আল-জামি` আল-কামিল
14408 - عن عبد الله بن عمر بن الخطاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ من الشّجر شجرةً لا يسقط ورقُها، وإنّها مثل المسلم، فحدّثوني ما هي؟". فوقع النّاسُ في شجر البوادي. قال عبد الله بن عمر: ووقع في نفسي أنّها النّخلة، فاستحييتُ، ثم قالوا: حدّثنا ما هي يا رسول الله! قال:"هي النّخلة".
وفي رواية:"أخبروني شجرة مثلُها مَثَلُ المسلم، تُؤتي أكلها كلَّ حين بإذن ربِّها، ولا تحت ورقها" فوقع في نفسي: النّخلة، فكرهتُ أن أتكلّم وثمَّ أبو بكر وعمر، فلما لم يتكلما قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"هي النّخلة". فلما خرجتُ مع أبي قلت: يا أبتاه، وقع في نفسي النّخلة. قال: ما منعك أن تقولها؟ لو كنتَ قلتَها كان أحبّ إليَّ من كذا وكذا. قال: ما منعني إلا أني لم أرك ولا أبا بكر تكلمتما فكرهت".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (61)، ومسلم في صفات المنافقين (2811) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا إسماعيل بن جعفر، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.
والرواية الثانية عند البخاريّ (6144) من وجه آخر عن نافع، عن ابن عمر.
আব্দুল্লাহ ইবনু উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই বৃক্ষসমূহের মধ্যে এমন একটি বৃক্ষ আছে যার পাতা ঝরে পড়ে না। আর তা একজন মুসলমানের মতোই। তোমরা আমাকে বলো, সেটি কী?"
তখন লোকেরা (ধারণা করতে শুরু করল) মরুভূমির বিভিন্ন বৃক্ষের কথা বলতে শুরু করল। আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার মনে আসলো যে, এটি হলো খেজুর গাছ। কিন্তু আমি (লজ্জায়) বলতে পারলাম না। এরপর তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! সেটি কী, আপনিই আমাদের বলে দিন। তিনি বললেন: "সেটি হলো খেজুর গাছ।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমরা আমাকে এমন একটি গাছ সম্পর্কে জানাও যা একজন মুসলমানের মতো। এটি তার প্রতিপালকের নির্দেশে সর্বক্ষণ ফল দান করে এবং এর পাতা ঝরে পড়ে না।" আমার মনে পড়ল যে, সেটি হলো খেজুর গাছ। কিন্তু সেখানে আবূ বকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও উপস্থিত ছিলেন। তাই আমি কথা বলতে দ্বিধা করলাম। যখন তারা দুজনও কোনো কথা বললেন না, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সেটি হলো খেজুর গাছ।" যখন আমি পিতার (উমর ইবনুল খাত্তাব) সাথে বের হলাম, তখন আমি বললাম: হে পিতা! আমার মনে খেজুর গাছের কথাই এসেছিল। তিনি বললেন: তুমি তা বলতে পারতে না কেন? যদি তুমি তা বলতে, তবে সেটা আমার কাছে এত এত কিছুর চেয়েও বেশি প্রিয় হতো। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি কেবল এ কারণেই বলতে পারিনি যে, আমি আপনাকে এবং আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কথা বলতে দেখিনি, তাই আমি সংকোচ বোধ করেছি।
14409 - عن عبد الله بن عمر بن الخطاب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنما مثلكم واليهود والنصارى كرجل استعمل عمالا، فقال: من يعمل لي إلى نصف النهار على قيراط قيراط؟ فعملت اليهود على قيراط قيراط، ثم عملت النصارى على قيراط قيراط، ثم أنتم الذين تعملون من صلاة العصر إلى مغارب الشمس على قيراطين قيراطين، فغضبت اليهود والنصارى، وقالوا: نحن أكثر عملا وأقل عطاء. قال: هل ظلمتكم من حقكم شيئا؟ قالوا: لا. فقال: فذلك فضلي أوتيه من أشاء".
صحيح: رواه البخاري في الإجارة (2269) عن إسماعيل بن أبي أويس قال: حدثني مالك، عن عبد الله بن دينار مولى عبد الله بن عمر، عن عبد الله بن عمر بن الخطاب، فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের, ইহুদিদের এবং খ্রিস্টানদের উদাহরণ হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে শ্রমিকদের কাজে লাগাল। সে বলল: ‘কে আমার জন্য দুপুর পর্যন্ত এক কিরাত এক কিরাত মজুরির বিনিময়ে কাজ করবে?’ এরপর ইহুদিরা এক কিরাত এক কিরাত মজুরির বিনিময়ে কাজ করল। তারপর খ্রিস্টানরা এক কিরাত এক কিরাত মজুরির বিনিময়ে কাজ করল। এরপর তোমরা এলে, যারা আসরের সালাত থেকে সূর্যাস্ত পর্যন্ত দুই কিরাত দুই কিরাত মজুরির বিনিময়ে কাজ করছ। এতে ইহুদি ও খ্রিস্টানরা অসন্তুষ্ট হলো এবং তারা বলল: ‘আমরা কাজে বেশি করেছি, কিন্তু পারিশ্রমিক পেয়েছি কম।’ তিনি (নিয়োগকারী) বললেন: ‘আমি কি তোমাদের প্রাপ্য হক থেকে সামান্য কিছুও কম দিয়েছি?’ তারা বলল: ‘না।’ তখন তিনি বললেন: ‘এটা আমার অনুগ্রহ, আমি যাকে ইচ্ছা তাকে তা দান করি’।"
14410 - عن أبي هريرة أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنما مثلي ومثل الناس كمثل رجل استوقد نارا، فلما أضاءت ما حوله جعل الفراش وهذه الدواب التي تقع في النار يقعن فيها، فجعل ينزعهن ويغلبنه فيقتحمن فيها، فأنا آخذ بحجزكم عن النار، وأنتم تقحمون فيها".
متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6483)، ومسلم في الفضائل (2284: 17) كلاهما من طريق أبي الزناد، عن عبد الرحمن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. واللفظ للبخاري.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমার এবং মানুষের দৃষ্টান্ত হলো এমন একজন ব্যক্তির মতো, যে আগুন জ্বালালো। অতঃপর যখন আগুন তার চারপাশ আলোকিত করল, তখন পতঙ্গেরা এবং আগুনের দিকে ধাবমান ছোট ছোট প্রাণী তাতে ঝাঁপিয়ে পড়তে শুরু করল। লোকটি তাদের সরাতে লাগল, কিন্তু তারা তার বাধা উপেক্ষা করে (জোরপূর্বক) তাতে ঝাঁপিয়ে পড়ছিল। আমিও তোমাদের কোমরের কাপড় ধরে তোমাদেরকে আগুন থেকে রক্ষা করার চেষ্টা করছি, অথচ তোমরা তাতে ঝাঁপিয়ে পড়ছো।"
14411 - عن عبد الله بن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنما الناس كالإبل المائة، لا تكاد تجد فيها راحلة".
متفق عليه: رواه البخاري في الرقاق (6498)، ومسلم في البر والصلة (2547: 232) كلاهما من طريق الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، قال: فذكره.
وفسّر القرطبي معنى الحديث بقوله: الذي يناسب التمثيل أن الرجل الجواد الذي يحمل أثقال الناس، والحمالات عنهم، ويكشف كربهم عزيز الوجود كالراحلة في الإبل الكثيرة.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “মানুষ হলো একশ উটের মতো, যার মধ্যে আরোহণের জন্য একটি ভালো বাহন (রাহিলা) খুঁজে পাওয়াই দুষ্কর।”
14412 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول صلى الله عليه وسلم:"مثل أمتي مثل المطر، لا يُدرى أوله خير أو آخره".
حسن: رواه الترمذي (2869)، وأحمد (12327)، والبزار (6896) كلهم من طريق حماد بن يحيى الأبَح، عن ثابت، عن أنس، قال: فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب من هذا الوجه، ورُوي عن عبد الرحمن بن مهدي أنه كان يُثبّت حماد بن يحيى الأبح وكان يقول: هو من شيوخنا".
وإسناده حسن من أجل حماد بن يحيى الأبح وهو حسن الحديث.
وقال البزار:"هذا الحديث لا نعلم رواه عن ثابت، عن أنس إلا حماد بن يحيى - ولم يكن بالقوي -، وقد حدّث عنه المتقدمون".
قلت: ولم يتفرد به حماد بن يحيى بل توبع، رواه الرامهرمزي في الأمثال (69) من طريق عبيد بن مسلم صاحب السابري عن ثابت به.
وعبيد بن مسلم روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في الثقات فهو لا بأس به في المتابعات، ولذا قال الحافظ في الفتح (7/ 8):"هذا حديث حسن، له طرق يرتقي بها إلى الصحة".
ورواه أحمد (12462) عن حسن بن موسى، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت وحميد ويونس، عن الحسن به مرسلا.
وسئل أحمد عن هذا الحديث فقال:"الصواب مرسل".
قلت: لا شك أن حماد بن سلمة من أثبت الناس في ثابت لكن رواية الاثنين تقوّي أيضا جانب الوصل، فلعل ثابتا حدّثَ على الوجهين.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের উপমা হলো বৃষ্টির মতো, যার প্রথম ভাগ ভালো, নাকি শেষ ভাগ ভালো—তা জানা যায় না।"
14413 - عن عمار بن ياسر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مثل أمتي مثل المطر، لا يُدرى أوله خيرٌ أم آخره".
حسن: رواه البزار (1412)، وابن حبان (7226) كلاهما من طريق الفضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، عن عبيد بن سليمان الأغر، عن أبيه، عن عمار بن ياسر قال: فذكره.
والفضيل بن سليمان هو النميري تكلم فيه أهل العلم وهو ضعيف الحديث، ولكن للحديث إسناد آخر يقوّيه.
وهو ما رواه أحمد (18881) عن عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا زياد أبو عمر، عن الحسن، عن عمار بن ياسر به.
وهذا الإسناد منقطع لأن الحسن البصري مدلس وقد عنعن، وهو لم يسمع من عمار بن ياسر.
وله إسناد آخر: رواه الطيالسي (682) عن عمران هو القطان، عن قتادة، حدثنا صاحب لنا، عن عمار، فذكره. والراوي عن عمار مجهول.
والحديث بهذه الطرق يرتقي إلى درجة الحسن إنْ شاء الله.
وفي الباب أحاديث أخرى من مسند عمران بن حصين، وعبد الله بن عمر، وعبد الله بن عمرو بن العاص، وفي كل منها مقال.
والحديث يُحمل على من جاء بعد:"خير القرون" المنصوص ذكرهم في الأحاديث الصحيحة، وأنهم بلا شك أفضل هذه الأمة، فلا بد أن يُحمل هذا الحديث على غيرهم.
وقال ابن حبان:"عموم هذا الخطاب أريد به بعضُ الأمة لا الكل.
وقال العلائي: والأحاديث الثابتة في تفضيل الصحابة على من بعدهم صريحة لا تحتمل التأويل، وهي أصح وأكثر من هذه الأحاديث المحتملة فلا تكون معارضة".
وهذا الذي قاله هو الحق فلا بد من الاستثناء الذي ذكرتُه ليستقيم معنى الحديثين، وهذا الحديث يُعدّ من دلائل النبوة، فإن الواقع يشهد بذلك.
আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের উদাহরণ হলো বৃষ্টির মতো। জানা যায় না এর প্রথমটা কল্যাণকর, নাকি এর শেষটা।"
14414 - عن * *
১৪৪১৪ - থেকে * *
14415 - عن النعمان بن بشير، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"مثل القائم على حدود الله والواقع فيها، كمثل قوم استهموا على سفينة، فأصاب بعضهم أعلاها وبعضهم أسفلها، فكان الذين في أسفلها إذا استقوا من الماء مروا على من فوقهم، فقالوا: لو أنا خرقنا في نصيبنا خرقا ولم نؤذ من فوقنا، فإن يتركوهم وما أرادوا هلكوا جميعا، وإن أخذوا على أيديهم نجوا، ونجوا جميعا".
صحيح: رواه البخاري في الشركة (2493) عن أبي نعيم، حدثنا زكرياء، قال: سمعت عامرا، يقول: سمعت النعمان بن بشير يقول: فذكره.
নু'মান ইবনে বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ্র নির্ধারিত সীমা রক্ষাকারী এবং তাতে লিপ্ত ব্যক্তির উদাহরণ হলো এমন একদল লোকের মতো, যারা একটি জাহাজে স্থান গ্রহণের জন্য লটারি করলো। ফলে তাদের কেউ পেলো জাহাজের উপরের অংশ এবং কেউ পেলো নিচের অংশ। নিচের অংশে যারা ছিলো, তারা যখন পানি নিতো, তখন তারা উপরের অংশে যারা ছিলো তাদের পাশ দিয়ে যেত। তখন তারা (নিচের অংশের লোকেরা) বললো: 'যদি আমরা আমাদের অংশে একটি ছিদ্র করে নেই এবং উপরের লোকদের কষ্ট না দেই (তবে কেমন হয়)।' যদি তারা তাদের এ কাজটি করার সুযোগ দেয়, তবে সবাই ধ্বংস হয়ে যাবে। আর যদি তারা তাদের হাত ধরে (অর্থাৎ বাধা দেয়), তবে তারা নিজেরা রক্ষা পাবে এবং সকলে রক্ষা পাবে।"
14416 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من رأى منكم منكرًا فليغيره بيده، فإن لم يستطع فبلسانه، فإن لم يستطع فبقلبه، وذلك أضعف الإيمان".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (49) من طرق عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب قال: أوّل من بدأ بالخطبة يوم العيد قبل الصلاة مروان فقام إليه رجلٌ فقال: الصلاة قبل الخطبة. فقال: قد تُرك ما هنالك. فقال أبو سعيد: أمّا هذا فقد قضى ما عليه، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكر الحديث.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “তোমাদের মধ্যে যে কেউ কোনো মন্দ কাজ (মুনকার) দেখবে, সে যেন তার হাত দিয়ে তা পরিবর্তন করে দেয়। যদি সে তাতে সক্ষম না হয়, তবে তার জিহ্বা দিয়ে (পরিবর্তন করবে)। আর যদি সে তাতেও সক্ষম না হয়, তবে তার অন্তর দিয়ে (ঘৃণা করবে)। আর এটা হলো ঈমানের দুর্বলতম স্তর।”
14417 - عن عبد الله بن مسعود، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من نبيّ بعثه الله في أمّة قبلي إلّا كان له من أمّته حواريّون وأصحاب يأخذون بسنته، ويقتدون بأمره، ثم إنّها تخلفُ من بعدهم خلوف، يقولون ما لا يفعلون، ويفعلون ما لا يؤمرون، فمن جاهدهم بيده فهو مؤمن، ومن جاهدهم بلسانه فهو مؤمن، ومن جاهدهم بقلبه فهو مؤمن. وليس وراء ذلك من الإيمان حبّةُ خردل".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (50) من طرق عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، قال: حدثني أبي، عن صالح بن كيسان، عن الحارث، عن جعفر بن عبد الله بن الحكم، عن عبد الرحمن بن المسور، عن أبي رافع، عن ابن مسعود، فذكره.
আবদুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার পূর্বে আল্লাহ তা’আলা যে কোনো উম্মতের নিকটই কোনো নবীকে প্রেরণ করেছেন, তার উম্মতের মধ্যে তার কিছু একান্ত সহযোগী (হাওয়ারি) এবং সঙ্গী ছিল, যারা তাঁর সুন্নাতকে গ্রহণ করত এবং তাঁর নির্দেশের অনুসরণ করত। এরপর তাদের পরে এমন কিছু লোক আসবে, যারা যা করে না, তা বলবে; আর যা করতে নির্দেশ দেওয়া হয়নি, তাই করবে। সুতরাং যে তাদের সাথে স্বহস্তে জিহাদ করবে, সে মুমিন; আর যে তাদের সাথে স্বীয় জিহ্বা দ্বারা জিহাদ করবে, সে মুমিন; আর যে তাদের সাথে স্বীয় অন্তর দ্বারা জিহাদ করবে, সে মুমিন। আর এর বাইরে (ঈমানের) সরিষা দানা পরিমাণও অবশিষ্ট নেই।"
14418 - عن قيس بن أبي حازم قال: قام أبو بكر، فحمد الله وأثنى عليه، ثم قال: يا أيها
الناس! إنكم تقرؤون هذه الآية {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا عَلَيْكُمْ أَنْفُسَكُمْ لَا يَضُرُّكُمْ مَنْ ضَلَّ إِذَا اهْتَدَيْتُمْ} [المائدة: 105] وإنا سمعنا رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الناس إذا رأوا المنكر لا يغيرونه أوشك أن يعمهم الله بعقابه".
صحيح: رواه أبو داود (4338)، والترمذي (2168)، وابن ماجه (4005)، والنسائي في الكبرى (11092)، وأحمد (1)، وصحّحه ابن حبان (304) كلهم من طرق عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، فذكره. وإسناده صحيح.
وفي الباب عن أمية الشعباني قال: سألت أبا ثعلبة الخشني، فقلت: يا أبا ثعلبة! كيف تقول في هذه الآية: {عَلَيْكُمْ أَنْفُسَكُمْ}؟ قال: أما والله! لقد سألت عنها خبيرا، سألت عنها رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"بل ائتمروا بالمعروف، وتناهوا عن المنكر، حتى إذا رأيت شحا مطاعا، وهوى متبعا، ودنيا مؤثرة، وإعجاب كل ذي رأي برأيه، فعليك - يعني - بنفسك، ودع عنك العوام، فإن من ورائكم أيام الصبر، الصبر فيه مثل قبض على الجمر، للعامل فيهم مثل أجر خمسين رجلا يعملون مثل عمله"، وزادني غيره قال: يا رسول الله! أجر خمسين منهم؟ قال:"أجر خمسين منكم".
رواه أبو داود (4341)، والترمذي (3058)، وابن ماجه (4014)، وابن حبان (385) كلهم من حديث عتبة بن أبي حكيم، قال: حدثني عمرو بن جارية اللخمي، حدثني أبو أمية الشعباني، فذكره.
وفيه عمرو بن جارية لم يوثقه غير ابن حبان. ولذا قال الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أجد له متابعا. وكذا شيخه أبو أمية لم يوثقه غير ابن حبان.
وفي معناه ما روي عن جرير بن عبد الله أن نبي الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من قوم يُعمل فيهم المعاصي هم أعز وأكثر ممن يعمله لم يغيروه إلا عمّهم الله بعقاب".
رواه أحمد (19230) من طريق شعبة، وابن ماجه (4009)، وأحمد (19253) من طريق إسرائيل، وأبو داود (4339)، وابن حبان (300، 302) من طريق أبي الأحوص سلام بن سليم، كلهم عن أبي إسحاق، عن عبيد الله بن جرير، عن أبيه، فذكره. إلا أن أبا داود قال:"عن ابن الجرير" ولم يسمه.
وعبيد الله بن جرير بن عبد الله البجلي لم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعا.
لكن سمى شريكٌ شيخَ أبي إسحاق:"المنذر بن جرير" رواه أحمد (19192) من طريق شريك، عن أبي إسحاق، عن المنذر بن جرير، عن أبيه، فذكره.
وهذا وهمٌ فإن شريك سيء الحفظ، والصواب ما رواه شعبة وإسرائيل ومن تابعهما.
আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি দাঁড়িয়ে আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন, অতঃপর বললেন: হে লোক সকল! তোমরা এই আয়াতটি পাঠ করে থাকো: "হে মুমিনগণ! তোমাদের উপর তোমাদের নিজেদের দায়িত্ব। কেউ পথভ্রষ্ট হলে তোমাদের কোনো ক্ষতি নেই, যদি তোমরা সঠিক পথে থাকো।" (সূরা আল-মায়েদা: ১০৫)। কিন্তু আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যখন লোকেরা কোনো মন্দ কাজ দেখতে পায়, অথচ তারা তা পরিবর্তন করে না, তখন অচিরেই আল্লাহ তাদের সকলকে তাঁর শাস্তি দ্বারা আচ্ছন্ন করে দেবেন।"
উমাইয়াহ আশ-শা'বানী (রহ.) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আবূ সা’লাবাহ আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, হে আবূ সা’লাবাহ! আপনি এই আয়াত সম্পর্কে কী বলেন: {তোমাদের উপর তোমাদের নিজেদের দায়িত্ব}? তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আমি এ বিষয়ে একজন অভিজ্ঞ ব্যক্তির নিকট জিজ্ঞাসা করেছিলাম—আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তিনি বলেছিলেন: "বরং তোমরা সৎকাজের আদেশ দিতে থাকো এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করতে থাকো। এমনকি যখন তোমরা দেখবে কৃপণতা আনুগত্য লাভ করেছে, প্রবৃত্তির অনুসরণ করা হচ্ছে, দুনিয়াকে প্রাধান্য দেওয়া হচ্ছে এবং প্রত্যেক মতাবলম্বী নিজ নিজ মত নিয়ে আত্মতৃপ্ত, তখন—অর্থাৎ—তোমার নিজের কর্তব্য পালন করো এবং সাধারণ লোকেদেরকে ছেড়ে দাও। কারণ, তোমাদের সামনে ধৈর্যের যুগ আসছে। সেই যুগে ধৈর্যধারণ করা জ্বলন্ত অঙ্গার মুষ্টিবদ্ধ করে রাখার মতো। সে সময় যারা সৎকর্ম করবে, তাদের জন্য তোমাদের ৫০ জন লোকের কাজের সমপরিমাণ সওয়াব রয়েছে।" বর্ণনাকারী আরো যোগ করেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! তাদের মধ্য থেকে ৫০ জনের সওয়াব? তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্য থেকে ৫০ জনের সওয়াব।"
এরই সমার্থবোধক একটি বর্ণনায় জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে জনপদের মধ্যে পাপাচার সংঘটিত হয়, অথচ যারা পাপাচার করছে তাদের চেয়েও শক্তিশালী ও সংখ্যাগরিষ্ঠ হওয়া সত্ত্বেও তারা তা পরিবর্তন করে না, আল্লাহ অবশ্যই তাদের সকলকে শাস্তি দ্বারা আচ্ছন্ন করে দেন।"
14419 - عن العرس ابن عميرة الكندي، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا عملت الخطيئة في الأرض، كان من شهدها فكرهها - وقال مرة:"أنكرها" - كان كمن غاب عنها،
ومن غاب عنها فرضيها، كان كمن شهدها".
حسن: رواه أبو داود (4345)، والطبراني في الكبير (17/ 139) كلاهما من طريق أبي بكر بن عياش، حدثنا مغيرة بن زياد الموصلي، عن عدي بن عدي، عن العرس بن عميرة الكندي، فذكره.
وإسناده حسن من أجل المغيرة بن زياد الموصلي وأبي بكر بن عياش فإنهما حسنا الحديث، وقد روي مرسلا عند أبي داود (4346)، والحكم لمن وصل.
আল-ইরস ইবনে উমাইরাহ আল-কিন্দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন যমীনে কোনো পাপ কাজ করা হয়, তখন যে ব্যক্তি তা প্রত্যক্ষ করল কিন্তু ঘৃণা করল – (অন্য বর্ণনায় আছে, 'তা অস্বীকার করল') – সে যেন অনুপস্থিত ছিল। আর যে ব্যক্তি অনুপস্থিত থেকেও তাতে সন্তুষ্ট হলো, সে যেন তা প্রত্যক্ষ করল।"
14420 - عن أبي البختري قال: أخبرني من سمعه من رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"لن يهلك الناس حتى يعذروا من أنفسهم".
صحيح: رواه أبو داود (4347)، وأحمد (18289) كلاهما من طرق عن شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري الطائي، فذكره. وإسناده صحيح.
قوله:"يعذروا من أنفسهم" يقال: أعذر فلان من نفسه إذا أمكن منها يعني أنهم لا يهلكون حتى تكثر ذنوبهم وعيوبهم، فيستوجبون العقوبة، ويكون لمن يعذبهم عذر. قاله صاحب النهاية.
আবূল বাখতারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এটি বলতে শুনেছেন, তিনি আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ ততক্ষণ পর্যন্ত ধ্বংস হবে না যতক্ষণ না তারা নিজেরাই নিজেদের পক্ষ থেকে ওজরবিহীন হয়ে পড়ে।"
14421 - عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى الله عليه وسلم: قال:"كيف بكم وبزمان يوشك أن يأتي يُغربل الناس فيه غربلة، وتبقى حثالة من الناس، قد مرجت عهودهم وأماناتهم، فاختلفوا، وكانوا هكذا؟" - وشبك بين أصابعه - قالوا: كيف بنا يا رسول الله! إذا كان ذلك؟ قال:"تأخذون بما تعرفون، وتدعون ما تنكرون، وتقبلون على خاصتكم، وتذرون أمر عوامكم".
صحيح: رواه أبو داود (4342)، وابن ماجه (3957)، وأحمد (7063)، وصحّحه الحاكم (4/ 435) كلهم من طريق أبي حازم، عن عمارة بن عمرو بن حزم، عن عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد" وهو كما قال.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কী অবস্থা হবে এমন এক যুগে যা অচিরেই আগমন করবে— যখন মানুষদেরকে ছাঁকা হবে (যেমন চালনি দিয়ে ছাঁকা হয়), এবং বাকি থাকবে কিছু নিকৃষ্ট মানুষ, যাদের ওয়াদা ও আমানত মিশ্রিত হয়ে যাবে (নষ্ট হয়ে যাবে), ফলে তারা মতভেদ করবে এবং তারা এরকম হয়ে যাবে?" – এই বলে তিনি তাঁর আঙ্গুলগুলো একটির সাথে আরেকটি মিলিয়ে ধরলেন। তাঁরা বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! যখন এমন হবে, তখন আমাদের কী করণীয়? তিনি বললেন, "তোমরা যা ভালো বলে জানো তা গ্রহণ করবে এবং যা মন্দ বলে অস্বীকার করো তা পরিত্যাগ করবে, আর তোমরা তোমাদের নিজেদের (বিশেষ) বিষয়গুলোর প্রতি মনোযোগী হবে এবং সাধারণ মানুষের বিষয় ছেড়ে দেবে।"
14422 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: بينما نحن حول رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ ذكر الفتنة، فقال:"إذا رأيتم الناس قد مرجت عهودهم، وخفت أماناتهم، وكانوا هكذا" وشبك بين أصابعه، قال: فقمت إليه، فقلت: كيف أفعل عند ذلك، جعلني الله فداك؟ قال:"الزم بيتك، واملك عليك لسانك، وخذ بما تعرف، ودع ما تنكر، وعليك بأمر خاصة نفسك، ودع عنك أمر العامة".
حسن: رواه أبو داود (4343)، وأحمد (6987)، والحاكم (4/ 282) كلهم من طريق يونس بن أبي إسحاق، عن هلال بن خباب أبي العلاء، قال: حدثني عكرمة، حدثني عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل يونس بن أبي إسحاق وهلال بن خباب فإنهما حسنا الحديث.
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আশেপাশে ছিলাম, যখন তিনি ফিতনা (বিশৃঙ্খলা) সম্পর্কে আলোচনা করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "যখন তোমরা দেখবে মানুষের অঙ্গীকারগুলি মিশ্রিত হয়ে গেছে (বা দুর্বল হয়ে গেছে), তাদের আমানত (বিশ্বাস/নিরাপত্তা) দুর্বল হয়ে গেছে, এবং তারা এমন হয়ে গেছে"— এই বলে তিনি তাঁর আঙ্গুলগুলিকে পরস্পরের সাথে জড়িয়ে দিলেন।
তিনি (আব্দুল্লাহ) বলেন, তখন আমি তাঁর কাছে দাঁড়িয়ে বললাম: আল্লাহ্ আমাকে আপনার প্রতি উৎসর্গ করুন! তখন আমি কী করব?
তিনি বললেন: "তুমি তোমার ঘরে অবস্থান করো, তোমার জিহবাকে নিয়ন্ত্রণে রাখো, যা তুমি ভালো বলে জানো তা গ্রহণ করো, যা তুমি মন্দ বলে অস্বীকার করো তা পরিহার করো এবং তোমার নিজের বিশেষ (ব্যক্তিগত) বিষয় নিয়ে ব্যস্ত থাকো, আর সাধারণ মানুষের বিষয় (সমস্যা) ছেড়ে দাও।"
14423 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كيف أنت يا عبد الله! إذا بقيت في حثالة من الناس"؟ قال: وذاك ما هم يا رسول الله؟ قال:"ذاك إذا مرجت أماناتهم وعهودهم، وصاروا هكذا" وشبك بين أصابعه قال: فكيف بي يا رسول الله؟ قال:"تعمل ما تعرف، ودع ما تنكر، وتعمل بخاصة نفسك، وتدع عوام الناس".
حسن: رواه ابن حبان (5950، 5951)، والطحاوي في شرح المشكل (1182، 1183)، والطبراني في الأوسط (2797) كلهم من طريق العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل العلاء بن عبد الرحمن فإنه حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "হে আবদুল্লাহ! যখন তুমি সমাজের নিকৃষ্ট (বা: তুচ্ছ) লোকেদের মাঝে অবশিষ্ট থাকবে, তখন তোমার অবস্থা কেমন হবে?" তিনি (আবূ হুরায়রা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তারা কেমন হবে? (বা: তাদের অবস্থা কী?) তিনি বললেন: "তারা হল, যখন তাদের আমানত ও অঙ্গীকারসমূহ নষ্ট হয়ে যাবে এবং তারা এমন হয়ে যাবে।" এই বলে তিনি তাঁর আঙুলগুলো পরস্পরের মধ্যে প্রবেশ করালেন। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তখন আমার জন্য কী করণীয় হবে? তিনি বললেন: "যা তুমি ভালো বলে জানো, তা পালন করবে এবং যা মন্দ বলে অস্বীকার করো, তা ত্যাগ করবে। তুমি নিজের ব্যাপারে কাজ করবে এবং সাধারণ মানুষকে (তাদের অবস্থার উপর) ছেড়ে দেবে।"
14424 - عن عائشة، قالت: دخل علي النبي صلى الله عليه وسلم، فعرفت في وجهه أن قد حضره شيء، فتوضأ، وما كلم أحدا، ثم خرج، فلصقت بالحجرة أسمع ما يقول، فقعد على المنبر، فحمد الله وأثنى عليه، ثم قال:"يا أيها الناس! إن الله تبارك وتعالى يقول لكم: مروا بالمعروف، وانهوا عن المنكر، قبل أن تدعوني، فلا أجيبكم، وتسألوني فلا أعطيكم، وتستنصروني فلا أنصركم"، فما زاد عليهن حتى نزل.
حسن: رواه أحمد (25255)، وابن حبان (290)، وابن ماجه (4004) كلهم من طريق عمرو بن عثمان بن هانئ، عن عاصم بن عمر بن عثمان، عن عروة، عن عائشة، فذكرته. والسياق لابن حبان، وسياق أحمد قريب منه، عند ابن ماجه باختصار.
وعاصم بن عمر بن عثمان لم يرو عنه إلا عمرو بن عثمان بن هانئ ولذا قال المزي:"مجهول".
وعمرو بن عثمان بن هانئ - ويقال: عثمان بن عمرو بن هانئ كما في مسند أحمد، روى عنه أكثر من واحد، وذكره ابن حبان في الثقات.
وله طريق آخر: رواه البخاري في التاريخ الكبير (6/ 178) عن قتيبة، حدثنا عبد الحميد بن سليمان، عن عمر بن عثمان بن الهدير، عن عروة، عن عائشة.
وعمر بن عثمان بن الهدير لا يعرف حاله إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، وبالإسنادين يصير الحديث حسنا.
وبمعناه أيضا عن حذيفة بن اليمان، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده لتأمرن بالمعروف، ولتنهون عن المنكر، أو ليوشكن الله أن يبعث عليكم عقابا منه، ثم تدعونه، فلا يستجاب لكم".
رواه الترمذي (2169)، وأحمد (23301)، والبيهقي (10/ 93) كلهم من طريق عمرو بن أبي
عمرو، عن عبد الله بن عبد الرحمن الأشهلي الأنصاري، عن حذيفة بن اليمان، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن".
قلت: عبد الله بن عبد الرحمن الأشهلي الأنصاري مجهول، تفرد بالرواية عنه عمرو بن أبي عمرو، ولم يوثقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته على قاعدته في توثيق من لم يعرف فيه الجرح، وقال ابن معين:"لا أعرفه"، وقال الذهبي في الميزان:"له حديث منكر".
وفي معناه أيضا روي عن أبي هريرة، وأنس، وابن عمر وغيرهم ولا تخلو من مقال، ومجموعها يدل على أن له أصلا.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন। আমি তাঁর চেহারা দেখে বুঝতে পারলাম যে কোনো গুরুত্বপূর্ণ বিষয় তাঁকে চিন্তিত করেছে। তিনি উযু করলেন এবং কারো সাথে কোনো কথা বললেন না। এরপর তিনি (ঘর থেকে) বেরিয়ে গেলেন। তিনি কী বলেন তা শোনার জন্য আমি (তাঁর হুজরার) দেয়ালের সাথে ঘেঁষে দাঁড়ালাম। তিনি মিম্বরে বসলেন, আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: "হে লোক সকল! নিশ্চয় আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তোমাদেরকে বলছেন: তোমরা সৎ কাজের আদেশ দাও এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করো। (যদি তা না করো) তবে এমন সময় আসার পূর্বে যে তোমরা আমাকে ডাকবে কিন্তু আমি তোমাদের ডাকে সাড়া দেব না, আমার কাছে চাইবে কিন্তু আমি তোমাদেরকে দেব না, এবং আমার কাছে সাহায্য চাইবে কিন্তু আমি তোমাদেরকে সাহায্য করব না।" তিনি মিম্বর থেকে নেমে আসা পর্যন্ত এর অতিরিক্ত আর কিছুই বললেন না।
14425 - عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يمنعن أحدكم مخافة الناس أن يتكلم بحق إذا علمه".
قال: فقال أبو سعيد الخدري: فما زال بنا البلاء حتى قصّرنا وإنا لنبلغ في الشر.
صحيح: رواه أحمد (11869)، وصحّحه ابن حبان (278) كلاهما من طريق شعبة، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه الترمذي (2191) - في أثناء حديث طويل -، وابن ماجه (4007) كلاهما من طريق علي بن زيد جدعان، عن أبي نضرة عنه.
وعلي بن زيد بن جدعان ضعيف ولكنه توبع على الفقرة المذكورة.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কাউকে যেন মানুষের ভয় সত্য কথা বলা থেকে বিরত না রাখে, যখন সে তা জানতে পারে।
তিনি বলেন, অতঃপর আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: বিপদ ক্রমাগত আমাদের উপর আসতে লাগল, যতক্ষণ না আমরা ত্রুটি করলাম (বা সত্য বলা থেকে পিছপা হলাম), এবং আমরা অকল্যাণের দিকে অগ্রসর হলাম।
14426 - عن أبي سعيد الخدري يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن الله ليسأل العبد يوم القيامة حتى يقول: ما منعك إذ رأيت المنكر أن تنكره؟ فإذا لقن الله عبدا حجته قال: يا رب! رجوتك وفرِقت من الناس".
حسن: رواه ابن ماجه (4017)، وأحمد (11735)، وصحّحه ابن حبان (7368) كلهم من حديث يحيى بن سعيد، حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن أبو طوالة، حدثنا نهار العبدي أنه سمع أبا سعيد الخدري يقول: فذكره.
وإسناده حسن من أجل نهار العبدي فإنه حسن الحديث.
وروي أيضا عن أبي سعيد قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يحقر أحدكم نفسه" قالوا: يا رسول الله! كيف يحقر أحدنا نفسه؟ قال:"يرى أمرا لله عليه فيه مقال، ثم لا يقول فيه، فيقول الله عز وجل له يوم القيامة: ما منعك أن تقول في كذا وكذا؟ فيقول خشية الناس، فيقول: فإياي كنت أحق أن تخشى".
رواه ابن ماجه (4008)، وأحمد (11255) كلاهما من طريق الأعمش، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري، عن أبي سعيد، فذكره.
وأبو البختري هو سعيد بن فيروز الطائي لم يسمع من أبي سعيد الخدري، وبينهما رجل، فقد رواه أحمد (11868) من طريق شعبة، عن عمرو بن مرة، عن أبي البختري، عن رجل، عن أبي سعيد، فذكره.
والقول قول شعبة كما قال الدارقطني في العلل (11/ 354)، وفيه رجل مبهم.
وفي الباب عن عبد الله بن مسعود قال: انتهيت إلى النبي صلى الله عليه وسلم وهو في قبة حمراء من أدم في نحو من أربعين رجلا فقال:"إنكم مفتوح عليكم منصورون ومصيبون فمن أدرك ذلك منكم فليتق الله وليأمر بالمعروف، ولينه عن المنكر، وليصل رحمه، من كذب علي متعمدا فليتبوأ مقعده من النار، ومثل الذي يعين قومه على غير الحق كمثل بعير ردي في بئر فهو ينزع منها بذنبه".
رواه أحمد (3801 و 3694)، وأبو داود (5117، 5118)، والترمذي (2257)، وابن ماجه (30) كلهم من طرق عن سماك بن حرب، عن عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود، عن أبيه، فذكره. والسياق لأحمد في الموضع الأول، ومنهم من اختصره.
وقال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".
قلت: سماع عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود من أبيه محل خلاف، والصحيح أنه لم يسمع من أبيه إلا أربعة أحاديث، وليس هذا منها إلا أن لبعض فقراته أصول صحيحة، وتصحيح الترمذي وغيره يعود إلى أن الحديث من أهل البيت وهم معروفون، وليس فيهم متهم.
فائدة مهمة: الضوابط في الإنكار على المنكر:
قال العلامة ابن القيم في كتابه إعلام الموقعين (3/ 4):"أن النبي صلى الله عليه وسلم شرع لأمته إيجاب إنكار المنكر ليحصل بإنكاره من المعروف ما يحبه الله ورسوله، فإذا كان إنكار المنكر يستلزم ما هو أنكر منه وأبغض إلى الله ورسوله فإنه لا يسوغ إنكاره، وإن كان الله يبغضه ويمقت أهله، وهذا كالإنكار على الملوك والولاة بالخروج عليهم؛ فإنه أساس كل شر وفتنة إلى آخر الدهر.
فإنكار المنكر أربع درجات؛ الأولى: أن يزول ويخلفه ضده، الثانية: أن يقل وإن لم يزل بجملته، الثالثة: أن يخلفه ما هو مثله، الرابعة: أن يخلفه ما هو شر منه؛ فالدرجتان الأوليان مشروعتان، والثالثة موضع اجتهاد، والرابعة محرمة.
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় আল্লাহ কিয়ামতের দিন বান্দাকে প্রশ্ন করবেন, এমনকি বলবেন: যখন তুমি মন্দ কাজ (মুনকার) দেখেছিলে, তখন তা প্রতিহত করতে/অস্বীকার করতে তোমাকে কী বাধা দিয়েছিল? যখন আল্লাহ বান্দাকে তার পক্ষে যুক্তি দেওয়ার সুযোগ দেবেন, তখন সে বলবে: হে রব! আমি আপনার প্রতি আশা রেখেছিলাম এবং আমি মানুষকে ভয় পেয়েছিলাম।"
অন্যত্র আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন নিজেকে হেয় না করে।" সাহাবাগণ বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের কেউ কিভাবে নিজেকে হেয় করতে পারে? তিনি বললেন: "সে এমন কোনো বিষয় দেখে যেখানে আল্লাহর পক্ষ থেকে তার বলার অবকাশ রয়েছে, কিন্তু সে তাতে কোনো কথা বলে না। অতঃপর কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাআলা তাকে বলবেন: অমুক অমুক বিষয়ে কথা বলতে তোমাকে কিসে বাধা দিয়েছিল? সে বলবে: মানুষের ভয়। তখন আল্লাহ বলবেন: তবে আমাকেই ভয় করা তোমার জন্য অধিক হকদার ছিল।"
এই প্রসঙ্গে আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। তিনি তখন চামড়ার তৈরি একটি লাল তাঁবুর ভেতর প্রায় চল্লিশজন লোকের সাথে ছিলেন। তিনি বললেন: "তোমরা বিজয়ী হবে, সাহায্যপ্রাপ্ত হবে এবং সম্পদ লাভ করবে। তোমাদের মধ্যে যে সেই সময় পাবে, সে যেন আল্লাহকে ভয় করে, সৎকাজের আদেশ করে, অসৎকাজ থেকে নিষেধ করে এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখে। যে ব্যক্তি আমার উপর ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা আরোপ করে, সে যেন জাহান্নামে তার স্থান বানিয়ে নেয়। আর যে ব্যক্তি অন্যায়ভাবে তার কওমকে সাহায্য করে, তার উদাহরণ হলো এমন একটি মন্দ উটের মতো, যা কূপে পড়ে গেছে এবং সে তার লেজ দিয়ে সেখান থেকে বের হওয়ার চেষ্টা করছে।"
14427 - عن أسامة بن زيد، قال: قيل له: ألا تدخل على عثمان فتكلمه؟ فقال: أترون
أني لا أكلمه إلا أسمعكم؟ والله! لقد كلمته فيما بيني وبينه، ما دون أن أفتتح أمرا لا أحب أن أكون أول من فتحه، ولا أقول لأحد، يكون علي أميرا: إنه خير الناس بعد ما سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"يؤتى بالرجل يوم القيامة، فيلقى في النار، فتندلق أقتاب بطنه، فيدور بها كما يدور الحمار بالرحى، فيجتمع إليه أهل النار، فيقولون: يا فلان مالك؟ ألم تكن تأمر بالمعروف، وتنهى عن المنكر؟ فيقول: بلى، قد كنت آمر بالمعروف ولا آتيه، وأنهى عن المنكر وآتيه".
متفق عليه: رواه البخاري في الفتن (7098)، ومسلم في الزهد (2989)، واللفظ له، كلاهما من طريق سليمان الأعمش، قال: سمعت أبا وائل شقيق بن سلمة قال: قيل لأسامة بن زيد: ألا تدخل على عثمان … فذكره.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তাঁকে বলা হলো, ‘আপনি কি (খলীফা) উসমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে প্রবেশ করে তার সাথে (রাষ্ট্রীয় বিষয়ে) কথা বলবেন না?’ তিনি বললেন: তোমরা কি মনে করো যে আমি তোমাদের না শুনিয়ে তার সাথে কথা বলি না? আল্লাহর শপথ! আমি অবশ্যই আমার ও তার মাঝে গোপনে তার সাথে কথা বলেছি। আমি এমন কোনো ফিতনা বা কাজ শুরু করতে চাই না, যার প্রথম প্রবর্তক আমি হতে অপছন্দ করি। আর আমি এমন কোনো শাসককে জনগণের মধ্যে সর্বশ্রেষ্ঠ বলতে প্রস্তুত নই, কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কিয়ামতের দিন এক ব্যক্তিকে আনা হবে এবং তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে। তখন তার পেটের নাড়িভুঁড়ি বের হয়ে যাবে। সে এগুলো নিয়ে এমনভাবে ঘুরতে থাকবে, যেমন গাধা যাঁতাকলের চারদিকে ঘোরে। তখন জাহান্নামের অন্যান্য বাসিন্দারা তার কাছে সমবেত হয়ে বলবে, হে অমুক! তোমার কী হয়েছে? তুমি কি (দুনিয়াতে) সৎকাজের আদেশ দিতে না এবং অসৎকাজ থেকে নিষেধ করতে না? সে বলবে: হ্যাঁ, (আমি করতাম), কিন্তু আমি সৎকাজের আদেশ দিতাম অথচ আমি নিজে তা করতাম না, আর আমি অসৎকাজ থেকে নিষেধ করতাম অথচ আমি নিজে তা করতাম।"