আল-জামি` আল-কামিল
1401 - عن ابن عباس قال: مرّ رسول الله صلى الله عليه وسلم على قبرين، فقال:"أما إنهما لَيُعذَّبان،
وما يُعَذَّبان في كبير، أمّا أحدهما فكان يمشي بالنميمة، وأمّا الآخر فكان لا يستر من بوله".
قال: فدعا بعسيب رطْبٍ فشقَّه باثنين، ثم غرس على هذا واحدًا، وعلى هذا واحدًا، ثم قال:"لعله يُخفَّفُ عنهما ما لم ييبسا".
وفي رواية:"وكان الآخر لا يستنزه عن البول، أو من البول".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (218) وفي الجنائر (1361) ومسلم في الطهارة (292) كلاهما من طريق الأعمش، قال: سمعت مجاهدًا يحدِّث عن طاوس، عن ابن عباس … فذكر الحديث. واللفظ لمسلم، وفي لفظ البخاري: ثم أخذ جريدة رطبة … وفيه أيضًا: قالوا: يا رسول الله! لم صنعت هذا؟ فقال:"لعله أن يخفَّف عنهما ما لم ييبسا".
وقد استنكر الخطّابيُّ وغيره وضع الناس الجريد ونحوه في القبر، عملًا بهذا الحديث. وعلَّل ذلك العلَّامة ابن بازٍ قائلًا:"لأنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم لم يفعله إلَّا في قبورٍ مخصوصةٍ اطلَّع على تعذيب أهلها، ولو كان مشروعًا لفعله في كلِّ القبور، وكبار الصحابة - كالخلفاء لم يفعلوه، وهم أعلم بالسنَّة". الحاشية على فتح الباري (1/ 330). انظر ما يستفاد من الحديث:"المنة الكبرى" (1/ 78).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি বললেন, "শুনে রাখো, এদের দু'জনকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে, তবে কোনো গুরুতর (ব্যাপারের) জন্য তাদের শাস্তি দেওয়া হচ্ছে না। তাদের একজনের অভ্যাস ছিল সে চোগলখুরি করে বেড়াত, আর অন্যজন পেশাব থেকে নিজেকে আড়াল (বা পবিত্র) করত না।"
তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন, অতঃপর তিনি একটি কাঁচা খেজুরের ডাল চাইলেন এবং সেটিকে দু'ভাগ করলেন। এরপর তিনি একটি ডাল এক কবরের ওপর এবং অন্যটি আরেক কবরের ওপর গেঁথে দিলেন। এরপর বললেন, "সম্ভবত ডাল দুটি শুকিয়ে না যাওয়া পর্যন্ত তাদের শাস্তি লাঘব করা হবে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে, "অন্যজন পেশাবের ব্যাপারে পবিত্রতা (বা সতর্কতার) অবলম্বন করত না, বা পেশাব থেকে বাঁচত না।"
1402 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"أكثر عذاب القبر من البول.
صحيح: رواه ابن ماجه (348) عن أبي بكر بن أبي شيبة - وهو في مصنفه (1/ 122) قال: حدثنا عفان، قال: حدثنا أبو عوانة، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكر الحديث. ورواه الدارقطني (1/ 128) وقال: صحيح، والحاكم (1/ 183) وقال: صحيح على شرط الشيخين ولا أعرف له علة، . وأورده البوصيري في زوائد ابن ماجه، وقال: هذا إسناد صحيح رجاله عن آخرهم محتج بهم في الصحيحين" وحكى الترمذي في العلل عن البخاري أنه قال: إنه حديث صحيح. وأما أبو حاتم فقال: حديث باطل يعني مرفوعا، العلل (1/ 366) قلت: هذا مثال الاختلاف أنظار العلماء.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, কবরের অধিকাংশ শাস্তি প্রস্রাবের (ব্যাপারে সতর্কতা অবলম্বন না করার) কারণে হয়ে থাকে।
1403 - عن أبي هريرة، قال: كنا نمشي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فمررنا على قبرين، فقام، فقمنا معه، فجعل لونه يتغير حتى رعد كُمُّ قميصه، فقلنا: ما لك يا نبي الله؟ قال: ما تسمعون ما أسمع؟ قلنا: وما ذاك يا نبي الله؟ قال:"هذان رجلان يعذبان في قبورهما عذابًا شديدًا في ذنبٍ هينٍ" قلنا: مِمَّ ذلك يا نبيَّ الله؟ قال:"كان أحدهما لا يستنزه من البول، وكان الآخر يؤذي الناس بلسانه، ويمشي بينهم بالنميمة" فدعا بجريدَتَيْن من جرائد النخل، فجعل في كل قبر واحدة، قلنا: وهل ينفعهما ذلك يا رسول الله؟ قال: نعم يخفف عنهما ما داما رَطْبَتَيْن".
صحيح: رواه ابن حبان (824) قال: أخبرنا أبو عروبة، قال: حدثنا محمد بن وهب بن أبي كريمة، قال: حدثنا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم، قال: حدثني زيد بن أبي أُنْيْسة، عن المنهال بن عمرو، عن عبد الله بن الحارث، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
ورجاله ثقات. أبو عروبة هو الحسين بن محمد بن أبي معشر الحراني حافظ مترجَم في"تذكرة الحفاظ" (2/ 774) وأبو عبد الرحيم هو: خالد بن يزيد، ويقال: ابن أبي يزيد الأموي مولاهم الحراني، ثقة من رجال مسلم.
وللحديث إسناد آخر رواه ابن أبي شيبة (3/ 376) وأحمد (9686) من طريق محمد بن عبيد، حدثنا يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة قال: مر رسول الله صلى الله عليه وسلم على قبر فوقف عليه، فقال:"إيتوني بجريدتين، فجعل أحداهما عند رأسه، والأخرى عند رجليه، فقيل له: يا رسول الله! أينفعه ذلك؟ فقال:"لعله يخفف عنه بعض عذاب القبر ما بقيت فيه ندوة".
وإسناده حسن لأجل يزيد بن كيسان فإنه مختلف فيه، والخلاصة أنه حسن الحديث. وهو من رجال مسلم. ولذا قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 57) رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".
قلت: ليس فيه ذكر السبب العذاب، فيحتمل أنه يعذب بسبب البول كما في الرواية السابقة، ويحتمل أن يكون السبب آخر، ولذا ذكروه في كتاب الجنائز، ولم يذكروه في كتاب الطهارة. وسأذكر بقية أحاديث عذاب القبر في كتاب الجنائز.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে হাঁটছিলাম। তখন আমরা দু'টি কবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলাম। তিনি দাঁড়িয়ে গেলেন, ফলে আমরাও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম। তখন তাঁর চেহারার রং পরিবর্তিত হতে লাগল, এমনকি তাঁর জামার আস্তিন কাঁপতে শুরু করল। আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! আপনার কী হয়েছে? তিনি বললেন, আমি যা শুনছি, তোমরা কি তা শুনছো না? আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! তা কী? তিনি বললেন, "এই দুইজন লোককে তাদের কবরে কঠিন শাস্তি দেওয়া হচ্ছে একটি সামান্য পাপের কারণে।" আমরা বললাম, হে আল্লাহর নবী! সেই পাপটি কী? তিনি বললেন, "তাদের একজনের অভ্যাস ছিল যে সে পেশাব থেকে পবিত্রতা অর্জন করত না। আর অন্যজন নিজের জিভ দ্বারা মানুষকে কষ্ট দিত এবং তাদের মধ্যে চোগলখুরি করে বেড়াত।" এরপর তিনি খেজুর গাছের দু'টি ডাল আনালেন এবং প্রতিটি কবরে একটি করে গেঁথে দিলেন। আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এটা কি তাদের কোনো উপকারে আসবে? তিনি বললেন, "হ্যাঁ, যতক্ষণ ডাল দুটি সতেজ থাকবে, ততক্ষণ তাদের ওপর থেকে আযাব হালকা করা হবে।"
1404 - عن أبي بكرة قال: بينما أنا أُماشي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو آخذ بيدي، ورجل عن يساره، فإذا نحن بقبرين أمامنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم"إنهما ليعذَّبان، وما يعذَّبان في كبير، وبلى، فأيكم يأتيني بجريدةٍ؟" فاستبقنا، فسبقتُه، فأتيتُه بجريدةٍ، فكسَرها نصفين، فألقى على ذا القبر قِطْعة، وعلى ذا القبر قِطْعة، وقال:"إنه يُهوَّنُ عليهما ما كانا رطْبتَين، وما يُعذَّبان إلا في البول والغيبة".
حسن: رواه أحمد (20373) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، والبزَّار (3636)، من طريق مسلم بن إبراهيم، كلاهما - أعني أبا سعيد ومسلم بن إبراهيم - عن الأسود بن شيبان، عن بحر بن مَرَّار، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبي بكرة فذكره.
وهذا إسناد حسن متصل؛ فإن بحر بن مرَّار سمع عن جده عبد الرحمن بن أبي بكرة. وبحر بن مَرَّار تكلم فيه القطان فقال فيه: إنَّه خولط. إلَّا أنَّ ابن عديٍّ بعد أن أخرج الحديث المذكور وغيره من رواياته قال: لا أعرف له حديثًا منكرًا فأذكره، ولم أر أحدًا من المتقدِّمين ممَّن تكلَّم في الرجال ضعَّفه إلا يحيى القطَّان، ذكر أنَّه خولط. ومقدار ما له من الحديث لم أر فيه حديثًا منكرًا".
وهذا هو الصواب؛ فحديثه هذا لا بأس به في الشواهد.
ولا يُعكِّر على هذا الاختلافُ عليه، أعني به ما رواه ابن ماجه (349) من طريق وكيعٍ، وأبو
داود الطيالسي في مسنده (908) كلاهما عن الأسود بن شيبان، عن بحر بن مَرَّار، عن جدِّ أبيه أبي بكرة. ففيه انقطاع؛ لأنَّ بحرًا لم يسمع من أبي بكرة؛ ولذا صوّب الدارقطني في العلل (7/ 156) الرواية الموصولة، وقال أبو حاتم: هي أصحُّ."العلل" (1/
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে হাঁটছিলাম, আর তিনি আমার হাত ধরেছিলেন, এবং একজন লোক তাঁর বাম পাশে ছিল, হঠাৎ আমরা আমাদের সামনে দুটি কবরের কাছে পৌঁছলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই এই দুজনকে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে, তবে এমন কোনো বড়ো কারণে তাদের শাস্তি দেওয়া হচ্ছে না (যা থেকে বেঁচে থাকা কঠিন)। অবশ্য, তোমাদের মধ্যে কে আমার কাছে একটি খেজুর ডাল নিয়ে আসবে?" অতঃপর আমরা দৌড় প্রতিযোগিতা শুরু করলাম, আর আমি তাঁকে অতিক্রম করে এগিয়ে গেলাম এবং তাঁর কাছে একটি খেজুর ডাল নিয়ে এলাম। তিনি তা দু'ভাগে ভাঙলেন। তারপর তিনি এক কবরের উপর এক টুকরা এবং অন্য কবরের উপর আরেক টুকরা রাখলেন এবং বললেন: "যতক্ষণ এই ডাল দুটি সতেজ থাকবে, ততক্ষণ তাদের শাস্তি কিছুটা হালকা করা হবে। আর তাদের শাস্তি দেওয়া হচ্ছে কেবল পেশাবের কারণে এবং গীবতের কারণে।"
1405 - عن عائشة أنها قالت: أُتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بصبي، فبال على ثوبه، فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بماء فأتبعه إيّاه.
متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (109) عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرت الحديث.
ورواه البخاري في الوضوء (222) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك. وأما مسلم فرواه في الطهارة (286) من طريق جرير، عن هشام به، وفيه:"صبي يرضع .. فدعا بماء فصبه عليه" ..
وفي الصحيحين:"أتي بصبي فحنَّكهـ، فبال عليه".
ولمسلم:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يؤتى بالصبيان فيُبرّك عليهم ويحكهم، فأتي بصبي فبال عليه، فدعا بماء فأتبعه بوله ولم يغسله".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি শিশুকে আনা হলো। শিশুটি তাঁর কাপড়ে পেশাব করে দিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানি আনালেন এবং পেশাবের স্থানটিতে তা ছড়িয়ে দিলেন।
1406 - عن أم قيس بنت مِحْصَن أنها أتت بابن لها صغير لم يأكل الطعام إلى رسول الله، صلى الله عليه وسلم فأجلسه في حِجْره، فبال على ثوبه، فدعا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بماء، فَنَضَحَه ولم يَغْسِله.
متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (110) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عُتْبة بن مسعود، عن أم قيس به.
ورواه البخاري في الوضوء (223) عن عبد الله بن يوسف، عن مالك به.
ورواه مسلم في الطهارة (287) عن محمد بن رمح، أخبرنا الليث، عن ابن شهاب به نحوه، وفي رواية عنده:"فدعا بماء فرشَّه"، وفي رواية:"فضحه على ثوبه ولم يغسله غَسْلًا"، وفي رواية: أن أمّ قيس بنت مِحْصَن كانت من المهاجرات الأُوَل اللَّاتي بايعن رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهي أخت عُكاشة بن مِحْصَن أحد بني أسد بن خُزَيْمة، قال: أخبرتني أنها أتت رسول الله صلى الله عليه وسلم بابنٍ لها لم يبلغ أن يأكل الطعام.
والنضح: رشّ الماء على الشيء، ولا يبلغ الغسل.
উম্মে কায়স বিনতে মিহসান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর একটি ছোট ছেলেকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসেছিলেন, ছেলেটি তখনও খাদ্য গ্রহণ শুরু করেনি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে তাঁর কোলে বসালেন। তখন সে তাঁর কাপড়ে পেশাব করে দিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানি চাইলেন এবং তা (পেশাবের উপর) ছিটিয়ে দিলেন, কিন্তু তা ধৌত করলেন না।
1407 - عن لُبابة بنت الحارث قالت: كان الحسين بن علي في حِجْر رسول الله صلى الله عليه وسلم فبال عليه، فقلت: الْبَسَ ثوبا وأعْطِني إزارك حتى أغسله، فقال:"إنما يغسل من بول الأنثى، ويُنْضح من بول الصبي".
حسن: رواه أبو داود (375) واللفظ له، وابن ماجه (522) كلاهما من طريق أبي الأحوص، عن سماك بن حرب، عن قابوس بن أبي المخارق، عن لُبابة بنت الحارث. وإسناده حسن،
ورجال إسناده ثقات غير سماك بن خرب؛ فإنه صدوق، وشيخه قابوس بن المخارق الشيباني الكوفي قال فيه النسائي: ليس به بأس. وذكره ابن حبان في الثقات. وقد ثبت لقاؤه بلُبابة بنت الحارث، وهي أم الفضل زوج العباس بن عبد المطلب، وأخت ميمونة بنت الحارث أمّ المؤمنين.
وأعلَّه البوصيري بالانقطاع بين قابوس وأم الفضل، والصواب أنه متصل؛ لأنه ثبت اللقاء بينهما. وصحَّحه ابن خزيمة (282)، والحاكم (1/ 166).
লুবাবাহ বিনত আল-হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন হুসাইন ইবনু আলী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোলে ছিলেন, তখন সে তাঁর (রাসূলের) উপর পেশাব করে দিল। আমি বললাম: আপনি (অন্য) একটি কাপড় পরিধান করুন এবং আপনার (পেশাব লাগা) লুঙ্গিটি আমাকে দিন, যাতে আমি তা ধুয়ে দিতে পারি। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মেয়ে শিশুর পেশাব অবশ্যই ধৌত করতে হয়, কিন্তু বালক শিশুর পেশাবের ওপর শুধু পানি ছিটালেই (তা পবিত্র হয়ে যায়)।"
1408 - عن أبي السمح قال: كنت أخدم النبي صلى الله عليه وسلم فكان إذا أراد أن يغتسل قال:"ولِّني قفاك"، فأوليه قفاي، فأستره به، فأُتي بِحَسن أو حُسين فبال على صدره، فجئت أغسله فقال:"يُغسل من بول الجارية، ويُرش من بول الغلام".
حسن: رواه أبو داود (376)، والنسائي (304) وابن ماجه (526، 613) كلهم عن مجاهد بن موسى، عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثني يحيى بن الوليد، حدثني مُحِلُّ بن خليفة، حدثني أبو السمح، فذكر الحديث.
واللفظ لأبي داود، وقد رواه عن عباس بن عبد العظيم العنبري مقرونًا بمجاهد بن موسى به. وإسناده حسن.
قال الحافظ ابن حجر في التلخيص الحبير (1/ 37 - 38):"قال البزار وأبو زرعة: ليس لأبي السمح غيره، ولا أعرف اسمه، وقال غيره: يقال اسمه إياد، وقال البخاري: حديث حسن".
قلت: وهو كما قال؛ فإن يحيي بن الوليد الطائي أبو الزعراء دون الثقة، قال فيه النسائي: ليس به بأس. وذكره ابن حبان في الثقات. وصححه أيضًا ابن خزيمة (283).
আবুস সামহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করতাম। যখন তিনি গোসল করতে ইচ্ছা করতেন, তখন বলতেন: "তোমার পিঠ আমার দিকে ফিরিয়ে দাও (যাতে তুমি আমাকে আড়াল করতে পারো)।" আমি আমার পিঠ তাঁর দিকে ফেরাতাম এবং এভাবে তাঁকে আড়াল করে রাখতাম। এরপর (একদিন) হাসান অথবা হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আনা হলো। সে তাঁর বুকের ওপর পেশাব করে দিল। আমি তা ধোয়ার জন্য আসলাম, তখন তিনি বললেন: "মেয়ের পেশাব ধৌত করতে হয়, আর ছেলের পেশাবের উপর পানি ছিটিয়ে দিলেই যথেষ্ট।"
1409 - عن علي بن أبي طالب قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في بول الغلام الرضيع:"ينضح من بول الغلام، ويغسل من بول الجارية".
صحيح: رواه أبو داود (378) واللفظ له، والترمذي (610) وابن ماجه (525) كلهم من طريق معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن أبي حرب بن أبي الأسود الدِّيلي، عن أبيه، عن عليّ رضي الله عنه.
إسناده صحيح، غير أنه اختلف في رفعه ووقفه، والصواب أنه مرفوع، قال الترمذي:"حسن صحيح، رفع هشام الدستوائي هذا الحديث عن قتادة، وأوقفه سعيد بن أبي عروبة عن قتادة ولم يرفعه".
وقال المنذري:"قال البخاري: سعيد بن أبي عروبة لا يرفعه، وهشام الدستوائي يرفعه، وهو حافظه. وصححه أيضًا ابن خزيمة (1/ 144) والحاكم (1/ 165، 166). وانظر للمزيد:"المنة الكبرى: (1/ 270).
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দুধ পানকারী ছেলের পেশাবের ব্যাপারে বলেছেন: "ছেলের পেশাবের ওপর পানি ছিটিয়ে দেবে, আর মেয়ের পেশাব ধৌত করবে।"
1410 - عن أنس بن مالك قال: جاء أعرابي فبال في طائفة المسجد، فزجره الناس، فنهاهم النبي صلى الله عليه وسلم، فلما قضى بوله أمر النبي صلى الله عليه وسلم بذَنوب من ماء، فأهريق عليه.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (221) ومسلم في الطهارة (284) كلاهما من طريق يحيي بن سعيد الأنصاري، أنه سمع أنس بن مالك، فذكر الحديث.
وفي رواية عند مسلم: بينما نحن في المسجد مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ جاء أعرابي، فقام يبول في المسجد، فقال أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم: مه مه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُزْرِموه، دَعُوه!" فتركوه حتى بال، ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم دعاه فقال له:"إن هذه المساجد لا تصلح لشيء من هذا البول ولا القذر، إنما هي لذكر الله عز وجل، والصلاة وقراءة القرآن" أو كما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فأمر رجلًا من القوم، فجاء بدَلْوٍ من ماءٍ، فشنّه عليه.
قوله (فشنه) - بالشين المعجمة - أي: فأراقه عليه من جميع جهاته، ورشّه عليه، وفي أكثر الروايات الصحيح مسلم:"فسنَّه عليه" بالسين المهملة، يقال: (سننتُ الماء على الثوب، وعلى الأرض ونحو ذلك) إذا صببتَه عليه.
وقوله:"في طائفة المسجد" أي: ناحية المسجد
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন এসে মসজিদের এক কোণে পেশাব করা শুরু করল। তখন লোকেরা তাকে ধমকাতে লাগল। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের নিষেধ করলেন। যখন সে তার পেশাব শেষ করল, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক বালতি (বা পাত্র ভরা) পানি আনতে নির্দেশ দিলেন এবং তা পেশাবের ওপর ঢেলে দেওয়া হলো।
মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় আছে: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে মসজিদে ছিলাম, এমন সময় এক বেদুঈন এসে মসজিদে দাঁড়িয়ে পেশাব করতে শুরু করল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীগণ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘আহ! আহ!’ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “তোমরা ওকে বাধা দিও না, ওকে ছেড়ে দাও।” অতঃপর লোকেরা তাকে ছেড়ে দিল, ফলে সে পেশাব করল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে ডাকলেন এবং বললেন, “নিশ্চয়ই এই মসজিদগুলো পেশাব কিংবা কোনো প্রকার নাপাকির জন্য উপযোগী নয়। এগুলো কেবল আল্লাহ তাআলার যিকির, সালাত এবং কুরআন তিলাওয়াতের জন্য।” অথবা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এ-রকমই কিছু বলেছিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তিনি লোকজনের মধ্য থেকে একজনকে নির্দেশ দিলেন। তখন সে এক বালতি পানি নিয়ে এলো এবং তা তার ওপর ছড়িয়ে (ঢেলে) দিল।
1411 - عن أبي هريرة قال: قام أعرابي فبال في المسجد، فتناوله الناس، فقال لهم النبي صلى الله عليه وسلم:"دعوه! وهَريقوا على بوله سَجْلا من ماء، أو ذَنوبا من ماء؛ فإنما بُعِثْتُم مُيَسِّرين، ولم تُبعَثُوا مُعَسِّرين".
صحيح: رواه البخاري في الوضوء (220) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: أخبرنا عبد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، أن أبا هريرة قال .. فذكره.
وفي رواية عنده (6128): فشار إليه الناس ليقعوا به، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث،
وفيه:"أهريقوا على بوله" بدلًا من"هريقواه، وزاد في كتاب الأدب (6010): قال أبو هريرة: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة وقمنا معه، فقال أعرابي وهو في الصلاة: اللهم ارحمني ومحمدًا ولا ترحم معنا أحدًا، فلما سلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم قال للأعرابي:"لقد حجَّرت واسعًا" يريد: رحمة الله.
هكذا رواه البخاري من طريق شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن أن أبا هريرة قال. ولم يذكر فيه بول الأعرابي.
ورواه أبو داود (380) والترمذي (147) والنسائي (1218) كلهم من طريق سفيان، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، وزادوا: فلم يلْبث أن بال في المسجد، فأسرع
الناس إليه، فنهاهم. فذكروا بقية الحديث.
ورواه ابن ماجه (529) قريبا منه من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، وفيه: دخل أعرابي المسجد، ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالس، فقال: اللهم اغفر لي ولمحمد، ولا تغفر لأحد معنا، فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"لقد احْتظرت واسعًا" ثم ولَّى حتى إذا كان في ناحية المسجد فَشَجَ ببول، فقال الأعرابي بعد أن فَقِه: فقام إليَّ بأبي وأمي! فلم يُؤنِّبْ ولم يَسُبَّ.
وفيه محمد بن عمرو بن علقمة صدوق.
وقوله"احتظرت": ضيّقت ما وسعه الله، وبمعنى (حجرت).
وقوله"هريقوا: قال الحافظ في"الفتح" (1/ 303):"كذا للأكثر، وللأصلي أهريقوا": بزيادة الهمزة، قال ابن التين: هو بإسكان الهاء، ونقل عن سيبويه أنه قال: (أهراق يُهريق إهرياقا) مثل (أسطاع يُسطيع إسطياعا) بقطع الألف وفتحها في الماضي وضم الياء في المستقبل، وهي لغة في أطاع يطيع، فجعلت السين والهاء عوضا من ذهاب حركة عين الفعل. وروي بفتح الهاء، واستشكله، ويوجه بأن الهاء مبدلة من الهمزة؛ لأن أصل (هراق) (أراق) ثم اجتلبت الهمزة، فتحريك الهاء على إبقاء البدل والمبدل منه، وله نظائر. وذكر الجوهري توجيهًا آخر، وأن أصله (أأريقوا)، فأبدلت الهمزة الثانية هاء للخفة. وجزم ثعلب في الفصيح بأن (أهريقه) بفتح الهاء" انتهى.
وقوله:"فَشَجَ" الفَشجُ هو تفريج بين الرجلين.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক বেদুঈন উঠে মসজিদে পেশাব করে দিল। তখন লোকেরা তাকে (ধমক দিতে) উদ্যত হলো। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও! এবং তার পেশাবের উপর এক বালতি অথবা এক মশক পানি ঢেলে দাও; কেননা তোমাদেরকে সহজকারী হিসেবে পাঠানো হয়েছে, কঠোরতাকারী হিসেবে পাঠানো হয়নি।"
1412 - عن عبد الله بن عمر قال: كانت الكلاب تبول. وتقبل وتدبر في المسجد في زمان رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم يكونوا يرشون شيئًا من ذلك.
صحيح: رواه البخاري (174) إلَّا أنَّه قال: قال أحمد بن شبيب، ثنا أبي، عن يونس، عن ابن شهاب، قال: حدثني حمزة بن عبد الله، عن أبيه .. فذكر الحديث.
وزاد أبو داود (382): كنت أبيت في المسجد في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكنت فتى شابًا عزِبًا، وكانت الكلاب تبول، وتُقبل وتدبر في المسجد، فلم يكونوا يرشون شيئًا من ذلك.
قال أهل العلم: يحمل هذا على ابتداء الإسلام، لما لم يكن للمساجد أبواب، ثم أمرنا بتكريم المساجد وتطهيرها وجعل الأبواب عليها.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে কুকুরগুলো মাসজিদে প্রস্রাব করত এবং আসা-যাওয়া করত, কিন্তু তারা এর কোনো কিছুর উপরই পানি ছিটিয়ে পবিত্র করতেন না।
(অন্য একটি বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে যে,) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মাসজিদে রাত্রি যাপন করতাম, আর আমি ছিলাম অবিবাহিত যুবক। কুকুরগুলো মাসজিদে প্রস্রাব করত এবং আসা-যাওয়া করত, কিন্তু সাহাবীগণ এর কোনো কিছুর উপরই পানি ছিটিয়ে পবিত্র করতেন না।
আহলে ইলম (ইসলামী জ্ঞান বিশারদগণ) বলেছেন: এই বিধানকে ইসলামের প্রথম দিকের বলে গণ্য করা হবে, যখন মাসজিদসমূহে দরজা ছিল না। এরপর আমাদেরকে মাসজিদসমূহকে সম্মান করতে, পবিত্র রাখতে এবং সেগুলোতে দরজা লাগানোর নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।
1413 - عن عائشة قالت: كنت أغسل الجنابة من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فيخرج إلى الصلاة، وإن بُقَعَ الماء في ثوبه.
وفي رواية: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يغسل المنيّ، ثم يخرج إلى الصلاة في ذلك
الثوب، وأنا أنظر إلى أثر الغسل فيه.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (229 - 232) ومسلم في الطهارة (289) كلاهما من طريق عمرو بن ميمون قال: سألت سليمان بن يسار عن المني يصيب ثوب الرجل أيغسله أم يغسل الثوب؟ فقال: أخبرتني عائشة، فذكرت الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাপড় থেকে অপবিত্রতা (জানাবাত) ধুয়ে দিতাম। অতঃপর তিনি সালাতের জন্য বের হতেন এবং তাঁর কাপড়ে পানির দাগ লেগে থাকত।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বীর্য ধুয়ে নিতেন, অতঃপর সেই কাপড় পরেই সালাতের জন্য বের হতেন এবং আমি তাতে ধোয়ার চিহ্ন দেখতে পেতাম।
1414 - عن عبد الله بن شهاب الخولاني قال: كنتُ نازلًا على عائشة، فاحتلمت في ثوَبيّ، فغمستُهما في الماء، فرأتْني جاريةٌ لعائشة فأخبرتْها، فبعثت إليّ عائشة فقالت: ما حملكَ على ما صنعت بثوبَيك؟ قال: فقلت: رأيت ما يرى النائم في منامه، قالت: هل رأيت فيهما شيئًا؟ قلتُ: لا، قالت: فلو رأيت شيئًا غسلته؛ لقد رأيتُني وإني لأحكُّه من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم يابسا بظُفُري.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (290) عن أحمد بن جوص الحنفي، حدّثنا أبو الأحوص، عن شبيب بن غرقدة، عن عبد الله بن شهاب الخولاني، أنَّه قال .. فذكر الحديث. وفي رواية عنده (288): أن رجلًا نزل بعائشة فأصبح يغسل ثوبه، فقالت عائشة: إنما كان يجزئك إن رأيته أن تغسل مكانه، فإن لم تر نضحت حوله، ولقد رأيتني أفركه من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم فركا، فيصلي فيه.
وفي سنن الترمذي (116) وابن ماجه (528) عن همام بن الحارث قال: ضاف عائشة ضيفٌ، فأمرت له بملحفة صفراء، فنام فيها، فاحتلم، فاستحيا أن يرسل بها، وبها أثر الاحتلام، فغمسها في الماء، ثم أرسل بها، فقالت عائشة: لم أفسد علينا ثوبنا؟ إنما كان يكفيه أن يفركه بأصابعه، وربما فركتُه من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم بأصابعي.
قال الترمذي: حسن صحيح.
لعل هذا الضيف هو عبد الله بن شهاب الخولاني.
وليس بين حديث الغسل وحديث الفرك تعارض؛ لأن الجمع بينهما واضح على القول بطهارة المني، بأن يحمل الغسل على الاستحباب للتنظيف لا على الوجوب؛ فإن المني بمنزلة البصاق والمخاط، كما قال ابن عباس.
وبه قال الشافعي وأحمد وأصحاب الحديث.
قال البيهقي:"وقد يغسل المني تنظيفًا كما يغسل المخاط وغيره من الثوب تنظيفًا لا تنجيسًا"."السنن الكبرى" (2/ 419).
ومن ذهب إلى نجاسته حمل الغسل على ما كان رطبا، والفرك على ما كان يابسا، وهو مذهب الحنفية. انظر للمزيد: فتح الباري (1/ 333).
আব্দুল্লাহ ইবনে শিহাব আল-খাওলানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে অবস্থান করছিলাম। তখন আমার দুটি কাপড়ে স্বপ্নদোষ হলো। আমি সে দুটিকে পানিতে ডুবিয়ে দিলাম। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একজন দাসী আমাকে দেখতে পেল এবং তাকে এ বিষয়ে জানাল। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: তোমার দুটি কাপড়ের সাথে এমনটি করার কারণ কী? আমি বললাম: ঘুমের মধ্যে একজন যা দেখে, আমিও তাই দেখেছি। তিনি বললেন: তুমি কি সে দুটিতে (কাপড়ে) কোনো কিছু দেখতে পেয়েছিলে? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: যদি কিছু দেখতে পেতে, তবে তুমি তা ধুয়ে ফেলতে। আমি তো দেখেছি যে আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাপড় থেকে শুকনো বীর্য আমার নখ দ্বারা ঘষে উঠিয়ে ফেলতাম।
1415 - عن امرأة من بني عبد الأشهل رضي الله عنها قالت: قلت: يا رسول الله! إن لنا طريقا إلى المسجد مُنْتِنَةٌ، فكيف نفعل إذا مُطِرنا؟ قال:"أليس بعدها طريق هي أطيب منها؟"، قالت: قلت: بلى، قال:"فهذه بهذه".
صحيح: رواه أبو داود (384) وابن ماجه (533) كلاهما من طريق عبد الله بن عيسى، عن موسى بن عبد الله بن يزيد، عن امرأة من بني عبد الأشهل، ذكر الحديث.
إسناده صحيح، ولا تضر جهالة (امرأة من بني عبد الأشهل)؛ فإنها صحابية. وقد صححه المنذري وعبد الحق الإشبيلي وغيرهما.
বনী আব্দুল আশহাল গোত্রের জনৈক মহিলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের মসজিদের দিকে যাওয়ার একটি রাস্তা রয়েছে যা দুর্গন্ধযুক্ত। বৃষ্টি হলে আমরা কী করব? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এরপরে কি এর থেকে অধিক উত্তম/পরিষ্কার কোনো রাস্তা নেই?" তিনি বললেন: আমি বললাম: অবশ্যই আছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে এটি এর (অসুবিধার) প্রতিদান হিসেবে যথেষ্ট হবে।"
1416 - عن ابن مسعود قال: كنا لا نتوضأ من موطئٍ، ولا نكف شعرًا ولا ثوبًا.
حسن: رواه أبو داود (204) واللفظ له، ورواه أيها ابن ماجه (1041) ولفظه:"أُمرنا ألّا نكف شعرًا ولا ثوبًا، ولا نتوضأ من موْطأٍ"، كلاهما من حديث عبد الله بن إدريس، وقرنه أبو داود بشريك وجرير، كلهم عن الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن عبد الله بن مسعود، فذكر الحديث.
وأخرجه الحاكم (1/ 171) من طريق عبد الله بن إدريس وأبي بكر بن أبي شيبة - كلاهما عن شريك وجرير به مثله، وقال: صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجا ذكر الموطئ، وأخرج أيضًا (1/ 139) من طريق سفيان، عن الأعمش به ولفظه:"كنا نصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم فلا نتوضأ من موطئ"، وقال: تابعه أبو معاوية وعبد الله بن إدريس، عن الأعمش به وقال:" صحيح على شرط الشيخين".
قلت: إسناده حسن إن كان الحسن سمعه من شقيق، وإلَّا فقد قال ابن خزيمة:"هذا الخبر له
علَّة: لم يسمعه الأعمش عن شقيق، لم أكن فهمته في الوقت. ثمَّ روى من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، قال: حدَّثني شقيق أو حُدِّثت عنه، عن عبد الله". انتهى.
قلت: إن كان أبو معاوية أبدى الشكَّ في اتصال الإسناد فلم يشك عبد الله بن إدريس، وشريك، وجرير، كلُّهم رووه عن الأعمش بدون شكٍّ، إلَّا أنَّ الأعمش مدلَّسٌ، وقد عنعن في جميع هذه الأسانيد، لكنَّه في المرتبة الثانية عند الحافظ ابن حجر، واحتمل الأئمَّة تدليسه.
وذكره الترمذي (1/ 267) معلقا قائلا: وفي الباب عن عبد الله بن مسعود قال:"كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم نتوضأ من المَوْطَأ". وهذا لفظ سفيان بن عيينة كما رواه الحاكم.
وقول الصحابي:"أُمرناه في حكم المرفوع؛ لأن الآمر لهم هو النبي صلى الله عليه وسلم.
قال الخطابي في شرح الحديث:"الموطئ: ما يوطأ من الأذى في الطرق، وأصله (الموطوء) بالواو، وإنما أراد بذلك أنهم كانوا لا يعيدون الوضوء للأذى إذا أصاب أرجلهم، لا أنهم كانوا لا يغسلون أرجلهم ولا ينظفونها من الأذي إذا أصابها".
وأما الترمذي ففهم من الحديث:"إذا وطئ الرجل على المكان القذر أنه لا يجب عليه غسل القدم، إلا أن يكون رطبا، فيغسل ما أصابه"، ونقل ذلك عن غير واحد من أهل العلم.
وقوله (لا نكُفّ شعرًا ولا ثوبًا) أي: لا نقيها من التراب إذا صلينا صيانة لها عن التتريب، ولكن نرسلها فتقع على الأرض إذا سجدنا مع الأعضاء.
আব্দুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা (নোংরা) স্থানে পা রাখার কারণে (পুনরায়) ওযু করতাম না, আর (সালাতের সময়) চুল ও কাপড় গুটিয়ে রাখতাম না।
1417 - عن أبي سعيد الخدري قال: بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي بأصحابه، إذ خلع نعليه فوضعهما عن يساره، فلما رأى ذلك القومُ، ألْقَوا نِعالَهم، فلما قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاته قال: ما حملكم على إلقائكم نِعالَكم؟". .
قالو: رأيناك ألقيتَ نعليك فألقينا نِعالنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن جبريل عليه السلام أتاني، فأخبرني أن فيهما قذرًا - أو قال: أذًى"، وقال:"إذا جاء أحدكم إلى المسجد فلينظر، فإن رأى في نعليه قذًرا، أو أذّى فليمسحه وليصل فيهما".
صحيح: رواه أبو داود (650) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن أبي نعامة السعدي، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وإسناده صحيح، وحماد هو ابن زيد كما وقع في بعض النسخ، وفي نسخة أخرى إنه حماد بن سلمة، وكذلك قال البيهقي في"معرفة السنن" (2/ 431) بعد أن رواه عن أبي داود، وأخرجه أيضًا ابن خزيمة (1017) في صحيحه، والحاكم (1/ 160) وقال:"صحيح على شرط مسلم".
وقال النووي في المجموعه (2/ 179):"إسناده صحيحه وما قيل فيه بأنه مرسل فقد رجع أبو حاتم الموصول"العلل" (1/ 121).
وأما ما رُوي عن أبي هريرة:"إذا وَطِئ أحدكم بنعله الأذى، فإن التراب له طهور" فإنه ضعيف رواه أبو داود (385) وفيه شيخ الأوزاعي مجهول، وفي رواية أن شيخه ابن عجلان، ولكن الراوي عنه محمد بن كثير الصنعاني سيئ الحفظ.
ورُوي عن عائشة بمعناه وفيه القعقاع بن حكيم لم يسمع من عائشة، كل هذه الروايات عند أبي داود.
قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 278): ورواه أيضًا الحاكم من حديث أنس وابن مسعود، ورواه الدارقطني من حديث ابن عباس، وعبد الله بن الشخير، وإسناد كل منهما ضعيف، ورواه البزار من حديث أبي هريرة وإسناده ضعيف ومعلول أيضًا.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের নিয়ে সালাত আদায় করছিলেন, তখন তিনি তাঁর জুতোজোড়া খুলে তাঁর বাম পাশে রাখলেন। যখন লোকেরা তা দেখল, তখন তারাও তাদের জুতো ফেলে দিল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের জুতো ফেলে দিলে কেন?"
তারা বলল: আমরা দেখলাম আপনি আপনার জুতো ফেলে দিয়েছেন, তাই আমরাও আমাদের জুতো ফেলে দিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই জিবরীল (আঃ) আমার কাছে এসেছিলেন এবং আমাকে জানিয়েছিলেন যে সেগুলোতে ময়লা—অথবা তিনি বলেছেন: কষ্টদায়ক বস্তু—ছিল।" তিনি আরও বললেন: "যখন তোমাদের কেউ মসজিদে আসে, তখন সে যেন ভালোভাবে দেখে নেয়। যদি সে তার জুতোতে কোনো ময়লা বা কষ্টদায়ক বস্তু দেখতে পায়, তবে সে যেন তা মুছে ফেলে এবং জুতো পরেই সালাত আদায় করে।"
1418 - عن أبي هريرة قال: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم حامل الحسن بن علي على عاتقه، ولعابه يسيل عليه.
صحيح: رواه ابن ماجه (658) قال: حدثنا علي بن محمد، ثنا وكيع، عن حماد بن سلمة،
عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قال البوصيري في زوائده: إسناده صحيح، ورجاله رجال الصحيحين.
قلت: ليس كما قال؛ فإن حماد بن سلمة من رجال مسلم، ومحمد بن زياد - وهو الجُمَحي مولاهم - من رجال السنن، إلا أنه ثقة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি হাসান ইবনু ‘আলীকে তাঁর কাঁধের উপর বহন করে আছেন এবং তাঁর (হাসানের) লালা তাঁর (নবীর) গায়ে ঝরছে।
1419 - عن عبد الله بن عمر أن رجلًا مرَّ، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يبول، فسلَّم، فلم يرد عليه.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (370) من طريق سفيان، عن الضحاك بن عثمان، عن نافع، عن ابن عمر فذكره، وهو حديث مختصر وسيأتي في التيمم أنه تيمم ورد عليه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন পেশাব করছিলেন তখন পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। সে সালাম দিল, কিন্তু তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উত্তর দিলেন না।
1420 - عن جابر بن عبد الله أن رجلًا مرّ على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يبول، فسلم عليه، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا رأيتني على مثل هذه الحالة فلا تُسلِّم عليّ؛ فإنك إن فعلت ذلك لم أردّ عليك".
حسن: رواه ابن ماجه (352) قال: حدثنا سويد بن سعيد، ثنا عيسى بن يونس، عن هاشم بن البريد، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن، ورجاله ثقات، غير شيخ ابن ماجه، وهو صدوق وإن كان إبن معين أفحش القول فيه؛ فإنه لم ينفرد به.
ولذا قال البوصيري:"هذا إسناد حسن؛ لأنَّ سويدًا لم يتفرد به، فله متابع عن عيسى بن يونس في سند أبي يعلى وغيره".
قلت: ومن طريق عيسى بن يونس رواه أيضًا ابن عدي في الكامل (7/ 2574).
وإنما الذي تفرد به هو هاشم بن البريد، كما قال أبو حاتم." العلل" (1/ 34)، إلا أنه ثقة مع غلوه في التشيع كما قال الجوزجاني:"كان غاليًا في سوء مذهبه" وقال ابن عدي في"الكامل" (7/ 2574):"هاشم بن البريد ليس له كثير حديث، وإنما يذكر الغلو في التشيع. وكذلك ابنه علي. وأما هاشم فمقدار ما يرويه لم أر في حديثه شيئًا منكرًا. والمناكير تقع في حديث ابنه علي بن هاشم".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল, যখন তিনি প্রস্রাব করছিলেন। তখন সে তাঁকে সালাম দিলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “যখন তুমি আমাকে এই ধরনের অবস্থায় দেখবে, তখন আমাকে সালাম দেবে না; কারণ তুমি যদি এমনটি করো, তবে আমি তোমার সালামের উত্তর দেব না।”