আল-জামি` আল-কামিল
14908 - عن جابر بن سمرة، يقول: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد شمط مقدم رأسه ولحيته، وكان إذا ادهن لم يتبين، وإذا شعث رأسه تبين، وكان كثير شعر اللحية، فقال رجل: وجهه مثل السيف؟ قال: لا، بل كان مثل الشمس والقمر، وكان مستديرًا، ورأيت الخاتم عند كتفه مثل بيضة الحمامة يشبه جسده.
صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2344: 109) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا عبيد اللَّه، عن إسرائيل، عن سماك، أنه سمع جابر بن سمرة، يقول: فذكره.
জাবির ইবনে সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথার সামনের অংশে ও দাড়িতে কিছু সাদা চুল দেখা গিয়েছিল। তিনি যখন তেল মাখতেন, তখন তা (সাদা অংশ) বোঝা যেতো না। আর যখন তার চুলগুলো এলোমেলো হয়ে থাকতো, তখন তা বোঝা যেতো। তাঁর দাড়ির চুল ছিল ঘন। তখন এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করলো: তাঁর চেহারা কি তলোয়ারের মতো ছিল? তিনি বললেন: না, বরং তা ছিল সূর্য ও চাঁদের মতো (উজ্জ্বল) এবং তা ছিল গোলাকার। আর আমি তাঁর কাঁধের কাছে (নবুওয়তের) মোহর দেখেছি, যা কবুতরের ডিমের মতো ছিল এবং তা তাঁর শরীরের রঙের মতোই ছিল।
14909 - عن زيد بن أسلم، أن ابن عمر كان يصبغ لحيته بالصفرة حتى تمتلئ ثيابه من الصفرة، فقيل له: لم تصبغ بالصفرة؟ فقال: إني رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يصبغ بها، ولم يكن شيء أحب إليه منها، وقد كان يصبغ ثيابه كلها حتى عمامته.
حسن: رواه أبو داود (4064)، والنسائي (5086) كلاهما من حديث عبد العزيز يعني ابن محمد، عن زيد بن أسلم، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد العزيز بن محمد هو الدراوردي إلا أنه توبع. رواه النسائي (5115)، وأحمد (5717) كلاهما من حديث عبد اللَّه بن زيد، عن أبيه بإسناده نحوه. واختصره النسائي.
وعبد اللَّه بن زيد متكلم فيه ولكن لا بأس به في المتابعة.
قوله:"وقد كان يصبغ بها ثيابه. . ." شاذ، والصحيح كما في أول الحديث: اللحية، وعليه يحمل قول عبيد بن جريج في الحديث الذي ورد التصريح عند أحمد (4672) أنه كان يصفّر لحيته.
وروي عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أن عبد الرحمن بن الأسود بن عبد يغوث قال -وكان جليسا لهم، وكان أبيض اللحية والرأس قال-: فغدا عليهم ذات يوم وقد حمرهما، قال: فقال له
القوم: هذا أحسن، فقال: إن أمي عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أرسلت إلي البارحة جاريتها نخيلة، فأقسمت علي لأصبغن، وأخبرتني أن أبا بكر الصديق كان يصبغ.
رواه مالك في الشعر (8) عن يحيى بن سعيد، قال: أخبرني محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، فذكره. وإسناده صحيح غير أنه موقوف.
قال يحيى: سمعت مالكا يقول في صبغ الشعر بالسواد: لم أسمع في ذلك شيئًا معلومًا، وغير ذلك من الصبغ أحب إلي. قال؟ وترك الصبغ كله واسع، إن شاء اللَّه، ليس على الناس فيه ضيق.
قال: وسمعت مالكا يقول: في هذا الحديث بيان أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لم يصبغ، ولو صبغ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لأرسلت بذلك عائشة إلى عبد الرحمن بن الأسود.
وفي الباب عن ابن عباس، قال: مر على النبي صلى الله عليه وسلم رجل قد خضب بالحناء، فقال:"ما أحسن هذا" قال: فمر آخر قد خضب بالحناء والكتم، فقال:"هذا أحسن من هذا" قال: فمر آخر قد خضب بالصفرة، فقال:"هذا أحسن من هذا كله"
رواه أبو داود (4211)، وابن ماجه (3627)، والبيهقي (7/ 310) كلهم من طريق محمد بن طلحة، عن حميد بن وهب، عن ابن طاوس، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل حميد بن وهب القرشي أبي وهب المكي قال البخاري: منكر الحديث، وقال العقيلي: لا يتابع على حديثه، وحميد مجهول النقل، وجهّله أيضًا ابن المديني.
قلت: هذا الحديث تفرد به ولم يتابع عليه.
وأما ما روي عن ابن مسعود قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يكره عشر خلال، فذكر منها:"تغيير الشيب". فهو منكر.
رواه أبو داود (4222)، والنسائي (5088)، وأحمد (3605)، وصحّحه ابن حبان (5682)، والحاكم (4/ 195) كلهم من طريق الركين بن الربيع، يحدث عن القاسم بن حسان، عن عبد الرحمن بن حرملة، عن ابن مسعود، فذكر الحديث بطوله. وهو قوله: كان نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم يكره عشر خلال: الصفرة -يعني الخلوق- وتغيير الشيب، وجر الإزار، والتختم بالذهب، والتبرج بالزينة لغير محلها، والضرب بالكعاب، والرقى إلا بالمعوذات، وعقد التمائم، وعزل الماء لغير أو غير محله -أو عن محله- وفساد الصبي غير محرمه.
قال أبو داود:"انفرد بإسناد هذا الحديث أهل البصرة".
قلت: عبد الرحمن بن حرملة لم يسمع من ابن مسعود، ولا يعرف من أصحابه إلا بهذا الحديث.
وقال البخاري:"هذا حديث منكر"، ذكره الذهبي في ترجمة قاسم بن حسان، من الميزان، وقال في التاريخ الكبير (5/ 270):"لم يصح حديثه".
وقاسم بن حسان لا يعرف كما قال ابن القطان، وقال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند
المتابعة، والحديث ليس على شرط الجامع الكامل وإنْ كان لبعض فقراته شواهد صحيحة.
فقه أحاديث الباب:
أحاديث الباب تدل على استحباب الخضاب للرجال.
واختلف السلف في الخضاب بالسواد، فكره قوم لحديث جابر:"تجنبوا السواد" وكان أكثر عمل السلف على هذا، فكانوا يخضبون بالصفرة. منهم ابن عمر، وأبو هريرة، وأبو أمامة، وجرير ابن عبد اللَّه، والمغيرة بن شعبة، وعبد اللَّه بن بسر وغيرهم.
ولم يكرهه قوم فأجازوا الخضاب بالسواد منهم: عثمان، والحسن والحسين ابنا علي، وعقبة ابن عامر، وابن سيرين، وأبو بردة، والزهري، وأبو سلمة بن عبد الرحمن وغيرهم.
سئل محمد بن علي عن الوسمة فقال: هو خضابنا أهل البيت.
وقال أيوب عن محمد بن سيرين: لا أعلم بخضاب السواد بأسا إلا أن يغر به رجل امرأة.
قال الزهري: أمر النبي صلى الله عليه وسلم بالأصباغ، فأحلكها أحب إلينا - يعني أسودها. أخرجه عبد الرزاق (20176) عن معمر، عن الزهري.
وكذلك رخص السلف في تسويد الشعر للنساء.
ذكر عبد الرزاق (2018) عن معمر، عن قتادة قال: رُخّص في صباغ الشعر بالسواد للنساء.
وعن حماد بن سلمة، عن أم شبيب قالت: سألنا عائشة عن تسويد الشعر، قالت: لوددتُ أن عندي شيئًا سودت به شعري.
هذه الآثار ذكرها البغوي في شرح السنة (12/ 93 - 94)، والقاضي عياض، ونقلها عنه النووي في شرح مسلم.
وأما ترك الخضاب فلم ير قوم به بأسا.
قال مالك: ترك الصبغ كله واسع للناس، بل ذهب بعض المالكية إلى كراهية تغيير الشيب لأنه نور كما ورد في الأحاديث، وقد جاء النهي عن تغيير الشيب إلا أنه لم يثبت.
وممن روي عنه من السلف ترك الصبغ: أبو بكر وعمر وعلي، كما روي عنهم خلاف ذلك. قال أبو إسحاق: رأيت عليا على المنبر أبيض الرأس واللحية. أخرجه عبد الرزاق (20188) عن معمر، عن أبي إسحاق.
وقال الحسن: رأيت أبي بن كعب أبيض الرأس واللحية.
وقال عدي بن عدي: رأيت جابر بن عبد اللَّه أبيض الرأس واللحية.
وكان أبو سعيد الخدري لا يخضب وكانت لحيته بيضاء.
وقال جرير بن حازم: رأيت عطاء بن أبي رباح، ورجاء بن حيوة، ومكحولا، والحكم بن عتيبة
لحاهم بيض.
قال سعيد بن جبير: يعمد أحدكم إلى نور، جعله اللَّه في وجهه فيطفئه.
أخرجه عبد الرزاق (20180) عن معمر، عن أيوب، سمعت سعيد بن جبير، فذكره.
قال أيوب: وذلك أني سألته عن الوسمة.
وكان سعيد بن المسيب شديد بياض الرأس واللحية. والأمر واسع، ولذا ذهب الشافعية إلى الخيار حسب أحوال الناس وظروفهم، وذهب الحنفية والحنابلة إلى الاستحباب، ولم يقل بوجوبها، وأما التجنب من السواد فهو أفضل خروجا من الخلاف.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর দাড়িতে হলুদ রং (খিজাব) ব্যবহার করতেন, এমনকি তাঁর পোশাকও হলুদ রংয়ে ভরে যেত। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কেন হলুদ রং ব্যবহার করেন? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এটি ব্যবহার করতে দেখেছি এবং এটির চেয়ে অন্য কিছু তাঁর কাছে অধিক প্রিয় ছিল না। তিনি তাঁর সমস্ত পোশাক, এমনকি তাঁর পাগড়িও এই রংয়ে রঞ্জিত করতেন।
14910 - عن عمر بن الخطاب قال: من ضفر رأسه فليحلق، ولا تشبهوا بالتلبيد.
صحيح: رواه مالك في الحج (204) عن نافع، عن ابن عمر، عن عمر، فذكره.
ولكن خالفه عبد اللَّه بن عمر كما رواه البخاريّ في اللباس (5914) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، قال: أخبرني سالم بن عبد اللَّه، أن عبد اللَّه بن عمر، قال: سمعت عمر يقول:" من ضفر فليحلق، ولا تشبهوا بالتلبيد" وكان ابن عمر يقول: لقد رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ملبدًا.
يعني أن عمر بن الخطاب يرى وجوب الحلق على من لبّد رأسه في الإحرام بخلاف ابنه عبد اللَّه فإنه خالف أباه فقال: رأيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ملبّدًا، ولم يوجب الحلق على من لبّد وهو وإن كان حلق ولكنه أجاز القصر أيضًا.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: যে ব্যক্তি তার চুল বেণী (জটা) করে, সে যেন তা কামিয়ে ফেলে। আর তোমরা তালবিদ (চুলে আঠালো দ্রব্য লাগিয়ে জট পাকানো) এর সাথে সাদৃশ্য রেখো না।
(সহীহ: এটি ইমাম মালিক বর্ণনা করেছেন হাজ্জ অধ্যায়ে (২০৪), নাফি' থেকে, তিনি ইবনু উমর থেকে, তিনি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।)
কিন্তু আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিতার বিরোধিতা করেন। যেমনটি বুখারী (লিবাস অধ্যায়, ৫৯১৪) বর্ণনা করেছেন আবূল ইয়ামান থেকে, তিনি শুআইব থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি বলেছেন: আমাকে সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ জানিয়েছেন যে, আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: “যে বেণী (জটা) করে, সে যেন কামিয়ে ফেলে, আর তোমরা তালবিদ এর সাথে সাদৃশ্য রেখো না।” কিন্তু ইবনু উমর বলতেন: আমি অবশ্যই রাসুলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তালবিদ (চুলে আঠা বা গঁদ দিয়ে জট) অবস্থায় দেখেছি।
অর্থাৎ উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মনে করতেন যে ইহরামে যারা চুলে তালবিদ করে, তাদের জন্য মাথা কামানো আবশ্যক। তবে তাঁর পুত্র আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পিতার বিরোধিতা করে বলেন: আমি রাসুলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তালবিদ করা অবস্থায় দেখেছি, এবং তিনি তালবিদকারী ব্যক্তির জন্য মাথা কামানো আবশ্যক মনে করতেন না। যদিও তিনি নিজে কামিয়েছিলেন, তবে তিনি চুল ছোট করারও অনুমতি দিয়েছেন।
14911 - عن ابن عباس قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يحب موافقة أهل الكتاب فيما لم يؤمر فيه، وكان أهل الكتاب يسدلون أشعارهم، وكان المشركون يفرقون رؤوسهم، فسدل النبي صلى الله عليه وسلم ناصيته، ثم فرق بعد.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5917)، ومسلم في الفضائل (23361) كلاهما من طريق إبراهيم بن سعد، حدّثنا ابن شهاب، عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه، عن ابن عباس، فذكره.
قوله:"يسدلون أشعارهم" أي يرسلونه.
وقوله:"يفرقون رؤوسهم" فرق شعر الرأس هو قسمته من المفرق، وهو وسط الرأس، والمفرق هو مكان انقسام الشعر من الجبين إلى دارة وسط الرأس.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন সব বিষয়ে আহলে কিতাবদের (ইহুদি-খ্রিস্টানদের) সাথে মিল রাখতে পছন্দ করতেন, যে বিষয়ে তাঁকে কোনো নির্দেশ দেওয়া হয়নি। আর আহলে কিতাবরা তাদের চুল ছেড়ে দিত (ঝুলিয়ে রাখত), আর মুশরিকরা তাদের মাথার চুল সিঁথি করত (ভাগ করত)। তাই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কপালের চুল ছেড়ে রাখতেন, এরপর তিনি পরে সিঁথি করেন।
14912 - عن عائشة قالت: كنت إذا أردت أن أفرق رأس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم صدعت الفرق من يافوخه، وأرسل ناصيته بين عينيه.
حسن: رواه أبو داود (4189) عن يحيى بن خلف، حدّثنا عبد الأعلى، عن محمد بن إسحاق، حدثني محمد بن جعفر بن الزبير، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق لأنه صرّح بالتحديث.
وكذلك رواه أحمد (24594) عن إبراهيم بن سعد، عن محمد بن إسحاق، به.
ورواه ابن ماجه (3633) من وجه آخر عن إبراهيم بن سعد، عن ابن إسحاق، عن يحيى بن عباد، عن أبيه، عن عائشة قالت: كنت أفرق خلف يافوخ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ثم أسدل ناصيته.
وكلا الوجهين محفوظان كما قال الدارقطني في العلل (3568)
قولها:"صدعت فرقه" أي فرقتها.
وقوله:"اليافوخ": هو وسط الرأس.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথার চুল আঁচড়ে সিঁথি কাটতে চাইতাম, তখন তাঁর মাথার মধ্যভাগ (ইয়াফুখ) থেকে সিঁথি কাটা শুরু করতাম এবং তাঁর কপালের চুল তাঁর দুই চোখের মাঝখানে ঝুলিয়ে দিতাম।
14913 - عن ابن عباس قال: بتُّ ليلة عند ميمونة بنت الحارث خالتي، وكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عندها في ليلتها، قال: فقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يصلي من الليل، فقمت عن يساره. قال: فأخذ بذؤابتي فجعلني عن يمينه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5919) من طريق هشيم (هو ابن بشير)، عن أبي بشر (هو جعفر بن أبي وحشية)، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه مسلم في صلاة المسافرين (763) من وجوه أخرى عن ابن عباس بنحوه دون ذكر الذؤابة وفي بعضها:"فوضع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يده اليمنى على رأسي، وأخذ بأذني اليمنى يفتلها".
قوله:"فأخذ بذؤابتي": قال الحافظ: فيه تقريره صلى الله عليه وسلم على اتخاذ الذؤابة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এক রাতে আমার খালা মাইমুনা বিনত আল-হারিছ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম, আর সে রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর (মাইমুনার) কাছে ছিলেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে (তাহাজ্জুদের) সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। তখন আমি তাঁর বাম দিকে দাঁড়ালাম। তিনি বললেন, তখন তিনি আমার চুলের ঝুঁটি ধরলেন এবং আমাকে তাঁর ডান দিকে স্থাপন করলেন।
14914 - عن وائل بن حجر قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم ولي شعر طويل، فلما رآني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ذباب ذباب" قال: فرجعت فجززته، ثم أتيته من الغد. فقال:"إني لم أعنك، وهذا أحسن".
حسن: رواه أبو داود (4190)، والنسائي (5052، 5066)، وابن ماجه (3636) كلهم من حديث سفيان، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن وائل بن حجر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن كليب وأبيه كليب بن شهاب فإنهما حسنا الحديث.
قوله:"ذباب" هو الشؤم أي هذا شؤم. وقيل: الذباب الشر الدائم، يقال: أصابك ذباب من هذا الأمر. كذا في النهاية.
ওয়াইল ইবনু হুজর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম, তখন আমার চুল লম্বা ছিল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে দেখলেন, তখন তিনি বললেন: "অশুভ, অশুভ।" তিনি (ওয়াইল) বলেন, অতঃপর আমি ফিরে গেলাম এবং তা কেটে ছোট করে ফেললাম। এরপর আমি পরের দিন তাঁর নিকট আসলাম। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে উদ্দেশ্য করে বলিনি (লম্বা চুল রাখতে মানা করিনি), তবে এটিই (ছোট চুল) বেশি সুন্দর।
"
14915 - عن سمرة بن فاتك أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"نعم الفتى سمرة، لو أخذ من لمته، وشمر من مئزره". ففعل ذلك سمرة، أخذ من لمته، وشمر من مئزره.
حسن: رواه أحمد (17788) عن يعمر بن بشر قال: حدّثنا عبد اللَّه قال: حدّثنا هشيم، عن داود بن عمرو، عن بسر بن عبيد اللَّه، عن سمرة بن فاتك، فذكره.
وإسناده حسن من أجل يعمر بن بشر شيخ أحمد فقد قال فيه أحمد: لا بأس به، ووثّقه الدارقطني كما في تاريخ بغداد (14/ 357).
وعبد اللَّه هو ابن المبارك والحديث في كتابه الجهاد (109).
وروي نحوه عن أخيه خريم بن فاتك كما في الحديث الآتي:
قوله:"اللمة": هي الشعر المتجاوز شحمة الأذن.
وقوله:"شمّر": معناه قصر.
وسمرة بن فاتك وأخوه خريم بن فاتك أسلما بعد الفتح واختلف في نسبهما فقيل: الأسدي وهو الأصح.
সামুরাহ ইবনে ফাতেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সামুরাহ কতই না উত্তম যুবক, যদি সে তার চুল কিছুটা ছোট করত এবং তার লুঙ্গি কিছুটা গুটিয়ে নিত।" অতঃপর সামুরাহ তা-ই করলেন, তিনি তার চুল ছোট করলেন এবং তার লুঙ্গি গুটিয়ে নিলেন।
14916 - عن قيس بن بشر التغلبي قال: أخبرني أبي -وكان جليسا لأبي الدرداء- قال: كان بدمشق رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم يقال له: ابن الحنظلية، وكان رجلا متوحدًا، قلما يجالس الناس، إنما هو في صلاة فإذا فرغ فإنما يسبح ويكبر حتى يأتي أهله، فمر بنا يوما ونحن عند أبي الدرداء، فقال له أبو الدرداء: كلمة تنفعنا ولا تضرك. قال: بعث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم سرية فقدمت، فجاء رجل منهم، فجلس في المجلس الذي فيه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقال لرجل إلى جنبه: لو رأيتنا حين التقينا نحن والعدو، فحمل فلان فطعن، فقال: خذها وأنا الغلام الغفاري. كيف ترى في قوله؟ قال: ما أراه إلا قد أبطل أجره. فسمع ذلك آخر، فقال: ما أرى بذلك بأسا. فتنازعا حتى سمع النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"سبحان اللَّه! لا بأس أن يحمد ويؤجر". قال: فرأيت أبا الدرداء سُرَّ بذلك، وجعل يرفع رأسه إليه، ويقول: آنت سمعت ذلك من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ فيقول: نعم. فما زال يعيد عليه حتى إني لأقول: ليبركن على ركبتيه.
قال: ثم مر بنا يوما آخر، فقال له أبو الدرداء: كلمة تنفعنا ولا تضرك قال: قال لنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن المنفق على الخيل في سبيل اللَّه كباسط يديه بالصدقة لا يقبضها".
قال: ثم مر بنا يوما آخر، فقال له أبو الدرداء: كلمة تنفعنا ولا تضرك. فقال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"نعم الرجل خريم الأسدي لولا طول جمته وإسبال إزاره"، فبلغ
ذلك خريما، فجعل يأخذ شفرة يقطع بها شعره إلى أنصاف أذنيه، ورفع إزاره إلى أنصاف ساقيه.
قال: فأخبرني أبي قال: دخلت بعد ذلك على معاوية، فإذا عنده شيخ جمته فوق أذنيه، ورداؤه إلى ساقيه، فسألت عنه، فقالوا: هذا خريم الأسدي.
قال: ثم مر بنا يوما آخر، ونحن عند أبي الدرداء، فقال له أبو الدرداء: كلمة تنفعنا ولا تضرك، فقال سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنكم قادمون على إخوانكم، فأصلحوا رحالكم، وأصلحوا لباسكم؛ فإن اللَّه عز وجل لا يحب الفحش، ولا التفحش".
حسن: رواه أبو داود (4089)، وأحمد (17622)، والحاكم (4/ 183)، والبيهقي في الشعب (5793) كلهم من حديث هشام بن سعد، قال: حدّثنا قيس بن بشر التغلبي قال: أخبرني أبي -وكان جليسا لأبي الدرداء- قال: فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
وإسناده حسن، من أجل بشر التغلبي والد قيس، وهو بشر بن قيس التغلبي وهو"صدوق" كما قال الحافظ. ولم يظهر من ترجمته في تهذيبه أي جرح فيه.
ومن أجل ابنه قيس وهو من رجال الصحيح قال فيه أبو حاتم: ما أرى بحديثه بأسا.
وأما ما رواه أحمد (18899) عن عبد الرزاق، حدّثنا معمر، عن أبي إسحاق، عن شمر، عن خريم رجل من بني أسد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لولا أن فيك اثنتين كنت أنت". قال: إن واحدة تكفيني، قال:"تسبل إزارك، وتوفر شعرك" قال: لا جرم، واللَّه لا أفعل. فهو ضعيف.
وشمر هو ابن عطية الأسدي لم يدرك خريما كما في تهذيب الكمال، وله طرق أخرى لا يسلم منها شيء.
কাইস ইবন বিশর আত-তাগলাবি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার পিতা—যিনি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গী ছিলেন—আমাকে অবহিত করেন যে, দামেশকে নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণের মধ্যে ইবনুল হানযালিয়্যাহ নামে একজন লোক ছিলেন। তিনি ছিলেন একজন একাকী স্বভাবের মানুষ, যিনি খুব কমই লোকজনের সাথে বসতেন। তিনি সাধারণত নামাযে মগ্ন থাকতেন এবং যখন নামায শেষ করতেন, তখন তাসবীহ ও তাকবীর পাঠ করতে থাকতেন যতক্ষণ না তিনি তাঁর পরিবারের কাছে ফিরে যেতেন।
একদিন তিনি আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যখন আমরা আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: এমন একটি কথা বলুন যা আমাদের উপকার করবে এবং আপনার কোনো ক্ষতি করবে না।
তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি সেনাদল প্রেরণ করেন। তারা ফিরে আসার পর তাদের মধ্য থেকে একজন লোক এসে সেই মজলিসে বসলেন যেখানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ছিলেন। লোকটি তার পাশের একজনকে বললেন: "যদি তুমি দেখতে যখন আমরা এবং শত্রুরা একে অপরের সম্মুখীন হলাম! অমুক ব্যক্তি তখন আক্রমণ করে আঘাত হানলেন এবং বললেন: 'এটা নাও! আমিই সেই গিফারী যুবক'!" [তারপর লোকটি জিজ্ঞেস করল:] "তাঁর এই উক্তি সম্পর্কে আপনি কী মনে করেন?" [পাশের লোকটি] বললেন: "আমার মনে হয় তিনি এর দ্বারা তাঁর সাওয়াব বাতিল করে দিয়েছেন।"
এ কথা শুনে আরেকজন লোক বললেন: "আমি এতে কোনো সমস্যা দেখি না।" তারা দুজন বিতর্কে লিপ্ত হলেন, এমনকি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তা শুনতে পেলেন। তিনি বললেন: "সুবহানাল্লাহ! প্রশংসিত হওয়া এবং সাওয়াবপ্রাপ্ত হওয়াতে কোনো সমস্যা নেই।"
(কাইস ইবন বিশরের পিতা) বলেন: আমি দেখলাম আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এতে অত্যন্ত খুশি হলেন এবং তাঁর দিকে মাথা উঠিয়ে বারবার বলতে লাগলেন: "আপনি কি নিজ কানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছ থেকে এটা শুনেছেন?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (আবূ দারদা) বারংবার এ কথা জিজ্ঞেস করতে থাকলেন, এমনকি আমি ভাবলাম যে তিনি বুঝি তার হাঁটুর ওপর ভর করে বসে পড়বেন।
আমার পিতা বলেন: এরপর আরেক দিন তিনি আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: এমন একটি কথা বলুন যা আমাদের উপকার করবে এবং আপনার কোনো ক্ষতি করবে না। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে বলেছেন: "আল্লাহর পথে ঘোড়ার পেছনে যে খরচ করে, সে ঐ ব্যক্তির মতো যে তার হাত দান-খয়রাতের জন্য প্রসারিত করে এবং তা আর ফিরিয়ে নেয় না।"
তিনি বলেন: এরপর আরেক দিন তিনি আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: এমন একটি কথা বলুন যা আমাদের উপকার করবে এবং আপনার কোনো ক্ষতি করবে না। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "খুরাইম আল-আসাদী কতই না উত্তম লোক! যদি না তাঁর চুলের ঝুটির (জুম্মাহ) দৈর্ঘ্য বেশি হতো এবং তাঁর লুঙ্গী (ইযার) নিচে ঝোলানো থাকতো।" এ সংবাদ খুরাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলে তিনি একটি ক্ষুর নিয়ে তাঁর চুল কেটে কানের মধ্যভাগ পর্যন্ত করলেন এবং তাঁর লুঙ্গী পায়ের গোছার মধ্যভাগ পর্যন্ত উঠিয়ে নিলেন।
আমার পিতা আমাকে জানালেন, তিনি বলেন: এরপর আমি মুআবিয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে দেখা করতে গেলাম। আমি দেখলাম তাঁর কাছে এমন একজন বৃদ্ধ আছেন যাঁর চুল কানের উপরে এবং তাঁর চাদর পায়ের গোছা পর্যন্ত রয়েছে। আমি তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তারা বলল: ইনি খুরাইম আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
তিনি বলেন: এরপর আরেক দিন আমরা যখন আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম, তিনি আমাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: এমন একটি কথা বলুন যা আমাদের উপকার করবে এবং আপনার কোনো ক্ষতি করবে না। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই তোমরা তোমাদের ভাইদের সাথে সাক্ষাৎ করতে যাচ্ছো। সুতরাং তোমরা তোমাদের মালপত্র সুবিন্যস্ত করো এবং তোমাদের পোশাক ঠিক করো। কেননা আল্লাহ তাআলা অশালীনতা ও অভদ্রতা পছন্দ করেন না।"
14917 - عن عبد اللَّه بن جعفر، أن النبي صلى الله عليه وسلم أمهل آل جعفر ثلاثا أن يأتيهم، ثم أتاهم، فقال:"لا تبكوا على أخي بعد اليوم" ثم قال:"ادعوا لي بني أخي" فجيء بنا كأنا أفرخ، فقال:"ادعوا لي الحلاق"، فأمره فحلق رؤوسنا.
صحيح: رواه أبو داود (4192)، والنسائي (5227) كلاهما من حديث وهب بن جرير، حدّثنا أبي، قال: سمعت محمد بن أبي يعقوب، يحدث عن الحسن بن سعد، عن عبد اللَّه بن جعفر، فذكره. وإسناده صحيح.
ومن هذا الطريق رواه أحمد (1750) مطولا، وهو مذكور في موضعه.
আব্দুল্লাহ ইবনু জা'ফার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জা'ফরের পরিবারের কাছে আসার জন্য তিন দিন অবকাশ দিলেন। এরপর তিনি তাদের কাছে এলেন, এবং বললেন, "আজকের দিনের পর থেকে আমার ভাইয়ের (জা'ফরের) জন্য তোমরা আর কাঁদবে না।" এরপর তিনি বললেন, "আমার ভাতিজাদেরকে আমার কাছে ডেকে আনো।" আমাদেরকে আনা হলো, যেন আমরা ছোট পাখির ছানার মতো (দুর্বল)। তিনি বললেন, "আমার জন্য নাপিতকে ডাকো।" অতঃপর তিনি তাকে নির্দেশ দিলেন, ফলে সে আমাদের মাথা মুণ্ডন করে দিল।
14918 - عن ابن عمر، أن النبي صلى الله عليه وسلم رأى صبيا قد حلق بعض شعره وترك بعضه، فنهاهم عن ذلك، وقال:"احلقوه كله، أو اتركوه كله"
صحيح: رواه أبو داود (4195)، والنسائي (5048)، وأحمد (5615) كلهم عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (19564) - حدّثنا معمر، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. وإسناده صحيح.
وساق مسلم هذا الإسناد (2120) ولم يذكر لفظه، وإنما أحال على اللفظ المذكور قبله.
ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি শিশুকে দেখলেন, যার মাথার কিছু অংশ মুণ্ডন করা হয়েছিল এবং কিছু অংশ ছেড়ে দেওয়া (রাখা) হয়েছিল। অতঃপর তিনি তাদেরকে তা থেকে নিষেধ করলেন এবং বললেন: "তোমরা এর পুরোটা মুণ্ডন করো, অথবা পুরোটা ছেড়ে দাও (রাখো)।"
14919 - عن عبيد اللَّه بن حفص، أن عمر بن نافع، أخبره، عن نافع، مولى عبد اللَّه: أنه سمع ابن عمر يقول: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينهى عن القزع.
قال عبيد اللَّه: قلت: وما القزع؟ فأشار لنا عبيد اللَّه قال: إذا حلق الصبي، وترك ها هنا شعرة وها هنا وها هنا، فأشار لنا عبيد اللَّه إلى ناصيته وجانبي رأسه.
قيل لعبيد اللَّه: فالجارية والغلام؟ قال: لا أدري، هكذا قال: الصبي. قال عبيد اللَّه: وعاودته، فقال: أما القصة والقفا للغلام فلا بأس بهما، ولكن القزع أن يترك بناصيته شعر، وليس في رأسه غيره، وكذلك شق رأسه هذا وهذا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5920) من طريق ابن جريج قال: أخبرني عبيد اللَّه بن حفص به، فذكره. هذا لفظ البخاري.
قوله:"فأشار لنا عبيد اللَّه" فيه حذف تقديره فأشار لنا عبيد اللَّه ناقلا من كلام عمر بن نافع أنه قال: القزع إذا حلق الصبي، وترك ههنا شعرة وههنا وههنا.
وقوله في الإشارة الثانية:"فأشار لنا عبيد اللَّه إلى ناصيته وجانبي رأسه" من كلام عبد اللَّه نفسه. قاله العيني (22/ 58).
وقد يكون التفسير لنافع كما في صحيح مسلم (2120) عن زهير بن حرب، حدثني يحيى بن سعيد، عن عبيد اللَّه، أخبرني عمر بن نافع، عن أبيه، عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن القزع، قال: قلت لنافع: وما القزع؟ قال:"يحلق بعض رأس الصبي ويترك بعض".
فالسائل قد يكون عمر بن نافع ابنه، وقد يكون عبيد اللَّه، ويكون سؤاله في وقت آخر، وجمع الراوي الحديث وتفسيره في سياق واحد.
وقد جاء تفسير الحديث من عبيد اللَّه نفسه كما رواه أحمد (4973) عن محمد بن بشر، عن عبيد اللَّه، عن عمر بن نافع، عن نافع، عن عبد اللَّه بن عمر قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن القزع. قال عبيد اللَّه: والقزع الترقيع في الرأس.
فكان عبيد اللَّه بن عمر يعزو التفسير إلى نافع مرة، ويعزوه إلى نفسه أخرى.
قال النووي:"القزع" -بفتح القاف والزاي- وهذا الذي فسره به نافع أو عبيد اللَّه هو الأصح،
وهو أن القزع: حلق بعض الرأس مطلقا، ومنهم من قال: هو حلق مواضع متفرقة منه، والصحيح الأول؛ لأنه تفسير الراوي، وهو غير مخالف للظاهر فوجب العمل به". انتهى.
وقال الحافظ:"إلا أن تخصيصه بالصبي ليس قيدًا" يعني أنه عام يشمل أيضًا الرجل والمرأة".
وقوله:"أما القُصّة والقفا للغلام فلا بأس بهما" قال الحافظ:"القُصّة -بضم القاف ثم المهملة- والمراد بها هنا شعر الصدغين، والمراد بالقفا شعر القفا، والحاصل منه أن القزع مخصوص بشعر الرأس، وليس شعر الصدغين والقفا من الرأس".
আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে 'কাযা' (Qaza') করতে নিষেধ করতে শুনেছি।
উবাইদুল্লাহ ইবন হাফস (বর্ণনাকারী) বলেন: আমি (তাকে) জিজ্ঞাসা করলাম, 'কাযা' কী? তখন উবাইদুল্লাহ আমাদের ইশারা করে বললেন: যখন কোনো বালকের মাথার কিছু অংশ মুণ্ডন করা হয় এবং এখানে কিছু চুল, এখানে কিছু চুল এবং এখানে কিছু চুল রেখে দেওয়া হয়। (এ কথা বলার সময়) উবাইদুল্লাহ আমাদের কপালের সামনের অংশ এবং মাথার দু'পাশে ইশারা করে দেখালেন।
উবাইদুল্লাহকে জিজ্ঞেস করা হলো: এটি কি বালিকা ও বালক উভয়ের জন্যই? তিনি বললেন: আমি জানি না, তিনি (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এভাবেই 'বালক' বলেছেন।
উবাইদুল্লাহ বলেন: আমি তাকে পুনরায় জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: বালকের জন্য কপালের সামনের অংশের চুল ('আল-কুসসাহ') এবং ঘাড়ের পেছনের অংশের চুল ('আল-কাফা') রেখে দিতে কোনো অসুবিধা নেই। কিন্তু 'কাযা' হলো— মাথার সামনের অংশে চুল রেখে দেওয়া এবং মাথার বাকি অংশে অন্য কোনো চুল না থাকা। অনুরূপভাবে মাথার এই দিক এবং ঐ দিকের কিছু অংশ মুণ্ডন করা।
14920 - عن عائشة قالت: كنت أطيب النبي صلى الله عليه وسلم بأطيب ما يجد حتى أجد وبيص الطيب في رأسه ولحيته.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5923)، ومسلم في الحج (1190: 44) كلاهما من طريق أبي إسحاق السبيعي، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সবচেয়ে উত্তম সুগন্ধি দিয়ে সুগন্ধিযুক্ত করতাম, এমনকি আমি তাঁর মাথা ও দাড়িতে সেই সুগন্ধির দ্যুতি বা ঔজ্জ্বল্য দেখতে পেতাম।
14921 - عن عائشة قالت: طيبتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بيديّ بذريرة في حجة الوداع للحلّ والإحرام. وفي رواية: بطيب فيه مسك.
متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5930)، ومسلم في الحج (1189: 35) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عمر بن عبد اللَّه بن عروة أنه سمع عروة والقاسم يخبران عن عائشة، فذكرته.
والرواية الأخرى لمسلم (1191) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة.
قوله:"بذريرة" هي نوع من الطيب مجموع من أخلاط، وقيل: هو فتات قصب طيب يجاء به من الهند. فتح الباري (10/ 371).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিদায় হজ্জের সময় আমি আমার দু'হাত দিয়ে আল্লাহ্র রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হালাল হওয়া এবং ইহরামের জন্য ‘যারীরাহ’ নামক সুগন্ধি লাগিয়ে দিলাম। অপর এক বর্ণনায় আছে: এমন সুগন্ধি দ্বারা, যাতে কস্তুরী (মিশক) ছিল।
14922 - عن أنس بن مالك قال: كان للنبي صلى الله عليه وسلم سكة يتطيب منها.
صحيح: رواه أبو داود (4162)، والترمذي في الشمائل (217)، وأبو الشيخ في أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم (ص 88) كلهم من حديث عبد اللَّه بن المختار، عن موسى بن أنس، عن أنس بن مالك، فذكره. وإسناده صحيح.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি সুগন্ধির আধার ছিল, তিনি তা থেকে খুশবু ব্যবহার করতেন।
14923 - عن أبي سعيد الخدري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كانت امرأة من بني إسرائيل، قصيرة تمشي مع امرأتين طويلتين، فاتخذت رجلين من خشب، وخاتما من ذهب مغلق مطبق، ثم حشته مسكا، وهو أطيب الطيب، فمرت بين المرأتين، فلم يعرفوها، فقالت بيدها هكذا" ونفض شعبة يده.
صحيح: رواه مسلم في الألفاظ من الأدب (2252: 18) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا أبو أسامة، عن شعبة، حدثني خليد بن جعفر، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বনী ইসরাঈলের এক খর্বাকৃতির নারী ছিল, যে দু'জন দীর্ঘাকৃতির নারীর সাথে হাঁটত। অতঃপর সে কাঠের তৈরি দু'টি পা (কৃত্রিমভাবে) তৈরি করল এবং মোহর লাগানো ও আবৃত একটি স্বর্ণের আংটি নিল। এরপর সে সেটিকে কস্তুরী (মিশক) দ্বারা ভরে নিল। আর কস্তুরী হলো উত্তম সুগন্ধি। এরপর সে ওই দুই নারীর মাঝখান দিয়ে গেল, কিন্তু তারা তাকে চিনতে পারল না। তখন সে তার হাত দ্বারা এভাবে ইশারা করল।" (বর্ণনাকারী) শু'বাহ তাঁর হাত নাড়িয়ে দেখালেন।
14924 - عن نافع قال: كان ابن عمر إذا استجمر استجمر بألوة، غير مطراة، وبكافور يطرحه مع الألوة، ثم قال: هكذا كان يستجمر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في الألفاظ من الأدب (2254) من طرق عن ابن وهب، أخبرني مخرمة، عن أبيه، عن نافع، فذكره.
قوله:"يستجمر" الاستجمار هنا استعمال الطيب، والتبخر به، مأخوذ من المجمر وهو البخور.
وقوله:"الألوة" بفتح الهمزة وضمها، وضم اللام هي العود يتبخر به.
وقوله:"غير مطراة" أي غير مخلوطة بغيرها من الطيب.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি সুগন্ধি ব্যবহার করতেন, তখন তিনি খাঁটি (অন্য কিছু মেশানো নয় এমন) 'আলুওয়াহ' (এক প্রকার সুগন্ধি কাষ্ঠ/আগর) এবং কর্পূর ব্যবহার করতেন, যা তিনি 'আলুওয়াহ'-এর সাথে মিশিয়ে দিতেন। অতঃপর তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এভাবেই সুগন্ধি ব্যবহার করতেন।
14925 - عن أنس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كانت تعجبه الفاغية، وكان أعجب الطعام إليه الدباء.
حسن: رواه أحمد (12546) عن عبد الصمد، حدّثنا سليمان -يعنى ابن كثير-، حدّثنا عبد الحميد، عن أنس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل سليمان بن كثير هو العبدي البصري مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ.
وقوله:"الفاغية" من فغا يفغو فغوا، هو تفتّحَ نوره، ويقال: فغا الشيءُ ظهرت رائحته، والفاغية: نور الحناء خاصة، ونور كل نبت ذي رائحة طيبة.
ونور الحناء من أطيب الرياحين.
وقد ثبت أيضًا أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يداوي بالحناء أيضًا، وهو مخرج في كتاب الطب.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আল-ফাগিয়া (সুগন্ধিযুক্ত ফুল) পছন্দনীয় ছিল এবং তাঁর নিকট সবচেয়ে প্রিয় খাবার ছিল লাউ বা মিষ্টি কুমড়া (আদ-দুব্বা)।
14926 - عن أنس بن مالك أنه كان لا يرد الطيب، وزعم أن النبي صلى الله عليه وسلم لا يردّ الطيب.
صحيح: رواه البخاريّ في اللباس (5929) عن أبي نعيم (هو الفضل بن دُكين)، ثنا عزرة بن ثابت الأنصاري، ثني ثمامة بن عبد اللَّه، عن أنس، فذكره.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) সুগন্ধি (তীব) প্রত্যাখ্যান করতেন না। তিনি আরও বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামও সুগন্ধি প্রত্যাখ্যান করতেন না।
14927 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من عرض عليه ريحان فلا يرده، فإنه خفيف المحمل طيب الريح".
صحيح: رواه مسلم في الألفاظ من الأدب (2253) من طريق أبي عبد الرحمن المقري، عن سعيد بن أبي أيوب، حدثني عبيد اللَّه بن أبي جعفر، عن عبد الرحمن الإعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যাকে (উপহার হিসেবে) সুগন্ধি ফুল বা গাছ (রিয়হান) দেওয়া হয়, সে যেন তা প্রত্যাখ্যান না করে। কারণ এটি বহন করা হালকা এবং এর ঘ্রাণ উত্তম।"