আল-জামি` আল-কামিল
14628 - عن المقدام بن معد يكرب وأبي أمامة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الأمير إذا ابتغى الريبة في الناس أفسدهم"
حسن: رواه الطبراني في مسند الشاميين (1660) عن أحمد بن المعلى (هو الدمشقي)، ثنا هشام بن عمار، ثنا إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن جبير بن نفير، وكثير بن مرة، عن المقدام بن معدي كرب وأبي أمامة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش فإنه حسن الحديث في روايته عن أهل الشام وهذا منها. وكذلك شيخ الطبراني أحمد بن المعلى الدمشقي وشيخه هشام بن عمار السلمي الدمشقي صدوقان.
ورواه أحمد (23815) من طريق بقية بن الوليد، حدثني إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عُبيد، عن جبير بن نفير وعمرو بن الأسود، عن المقداد بن الأسود وأبي أمامة به مثله.
وقوله:"المقداد بن الأسود" وهِمَ فيه بقية بن الوليد ولم يُتابع على ذلك، والحديث حديث
المقدام وأبي أمامة.
ورواه أبو داود (4889) عن سعيد بن عمرو الحضرمي، والحاكم (4/ 378) من طريق محمد ابن عبد العزيز الرملي، كلاهما عن إسماعيل بن عياش، حدّثنا ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن جبير بن نفير، وكثير بن مرة، وعمرو بن الأسود، والمقدام بن معدي كرب، وأبي أمامة به مثله.
كذا وقع"والمقدام وأبي أمامة" وهو خطأ قديم لأنه مثله في"تحفة الأشراف" وكذا في"السنن الكبرى" للبيهقي.
والصواب:"عن المقدام وأبي أمامة" كما جاء عند الطبراني في"مسند الشاميين"، وعند أحمد في"المسند"، وكذلك ذكره"بالعنعنة" ابنُ حجر في"إتحاف المهرة" (17009)، و"أطراف المسند" (7392)؛ لأنه غير معقول أن يسمع التابعي من الصحابي ويعطف عليه التابعين، فالصواب كما قلت، فلعل هذا الخطأ يعود إلى إسماعيك بن عياش فإنه ليس من الثقات الحفاظ وكان يهم في رواياته، فلعله هو الذي قال مرة"عن المقدام" وذكر مرة بالواو"والمقدام". واللَّه أعلم بالصواب.
মিকদাম ইবনু মা'দিকারিব ও আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই শাসক যখন জনগণের মধ্যে সন্দেহ (বা খুঁত) খুঁজতে শুরু করে, তখন সে তাদেরকে নষ্ট করে দেয়।
14629 - عن عائشة، أن رجلا استأذن على النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"ائذنوا له، فلبئس ابن العشيرة، أو بئس رجل العشيرة" فلما دخل عليه ألان له القول، قالت عائشة: فقلت: يا رسول اللَّه! قلت له الذي قلت، ثم ألنت له القول؟ قال:"يا عائشة! إن شر الناس منزلة عند اللَّه يوم القيامة، من ودعه، أو تركه الناس اتقاء فحشه"
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6054)، ومسلم في البر والصلة (2591: 73) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن ابن المنكدر، سمع عروة بن الزبير، يقول: حدثتني عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে একজন লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইল। তখন তিনি বললেন: "তাকে অনুমতি দাও, সে তো গোত্রের নিকৃষ্ট লোক", অথবা বললেন, "সে তো গোত্রের নিকৃষ্ট ব্যক্তি"। যখন সে তাঁর কাছে প্রবেশ করল, তখন তিনি তার সাথে নরমভাবে কথা বললেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তার সম্পর্কে যা বলার তা বললেন, তারপর তার সাথে নরমভাবে কথা বললেন?" তিনি বললেন: "হে আয়িশা! কিয়ামতের দিন আল্লাহর কাছে মর্যাদার দিক থেকে সেই ব্যক্তিই সবচেয়ে খারাপ হবে, যাকে মানুষ তার অশ্লীলতা (বা খারাপ কথা) থেকে বাঁচার জন্য ছেড়ে দেয় বা এড়িয়ে চলে।"
14630 - عن عبد اللَّه بن عمرو، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن من أكبر الكبائر أن يلعن الرجل والديه" قيل: يا رسول اللَّه! وكيف يلعن الرجل والديه؟ قال:"يسب الرجل أبا الرجل، فيسب أباه، ويسب أمه"
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (5973)، ومسلم في الإيمان (90) كلاهما من طريق سعد بن إبراهيم، عن حُميد بن عبد الرحمن، عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص، فذكره.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই সবচেয়ে বড় কবিরা গুনাহ হলো কোনো ব্যক্তির তার পিতা-মাতাকে অভিশাপ দেওয়া।" জিজ্ঞাসা করা হলো, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! একজন ব্যক্তি কীভাবে তার পিতা-মাতাকে অভিশাপ দিতে পারে? তিনি বললেন: "একজন ব্যক্তি অন্য এক ব্যক্তির পিতাকে গালি দেয়, তখন সেই ব্যক্তি তার (গালিদাতার) পিতাকে এবং তার মাতাকে গালি দেয়।"
14631 - عن أبي الطفيل عامر بن واثلة قال: كنت عند علي بن أبي طالب، فأتاه رجل،
فقال: ما كان النبي صلى الله عليه وسلم يُسِرُّ إليك؟ قال: فغضب، وقال: ما كان النبي صلى الله عليه وسلم يُسِرُّ إليَّ شيئًا يكتمه الناس، غير أنه قد حدثني بكلمات أربع، قال: فقال: ما هن يا أمير المؤمنين؟ قال: قال:"لعن اللَّه من لعن والده، ولعن اللَّه من ذبح لغير اللَّه، ولعن اللَّه من آوى محدثا، ولعن اللَّه من غيّر منارَ الأرض"
صحيح: رواه مسلم في الأضاحي (1978) من طرق عن مروان بن معاوية الفزاري، حدّثنا منصور بن حيان، حدّثنا أبو الطفيل عامر بن واثلة، قال: فذكره.
قوله:"غيّرَ منار الأرض" أي أحدثَ فسادا ودمارًا.
আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আবু তুফাইল আমির ইবনে ওয়াসিলা বলেন: আমি তাঁর নিকট ছিলাম) এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে বললো: "নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আপনার কাছে গোপনে কী কথা বলেছিলেন?"
তিনি (আলী) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: "নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে এমন কোনো কথা গোপনে বলেননি যা তিনি অন্য লোকদের কাছ থেকে গোপন রাখতেন। তবে তিনি আমাকে চারটি কথা বলেছেন।" লোকটি বললো: "হে আমীরুল মুমিনীন! সেগুলো কী কী?" তিনি (আলী) বললেন: "(নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:) আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে তার পিতাকে অভিশাপ দেয়। আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে আল্লাহ ছাড়া অন্যের নামে যবেহ করে। আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে বিদ‘আতী বা দুষ্কৃতিকারীকে আশ্রয় দেয়। আর আল্লাহ তাকে অভিশাপ দেন, যে জমির সীমানা নির্ধারণকারী খুঁটি পরিবর্তন করে।"
14632 - عن أبي هريرة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إياكم والظن، فإن الظن أكذب الحديث، ولا تجسسوا، ولا تحسسوا، ولا تنافسوا، ولا تحاسدوا، ولا تباغضوا، ولا تدابروا، وكونوا عباد اللَّه إخوانا".
متفق عليه: رواه مالك في حسن الخلق (15) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة قال: فذكره. ورواه مسلم في البر والصلة (2563) من طريق مالك به.
ورواه البخاريّ في النكاح (5143) عن جعفر بن ربيعة، بهذا الإسناد نحوه.
قال الترمذيّ (1988) بعد أن رواه من طريق سفيان، عن أبي الزناد بإسناده:"وسمعت عبد بن حميد يذكر عن بعض أصحاب سفيان، قال: قال سفيان: الظن ظنان: فظن إثم، وظن ليس بإثم، فأما الظن الذي هو إثم فالذي يظن ظنا ويتكلم به، وأما الظن الذي ليس بإثم فالذي يظن ولا يتكلم به" اهـ.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা কুধারণা পোষণ করা থেকে বিরত থাকো। কেননা ধারণা সবচেয়ে বড় মিথ্যা কথা। আর তোমরা (কারো দোষ) অনুসন্ধান করো না, কারো গোপন বিষয় খোঁজ করো না, (মন্দ বিষয়ে) প্রতিযোগিতা করো না, একে অপরের প্রতি হিংসা করো না, একে অপরের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করো না এবং একে অপরের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিও না। আর তোমরা আল্লাহর বান্দা হিসেবে ভাই ভাই হয়ে যাও।
14633 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تحاسدوا، ولا تباغضوا، ولا تجسسوا، ولا تحسسوا، ولا تناجشوا، وكونوا عباد اللَّه إخوانا"
وفي لفظ:"لا تقاطعوا، ولا تدابروا، ولا تباغضوا، ولا تحاسدوا، وكونوا إخوانا كما أمركم اللَّه"
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2563: 30) من طريق جرير، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال: فذكره.
ورواه من طريق شعبة، عن الأعمش باللفظ الثاني.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা একে অপরের প্রতি হিংসা করো না, একে অপরের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করো না, একে অপরের গোপন দোষ অনুসন্ধান করো না, একে অপরের প্রতি আগ্রহ দেখাও না (দোষ খুঁজে বেড়িও না), আর (ক্রয়-বিক্রয়ের সময়) মিথ্যাভাবে দাম বাড়িয়ে বোলো না (নাজাশ করো না), এবং তোমরা আল্লাহর বান্দা হিসেবে ভাই ভাই হয়ে যাও।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমরা সম্পর্ক ছিন্ন করো না, একে অপরের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়ো না, একে অপরের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করো না, একে অপরের প্রতি হিংসা করো না, এবং আল্লাহ তোমাদেরকে যেমন নির্দেশ দিয়েছেন, তোমরা ভাই ভাই হয়ে যাও।"
14634 - عن أبي هريرة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تهجروا، ولا تدابروا، ولا تحسسوا، ولا يبع بعضكم على بيع بعض، وكونوا عباد اللَّه إخوانا"
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2563: 29) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا عبد العزيز، يعني ابن محمد، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা পরস্পর বিদ্বেষ পোষণ করো না, তোমরা পরস্পর সম্পর্ক ছিন্ন করো না, তোমরা একে অপরের দোষ খুঁজে বেড়াও না, আর তোমাদের কেউ যেন অন্যের ক্রয়-বিক্রয়ের উপর ক্রয়-বিক্রয় না করে, আর তোমরা আল্লাহর বান্দা হিসেবে ভাই ভাই হয়ে যাও।"
14635 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تباغضوا، ولا تدابروا، ولا تنافسوا، وكونوا عباد اللَّه إخوانا".
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2563: 31) عن أحمد بن سعيد الدارمي، حدّثنا حبان، حدّثنا وهيب، حدّثنا سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা পরস্পর বিদ্বেষ পোষণ করো না, একে অপরের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়ো না এবং একে অপরের প্রতি ঈর্ষা করো না। আর তোমরা আল্লাহর বান্দা হিসেবে ভাই ভাই হয়ে যাও।"
14636 - عن أبي هريرة، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إياكم والحسد، فإن الحسد يأكل الحسنات كما تأكل النار الحطب -أو قال: العشب-"
حسن: رواه أبو داود (4903)، وعبد بن حميد (1430) كلاهما من طريق أبي عامر، يعني عبد الملك بن عمرو، حدّثنا سليمان بن بلال، عن إبراهيم بن أبي أسيد، عن جده، عن أبي هريرة، فذكره.
وجدّ إبراهيم بن أبي أسيد قال المزي في فصل المبهمات من تهذيبه:"إنْ لم يكن جده سالم بن عبد اللَّه البراد مولى القرشيين فلا أدري من هو؟
وسالم أبو عبد اللَّه البرّاد ثقة فعلى هذا يكون إسناد الحديث حسنا لأن إبراهيم بن أبي أسيد البراد حسن الحديث.
وإن لم يكن جده سالم أبو عبد اللَّه البراد فإسناده ضعيف من أجل جهالته، ولعله لذلك قال البخاري:"لا يصح". التاريخ الكبير (1/ 272، 273).
وتحريم الحسد قد ورد في أحاديث صحيحة.
وفي معناه ما روي عن أنس، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"الحسد يأكل الحسنات، كما تأكل النار الحطب، والصدقة تطفئ الخطيئة، كما يطفئ الماء النار، والصلاة نور المؤمن، والصيام جنة من النار".
رواه ابن ماجه (4210) من طريق عيسى بن أبي عيسى الحناط، عن أبي الزناد، عن أنس، فذكره.
وعيسى بن أبي عيسى الحناط الغفاري أبو موسى المدني جمهور أهل العلم على تضعيفه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা হিংসা (ঈর্ষা) থেকে দূরে থাকো। কারণ হিংসা নেক আমলসমূহকে এমনভাবে খেয়ে ফেলে (বিনষ্ট করে দেয়), যেমন আগুন কাঠকে—অথবা তিনি বলেছেন: ঘাসকে—খেয়ে ফেলে।”
14637 - عن ضمرة بن ثعلبة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يزال الناس بخير ما لم يتحاسدوا".
حسن: رواه أبو الشيخ في التوبيخ والتنبيه (80)، والطبراني في الكبير (8/ 369) كلاهما من طرق عن إسماعيل بن عياش، عن ضمضم بن زرعة، عن شريح بن عبيد، عن أبي بحرية، عن ضمرة بن ثعلبة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش، وشيخه ضمضم بن زرعة فإنهما حسنا الحديث وهما شاميان.
قال المنذري في الترغيب (4380):"رواه الطبراني ورواته ثقات"، وتبعه الهيثمي في المجمع (8/ 78).
দমরা ইবনু সা'লাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যতক্ষণ পর্যন্ত মানুষ একে অপরের প্রতি হিংসা বা বিদ্বেষ পোষণ না করবে, ততক্ষণ পর্যন্ত তারা কল্যাণের মধ্যে থাকবে।”
14638 - عن زيد بن وهب، قال: أتي ابن مسعود فقيل هذا فلان تقطر لحيته خمرا، فقال عبد اللَّه: إنا قد نهينا عن التجسس ولكن إن يظهر لنا شيء نأخذ به.
صحيح: رواه أبو داود (4890)، وعبد الرزاق في المصنف (18945)، وصحّحه الحاكم (4/ 377) كلهم من طرق عن الأعمش، عن زيد بن وهب قال: فذكره. وإسناده صحيح.
قوله:"هذا فلان" جاء مسمَّى عند عبد الرزاق والحاكم أنه"الوليد بن عقبة".
আবদুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (একবার) তাঁর নিকট আসা হলো এবং বলা হলো: এই যে অমুক ব্যক্তি, তার দাড়ি থেকে মদ টপকে পড়ছে। তখন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: নিশ্চয়ই আমাদের গুপ্তচরবৃত্তি (তাজাসসুস) থেকে নিষেধ করা হয়েছে। কিন্তু যদি আমাদের নিকট (প্রকাশ্যে) কোনো কিছু প্রকাশ পায়, তবে আমরা সে অনুযায়ী ব্যবস্থা গ্রহণ করব।
14639 - عن عائشة قالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ما أظن فلانا وفلانا يعرفان من ديننا شيئًا". قال الليث: كانا رجلين من المنافقين.
وفي لفظ عنها: دخل عليّ النبي صلى الله عليه وسلم يوما، وقال:"يا عائشة! ما أظن فلانا وفلانا يعرفان ديننا الذي نحن عليه".
صحيح: رواه البخاريّ في الأدب (6067) عن سعيد بن عفير، حدّثنا الليث، عن عقيل، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
ورواه (6068) عن ابن بكير، عن الليث به باللفظ الثاني.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি মনে করি না যে অমুক এবং অমুক আমাদের দ্বীনের (ধর্মের) কোনো কিছুই জানে।" লায়ছ (রাবী) বলেন: তারা দুজন মুনাফিক (কপট) লোক ছিল।
অন্য এক বর্ণনায় তাঁর (আয়িশার) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে এলেন এবং বললেন: "হে আয়িশা! আমি মনে করি না যে অমুক এবং অমুক আমাদের এই দ্বীন সম্পর্কে জানে, যার ওপর আমরা আছি।"
14640 - عن أبي هريرة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"تفتح أبواب الجنة يوم الاثنين، ويوم الخميس، فيغفر لكل عبد مسلم لا يشرك باللَّه شيئًا، إلا رجلا كانت بينه وبين أخيه شحناء، فيقال: أَنظروا هذين حتى يصطلحا، أنظروا هذين حتى يصطلحا، أنظروا هذين حتى يصطلحا"
صحيح: رواه مالك في حسن الخلق (17) عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه مسلم في البر والصلة (2565: 35) من طريق مالك به.
ورواه مسلم من وجه آخر عن سهيل به نحوه غير أنه قال:"إلا المتهاجرين" وفي رواية:"إلا المتهجرين".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জান্নাতের দরজাসমূহ সোম ও বৃহস্পতিবার খোলা হয়। তখন আল্লাহ্র সাথে কাউকে শরীক করে না এমন প্রত্যেক মুসলিম বান্দাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়, তবে ঐ ব্যক্তি ব্যতীত, যার এবং তার ভাইয়ের মাঝে শত্রুতা বিদ্যমান। তখন বলা হয়: এই দু’জনকে অবকাশ দাও যতক্ষণ না তারা আপোষে মীমাংসা করে নেয়। এই দু’জনকে অবকাশ দাও যতক্ষণ না তারা আপোষে মীমাংসা করে নেয়। এই দু’জনকে অবকাশ দাও যতক্ষণ না তারা আপোষে মীমাংসা করে নেয়।
14641 - عن أنس بن مالك، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا تباغضوا، ولا تحاسدوا، ولا
تدابروا، وكونوا عباد اللَّه إخوانا، ولا يحل لمسلم أن يهاجر أخاه فودتى ثلاث ليال".
متفق عليه: رواه مالك في الأخلاق (14) عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك، فذكره. ورواه البخاري في الأدب (6076)، ومسلم في البرو الصلة (2559: 23) كلاهما من طريق مالك به.
ورواه مسلم من طريق ابن عيينة، عن الزهري بهذا الإسناد، وقال: زاد ابن عيينة:"لا تقاطعوا".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা একে অপরের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করো না, একে অপরের প্রতি হিংসা করো না এবং একে অপরের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়ো না। তোমরা আল্লাহর বান্দা হিসেবে ভাই ভাই হয়ে যাও। কোনো মুসলমানের জন্য এটা বৈধ নয় যে সে তার ভাইকে তিন দিনের বেশি সময় ধরে পরিত্যাগ (সম্পর্ক ছিন্ন) করে রাখবে।
14642 - عن أبي أيوب الأنصاري، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحل لمسلم أن يهاجر أخاه فودتى ثلاث ليال، يلتقيان فيعرض هذا، ويعرض هذا، وخيرهما الذي يبدأ بالسلام".
متفق عليه: رواه مالك في حسن الخلق (13) عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي أيوب الأنصاري، فذكره. ورواه البخاريّ في الأدب (6077)، ومسلم في البر والصلة (2560: 25) كلاهما من طريق مالك به.
আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলমানের জন্য বৈধ নয় যে সে তার ভাইকে তিন রাতের বেশি পরিত্যাগ (বিমুখ) করে থাকবে। তারা সাক্ষাৎ করে, তখন এও মুখ ফিরিয়ে নেয় আর সেও মুখ ফিরিয়ে নেয়। আর তাদের দুজনের মধ্যে উত্তম হল সে, যে প্রথম সালাম দেয়।"
14643 - عن عوف بن مالك بن الطفيل -وهو ابن أخي عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم لأمها- أن عائشة، حدثت: أن عبد اللَّه بن الزبير قال: في بيع أو عطاء أعطته عائشة: واللَّه! لتنتهين عائشة أو لأحجرن عليها، فقالت: أهو قال هذا؟ قالوا: نعم، قالت: هو للَّه علي نذر، أن لا أكلم ابن الزبير أبدا. فاستشفع ابن الزبير إليها، حين طالت الهجرة، فقالت: لا واللَّه! لا أشفع فيه أبدا، ولا أتحنث إلى نذري. فلما طال ذلك على ابن الزبير، كلم المسور بن مخرمة، وعبد الرحمن بن الأسود بن عبد يغوث، وهما من بني زهرة، وقال لهما: أنشدكما باللَّه لما أدخلتماني على عائشة، فإنها لا يحل لها أن تنذر قطيعتي. فأقبل به المسور وعبد الرحمن مشتملين بأرديتهما، حتى استأذنا على عائشة، فقالا: السلام عليك ورحمة اللَّه وبركاته أندخل؟ قالت عائشة: ادخلوا، قالوا: كلنا؟ قالت: نعم، ادخلوا كلكم، ولا تعلم أن معهما ابن الزبير، فلما دخلوا دخل ابن الزبير الحجاب، فاعتنق عائشة وطفق يناشدها ويبكي، وطفق المسور وعبد الرحمن يناشدانها إلا ما كلمته، وقبلت منه، ويقولان: إن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عما قد علمت من الهجرة، فإنه لا يحل لمسلم أن يهجر أخاه فوق ثلاث ليال. فلما أكثروا على عائشة من التذكرة والتحريج، طفقت تذكرهما نذرها وتبكي وتقول: إني نذرت، والنذر شديد، فلم يزالا بها حتى كلمت ابن الزبير، وأعتقت في نذرها ذلك أربعين رقبة، وكانت تذكر نذرها بعد ذلك، فتبكي حتى تبل دموعها خمارها.
صحيح: رواه البخاريّ في الأدب (6073، 6074، 6075) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: حدثني عوف بن مالك بن الطفيل، فذكره.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়িশার প্রদত্ত কোনো বিক্রয় বা দান সম্পর্কে বললেন: "আল্লাহর কসম! আয়িশাকে অবশ্যই বিরত হতে হবে, নতুবা আমি তার উপর (ব্যয়) নিয়ন্ত্রণ আরোপ করব।"
তিনি (আয়িশা) জিজ্ঞাসা করলেন: সে কি এই কথা বলেছে? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আল্লাহর জন্য আমার উপর এই মানত (নযর) রইল যে, আমি আর কখনোই ইবনুয যুবাইরের সাথে কথা বলব না।
যখন এই সম্পর্কচ্ছেদ দীর্ঘস্থায়ী হলো, তখন ইবনুয যুবাইর তাঁর কাছে সুপারিশ চাইলেন। তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! আমি তার ব্যাপারে কখনোই সুপারিশ গ্রহণ করব না এবং আমি আমার মানত ভঙ্গ করব না।
যখন ইবনুয যুবাইরের জন্য এটি অনেক কঠিন হয়ে গেল, তখন তিনি মিসওয়ার ইবনু মাখরামা এবং আবদুর রহমান ইবনুল আসওয়াদ ইবনু আব্দ ইয়াগূছের সাথে কথা বললেন। তারা উভয়ই বনু যুহরা গোত্রের ছিলেন। তিনি তাঁদের বললেন: আমি তোমাদের আল্লাহর কসম দিচ্ছি, তোমরা আমাকে অবশ্যই আয়িশার কাছে নিয়ে যাবে, কারণ আমার সাথে সম্পর্কচ্ছেদ করার মানত করা তাঁর জন্য বৈধ নয়।
অতঃপর মিসওয়ার ও আবদুর রহমান নিজেদের চাদরে আবৃত হয়ে তাঁকে (ইবনুয যুবাইরকে) নিয়ে আসলেন। তাঁরা আয়িশার নিকট প্রবেশের অনুমতি চাইলেন এবং বললেন: আসসালামু আলাইকুম ওয়া রাহমাতুল্লাহি ওয়া বারাকাতুহু, আমরা কি প্রবেশ করব? আয়িশা বললেন: প্রবেশ করো। তাঁরা বললেন: আমরা সবাই? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তোমরা সবাই প্রবেশ করো। তিনি জানতেন না যে, ইবনুয যুবাইর তাঁদের সঙ্গে আছেন।
যখন তাঁরা প্রবেশ করলেন, তখন ইবনুয যুবাইর পর্দার আড়ালে গিয়ে আয়িশাকে আলিঙ্গন করলেন এবং তাঁকে অনুরোধ করতে লাগলেন আর কাঁদতে লাগলেন। মিসওয়ার ও আবদুর রহমানও তাঁকে অনুরোধ করতে লাগলেন, যেন তিনি তাঁর সাথে কথা বলেন এবং তাকে ক্ষমা করেন।
তাঁরা বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কচ্ছেদ করা থেকে নিষেধ করেছেন, যা আপনি অবগত আছেন। কারণ, কোনো মুসলমানের জন্য তার ভাইকে তিন দিনের বেশি সময় ধরে ত্যাগ (বয়কট) করে থাকা বৈধ নয়।
যখন তাঁরা আয়িশার উপর উপদেশ ও চাপ দেওয়া বাড়িয়ে দিলেন, তখন তিনি তাঁর মানতের কথা স্মরণ করে কাঁদতে লাগলেন এবং বলতে লাগলেন: আমি মানত করেছি, আর মানত হলো একটি কঠিন বিষয়। এরপরও তাঁরা (অনুরোধ করা থেকে) বিরত হলেন না, অবশেষে তিনি ইবনুয যুবাইরের সাথে কথা বললেন।
আর তিনি সেই মানতের কাফফারা হিসেবে চল্লিশটি দাস মুক্ত করে দিলেন। এরপর তিনি যখনই তাঁর সেই মানতের কথা স্মরণ করতেন, তখনই এমনভাবে কাঁদতেন যে, তাঁর চোখের পানিতে তাঁর মাথার ওড়না ভিজে যেত।
14644 - عن عبد اللَّه بن عمر، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحل للمؤمن أن يهجر أخاه فوق ثلاثة أيام"
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2561) عن محمد بن رافع، حدّثنا محمد بن أبي فديك، أخبرنا الضحاك وهو ابن عثمان، عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “কোনো মুমিনের জন্য তার ভাইকে তিন দিনের বেশি সময় ধরে পরিত্যাগ (সম্পর্ক ছিন্ন করে রাখা) করা বৈধ নয়।”
14645 - عن أبي هريرة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"لا هجرة بعد ثلاث"
صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2562) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا عبد العزيز، يعني ابن محمد، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه أبو داود (4914)، وأحمد (9092) كلاهما من طرق عن منصور، عن أبي حازم، عن أبي هريرة به نحوه وزاد فيه:"فمن هجر أخاه فوق ثلاث فمات دخل النار".
واختلف في رفعه ووقفه فلعل أحد الرواة زاد من عنده للزجر والتوبيخ لأن هذه الزيادة لم تردْ في الأحاديث الصحيحة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন দিনের বেশি (কারও সাথে) সম্পর্ক ছিন্ন করা বা বয়কট করা বৈধ নয়।"
14646 - عن سعد بن مالك أبي وقاص قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يحل لمسلم أن يهجر أخاه فوق ثلاث".
صحيح: رواه أحمد (1589)، والبزار - كشف الأستار (2051)، وأبو يعلى (720) كلهم من طريق إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن محمد بن سعد بن مالك، عن أبيه، فذكره. وإسناده صحيح.
সা'দ ইবনু মালিক আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো মুসলিমের জন্য এটা বৈধ নয় যে সে তার ভাইয়ের সাথে তিন দিনের বেশি সময় সম্পর্ক ছিন্ন করে থাকবে।"
14647 - عن عائشة أن رسول صلى الله عليه وسلم قال:"لا يكون لمسلم أن يهجر مسلما فوق ثلاثة، فإذا لقيه سلم عليه ثلاث مراركل ذلك لا يرد عليه فقد باء بإثمه"
حسن: رواه أبو داود (4913)، وأبو يعلى (4583) كلاهما من طريق محمد بن المثنى، حدّثنا محمد بن خالد بن عثمة، حدّثنا عبد اللَّه بن المنيب، يعني المدني، قال: أخبرني هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل محمد بن خالد بن عثمة وشيخه عبد اللَّه بن المنيب المدني فإنهما حسنا الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো মুসলমানের জন্য বৈধ নয় যে সে তার অপর মুসলমান ভাইকে তিন দিনের বেশি সম্পর্ক ছিন্ন রাখবে (কথাবার্তা বলা বন্ধ রাখবে)। অতঃপর যখন সে তার সাথে সাক্ষাৎ করে, তখন সে তাকে তিনবার সালাম দেয়, এবং এই তিনবারের মধ্যে কোনোবারই (অপরজন) তার সালামের উত্তর দেয় না, তবে (সালামের উত্তর না দেওয়া) এই ব্যক্তি তার গুনাহ নিয়ে ফিরে গেল।