্য ব্যবহৃত হয় যার লেজ কাটা হয়েছে। এরপর এটি এমন ব্যক্তির জন্য ব্যবহৃত হতে শুরু করে যার পুত্র ও কন্যা উভয়ই ছিল, কিন্তু পুত্ররা মারা গেছে এবং কেবল কন্যারা অবশিষ্ট আছে।
আর আল্লাহর বাণী: "إِنَّ شَانِئَكَ" (ইন্না শা-নি-আকা) হলো 'শানাআহ' (শত্রুতা ও বিদ্বেষ) থেকে উদ্ভূত কর্তা। অর্থাৎ, হে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনার বিদ্বেষী, আর যে হেদায়াত, সত্য ও প্রমাণ নিয়ে আপনি এসেছেন তার বিদ্বেষী—সে-ই হলো অপদস্থ, নির্বংশ ও যার আলোচনা বন্ধ হয়ে যাবে।
এই আয়াতটি মক্কার কাফিরদের একটি দলের সম্পর্কে অবতীর্ণ হয়েছিল, যখন তারা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলেছিল: "তাকে ছেড়ে দাও, কারণ সে হলো লেজকাটা (নির্বংশ) মানুষ, তার কোনো উত্তরাধিকারী নেই; সে মারা গেলে তার নাম-নিশানা বন্ধ হয়ে যাবে।" আল্লাহ তা'আলা তাদের জবাবে বললেন: "নিশ্চয় আপনার নিন্দুকই হলো লেজকাটা, নির্বংশ (আল-আবতার)।"
আর আল্লাহ তা'আলা যেমন বলেছিলেন, ঠিক তেমনই হয়েছে। আবূ লাহাব, আবূ জাহল এবং কুরাইশের অন্যান্য নেতৃবর্গের খবর বিলুপ্ত হয়েছে। আর আল্লাহ তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আলোচনাকে আসমানেও বাকি রেখেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ এবং তাঁর ফেরেশতারা নবীর প্রতি সালাত প্রেরণ করেন।" (আল-আহযাব: ৫৬)। অনুরূপভাবে, তিনি জমিনেও তাঁর আলোচনা বাকি রেখেছেন: "হে ঈমানদারগণ! তোমরাও তাঁর প্রতি সালাত ও সালাম প্রেরণ করো।" (আল-আহযাব: ৫৬)। ফলে সাক্ষীদের সামনে তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আলোচনা চলছেই। এমন কোনো মুহূর্ত অতিবাহিত হয় না, যখন পৃথিবীর সকল প্রান্তে উচ্চস্বরে তাঁর নাম স্মরণ করা না হয়: "ওয়া আশহাদু আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ (আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল)।" আর আল্লাহ তাঁর শরীয়তকে হাশর ও কিয়ামতের দিন পর্যন্ত স্থায়ী করেছেন।
13587 - عن ابن عباس قال: لما قدم كعب بن الأشرف مكة قالت له قريش: أنت خير أهل المدينة وسيدهم؟ قال: نعم، قالوا: ألا ترى إلى هذا المنبتر من قومه، يزعم أنه خير منا، ونحن أهل الحجيج وأهل السدانة، قال: أنتم خير منه، فنزلت: {إِنَّ
شَانِئَكَ هُوَ الْأَبْتَرُ}، ونزلت: {أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ أُوتُوا نَصِيبًا مِنَ الْكِتَابِ يُؤْمِنُونَ بِالْجِبْتِ وَالطَّاغُوتِ} إلى قوله: {فَلَنْ تَجِدَ لَهُ نَصِيرًا} [النساء: 52، 51].
صحيح: رواه النسائي في الكبرى (11643)، والبزار - كشف الأستار (2293) وصحَّحه ابن حبان (6572) كلهم من طريق ابن أبي عدي، عن داود بن أبي هند، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره. وإسناده صحيح.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন কা'ব ইবনুল আশরাফ মক্কায় আগমন করল, কুরাইশরা তাকে বলল: আপনি কি মদীনার লোকদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং তাদের নেতা? সে বলল: হ্যাঁ। তারা বলল: আপনি কি আপনার কওম থেকে বিচ্ছিন্ন এই লোকটিকে দেখছেন না, যে দাবি করে যে সে আমাদের চেয়ে উত্তম, অথচ আমরাই হজ্জ পালনকারীদের সেবাকারী এবং কাবাঘরের রক্ষক? সে (কা'ব) বলল: তোমরাই তার চেয়ে উত্তম। তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {নিশ্চয়ই যে আপনাকে ঘৃণা করে, সেই তো নির্বংশ (আবতার)}। এবং নাযিল হলো: {আপনি কি তাদেরকে দেখেননি, যাদেরকে কিতাবের কিছু অংশ দেওয়া হয়েছে? তারা জিবত (জাদু) ও তাগূতকে (শয়তান বা মিথ্যা উপাস্য) বিশ্বাস করে...} থেকে আল্লাহর বাণী: {...সুতরাং আপনি তার জন্য কোনো সাহায্যকারী পাবেন না} [সূরা আন-নিসা: ৫১-৫২] পর্যন্ত।