আল-জামি` আল-কামিল
13848 - عن النعمان بن بشير، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل المؤمنين في توادهم، وتراحمهم، وتعاطفهم مثل الجسد إذا اشتكى منه عضو تداعى له سائر الجسد بالسهر والحمى".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6011)، ومسلم في البر والصلة (2586) كلاهما من طرق عن الشعبي، عن النعمان بن بشير، قال: فذكره.
নু'মান ইবনে বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মুমিনদের একে অপরের প্রতি ভালোবাসা, দয়া এবং সহানুভূতির দৃষ্টান্ত হলো একটি দেহের মতো; যখন এর কোনো একটি অঙ্গ অসুস্থ হয়, তখন তার জন্য দেহের অন্যান্য অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ অনিদ্রা ও জ্বরের মাধ্যমে সাড়া দেয়।
13849 - عن عمرو بن العاص، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم جهارا غير سر، يقول:"ألا إن آل أبي قال عمرو: في كتاب محمد بن جعفر بياض -، ليسوا بأوليائي، إنّما وليي اللهُ، وصالح المؤمنين".
وفي رواية البخاريّ:"ولكن لهم رحم أبلُّها بصلتها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (5990) عن عمرو بن عباس، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس، عن عمرو بن العاص، قال: فذكره.
وقال البخاريّ عقبه: زاد عنبسة بن عبد الواحد، عن بيان، عن قيس، عن عمرو بن العاص قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الزيادة.
وأخرجه مسلم في الإيمان (215) عن أحمد بن حنبل قال: حَدَّثَنَا محمد بن جعفر به مختصرًا.
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি প্রকাশ্যে, গোপনে নয়—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “সাবধান! আবূ'র পরিবারবর্গ (আমর বলেন, মুহাম্মাদ ইবন জাফর-এর কিতাবে এখানে শূন্যস্থান রয়েছে) আমার বন্ধু নয়। আমার বন্ধু তো কেবল আল্লাহ এবং নেককার মুমিনগণ।”
আর বুখারীর এক বর্ণনায় আছে: “তবে তাদের সাথে আমার আত্মীয়তার সম্পর্ক রয়েছে, যা আমি আত্মীয়তা রক্ষার মাধ্যমে রক্ষা করি।”
13850 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الله لا ينظر إلى صوركم وأموالكم، ولكن ينظر إلى قلوبكم وأعمالكم".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2564: 34) عن عمرو الناقد، حَدَّثَنَا كثير بن هشام، حَدَّثَنَا جعفر بن برقان، عن يزيد بن الأصم، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের আকৃতি (চেহারা) ও ধন-সম্পদের দিকে তাকান না, বরং তিনি তোমাদের অন্তর এবং আমলের দিকে তাকান।"
13851 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حق المسلم على المسلم خمس: رد السّلام، وعيادة المريض، واتباع الجنائز، وإجابة الدعوة، وتشميت العاطس".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1240)، ومسلم في السّلام (2162: 4) كلاهما من طرق عن ابن شهاب، أخبرني سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক মুসলমানের উপর অপর মুসলমানের পাঁচটি হক (অধিকার) রয়েছে: সালামের জবাব দেওয়া, রুগী দেখতে যাওয়া, জানাযার অনুসরণ করা, দাওয়াত কবুল করা এবং হাঁচি দাতার তশমিত করা।"
13852 - عن أبي هريرة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"حق المسلم على المسلم ست" قيل: ما هن يا رسول الله؟ ، قال:"إذا لقيته فسلم عليه، وإذا دعاك فأجبه، وإذا استنصحك فانصح له، وإذا عطس فحمد الله فشمته، وإذا مرض فعُدْه، وإذا مات فاتبعْه".
صحيح: رواه مسلم في السّلام (2162: 5) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক মুসলমানের উপর অপর মুসলমানের অধিকার ছয়টি।" জিজ্ঞাসা করা হলো: "হে আল্লাহর রাসূল! সেগুলো কী?" তিনি বললেন: "যখন তুমি তার সাথে দেখা করবে, তখন তাকে সালাম দেবে; যখন সে তোমাকে দাওয়াত দেবে, তখন তুমি তা গ্রহণ করবে; যখন সে তোমার কাছে সদুপদেশ চাইবে, তখন তাকে উপদেশ দেবে; যখন সে হাঁচি দেবে এবং আলহামদুলিল্লাহ বলবে, তখন তুমি তার জবাবে (ইয়ারহামুকাল্লাহ বলে) দুআ করবে; যখন সে অসুস্থ হবে, তখন তাকে দেখতে যাবে; আর যখন সে মারা যাবে, তখন তার জানাযার অনুগমন করবে।"
13853 - عن عبد الله بن عمر: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"المسلم أخو المسلم، لا يظلمه ولا يسلمه، من كان في حاجة أخيه كان الله في حاجته، ومن فرج عن مسلم كربة، فرج الله عنه بها كربة من كرب يوم القيامة، ومن ستر مسلما ستره الله يوم القيامة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المظالم (2442)، ومسلم في البر والصلة (2580: 58) كلاهما من طرق عن اللّيث، عن عقيل، عن الزّهري، عن سالم، عن أبيه قال: فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "মুসলিম মুসলিমের ভাই। সে তাকে যুলুম করবে না এবং তাকে (শত্রুর হাতে) সোপর্দও করবে না। যে ব্যক্তি তার ভাইয়ের প্রয়োজন পূরণে সচেষ্ট হবে, আল্লাহ তার প্রয়োজন পূরণে থাকবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের একটি কষ্ট দূর করবে, আল্লাহ এর বিনিময়ে কিয়ামতের দিনের বিপদসমূহের মধ্য থেকে একটি বিপদ তার থেকে দূর করে দেবেন। আর যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের দোষ গোপন করবে, আল্লাহ কিয়ামতের দিন তার দোষ গোপন করবেন।"
13854 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تحاسدوا، ولا تناجشوا، ولا تباغضوا، ولا تدابروا، ولا يبع بعضكم على بيع بعض، وكونوا عباد الله إخوانا، المسلم أخو المسلم، لا يظلمه ولا يخذله، ولا يحقره، التقوى هاهنا" ويشير إلى صدره ثلاث مرات"بحسب امرئ من الشر أن يحقر أخاه المسلم، كل المسلم على المسلم حرام، دمه، وماله، وعرضه".
وزاد في رواية:"إنَّ الله لا ينظر إلى أجسادكم، ولا إلى صوركم، ولكن ينظر إلى قلوبكم" وأشار بأصابعه إلى صدره.
متفق عليه: رواه مسلم في البر والصلة (2564: 32) عن عبد الله بن مسلمة بن قعنب، حَدَّثَنَا داود يعني ابن قيس، عن أبي سعيد، مولى عامر بن كريز، عن أبي هريرة، قال: فذكره.
ورواه (2564: 33) عن أبي الطاهر أحمد بن عمرو بن سرح، حَدَّثَنَا ابن وهب، عن أسامة وهو ابن زيد، أنه سمع أبا سعيد، مولى عبد الله بن عامر بن كريز يقول: سمعت أبا هريرة، يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكر نحو حديث داود، وزاد، ونقص ومما زاد فيه الزيادة المذكورة.
ورواه البخاريّ في الأدب (6066) من حديث مالك، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة نحوه، وزاد في أول الحديث:"إياكم والظن، فإن الظن أكذب الحديث".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা একে অপরের প্রতি হিংসা করো না, একে অপরকে ধোঁকা দিয়ে দাম বাড়িয়ে দিও না (নাজাশ করো না), একে অপরের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করো না, আর তোমরা একে অপরের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়ো না। আর তোমাদের কেউ যেন অন্যের বেচাকেনার উপর বেচাকেনা না করে। তোমরা আল্লাহর বান্দা, ভাই ভাই হয়ে যাও। মুসলিম মুসলিমের ভাই। সে তাকে অত্যাচার করে না, তাকে অপমানিত করে না, এবং তাকে হেয় জ্ঞান করে না। 'তাকওয়া (আল্লাহভীতি) হলো এখানে'—এই বলে তিনি নিজের বুকের দিকে তিনবার ইশারা করলেন। কোনো মানুষের খারাপ হওয়ার জন্য এটাই যথেষ্ট যে সে তার মুসলিম ভাইকে হেয় প্রতিপন্ন করে। এক মুসলিমের উপর অন্য মুসলিমের সবকিছু হারাম—তার রক্ত, তার সম্পদ এবং তার মান-সম্মান (ইজ্জত)।
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত বলা হয়েছে: নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের শরীর বা তোমাদের চেহারার দিকে তাকান না, বরং তিনি তোমাদের অন্তরের দিকে তাকান। এই বলে তিনি তার আঙুলগুলো দ্বারা নিজের বুকের দিকে ইশারা করলেন।
13855 - عن شيخ من بني سليط أخبره قال: أتيت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أكلمه في سبي أصيب لنا في الجاهليّة، فإذا هو قاعد، وعليه حلقة قد أطافت به وهو يحدث القوم، عليه إزار قطر له غليظ، قال سمعته يقول - وهو يشير بإصبعه -:"المسلم أخو المسلم لا يظلمه، ولا يخذله، التقوى هاهنا، التقوى هاهنا" يقول أي في القلب.
حسن: رواه أحمد (16624) عن أبي النضر قال: حَدَّثَنَا المبارك، قال: حَدَّثَنَا الحسن أن شيخا من بني سليط أخبره، فذكره.
وإسناده حسن من أجل المبارك وهو ابن فضالة، فإنه حسن الحديث إذا صرّح بالتحديث، وقد صرّح به، وقد تابعه عباد بن راشد عن الحسن به، عند أحمد (16644، 20278).
قال الهيثميّ في"المجمع" (8/ 184):"رواه أحمد بأسانيد، وإسناده حسن، ورواه أبو يعلى بنحوه".
বনু সুলাইট গোত্রের জনৈক শায়খ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলাম, যেন জাহিলিয়্যাতের যুগে আমাদের থেকে ছিনিয়ে নেওয়া কিছু বন্দীর বিষয়ে তাঁর সাথে কথা বলতে পারি। আমি তাঁকে উপবিষ্ট অবস্থায় দেখতে পেলাম, এবং একদল লোক তাঁকে ঘিরে বসে আছে। তিনি তাদের উদ্দেশ্যে কথা বলছিলেন। তাঁর পরিধানে ছিল মোটা কাপড়ের একটি ইযার (লুঙ্গি)। রাবী বলেন, আমি তাঁকে বলতে শুনলাম—আর তিনি তাঁর আঙ্গুল দিয়ে ইশারা করছিলেন—: "এক মুসলিম অন্য মুসলিমের ভাই; সে তাকে যুলুম করে না এবং তাকে অসহায় অবস্থায় ত্যাগ করে না। তাকওয়া (আল্লাহভীতি) এইখানে, তাকওয়া এইখানে।"—তিনি (ইশারা করে) বুঝাচ্ছিলেন যে তা অন্তরে।
13856 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"المؤمن مِرآة المؤمن، والمؤمن أخو المؤمن، يكف عليه ضيعته، ويحوطه من ورائه".
حسن: رواه أبو داود (4918)، والبخاري في الأدب المفرد (239)، والبزّار (8109) كلّهم من طرق عن كثير بن زيد، عن الوليد بن رباح، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل كثير بن زيد وهو الأسلمي فإنه حسن الحديث.
ورواه الترمذيّ (1929) من وجه آخر عن يحيى بن عبيد الله، عن أبيه، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن أحدكم مرآة أخيه، فإن رأى به أذى فليمطه عنه".
وقال الترمذيّ:"يحيى بن عبيد الله ضعّفه شعبة".
قلت: وهو كما قال، فقد ضعفه جمهور أهل العلم، وقال ابن حبَّان:"يُروي عن أبيه ما لا أصل له".
ولكن قال ابن عدي:"في بعض ما يرويه ما لا يتابع عليه". يعني أنه قد يتابع في بعض ما
يرويه وهذا منه، ويقوّيه ما قبله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুমিন (অপর) মুমিনের দর্পণ (আয়না)। আর মুমিন মুমিনের ভাই। সে তার ভাইয়ের ক্ষতি প্রতিহত করে এবং তার অনুপস্থিতিতে তাকে সুরক্ষা দেয়।"
13857 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: المؤمن مرآة المؤمن.
حسن: رواه البزّار (6193)، والطَّبرانيّ في الأوسط (2114) - ومن طريقه الضياء في المختارة (2185) -، وأبو الشّيخ في الأمثال (43)، وابن عدي في الكامل (7/ 467) من طرق عن محمد بن عمار بن سعد المؤذن المدني، عن شريك بن عبد الله بن أبي نمر، عن أنس بن مالك، فذكره.
وقال البزّار:"وهذا الحديث لا نعلمه رواه عن شريك إِلَّا محمد بن عمار، ولا نعلم يروى عن أنس إِلَّا من هذا الوجه".
قلت: هذا إسناد حسن من أجل محمد بن عمار بن سعد المؤذن وشريك بن عبد الله بن أبي نمر، فإنهما حسنا الحديث.
وأمّا قول الذّهبيّ في الميزان (3/ 662) من مناكير محمد بن عمار، فالمقصود منه تفرده كما قال البزّار.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মু'মিন হলো মু'মিনের আয়না।
13858 - عن جرير بن عبد الله قال:"بايعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم على إقام الصّلاة، وإيتاء الزّكاة، والنصحِ لكلّ مسلم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1401)، ومسلم في الإيمان (56) كلاهما من حديث إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس، عن جرير، فذكره.
জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সালাত প্রতিষ্ঠা করা, যাকাত প্রদান করা এবং প্রত্যেক মুসলমানের জন্য কল্যাণ কামনা করার ওপর বাইয়াত (শপথ) গ্রহণ করেছিলাম।
13859 - عن عاصم الأحول، قال: قلت لأنس بن مالك: أبلغك أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال"لا حلف في الإسلام" فقال: قد حالف النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بين قريش والأنصار في داري.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6083) عن محمد بن الصباح، حَدَّثَنَا إسماعيل بن زكرياء، حَدَّثَنَا عاصم، فذكره.
ورواه مسلم في فضائل الصّحابة (2529: 204) عن محمد بن الصباح، حَدَّثَنَا حفص بن غياث، عن عاصم الأحول، فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাবী) 'আসিম আল-আহওয়াল বলেন, আমি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: আপনার কাছে কি এই মর্মে (কথা) পৌঁছেছে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ইসলামে কোনো মৈত্রী-চুক্তি (হিলফ) নেই”? তিনি (আনাস) বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার ঘরে কুরাইশ ও আনসারের মাঝে মৈত্রী স্থাপন করেছিলেন।
13860 - عن أنس بن مالك قال: قدم علينا عبد الرحمن بن عوف فآخى رسول الله صلى الله عليه وسلم بينه وبين سعد بن الربيع.
صحيح: رواه البخاريّ في الكفالة (2293) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا إسماعيل بن جعفر، عن حميد، عن أنس، فذكره.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আব্দুর রহমান ইবনে আউফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের কাছে এলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর এবং সা’দ ইবনে রাবী’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করে দিলেন।
13861 - عن جبير بن مطعم، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا حلف في الإسلام، وأيما حلف كان في الجاهليّة لم يزده الإسلام إِلَّا شدة".
صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2530) من حديث زكريا، عن سعد بن إبراهيم، عن أبيه، عن جبير بن مطعم، فذكره.
জুবাইর ইবনু মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে কোনো (নতুন) আনুগত্যের শপথ নেই। তবে জাহিলিয়্যাতের যুগে যে আনুগত্যের শপথ হয়েছিল, ইসলাম তাকে কেবল দৃঢ়তাই দিয়েছে।"
13862 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده قال: لما فتح على رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة قال: فذكر الخطبة بطولها وجاء فيها:"وأوفوا بحلف الجاهليّة فإن الإسلام لم يزده إِلَّا شدة، ولا تحدثوا حلفا في الإسلام".
حسن: رواه أحمد (6933)، والتِّرمذيّ (1585) كلاهما من حديث يزيد، أخبرنا حسين المعلم عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب فإنه حسن الحديث.
وقال الترمذيّ:"حسن صحيح".
وفي معناه ما روي أيضًا عن قيس بن عاصم أنه سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الحلف فقال:"ما كان من حلف في الجاهليّة فتمسكوا به، ولا حلف في الإسلام".
رواه أحمد (20613، 20614)، والطَّبرانيّ (18/ 337)، والبزّار - كشف الأستار (1915)، وصحّحه ابن حبَّان (4396) كلّهم من حديث مغيرة، عن أبيه، عن شعبة بن التوأم، عن قيس بن عاصم، فذكره.
وأبو المغيرة هو مقسم الضبي لم يرو عنه غير ابنه المغيرة، كذا ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل، وابن حبَّان في ثقاته فهو في عداد المجهولين.
وكذلك في الإسناد شعبة بن التوأم روى عنه مقسم الضبي والهيثم بن زيد وغيرهما، ولم يوثقه غير ابن حبَّان، قال البخاريّ: قال شعبة بن التوأم: أتينا ابن مسعود في زمن عمر، كذا في التعجيل.
وأمّا قول ابن حجر في الإتحاف (14/ 730) بعد عزوه إلى ابن حبَّان:"صورته مرسل" فهو كما قال فإنه قال فيه:"عن شعبة بن التوأم، أن قيس بن عاصم سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فكأن شعبة لم يسمع من قيس.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মক্কায় বিজয় অর্জিত হলো, তখন তিনি দীর্ঘ এক খুতবা দিলেন। আর তার মধ্যে ছিল: তোমরা জাহেলী যুগের মিত্রতার বন্ধন রক্ষা করো, কেননা ইসলাম তাকে কেবল মজবুতই করেছে; আর ইসলামে নতুন কোনো মিত্রতার বন্ধন (চুক্তি) স্থাপন করো না।
13863 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا حلف في الإسلام، وكل حلف كان في الجاهليّة فلم يزده الإسلام إِلَّا شدة، وما يسرني أن لي حمر النعم، وأني نقضت الحلف الذي كان في دار الندوة".
حسن: رواه ابن جرير انطبري في تفسيره (6/ 683) عن أبي كريب قال: ثنا مصعب بن المقدام، عن إسرائيل بن يونس، عن محمد بن عبد الرحمن، مولى آل طلحة، عن عكرمة، عن ابن
عباس، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل مصعب بن المقدام فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
ورواه أحمد (2909)، وأبو يعلى (2336)، وعنه ابن حبَّان (4370)، والطَّبرانيّ (11/ 281، 282)، والطبري في تفسيره (6/ 683) كلّهم من طريق شريك، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
قال الهيثميّ في"المجمع":"رواه أبو يعلى وأحمد ورجالهما رجال الصَّحيح".
قلت: وهو كما قال، ولكن فيه شريك وهو ابن عبد الله النخعي القاضي الكوفي أبو عبد الله سيء الحفظ.
وسماك هو ابن حرب بن أوس صدوق، ولكن روايته عن عكرمة خاصة مضطربة، وقد تغير بآخره، فكان ربما يتلقن، ولكن في غير عكرمة لا بأس به وقد توبع في الإسناد الأوّل.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে (নতুন করে) কোনো মৈত্রীচুক্তি (বা অঙ্গীকার) নেই। আর জাহিলিয়্যাতের যুগে যত মৈত্রীচুক্তি ছিল, ইসলাম সেগুলোকে কেবল (ঐ অঙ্গীকারের) দৃঢ়তাই বৃদ্ধি করেছে। আর এটা আমাকে আনন্দিত করত না যে আমার জন্য (সর্বোৎকৃষ্ট সম্পদ) লাল উট থাকুক, আর আমি দারুন-নাদওয়ায় যে চুক্তি হয়েছিল, তা ভঙ্গ করি।"
13864 - عن عبد الله بن عمرو، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"المسلم من سلم المسلمون من لسانه ويده، والمهاجر من هجر ما نهى الله عنه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6484) عن أبي نعيم، حَدَّثَنَا زكريا، عن عامر (هو الشعبي) قال: سمعت عبد الله بن عمرو يقول: فذكره.
ورواه مسلم في الإيمان (40: 64) من طريق ابن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، أنه سمع عبد الله بن عمرو بن العاص، يقول: إن رجلًا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم أي المسلمين خير؟ قال:"من سلم المسلمون من لسانه ويده".
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “প্রকৃত মুসলিম সে, যার জিহ্বা ও হাত থেকে অন্য মুসলিমরা নিরাপদ থাকে। আর মুহাজির (দেশত্যাগী) সে, যে জিনিসগুলো থেকে আল্লাহ নিষেধ করেছেন তা বর্জন করে।”
13865 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يشير أحدكم إلى أخيه بالسلاح، فإنه لا يدري أحدكم لعل الشّيطان ينزع في يده فيقع في حفرة من النّار".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7072)، ومسلم في البر والصلة (2617) من طرق عن عبد الرزّاق، أخبرنا معمر، عن همام بن منبه قال: سمعت أبا هريرة يقول: فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: তোমাদের কেউ যেন তার ভাইয়ের দিকে অস্ত্র দিয়ে ইশারা না করে। কারণ তোমাদের কেউ জানে না, হয়তো শয়তান তার হাতে টান দেবে (বা তার হাত ফসকে দেবে), ফলে সে জাহান্নামের গর্তে পতিত হবে।
13866 - عن أبي هريرة قال: قال أبو القاسم صلى الله عليه وسلم:"من أشار إلى أخيه بحديدة، فإن الملائكة تلعنه حتَّى يدعه، وإن كان أخاه لأبيه وأمه".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2616) من طرق عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার ভাইয়ের দিকে কোনো ধারালো অস্ত্র দিয়ে ইশারা করে, তবে ফিরিশতাগণ তাকে অভিসম্পাত করতে থাকে যতক্ষণ না সে তা পরিত্যাগ করে, যদিও সে তার আপন (পিতা-মাতা উভয়ের দিক থেকে) ভাই হয়।"
13867 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من حمل علينا السلاح فليس منا، ومن
غشّنا فليس منا".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (101) من طرق عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে আমাদের বিরুদ্ধে অস্ত্র ধারণ করে, সে আমাদের দলভুক্ত নয়, আর যে আমাদের সাথে প্রতারণা করে (বা ভেজাল মেশায়), সেও আমাদের দলভুক্ত নয়।"