হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (1381)


1381 - عن المغيرة بن شعبة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا ذهب المذهب أبعد.

حسن: رواه أبو داود (1) والترمذي (20) والنسائي (17) وابن ماجه (331) كلّهم من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن المغيرة بن شعبة به.

وزاد النّسائي: فذهب لحاجته وهو في بعض أسفاره فقال:"ائتني بوضوء" فأتيته بوضوء، فتوضأ ومسح على الخفين. قال الترمذي: حسن صحيح.

وصححه ابن خزيمة (50) والحاكم (1/ 140) فأخرجاه من طريق محمد بن عمرو به قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: رجاله ثقات غير محمد بن عمرو بن علقمة الليثي أبي عبد الله المدني أحد أئمة الحديث، وثَّقه النسائي، وروى له مسلم متابعة، فهو لا ينزل عن درجة الحسن. وأمَّا الجوزجاني فقال: ليس بالقويِّ.

وقوله (كان إذا ذهب المذهب) - بفتح الميم والهاء بينهما ذال معجمة ساكنة، مفعل من الذهاب - قال أبو عبيدة وغيره: هو اسم لموضعِ التغوَّطِ، يقال له المذهب والخلاء والمَرْقَق والمِرْحاض."شرح السيوطي للنسائي".




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন প্রাকৃতিক প্রয়োজন মেটানোর জন্য যেতেন, তখন তিনি অনেক দূরে চলে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1382)


1382 - عن عبد الرحمن بن أبي قُراد قال: خرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الخلاء، وكان إذا أراد الحاجة أبعد.

صحيح: رواه النسائي (16) وابن ماجه (334) كلاهما من طريق يحيي بن سعيد القطان، عن أبي جعفر عمير بن يزيد الخَطْمي، عن عُمارة بن خزيمة والحارث بن فُضيل، عن عبد الرحمن بن أبي قُراد.

وفي سنن ابن ماجه: قال عبد الرحمن بن أبي قُراد: حججتُ مع النبي صلى الله عليه وسلم فذهب لحاجته فأبعد. قلت: إسناده صحيح. وصححه أيضًا ابن خزيمة (51).




আব্দুল রহমান ইবনে আবি কুরাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে খোলা ময়দানে বের হলাম, আর যখন তিনি প্রাকৃতিক প্রয়োজন পূরণের ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি অনেক দূরে চলে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1383)


1383 - عن ابن عمر، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يذهب لحاجته إلى المُغَمِّس. قال نافعٌ:
نحوًا من ميلين من مكَّةَ.

صحيح: رواه أبو يعلى (5600)، والطبراني في"المعجم الكبير" (12/ 451). و"الأوسط" (5/ 469) من طرق، عن سعيد بن أبي مريم، قال أخبرنا نافع بن عمر الجمحي، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، فذكر مثله. ومن هذا الوجه أخرجه السراج في مسنده (17) وإسناده صحيح.

قال الطبراني في"الأوسط":"لم يرو هذا الحديث عن عمرو بن دينار إلَّا نافع بن عمر، تفرَّد به ابن أبي مريم".

قلت: نافع بن عمر هو: الجمحي المكي ثقة ثبت.

وابن أبي مريم هو: سعيد بن الحكم بن محمد بن سالم بن أبي مريم الجُمحي بالولاء أبو محمد المصري، ثقة ثبت أيضًا. وكلاهما من رجال الجماعة.

قال الهيثمي في"المجمع" (1/ 203):"رواه أبو يعلى والطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله ثقات من أهل الصحيح".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর প্রয়োজন পূরণের জন্য মুগাম্মিস নামক স্থানে যেতেন। নাফে’ বলেন: তা মক্কা থেকে প্রায় দুই মাইল দূরে অবস্থিত।









আল-জামি` আল-কামিল (1384)


1384 - عن جابر بن عبد الله: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان إذا أراد البراز انطلق حتَّى لا يراه أحد حسن: رواه أبو داود (2) وابن ماجه (334) كلاهما من طريق إسماعيل بن عبد الملك، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله فذكر مثله. واللفظ لأبي داود. ولفظ ابن ماجه: قال:"خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يأتي البراز حتَّى يتغيَّبَ فلا يُري".

وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عبد الله فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا كان لحديثه أصول ثابتة. وهذا منه.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন শৌচকার্য করার ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি এত দূরে চলে যেতেন, যেন কেউ তাঁকে দেখতে না পায়।









আল-জামি` আল-কামিল (1385)


1385 - عن عائشة قالت: من حدّثكم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يبول قائما فلا تصدقوه؛ ما كان يبول إلا قاعدا.

حسن: رواه الترمذي (12) والنسائي (29) وابن ماجه (307) كلهم من طريق شريك، عن المقدام بن شريح، عن أبيه، عن عائشة به.

قال الترمذي:"حديث عائشة أحسن شيء في الباب وأصحّ".

إلا أنه لم يحكم عليه بالصّحة ولا بالحسن، وإنما قال:"أحسن شيء في الباب وأصحّ" بمقابل حديث عمر قال:"رآني النبي صلى الله عليه وسلم وأنا أبول قائما فقال:"يا عمر! لا تَبُلْ قائما"، قال: فما بُلتُ قائما". قال الترمذي:"إنما رفع هذا الحديث عبد الكريم بن أبي المخارق، وهو ضعيف عند أهل الحديث، ضعّفه أيوب السختياني وتكلم فيه" انتهي.

قلت: وحديث عمر هذا أخرجه أيضًا ابن ماجه (1/ 112) من طريق عبد الكريم بن أبي
المخارق، إلا أنه قال: عبد الكريم بن أبي أمية. والصواب: أبو أمية كنية عبد الكريم.

قال البوصيري في الزوائد:"عبد الكريم متفق على تضعيفه، وقد تفرد بهذا الخبر".

وكذلك لا يصحّ ما روي عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يبول قائمًا. رواه ابن ماجه (309) من طريق عدي بن الفضل، عن علي بن الحكم، عن أبي نضرة، عن جابر بن عبد الله، فذكر مثله. إسناده ضعيف جدًّا؛ فإنّ عديّ بن الفضل التيمي أبو حاتم البصري متروك كما قال أبو حاتم، وترك أبو زرعة حديثه، وضعَّفه ابن معين والنسائي وغيرهما، وليس له في الكتب الستّة إلَّا هذا الحديث وحده رواه ابن ماجه.

وأما حديث عائشة ففي إسناده شريك، وهو ابن عبد الله النخعي الكوفي القاضي، قال فيه ابن معين: ثقة يغلط. وقال يعقوب بن سفيان: ثقة سيئ الحفظ. وفي التقريب: صدوق يخطئ كثيرا، تغير حفظه منذ ولي قضاء الكوفة.

قلت: ولكنه لم ينفرد؛ فقد رواه أحمد (6/ 136) والحاكم (1/ 181) والبيهقي (1/ 101) من طرق عن سفيان، عن المقدام بن شريح به. وصححه ابن حبان (1430) والحاكم، وقال:"صحيح على شرط الشيخين"

قلت: لم يخرج البخاري للمقدام بن شريح وأبيه.

وبقية رجال حديث عائشة ثقات.

ومعنى النهي عن البول قائما قال الترمذي:"على التأديب لا على التحريم، وقد رُوي عن عبد الله بن مسعود قال: إن من الجفاء أن تبول وأنت قائم" انتهى.

إلا أن حديث عائشة لا يعارض حديث حذيفة؛ فإنها أخبرت بما علمت، والرجل أعلم بهذا منها، كما قال سفيان الثوري ذكره ابن ماجه. وقال: قال أحمد بن عبد الرحمن، وكان من شأن العرب البول قائما، ألا تراه في حديث عبد الرحمن بن حسنة يقول: قعد يبول كما تبول المرأة.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যে ব্যক্তি তোমাদেরকে বলে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে পেশাব করতেন, তোমরা তাকে বিশ্বাস করো না; তিনি বসে ছাড়া কখনো পেশাব করতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1386)


1386 - عن حذيفة قال: كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم فانتهى إلى سُباط قوم، فبال قائما، فتنحّيتُ، فقال:"ادنُه"، فدنوتُ حتى قمت عند عقبيه، فتوضأ، فمسح على خفيه.

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (224، 225) من طريق شعبة، ومسلم في الطهارة (273) من طريق أبي خثيمة - كلاهما عن الأعمش، عن أبي وائل، عن حذيفة فذكر مثله واللفظ المسلم، وأما البخاري فلم يذكر"فمسح على خفيه". هذا هو الصحيح من حديث حذيفة.

وأما ما رواه ابن ماجه (306) من طريق شعبة، عن عاصم، عن أبي وائل، عن المغيرة بن شعبة"أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي سباط قوم فبال قائمًا: فقال شعبة: قال عاصم يومئذ: وهذا الأعمش يرويه عن أبي وائل، عن
حذيفة - يعني كما قال الأعمش، فتابع منصور الأعمش على روايته عن أبي وائل، عن حذيفة.

فظهر خطأ عاصم في رواية هذا الحديث، عن أبي وائل، عن المغيرة بن شعبة. وقد رجَّح الترمذي رواية أبي وائل عن حذيفة، على روايته عن المغيرة. قال الحافظ في"الفتح" (1/ 329):"وهو كما قال، وإن جنح ابن خزيمة إلى تصحيح الروايتين لكون حماد بن أبي سليمان وافق عاصمًا على قوله"عن المغيرة"، فجاز أن يكون أبو وائل سمعه منهما، فيصح القولان معًا، لكن من حيث الترجيح رواية الأعمش ومنصور لاتفاقهما أصح من رواية عاصم وحماد لكونهما في حفظهما مقال" إنتهي.

وقوله (بال قائما) الأصل من عادة النبي صلى الله عليه وسلم وهديه أنه كان يبول قاعدا، فلعله بال قائما لبيان الجواز لما أمن من إصابته رشاشة البول؛ لأن السباطة كانت رخوة، فلا يرتد البول إلى البائل.

وسُباطة القوم: هي ملقى القمامة والتراب ونحوه.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। অতঃপর তিনি একটি কওমের আবর্জনার স্তূপের কাছে গেলেন এবং দাঁড়িয়ে পেশাব করলেন। তখন আমি দূরে সরে গেলাম। তিনি বললেন, "কাছে এসো।" আমি তাঁর কাছে গেলাম, এমনকি তাঁর দুই গোড়ালির পেছনে দাঁড়ালাম। অতঃপর তিনি ওযু করলেন এবং তাঁর মোজা (খুফ্ফাইন)-এর উপর মাসাহ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1387)


1387 - عن أبي أيوب الأنصاري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أتي أحدكم الغائط؛ فلا يستقبل القبلة ولا يولِّها ظهره؛ شرِّقوا أو غرِّبوا".

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (144) ومسلم في الطهارة (264) كلاهما من طريق الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي أيوب الأنصاري. قال أبو أيوب: فقدمنا الشام فوجدنا مراحيض قد بنيت قبل القبلة، فننحرف عنها، ونستغفر الله.

وفي رواية عند مالك في القبلة (1) قال أبو أيوب الأنصاري وهو بمصر: والله! ما أدري كيف أصنع بهذا الكراييس، وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ذهب أحدكم الغائط أو البول، فلا يستقبل القبلة ولا يستدبرها بفرجه".

ولا منافاة بين الأمرين؛ لأنه يمكن أنه وقع له هذا في البلدين معا.

والكراييس: بياءين، وهي: الكنف، واحدها كرياس، وهو الذي يكون مشرفا على سطح بقناة من الأرض، فإذا كان أسفل فليس بكرياس، وسمي به لما تعلق به من الأقذار ويتكرس، ككرس الدمن. ومن أهل اللغة من جعله بالنون: الكرناس.




আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ শৌচকার্যের জন্য যায়, তখন সে যেন ক্বিবলাকে তার সামনেও না রাখে এবং তার দিকে পিঠও না ফিরায়; তোমরা পূর্ব দিকে মুখ করো অথবা পশ্চিম দিকে।"

হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি (ঐকমত্য): এটি বুখারী ‘ওযু’ অধ্যায়ে (১৪৪) এবং মুসলিম ‘পবিত্রতা’ অধ্যায়ে (২৬৪) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই যুহরী, আত্বা ইবনু ইয়াযীদ আল-লায়সী, আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা শামে (সিরিয়ায়) পৌঁছলাম এবং দেখতে পেলাম কিছু শৌচাগার ক্বিবলামুখী করে তৈরি করা হয়েছে। ফলে আমরা সে দিক থেকে ফিরে যেতাম এবং আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করতাম।

মালিকের কিতাব ‘আল-ক্বিবলা’ (১)-এর এক বর্ণনায় আছে, আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মিসরে থাকাকালে বললেন: আল্লাহর কসম! আমি জানি না এই ক্বারাঈস (শৌচাগার)-এর সাথে আমি কী করব, অথচ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ শৌচকার্য বা পেশাবের জন্য যায়, তখন সে যেন ক্বিবলাকে তার সামনেও না রাখে এবং তার লজ্জাস্থান দ্বারা তার দিকে পিঠও না ফিরায়।"

উভয় নির্দেশের মধ্যে কোনো বিরোধ নেই; কারণ সম্ভবত এই বিষয়টি (ক্বিবলামুখী শৌচাগার) তার ক্ষেত্রে উভয় শহরেই ঘটেছিল।

আর 'আল-ক্বারাঈস' (الكراييس) শব্দটি দুটি ইয়া (ي)-সহ লেখা হয়, এবং এটি হলো শৌচাগার বা পায়খানা, যার একবচন হলো 'ক্বিরিয়াস' (كرياس)। এটি হলো এমন স্থান যা ভূপৃষ্ঠ থেকে কোনো নল বা নালার উপর নির্মিত হয়। যদি এটি নিচে তৈরি হয়, তবে তা ক্বিরিয়াস নয়। এই নামে এর নামকরণের কারণ হলো এর সাথে সংযুক্ত ময়লা যা স্তূপীকৃত হয় (يتكرس), যেমন গোবরের স্তূপ। ভাষা বিশেষজ্ঞদের মধ্যে কেউ কেউ এটিকে নূন (ن) দ্বারা 'আল-ক্বারনাস' (الكرناس) হিসেবেও উল্লেখ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1388)


1388 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا جلس أحدكم على حاجته فلا يستقبل القبلة ولا يستدبرها".

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (265) مختصرا هكذا. من طريق سهيل، عن القعقاع بن حكيم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه أبو داود (8) وابن ماجه (313) من طريق ابن عجلان، عن القعقاع بن حكيم مطولًا،
وفيه:"إنما أنا لكم بمنزلة الوالد؛ أعلمكم، فإذا أتي أحدكم الغائط فلا يستقبل القبلة ولا يتدبرها، ولا يستطيب بيمينه"، وكان يأمر بثلاثة أحجار، وينهى عن الروث والرِّمة. وأخرجه أيضًا النسائي مختصرًا.

وهذا إسناد حسن لأن فيه ابن عجلان وهو صدوقٌ.

والرِّمّة: العظام البالية.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমি তোমাদের জন্য পিতার মতন; আমি তোমাদের শিক্ষা দেই। অতএব, যখন তোমাদের কেউ শৌচাগারে যায়, তখন সে যেন ক্বিবলাকে মুখ না করে এবং পিঠও না করে, আর সে যেন তার ডান হাত দ্বারা ইস্তিঞ্জা না করে।" আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনটি পাথর দ্বারা ইস্তিঞ্জা করার নির্দেশ দিতেন এবং গোবর ও পচা হাড় (ব্যবহার করতে) নিষেধ করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (1389)


1389 - عن عبد الله بن الحارث بن جَزْءٍ الزبيدي يقول: أنا أول من سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يبولن أحدكم مستقبل القبلة". وأنا أول من حدّث الناس بذلك.

صحيح: رواه ابن ماجه (317) قال: حدثنا محمد بن رمحٍ المصري، أنا الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، أنه سمع عبد الله بن الحارث بن جزء يقول، فذكر الحديث.

قال البوصيري في الزوائد: إسناده صحيح، وحكم بصحته ابن حبان والحاكم وأبو ذر الهروي وغيرهم، ولا أعرف له علة .. انتهى.

قلت: وهو كما قال، وقد رواه الإمام أحمد (17700) وغيره من طرق عن الليث بن سعد هكذا. ثم رواه من طريق آخر (17708) عن ابن لهيعة، عن عبيد الله بن المغيرة قال: أخبرني عبد الله بن الحارث بن جَزْءٍ الزبيدي قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يبول مستقبل القبلة، وأنا أول من حدَّث الناس بذلك.

وهذا مما أخطأ فيه ابن لهيعة؛ فإن عبد الله بن الحارث يروي النهي عن استقبال القبلة لا العكس من فعل النبي صلى الله عليه وسلم بأنه كان يبول مستقبل القبلة.




আবদুল্লাহ ইবনু হারিস ইবনু জায আয-যুবায়দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমিই প্রথম ব্যক্তি, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমাদের কেউ যেন ক্বিবলামুখী হয়ে পেশাব না করে।" আর আমিই প্রথম ব্যক্তি, যিনি মানুষকে এ বিষয়ে হাদীস বর্ণনা করেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1390)


1390 - عن عبد الله بن عمر أنه كان يقول: إن ناسا يقولون: إذا قعدت على حاجتك فلا تستقبل القبلة ولا بيت المقدس، فقال عبد الله بن عمر: لقد ارتقيت يوما على ظهر بيتٍ لنا، فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم على لَبِنَتَيْن مستقبلا بيت المقدس لحاجته، وقال: لعلك من الذين يُصلّون على أوراكهم؟ فقلت: لا أدري والله!

قال مالك: يعني يصلِّي ولا يرتفع عن الأرض؛ يسجد وهو لاصِقٌ بالأرض.

متفق عليه: رواه مالك في القبلة (3) عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى بن حَبْان، عن عمه واسع بن حَبّان، عن عبد الله بن عمر، فذكر الحديث. ورواه البخاري في الوضوء (145) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به مثله. ورواه مسلم في الطهارة (266) عن عبد الله بن مسلمة، ثنا سليمان بن بلال، عن يحيى بن سعيد، عن محمد بن يحيى، عن عمه واسع بن حَبّان قال:"كنت أصلي في المسجد وعبد الله بن عمر مُسند ظهره إلى القِبلة، فلما قضيت صلاتي انصرفت إليه من
شِقِّي، فقال عبد الله: يقول ناس: إذا قعدت للحاجة تكون لك، فلا تعقد مستقبل القبلة ولا بيت المقدس، قال عبد الله: ولقد رقيتُ على ظهر بيتٍ فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم قاعدا على لَبِنتين مستقبلا بيت المقدس لحاجته". وفي رواية عندهما - البخاري (148) ومسلم - عن عبيد الله بن عمر، عن محمد بن يحيى بن حَبّان به، وفيها:"ارتقيتُ فوق بيت حفصة لبعض حاجتي، فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقضي حاجته مستدبر القبلة مستقبل الشام".

وعبيد الله بن عمر هو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب، تابعي صغير من فقهاء أهل المدينة.

وقوله:"لعلّك من الذين يُصلون على أوراكهم!" أي: من يلصق بطنه بوركيه إذا سجد، وهو خلاف هيئة السجود المشروعة، وهي التجافي والتجنح. انظر ما ذكره الحافظ من مناسبة هذه الجملة بما قبله من الحديث.

وفي الحديث دليل على أن خروج النساء للبراز لم يستمرّ، ثم اتخذت الأخلية في البيوت.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: কিছু লোক বলে থাকে যে, তোমরা যখন প্রাকৃতিক প্রয়োজন সারতে বসো, তখন যেন কিবলা অথবা বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে মুখ না করো। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি একদিন আমাদের একটি ঘরের ছাদে উঠলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজনের জন্য দুটি ইটের উপর বসা অবস্থায় বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে মুখ করে থাকতে দেখলাম। এবং (তিনি আমাকে দেখে) বললেন, “সম্ভবত তুমি কি তাদের মধ্যে একজন, যারা নিজেদের উরুর উপর ভর দিয়ে সালাত আদায় করে?” আমি বললাম, আল্লাহর কসম, আমি জানি না!









আল-জামি` আল-কামিল (1391)


1391 - عن جابر بن عبد الله قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نستقبل القبلة ببولٍ، فرأيته قبل أن يقبض بعام يستقبلها.

حسن: رواه أبو داود (13) والترمذي (9) وابن ماجه (325) كلهم عن محمد بن بشار، ثنا وهب بن جرير، ثنا أبي، قال: سمعتُ محمد بن إسحاق يحدث عن أبان بن صالح، عن مجاهد، عن جابر بن عبد الله به. وإسناده حسن لأجل محمد بن إسحاق وهو مدلس وقد صرَّح بالتحديث، وصححه أيضًا ابن خزيمة (58) فأخرجه عن محمد بن بشار به مثله. ورواه الدارقطني (1/ 58)، والحاكم (1/ 154) كلاهما من طريق يعقوب بن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن ابن إسحاق به مثله. وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وقال الترمذي: حديث حسن غريب، وقد روي هذا الحديث ابن لهيعة، عن أبي الزبير، عن جابر، عن أبي قتادة: أنه رأى النبي صلى الله عليه وسلم يبول مستقبل القبلة، قال: حدثنا بذلك فتية، حدثنا ابن لهيعة. وحديث جابر عن النبي صلى الله عليه وسلم أصحّ من حديث ابن لهيعة" انتهي.

قلت: وهو كذلك؛ فإن ابن لهيعة ضعيف معروف، ولعله حسّن حديث جابر لأجل محمد بن إسحاق؛ فإنه صدوق، وأما تدليسه فزال لتصريحه بالتحديث.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পেশাব করার সময় কিবলামুখী হতে নিষেধ করেছেন। (কিন্তু) আমি তাঁকে তাঁর ইন্তেকালের এক বছর আগে কিবলামুখী হয়ে (পেশাব করতে) দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (1392)


1392 - عن مروان الأصفر قال: رأيت ابن عمر أناخ راحلته مستقبل القبلة، ثم جلس يبول إليها، فقلت: يا أبا عبد الرحمن! أليس قد نُهي عن هذا؟ قال: بلى، إنما نهي عن ذلك في الفضاء، فإذا كان بينك وبين القبلة شيء يسترك فلا بأس.

حسن: رواه أبو داود (11) عن محمد بن يحيى بن فارس، ثنا صفوان بن عيسى، عن الحسن ابن ذكوان، عن مروان الأصفر فذكره.

وإسناده حسن لأجل الكلام في الحسن بن ذكوان غير أنه حسن الحديث.
وصححه ابن خزيمة (60)، والحاكم (1/ 154) كلاهما، من طريق الحسن بن ذكوان به. قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري - وفي نسخة: على شرط مسلم -، وقد احتجَّ بالحسن بن ذكوان"، ورواه الدارقطني (1/ 58) وقال:"صحيحٌ رجاله كلُّهم ثقات".




মারওয়ান আল-আসফার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনে উমরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখলাম যে তিনি তাঁর উটনীকে কিবলামুখী করে বসালেন, অতঃপর তিনি সেদিকে মুখ করে বসে পেশাব করলেন। তখন আমি বললাম: হে আবূ আবদুর রহমান! এটা কি নিষিদ্ধ করা হয়নি? তিনি বললেন: হ্যাঁ, নিশ্চয় এটা শুধুমাত্র খোলা ময়দানে (ফাযা’তে) নিষিদ্ধ করা হয়েছে। কিন্তু যখন তোমার ও কিবলার মাঝে কোনো আড়ালকারী বস্তু থাকে, তখন কোনো সমস্যা নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (1393)


1393 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لم يستقبل القبلةَ، ولم يستدبرها في الغائط، كُتب له حسنةٌ، ومُحيَ عنه سيئةٌ".

حسن: رواه الطبراني في الأوسط (1343) قال: حدثنا أحمد، قال: حدثنا أحمد بن حرب الموصلي، قال: حدثنا القاسم بن يزيد الجَرْمي، عن إبراهيم بن طهمان، عن حسين المعلم، عن يحيي بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

قال المنذري في"الترغيب" (1/ 136):"رواه الطبراني، ورواتُه رواة الصحيحة".

قلت: ليس كما قال فإن شيخ الطبراني، وشيخ شيخه ليسا من رجال الصحيح، فأجاد الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1014) لما قال:"رواه الطبراني في الأوسط ورجاله رجال الصحيح إلا شيخ الطبراني وشيخ شيخه وهما ثقتان".

قلت: شيخ الطبراني هو: أحمد غير منسوب ولكن تعين بما ذكره قبله منسوبًا بأنه: أحمد بن محمد بن عبد الله بن صدقة وهو: أبو بكر البغدادي الإمام الحافظ توفي سنة 293. تاريخ بغداد (5/ 40) وشيخه أحمد بن حرب الموصلي الطائي من رجال التقريب"صدوق" روي له النسائي فقط. وبقية رجاله ثقات.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি শৌচাগারে কিবলার দিকে মুখ করে না এবং পিঠও দেয় না, তার জন্য একটি নেকি লেখা হয় এবং একটি গুনাহ মুছে দেওয়া হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (1394)


1394 - عن ابن عمر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد الحاجة تنحَّى، ولا يرفع ثيابه حتى يدنو من الأرض.

صحيح: رواه البيهقي في السنن الكبري" (1/ 96) عن أبي الحسن علي بن عبد الله الخسروجردي، أنا أبو بكر الإسماعيلي، ثنا عبد الله بن محمد بن مسلم من أصل كتابه، ثنا أحمد بن محمد بن أبي رجاء المصيمي - شيخ جليل - ثنا وكيع، ثنا الأعمش، عن القاسم بن محمد، عن ابن عمر فذكره. وهذا إسناد صحيح.

وأما ما رواه أبو داود (14) عن زهير بن حرب، حدثنا وكيع، عن الأعمش عن رجل، عن ابن عمر فذكر مثله. فقال أبو داود:"رواه عبد السلام بن حرب، عن الأعمش، عن أنس بن مالك، وهو ضعيف".

قلت: فيه علتان:
إحداهما: في الإسناد الأول رجل لم يّسم.

والثانية: في الإسناد الثاني فيه انقطاع، فإن الأعمش لم يسمع من أنس كما قال الترمذي (1/ 21 - 22) بعد أن رواه من طريق عبد السلام بن حرب، عن الأعمش، عن أنس، وقال: وروي وكيع وأبو يحيى الحماني، عن الأعمش، قال: قال ابن عمر فذكر حديثه وقال:"وكلا الحديثين مرسل، ويقال: لم يسمع الأعمش عن أنس، ولا من أحد من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم. وقد نظر إلى أنس بن مالك قال: رأيتُه يُصَلِّي فذكر عنه حكايةً في الصلاة". انتهى.

وكذلك ما روي عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أراد الحاجة لم يرفع ثوبه حتى يدنو من الأرض. رواه الطبراني في الأوسط. وفيه الحسين بن عبد الله العجلي كان يضع الحديث كما قال الدارقطني"اللسان" (2/ 296) وقال الهيثمي في"المجمع" (1/ 206) الحسين بن عبد الله العجلي: كان يضع الحديث.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন প্রকৃতির ডাকে সাড়া দিতে চাইতেন, তখন (মানুষের দৃষ্টি থেকে) দূরে সরে যেতেন এবং মাটির কাছাকাছি না হওয়া পর্যন্ত নিজের কাপড় তুলতেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (1395)


1395 - عن عائشة قالت: يقولون: إن النبي صلى الله عليه وسلم أوصى إلى عليّ، لقد دعا بالطست ليبول فيها، فانخنثتْ نفسه وما أشعر، فإلى من أوصي؟ ! .

صحيح: رواه النسائي (33) عن عمرو بن علي، أخبرنا أزهر، قال: أخبرنا ابن عون، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة فذكرت الحديث.

قال النسائي: أزهر هو ابن سعد السمان.

وأصله في الصّحيحين بدون قولها:"ليبول فيها، البخاريّ في المغازي (4459) عن عبد الله بن محمد، عن أزهر ولفظه: ذكر عند عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم أوصى إلى عليٍّ، فقالت: من قاله، لقد رأيت النبي صلى الله عليه وسلم وإني لمُسنِدَته إلى صدري، فدعا بالطست فانخنث، فمات فما شعرتُ، فكيف أوصى إلى عليٍّ؟

ورواه أيضًا هو في الوصايا (2741) ومسلم في الوصية (1636) كلاهما من طريق إسماعيل بن عليه، عن ابن عون، به مثله.

وقولها: انخنث - بالنون والخاء المعجمة ثم نون مثلثة، معناه كما في النهاية: انكسر وانثنى الاسترخاء أعضائه عند الموت.

وفي الباب ما رُوي عن حُكيمة بنت أُمَيْة بنت رُقَيْقة، عن أمِّها أنها قالت:"كان للنبي صلى الله عليه وسلم قَدَح من عيدان تحت سريره يبول فيه بالليل".

رواه أبو داود (24) والنسائيّ (32)، والطبراني في الكبير (24/ 189)، وابن حبان (1426)، والحاكم (1/ 167) وعنه البيهقي (1/ 99) كلّهم من حديث حجاج بن محمد، عن ابن جريح، عن حُكيمة بنت أميمة، عن أنها أميمة، فذكرته.
قال الحاكم: هذا حديث صحيح الإسناد، وسنّة غريبة، وأميمة بنت رقيقة صحابيّة مشهورة، مخرج حديثها في الوُحدان للأئمة، ولم يخرجاه".

قلت: فيه حُكيمة لم يوثقها غير ابن حبان (4/ 195)، ولم يذكر من الرّواة عنها غير ابن جريج، فهي مجهولة؛ ولذا ذكرها الذهبي في الميزان" في النسوة المجهولات، وقال الحافظ في التقريب:"لا تعرف" وكذلك قال ابن الملقن في"البدر المنير" (2/ 226).

وقد تعقّب ابن القطان في الوهم والإيهام (5/ 514) عبد الحق فيما نقله عن الدارقطني من قوله:"أنّ هذا الحديث يلحق بالصحيح - أو كلامًا هذا معناه بأن الدارقطني لم يقضي فيه بصحة ولا ضعف، والخبر متوقف الصحة على العلم بحال الراوية، فإن ثبتت ثقتها صحّت روايتها، وهي لم تثبت".

هذه خلاصة ما نقله المناوي في"فيض القدير" (5/ 178).

وفي"الوهم والإيهام": ثم ذكر الدارقطني في هذه الترجمة أميمة بنت رقيقة، روى عنها محمد بن المنكدر وابنتها حكيمة، ولم يزد على هذا ولا عيّن ما رويا عنها، ولا قضى لحكيمة بثقة ولا ضعف، ولا لشيء مما روت".

ونقل المناوي في"فيض القدير""من شهاب الدين صاحب كتاب"اقتفاء السنن": هذا الحديث لم يضعّفوه، وهو ضعيف، ففيه حكيمة، وفيها جهالة فإنه لم يرو عنها إلا ابن جريج ولم يذكرها ابن حبان في"الثقات"".

قلت: بل ذكرها ابن حبان في"الثقات" كما مضى، وروي لها في صحيحه ولم يذكر من الرّواة عنها غير ابن جريج.

ثم زاد الطبرانيّ:"فبال فيه، ثم جاء فأراده فإذا القدح ليس فيه شيء، فقال لامرأة يقال لها: بركة كانت تخدم أمّ حبيبة، جاءت بها من أرض الحبشة:"أين البول الذي كان في القدح؟". قالت: شربته! فقال: القد احتظت من النار بحظار". وهذه زيادة شاذة أو منكرة رواها شيخ الطبراني أحمد بن زياد الحذّاء الرّقي، عن حجاج بن محمد وهو الأعور المصيصيّ.

وأحمد بن زياد الحذّاء هذا لم أقف على من وثقه، وكان من كبار شيوخ الطبراني كما قال الذّهبي في تاريخ الإسلام (21/ 59) أي الكبار سنًّا لا علمًا ورتبة؛ فإنّ الحجاج بن محمد المصيصيّ توفي سنة (206 هـ) وكان قد تغيّر في آخر حياته حين رجع إلى بغداد، فالظاهر أنه أدركهـ في حال اختلاطه.

ثم رواه الطبراني (24/ 205 - 206) من وجه آخر عن حجاج بن محمد، بإسناده، وفيه: قالوا:

"شربته برّة خادم أمّ سلمة التي قدمت معها من أرض الحبشة .... وهذا كله يدل على أن حجاج بن محمد المصيصي روي هذه الزيادة في حال اختلاطه فلم يضبط اسم الخادم، ولا اسم المخدوم.

ولكن يعكّر على هذا أن هذه الزيادة رواها أيضًا يحيى بن معين عن الحجاج بن محمد. رواها
الطبرانيّ في الكبير (24/ 205 - 206) عن عبد الله بن أحمد بن حنبل، عنه. فلا أدري هل روي هو أيضًا هذا الحديث في حال اختلاطه أمّ قبله، ومن المعروف أنه كان مكثرًا عنه، كتب عنه نحو خمسين ألف حديث.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أمّ أيمن قالت: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم من اللّيل إلى فخارة في جانب البيت فبال فيها، فقمت من الليل وأنا عطشانة فشربت ما فيها وأنا لا أشعر، فلما أصبح النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يا أمّ أيمن، قومي فأهريقي ما في تلك الفخارة" قلت: قد واللهِ شربتُ ما فيها! قال: فضحك النبيّ صلى الله عليه وسلم حتى بدت نواجذه، ثم قال:"أما إنّك لا تتجعين بطنك أبدًا".

رواه الطبرانيّ في الكبير (25/ 89)، والحاكم في المستدرك (4/ 63) كلاهما من حديث شبابة بن سوار، حدّثني أبو مالك النخعيّ، عن الأسود بن قيس عن نبيح العنزي، عن أمّ أيمن، قالت (فذكرته). وسكت عليه الحاكم.

وقال الهيثمي في"المجمع" (8/ 271):"وفيه أبو مالك النخعيّ وهو ضعيف.

قلت: وهو كما قال، فإنّ أبا مالك النخعيّ وهو الواسطيّ، واسمه عبد الملك بن حسين، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وبه ضعفه ابن حجر في"التلخيص" (1/ 31) وزاد أن نبيحًا لم يلق أمّ أيمن.

ثم إن عبد الملك قد اضطرب في إسناد هذا الحديث، فمرة رواه كما مضى، وأخرى روى عن نافع بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن، عن أمّ أيمن.

ومن هذا الطريق رواه ابن السكن، قال الحافظ في الإصابة في ترجمة أمّ أيمن (4/ 433):"فيحتمل أن تكون قصة أخرى غير القصة التي اتفقت لبركة خادم أمّ حبية، ولكن ادّعى ابن السكن أنّ بركة خادم أمّ حبيبة كانت تكنى أيضًا أمّ أيمن أخذًا من هذا الحديث، والعلم عند الله" انتهى قول الحافظ.

قلت: ونافع بن عطاء هذا لم أعرف من هو؟ ولم يذكره المزّي في"تهذيب الكمال" في شيوخ عبد الملك بن الحسين أبي مالك النخعيّ، ولم يذكره ابن حبان في"الثقات" من يُسمّى بـ نافع بن عطاء. وكذلك أكد ذلك الحافظ ابن حجر في التهذيب (10/ 415) في ترجمة نافع عن عائشة.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা বলে যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ওসীয়ত করে গেছেন। অথচ তিনি পেশাব করার জন্য পাত্র আনতে বললেন, এরপর তাঁর প্রাণবায়ু বেরিয়ে গেল এবং আমি তা টেরও পাইনি। তাহলে তিনি কার কাছে ওসীয়ত করে গেলেন?!









আল-জামি` আল-কামিল (1396)


1396 - عن عبد الله بن سرجس، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يبولن أحدكم في الجحر، وإذا نمتم فأطفئوا السراج، فإن الفأرة تأخذ الفتيلة فتحرق أهل البيت، وأوكئوا الأسقية، وخمروا الشراب، وغلقوا الأبواب بالليل".

قالوا لقتادة: ما يكره من البول في الجحر؟ قال: يقال إنها مساكن الجن.

صحيح: رواه أحمد (20775)، والحاكم (1/ 186) كلاهما من طريق معاذ بن هشام، قال:
حدثنا أبي عن قتادة، عن عبد الله بن سرجس فذكره.

ورواه أبو داود (29)، والنسائي (34)، وابن الجارود (34) كلهم من طريق معاذ بن هشام به مقتصرا على النهي عن البول في الجحر.

وإسناده صحيح، قتادة سمع من عبد الله بن سرجس كما قال ابن المديني، وأبو زرعة، وأبو حاتم، وأحمد بن حنبل في رواية ابنه عبد الله.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، فقد احتجا بجميع رواته".

وصححه أيضًا ابن خزيمة، وابن السكن فيما أفاده الحافظ ابن حجر في التلخيص الحبير (1/ 106). وأسند الحاكم عن ابن خزيمة أنه قال:"أنهي عن البول في الأجحرة لخبر عبد الله بن سرجس … فذكر الحديث وقول قتادة، وقال: ولست أبت القول أنها مساكن الجن؛ لأن هذا من قول قتادة".




আব্দুল্লাহ ইবনে সারজিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন গর্তে পেশাব না করে। আর যখন তোমরা ঘুমাও, তখন বাতি নিভিয়ে দাও, কারণ ইঁদুর সলতে টেনে নিয়ে ঘরের লোকদের পুড়িয়ে দিতে পারে। আর মশকের মুখ বেঁধে রাখো, পানীয় ঢেকে রাখো এবং রাতের বেলায় দরজা বন্ধ করে দাও।"

তারা কাতাদাহকে জিজ্ঞেস করল: গর্তে পেশাব করা অপছন্দনীয় কেন? তিনি বললেন: বলা হয় যে, এগুলো জিনদের আবাসস্থল।









আল-জামি` আল-কামিল (1397)


1397 - عن أبي هريرة أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يبولَنَّ أحدُكم في الماء الدائم الذي لا يجري، ثم يغتسل فيه".

متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (239) ومسلم في الطهارة (282) كلاهما من طرق، عن أبي هريرة. وفي رواية عند مسلم:"لا تَبُل في الماء الدائم الذي لا يجري ثم تغتسل منه". وزاد أبو داود (70): لولا تغتسل فيه من الجنابة".

وقوله (الماء الدائم) أي: الراكد، كما في رواية النسائي (1/ 49).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: “তোমাদের কেউ যেন স্থির, প্রবহমান নয় এমন পানিতে পেশাব না করে, অতঃপর সেই পানি দিয়েই গোসল করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (1398)


1398 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يغتسلْ أحدكم في الماء الدائم وهو جُنُب". قالوا: كيف يفعل يا أبا هريرة؟ قال: يتناوله تناولا.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (283) من طرق، عن ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن بكير بن الأشجّ، أن أبا السائب مولى هشام بن زُهرة حدَّثه، أنَّه سمع أبا هريرة يقول … فذكر مثله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন জানাবত (নাপাকী) অবস্থায় বদ্ধ পানিতে গোসল না করে। তারা জিজ্ঞেস করল: হে আবূ হুরায়রা! তাহলে সে কী করবে? তিনি বললেন: সে যেন তা তুলে নেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (1399)


1399 - عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اتقوا اللَّعّانين". قيل وما اللَّعّانان يا رسول الله؟ قال:"الذي يتخَلَّى في طريق الناس أو في ظلِّهم.

صحيح: أخرجه مسلم في الطهارة (269). من طريق إسماعيل بن جعفر، أخبرني العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

قوله:"اللعانين قال الخطابي:"المراد باللعانين: الأمرين الجالبين للّعن، الحاملين الناس عليه، والداعيين إليه، وذلك أنَّ من فعلهما شُيْم، ولُعِن. يعني: عادة الناس لعنه. فلما صارا سببًا لذلك أُضِيف اللعن إليهما". وقال:"المراد هنا بالظل، هو الظل الذي اتخذه الناس مقيلًا ومنزلًا ينزلونه، وليس كل ظل يحرم قضاء الحاجة تحته، فقد قضى النبي صلى الله عليه وسلم حاجته تحت حايش من
النخل، وهو - لا محالة - له ظل" انتهى.

ولحديث أبي هريرة شواهد من حديث ابن عباس ومعاذ بن جبل وجابر بن عبد الله وابن عمر وأبي ذر وغيرهم، ولكن لم يصح منها شيء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা অভিশাপ আনয়নকারী দুটি কাজ থেকে বেঁচে থাকো।" জিজ্ঞেস করা হলো, হে আল্লাহর রাসূল! অভিশাপকারী দুটি কাজ কী কী? তিনি বললেন: "(তা হলো) যে ব্যক্তি মানুষের চলার পথে অথবা তাদের বিশ্রামের ছায়ায় পেশাব-পায়খানা করে।









আল-জামি` আল-কামিল (1400)


1400 - عن جابر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه نهى أن يُبال في الماء الراكد.

صحيح: رواه مسلم في الطهارة (281). من طريق الليث، عن أبي الزبير، عن جابر فذكر الحديث.

وفي الباب روي عن عبد الله بن مغفل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يبولنَّ أحدكم في مُسْتَحَمِّه، ثم يغتسل فيه؛ فإن عامة الوسواس منه.

رواه أبو داود (27) والترمذي (21) والنسائي (36) وابن ماجه (304) وابن حبان (1255) والحاكم (1/ 167) كلهم من طريق أشعث بن عبد الله، عن الحسن، عن عبد الله بن مغفل، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.

قال الترمذي: هذا حديث غريب، لا نعرفه مرفوعا إلا من حديث أشعث بن عبد الله" وهو كما قال.

فقد رواه غيره عن عبد الله بن مغفل موقوفا، رواه البيهقي (1/ 98)، كما أن فيه الحسن وهو البصري الإمام المعروف، مدلس، ولم أجد له تصريحا بالسماع، وإن كان قد نص أهل العلم على سماعه من عبد الله بن مغفل.

ويشهد لحديث عبد الله بن مغفل حديث حميد بن عبد الرحمن الحميري قال: لقيت رجلا صحب النبي صلى الله عليه وسلم كما صحبه أبو هريرة قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يمتشط أحدنا كلَّ يوم، أو يبول في مغتسله".

رواه أبو داود (28) والنسائي (238) كلاهما من طريق داود الأودي، عن حميد بن عبد الرحمن به.

هذا الحديث هو نفسه جاء ذكره في باب النهي عن الوضوء بفضل وضوء المرأة، كرّره أبو داود في موضعين، ولم يكرره النسائي؛ فإنه جمع في حديث واحد، ولفظه:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يمتشط أحدنا كل يوم، أو يول في مغتسله، أو يغتسل الرجل بفضل المرأة، والمرأة بفضل الرجل، وليغترفا جميعًا".

فائدة: قال ابن ماجه:"سمعت محمد بن يزيد يقول: سمعت علي بن محمد الطنافسي يقول:

إنما هذا في الحفيرة، فأما اليوم فلا، فمغتسلاتهم الجصُّ والصاروج والقير؛ فإذا بال فأرسل عليه

الماء، لا بأس به.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্থির (জমাবদ্ধ) পানিতে পেশাব করতে নিষেধ করেছেন।