আল-জামি` আল-কামিল
1408 - عن أبي السمح قال: كنت أخدم النبي صلى الله عليه وسلم فكان إذا أراد أن يغتسل قال:"ولِّني قفاك"، فأوليه قفاي، فأستره به، فأُتي بِحَسن أو حُسين فبال على صدره، فجئت أغسله فقال:"يُغسل من بول الجارية، ويُرش من بول الغلام".
حسن: رواه أبو داود (376)، والنسائي (304) وابن ماجه (526، 613) كلهم عن مجاهد بن موسى، عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثني يحيى بن الوليد، حدثني مُحِلُّ بن خليفة، حدثني أبو السمح، فذكر الحديث.
واللفظ لأبي داود، وقد رواه عن عباس بن عبد العظيم العنبري مقرونًا بمجاهد بن موسى به. وإسناده حسن.
قال الحافظ ابن حجر في التلخيص الحبير (1/ 37 - 38):"قال البزار وأبو زرعة: ليس لأبي السمح غيره، ولا أعرف اسمه، وقال غيره: يقال اسمه إياد، وقال البخاري: حديث حسن".
قلت: وهو كما قال؛ فإن يحيي بن الوليد الطائي أبو الزعراء دون الثقة، قال فيه النسائي: ليس به بأس. وذكره ابن حبان في الثقات. وصححه أيضًا ابن خزيمة (283).
আবুস সামহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করতাম। যখন তিনি গোসল করতে ইচ্ছা করতেন, তখন বলতেন: "তোমার পিঠ আমার দিকে ফিরিয়ে দাও (যাতে তুমি আমাকে আড়াল করতে পারো)।" আমি আমার পিঠ তাঁর দিকে ফেরাতাম এবং এভাবে তাঁকে আড়াল করে রাখতাম। এরপর (একদিন) হাসান অথবা হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আনা হলো। সে তাঁর বুকের ওপর পেশাব করে দিল। আমি তা ধোয়ার জন্য আসলাম, তখন তিনি বললেন: "মেয়ের পেশাব ধৌত করতে হয়, আর ছেলের পেশাবের উপর পানি ছিটিয়ে দিলেই যথেষ্ট।"
1409 - عن علي بن أبي طالب قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في بول الغلام الرضيع:"ينضح من بول الغلام، ويغسل من بول الجارية".
صحيح: رواه أبو داود (378) واللفظ له، والترمذي (610) وابن ماجه (525) كلهم من طريق معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن أبي حرب بن أبي الأسود الدِّيلي، عن أبيه، عن عليّ رضي الله عنه.
إسناده صحيح، غير أنه اختلف في رفعه ووقفه، والصواب أنه مرفوع، قال الترمذي:"حسن صحيح، رفع هشام الدستوائي هذا الحديث عن قتادة، وأوقفه سعيد بن أبي عروبة عن قتادة ولم يرفعه".
وقال المنذري:"قال البخاري: سعيد بن أبي عروبة لا يرفعه، وهشام الدستوائي يرفعه، وهو حافظه. وصححه أيضًا ابن خزيمة (1/ 144) والحاكم (1/ 165، 166). وانظر للمزيد:"المنة الكبرى: (1/ 270).
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দুধ পানকারী ছেলের পেশাবের ব্যাপারে বলেছেন: "ছেলের পেশাবের ওপর পানি ছিটিয়ে দেবে, আর মেয়ের পেশাব ধৌত করবে।"
1410 - عن أنس بن مالك قال: جاء أعرابي فبال في طائفة المسجد، فزجره الناس، فنهاهم النبي صلى الله عليه وسلم، فلما قضى بوله أمر النبي صلى الله عليه وسلم بذَنوب من ماء، فأهريق عليه.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (221) ومسلم في الطهارة (284) كلاهما من طريق يحيي بن سعيد الأنصاري، أنه سمع أنس بن مالك، فذكر الحديث.
وفي رواية عند مسلم: بينما نحن في المسجد مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ جاء أعرابي، فقام يبول في المسجد، فقال أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم: مه مه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُزْرِموه، دَعُوه!" فتركوه حتى بال، ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم دعاه فقال له:"إن هذه المساجد لا تصلح لشيء من هذا البول ولا القذر، إنما هي لذكر الله عز وجل، والصلاة وقراءة القرآن" أو كما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فأمر رجلًا من القوم، فجاء بدَلْوٍ من ماءٍ، فشنّه عليه.
قوله (فشنه) - بالشين المعجمة - أي: فأراقه عليه من جميع جهاته، ورشّه عليه، وفي أكثر الروايات الصحيح مسلم:"فسنَّه عليه" بالسين المهملة، يقال: (سننتُ الماء على الثوب، وعلى الأرض ونحو ذلك) إذا صببتَه عليه.
وقوله:"في طائفة المسجد" أي: ناحية المسجد
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন এসে মসজিদের এক কোণে পেশাব করা শুরু করল। তখন লোকেরা তাকে ধমকাতে লাগল। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের নিষেধ করলেন। যখন সে তার পেশাব শেষ করল, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক বালতি (বা পাত্র ভরা) পানি আনতে নির্দেশ দিলেন এবং তা পেশাবের ওপর ঢেলে দেওয়া হলো।
মুসলিম শরীফের এক বর্ণনায় আছে: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে মসজিদে ছিলাম, এমন সময় এক বেদুঈন এসে মসজিদে দাঁড়িয়ে পেশাব করতে শুরু করল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীগণ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘আহ! আহ!’ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “তোমরা ওকে বাধা দিও না, ওকে ছেড়ে দাও।” অতঃপর লোকেরা তাকে ছেড়ে দিল, ফলে সে পেশাব করল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে ডাকলেন এবং বললেন, “নিশ্চয়ই এই মসজিদগুলো পেশাব কিংবা কোনো প্রকার নাপাকির জন্য উপযোগী নয়। এগুলো কেবল আল্লাহ তাআলার যিকির, সালাত এবং কুরআন তিলাওয়াতের জন্য।” অথবা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এ-রকমই কিছু বলেছিলেন। বর্ণনাকারী বলেন, এরপর তিনি লোকজনের মধ্য থেকে একজনকে নির্দেশ দিলেন। তখন সে এক বালতি পানি নিয়ে এলো এবং তা তার ওপর ছড়িয়ে (ঢেলে) দিল।
1411 - عن أبي هريرة قال: قام أعرابي فبال في المسجد، فتناوله الناس، فقال لهم النبي صلى الله عليه وسلم:"دعوه! وهَريقوا على بوله سَجْلا من ماء، أو ذَنوبا من ماء؛ فإنما بُعِثْتُم مُيَسِّرين، ولم تُبعَثُوا مُعَسِّرين".
صحيح: رواه البخاري في الوضوء (220) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: أخبرنا عبد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، أن أبا هريرة قال .. فذكره.
وفي رواية عنده (6128): فشار إليه الناس ليقعوا به، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث،
وفيه:"أهريقوا على بوله" بدلًا من"هريقواه، وزاد في كتاب الأدب (6010): قال أبو هريرة: قام رسول الله صلى الله عليه وسلم في صلاة وقمنا معه، فقال أعرابي وهو في الصلاة: اللهم ارحمني ومحمدًا ولا ترحم معنا أحدًا، فلما سلَّم رسول الله صلى الله عليه وسلم قال للأعرابي:"لقد حجَّرت واسعًا" يريد: رحمة الله.
هكذا رواه البخاري من طريق شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن أن أبا هريرة قال. ولم يذكر فيه بول الأعرابي.
ورواه أبو داود (380) والترمذي (147) والنسائي (1218) كلهم من طريق سفيان، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، وزادوا: فلم يلْبث أن بال في المسجد، فأسرع
الناس إليه، فنهاهم. فذكروا بقية الحديث.
ورواه ابن ماجه (529) قريبا منه من طريق محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، وفيه: دخل أعرابي المسجد، ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالس، فقال: اللهم اغفر لي ولمحمد، ولا تغفر لأحد معنا، فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"لقد احْتظرت واسعًا" ثم ولَّى حتى إذا كان في ناحية المسجد فَشَجَ ببول، فقال الأعرابي بعد أن فَقِه: فقام إليَّ بأبي وأمي! فلم يُؤنِّبْ ولم يَسُبَّ.
وفيه محمد بن عمرو بن علقمة صدوق.
وقوله"احتظرت": ضيّقت ما وسعه الله، وبمعنى (حجرت).
وقوله"هريقوا: قال الحافظ في"الفتح" (1/ 303):"كذا للأكثر، وللأصلي أهريقوا": بزيادة الهمزة، قال ابن التين: هو بإسكان الهاء، ونقل عن سيبويه أنه قال: (أهراق يُهريق إهرياقا) مثل (أسطاع يُسطيع إسطياعا) بقطع الألف وفتحها في الماضي وضم الياء في المستقبل، وهي لغة في أطاع يطيع، فجعلت السين والهاء عوضا من ذهاب حركة عين الفعل. وروي بفتح الهاء، واستشكله، ويوجه بأن الهاء مبدلة من الهمزة؛ لأن أصل (هراق) (أراق) ثم اجتلبت الهمزة، فتحريك الهاء على إبقاء البدل والمبدل منه، وله نظائر. وذكر الجوهري توجيهًا آخر، وأن أصله (أأريقوا)، فأبدلت الهمزة الثانية هاء للخفة. وجزم ثعلب في الفصيح بأن (أهريقه) بفتح الهاء" انتهى.
وقوله:"فَشَجَ" الفَشجُ هو تفريج بين الرجلين.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক বেদুঈন উঠে মসজিদে পেশাব করে দিল। তখন লোকেরা তাকে (ধমক দিতে) উদ্যত হলো। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও! এবং তার পেশাবের উপর এক বালতি অথবা এক মশক পানি ঢেলে দাও; কেননা তোমাদেরকে সহজকারী হিসেবে পাঠানো হয়েছে, কঠোরতাকারী হিসেবে পাঠানো হয়নি।"
1412 - عن عبد الله بن عمر قال: كانت الكلاب تبول. وتقبل وتدبر في المسجد في زمان رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم يكونوا يرشون شيئًا من ذلك.
صحيح: رواه البخاري (174) إلَّا أنَّه قال: قال أحمد بن شبيب، ثنا أبي، عن يونس، عن ابن شهاب، قال: حدثني حمزة بن عبد الله، عن أبيه .. فذكر الحديث.
وزاد أبو داود (382): كنت أبيت في المسجد في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وكنت فتى شابًا عزِبًا، وكانت الكلاب تبول، وتُقبل وتدبر في المسجد، فلم يكونوا يرشون شيئًا من ذلك.
قال أهل العلم: يحمل هذا على ابتداء الإسلام، لما لم يكن للمساجد أبواب، ثم أمرنا بتكريم المساجد وتطهيرها وجعل الأبواب عليها.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে কুকুরগুলো মাসজিদে প্রস্রাব করত এবং আসা-যাওয়া করত, কিন্তু তারা এর কোনো কিছুর উপরই পানি ছিটিয়ে পবিত্র করতেন না।
(অন্য একটি বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে যে,) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মাসজিদে রাত্রি যাপন করতাম, আর আমি ছিলাম অবিবাহিত যুবক। কুকুরগুলো মাসজিদে প্রস্রাব করত এবং আসা-যাওয়া করত, কিন্তু সাহাবীগণ এর কোনো কিছুর উপরই পানি ছিটিয়ে পবিত্র করতেন না।
আহলে ইলম (ইসলামী জ্ঞান বিশারদগণ) বলেছেন: এই বিধানকে ইসলামের প্রথম দিকের বলে গণ্য করা হবে, যখন মাসজিদসমূহে দরজা ছিল না। এরপর আমাদেরকে মাসজিদসমূহকে সম্মান করতে, পবিত্র রাখতে এবং সেগুলোতে দরজা লাগানোর নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।
1413 - عن عائشة قالت: كنت أغسل الجنابة من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فيخرج إلى الصلاة، وإن بُقَعَ الماء في ثوبه.
وفي رواية: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يغسل المنيّ، ثم يخرج إلى الصلاة في ذلك
الثوب، وأنا أنظر إلى أثر الغسل فيه.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (229 - 232) ومسلم في الطهارة (289) كلاهما من طريق عمرو بن ميمون قال: سألت سليمان بن يسار عن المني يصيب ثوب الرجل أيغسله أم يغسل الثوب؟ فقال: أخبرتني عائشة، فذكرت الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাপড় থেকে অপবিত্রতা (জানাবাত) ধুয়ে দিতাম। অতঃপর তিনি সালাতের জন্য বের হতেন এবং তাঁর কাপড়ে পানির দাগ লেগে থাকত।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বীর্য ধুয়ে নিতেন, অতঃপর সেই কাপড় পরেই সালাতের জন্য বের হতেন এবং আমি তাতে ধোয়ার চিহ্ন দেখতে পেতাম।
1414 - عن عبد الله بن شهاب الخولاني قال: كنتُ نازلًا على عائشة، فاحتلمت في ثوَبيّ، فغمستُهما في الماء، فرأتْني جاريةٌ لعائشة فأخبرتْها، فبعثت إليّ عائشة فقالت: ما حملكَ على ما صنعت بثوبَيك؟ قال: فقلت: رأيت ما يرى النائم في منامه، قالت: هل رأيت فيهما شيئًا؟ قلتُ: لا، قالت: فلو رأيت شيئًا غسلته؛ لقد رأيتُني وإني لأحكُّه من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم يابسا بظُفُري.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (290) عن أحمد بن جوص الحنفي، حدّثنا أبو الأحوص، عن شبيب بن غرقدة، عن عبد الله بن شهاب الخولاني، أنَّه قال .. فذكر الحديث. وفي رواية عنده (288): أن رجلًا نزل بعائشة فأصبح يغسل ثوبه، فقالت عائشة: إنما كان يجزئك إن رأيته أن تغسل مكانه، فإن لم تر نضحت حوله، ولقد رأيتني أفركه من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم فركا، فيصلي فيه.
وفي سنن الترمذي (116) وابن ماجه (528) عن همام بن الحارث قال: ضاف عائشة ضيفٌ، فأمرت له بملحفة صفراء، فنام فيها، فاحتلم، فاستحيا أن يرسل بها، وبها أثر الاحتلام، فغمسها في الماء، ثم أرسل بها، فقالت عائشة: لم أفسد علينا ثوبنا؟ إنما كان يكفيه أن يفركه بأصابعه، وربما فركتُه من ثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم بأصابعي.
قال الترمذي: حسن صحيح.
لعل هذا الضيف هو عبد الله بن شهاب الخولاني.
وليس بين حديث الغسل وحديث الفرك تعارض؛ لأن الجمع بينهما واضح على القول بطهارة المني، بأن يحمل الغسل على الاستحباب للتنظيف لا على الوجوب؛ فإن المني بمنزلة البصاق والمخاط، كما قال ابن عباس.
وبه قال الشافعي وأحمد وأصحاب الحديث.
قال البيهقي:"وقد يغسل المني تنظيفًا كما يغسل المخاط وغيره من الثوب تنظيفًا لا تنجيسًا"."السنن الكبرى" (2/ 419).
ومن ذهب إلى نجاسته حمل الغسل على ما كان رطبا، والفرك على ما كان يابسا، وهو مذهب الحنفية. انظر للمزيد: فتح الباري (1/ 333).
আব্দুল্লাহ ইবনে শিহাব আল-খাওলানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে অবস্থান করছিলাম। তখন আমার দুটি কাপড়ে স্বপ্নদোষ হলো। আমি সে দুটিকে পানিতে ডুবিয়ে দিলাম। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একজন দাসী আমাকে দেখতে পেল এবং তাকে এ বিষয়ে জানাল। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: তোমার দুটি কাপড়ের সাথে এমনটি করার কারণ কী? আমি বললাম: ঘুমের মধ্যে একজন যা দেখে, আমিও তাই দেখেছি। তিনি বললেন: তুমি কি সে দুটিতে (কাপড়ে) কোনো কিছু দেখতে পেয়েছিলে? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: যদি কিছু দেখতে পেতে, তবে তুমি তা ধুয়ে ফেলতে। আমি তো দেখেছি যে আমি রসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাপড় থেকে শুকনো বীর্য আমার নখ দ্বারা ঘষে উঠিয়ে ফেলতাম।
1415 - عن امرأة من بني عبد الأشهل رضي الله عنها قالت: قلت: يا رسول الله! إن لنا طريقا إلى المسجد مُنْتِنَةٌ، فكيف نفعل إذا مُطِرنا؟ قال:"أليس بعدها طريق هي أطيب منها؟"، قالت: قلت: بلى، قال:"فهذه بهذه".
صحيح: رواه أبو داود (384) وابن ماجه (533) كلاهما من طريق عبد الله بن عيسى، عن موسى بن عبد الله بن يزيد، عن امرأة من بني عبد الأشهل، ذكر الحديث.
إسناده صحيح، ولا تضر جهالة (امرأة من بني عبد الأشهل)؛ فإنها صحابية. وقد صححه المنذري وعبد الحق الإشبيلي وغيرهما.
বনী আব্দুল আশহাল গোত্রের জনৈক মহিলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের মসজিদের দিকে যাওয়ার একটি রাস্তা রয়েছে যা দুর্গন্ধযুক্ত। বৃষ্টি হলে আমরা কী করব? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এরপরে কি এর থেকে অধিক উত্তম/পরিষ্কার কোনো রাস্তা নেই?" তিনি বললেন: আমি বললাম: অবশ্যই আছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে এটি এর (অসুবিধার) প্রতিদান হিসেবে যথেষ্ট হবে।"
1416 - عن ابن مسعود قال: كنا لا نتوضأ من موطئٍ، ولا نكف شعرًا ولا ثوبًا.
حسن: رواه أبو داود (204) واللفظ له، ورواه أيها ابن ماجه (1041) ولفظه:"أُمرنا ألّا نكف شعرًا ولا ثوبًا، ولا نتوضأ من موْطأٍ"، كلاهما من حديث عبد الله بن إدريس، وقرنه أبو داود بشريك وجرير، كلهم عن الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن عبد الله بن مسعود، فذكر الحديث.
وأخرجه الحاكم (1/ 171) من طريق عبد الله بن إدريس وأبي بكر بن أبي شيبة - كلاهما عن شريك وجرير به مثله، وقال: صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجا ذكر الموطئ، وأخرج أيضًا (1/ 139) من طريق سفيان، عن الأعمش به ولفظه:"كنا نصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم فلا نتوضأ من موطئ"، وقال: تابعه أبو معاوية وعبد الله بن إدريس، عن الأعمش به وقال:" صحيح على شرط الشيخين".
قلت: إسناده حسن إن كان الحسن سمعه من شقيق، وإلَّا فقد قال ابن خزيمة:"هذا الخبر له
علَّة: لم يسمعه الأعمش عن شقيق، لم أكن فهمته في الوقت. ثمَّ روى من طريق أبي معاوية، عن الأعمش، قال: حدَّثني شقيق أو حُدِّثت عنه، عن عبد الله". انتهى.
قلت: إن كان أبو معاوية أبدى الشكَّ في اتصال الإسناد فلم يشك عبد الله بن إدريس، وشريك، وجرير، كلُّهم رووه عن الأعمش بدون شكٍّ، إلَّا أنَّ الأعمش مدلَّسٌ، وقد عنعن في جميع هذه الأسانيد، لكنَّه في المرتبة الثانية عند الحافظ ابن حجر، واحتمل الأئمَّة تدليسه.
وذكره الترمذي (1/ 267) معلقا قائلا: وفي الباب عن عبد الله بن مسعود قال:"كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم نتوضأ من المَوْطَأ". وهذا لفظ سفيان بن عيينة كما رواه الحاكم.
وقول الصحابي:"أُمرناه في حكم المرفوع؛ لأن الآمر لهم هو النبي صلى الله عليه وسلم.
قال الخطابي في شرح الحديث:"الموطئ: ما يوطأ من الأذى في الطرق، وأصله (الموطوء) بالواو، وإنما أراد بذلك أنهم كانوا لا يعيدون الوضوء للأذى إذا أصاب أرجلهم، لا أنهم كانوا لا يغسلون أرجلهم ولا ينظفونها من الأذي إذا أصابها".
وأما الترمذي ففهم من الحديث:"إذا وطئ الرجل على المكان القذر أنه لا يجب عليه غسل القدم، إلا أن يكون رطبا، فيغسل ما أصابه"، ونقل ذلك عن غير واحد من أهل العلم.
وقوله (لا نكُفّ شعرًا ولا ثوبًا) أي: لا نقيها من التراب إذا صلينا صيانة لها عن التتريب، ولكن نرسلها فتقع على الأرض إذا سجدنا مع الأعضاء.
আব্দুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা (নোংরা) স্থানে পা রাখার কারণে (পুনরায়) ওযু করতাম না, আর (সালাতের সময়) চুল ও কাপড় গুটিয়ে রাখতাম না।
1417 - عن أبي سعيد الخدري قال: بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم يُصَلِّي بأصحابه، إذ خلع نعليه فوضعهما عن يساره، فلما رأى ذلك القومُ، ألْقَوا نِعالَهم، فلما قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاته قال: ما حملكم على إلقائكم نِعالَكم؟". .
قالو: رأيناك ألقيتَ نعليك فألقينا نِعالنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن جبريل عليه السلام أتاني، فأخبرني أن فيهما قذرًا - أو قال: أذًى"، وقال:"إذا جاء أحدكم إلى المسجد فلينظر، فإن رأى في نعليه قذًرا، أو أذّى فليمسحه وليصل فيهما".
صحيح: رواه أبو داود (650) عن موسى بن إسماعيل، حدثنا حماد، عن أبي نعامة السعدي، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وإسناده صحيح، وحماد هو ابن زيد كما وقع في بعض النسخ، وفي نسخة أخرى إنه حماد بن سلمة، وكذلك قال البيهقي في"معرفة السنن" (2/ 431) بعد أن رواه عن أبي داود، وأخرجه أيضًا ابن خزيمة (1017) في صحيحه، والحاكم (1/ 160) وقال:"صحيح على شرط مسلم".
وقال النووي في المجموعه (2/ 179):"إسناده صحيحه وما قيل فيه بأنه مرسل فقد رجع أبو حاتم الموصول"العلل" (1/ 121).
وأما ما رُوي عن أبي هريرة:"إذا وَطِئ أحدكم بنعله الأذى، فإن التراب له طهور" فإنه ضعيف رواه أبو داود (385) وفيه شيخ الأوزاعي مجهول، وفي رواية أن شيخه ابن عجلان، ولكن الراوي عنه محمد بن كثير الصنعاني سيئ الحفظ.
ورُوي عن عائشة بمعناه وفيه القعقاع بن حكيم لم يسمع من عائشة، كل هذه الروايات عند أبي داود.
قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 278): ورواه أيضًا الحاكم من حديث أنس وابن مسعود، ورواه الدارقطني من حديث ابن عباس، وعبد الله بن الشخير، وإسناد كل منهما ضعيف، ورواه البزار من حديث أبي هريرة وإسناده ضعيف ومعلول أيضًا.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের নিয়ে সালাত আদায় করছিলেন, তখন তিনি তাঁর জুতোজোড়া খুলে তাঁর বাম পাশে রাখলেন। যখন লোকেরা তা দেখল, তখন তারাও তাদের জুতো ফেলে দিল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের জুতো ফেলে দিলে কেন?"
তারা বলল: আমরা দেখলাম আপনি আপনার জুতো ফেলে দিয়েছেন, তাই আমরাও আমাদের জুতো ফেলে দিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই জিবরীল (আঃ) আমার কাছে এসেছিলেন এবং আমাকে জানিয়েছিলেন যে সেগুলোতে ময়লা—অথবা তিনি বলেছেন: কষ্টদায়ক বস্তু—ছিল।" তিনি আরও বললেন: "যখন তোমাদের কেউ মসজিদে আসে, তখন সে যেন ভালোভাবে দেখে নেয়। যদি সে তার জুতোতে কোনো ময়লা বা কষ্টদায়ক বস্তু দেখতে পায়, তবে সে যেন তা মুছে ফেলে এবং জুতো পরেই সালাত আদায় করে।"
1418 - عن أبي هريرة قال: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم حامل الحسن بن علي على عاتقه، ولعابه يسيل عليه.
صحيح: رواه ابن ماجه (658) قال: حدثنا علي بن محمد، ثنا وكيع، عن حماد بن سلمة،
عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قال البوصيري في زوائده: إسناده صحيح، ورجاله رجال الصحيحين.
قلت: ليس كما قال؛ فإن حماد بن سلمة من رجال مسلم، ومحمد بن زياد - وهو الجُمَحي مولاهم - من رجال السنن، إلا أنه ثقة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি হাসান ইবনু ‘আলীকে তাঁর কাঁধের উপর বহন করে আছেন এবং তাঁর (হাসানের) লালা তাঁর (নবীর) গায়ে ঝরছে।
1419 - عن عبد الله بن عمر أن رجلًا مرَّ، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يبول، فسلَّم، فلم يرد عليه.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (370) من طريق سفيان، عن الضحاك بن عثمان، عن نافع، عن ابن عمر فذكره، وهو حديث مختصر وسيأتي في التيمم أنه تيمم ورد عليه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন পেশাব করছিলেন তখন পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। সে সালাম দিল, কিন্তু তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উত্তর দিলেন না।
1420 - عن جابر بن عبد الله أن رجلًا مرّ على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يبول، فسلم عليه، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا رأيتني على مثل هذه الحالة فلا تُسلِّم عليّ؛ فإنك إن فعلت ذلك لم أردّ عليك".
حسن: رواه ابن ماجه (352) قال: حدثنا سويد بن سعيد، ثنا عيسى بن يونس، عن هاشم بن البريد، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن، ورجاله ثقات، غير شيخ ابن ماجه، وهو صدوق وإن كان إبن معين أفحش القول فيه؛ فإنه لم ينفرد به.
ولذا قال البوصيري:"هذا إسناد حسن؛ لأنَّ سويدًا لم يتفرد به، فله متابع عن عيسى بن يونس في سند أبي يعلى وغيره".
قلت: ومن طريق عيسى بن يونس رواه أيضًا ابن عدي في الكامل (7/ 2574).
وإنما الذي تفرد به هو هاشم بن البريد، كما قال أبو حاتم." العلل" (1/ 34)، إلا أنه ثقة مع غلوه في التشيع كما قال الجوزجاني:"كان غاليًا في سوء مذهبه" وقال ابن عدي في"الكامل" (7/ 2574):"هاشم بن البريد ليس له كثير حديث، وإنما يذكر الغلو في التشيع. وكذلك ابنه علي. وأما هاشم فمقدار ما يرويه لم أر في حديثه شيئًا منكرًا. والمناكير تقع في حديث ابنه علي بن هاشم".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিল, যখন তিনি প্রস্রাব করছিলেন। তখন সে তাঁকে সালাম দিলো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: “যখন তুমি আমাকে এই ধরনের অবস্থায় দেখবে, তখন আমাকে সালাম দেবে না; কারণ তুমি যদি এমনটি করো, তবে আমি তোমার সালামের উত্তর দেব না।”
1421 - عن عبد الله بن عمر أن رجلًا مرَّ برسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يُهريق الماء، فسلم عليه الرجل، فرد عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، ثم قال:"إذا رأيتني هكذا فلا تُسلم عليّ؛ فإنك إن تفعل لا أردُّ عليك السلام".
صحيح: رواه البزار كما ذكره الزيلعي في نصب الراية (1/ 6)، من حديث أبي بكر رجل من آل
عمر بن الخطاب، عن نافع، عن ابن عمر، وابن الجارود في المنتقى (37) من طريق أبي بكر، وقال: هو ابن عمر بن عبد الرحمن بن عبد الله بن عمر بن الخطاب عنه، واللفظ له. وإسناده صحيح.
وأبو بكر هذا قال عبد الحق الإشبيلي: فيما أعلم هو: ابن عمر بن عبد الرحمن بن عبد الله بن عمر، روى عنه مالك وغيره، وهو لا بأس به، ثم قال: ولكن حديث مسلم أصح، لأنه من حديث الضحاك بن عثمان، عن نافع، عن ابن عمر، والضحاك أوثق من أبي بكر، ولعل ذلك كان في موطنين" انتهى.
انظر الأحكام الوسطى (1/ 131).
قلت: هكذا جاء مُصرَّحًا في مسند السرَّاج (21) فقال: حدَّثنا محمد بن إدريس، ثنا عبد الله بن رجاء، ثنا سعيد بن سلمة، حدَّثني أبو بكر بن عمر بن عبد الرحمن بن عبد الله بن عمر بن الخطَّاب، عن نافع به مثله. وذكره أيضًا الزيلعي.
وإسناده حسن لأجل سعيد بن سلمة، وهو: ابن أبي الحُسام العدوي مولاهم، مختلَفٌ فيه؛ فضعَّفه النسائي، ومشَّاه غيره، وله في صحيح مسلم حديث أمِّ زرع، واستشهد به البخاري، وروي له حديثًا واحدًا. وقال الحافظ:"صدوقٌ صحيح الكتاب يُخطِئ من حفظه".
ويجمع بين الحديثين بأنه ردَّ السلامَ مرة، ولم يردّ أخرى، وعلَّم في الحالتين بأنه لا يفعل مثل هذا؛ فإن فعل فإنه لا يرد عليه السلام بعد هذا.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন তিনি পেশাব করছিলেন। লোকটি তাঁকে সালাম দিল, আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার সালামের উত্তর দিলেন। এরপর তিনি বললেন: "যখন তুমি আমাকে এই অবস্থায় দেখবে, তখন আমাকে সালাম দেবে না; কারণ তুমি যদি তা করো, তবে আমি তোমার সালামের উত্তর দেব না।"
1422 - عن أُبَي بن كعب قال: سألتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الرجل يُصيب من المرأة ثم يُكْسِل؟ فقال:"يَغْسِلُ ما أصابه من المرأةِ، ثم يتوضأُ ويُصَلِّي".
متفق عليه: رواه البخاري في الغسل (293) ومسلم في الحيض (346) واللفظ له، كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن أُبَي أيوب، عن أُبَي بن كعب، فذكر الحديث. وفي لفظ: إذا جامع الرجل المرأةَ فلم يُنزِل؟ قال:"يغسلُ ما مسّ المرأة منه، ثم يتوضأ ويُصلي". هكذا في لفظ البخاري.
قال أبو عبد الله (البخاري):"والغُسل أحْوَطُ وذاك الآخِرُ، وإنما بيَّنَا لاختلافهم". ومعناه - كما قال الحافظ -: أي على تقدير أن لا يثبت الناسخ ولا يظهر الترجيح، فالاحتياط للدين الاغتسال. انتهى.
ومعنى هذا أنَّ البخاري لا يرى وجوب الغسل إلا بالإنزال، ويدل عليه ما رواه من حديث أبي هريرة:"إذا جلس بين شُعَبِها الأربع، ثم جهدها فقد وجب الغسل" (رقم 291)، والمقصود من الجهد: الإنزال، فأراد بيان اختلاف الصحابة والتابعين بأنه في أول الإسلام كان العمل على حديث عثمان وأُبَي بن كعب، والغسل أحوط، أي: المستحب، ولما لم يثبت عنده حديث أُبَي بن كعب الناسخ الآتي - لاختلافهم على الزهري - لم يخرجه.
উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সেই ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম যে স্ত্রীর সাথে মিলন করে কিন্তু বীর্যপাত (ইনযাল) করে না? তিনি বললেন: "সে যেন তার স্ত্রীর দেহ থেকে যা (স্পর্শ) লেগেছে, তা ধৌত করে নেয়, তারপর উযূ করে সালাত আদায় করে।"
(হাদিসটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি গোসল অধ্যায়ে (হা/২৯৩) এবং ইমাম মুসলিম এটি হায়েজ অধ্যায়ে (হা/৩৩৬) বর্ণনা করেছেন। শব্দগুলো মুসলিমের। উভয়ই হিশাম ইবনে উরওয়া, তার পিতা, আবু আইয়ুব, উবাই ইবনে কা'ব সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং হাদিসটি উল্লেখ করেছেন।
অন্য এক শব্দে (বর্ণনায় এসেছে): যদি কোনো ব্যক্তি স্ত্রীর সাথে সহবাস করে কিন্তু বীর্যপাত না করে? তিনি বললেন: "সে যেন স্ত্রীর দেহ থেকে যা তাকে স্পর্শ করেছে, তা ধৌত করে নেয়, তারপর উযূ করে সালাত আদায় করে।" বুখারীর শব্দে এরূপ এসেছে।
আবু আব্দুল্লাহ (ইমাম বুখারী) বলেন: "গোসল করা অধিক সতর্কতাযুক্ত এবং এটি পরের বিধান। আমরা কেবল তাদের (সাহাবীদের) মতপার্থক্য বোঝানোর জন্য এটি বর্ণনা করেছি।" আর এর অর্থ – যেমন হাফিয (ইবনে হাজার) বলেছেন – হলো: যদি নাসিখ (রহিতকারী) প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত না হয় এবং অগ্রাধিকার স্পষ্ট না হয়, তবে দ্বীনের জন্য সতর্কতা হলো গোসল করা। সমাপ্ত।
এর অর্থ হলো, ইমাম বুখারী বীর্যপাত (ইনযাল) ব্যতীত গোসল ওয়াজিব মনে করতেন না। এর প্রমাণস্বরূপ তিনি আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদিসটি পেশ করেছেন: "যখন সে তার (স্ত্রীর) চার শাখার মাঝে উপবিষ্ট হয় এবং তাকে পীড়িত করে (শ্রম দেয়), তখন গোসল ওয়াজিব হয়ে যায়।" (হা/২৯১)। এখানে 'পীড়িত করা' দ্বারা উদ্দেশ্য হলো বীর্যপাত। সুতরাং তিনি (ইমাম বুখারী) সাহাবী ও তাবেয়ীদের মধ্যকার মতভেদ তুলে ধরতে চেয়েছেন যে, ইসলামের প্রথম দিকে উসমান ও উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদিসের উপর আমল করা হতো, তবে গোসল করাই অধিক সতর্কতামূলক, অর্থাৎ মুস্তাহাব। আর যেহেতু (তাঁর নিকট) উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাসিখ (রহিতকারী) হাদিস – যা পরবর্তীতে আসছে – প্রমাণিত হয়নি (যুহরীকে নিয়ে তাদের মতপার্থক্যের কারণে), তাই তিনি তা (পরবর্তী হাদিসটি) সংকলন করেননি।
1423 - عن زيد بن خالد أنه سأل عثمان بن عفان رضي الله عنه قلت: أرأيت إذا جامع فلم يُمْنِ؟ قال: يتوضأ كما يتوضأ للصلاة، ويغسل ذكره، قال عثمان: سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فسألت عن ذلك عليًّا والزبير وطلحة وأُبَي بن كعب رضي الله عنهم فأمروه بذلك.
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (179) واللفظ له، ومسلم في الحيض (374) كلاهما من حديث يحيي بن أبي كثير، عن أبي سلمة، أنَّ عطاء بن يسار أخبره، أنَّ زيد بن خالدٍ أخبره فذكر الحديث.
ورواه مسلم أيضًا من حديث أبي أيوب أنه أخبره أنه سمع ذلك من رسول الله صلى الله عليه وسلم. ولم يسق لفظه. وسيأتي حديث أبي أيوب بلفظه.
যায়িদ ইবনু খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলেন। আমি বললাম: আপনার কী অভিমত যদি কোনো ব্যক্তি সহবাস করে, কিন্তু তার বীর্যপাত না ঘটে? তিনি (উসমান) বললেন: সে সালাতের জন্য যেভাবে ওযু করে সেভাবে ওযু করবে এবং তার পুরুষাঙ্গ ধৌত করবে। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি। এরপর আমি এ ব্যাপারে আলী, যুবাইর, তালহা এবং উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম। তাঁরা সকলেই তাকে এ রকম করার নির্দেশ দিলেন।
1424 - عن أبي أيوب، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، نحو حديث عثمان.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (347) عن عبد الوارث بن عبد الصمد، حدثني أبي، عن
جدّي، عن الحسين، قال يحيي (وهو ابن أبي كثير): وأخبرني أبو سلمة، أنّ عروة بن الزّبير أخبره، أنَّ أبا أيوب أخبره أنه سمع ذلك من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولم يسق مسلم لفظه، وإنما أحاله على حديث عثمان.
وأبو أيوب يرويه أيضًا عن أبي بن كعب الذي سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الرّجل الذي جامع امرأته ولم ينزل … إلخ الحديث.
فكان أبو أيوب يفتي بهذا بعد النبيّ صلى الله عليه وسلم أيضًا؛ لأنّه لم يبلغه النّسخ.
وأمّا ما رواه ابن ماجه (607) وغيره بلفظ:"الماء من الماء" فإسناده ليس بذاك، فيه عبد الرحمن بن سُعاد، قال فيه البخاري: فيه نظر، ومع ذلك ذكره ابن حبان في الثقات (5/ 93)، وقال الحافظ:"مقبول" يعني إذا توبع وإلا فلين الحديث.
আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে।
সহীহ: এটি মুসলিম তার আল-হাইদ অধ্যায়ে (হাদীস নং ৩৪/৭) আব্দুল ওয়ারিস ইবনে আবদিস সামাদ হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি তার দাদা হতে, তিনি হুসাইন হতে বর্ণনা করেছেন। ইয়াহইয়া (তিনি ইবনে আবী কাছীর) বলেন: আবু সালামা আমাকে জানিয়েছেন যে, উরওয়াহ ইবন আয-যুবাইর তাকে জানিয়েছেন যে, আবু আইয়ুব তাকে জানিয়েছিলেন যে, তিনি তা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছেন। তবে মুসলিম এর শব্দগুলো উদ্ধৃত করেননি, বরং তিনি এটিকে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের দিকে উল্লেখ করেছেন।
আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি উবাই ইবনে কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণনা করেছেন, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রশ্ন করেছিলেন সেই ব্যক্তি সম্পর্কে, যে তার স্ত্রীর সাথে সহবাস করেছে কিন্তু বীর্যপাত হয়নি... ইত্যাদি হাদীস।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরেও আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই ভিত্তিতে ফতোয়া দিতেন; কারণ তাঁর কাছে রহিতকরণের (নাসিখ) খবর পৌঁছায়নি।
আর ইবনে মাজাহ (হাদীস নং ৬০৭) ও অন্যান্যরা যে শব্দে বর্ণনা করেছেন: "আল-মাউ মিনাল মাউ" (বীর্যের কারণে গোসল), তার সনদ তেমন শক্তিশালী নয়। তাতে আব্দুর রহমান ইবনে সু’আদ নামক রাবী রয়েছেন। ইমাম বুখারী তার সম্পর্কে বলেন: তাতে আপত্তি রয়েছে। এতদসত্ত্বেও ইবনে হিব্বান তাকে আস-সিকাত (নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের তালিকা) (৫/৯৩)-তে উল্লেখ করেছেন এবং হাফিয (ইবনে হাজার আসকালানী) বলেছেন: "মাকবুল" (গ্রহণযোগ্য), অর্থাৎ যদি অন্য রাবী তাকে সমর্থন করে। নতুবা তিনি লীনুল হাদীস (নরম প্রকৃতির হাদীস বর্ণনাকারী)।
1425 - عن أبي سعيد الخُدري قال: خرجتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم الاثنين إلى قباء، حتى إذا كُنّا في بني سالم وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على باب عِتْبان، فصرخ به، فخرج يجر إزاره، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أعْجَلنا الرجلَ". فقال عِتْبانُ: يا رسول الله! أرأيت الرجلَ يُعْجَلُ عن امرأته ولم يُمْنِ، ما عليه؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنما الماء من الماء".
متفق عليه: رواه مسلم في الحيض (343) عن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبيه، ورواه أيضًا عن أبي سلمة بن عبد الرحمن عن أبي سعيد، ولم يذكر القصة، وإنما ذكر لفظ الحديث فقط، وهو:"إنما الماء من الماء". وفي رواية عنده وعند البخاري في الوضوء (180) عن الحكم، عن ذكوان، عن أبي سعيد الخدري، قال: أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مرّ على رجل من الأنصار، فأرسل إليه فخرج ورأسه يقطر، فقال: لعلَّنا أعْجَلْناك؟ ، قال: نعم يا رسول الله! ، قال:"إذا أُعْجِلتَ أو أُقْحِطْت فلا غُسْلَ عليك، وعليك الوضوءُ". واللفظ لمسلم.
قوله:"أقحطْتَ" من القحط، وهو عدم المطر، يقال: أقحط الرجلُ إذا جامع ولم يُنزِل، وهو بمعنى الإكسال كما في حديث أُبِي بن كعب.
وقوله:"إنما الماءُ من الماء" الماءُ الأول: الماءُ المُطَهْر، والثاني: المني. فيه حجة لمن لم ير إيجاب الغُسل من التقاء الختانين، إلا أنه منسوخ بحديث عائشة وغيرها في قول النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا جلس بين شُعَبِها الأربع، ومس الختانُ الختانَ فقد وجب الغسل". وسيأتي في الباب الذي يليه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে সোমবার কুবায় গেলাম। আমরা যখন বানী সালিমের মহল্লায় পৌঁছলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইতবানের দরজায় দাঁড়িয়ে তাঁকে ডাকলেন। তিনি নিজের লুঙ্গি টেনে বের হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমরা লোকটিকে তাড়াহুড়ো করিয়ে দিলাম।" তখন ইতবান বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি বলুন, যে ব্যক্তি তার স্ত্রীর নিকট হতে তাড়াতাড়ি সরে আসে এবং বীর্যপাত না হয়, তার উপর কী আবশ্যক?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই পানি (গোসল) পানির (বীর্যের) কারণে আবশ্যক।"
মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মুসলিম এটি হায়য অধ্যায়ে (৩৪৩) আব্দুর রহমান ইবনে আবী সাঈদ তার পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন। ইমাম মুসলিম আবূ সালামা ইবনে আব্দুর রহমান থেকে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রেও বর্ণনা করেছেন, তবে তাতে সম্পূর্ণ ঘটনাটি উল্লেখ করেননি; শুধু হাদীসের এই বাক্যটি উল্লেখ করেছেন: "নিশ্চয়ই পানি পানির কারণে আবশ্যক।"
তাঁর (মুসলিম) নিকট এবং ইমাম বুখারীর নিকট উযু অধ্যায়ে (১৮০) হাকামের সূত্রে যাকাওয়ান থেকে আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারদের এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি লোকটির কাছে লোক পাঠালেন। লোকটি মাথা থেকে পানি ঝরতে থাকা অবস্থায় বেরিয়ে আসল। তিনি বললেন: "সম্ভবত আমরা তোমাকে তাড়াহুড়ো করিয়ে দিলাম?" লোকটি বলল: "হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল!" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তোমাকে তাড়াহুড়ো করানো হয় (বীর্যপাত ছাড়াই সহবাস ভঙ্গ হয়) অথবা তুমি নিষ্ফলা হও (বীর্যপাত না হয়), তখন তোমার ওপর গোসল আবশ্যক নয়, বরং তোমার জন্য কেবল ওযু আবশ্যক।" এই শব্দটি মুসলিমের।
তাঁর বাণী: "আক্বহাত্তা" শব্দটি 'আল-ক্বাহত' থেকে এসেছে, যার অর্থ বৃষ্টি না হওয়া। বলা হয়: লোকটি "আক্বহাত্বা" হয়েছে যখন সে সহবাস করল কিন্তু বীর্যপাত করল না। এর অর্থ 'আল-ইকসাল' (বীর্যপাতের আগে থামা), যেমন উবাই ইবনে কা'বের হাদীসে এসেছে।
আর তাঁর বাণী: "নিশ্চয়ই পানি পানির কারণে আবশ্যক"-এ প্রথম 'পানি' দ্বারা পবিত্রকারী পানি (গোসল) এবং দ্বিতীয় 'পানি' দ্বারা বীর্য বোঝানো হয়েছে। এই হাদীসটি তাদের জন্য দলীল যারা শুধু খিতানদ্বয়ের মিলনের কারণে গোসল আবশ্যক মনে করেন না। তবে এটি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্যদের হাদীস দ্বারা রহিত হয়ে গেছে, যেখানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সে (পুরুষ) তার স্ত্রীর চার শাখার মাঝে বসে এবং এক খিতান অপর খিতানকে স্পর্শ করে, তখন গোসল আবশ্যক হয়ে যায়।" (এটি পরবর্তী অধ্যায়ে আসবে।)
1426 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إذا جلس بين شُعَبِها الأربع، ثم جَهَدَها فقد وجب الغسلُ".
متفق عليه: رواه البخاري في الغسل (291) ومسلم في الحيض (348) كلاهما من حديث هشام الدستوائي، عن قتادة، عن الحسن، عن أبي رافع، عن أبي هريرة. وزاد مسلم من طريق مطر، عن الحسن: وإن لم يُنزِل".
وقوله:"الختانان" المراد بهذه التثنية ختان الرجل والمرأة، وختان المرأة هو قطع جليدة في أعلى فرجها تُشبه عرف الديك، بينها وبين مدخل الذكر جلدة رقيقة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন সে (পুরুষ) তার (স্ত্রীর) চার শাখার (হাত-পায়ের) মাঝে বসে এবং তাকে কষ্ট দেয় (অর্থাৎ সহবাস করে), তবে গোসল ফরয হয়ে যায়।"
(সহীহ বুখারী ও সহীহ মুসলিমের দ্বারা) হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। উভয়েই (বুখারী ও মুসলিম) এটি হিশাম আদ-দাস্তুয়ায়ী, তিনি কাতাদাহ, তিনি হাসান, তিনি আবূ রাফি’ ও তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। আর মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) মাত্বার সূত্রে হাসানের পক্ষ থেকে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: "যদিও বীর্যপাত না ঘটে।"
আর তাঁর (অন্য হাদীসে) বাণী 'আল-খিতানান' (দু'টি খতনাস্থল) দ্বারা উদ্দেশ্য হলো পুরুষ ও নারীর খতনাস্থল। আর নারীর খতনাস্থল হলো তার যৌনাঙ্গের উপরের অংশে মোরগের ঝুঁটির মতো একটি সামান্য চামড়া কর্তন করা, যা যোনিপথের প্রবেশদ্বার থেকে সামান্য দূরত্বে একটি পাতলা চামড়া দ্বারা আবৃত থাকে।
1427 - عن أبي موسى قال: اختلف في ذلك رَهْطٌ من المهاجرين والأنصار، فقال الأنصار: لا يجب الغسل إلا من الدَّفْق أو من الماء، وقال المهاجرون: بل إذا خَالط فقد وجب الغُسْلُ. قال أبو موسى: فأنا أشْفيكم من ذلك، فقمتُ فاستأْذَنْتُ على عائشة، فأُذِن لي، فقلت لها: يا أُمّاه! - أو يا أمَّ المؤمنين! - إني أريد أن أسألكِ عن شيء، وإني أَستحْييكِ، فقالت: لا تَسْتَحْي أن تَسألني عما كنتَ سائلًا عنه أمَّك التي ولدتْك؛ فإنما أنا أمُّك. قلت: فما يُوجِب الغُسْلَ؟ قالت: على الخَبير سَقَطْتَ؛ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا جلس بين شُعَبِها الأرْبَع، ومَسَّ الختانُ الخِتانَ فقد وجب الغُسْلُ".
صحيح: رواه مسلم (344) من طرق عن هشام بن حسان، عن حميد بن هلال، عن أبي بردة، عن أبي موسى فذكره. وجاء في آخر الإسناد: ولا أعلمه إلا عن أبي بردة.
فتردد في وصل إسناده. قال الدارقطني: صحيح غريب تفرد به هشام بن حسان، عن حميد. قلت: لعل البخاري أعرض عن إخراجه لهذا السبب.
وقوله:"إذا جلس بين شُعَبِها الأربع" قبل: هي اليدان والرجلان، وقيل: بين رِجلَيها وشَفَريها، وقيل: رجليها وفخذيها.
وقوله:"جهدها" من جهدتُه أجهدتُه، إذا أتْعَبتُه، والمراد: مباشرته إياها.
আবু মুসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মুহাজিরীন ও আনসারদের একটি দল এ বিষয়ে মতভেদ করলেন। আনসারগণ বললেন: গোসল কেবল বীর্যস্খলন বা (বীর্যের) পানি নির্গত হলেই ফরয হবে। আর মুহাজিরগণ বললেন: বরং যখনই সংমিশ্রণ ঘটবে, তখনই গোসল ফরয হবে। আবু মুসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তোমাদেরকে এ বিষয়ে সঠিক সমাধান দেব। আমি দাঁড়িয়ে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করার অনুমতি চাইলাম। আমাকে অনুমতি দেওয়া হলো। আমি তাঁকে বললাম: হে আমার আম্মা! — অথবা হে মুমিনদের মাতা! — আমি আপনাকে একটি বিষয় জিজ্ঞেস করতে চাই, তবে আমি আপনাকে জিজ্ঞেস করতে সঙ্কোচ বোধ করছি। তিনি (আয়িশা) বললেন: তোমার জন্মদাত্রী মাকে তুমি যে বিষয়ে জিজ্ঞেস করতে সঙ্কোচ বোধ করো না, সে বিষয়ে আমাকে জিজ্ঞেস করতেও সঙ্কোচ করো না; কেননা আমিও তো তোমার মা। আমি বললাম: কিসে গোসল ফরয করে? তিনি বললেন: তুমি অভিজ্ঞজনের কাছেই এসেছো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন সে (পুরুষ) তার (নারীর) চার শাখার মাঝখানে বসে পড়ে এবং খিতান (লিঙ্গমুণ্ড) খিতানকে (যোনির মুখ) স্পর্শ করে, তখন অবশ্যই গোসল ফরয হয়ে যায়।"
