হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (14688)


14688 - عن أبي هند الداري أنه سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم-يقول:"من قام مقام رياء وسمعة راءى اللَّه تعالى به يوم القيامة وسمّع".

حسن: رواه أحمد (22322)، والبزار - كشف الأستار (2026)، والطبراني في الكبير (22/ 319) كلهم من طريق عبد اللَّه بن يزيد المقرئ، حدّثنا حيوة، حدّثنا أبو صخر أنه سمع مكحولا يقول: حدثني أبو هند الداري، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي صخر حميد بن زياد الخرّاط فإنه حسن الحديث إذا لم يخالف.

وللحديث شواهد صحيحة مما يدل على أنه لم يَهِمْ في هذا الحديث.

وأما سماع مكحول عن أبي هند الداري فمختلف فيه غير أن الترمذيّ أكّد أنه سمع من واثلة وأنس وأبي هند الداري، ويقال: إنه لم يسمع من أحد من الصحابة إلا من هؤلاء الثلاثة.

كذا قال، وقال غيره: ذُكِرَ سماعُه من عددٍ من الصحابة، ويحقق كل حديث في موضعه.




আবু হিন্দ আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যে ব্যক্তি রিয়া (প্রদর্শনী) ও সুম'আহ (লোক-শুনানোর) উদ্দেশ্যে কোনো স্থানে দাঁড়ায় (বা কাজ করে), আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন তাকে প্রদর্শন করাবেন এবং লোক-শুনানি করাবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (14689)


14689 - عن أبي بكرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من سمّع سمّع اللَّهُ به، ومن راءى راءى اللَّه به".
حسن: رواه أحمد (20456)، والبزار (3691) كلاهما من طريق بكار بن عبد العزيز، حدثني أبي (هو عبد العزيز بن أبي بكرة)، عن أبي بكرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل بكار بن عبد العزيز فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت بما يُنكر عليه، ولحديثه أصل ثابت، ولذا قال ابن عدي:"أرجو أنه لا بأس به".

وكذلك أبوه عبد العزيز بن أبي بكرة حسن الحديث.

وذكره الهيثمي في المجمع (10/ 222) وقال:"رواه أحمد، والبزار، والطبراني، وأسانيدهم حسنة".

وبمعناه رُوي عن معاذ بن جبل قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما من عبدٍ يقوم في الدنيا مقام سمعة ورياء إلا سمع اللَّه به على رءوس الخلائق يوم القيامة"

رواه البزار (2657)، والطبراني في الكبير (20/ 119) كلاهما من طريق صفوان بن عمرو قال: سمعت شرحبيل بن معشر يحدث عن معاذ بن جبل، فذكره.

وشرحبيل بن معشر هو العنسي ذكره ابن حبان في الثقات، ولم يوثقه غيره، وابن حبان معروف في توثيق من لم يُعرف فيه جرحٌ، وأعلّه البزار بالانقطاع.

وأما الهيثمي فحسّنه في المجمع (10/ 223) اعتمادا على توثيق ابن حبان.




আবু বকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি (নিজের নেক আমল) লোকসমক্ষে প্রচার করে, আল্লাহ্ তাকে (অন্যদের মাঝে) প্রচার করে দেবেন, আর যে ব্যক্তি লোক দেখানোর উদ্দেশ্যে (রিয়া) কাজ করে, আল্লাহ্ তাকে (লোকচক্ষে) প্রকাশ করে দেবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (14690)


14690 - عن شداد بن أوس قال: كنا نعد الشرك الأصغر على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الرياء.

حسن: رواه البزار - كشف الأستار (3565)، والطبراني في الأوسط - مجمع البحرين (4941) كلاهما من طريق سعيد بن الحكم بن أبي مريم، قال: نا يحيى بن أيوب، عن عمارة بن غزية، عن يعلى بن شداد بن أوس، عن أبيه، فذكره.

وعند الطبراني:"الشرك الأكبر" ولعله تصحيف.

وإسناده حسن من أجل يحيى بن أيوب ويعلى بن شداد فإنهما حسنا الحديث.

قال الهيثمي في المجمع (10/ 222):"رواه الطبراني والبزار، ورجالهما رجال الصحيح غير يعلى بن شداد وهو ثقة".




শাদাদ ইবন আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে রিয়া (লোক দেখানো ইবাদত)-কে ছোট শির্ক (শির্ক আল-আসগার) বলে গণ্য করতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (14691)


14691 - عن محمود بن لبيد قال: خرج النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"أيها الناس! إياكم وشرك السرائر" قالوا: يا رسول اللَّه! وما شرك السرائر؟ قال:"يقوم الرجل فيصلي، فيزين صلاته جاهدا لما يرى من نظر الناس إليه، فذلك شرك السرائر".

وفي رواية: أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن أخوف ما أخاف عليكم الشرك الأصغر" قالوا: يا رسول اللَّه! وما الشرك الأصغر؟ قال:"الرياء، يقول اللَّه عز وجل لهم يوم القيامة إذا جزي الناس بأعمالهم: اذهبوا إلى الذين كنتم تراؤون في الدنيا، فانظروا هل تجدون عندهم جزاءًا".
صحيح: رواه ابن خزيمة (937)، وابن أبي شيبة (8489)، وأحمد (23631)، والبغوي في شرح السنة (4135)، والبيهقي في شعب الإيمان (6831) كلهم من طرق عن عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود بن لبيد، فذكره. وإسناده صحيح.

واللفظ الأول لابن خزيمة وابن أبي شيبة، واللفظ الثاني للبغوي والبيهقي، والإمام أحمد لم يسق لفظه بهذا الإسناد، وإنما أحال على لفظ حديث قبله.




মাহমুদ বিন লাবীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হয়ে এলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! তোমরা গোপন শিরক (শিরকে সারাইর) থেকে সাবধান থেকো।" তারা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! গোপন শিরক কী? তিনি বললেন: "কোনো ব্যক্তি সালাতে দাঁড়ায় এবং সাধ্যমতো তার সালাতকে সুন্দর করে কেবল এজন্য যে, সে দেখে যে লোকেরা তার দিকে তাকাচ্ছে। এটাই হলো গোপন শিরক।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের উপর আমি যে বিষয়ে সবচেয়ে বেশি ভয় করি তা হলো ছোট শিরক (শিরকে আসগার)।" তারা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! ছোট শিরক কী? তিনি বললেন: "রিয়া (লোক দেখানো ইবাদত)। যখন কিয়ামতের দিন মানুষকে তাদের আমলের প্রতিদান দেওয়া হবে, তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল তাদেরকে বলবেন: 'তোমরা দুনিয়াতে যাদের দেখানোর জন্য (ইবাদত) করতে তাদের কাছে যাও এবং দেখো, তোমরা তাদের কাছে কোনো প্রতিদান পাও কিনা'।"









আল-জামি` আল-কামিল (14692)


14692 - عن شهر بن حوشب أنه سمع، يقول: لما دخلنا مسجد الجابية أنا وأبو الدرداء لقينا عبادة بن الصامت، فأخذ يميني بشماله وشمال أبي الدرداء بيمينه، فخرج يمشي بيننا ونحن ننتجي واللَّه أعلم بما نتناجى وذاك قوله، فقال عبادة بن الصامت: لئن طال بكما عمر أحدكما أو كلاكما لتوشكان أن تريا الرجل من ثبج المسلمين -يعني من وسط- قرأ القرآن على لسان محمد صلى الله عليه وسلم. فأعاده وأبدأه، وأحل حلاله، وحرم حرامه، ونزل عند منازله، أو قرأه على لسان أخيه قراءة على لسان محمد صلى الله عليه وسلم، فأعاده وأبداه، وأحل حلاله، وحرم حرامه، ونزل عند منازله، لا يحور فيكم إلا كما يحور رأس الحمار الميت. قال: فبينا نحن كذلك إذ طلع شداد بن أوس وعوف بن مالك، فجلسا إلينا، فقال شداد: إن أخوف ما أخاف عليكم أيها الناس لما سمعت من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من الشهوة الخفية والشرك" فقال عبادة بن الصامت وأبو الدرداء: اللهم غفرا، أولم يكن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد حدّثنا:"إن الشيطان قد يئس أن يعبد في جزيرة العرب"؟ فأما الشهوة الخفية فقد عرفناها، هي شهوات الدنيا من نسائها وشهواتها، فما هذا الشرك الذي تخوفنا به يا شداد؟ فقال شداد: أرأيتكم لو رأيتم رجلا يصلي لرجل، أو يصوم له، أو يتصدق له، أترون أنه قد أشرك؟ قالوا: نعم واللَّه، إنه من صلى لرجل، أو صام له، أو تصدق له، لقد أشرك. فقال شداد: فإني قد سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من صلى يرائي فقد أشرك، ومن صام يرائي فقد أشرك، ومن تصدق يرائي فقد أشرك" فقال عوف بن مالك عند ذلك: أفلا يعمد إلى ما ابتغي فيه وجهه من ذلك العمل كله، فيقبل ما خلص له، ويدع ما يشرك به؟ فقال شداد عند ذلك: فإني قد سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إن اللَّه عز وجل يقول: أنا خير قسيم لمن أشرك بي، من أشرك بي شيئًا فإن حشده عمله قليله وكثيره لشريكه الذي أشركه به، وأنا عنه غني".

حسن: رواه أحمد (17140) واللفظ له، والطبراني في الكبير (7/ 337)، والحاكم (4/
329)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 286، 269) كلهم من حديث عبد الحميد بن بهرام، عن شهر بن حوشب أنه سمع عبد الرحمن بن غنم يقول: فذكره.

إلا أن البعض لم يذكر فيه سماعه من عبد الرحمن بن غنم.

وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب غير أنه حسن الحديث، فقد وثقه ابن معين وأحمد ويعقوب بن سفيان والبخاري وغيرهم، وتكلم فيه شعبة وأبو حاتم والنسائي وابن حبان وغيرهم، وسبب كلامهم أنه كان يخطيء كثيرا فإذا ثبت خطؤه ضعِّف وإلا فهو حسن الحديث.

وأما عبد الحميد بن بهرأم فهو ممن ضبط حديث شهر بن حوشب إلا أنه لم يرتق إلى درجة الثقة فإنه حسن الحديث أيضًا. وقد حسّنه أيضًا الهيثمي في المجمع (10/ 53).




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: (শহর ইবনে হাওশাব বলেন) যখন আমি ও আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জাবিয়াহ মসজিদে প্রবেশ করলাম, তখন আমরা উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সাক্ষাৎ করলাম। তিনি আমার ডান হাত তাঁর বাম হাতে এবং আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাম হাত তাঁর ডান হাতে ধরলেন। তিনি আমাদের দু'জনের মাঝখান দিয়ে হাঁটতে লাগলেন, আর আমরা ফিসফিস করে কথা বলছিলাম। আমরা কী গোপন কথা বলছিলাম, তা আল্লাহ্ই ভালো জানেন। তিনি [উবাদাহ] বললেন:

যদি তোমাদের দু'জনের বা তোমাদের কারো হায়াত দীর্ঘ হয়, তবে অচিরেই তোমরা এমন ব্যক্তিকে দেখতে পাবে, যে মুসলমানদের মধ্যভাগ থেকে (অর্থাৎ সাধারণ মুসলিমদের মধ্য থেকে) উঠে আসবে। সে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভাষায় কুরআন তিলাওয়াত করবে। সে তা বারবার পড়বে, তার হালালকে হালাল করবে, তার হারামকে হারাম করবে এবং তার মনযিলসমূহে (বিধানসমূহে) অবতরণ করবে (অর্থাৎ মেনে চলবে)। অথবা সে তার ভাইয়ের ভাষায় মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ভাষায় তিলাওয়াত করবে। সে তা বারবার পড়বে, তার হালালকে হালাল করবে, তার হারামকে হারাম করবে এবং তার মনযিলসমূহে (বিধানসমূহে) অবতরণ করবে (অর্থাৎ মেনে চলবে)। (অথচ) তোমাদের মধ্যে তার অবস্থা মৃত গাধার মাথার মতো হবে, যা তোমাদের মাঝে কোনো পরিবর্তন আনবে না।

বর্ণনাকারী বলেন: আমরা যখন এভাবে ছিলাম, তখন শাদ্দাদ ইবনে আউস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আওফ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেখানে এলেন এবং আমাদের সাথে বসলেন। তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে লোকসকল! আমি তোমাদের ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে যা শুনে সবচেয়ে বেশি ভয় করি, তা হলো ‘গুপ্ত লালসা’ (আল-শাহওয়াতুল খাফিয়্যাহ) এবং ‘শিরক’।

তখন উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আমাদের বলেননি যে, “শয়তান আরব উপদ্বীপে তার উপাসনা হওয়া থেকে নিরাশ হয়ে গেছে”? গোপন লালসা সম্পর্কে তো আমরা জানি, তা হলো দুনিয়ার লালসা—এর নারী ও অন্যান্য ভোগ-বাসনা। কিন্তু শাদ্দাদ! এই শিরক কী, যা দিয়ে আপনি আমাদের ভয় দেখাচ্ছেন?

শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা কী মনে করো, যদি তোমরা কোনো ব্যক্তিকে কারো জন্য সালাত আদায় করতে, অথবা কারো জন্য সাওম পালন করতে, অথবা কারো জন্য সাদাকাহ দিতে দেখো—তোমরা কি মনে করো যে সে শিরক করেছে? তারা বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর কসম! যে ব্যক্তি কারো জন্য সালাত আদায় করে, বা কারো জন্য সাওম পালন করে, বা কারো জন্য সাদাকাহ করে, সে অবশ্যই শিরক করেছে।

তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি লোক দেখানোর উদ্দেশ্যে সালাত আদায় করে, সে শিরক করে। যে ব্যক্তি লোক দেখানোর উদ্দেশ্যে সাওম পালন করে, সে শিরক করে। আর যে ব্যক্তি লোক দেখানোর উদ্দেশ্যে সাদাকাহ করে, সে শিরক করে।”

তখন আওফ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ্ কি ঐ সমস্ত আমলের মধ্যে যেগুলোতে তাঁর সন্তুষ্টি উদ্দেশ্য ছিল, কেবল সেটুকু গ্রহণ করবেন না এবং যেগুলোতে শিরক করা হয়েছে, তা পরিত্যাগ করবেন না?

তখন শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, আল্লাহ্ তা‘আলা বলেন: “যে ব্যক্তি আমার সাথে অন্য কাউকে শরীক করে, আমিই তার জন্য উত্তম বণ্টনকারী। যে ব্যক্তি আমার সাথে কোনো কিছুকে শরীক করে, তার ছোট ও বড় সকল আমল সেই শরীকের জন্য হয়ে যায়, যাকে সে শরীক করেছে। আর আমি তার থেকে সম্পূর্ণ মুখাপেক্ষীহীন।”









আল-জামি` আল-কামিল (14693)


14693 - عن أبي سعيد الخدري قال: خرج علينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ونحن نتذاكر المسيح الدجال، فقال:"ألا أخبركم بما هو أخوف عليكم عندي من المسيح الدجال؟" قال: قلنا بلى. فقال:"الشرك الخفي: أن يقوم الرجل يصلي فيزين صلاته لما يرى من نظر رجل"

حسن: رواه ابن ماجه (4204) عن عبد اللَّه بن سعيد، حدّثنا أبو خالد الأحمر، عن كثير بن زيد، عن رُبيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد الخدري، عن أبيه، عن أبي سعيد قال: فذكره. وإسناده حسن من أجل ربيح بن عبد الرحمن مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، قال أبو زرعة: شيخ، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، وذكره ابن حبان في الثقات، فيُحسّن حديثه إذا كان له أصل، وهذا منه. وقد حسّنه أيضًا البوصيري في الزوائد.

وفي معناه ما رُويَ عن أبي موسى الأشعري قال: يا أيها الناس اتقوا هذا الشرك؟ فإنه أخفى من دبيب النمل، فقام إليه عبد اللَّه بن حزن وقيس بن المضارب فقالا: واللَّه لتخرجن مما قلت أو لنأتين عمر، مأذون لنا أو غير مأذون، قال: بل أخرج مما قلت خطبنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات يوم فقال:"أيها الناس اتقوا هذا الشرك؛ فإنه أخفى من دبيب النمل" فقال له من شاء اللَّه أن يقول وكيف نتقيه وهو أخفى من دبيب النمل يا رسول اللَّه؟ قال: قولوا:"اللهم إنا نعوذ بك من أن نشرك بك شيئًا نعلمه، ونستغفرك لما لا نعلم"

رواه أحمد (19606) واللفظ له، والطبراني في الأوسط (3503) كلاهما من طريق عبد اللَّه بن نمير، حدّثنا عبد الملك يعني ابن أبي سليمان العرزمي عن أبي علي رجل من بني كاهل قال خطبنا أبو موسى الأشعري فقال: فذكره.

وأبو علي مجهول، وهو من رجال التعجيل (1351) لم يروه عنه سوى عبد الملك بن أبي سليمان. وقال الهيثمي في المجمع (10/ 224):"رجاله رجال الصحيح غير أبي علي، ووثّقه ابن حبان".

وفي معناه ما رويَ أيضًا عن أبي بكر الصديق، أخرجه أبو يعلى (58، 59، 60، 61) بأسانيد منها: من طريق ليث بن أبي سليم، عن أبي محمد، عن حذيفة، عن أبي بكر -إما حضر ذلك
حذيفة من النبي صلى الله عليه وسلم وإما أخبره أبو بكر- أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الشرك فيكم أخفى من دبيب النمل".

وذكر فيه أشياء أخرى، هذا هو الإسناد الأول، وفيه ليث بن أبي سُليم وهو صدوق اختلط أخيرا، ولم يتميز حديثه فترك، وشيخه أبو محمد مجهول، وقد أشار إلى ذلك الهيثمي في المجمع (10/ 224).

والإسناد الثاني من وجه آخر عن ليث بن أبي سليم، عن أبي محمد، عن معقل بن يسار قال: حدثني أبو بكر عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكر مثله. وفيه مع ليث بن أبي سليم وشيخه أبي محمد، شيخ أبي يعلى عمرو بن الحصين متروك، وبه أعله الهيثمي.

والإسناد الثالث (60، 61) من وجه آخر عن ليث بن أبي سليم، عن أبي محمد، عن معقل بن يسار قال: شهدت النبي صلى الله عليه وسلم مع أبي بكر -أو قال: حدثني أبو بكر- عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: وهذا أحد ألفاظه:"الشرك أخفى فيكم من دبيب النمل" ثم قال:"ألا أدلك على ما يذهب عنك صغير ذلك وكبيره؟ قل: اللهم إني أعوذ بك أن أشرك بك وأنا أعلم، وأستغفرك مما لا أعلم" وفيه أيضًا ليث بن أبي سليم، وشيخه أبو محمد.

قال ابن الجوزي في العلل المتناهية (2/ 339):"هذا الحديث رواه ليث بن أبي سُليم عن أبي محمد شيخ له، عن حذيفة، عن أبي بكر، وتارة يقول: عن أبي محمد، عن معقل بن يسار، وتارة يقول: عن عثمان، عن رفيع، عن معقل بن يسار عن أبي بكر. قال أحمد:"ليث مضطرب الحديث"، وقال أبو حاتم وأبو زرعة:"لا نشتغل به". وأطال في إعلاله.

وفي معناه ما روي أيضًا عن عائشة، وابن عباس وفي إسنادهما مقال، إلا أن كثرة الشواهد تدل على أن له أصلا، فيجب على المسلم أن يخاف من الشرك الأصغر والخفي وهو الرياء.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের কাছে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, যখন আমরা মাসীহ দাজ্জাল সম্পর্কে আলোচনা করছিলাম। তখন তিনি বললেন: "আমি কি তোমাদের এমন কিছুর খবর দেব না, যা আমার কাছে মাসীহ দাজ্জালের চেয়েও তোমাদের জন্য বেশি ভয়ানক?" আমরা বললাম: অবশ্যই (দিন)। তিনি বললেন: "তা হলো গোপন শিরক: যখন কোনো ব্যক্তি সালাতে দাঁড়ায় এবং কোনো লোকের দৃষ্টির কারণে সে তার সালাতকে সুন্দর করে (অর্থাৎ লোক দেখানোর জন্য সালাতে সৌন্দর্য আনে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (14694)


14694 - عن جابر بن عبد اللَّه، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"اتقوا الظلم، فإن الظلم ظلمات يوم القيامة، واتقوا الشح، فإن الشح أهلك من كان قبلكم، حملهم على أن سفكوا دماءهم واستحلوا محارمهم"

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2578: 56) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدّثنا داود يعني ابن قيس، عن عبيد اللَّه بن مقسم، عن جابر، فذكره.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যুলম (অবিচার) করা থেকে বেঁচে থাকো। কারণ যুলম কিয়ামতের দিন ঘোর অন্ধকার হবে। আর তোমরা 'শুহ্' (তীব্র লোভ ও কৃপণতা) থেকে বেঁচে থাকো। কারণ 'শুহ্' তোমাদের পূর্ববর্তী লোকদেরকে ধ্বংস করে দিয়েছে। এটিই তাদেরকে তাদের রক্তপাত ঘটাতে এবং তাদের নিষিদ্ধ বিষয়গুলোকে হালাল করে নিতে প্ররোচিত করেছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (14695)


14695 - عن أبي هريرة قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"شر ما في رجل شح هالع وجبن خالع"

صحيح: رواه أبو داود (2511)، وأحمد (8010، 8263)، وابن حبان (3250)، والبيهقي (9/ 170) كلهم من طرق عن موسى بن عُلي بن رباح، عن أبيه، عن عبد العزيز بن مروان، عن
أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: মানুষের মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট যা বিদ্যমান তা হলো— তীব্র অস্থিরতা সৃষ্টিকারী কৃপণতা এবং পঙ্গুকারী কাপুরুষতা।









আল-জামি` আল-কামিল (14696)


14696 - عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه! إن لفلان نخلة في حائطي فمره فليبعنيها أو ليهبها لي قال: فأبى الرجل، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"افعل، ولك بها نخلة في الجنة فأبى فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"هذا أبخل الناس".

صحيح: رواه أحمد (23085) عن وكيع، حدّثنا الأعمش، عن أبي صالح ذكوان، عن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.

ذكره الهيثمي في المجمع (3/ 127) وقال:"رجاله رجال الصحيح".




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! অমুক ব্যক্তির একটি খেজুর গাছ আমার বাগানে রয়েছে। আপনি তাকে আদেশ করুন, যেন সে সেটি আমার নিকট বিক্রি করে দেয় অথবা আমাকে দান করে দেয়।' বর্ণনাকারী বলেন, লোকটি (গাছের মালিক) অস্বীকার করল (বা রাজি হলো না)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তা করো (অর্থাৎ তাকে দিয়ে দাও), এর বিনিময়ে তোমার জন্য জান্নাতে একটি খেজুর গাছ থাকবে।" কিন্তু সে তাতেও অস্বীকার করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "এই ব্যক্তিই সবচেয়ে কৃপণ মানুষ।"









আল-জামি` আল-কামিল (14697)


14697 - عن جابر أن رجلا أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إن لفلان في حائطي عذقا وإنه قد آذاني وشق علي مكان عذقه فأرسل إليه النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"بعني عذقك الذي في حائط فلان" قال: لا، قال:"فهبه لي" قال: لا، قال:"فبعنيه بعذق في الجنة" قال: لا، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ما رأيت الذي هو أبخل منك إلا الذي يبخل بالسلام"

حسن: رواه أحمد (14517) عن أبي عامر العقدي، حدّثنا زهير، عن عبد اللَّه بن محمد بن عقيل، عن جابر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد اللَّه بن محمد بن عقيل إلا أنه حسن الحديث.

ومن طريقه أخرجه الحاكم (2/ 20) وجعله شاهدا لحديث أنس وسكت عليه.

وأما ما رُوي عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خصلتان لا تجتمعان في مؤمن: البخل وسوء الخلق".

رواه الترمذيّ (1962)، والبخاري في الأدب المفرد (282) كلاهما من حديث صدقة بن موسى، قال: حدّثنا مالك بن دينار، عن عبد اللَّه بن غالب الحُدَّاني، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

قال الترمذيّ:"غريب، لا نعرفه إلا من حديث صدقة بن موسى".

وكذلك لا يصح ما روي عن أبي بكر الصديق عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يدخل الجنة خب ولا منان ولا بخيل".

رواه الترمذيّ: (1963) عن أحمد بن منيع، حدّثنا يزيد بن هارون، حدّثنا صدقة بن موسى، عن فرقد السبخي، عن مرة الطيب، عن أبي بكر الصديق، فذكره.

وفيه صدقة بن موسى ضعيف، وشيخه فرقد السبخي ضعيف أيضًا، ومرة الطيب لم يدرك أبا بكر.

ورواه همام بن يحيى، عن فرقد السبخي، عن مرة، عن أبي بكر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يدخل الجنة سيء الملكة".
رواه الترمذيّ (1946) عن أحمد بن منيع، قال: حدّثنا يزيد بن هارون، عن همام بن يحيى، فذكره. قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب وقد تكلم أيوب السختياني وغير واحد في فرقد السبخي من قبل حفظه".

ورواه أحمد (13) عن أبي سعيد مولى بني هاشم قال: حدّثنا صدقة بن موسى صاحب الدقيق، عن فرقد بهذا الإسناد، ولفظه:"لا يدخل الجنة بخيل ولا خب ولا خائن ولا سيء الملكة، وأول من يقرع باب الجنة المملوكون إذا أحسنوا فيما بينهم وبين اللَّه عز وجل وفيما بينهم وبين مواليهم".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: নিশ্চয় অমুক ব্যক্তির জন্য আমার বাগানে একটি খেজুরের ডাল/কাঁদি আছে। আর সেই ডাল/কাঁদির অবস্থানের কারণে সে আমাকে কষ্ট দেয় এবং এটি আমার জন্য কঠিন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার (অন্য ব্যক্তিটির) কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "তোমার সেই খেজুরের ডালটি, যা অমুকের বাগানে আছে, তা আমার কাছে বিক্রি করে দাও।" সে বলল: 'না।' তিনি বললেন: "তাহলে এটি আমাকে দান করো।" সে বলল: 'না।' তিনি বললেন: "তাহলে এর বিনিময়ে জান্নাতে একটি খেজুরের ডাল/কাঁদির বিনিময়ে তা বিক্রি করে দাও।" সে বলল: 'না।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমার চেয়ে কৃপণ আর কাউকে দেখিনি, শুধু সেই ব্যক্তি ছাড়া, যে সালাম দিতে কৃপণতা করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (14698)


14698 - عن أبي هريرة أن رجلا قال للنبي صلى الله عليه وسلم: أوصني، قال:"لا تغضب" فردد مرارا، قال:"لا تغضب"

صحيح: رواه البخاريّ في الأدب (6161) عن يحيى بن يوسف، أخبرنا أبو بكر هو ابن عياش، عن أبي حصين، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল: ‘আমাকে উপদেশ দিন।’ তিনি বললেন: ‘রাগ করো না।’ লোকটি বারবার (একই অনুরোধ) করল। (প্রতিবারই) তিনি বললেন: ‘রাগ করো না।’









আল-জামি` আল-কামিল (14699)


14699 - عن جارية بن قدامة أن رجلا قال له: يا رسول اللَّه! قل لي قولا وأقلل علي لعلي أعقله قال:"لا تغضب" فأعاد عليه مرارا كل ذلك يقول:"لا تغضب"

صحيح: رواه أحمد (15964)، وابن حبان (5690) كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن الأحنف بن قيس، عن جارية بن قدامة، فذكره. وإسناده صحيح، ووقع اختلاف طويل في إسناده، وما ذكرته هو أسلمها كما لمح ابن حجر في ترجمته من الإصابة.

وجارية بن قدامة مختلف في صحبته، وجزم أبو حاتم وغيره بأن له صحبة، واختاره ابن حجر في التقريب.




জারিয়াহ ইবনে কুদামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) বলল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমাকে এমন একটি উপদেশ দিন যা সংক্ষেপে হবে, যেন আমি তা সহজে মনে রাখতে পারি।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ক্রোধ করো না।" লোকটি এই অনুরোধ কয়েকবার পুনরাবৃত্তি করল, আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতিবারই বললেন, "ক্রোধ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (14700)


14700 - عن رجل من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: قال رجل: أوصني يا رسول اللَّه! قال:"لا تغضب"، قال الرجل: ففكرت حين قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ما قال، فإذا الغضب يجمع الشر كله.

وفي لفظ: عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أن رجلا قال للنبي صلى الله عليه وسلم: أخبرني بكلمات أعيش بهن ولا تكثر علي فأنسى قال:"اجتنب الغضب" ثم أعاد عليه، فقال:"اجتنب الغضب"

صحيح: رواه أحمد (23171) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (20286) - عن معمر، عن
الزهري، عن حميد بن عبد الرحمن، عن رجل من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فذكره. وإسناده صحيح، وجهالة الصحابي لا تضر.

واللفظ الثاني رواه أحمد (23468)، وابن أبي شيبة (25386) كلاهما عن سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن حميد بن عبد الرحمن بن عوف، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وإسناده أيضًا صحيح إلا أن مالكا رواه في الموطأ عن الزهري عن حميد مرسلا، والحكم لمن وصل.




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে উপদেশ দিন। তিনি বললেন: "তুমি রাগ করো না।" লোকটি বলল: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই কথা বললেন, তখন আমি চিন্তা করলাম। আমি দেখলাম, রাগ সমস্ত মন্দকে একত্রিত করে ফেলে।

অপর এক বর্ণনায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল: আমাকে এমন কিছু কথা বলে দিন যার মাধ্যমে আমি জীবন যাপন করতে পারি, আর বেশি বলবেন না যাতে আমি ভুলে যাই। তিনি বললেন: "তুমি রাগ পরিহার করো।" অতঃপর সে পুনরায় জানতে চাইল, তখন তিনি বললেন: "তুমি রাগ পরিহার করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (14701)


14701 - عن عبد اللَّه بن عمرو أنه سأل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ماذا يباعدني من غضب اللَّه عز وجل؟ قال:"لا تغضب"

حسن: رواه أحمد (6635) عن حسن (هو ابن موسى)، حدّثنا ابن لهيعة، حدّثنا دراج، عن عبد الرحمن بن جبير، عن عبد اللَّه بن عمرو، فذكره.

وابن لهيعة فيه كلام معروف، وقد تابعه عمرو بن الحارث، عن دراج بإسناده.

رواه ابن حبان (296) عن أبي يعلى الموصلي قال: حدّثنا أحمد بن عيسى المصري قال: حدّثنا ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، فذكره.

وإسناده حسن من أجل درّاج وهو ابن سمعان أبو السمح، روايته عن غير أبي الهيثم مستقيمة.




আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন, "কী জিনিস আমাকে আল্লাহ তা'আলার ক্রোধ থেকে দূরে রাখবে?" তিনি বললেন, "রাগ করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (14702)


14702 - عن عبد اللَّه بن مسعود، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما تعدون الرقوب فيكم؟" قال قلنا: الذي لا يولد له، قال:"ليس ذاك بالرقوب ولكنه الرجل الذي لم يقدم من ولده شيئًا" قال:"فما تعدون الصرعة فيكم؟" قال قلنا: الذي لا يصرعه الرجال، قال:"ليس بذلك، ولكنه الذي يملك نفسه عند الغضب"

صحيح: رواه مسلم في البر والصلة (2608: 106) من طرق عن الأعمش، عن إبراهيم التيمي، عن الحارث بن سويد، عن عبد اللَّه بن مسعود، قال: فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের মধ্যে কাকে 'রুকূব' (নিঃসন্তান) মনে করো?" আমরা বললাম: যার কোনো সন্তান জন্মায় না। তিনি বললেন: "সে প্রকৃত 'রুকূব' নয়। বরং রুকূব হলো সেই ব্যক্তি, যে তার কোনো সন্তানকে [মৃত্যুর মাধ্যমে] অগ্রগামী করেনি।" তিনি বললেন: "আর তোমরা তোমাদের মধ্যে কাকে 'সুরআহ' (মহাবীর) মনে করো?" আমরা বললাম: যাকে কোনো পুরুষ কুস্তিতে পরাজিত করতে পারে না। তিনি বললেন: "সে প্রকৃত সুরআহ নয়। বরং সে হলো সেই ব্যক্তি, যে রাগের সময় নিজেকে নিয়ন্ত্রণ করতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (14703)


14703 - عن أبي هريرة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ليس الشديد بالصرعة، إنما الشديد الذي يملك نفسه عند الغضب"

متفق عليه: رواه مالك في حسن الخلق (12) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاريّ في الأدب (6114)، ومسلم في البر والصلة (2609: 107) كلاهما من طريق مالك به.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শক্তিশালী তো সেই নয়, যে কুস্তিতে (অপরকে) ধরাশায়ী করে, বরং শক্তিশালী সেই ব্যক্তি, যে রাগের সময় নিজেকে নিয়ন্ত্রণ করতে পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (14704)


14704 - عن سليمان بن صرد، قال: استبّ رجلان عند النبي صلى الله عليه وسلم ونحن عنده جلوس،
وأحدهما يسب صاحبه، مغضبا قد احمرّ وجهه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إني لأعلم كلمة، لو قالها لذهب عنه ما يجد، لو قال: أعوذ باللَّه من الشيطان الرجيم" فقالوا للرجل: ألا تسمع ما يقول النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: إني لست بمجنون.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6115)، ومسلم في البر والصلة (2610) كلاهما من طرق عن الأعمش، عن عدي بن ثابت، حدّثنا سليمان بن صرد، قال: فذكره.




সুলাইমান ইবনে সুরদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম, তখন দুইজন লোক তাঁর সামনে গালাগালি করছিল। তাদের মধ্যে একজন অন্যজনকে গালি দিচ্ছিল, রাগে তার চেহারা লাল হয়ে গিয়েছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি এমন একটি বাক্য জানি, যদি সে তা বলে, তবে তার এই রাগ দূর হয়ে যাবে। তা হলো: 'আউযু বিল্লাহি মিনাশ শাইতানির রাজীম' (আমি বিতাড়িত শয়তান থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই)।" তখন লোকেরা লোকটিকে বলল: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বলছেন, তা কি তুমি শুনছ না? সে বলল: আমি তো পাগল নই।









আল-জামি` আল-কামিল (14705)


14705 - عن أبي ذر قال: كان يسقي على حوض له فجاء قوم فقال: أيكم يورد على أبي ذر ويحتسب شعرات من رأسه؟ فقال رجل: أنا، فجاء الرجل فأورد عليه الحوض فدقّه، وكان أبو ذر قائما فجلس، ثم اضطجع، فقيل له: يا أبا ذر! لم جلست ثم اضطجعت؟ قال: فقال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال لنا:"إذا غضب أحدكم وهو قائم فليجلس، فإن ذهب عنه الغفسب، وإلا فليضطجع"

صحيح: رواه أحمد (21348) عن أبي معاوية، حدّثنا داود بن أبي هند، عن أبي حرب بن أبي الأسود، عن أبي الأسود، عن أبي ذر، فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أبو داود (4782) عن أحمد بن محمد بن حنبل، عن أبي معاوية به ولم يذكر"أبا الأسود" بين أبي حرب وأبي ذر، فلعله كان هكذا (منقطعا) في نسخته، وبناء على ذلك أعله.

ورواه (4783) عن وهب بن بقية، عن خالد، عن داود، عن بكر (هو ابن عبد اللَّه المزني) أن النبي صلى الله عليه وسلم بعث بهذا الحديث، وقال:"هذا أصحّ الحديثين".

وذكر المزي في تحفة الأشراف (9/ 193) بعده:"إنما يروي أبو حرب عن عمه، عن أبي ذر، ولا يُحفظ له سماع من أبي ذر".

وذكر الدارقطني في العلل (1135) الاختلاف في هذا الحديث، ورجّح مرسل أبي حرب بن الأسود، عن أبي ذر يعني الإسناد المنقطع عن أبي ذر على الموصول الذي ذكره عن عباس بن يزيد، عن أبي معاوية.

وعباس بن يزيد كان يخطئ، ولم يذكر إسناد أحمد الموصول.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর একটি পানির চৌবাচ্চার (হাউজের) উপর পানি সেচ করছিলেন, তখন একদল লোক এলো। তিনি বললেন: তোমাদের মধ্যে কে আবূ যারের চৌবাচ্চাটিতে পানি এনে দেবে এবং এর বিনিময়ে (সওয়াবের প্রত্যাশায়) তার মাথার কয়েকটি চুল আল্লাহর কাছে উৎসর্গ করবে? এক ব্যক্তি বলল: আমি। লোকটি এলো এবং চৌবাচ্চাটিতে পানি ভরে দিল। আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন দাঁড়িয়ে ছিলেন, তিনি বসে পড়লেন, এরপর শুয়ে পড়লেন। তাকে বলা হলো: হে আবূ যার! আপনি কেন বসলেন এবং তারপর শুয়ে পড়লেন? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) আমাদের বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ দাঁড়ানো অবস্থায় রাগান্বিত হয়, তখন সে যেন বসে পড়ে। যদি এতে তার রাগ চলে যায়, (তবে তো ভালো), অন্যথায় সে যেন শুয়ে পড়ে।"









আল-জামি` আল-কামিল (14706)


14706 - عن عائشة قالت: دخل علي النبي صلى الله عليه وسلم وفي البيت قرام فيه صور، فتلوّنَ وجهه ثم تناول الستر فهتكه، وقالت: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"إن من أشد الناس عذابا يوم القيامة الذين يصورون هذه الصور"
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6109)، ومسلم في اللباس والزينة (2107: 91) كلاهما من طريق الزهري، عن القاسم، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার কাছে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রবেশ করলেন, অথচ ঘরে ছবিযুক্ত একটি পর্দা (ক্বিরাম) ছিল। তখন তাঁর মুখমণ্ডল বিবর্ণ হয়ে গেল। অতঃপর তিনি পর্দাটি ধরে ছিঁড়ে ফেললেন। আর তিনি (আয়িশা) বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় কিয়ামতের দিন ঐ সমস্ত লোক কঠিনতম শাস্তির সম্মুখীন হবে যারা এই ধরনের ছবি অঙ্কন করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (14707)


14707 - عن أبي مسعود قال: أتى رجل النبي صلى الله عليه وسلم فقال: إني لأتأخر عن صلاة الغداة، من أجل فلان مما يطيل بنا، قال: فما رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قط أشد غضبا في موعظة منه يومئذ، قال: فقال:"يا أيها الناس! إن منكم منفرين، فأيكم ما صلى بالناس فليتجوز، فإن فيهم المريضر والكبير وذا الحاجة"

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6110)، ومسلم في الصلاة (466) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، حدّثنا قيس بن أبي حازم، عن أبي مسعود، فذكره.




আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, 'আমি অমুক ব্যক্তির কারণে ফজরের সলাত থেকে দেরি করে আসি। কারণ তিনি আমাদের নিয়ে (সলাতে ক্বিরাআত) খুব দীর্ঘ করেন।' আবূ মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেই দিনের মতো আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উপদেশ প্রদানকালে আর কখনও এত বেশি রাগান্বিত হতে দেখিনি। অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে লোক সকল! তোমাদের মধ্যে এমন লোক আছে যারা (মানুষকে ইবাদত থেকে) বিতাড়িত করে। সুতরাং, তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তিই লোকদের নিয়ে সলাত আদায় করাবে, সে যেন সংক্ষিপ্ত করে (বা হালকা করে)। কারণ তাদের মধ্যে দুর্বল, অসুস্থ, বৃদ্ধ এবং প্রয়োজন সম্পন্ন লোক থাকে।"