আল-জামি` আল-কামিল
1441 - عن أبي جعفر محمد الباقر قال: قال لي جابر: وأتاني ابن عمك - يُعَرِّضُ بالحسن بن محمد ابن الحنفية - قال: كيف الغسلُ من الجنابة؟ فقلتُ: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأخذ ثلاثةَ أَكُفٍّ ويُفِيضُها على رأسه، ثم يُفِيضُ على سائِر جَسَده، فقال لي الحسن: إني رجلٌ كثير الشَّعْرِ، فقلت: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أكثْرَ منك شعرًا.
وفي رواية: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يفرغ على رأسه ثلاثًا.
متفق عليه: أخرجه البخاريّ في الغسل (256) من طريق معمر بن يحيى بن سام، حَدَّثَنِي أبو جعفر به، ورواه مسلم في الحيض (329) من وجه آخر عن جعفر، عن أبيه (وهو محمد المعروف بالباقر) عن جابر وفيه: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا اغتسل من الجنابة صَبَّ على رأسه ثلاث حَفناتٍ من ماء. فقال له الحسن بن محمد (ابن الحنفية): إنَّ شعري كثير. قال جابر: فقلت له: يا ابن أخي؟ كان شعرُ رسول الله صلى الله عليه وسلم أكثر من شعرك وأطيبَ. وعند البخاريّ (255) من طريق مِخْولِ بن راشد، عن محمد بن عليّ، عن جابر: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يُفْرغُ على رأسه ثلاثًا.
وفي رواية عند البخاريّ (252): قال محمد الباقر: إنه كان عند جابر هو وأبوه، وعنده قوم، فسألوه عن الغُسل؟ فقال: يَكفيك صاعٌ، فقال رجل: ما يكفيني، فقال جابر: كان يكفي من هو أوفَى منك شعرًا، وخيرٌ منك. ثم أمَّنا في ثوب.
وفي رواية عند مسلم (328) من طريق أبي سفيان عن جابر: أنَّ وفَدَ ثقيف سأَلُوا النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالوا: إنَّ أَرْضَنا أَرْضٌ باردةً، فكيف الغُسل؟ فقال:"أما أنا فأُفْرغُ على رأسي ثلاثًا".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ আল-বাকির (রহ.) বলেন: জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: তোমার চাচাতো ভাই—তিনি হাসান ইবনে মুহাম্মাদ ইবনুল হানাফিয়্যাকে ইঙ্গিত করছিলেন—আমার কাছে এসে জিজ্ঞাসা করলেন: জানাবাতের (অপবিত্রতার) গোসল কীভাবে করতে হয়? আমি বললাম: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিন আজলা পানি নিতেন এবং তা নিজের মাথায় ঢালতেন, তারপর তা দিয়ে অবশিষ্ট সমস্ত শরীরে পানি ঢালতেন। তখন হাসান আমাকে বললেন: আমি তো অধিক চুলের অধিকারী ব্যক্তি। আমি বললাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমার চেয়েও বেশি চুলের অধিকারী ছিলেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মাথায় তিনবার পানি ঢালতেন।
মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন জানাবাতের গোসল করতেন, তখন তাঁর মাথায় তিন আঁজলা পানি ঢালতেন। হাসান ইবনে মুহাম্মাদ (ইবনুল হানাফিয়্যা) তাঁকে বললেন: আমার চুল তো অনেক। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাকে বললাম, হে আমার ভাতিজা! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চুল তোমার চুলের চেয়েও বেশি এবং উন্নত ছিল।
বুখারীর এক বর্ণনায় (২৫২) মুহাম্মাদ আল-বাকির (রহ.) বলেন: তিনি এবং তাঁর পিতা জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত ছিলেন এবং সেখানে কিছু লোকও ছিল। তারা তাঁকে গোসল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: এক ‘সা’ (সা‘) পরিমাণ পানিই তোমার জন্য যথেষ্ট। তখন এক ব্যক্তি বলল: আমার জন্য তা যথেষ্ট নয়। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যার চুল তোমার চেয়েও বেশি এবং যিনি তোমার চেয়েও উত্তম ছিলেন, তাঁর জন্য তা যথেষ্ট ছিল। এরপর তিনি (জাবির) একটি মাত্র কাপড়ে আমাদের ইমামতি করলেন।
মুসলিম শরীফের অন্য এক বর্ণনায় জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: সাকীফ গোত্রের প্রতিনিধি দল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল। তারা বলল: আমাদের ভূমি শীতল। আমরা কীভাবে গোসল করব? তিনি বললেন: “আর আমি তো আমার মাথায় তিনবার পানি ঢালি।”
1442 - عن أنس أَنَّ وفْدَ ثقيفٍ قالوا: يا رسول الله! إنَّ أَرْضَنا أرْضٌ باردةٌ، فما يَكْفِينا من غُسْل الجنابةِ؟ فقال:"أما أنا فأُفِيضُ على رأسي ثلاثًا".
صحيح: رواه أبو يعلى في مسنده (3727) قال: حَدَّثَنَا ابن أبي سمينة البصريّ، ثنا معتمر بن سليمان، عن حميد الطّويل، عن أنس، فذكره.
قال الهيثميّ: رجاله رجال الصَّحيح."مجمع الزوائد" (1/ 271).
وأورده أيضًا الحافظ في"المطالب العالية" (1/ 108) وقال: صحيح.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাকীফ গোত্রের একটি প্রতিনিধি দল বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! নিশ্চয় আমাদের এলাকাটি একটি শীতল এলাকা। জানাবাতের গোসলের জন্য আমাদের কতটুকু (পানি) যথেষ্ট হবে? তখন তিনি বললেন: "আর আমি তো আমার মাথায় তিনবার (পানি) ঢেলে দেই।"
1443 - عن أبي هريرة، سأله رجل: كم أُفيضُ على رأسي وأنا جُنُبٌ؟ قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يَحْثُو على رأسه ثلاثَ حَثَيات، قال الرّجل: إنَّ شَعْرِي طويلٌ، قال: كان رسولُ الله أكثرَ شعرًا منك وأطيب.
حسن: رواه ابن ماجة (578) قال: حَدَّثَنَا أبو بكر بن أبي شيبة، ثنا أبو خالد الأحْمرُ، عن ابن عجلان، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل أبي خالد الأحمر، وهو سليمان بن حيان الكوفيّ، وشيخه محمد بن عجلان المدنيّ، وهما حسنا الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: জানাবত (নাপাকি) অবস্থায় আমি আমার মাথায় কতটুকু পানি ঢালব? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মাথায় তিন আঁজলা পানি ঢালতেন। লোকটি বলল: আমার চুল তো লম্বা। তিনি (আবূ হুরায়রা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চুল তোমার চেয়েও বেশি এবং উত্তম ছিল।
1444 - عن عائشة قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إذا أراد أن يَغْتسِلَ من الجنابة بدأ بكفَّيه فغَسَلَهما، ثم غَسَلَ مرافِغَه، وأفاض عليه الماء، فإذا أنقاهما أهوى بهما إلى حائط، ثم يستقبلُ الوضوءَ، ويفيض الماء على رأسه.
صحيح: رواه أبو داود (243) عن عمرو بن عليّ الباهليّ، حَدَّثَنَا محمد بن أبي عديّ، حَدَّثَنِي سعيد، عن أبي مَعْشَرٍ، عن النَّخْعيّ، عن الأسْود، عن عائشة، فذكرته.
ورجاله ثقات وإسناده صحيح. وأبو معشر هو زياد بن كُلَيب الحنظلي الكوفيّ، ثقة؛ وثَّقه النسائيّ والعجلي.
وقوله:"مَرافِغِه" - بفتح الميم وكسر الفاء وبعدها الغين - جمع (رُفغ) بضم الراء، وهي: مغابن البدن، وما يجتمع فيه الأوساخ، كالإبطين وأصول الفخذين.
وبيان هذا الحديث أنَّه: إذا أراد أن يغتسل من الجنابة، بدأ بكفيه فغسلهما، ثم غسل مَرافِغَه، وأفاض الماء على فرجه، فإذا أنقاهما - أي المرافِغ والفرج - أهوى بهما - باليدين - إلى حائط؛ ليدلكهما بالتراب للتنظيف، ثم يستقبل الوضوء، ويفيض الماء على رأسه، ومن ثم على جسمه كله. وهذا مستخلصٌ من الأحاديث المذكورة في الباب.
وفي الباب أيضًا حديث أبي سعيد الخدريّ: أنَّ رجلًا سأله عن الغُسْل من الجنابة، فقال: ثلاثًا، فقال الرّجلُ: إنَّ شَعْري كثيرٌ! فقال: رسولُ الله صلى الله عليه وسلم كان أكثرَ شعرًا منك وأطيب.
رواه ابن ماجة (576) عن أبي بكر بن أبي شية وعلي بن محمد، قالا: حَدَّثَنَا وكيع (ح) وحدثنا أبو كريب، قال حَدَّثَنَا ابن فُضَيل، جميعا عن فُضَيل بن مرزوق، عن عطية، عن أبي سعيد، فذكر الحديث.
وفيه عَطية، وهو ابن سعد بن جُنادة العَوفيّ، قال أبو داود: ليس بالذي يعتمد عليه. وقال النسائيّ: ضعيف. وليّنه أبو زرعة. وقال أبو حاتم: ضعيف يكتب حديثه.
قلت: القول فيه قول أبي حاتم؛ فإنه ليس بمطروح، ولحديثه شواهد كما تقدمت.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন জানাবাতের গোসল করার ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি প্রথমে তাঁর দু’হাত ধুয়ে নিতেন, এরপর তিনি তাঁর মাগাবন ধুতেন এবং এর উপর পানি ঢালতেন। যখন তিনি সেগুলোকে পরিচ্ছন্ন করতেন, তখন তিনি (হাত) দিয়ে দেওয়ালে ঘষতেন, অতঃপর তিনি পূর্ণাঙ্গ ওযু করতেন এবং তাঁর মাথায় পানি ঢালতেন।
1445 - عن عائشة قالت: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إذا اغتسل من الجنابة دعا بشيء نحوَ الحِلاب، فأخذ بِكفِّه فبدأَ بشِقِّ رأسِه الأيمن، ثم الأيسر، فقال بهما على رأسه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الغسل (258) ومسلم في الحيض (318) كلاهما عن محمد بن المثنَّى، ثنا أبو عاصم، عن حنظلة بن أبي سفيان، عن القاسم، عن عائشة فذكرت الحديث. واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلمٍ نحوه، إِلَّا أنه قال بعد قوله"ثم الأيسر":"ثم أخذ بكفيه فقال بهما على رأسه".
والحِلاب - بكسر الحاء المهملة - قال الخطّابي: هو إناء يسع قدر حلب ناقة، وقال: وقد ذكره محمد بن إسماعيل في كتابه"الجامع الصحيح"، وتأوله على استعمال الطيب في الطهور، وأحسبه توهم أنّه يريد به المحلب الذي يستعمل في غسل الأيديّ، وليس هذا من الطيب في شيء. انتهى.
وقال الإسماعيلي أيضًا في مستخرجه: رحم الله أبا عبد الله - يعني البخاريّ - من ذا يسلم من الغلط، سبق إلى قلبه أنَّ الحِلابَ طيب، وأي معنى للطيب عند الاغتسال قبل الغُسْلِ، إنّما الحِلاب إناءٌ، وهو ما يحلب فيه، يسمى حِلابًا ومحلبًا."الفتح" (1/ 369).
قلت: لأنَّ البخاريّ رحمه الله تعالى بوَّب في صحيحه بقوله:"باب من بدأ بالحِلاب أو الطيب عند الغُسْل" ظنًّا منه أنَّ الحِلابَ نوعٌ من الطيب.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন জানাবাত (বড় নাপাকি) থেকে গোসল করতেন, তখন তিনি 'হিলাব'-এর সমপরিমাণ (পানি ধারণ করে এমন) একটি পাত্র আনতে বলতেন। অতঃপর তিনি তাঁর হাতের অঞ্জলি ভরে পানি নিতেন, এবং মাথার ডান দিক দিয়ে (ঢালা) শুরু করতেন, এরপর বাম দিক দিয়ে, অতঃপর উভয় হাত দ্বারা পানি নিয়ে তাঁর পুরো মাথায় ঢালতেন।
1446 - عن عائشة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يغتسل من إناء - وهو الفَرَقُ - من الجنابة.
صحيح: رواه مالك في الطهارة (68) عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة. وعنه مسلم في الحيض (319).
والفَرَقُ: ثلاثة آصع.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জানাবাত (বড় নাপাকি)-এর কারণে একটি পাত্র থেকে গোসল করতেন, আর সেটি হলো 'আল-ফারাক'।
আর 'আল-ফারাক' হলো তিন সা’ (পরিমাণ)।
1447 - عن عائشة أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم كان يغتسل بالصاع، ويتوضَّأ بالمدِّ.
صحيح: رواه أبو داود (92) والنسائي (347) وابن ماجة (268) كلّهم من حديث قتادة، عن صفية بنت شيبة، عن عائشة، فذكرت الحديث.
ورجاله ثقات إِلَّا أنَّ قتادة مع إمامته في الحديث كان يُدلِّس، لكن قال أبو داود - عقب رواية
الحديث من طريق همام بن يحيى، عن قتادة، عن صفية بنت شيبة -:"رواه أبان، عن قتادة، قال: سمعت صفية" فانتفتْ عنه تهمةُ التدليس.
ولحديث عائشة طرق أخرى منها: قتادة، عن الحسن، عن أمه، عن عائشة نحوه. رواه النسائيّ.
ومنها: قتادة، عن معاذة، عن عائشة نحوه.
رواه أبو عبيد في الطهور (رقم 112).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক সা’ পরিমাণ পানি দ্বারা গোসল করতেন এবং এক মুদ্দ পরিমাণ পানি দ্বারা উযু করতেন।
1448 - عن أنس قال: كان النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يَغْتَسِلُ بالصاع إلى خمسةِ أمدادٍ، ويتوضأ بالمدّ. وفي لفظ: كان يغتسل بخَمْسِ مَكاكِيك، ويتوضأُ بمكّوكٍ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الوضوء (201) ومسلم في الحيض (325) كلاهما من طريق مِسْعر، حَدَّثَنِي عبد الله بن عبد الله بن جَبْرٍ قال: سمعت أنسًا، فذكره.
والرّواية الثانية أخرجها مسلم من طريق شعبة، عن ابن جَبْر.
ومكاكيك: جمع مكوك، كتنور، وهو مكيال. قال النوويّ: ولعل المراد بالمكُّوك هنا المُدّ كما قال في رواية أخرى: يتوضأ بالمدّ، ويغتسل بالصاع إلى خمسة أمداد" اهـ.
وفي السنن:"يتوضأ بإناء يسع رطلين، ويغتسل بالصاع".
قال أبو داود في سننه (95): سمعت أحمد بن حنبل يقول: الصاع خمسة أرطال، وهو صاع ابن أبي ذئب، وهو صاع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক সা' পরিমাণ পানি থেকে শুরু করে পাঁচ মুদ (পর্যন্ত পানি) দিয়ে গোসল করতেন এবং এক মুদ পানি দিয়ে ওযু করতেন। অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঁচ মাককূক পানি দিয়ে গোসল করতেন এবং এক মাককূক পানি দিয়ে ওযু করতেন।
এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। হাদিসটি বুখারী (কিতাবুল ওযু, ২০১) এবং মুসলিম (কিতাবুল হায়িয, ৩২৫) উভয়েই মিসআর-এর সূত্রে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু জাবর থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন মর্মে বর্ণনা করেছেন।
দ্বিতীয় বর্ণনাটি মুসলিম শু‘বাহ্-এর সূত্রে ইবনু জাবর (রাহ.) থেকে বর্ণনা করেছেন।
‘মাকাকিক’ শব্দটি ‘মাককূক’-এর বহুবচন। এটি তন্নূরের অনুরূপ একটি পরিমাপক পাত্র। ইমাম নববী (রহ.) বলেন: সম্ভবত এখানে ‘মাককূক’ দ্বারা ‘মুদ’ পরিমাণই বোঝানো হয়েছে, যেমন অন্য বর্ণনায় এসেছে: তিনি এক মুদ পানি দিয়ে ওযু করতেন এবং এক সা' থেকে পাঁচ মুদ পরিমাণ পানি দিয়ে গোসল করতেন।
সুনান গ্রন্থসমূহে এসেছে: তিনি দুই রিতল ধারণক্ষম পাত্র দ্বারা ওযু করতেন এবং এক সা' দ্বারা গোসল করতেন।
ইমাম আবূ দাঊদ তাঁর সুনানে (৯৫) বলেছেন: আমি আহমাদ ইবনু হাম্বলকে বলতে শুনেছি যে, এক সা' হল পাঁচ রিতল। আর এটি হল ইবনু আবী যি’ব-এর সা' এবং এটিই ছিল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সা'।
1449 - عن جابر بن عبد الله قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يَغْتَسِلُ بالصَّاعِ، ويتوضّأ بالمدّ.
حسن: رواه ابن ماجة (269) عن هشام بن عمار، ثنا ربيع بن بدرٍ، عن أبي الزُّبير، عن جابر فذكره.
وأبو الزُّبير المكي مدلِّس معروف، ولكن رواه أبو داود (93) عن الإمام أحمد، وهو في مسنده (3/ 303)، وصحّحه ابن خزيمة (117) كلهم من طريق سالم بن أبي الجعد، عن جابر.
وسالم بن أبي الجعد ثقة؛ وثَّقه ابن معين وأبو زرعة والنسائي. ولكن في الطريق إليه يزيد بن أبي زياد، وهو ضعيف، لكن قال ابن عديٍّ:"مع ضعَّفه يُكتب حديثه".
وفي بعض الروايات: قال رجل: لا يكفينا يا جابر! فقال: قد كفي من هو خيرٌ منك وأكثرُ شعرًا. (صحيح البخاريّ: 252).
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক 'সা' (Sa') পরিমাণ পানি দিয়ে গোসল করতেন এবং এক 'মুদ্দ' (Mudd) পরিমাণ পানি দিয়ে ওযু করতেন। অন্য কিছু বর্ণনায় এসেছে যে, এক ব্যক্তি বলল: হে জাবির! আমাদের জন্য তো এই পরিমাণ যথেষ্ট নয়! তিনি (জাবির) বললেন: তোমার চেয়ে উত্তম এবং যার চুল তোমার চেয়েও বেশি ছিল, তার জন্যই তো এই পরিমাণ যথেষ্ট হয়েছে।
1450 - عن سفينة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُغَسِّلُه الصاعُ من الماء من الجنابة، ويُوضِّئه المدُّ.
وفي رواية: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يَغْتَسِلُ بالصاع، ويتطهر بالمدّ.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (326) من طريق بشر بن المُفضَّل، ثنا أبو رَيحانة، عن سفينة.
والرّواية الثانية رواها من طريق عليّ بن حُجْرٍ، ثنا إسماعيل، عن أبي ريحانة عنه.
قال مسلمٌ: قال أبو ريحانة: وقدْ كان كبر، وما كنتُ أثق بحديثه. (يقصد به سفينة).
قال النوويّ رحمه الله تعالى: ولم يذكر مسلم رحمه الله تعالى حديثه هذا معتمدًا عليه وحده، بل ذكره متابعةً لغيره من الأحاديث التي ذكرها. انتهى
وأمّا سفينة فهو: صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم ومولاه، واسمه: مهران بن فروخ، وقيل غير ذلك، وقيل: سبب تسميته سفينة أنه حمل متاعًا كثيرًا لرُفْقَة في الغزو، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"أنت سفينة". أخرجه أحمد (21925) بإسناد حسن.
সফীনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম জানাবাতের (ফরয) গোসলের জন্য এক সা‘ (Sā’) পরিমাণ পানি ব্যবহার করতেন এবং ওযূর জন্য এক মুদ্দ (Mudd) পরিমাণ পানি ব্যবহার করতেন।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এক সা‘ দ্বারা গোসল করতেন এবং এক মুদ্দ দ্বারা পবিত্রতা অর্জন করতেন।
1451 - عن أم عُمارة أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم توضَّأ، فأُتي بإناءٍ فيه ماء قدرُ ثُلُثَيِ المُدِّ.
صحيح: رواه أبو داود (94) والنسائي (74) عن محمد بن بشار، ثنا محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن حبيب الأنصاريّ، قال: سمعت عبَّادَ بن تميم، عن جدته - وهي أم عُمارة بنت كعب. ورجاله ثقات وإسناده صحيح.
قال النسائيّ: قال شعبة: فأحفظ أنه غسل ذِراعَيه وجعل يَدلُكهما، ويمسح أذنيه باطنهما، ولا أحفظ أنه مسح ظاهرهما.
فائدة: ليس في هذه الأحاديث الواردة في بيان صفة غسل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم من الجنابة ذكر للدّلك؛ ولذلك قال الإمام البغويّ في شرح السنة (2/ 13):"وليس في الحديث ذكر إمرار اليد".
قلت: وورد دلك شعر الرَّأس في غسل الحائض والجنب من حديث عائشة، وسيأتي قريبًا إن شاء الله.
উম্মু উমারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযু করলেন, তখন তাঁর কাছে একটি পাত্র আনা হলো, যাতে প্রায় দুই-তৃতীয়াংশ মুদ্দ পরিমাণ পানি ছিল।
1452 - عن أم سلمة قالت: قلت يا رسول الله! إني امرأة أشُدُّ ضَفْرَ رأسيّ، أَفأنْقُضُه لغُسْل الجنابة؟ قال:"لا، إنّما يكَفِيكِ أن تَحْثِي على رأسكِ ثلاثَ حَثَيات، ثم تُفيِضِين عليكِ الماء، فتطهُرين".
وفي رواية: أفأنقضه للحيضةِ والجنابة؟ قال:"لا".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (330) من طريق أيوب بن موسى، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن عبد الله بن رافع - مولى أمِّ سلمة، عن أمِّ سلمة فذكرته.
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি এমন একজন মহিলা যে আমার মাথার চুল শক্ত করে বেণী করি, জানাবাতের (নাপাকির) গোসলের জন্য কি আমি তা খুলে ফেলব? তিনি বললেন, "না। তোমার জন্য যথেষ্ট হলো এই যে, তুমি তোমার মাথার ওপর তিনবার পানি ঢালবে (বা অঞ্জলি ভরে পানি দেবে), এরপর তুমি তোমার সমস্ত দেহের ওপর পানি প্রবাহিত করবে, তাহলেই তুমি পবিত্র হয়ে যাবে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমি কি হায়য (মাসিক) ও জানাবাতের জন্য তা খুলে ফেলব? তিনি বললেন, "না।"
1453 - عن عبيد بن عمير قال: بلغ عائشةَ أنَّ عبد الله بن عمرو يأمر النساءّ إذا اغتسلْنَ أن يَنْقُضْنَ رؤوسَهُنَّ، فقالت: يا عجبًا لابن عمرو هذا! يأمر النساءَ إذا اغْتَسَلْنَ أن ينقُضْنَ رؤوسَهُنّ، أفلا يأمرهنّ أن يحلقن رؤوسَهْنَّ! لقد كنت أغتسل أنا ورسول الله صلى الله عليه وسلم من إناء واحد، ولا أزيد على أن أُفرِغَ على رأسي ثلاثَ إفْراغاتٍ.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (331) من طريق إسماعيل ابن عُليَّة، عن أيُّوب، عن أبي
الزُّبير، عن عبيد بن عميرٍ فذكر مثله.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে জানানো হয়েছিল যে, আবদুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মহিলাদেরকে এই নির্দেশ দেন যে, যখন তারা গোসল করবে, তখন যেন তাদের মাথার চুল খুলে ফেলে। তখন তিনি [আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)] বললেন: ইবন আমরের এই আচরণের কী আশ্চর্য! তিনি মহিলাদেরকে গোসলের সময় চুল খুলে ফেলার নির্দেশ দিচ্ছেন, তাহলে তিনি কেন তাদেরকে মাথা কামিয়ে ফেলার নির্দেশ দেন না! আমি এবং আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একই পাত্র থেকে গোসল করতাম, আর আমি আমার মাথায় তিনবার পানি ঢালার অতিরিক্ত কিছুই করতাম না।
1454 - عن عائشة قالت: خرجنا موافين لهلال ذي الحجة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من
أحبّ أن يُهلَّ بعمرةٍ فلْيُهْلِلْ؛ فإني لولا أني أهديتُ لأهللتُ بعمرةٍ". فأهلّ بعضُهم بعمرةٍ، وأهلّ بعضُهم بحج، وكنت أنا ممن أهلّ بعمرة، فأدركني يومُ عرفةَ وأنا حائضٌ، فشكوت إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"دَعي عمرتَك، وانقُضي رأسَكِ، وامتْشِطي وأهِلِّي بحجّ".
ففعلتُ حتَّى إذا كان ليلةُ الحصْبةِ أرسل معي أخي عبد الرحمن بن أبي بكر فخرجتُ إلى التنعيم فأهللتُ بعمرةٍ مكان عمرتي.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحيض (317) من طريق أبي أُسامة، ومسلم في الحج (1211: 116) من طريق ابن نُمَير، كلاهما عن هشام بن عروة، عن أبيه عن عائشة. واللّفظ للبخاريّ.
وزاد ابن ماجة (641) بإسنادٍ صحيحٍ، عن وكيع، عن هشام بن عروة به:"واغتسلي".
وبوَّب عليه البخاريّ:"باب نقض المرأةِ شعرها عند غُسل المحيضِ"، وفيه إشارة إلى أنه يرى وجوب نقض الشعر في غُسْلِ المحيض، وبه قال الحسن وطاوس في الحائض دون الجنب.
وقال بوجوب النقض فيهما عبد الله بن عمرو كما في صحيح مسلم، وأنكرت عليه عائشة.
والجمهور على عدم الوجوب؛ لحديث أم سلمة في صحيح مسلم، وفيه:"أفأنقضه للحيضة والجنابة؟" فقال:"لا"، وحملوا الأمر في حديث عائشة على الاستحباب؛ جمعا بين الحديثين.
ويرى ابن رجب كما في شرحه للبخاريّ -"فتح الباري شرح صحيح البخاريّ" (1/ 476) أنه لا دلالة في حديث عائشة على نقض شعرها عند غسلها من المحيض، فإن غسل عائشة الذي أمرها النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم به لم يكن من المحيض، بل كانت حائضًا، وحيضها حينئذ موجود، فإنه لو كان قد انقطع حينها لطافت للعمرة، ولم نحتج إلى هذا السُؤال، ولكن أمرها أن تغتسل في حال حيضها، وتُهل بالحج، فهو غسل للإحرام في حال الحيض، كما أمر أسماء بنت عُميس لما نُفِستْ بذي الحليفة أن تغتسل وتُهل".
وقال:"وقد يُحمل مراد البخاريّ عن وجه صحيح، وهو أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم إنّما أمر عائشة بنقض شعرها، وامتشاطها عند الغسل للإحرام، لأنَّ غسل الإحرام لا يتكرر، فلا بشق نقض الشعر فيه، وغسل الحيض والنفاس يوجد فيه هذا المعنى بخلاف غسل الجنابة، فإنه يتكرر، فيشق النقض فيه، فلذلك لم يؤمر فيه بنقض الشعر".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যিলহাজ্জ মাসের চাঁদ দেখার সময় (মক্কার পথে) বের হলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি উমরার ইহরাম বাঁধতে পছন্দ করে, সে যেন তা করে। কারণ আমি যদি কুরবানীর পশু সঙ্গে না আনতাম, তবে আমিও উমরার ইহরাম বাঁধতাম।" ফলে তাদের কেউ কেউ উমরার ইহরাম বাঁধলেন এবং কেউ কেউ হাজ্জের ইহরাম বাঁধলেন। আমি তাদের মধ্যে ছিলাম যারা উমরার ইহরাম বেঁধেছিলাম। এরপর আরাফার দিনে আমার ঋতুস্রাব শুরু হলো। আমি তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অভিযোগ করলাম। তিনি বললেন: "তুমি তোমার উমরা ত্যাগ করো, তোমার মাথার চুল খুলে দাও (খুলে নাও), চিরুনি করো এবং হাজ্জের ইহরাম বাঁধো।" আমি তাই করলাম। অবশেষে যখন হাসবার রাত (মুহাস্সাব/মিনায় অবস্থানের রাত) হলো, তখন তিনি আমার ভাই আব্দুর রহমান ইবনু আবী বাকরকে আমার সাথে পাঠালেন। আমি তান'ঈমে গেলাম এবং আমার সেই উমরার বদলে (নতুন করে) উমরার ইহরাম বাঁধলাম।
1455 - عن عائشة قالت: إن امرأة من الأنصار سألت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن غسلها من الحيض، فأمرها كيف تغتسلُ، قال:"خُذي فِرْصةً من مسك، فتطهري بها". قالت: كيف أتطهّر بها؟ قال:"تطهري بها". قالت: كيف أتطهر بها؟ قال: سبحان الله! تطهري بها". فاجتذبتُها إليّ، فقلت: تتبّعي بها أثر الدم.
متَّفقٌ عليه: رواه البخاريّ في الحيض (314، 315) ومسلم في الحيض (332) كلاهما من طريق منصور بن صفية، عن أمه صفية، عن عائشة.
ونسب إلى أمه صفية لشهرتها، وهي صفية بنت شيبة بن عثمان بن أبي طلحة العبدرية. وأم أبيه عبد الرحمن بن طلحة بن الحارث بن طلحة بن أبي طلحة العبدري. إِلَّا أن البخاريّ لم يذكر كيف تغتسل.
وإنما بيَّنه مسلم في رواية إبراهيم بن المهاجر قال: سمعت صفية تحدث عن عائشة أن أسماء (وهي بنت شكل) سألت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن غُسل المحيض؟ فقال:"تأخذ إحداكنَّ ماءها وسدرتها فتطهَّر، فتُحسنُ الطهور، ثم تَصُبُّ على رأسها فتَدْلُكهـ دلكًا شديدًا حتَّى تبلغَ شؤونَ رأسِها، ثم تَصبُّ عليها الماء، ثم تأخذ فِرصة مُمسَّكةً فتطهر بها"، فقالت أسماء: كيف تطهر بها؟ فقال:"سبحان الله! تطهرين بها"، فقالت عائشة (كأنّها تخفي ذلك): تتَّبعين أثرَ الدم. وسألته عن غسل الجنابة؟ فقال:"تأخذ ماء فتطهر، فتحسن الطهور أو تُبْلِغ الطهور، ثم تَصُبُّ على رأسها فَتَدْلُكه، حتَّى تَبْلغ شؤونَ رأسها، ثم تفيض عليها الماء". فقالت عائشة: نعم النساءُ نساءُ الأنصار! لم يكن يمنعهن الحياءُ أن يتفقَّهن في الدين.
وفي رواية: دخلت أسماء بنت شكل على النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! كيف تغتسل إحدانا إذا طهرت من الحيض؟ وساق الحديث. ولم يذكر فيه غسل الجنابة، وكلها في صحيح مسلم.
والفِرصة: القطعة من صوف أو قطن، أي: بعد انقطاع الدم إذا اغتسلت أخذت قطعة من مسك، أو خرقة فتطيبه بمسك، فتطيب بها مواضع الدم ليذهب ريحه.
وفي رواية عند أبي داود:"قَرْصة" بالقاف، يعني: شيئًا يسيرًا يؤخذ من المسك، مثل القَرْصة بأطراف الأصبعين.
وقوله:"شؤون رأسها" مواصل قبائل الرأس وملتقاها، والمراد: إيصال الماء إلى منابت الشعر، مبالغة في الغسل. ذكر ابن الأثير في جامع الأصول" (7/ 320 - 321).
وانظر بقية أحاديث غسل الحائض والمستحاضة في كتاب الحيض.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনসারদের এক মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার হায়েয (মাসিক) থেকে পবিত্রতা অর্জনের গোসল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তখন তিনি তাকে গোসলের পদ্ধতি বলে দিলেন। তিনি বললেন: "এক টুকরো কস্তুরি (বা সুগন্ধিযুক্ত বস্তু) নাও, তারপর তা দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করো।" মহিলাটি বলল: আমি তা দিয়ে কীভাবে পবিত্রতা অর্জন করব? তিনি বললেন: "তা দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করো।" মহিলাটি আবার বলল: আমি তা দিয়ে কীভাবে পবিত্রতা অর্জন করব? তিনি বললেন: "সুবহানাল্লাহ! তা দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করো।" তখন আমি তাকে আমার দিকে টেনে নিলাম এবং বললাম: তুমি এর দ্বারা রক্তের চিহ্ন অনুসরণ করবে (অর্থাৎ যেখানে রক্ত লেগেছে সেখানে ব্যবহার করবে)।
(এটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী এটি বর্ণনা করেছেন ‘আল-হায়েয’ অধ্যায়ে (হাদীস নং ৩১৪, ৩১৫) এবং মুসলিম এটি বর্ণনা করেছেন ‘আল-হায়েয’ অধ্যায়ে (হাদীস নং ৩৩২)। উভয়েই মানসূর ইবনু সাফিয়্যাহ্-এর সূত্রে তাঁর মাতা সাফিয়্যাহ্ সূত্রে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
[সাফিয়্যাহ্ তাঁর প্রসিদ্ধির কারণে তাঁর মা হিসেবে পরিচিত। তিনি হলেন সাফিয়্যাহ্ বিনত শায়বাহ্ ইবনু উসমান ইবনু আবী তালহা আল-আবদারিয়্যাহ্। আর তাঁর পিতা হলেন আবূ আবদুর রহমান ইবনু তালহা ইবনু আল-হারিস ইবনু তালহা ইবনু আবী তালহা আল-আবদারী। তবে ইমাম বুখারী কীভাবে গোসল করবে তা উল্লেখ করেননি।]
কিন্তু ইমাম মুসলিম ইব্রাহিম ইবনু মুহাজির-এর বর্ণনায় তা বিস্তারিত উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেন, আমি সাফিয়্যাহ্-কে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীস বর্ণনা করতে শুনেছি যে, আসমা (তিনি হলেন বিনত শাকাল) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হায়েযের গোসল সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন। তখন তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ তার পানি ও সিদ্রাহ্ (কুল পাতা) গ্রহণ করবে, অতঃপর ভালোভাবে পবিত্রতা অর্জন করবে। তারপর সে তার মাথায় পানি ঢালবে এবং তা খুব জোরে মালিশ করবে, যেন তা মাথার গোড়া পর্যন্ত পৌঁছায়। তারপর তার ওপর পানি ঢালবে। এরপর এক টুকরো কস্তুরিযুক্ত ফুরসাহ্ (কাপড়/তুলা) নিয়ে তা দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করবে।" তখন আসমা জিজ্ঞাসা করলেন: কীভাবে তা দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করবে? তিনি বললেন: "সুবহানাল্লাহ! তা দিয়ে পবিত্রতা অর্জন করবে।" তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (যেন তা গোপন করছিলেন এমনভাবে) বললেন: তুমি রক্তের চিহ্ন অনুসরণ করবে। আর তিনি (আসমা) তাঁকে (নবীকে) জানাবাতের (অপবিত্রতার) গোসল সম্পর্কেও জিজ্ঞাসা করলেন? তখন তিনি বললেন: "সে পানি গ্রহণ করবে এবং পবিত্রতা অর্জন করবে, উত্তমরূপে পবিত্রতা অর্জন করবে অথবা পরিপূর্ণ পবিত্রতা অর্জন করবে। তারপর তার মাথায় ঢালবে এবং তা মালিশ করবে, যেন তা মাথার গোড়া পর্যন্ত পৌঁছায়। এরপর তার ওপর পানি ঢেলে দেবে।" তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আনসার মহিলারা কতই না উত্তম! দ্বীন সম্পর্কে জ্ঞান অর্জন করতে তাদের লজ্জা বাধা দিত না।
অন্য বর্ণনায় আছে: আসমা বিনত শাকাল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করে বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাদের মধ্যে কেউ হায়েয থেকে পবিত্র হলে কীভাবে গোসল করবে? অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন। এতে জানাবাতের গোসলের বিষয়টি উল্লেখ করেননি। এ সবগুলোই সহীহ মুসলিমে রয়েছে।
'আল-ফুরসাহ্' (الفرصة) হলো পশম বা তুলার টুকরো। অর্থাৎ রক্ত বন্ধ হওয়ার পর গোসল করার সময় সে কস্তুরিযুক্ত এক টুকরো (তুলা বা কাপড়) গ্রহণ করবে অথবা একটি ন্যাকড়া নেবে এবং তা কস্তুরি দিয়ে সুগন্ধিযুক্ত করে নেবে। অতঃপর তা দিয়ে রক্তের স্থানে সুগন্ধি মাখবে, যাতে তার দুর্গন্ধ দূর হয়ে যায়।
আবূ দাঊদ-এর এক বর্ণনায় 'ক্বরসাহ্' (قَرْصة) ‘ক্বাফ’ সহ বর্ণিত হয়েছে। অর্থাৎ খুব সামান্য পরিমাণ যা দুই আঙুলের অগ্রভাগ দিয়ে ক্বরসাহ্-এর মতো তুলে নেওয়া হয়।
তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাণী: "শূউনু রা'সিহা" (شؤون رأسها) অর্থ মাথার গ্রন্থিসমূহ ও সংযোগস্থল। উদ্দেশ্য হলো— গোসলের পূর্ণতার জন্য চুলের গোড়া পর্যন্ত পানি পৌঁছানো। [ইবনু আল-আছীর 'জামি‘উল উসূল'-এ (৭/৩২০-৩২১) এ কথা উল্লেখ করেছেন।]
হায়েয এবং ইস্তিহাযায় আক্রান্ত মহিলার গোসল সম্পর্কিত অন্যান্য হাদীসগুলো 'কিতাবুল হায়েয'-এ দেখুন।
1456 - عن أم هانئ بنت أبي طالب قالت: ذهبتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم عامَ الفتح،
فوجدتُه يَغْتَسِلُ، وفاطمةُ ابنتُه تستُره بثوبٍ.
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصّلاة (28) عن أبي النَّضْر مولي عمر بن عبيد الله، أنَّ أبا مُرَّة مولى عقيل بن أبي طالب أخبره أنه سمع أم هانئ بنت أبي طالب تقول، فذكرت الحديث في سياق أطول سيأتي في كتاب صلاة الضحى. ومن طريقه رواه البخاريّ (280) ومسلم في الحيض (336) مختصرًا كما ذكرته.
وهو طرفٌ من حديثٍ طويلٍ، وسيأتي ذكره في صلاة الضحى.
উম্মে হানী বিনত আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মক্কা বিজয়ের বছর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম, তখন আমি দেখলাম তিনি গোসল করছেন, এবং তাঁর কন্যা ফাতিমা তাঁকে একটি কাপড় দ্বারা আড়াল করে রেখেছেন।
1457 - عن ميمونة قالت: وضعتُ للنَّبِي صلى الله عليه وسلم ماءً، وسترتُه فاغتسلَ.
صحيح: رواه مسلم في الحيض (337) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: أخبرني موسى القارئ، ثنا زائدة، عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجعد، عن كُريب، عن ابن عبَّاسٍ، عن ميمونة فذكرته.
وهو طرف من حديثها المذكور في كيفية الغسل.
মায়মুনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য পানি রেখেছিলাম এবং তাঁকে আড়াল করে দিয়েছিলাম। অতঃপর তিনি গোসল করলেন।
1458 - عن عبد الله بن جعفر قال: أرْدَفني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذات يوم خَلْفَه، فأسرَّ إلى حديثًا لا أحَدِّثُ به أحدًا من الناس، وكان أحبَّ ما استتر به رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لحاجته هَدَفٌ، أو حائِشٌ نَخْلٍ.
وقال في رواية: يعني حائط نخْلٍ.
صحيح: أخرجه مسلم في الحيض (342) من طريق مهدي بن ميمون، ثنا محمد بن عبد الله بن أبي يعقوب، عن الحسن بن سعد، عن عبد الله بن جعفر فذكر الحديث.
والهدف: ما ارتفع من الأرض، ومنه الهدف المتَخَذُ للرَّمْيِ.
وحائش نخلٍ: بستان النخل، وفسَّره الراوي بقوله: يعني حائط نخل.
আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একদিন আমাকে তাঁর পিছনে সাওয়ার করে নিলেন। অতঃপর তিনি আমার কাছে একটি গোপন কথা বললেন, যা আমি আর কাউকে বলিনি। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন প্রকৃতির ডাকে সাড়া দিতে যেতেন (পায়খানা-পেশাব করতেন), তখন তিনি আড়াল করার জন্য সবচেয়ে বেশি পছন্দ করতেন উঁচু স্থান (হাদাফ) অথবা খেজুরের ঝোপ (হায়েশে নাখল)।
অন্য এক বর্ণনায় বলা হয়েছে: অর্থাৎ খেজুরের বাগান বা বেড়া।
1459 - عن عبد الرحمن قال: انطلقتُ أنا وعمرو بن العاص إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فخرج ومعه دَرَقةٌ، ثم استتر بها، ثم بال، فقلنا: انظروا إليه يَبولُ كما تَبولُ المرأة، فسمع ذلك فقال:"ألم تَعلمُوا ما لقي صاحبُ بني إسرائيل؟ كانوا إذا أصابهم البولُ قطعوا ما أصابه البول منهم؛ فنهاهم فعُذِّب في قبره".
صحيح: أخرجه أبو داود (22) والنسائي (30) وابن ماجة (346) كلّهم من طريق الأعمش، عن زيد بن وهب، عنه به. واللّفظ لأبي داود.
زيد بن وهب: هو الجهني أبو سليمان الكوفيّ، أسلم في حياة النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ورحل إليه مهاجرًا، فقُبِضَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو في الطريق فلم يُدركهـ، قال يعقوب بن سفيان: في حديثه خلل كثير. وردّ عليه الحافظ في التقريب:"لم يصب من قال: في حديثه خلل"، مات بعد الثمانين، وقيل: سنة ست وتسعين.
وبقية رجاله ثقات. قال الحافظ في"فتح الباري" (1/ 328): هو حديث صحيح، صحَّحه الدَّارقطنيّ وغيره".
وقال أبو داود:"قال منصور، عن أبي وائل، عن أبي موسى في هذا الحديث قال:"جلْدَ أحدهم"، وقال عاصم، عن أبي وائل، عن أبي موسى، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"جسد أحدهم". يقصد اختلاف الألفاظ.
والدَّرَقة - بفتح الدال والراء المهملتين والقاف - الجحفة، والمراد بها: الترس إذا كان من جلود وليس فيها خشب وعصب.
وقوله:"فقلنا انظروا إليه"، في رواية النسائيّ وابن ماجة:"فقال بعض القوم"، وهذا هو الظاهر؛ فقوله:"قلنا" حكاية عن قولهم؛ لأنَّ قائل هذا لا يكون مسلمًا؛ لما فيه من سوء الأدب مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وعلى الفرض أنَّ قائله مسلم فيحمل على التعجب من هذا الفعل؛ لأنه كان خلافًا لعادة العرب.
وقوله:"يبول كما تبول المرأة" فيه تشبه في الستر أو الجلوس، وقد فهم منه السترَ النسائيّ؛ فبوَّب بقوله:"البول إلى السترة يستر بها"، وبوَّب أبو داود بقوله:"الاستبراء من البول"، وبوَّب ابن ماجة بقوله:"باب التشديد في البول"، ولم يبوَّب أحد من هؤلاء: (البول قائمًا)، وهو أقرب إلى التشبيه، وقد نقل بعض أهل العلم أنَّ العرب كانوا يرون البول قائمًا من الشهامة من الرجال دون النساء، وأمّا كشفُ العورة فلم يكن مُتفشِّيًا فيهم، وإن كانوا غير مبالين به.
وقوله:"إذا أصابهم البولُ قطعوا ما أصابه البولُ" أي: الثياب؛ فالروايات الصحيحة هي بذكر الثوب، وما جاء في بعض الروايات بذكر الجلد أو الجسد فيحمل على حذف المضاف، يعني: ثوب جسدهم أو جلدهم؛ لأنَّ الحمل على الظاهر - وهو الجلد أو الجسد - يؤدي إلى قطع كل أجسادهم لتكرار الوقوع، والله لم يكلف أحدًا من عباده - في أي زمن أو مكان - ما لا يطيقون.
আব্দুর রহমান (রহ.) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এবং আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন। তাঁর সাথে একটি চামড়ার ঢাল (দারাকাহ) ছিল। তিনি তা দ্বারা আড়াল করলেন এবং পেশাব করলেন। তখন আমরা বললাম: তোমরা দেখো, তিনি তো নারীদের মতো পেশাব করছেন! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা শুনতে পেলেন এবং বললেন: তোমরা কি জানো না, বনী ইসরাঈলের সাথীর কী পরিণতি হয়েছিল? তাদেরকে যখন পেশাবের ছিটা লাগতো, তখন তারা পেশাব লাগা স্থানটুকু কেটে ফেলতো। ফলে (আল্লাহর পক্ষ থেকে) তাদেরকে নিষেধ করা হয়েছিল, কিন্তু (নিষেধ না মানার কারণে) তাকে কবরে শাস্তি দেওয়া হলো।
1460 - عن يعلى بن أمية أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يغتسل بالبَراز بلا إزار، فَصَعِدَ المنبرَ، فحمد الله وأثنى عليه، ثم قال:"إنَّ الله عز وجل حَيِيٌّ سِتِّير يُحبّ الحياءَ والسِّتْرَ؛ فإذا اغتسل أحدكم فليستتر".
حسن: رواه أبو داود (4012) والنسائي (406) كلاهما عن عبد الله بن محمد بن عليّ بن نُفَيل، قال: ثنا زهير، عن عبد الملك بن أبي سليمان العرزميّ، عن عطاء، عن يعلى، فذكر الحديث.
وعطاء هو: ابن أبي رباح، لم يسمع من يعلى بن أمية.
ثم أخرج أبو داود (4013)، والنسائي (407)، وأحمد (17970) كلّهم من طريق أبي بكر بن عَيَّاش، عن عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن صفوان بن يعلى بن أمية، عن أبيه نحوه.
وهذا الإسناد متصل غير أنَّ أبا بكر بن عياش مختلف في توثيقه؛ فوثَّقه أحمد والعجلي. وقال
أبو أحمد الحاكم: ليس بالحافظ. وقال البزّار: لم يكن بالحافظ. وقال الحافظ: ثقة عابد إِلَّا أنه لما كبِر ساءَ حفظُه، وكتابه صحيح، روايته في مقدمة مسلم.
وكذلك فيه عبد الملك بن أبي سليمان العرزمي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ.
ইয়া'লা ইবনু উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে উন্মুক্ত স্থানে ইযার (লুঙ্গি বা কাপড়) ছাড়া গোসল করতে দেখলেন। তখন তিনি মিম্বারে আরোহণ করলেন এবং আল্লাহর প্রশংসা ও গুণকীর্তন করলেন, তারপর বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা লজ্জাশীল, গোপনকারী (পর্দানশীনতার গুণসম্পন্ন)। তিনি লজ্জা ও গোপনীয়তাকে ভালোবাসেন। অতএব, তোমাদের কেউ যখন গোসল করে, তখন সে যেন পর্দা করে নেয়।"