আল-জামি` আল-কামিল
14788 - عن أبي رِمْثة، قال: انطلقتُ مع أبي إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فلما رأيته قال أبي: من هذا؟ قلت: لا أدري، قال: هذا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فاقشعْررْتُ حين قال ذلك، وكنت أظن أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا يُشْبه الناس، فإذا له وفرة بها ردع من حِنّاء، وعليه بُردان أخضران، فسلم عليه أبي، ثم أخذ يحدثنا ساعة، قال:"ابنك هذا؟" قال: إي ورب الكعبة أشهد به، قال:"أما إن ابنك هذا لا يَجْني عليك ولا تَجْني عليه"، ثم قرأ
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: {وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَى} ثم نظر إلى السلعة التي بين كتفيه، فقال: يا رسول اللَّه، إني كأطبِّ الرجال، ألا أُعالجها؟ قال:"طبيبُها الذى خلقها".
صحيح: رواه أحمد (7109)، وأبو داود (4206)، والنسائي (1572)، والترمذي (2812)، وصحّحه ابن حبان (5995) كلهم من حديث عبيد اللَّه بن إياد بن لقيط، عن إياد بن لقيط، عن أبي رمْثة، فذكره.
واللفظ لأحمد وابن حبان، وغيرهما ذكروه مختصرًا. وإسناده صحيح.
আবূ রিমছা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পিতার সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। যখন আমি তাঁকে দেখলাম, আমার পিতা জিজ্ঞেস করলেন: ইনি কে? আমি বললাম: আমি জানি না। তিনি (পিতা) বললেন: ইনিই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি (পিতা) একথা বলার সাথে সাথেই আমার শরীর শিহরিত হলো। কারণ আমি মনে করতাম যে, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখতে সাধারণ মানুষের মতো হবেন না। তখন দেখলাম, তাঁর কাঁধ পর্যন্ত চুল ছিল, তাতে মেহেদির আভা ছিল। আর তাঁর পরনে ছিল দু’টি সবুজ চাদর। অতঃপর আমার পিতা তাঁকে সালাম দিলেন। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুক্ষণ আমাদের সাথে কথা বললেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করলেন: "এ কি তোমার ছেলে?" তিনি (পিতা) বললেন: হাঁ, কাবার রবের কসম, আমি এ ব্যাপারে সাক্ষ্য দিচ্ছি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "শোনো! তোমার এই ছেলে তোমার জন্য (তোমার কৃতকর্মের জন্য) দায়ী হবে না এবং তুমিও তার জন্য (তার কৃতকর্মের জন্য) দায়ী হবে না।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিলাওয়াত করলেন: "আর কোনো বহনকারী অপরের বোঝা বহন করবে না।" এরপর তিনি (পিতা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দু’কাঁধের মধ্যখানের মাংসপিণ্ডটির (নবুওয়তের মোহর) দিকে তাকিয়ে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি তো লোকেদের মধ্যে সেরা ডাক্তার। আমি কি এর চিকিৎসা করব না? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এর চিকিৎসক তো তিনিই, যিনি এটিকে সৃষ্টি করেছেন।"
14789 - عن عائشة قالت: صنعتُ لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بردة سوداء فلبسها، فلما عرق فيها وجد ريح الصوف فقذفها.
قال: وأحسبه قال: وكان تُعجبه الريحُ الطيبة.
صحيح: رواه أبو داود (4074) وأحمد (25003)، وصحّحه ابن حبان (6395) كلهم من حديث همام بن يحيى، عن قتادة، عن مطرف بن عبد اللَّه بن الشخير، عن عائشة، فذكرته.
وإسناده صحيح، وقد رُوي من غير طريق همام، عن مُطَرف مرسلا.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য একটি কালো চাদর (বুরদা) তৈরি করলাম। তিনি সেটি পরিধান করলেন। যখন তিনি তাতে ঘামলেন, তখন তিনি পশমের গন্ধ অনুভব করলেন এবং তা ফেলে দিলেন। (রাবী) বলেন, আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: আর সুগন্ধি তাঁর নিকট প্রিয় ছিল।
14790 - عن أنس بن مالك قال: كنت أمشي مع النبي صلى الله عليه وسلم وعليه بُرد نجراني غليظ الحاشية.
متفق عليه: رواه البخاريّ في فرض الخمس (3149)، ومسلم في الزكاة (1057) كلاهما من طريق مالك، عن إسحاق بن عبد اللَّه، عن أنس بن مالك، فذكره. وهو ليس فى رواية يحيى الليثي، عن مالك.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হাঁটছিলাম, আর তাঁর উপর একটি নাজরানি চাদর ছিল, যার কিনারা ছিল মোটা।
14791 - عن سهل بن سعد أن امرأة جاءتِ النبي صلى الله عليه وسلم ببردةٍ منسوجة فيها حاشيتُها، -أتدرون ما البردةُ؟ قالوا: الشملة، قال: نعم-، قالت: نسجتُها بيدي فجئت لأكسوكها، فأخذها النبي صلى الله عليه وسلم محتاجًا إليها، فخرج إلينا وإنها إزاره، فحسّنها فلان، فقال: اكسُنِيها، ما أَحْسَنها! قال القوم: ما أحسنتَ، لبسها النبي صلى الله عليه وسلم محتاجًا إليها، ثم سألته، وعلمتَ أنه لا يردُّ، قال: إني واللَّه ما سألتُها لأَلْبسها، إنما سألتُه لتكون كفني. قال سهل: فكانت كفنه.
صحيح: رواه البخاريّ في الجنائز (1277) عن عبد اللَّه بن مسلمة، عن ابن أبي حازم، عن أبيه، عن سهل، فذكره.
قوله:"البرود" جمع برد أو بردة، وهي كساء أسود مربع وفيه خطوط.
قوله:"الشملة": ما يلتحف بها من الأكيسة.
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে একটি বোনা চাদর নিয়ে এসেছিলেন, যার মধ্যে সেটির কিনারা ছিল। (তোমরা কি জানো, 'বুরদাহ' কী? তারা বলল: তা হলো 'শামলাহ' বা মোটা চাদর। তিনি বললেন: হ্যাঁ)। মহিলাটি বললেন: আমি নিজের হাতে এটি বুনেছি এবং আপনাকে পরিধান করানোর জন্য নিয়ে এসেছি। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা গ্রহণ করলেন, কারণ তিনি সেটির মুখাপেক্ষী ছিলেন। অতঃপর তিনি যখন আমাদের কাছে বের হলেন, তখন সেটি ছিল তাঁর তহবন্দ (লুঙ্গি বা নিচের পরিধেয়)। তখন এক ব্যক্তি সেটির খুব প্রশংসা করল এবং বলল: আমাকে এটি পরিধান করতে দিন, কতই না সুন্দর এটি! লোকেরা (উপস্থিত সাহাবীগণ) বললেন: আপনি ভালো কাজ করেননি। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটি তাঁর প্রয়োজন হেতু পরিধান করলেন, আর আপনি তাঁকে তা চাইতে গেলেন, অথচ আপনি জানেন যে তিনি কাউকে ফেরান না। লোকটি বলল: আল্লাহর কসম! আমি এটি পরার জন্য চাইনি। আমি তো শুধু চেয়েছি যেন এটি আমার কাফন হয়। সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অতঃপর সেটিই তার কাফন হয়েছিল।
14792 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: أهدى أبو جهم بن حذيفة لرسول صلى الله عليه وسلم خميصة شامية، لها علم، فشهد فيها الصلاة، فلما انصرف قال:"رُدِّي هذه الخميصة إلى أبي جهم، فإني نظرت إلى علمها في الصلاة، فكاد يفتنني".
صحيح: رواه مالك في الموطأ (484) برواية أبي مصعب الزهري - عن علقمة بن أبي علقمة، عن أمه أن عائشة قالت: فذكرته.
تنبيه: ورواه يحيى الليثي عن مالك في الصلاة (67) فأسقط من إسناده"عن أمه".
قال ابن عبد البر في التمهيد (20/ 108):"ولم يتابعه على ذلك أحد من الرواة، وكلهم رواه عن مالك في الموطأ عن علقمة بن أبي علقمة عن أمه عن عائشة، وأسقط يحيى"عن أمه" وهو مما عُدّ عليه، والحديث صحيح متصل لمالك عن عائشة، كذلك رواه جماعة أصحاب مالك عنه" أهـ.
قلت: وأما ما جاء في مطبوعة الموطأ برواية الليثي بإثبات"عن أمه" فهو خطأ، ويعد من تصرفات المحقق. واللَّه المستعان.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, তিনি বলেন: আবূ জাহম ইবনু হুযাইফা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নকশা করা একটি শামী চাদর (খামীসা) উপহার দিলেন। তিনি সেটি পরিধান করে সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি (সালাত শেষে) ফিরলেন, তখন বললেন: "এই খামীসাটি আবূ জাহমের কাছে ফিরিয়ে দাও, কারণ আমি সালাতে এর নকশার দিকে তাকিয়েছিলাম, আর এটি প্রায় আমাকে ফিতনায় ফেলে দিচ্ছিল।"
14793 - عن عائشة، أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى في خميصة لها أعلام، فنظر إلى أعلامها نظرة، فلما انصرف قال:"اذهبوا بخميصتي هذه إلى أبي جهم وأتوني بأنبجانية أبي جهم، فإنها ألهتني آنفا عن صلاتي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصلاة (373)، ومسلم في المساجد (556) كلاهما من حديث الزهري، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নকশাযুক্ত একটি খামীসাহ (চাদর) পরিধান করে সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি সেটির নকশাগুলোর দিকে একবার তাকালেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, তখন বললেন: "তোমরা আমার এই খামীসাহটি আবু জাহমের কাছে নিয়ে যাও এবং আবু জাহমের আন্-বাজানিয়্যাহ (সাদামাটা চাদর) নিয়ে আসো। কারণ এই মাত্র এটি আমাকে আমার সালাত থেকে অমনোযোগী করে দিয়েছিল।"
14794 - عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كانت له خميصة لها علم، فكان يتشاغل بها في الصلاة، فأعطاها أباجهم، وأخذ كساءً له أَنْبِجانيا.
صحيح: رواه مسلم في المساجد (556: 63) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا وكيع، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
وأبو جهم هو عامر بن حذيفة بن غانم القرشي العدوي المدني صحابي معروف، إنه من مسلمة الفتح، وكان من معمري قريش وهو الذي جاء ذكره في حديث فاطمة بنت قيس لما قالت: إن معاوية وأبا جهم خطباني وجاء فيه:"وأما أبو جهم فلا يضع عصاه عن عاتقه". أي إنه كان ضرّابا للنساء.
قوله:"خميصة": هو قميص غليظ له أعلام.
وقوله:"أنبِجانية": منسوبة إلى موضع اسمه أَنبِجان، وهي كساء يتخذ من الصوف وله خمل،
وليس له علم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি নকশা বা চিত্রাঙ্কিত মোটা চাদর (খামীসা) ছিল, যার কারণে তিনি সালাতের মধ্যে তাতে মশগুল হয়ে যেতেন (মনোযোগ বিঘ্নিত হতো)। তখন তিনি সেটি আবূ জাহমকে দিয়ে দিলেন এবং তার জন্য একটি আনবিজানী (নকশাহীন মোটা) চাদর গ্রহণ করলেন।
14795 - عن عبد اللَّه، مولى أسماء بنت أبي بكر، -وكان خال ولد عطاء-، قال: أرسلتني أسماء إلى عبد اللَّه بن عمر، فقالت: بلغني أنك تحرم أشياء ثلاثة: العلم في الثوب، وميثرة الأُرجُوان، وصوم رجب كله، فقال لي عبد اللَّه: أما ما ذكرتْ من رجب فكيف بمن يصوم الأبد؟ وأما ما ذكرتْ من العلم في الثوب، فإني سمعت عمر بن الخطاب يقول: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنما يلبس الحرير من لا خلاق له" فخفت أن يكون العلم منه، وأما ميثَرة الأُرجُوان، فهذه ميثرة عبد اللَّه، فإذا هي أرجوان.
فرجعت إلى أسماء فخبّرتُها، فقالت: هذه جبة رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأخرجت إلي جبة طيالسة كسروانية لها لبنةُ ديباج، وفرجَيْها مكفوفين بالديباج، فقالت: هذه كانت عند عائشة حتى قُبِصْتْ، فلما قبضت قبضتُها، وكان النبي صلى الله عليه وسلم يلبسها، فنحن نغسلها للمرضى يستشفى بها.
صحيح: رواه مسلم في اللباس (2069) عن يحيى بن يحيى، أخبرنا خالد بن عبد اللَّه، عن عبد الملك، عن عبد اللَّه مولى أسماء بنت أبي بكر، فذكره.
قال النووي:"الأرجوان" بضم الهمزة والجيم هذا هو الصواب المعروف في روايات الحديث، وفي كتب الغريب، وفي كتب اللغة وغيرها، وكذا صرح به القاضي في المشارق، وفي شرح القاضي عياض في موضعين منه أنه بفتح الهمزة وضم الجيم، وهذا غلط ظاهر من النساخ لا من القاضي عياض، قال أهل اللغة وغيرهم: هو صبغ أحمر شديد الحمرة، هكذا قاله أبو عبيد والجمهور. وقال الفراء: هو الحمرة، وقال ابن فارس: هو كل لون أحمر، وقيل: هو الصوف الأحمر، وقال الجوهري: هو شجر له نور أحمر أحسن ما يكون، قال: وهو معرب، وقال آخرون: هو عربي، قالوا: والذكر والأنثى فيه سواء، يقال: هذا ثوب أرجُوان، وهذه قطيفة أرجُوان، وقد يقولونه على الصفة، ولكن الأكثر في استعماله إضافة الأرجوان إلى ما بعده.
وقال:"أما جواب ابن عمر في صوم رجب فإنكار منه لما بلغها عنه من تحريمه، وإخبار بأنه يصوم رجبا كله، وأنه يصوم الأبد، والمراد بالأبد ما سوى أيام العيدين والتشريق، وهذا مذهبه ومذهب أبيه عمر بن الخطاب وعائشة وأبي طلحة وغيرهم من سلف الأمة، ومذهب الشافعي وغيره من العلماء أنه لا يكره صوم الدهر.
وأما ما ذكرت عنه من كراهة العلم فلم يعترف بأنه كان يحرمه بل أخبر أنه تورع عنه خوفا من دخوله في عموم النهي عن الحرير.
وأما المئثرة فأنكر ما بلغها عنه فيها، وقال: هذه مئثرتي، وهي أرجوان، والمراد أنها حمراء، وليست من حرير بل من صوف أو غيره، وقد سبق أنها قد تكون من حرير وقد تكون من صوف، وأن الأحاديث الواردة في النهي عنها مخصوصة بالتي هي من الحرير.
وأما إخراج أسماء جبة النبي صلى الله عليه وسلم المكفوفة بالحرير فقصدت بها بيان أن هذا ليس محرما، وهكذا الحكم عند الشافعي وغيره أن الثوب والجبة والعمامة ونحوها إذا كان مكفوف الطرف بالحرير جاز ما لم يزد على أربع أصابع، فإن زاد فهو حرام لحديث عمر رضي الله عنه عنه المذكور بعد هذا.
وأما قوله"جبة طيالسة" فهو بإضافة جبة إلى طيالسة، والطيالسة جمع طيلسان بفتح اللام على المشهور، قال جماهير أهل اللغة: لا يجوز فيه غير فتح اللام، وعدوا كسرها في تصحيف العوام، وذكر القاضي في المشارق في حرف السين والياء في تفسير الساج أن الطيلسان يقال بفتح اللام وضمها وكسرها، وهذا غريب ضعيف.
وأما قوله"كِسْروانية" فهو بكسر الكاف وفتحها والسين ساكنة والراء مفتوحة، ونقل القاضي أن جمهور الرواة رووه بكسر الكاف، وهو نسبة إلى كِسرى صاحب العراق ملك الفرس، وفيه كسر الكاف وفتحها. قال القاضي: ورواه الهروي في مسلم فقال: خسروانية.
والنهي عن الحرير المراد به الثوب المتمحض من الحرير، أو ما أكثره حرير، وأنه ليس المراد تحريم كل جزء منه، بخلاف الخمر والذهب، فإنه يحرم كل جزء منهما.
وأما قوله في الجبة"إن لها لِبْنة" فهو بكسر اللام وإسكان الباء، هكذا ضبطها القاضي وسائر الشراح، وكذا هي في كتب اللغة والغريب، قالوا: وهي رقعة في جيب القميص هذه عبارتهم كلهم. واللَّه أعلم.
وأما قولها"وفرجيها مكفوفين" فكذا وقع في جميع النسخ:"وفرجيها مكفوفين" وهما منصوبان بفعل محذوف، أي: ورأيت فرجيها مكفوفين، ومعنى المكفوف أنه جعل لها كُفة بضم الكاف، وهو ما يكف به جوانبها، ويعطف عليها، ويكون ذلك في الذيل وفي الفرجين وفي الكمين، وفي هذا جواز لباس الجبة ولباس ماله فرجان، وأنه لا كراهة فيه" اهـ.
আবদুল্লাহ, আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত গোলাম—যিনি আতা’র সন্তানদের মামা ছিলেন—তিনি বলেন: আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে আবদুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠালেন এবং বললেন: আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে আপনি তিনটি জিনিসকে হারাম মনে করেন: কাপড়ের উপর রেশমের চিহ্ন ('আলাম'), আরজুয়ান (রক্তিম লাল) রঙের মিছারা (গদি বা আবরণ), এবং পুরো রজব মাসের সওম।
তখন আবদুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: রজব মাস সম্পর্কে সে যা উল্লেখ করেছে, তার ক্ষেত্রে সে কী বলবে যে সর্বদা সওম পালন করে? (অর্থাৎ, আমি তো সারা বছরই সওম রাখি)। আর কাপড়ে তৈরি ‘আলাম’ (রেশমী নকশা) সম্পর্কে সে যা বলেছে, তার বিষয়ে আমি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, তিনি বলেছেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই যে ব্যক্তি (দুনিয়াতে) রেশম পরিধান করে, তার জন্য আখিরাতে কোনো অংশ নেই।” তাই আমি ভয় করতাম যে সেই ‘আলাম’ (রেশমের চিহ্ন) হয়তো এর অন্তর্ভুক্ত। আর আরজুয়ান (রক্তিম লাল) মিছারা’র ব্যাপারে, এই হলো আবদুল্লাহর মিছারা, আর তা ছিল আরজুয়ান রঙের।
অতঃপর আমি আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ফিরে এলাম এবং তাঁকে (আবদুল্লাহ ইবন উমরের) উত্তর জানালাম। তখন তিনি বললেন: এটি তো রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের জুব্বা। এরপর তিনি আমার কাছে একটি কিসরওয়ানি (পারস্যের তৈরি) তায়ালিসা জুব্বা বের করলেন, যার গলার কাছে রেশমের একটি টুকরা (লেবনা) লাগানো ছিল এবং এর দুই দিকের (নিচের) অংশগুলোও রেশম দিয়ে সেলাই করা ছিল।
তিনি বললেন: এটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিল, যতক্ষণ না তিনি ইন্তেকাল করেন। যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, তখন আমি এটি গ্রহণ করলাম। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এটি পরিধান করতেন। আর আমরা এটি অসুস্থ লোকদের জন্য ধৌত করি, যাতে এর মাধ্যমে আরোগ্য লাভ করা যায়।
14796 - عن قتادة عن أنس قال: قلت له: أي الثياب كان أحب إلى النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال: الحبرة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5812)، ومسلم في اللباس (2079) كلاهما من طريق همام حدّثنا قتادة به، فذكره.
قوله:"الحبرة": بوزن عِنَبة، ويقال: برد حبير، وبرد حبرة على الوصف والإضافة. قال ابن بطال: هي من برود اليمن تصنع من قطن، وكان أشرف الثياب عندهم، وقال القرطبي: سميت حبرة لأنها تحبر أي تزيّن. والتحبير: التزيين والتحسين. فتح الباري (10/ 277).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কোন পোশাকটি সবচেয়ে বেশি প্রিয় ছিল? তিনি বললেন: হিবারা (নামক চাদর)।
14797 - عن أنس بن مالك، قال: كنت أمشي مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وعليه برد نجراني غليظ الحاشية، فأدركه أعرابي فجبذه بردائه جبذة شديدة، حتى نظرت إلى صفحة عاتق رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد أثرت بها حاشية البرد من شدة جبذته، ثم قال: يا محمد، مر لي من مال اللَّه الذي عندك، فالتفت إليه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ثم ضحك، ثم أمر له بعطاء.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5809)، ومسلم في الزكاة (1057) كلاهما من طريق مالك بن أنس، عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، عن أنس بن مالك، فذكره. واللفظ للبخاري ولفظ مسلم مثله إلا أنه قال:"وعليه رداء نجراني، وقد أثّرتْ بها حاشية الرداء".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হাঁটছিলাম, আর তাঁর গায়ে ছিল নাজরানি মোটা পাড়ের একটি চাদর। তখন একজন বেদুঈন (আরব) এসে তাঁকে সেই চাদর ধরে সজোরে টান দিল। এমনকি আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাঁধের ওপর দেখলাম যে, তার সেই চাদরের পাড়ের দাগ পড়ে গেছে, এত জোরে সে টেনেছিল। এরপর সে বলল, হে মুহাম্মাদ! আপনার কাছে আল্লাহর যে সম্পদ আছে, তা থেকে আমাকে কিছু দেওয়ার নির্দেশ দিন। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার দিকে ফিরলেন, এরপর হাসলেন এবং তাকে কিছু দান করার নির্দেশ দিলেন।
14798 - عن عائشة أم المؤمنين قالت: سُجّي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حين مات بثوب حبرة. وفي لفظ: ببرد حبرة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5814)، ومسلم في الجنائز (942) كلاهما من حديث ابن شهاب الزهري، أن أبا سلمة بن عبد الرحمن، أخبره أن عائشة أم المؤمنين قالت: فذكرته. واللفظ لمسلم والآخر للبخاري.
আয়িশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন ইন্তেকাল করেন, তখন তাঁকে একটি হিবরাহ কাপড় দিয়ে আবৃত করা হয়েছিল। অন্য একটি বর্ণনায় আছে: একটি হিবরাহ চাদর দিয়ে (আবৃত করা হয়েছিল)।
14799 - عن عائشة، قالت: صلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في خميصة له لها أعلام، فنظر إلى أعلامها نظرة، فلما سلم قال:"اذهبوا بخميصتي هذه إلى أبي جهم، فإنها ألهتني آنفا عن صلاتي، وأتوني بأنبجانية أبي جهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5817)، ومسلم في المساجد (556) كلاهما من طريق ابن شهاب الزهري، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
قوله:"بخميصتي" قال الأصمعي:"الخمائص: ثياب خز أو صوف معلمة وهى سود كانت من لباس الناس".
وقال أبو عبيد: هو كساء مربع له عَلَمان. وقيل: هي كساء رقيق من أي لون كان، وقيل: لا تسمى خميصة حتى تكون سوداء معلمة. فتح الباري (10/ 279).
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর একটি খামীসা (পোশাক) পরিধান করে সালাত আদায় করলেন, যাতে নকশা (আলাম) ছিল। অতঃপর তিনি একবার তার নকশার দিকে তাকালেন। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন বললেন: "আমার এই খামীসাটি আবূ জাহমের কাছে নিয়ে যাও। কেননা এই মাত্র এটি আমাকে আমার সালাত থেকে অমনোযোগী করে দিয়েছে। আর তোমরা আবূ জাহমের আনবিজানিয়্যাহ (মোটা চাদর) আমার কাছে নিয়ে এসো।"
14800 - عن أنس، قال: لما ولدتْ أم سليم قالت لي: يا أنس انظر هذا الغلام، فلا يصيبن شيئًا حتى تغدو به إلى النبي صلى الله عليه وسلم يحنِّكه، قال: فغدوت فإذا هو فى الحائط، وعليه خميصة جونية، وهو يَسِمُ الظهر الذي قدم عليه في الفتح.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5824)، ومسلم في اللباس (2119) كلاهما عن محمد ابن المثنى، حدثني محمد بن أبي عدي، عن ابن عون، عن محمد، عن أنس، فذكره. واللفظ لمسلم. وفي لفظ البخاري:"خميصة حريثية".
قوله:"جونية" منسوبة إلى بني الجون، قبيلة من الأزد، أو إلى لونها من السواد أو البياض أو الحمرة؛ لأن العرب تسمي كل لون من هذه جونا.
وقوله:"حريثية": منسوبة إلى بني حريث.
وقوله:"الظهر" المراد به الإبل، سميت به لأنها تحمل الأثقال على ظهورها.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন উম্মে সুলাইম সন্তান প্রসব করলেন, তখন তিনি আমাকে বললেন: হে আনাস! এই ছেলেটির দিকে খেয়াল রেখো। সে যেন কিছুই স্পর্শ না করে যতক্ষণ না তুমি তাকে নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাও, যাতে তিনি তাকে তাহনীক করান। তিনি (আনাস) বলেন, আমি ভোরেই গেলাম। দেখলাম তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি বাগানে আছেন, আর তাঁর পরিধানে ছিল জাওনিয়াহ (কালো বা ঘন রঙের) চাদর। তিনি সেই সকল জন্তুর পিঠে চিহ্ন দিচ্ছিলেন যা ফাতহের (মক্কা বিজয়ের) সময় তাঁর কাছে এসেছিল।
14801 - عن عبيد بن جريج أنه قال لعبد اللَّه بن عمر: يا أبا عبد الرحمن، رأيتك تصنع أربعا، لم أر أحدًا من أصحابك يصنعها، قال: وما هن يا ابن جريج؟ قال: رأيتك لا تمس من الأركان إلا اليمانيين، ورأيتك تلبس النعال السبتية، ورأيتك تصبغ بالصفرة، ورأيتك إذا كنت بمكة، أهل الناس إذا رأوا الهلال، ولم تهلل أنت، حتى يكون يوم التروية، فقال عبد اللَّه بن عمر: أما الأركان، فإني لم أر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يمس إلا اليمانيين، وأما النعال السبتية، فإني رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يلبس النعال التي ليس فيها شعر، ويتوضأ فيها، فأنا أحب أن ألبسها، وأما الصفرة، فإني رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يصبغ بها، فأنا أحب أن أصبغ بها، وأما الإهلال، فإني لم أر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يهل حتى تنبعث به راحلته.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (31) عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن عبيد بن جريج قال: فذكره. ورواه البخاريّ في اللباس (5851)، ومسلم في الحج (1187: 25) كلاهما من طريق مالك، به.
وجاء التصريح في مسند أحمد (4672) أنه كان يصفر لحيته.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উবাইদ ইবনে জুরাইজ তাঁকে বললেন, ‘হে আবু আবদুর রহমান! আমি আপনাকে চারটি কাজ করতে দেখেছি, যা আপনার অন্য কোনো সাথীকে করতে দেখিনি।’ তিনি (ইবনে উমর) বললেন, ‘হে ইবনে জুরাইজ! সেগুলো কী?’ তিনি বললেন, ‘আমি আপনাকে কাবাঘরের রুকনসমূহের মধ্যে কেবল রুকন ইয়ামানিয়্যান (ইয়ামানি কোণ দুটি) স্পর্শ করতে দেখেছি। আমি আপনাকে চর্মের তৈরি জুতা পরিধান করতে দেখেছি (সাবতিয়্যাহ জুতা)। আমি আপনাকে হলদে রং ব্যবহার করতে দেখেছি। আর আমি আপনাকে দেখেছি, যখন আপনি মক্কায় ছিলেন, লোকেরা নতুন চাঁদ দেখামাত্র ইহরামের তালবিয়াহ পাঠ শুরু করত, কিন্তু আপনি ইয়াওমুত তারবিয়াহ (৮ই যুলহাজ্জ) না আসা পর্যন্ত তালবিয়াহ শুরু করতেন না।’ আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘রুকনসমূহের বিষয়ে হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কেবল রুকন ইয়ামানিয়্যান (ইয়ামানি কোণ দুটি) স্পর্শ করতে দেখেছি। আর সাবতিয়্যাহ জুতার বিষয়ে হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এমন জুতা পরিধান করতে দেখেছি, যার মধ্যে কোনো পশম ছিল না। তিনি সেগুলো পরিধান করা অবস্থায়ই ওযু করতেন। তাই আমিও সেগুলো পরিধান করা পছন্দ করি। আর হলদে রঙের বিষয়ে হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তা দ্বারা রং করতে দেখেছি। তাই আমিও তা দ্বারা রং করা পছন্দ করি। আর তালবিয়াহ শুরু করার বিষয়ে হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখিনি যে, তাঁর সওয়ারি তাঁকে নিয়ে চলতে শুরু না করা পর্যন্ত তিনি তালবিয়াহ শুরু করেছেন।’
14802 - عن سعيد بن أبي مسلمة قال: سألت أنسًا أكان النبي صلى الله عليه وسلم يصلي في نعليه؟ قال: نعم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5850)، ومسلم في المساجد (555) كلاهما من طرق عن سعيد بن زيد أبي مسلمة قال: فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সাঈদ ইবনু আবী মাসলামাহ বলেন: আমি আনাসকে জিজ্ঞেস করলাম, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তাঁর জুতো পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
14803 - عن جابر قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول في غزوة غزوناها:"استكثروا من النعال، فإن الرجل لا يزال راكبا ما انتعل".
صحيح: رواه مسلم في اللباس (2096) عن سلمة بن شبيب، حدّثنا الحسن بن أعين، حدّثنا معقل، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আমাদের অংশগ্রহণ করা একটি যুদ্ধে বলতে শুনেছি: “তোমরা বেশি পরিমাণে জুতা ব্যবহার করো (বা জুতা পরিধান করো), কেননা ব্যক্তি যতক্ষণ জুতা পরিহিত থাকে, ততক্ষণ সে যেন আরোহণকারী (সাচ্ছন্দ্যে) থাকে।”
14804 - عن أنس أن نعل النبي صلى الله عليه وسلم كان لها قبالان.
صحيح: رواه البخاريّ في اللباس (5857) عن حجاج بن منهال، حدّثنا همام، عن قتادة،
حدّثنا أنس قال: فذكره.
قوله:"قبالان" واحده قِبال -بكسر القاف- وهو زمام النعل، وهو السير الذي يكون بين الأصبعين. كذا في النهاية.
والنعل قد يطلق على كل ما يلبس في الرجلين.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জুতার দু’টি ফিতা ছিল।
14805 - عن عبد اللَّه بن عباس قال: كان لنعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قِبالان، مَثْنِيٌّ شراكهما.
صحيح: رواه ابن ماجه (3614)، والترمذي في الشمائل (76)، والبيهقي في الشعب (5860) كلهم من حديث وكيع، عن سفيان (هو الثوري)، عن خالد الحذاء، عن عبد اللَّه بن الحارث، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده صحيح. وقوّى سنده الحافظ في الفتح (10/ 312).
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জুতার দুটি ক্বিবাল (সামনের ফিতা) ছিল এবং সেগুলোর ফিতাগুলো জোড়া লাগানো (বা মোড়ানো) ছিল।
14806 - عن أبي هريرة قال: كان لنعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قِبالان، ولنعل أبى بكر قِبالان، ولنعل عمر قِبالان، وأول من عقد عقدة واحدة عثمان.
حسن: رواه الطبراني في الأوسط - مجمع البحرين (4229) من طريق محمد بن حماد الطهراني، حدّثنا عبد الرزاق، ثنا معمر، عن ابن أبي ذئب، عن صالح مولى التوأمة، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه الترمذيّ في الشمائل (79) عن إسحاق بن منصور، عن عبد الرزاق مقتصرًا على قوله: كان لنعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قبالان. وكذا رواه أيضًا البزار - كشف الأستار (2961) مختصرًا من وجه آخر عن أبي هريرة.
وإسناده حسن من أجل صالح مولى التوأمة وهو ابن نبهان مولى التوأمة بنت أمية بن خلف الجمحي؛ فإنه حسن الحديث قبل أن يختلط.
قال ابن معين:"ثقة خرف قبل أن يموت فمن سمع منه قبل فهو ثبت".
قلت: وممن سمع منه قبل اختلاطه ابن أبي ذئب، قاله علي بن المديني وابن معين وابن عدي وغيرهم.
وأما قول ابن حبان في المجروحين (479):"تغير في سنة خمس وعشرين ومائة وجعل يأتي بالأشياء التي تشبه الموضوعات عن الأئمة الثقات، فاختلط حديثه الأخير بحديثه القديم، ولم يتميز فاستحق الترك".
ففيه نظر؛ لأنه نقل قول ابن معين أنه قال:"صالح مولى التوأمة قد كان خرف قبل أن يموت، فمن سمع منه قبل أن يختلط فهو ثبت".
وقول ابن معين هذا يرد على قول ابن حبان:"فاختلط حديثه الأخير بحديثه القديم". أردتُ أن أنبّه على ذلك. وقد نص ابن معين وغيره أن ابن أبي ذئب ممن سمع منه قبل الاختلاط.
وقال الحافظ ابن حجر:"رجال سنده ثقات". الفتح (10/ 313).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জুতা মোবারকে দুটি ক্বিবাল (বাঁধার ফিতা) ছিল। আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জুতা মোবারকেও দুটি ক্বিবাল ছিল এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জুতা মোবারকেও দুটি ক্বিবাল ছিল। আর যিনি সর্বপ্রথম এটিকে একটি মাত্র বাঁধন দ্বারা বাঁধেন, তিনি হলেন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
14807 - عن زياد أبي عمرو قال: دخلنا على شيخ يقال له مهاجر قال: وعليّ نعل له قِبالان قال: وقد تركته لشهرته، فقال: ما هذا؟ فقلت: أردت تركه لشهرته. فقال: لا تتركه، فإن نعل النبي صلى الله عليه وسلم كانتْ هكذا.
حسن: رواه الحارث بن أبي أسامة -بغية الباحث (577) - وعنه أبو نعيم في معرفة الصحابة (6218) - عن أشهل بن حاتم، ثنا زياد أبو عمرو قال: فذكره.
وإسناده حسن من أجل أشهل بن حاتم فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت بما ينكر عليه، وهذا مما له أصل ثابت.
وزياد أبو عمرو هو ابن أبي مسلم ويقال: ابن مسلم أبو عمرو الفراء مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وكان من كبار أتباع التابعين لم يدرك أحدًا من الصحابة.
وأما قول ابن عبد البر في الاستيعاب (1513):"المهاجر رجل من الصحابة، روى أن نعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كان لها قِبالان"، وكذلك قول من تبعه فمستبعد، وكونه وصف نعل النبي صلى الله عليه وسلم بأن له قِبالان لا يستلزم أن يكون من الصحابة، بل قد يصف ذلك من رآه أيضًا من التابعين وغيرهم.
যিয়াদ আবূ আমর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মুহাজির নামক এক শাইখের কাছে গেলাম। আমার পায়ে ক্বিবালান (দুই ফিতা) যুক্ত জুতা ছিল। আমি (শাইখকে) বললাম: আমি এর প্রসিদ্ধির কারণে তা পরিহার করতে চেয়েছিলাম। তখন তিনি (মুহাজির) জিজ্ঞেস করলেন: এটা কী? আমি বললাম: আমি এর প্রসিদ্ধির কারণে তা পরিহার করতে চেয়েছিলাম। তখন তিনি বললেন: তুমি তা পরিহার করো না, কারণ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর জুতাও এই রকমই ছিল।