হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (14968)


14968 - عن ثوبان مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حدثه: أن ابنة هبيرة دخلت على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وفي يدها خواتيم من ذهب، يقال لها: الفتخ، فجعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقرع يدها بعصية معه، يقول لها:"يسرك أن يجعل اللَّه في يدك خواتيم من نار؟"

فأتتْ فاطمةَ فشكتْ إليها ما صنع بها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: وانطلقت أنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقام خلف الباب، وكان إذا استأذن قام خلف الباب، قال: فقالت لها فاطمة: انظري إلى هذه السلسلة التي أهداها إلي أبو حسن. قال: وفي يدها سلسلة من ذهب، فدخل النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"يا فاطمة بالعدل أن يقول الناس: فاطمة بنت محمد وفي يدك سلسلة من نار؟ !"، ثم عذمها عذما شديدًا، ثم خرج ولم يقعد، فأمرتْ بالسلسلة فبيعتْ فاشترتْ بثمنها عبدًا، فأعتقته، فلما سمع بذلك النبيُّ صلى الله عليه وسلم كبّر، وقال:"الحمد للَّه الذي نجّى فاطمةَ من النار".

صحيح: رواه النسائي (5140)، وأحمد (22398)، والحاكم (3/ 153) كلهم من حديث يحيى بن أبي كثير قال: حدثني زيد بن سلام، أن جده حدثه أن أبا أسماء حدثه، أن ثوبان مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حدثه، فذكره. وإسناده صحيح.




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুক্ত দাস ছাওবান তাঁকে বর্ণনা করেছেন যে, হুবাইরার কন্যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলেন। তার হাতে সোনার আংটি ছিল, সেগুলোকে 'আল-ফাতাখ' বলা হতো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাতের সাথে থাকা লাঠি দিয়ে আঘাত করতে লাগলেন এবং তাকে বললেন: "তোমার কি এটা পছন্দ হবে যে আল্লাহ তোমার হাতে আগুনের আংটি পরিয়ে দেন?" সে তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সাথে যা করেছেন, সে সম্পর্কে অভিযোগ করলেন। (ছাওবান) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে চললাম। তিনি দরজার পিছনে দাঁড়ালেন, কেননা তিনি যখনই অনুমতি চাইতেন, দরজার পিছনেই দাঁড়াতেন। (ছাওবান) বলেন: ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আবূ হাসান (আলী) আমাকে যে হারটি উপহার দিয়েছেন, সেটি দেখো। (ছাওবান) বলেন: ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে সোনার একটি হার ছিল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরে প্রবেশ করে বললেন: "হে ফাতিমা! মানুষের এটা বলা কি ন্যায়সঙ্গত যে, ফাতিমা মুহাম্মাদের কন্যা, আর তোমার হাতে আগুনের হার রয়েছে?!" এরপর তিনি তাকে কঠোরভাবে তিরস্কার করলেন, অতঃপর তিনি না বসেই বের হয়ে গেলেন। তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই হারটি বিক্রি করার নির্দেশ দিলেন। তিনি তা বিক্রি করে সে অর্থ দিয়ে একজন গোলাম কিনলেন এবং তাকে মুক্ত করে দিলেন। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এ খবর শুনলেন, তখন তিনি তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বললেন এবং বললেন: "সেই আল্লাহর প্রশংসা, যিনি ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আগুন (জাহান্নাম) থেকে রক্ষা করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (14969)


14969 - عن أسماء بنت يزيد أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم جمع نساء المسلمين للبيعة، فقالت له أسماء: ألا تحسر لنا عن يدك يا رسول اللَّه؟ فقال لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني لست أصافح النساء، ولكن آخذ عليهن"، وفي النساء خالة لها عليها قُلبان من ذهب، وخواتيم من ذهب. فقال لها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا هذه، هل يسرك أن يحليك اللَّه يوم القيامة من جمر جهنم سوارين وخواتيم؟" فقالت: أعوذ باللَّه يا نبي اللَّه، قالت:
قلت: يا خالتي، اطرحي ما عليك، فطرحته فحدثتني أسماء، واللَّه يا بني لقد طرحته، فما أدري من لقطه من مكانه، ولا التفت منا أحد إليه، قالت أسماء: فقلت: يا نبي اللَّه إن إحداهن تصلف عند زوجها، إذا لم تملح له، أو تحلى لى، قال نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما على إحداكن أن تتخذ قرطين من فضة، وتتخذ لها جمانتين من فضة، فتدرجه بين أناملها بشيء من زعفران، فإذا هو كالذهب يبرق".

حسن: رواه أحمد (27572) عن هاشم هو ابن القاسم، حدّثنا عبد الحميد، قال: حدّثنا شهر ابن حوشب، قال: حدثتني أسماء بنت يزيد، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل شهر بن حوشب فإنه حسن الحديث إذا لم يخالف.

وفي الحديث الذي بعده أن أسماء هي التي طرحت السوارين من الذهب، فيحمل على أن القصة وقعت للاثنتين معا في مجلس واحد.




আসমা বিন্তে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মুসলিম মহিলাদের বায়আত (আনুগত্যের শপথ) গ্রহণের জন্য একত্রিত করলেন। তখন আসমা তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি আমাদের জন্য আপনার হাত উন্মুক্ত করবেন না? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "আমি নারীদের সাথে মুসাফাহা করি না, তবে আমি তাদের থেকে (আনুগত্যের) শপথ গ্রহণ করি।"

সেখানে মহিলাদের মধ্যে তার (আসমা’র) একজন খালা ছিলেন, যার হাতে দুটি সোনার বালা এবং সোনার আংটি ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "ওহে নারী, তুমি কি এতে খুশি হবে যে আল্লাহ কিয়ামতের দিন তোমাকে জাহান্নামের আগুন দ্বারা দুটি বালা এবং আংটি পরাবেন?" তিনি বললেন: হে আল্লাহর নবী! আমি আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই।

আসমা বলেন: আমি বললাম: হে আমার খালা, আপনার গায়ে যা আছে তা ছুঁড়ে ফেলুন। তিনি তা ছুঁড়ে ফেললেন। আসমা আমার কাছে বর্ণনা করে বললেন: হে আমার পুত্র! আল্লাহর কসম, তিনি তা ছুঁড়ে ফেলেছিলেন, এবং আমি জানি না কে তা ঐ স্থান থেকে তুলে নিয়েছিল, আর আমাদের কেউ সেদিকে ফিরেও তাকাইনি।

আসমা বলেন: অতঃপর আমি বললাম: হে আল্লাহর নবী! কোনো নারী যদি তার স্বামীর কাছে সুস্বাদু খাদ্য বা অলংকার দ্বারা নিজেদের সুন্দর করে পেশ না করে, তবে সে স্বামীর কাছে তুচ্ছ হয়ে যায়। নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমাদের মধ্যে কারোর জন্য দুটি রূপার দুল তৈরি করতে অথবা দুটি রূপার পুঁতি তৈরি করতে কি আপত্তি আছে? এরপর সে যেন সেগুলোকে জাফরানের কিছু অংশ দ্বারা তার আঙ্গুলের মাঝখানে মেখে নেয়। তখন তা সোনার মতো ঝলমল করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (14970)


14970 - عن أسماء بنت يزيد قالت: أتيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لأبايعه، فدنوت، وعليّ سواران من ذهب، فبصر ببصيصهما، فقال:"ألقي السوارين يا أسماء، أما تخافين أن يسورك اللَّه بسوار من نار".

قالت: فألقيتهما، فما أدري من أخذهما.

حسن: رواه أحمد (27563) واللفظ له، والطبرانى (24/ 182) كلاهما من طريق شهر بن حوشب أنه لقي أسماء بنت يزيد قال: فحدثتني، فذكرت الحديث.

وإسناده حسن من أجل الكلام في شهر بن حوشب غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف ولم يأت في حديثه بما ينكر عليه.

ورواه أيضًا أحمد (27578) من وجه آخر عن شهر بن حوشب عن أسماء نحوه.

وروى أبو داود (4238)، والنسائي (5139) كلاهما من حديث يحيى بن أبي كثير أن محمود ابن عمرو الأنصاري حدثه أن أسماء بنت يزيد، حدثته، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أيما امرأة تقلدت قلادة من ذهب، قلدت في عنقها مثله من النار يوم القيامة، وأيما امرأة جعلت في أذنها خرصا من ذهب، جعل في أذنها مثله من النار يوم القيامة".

وفيه محمود بن عمرو بن يزيد بن السكن الأنصاري لم يوثّقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ:"مقبول" وهو كذلك لأنه قد توبع.




আসমা বিনতে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বাইআত করার জন্য এসেছিলাম। আমি তাঁর নিকটবর্তী হলাম, আর আমার হাতে ছিল সোনার দুটি চুড়ি। তিনি সেগুলোর ঝলকের দিকে তাকিয়ে বললেন: "হে আসমা, চুড়ি দুটি খুলে ফেলো। তুমি কি ভয় পাও না যে আল্লাহ তোমাকে আগুনের চুড়ি পরিধান করাবেন?" তিনি (আসমা) বললেন: তখন আমি চুড়ি দুটি খুলে ফেললাম। আমি জানি না কে সেগুলো নিয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (14971)


14971 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ويل للنساء من الأحمرين: الذهب والمعصفر".

حسن: رواه ابن حبان (5968)، والبيهقي في الشعب (5780) كلاهما من حديث سريج بن يونس، قال: حدّثنا عباد بن عباد، عن محمد بن عمرو بن علقمة، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة،
فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة فإنه حسن الحديث.

وعباد بن عباد هو ابن حبيب بن المهلب بن أبي صفرة البصري روى عن محمد بن عمرو بن علقمة، وعنه سريج بن يونس وهو ثقة، ومن ظن أنه عباد بن عباد الرملي الأرسوفي فضعف هذا الإسناد، مع أنه صدوق أيضًا عند جمهور أهل العلم إلا أنه متأخر عن ابن أةي صفرة وهو لم يدرك محمد بن عمرو بن علقمة.

وفي الباب ما روي عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم رأى عليها مسكتي ذهب، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألا أخبرك بما هو أحسن من هذا، لو نزعت هذا وجعلت مسكتين من ورق، ثم صفرتهما بزعفران كانتا حسنتين".

رواه النسائي (5143)، والطحاوي في شرح المشكل (4803) كلاهما عن إسحاق بن بكر (هو: ابن مضر) قال: حدثني أبي، عن عمرو بن الحارث، عن ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.

قال النسائي:"هذا غير محفوظ".

قلت: وهو يشير إلى الخلاف الواقع على الزهري، وقال الدارقطني في العلل (14/ 115 - 116) بعد أن ذكر الخلاف على الزهري:"والصحيح قول من قال: عن الزهري، عن عبد الحميد ابن عبد الرحمن مرسلا، عن النبي صلى الله عليه وسلم" انتهى.

قلت: وقد روي أيضًا من وجه آخر عن عائشة قالت: لما نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن لبس الذهب قلنا: يا رسول اللَّه ألا نربط المسك بشيء من ذهب؟ قال:"أفلا تربطونه بالفضة، ثم تلطخونه بزعفران، فيكون مثل الذهب".

رواه أحمد (24047)، وأبو يعلى (6952) كلاهما من طريق خصيف ومروان بن شجاع، عن مجاهد، عن عائشة، فذكرته.

وخصيف هو ابن عبد الرحمن الجزري الغالب عليه الضعف لسوء حفظه، وكذلك مروان بن شجاع وهو الجزري أيضًا، ولكنه لا بأس به في المتابعة إلا أنهما اضطربا في هذا الحديث، فروياه أيضًا عن عطاء، عن أم سلمة مثله. رواه أحمد (24048)، ورواه أيضًا عن خصيف وحده (26639).

ورواه الطبراني في الكبير (23/ 282) من وجهين عن خصيف، عن مجاهد، عن عائشة، وعن عبد الكريم، عن أم سلمة.

وعكرمة هو مولى ابن عباس قال علي بن المديني:"لا أعلمه سمع من أحد من أزواج النبي صلى الله عليه وسلم شيئًا" ذكره العلائي.

وفي معناه ما روي عن أخت حذيفة قالت: خطبنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"يا معشر النساء، أما
لكن في الفضة ما تحلين، أما إنه ليس منكن امرأة تحلى ذهبا تظهره إلا عذبت به".

رواه النسائي (5137)، وأحمد (27011) كلاهما من حديث عبد الرحمن بن مهدي قال: حدثني سفيان، عن منصور، عن ربعي، عن امرأته، عن أخت حذيفة قالت: فذكرته. وفي الإسناد امرأة ربعي مجهولة لا نعرف عنها شيئًا.

وفي معناه ما روي عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: جعلت شعائر من ذهب في رقبتها، فدخل النبي صلى الله عليه وسلم، فأعرض عنها، فقلت: ألا تنظر إلى زينتها؟ فقال:"عن زينتك أعرض".

قال (الراوي): زعموا أنه قال:"ما ضر إحداكن لو جعلت خرصا من ورق ثم جعلته بزعفران".

رواه أحمد (26682) عن روح، حدّثنا ابن جريج، قال: أخبرنا عطاء، عن أم سلمة، فذكرته. وفيه انقطاع؛ فإن عطاء هو ابن أبي رباح لم يسمع من أم سلمة كما قال علي بن المديني.

وفي الباب ما روي عن أبي هريرة قال: كنت قاعدًا عند النبي صلى الله عليه وسلم، فجاءته امرأة، فقالت: يا رسول اللَّه طوق من ذهب؟ قال:"طوق من نار". قالت: يا رسول اللَّه سواران من ذهب؟ قال:"سواران من نار". قالت: قرطان من ذهب؟ قال:"قرطان من نار". قال: وكان عليها سوار من ذهب، فرمت به، ثم قالت: يا رسول اللَّه، إن إحدانا إذا لم تزين لزوجها صلفت عنده، قال: فقال:"ما يمنع إحداكن تصنع قرطين من فضة ثم تصفرهما بالزعفران".

رواه أحمد (9677)، والنسائي (5142) كلاهما من حديث أسباط، قال: حدّثنا مطرف، عن أبي الجهم، عن أبي زيد، عن أبي هريرة، فذكره.

وأبو زيد مجهول لم يوثّقه أحد، وذكر من رواته أبو الجهم فقط.

وأما ما ذكره الحافظ في تهذيب التهذيب:"أخرج أحمد من طريق شعبة، عن أبي زيد مولى الحسن بن علي، عن أبى هريرة حديثا غير هذا، فكأنه هو، ورواية شعبة عنه مما يقوي أمره". ففيه وهمٌ فإن الحافظ نفسه لم يذكر في إتحاف المهرة من رواية أبي زيد عن أبي هريرة غير حديث الذهب المذكور أعلاه.

وفي معناه ما روي عن عبد اللَّه بن عمر قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الميثرة والقسية وحلقة الذهب والمفدم.

قال يزيد: والميثرة جلود السباع، والقسية ثياب مضلعة من إبريسم يجاء بها من مصر، والمفدم المشبع بالعصفر.

رواه أحمد (5751) عن حسين بن محمد، حدّثنا يزيد يعني ابن عطاء، عن يزيد بن أبي زياد، حدثني الحسن بن سهيل -أو سهيل- بن عمرو بن عبد الرحمن بن عوف، عن عبد اللَّه بن عمر قال: فذكره.

ورواه ابن ماجه (3643) من وجه آخر عن يزيد بن أبي زياد مقتصرًا على قوله: نهى رسول اللَّه
-صلى الله عليه وسلم عن خاتم الذهب.

وإسناده ضعيف من أجل يزيد بن أبي زياد وهو الهاشمي القرشي ضعيف باتفاق أهل العلم.

فقه الحديث:

حملت أحاديث النهي عن استعمال الذهب والفضة للنساء ما لم تؤد زكاته، أو كانت تلبس إظهارًا للفخر.

وقد يُحمل التحريم على الجميع في أول الإسلام، ثم أبيحت للنساء وبقي التحريم على الرجال كما يظهر ذلك جليًّا في الباب الذي يليه:




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুটি লাল বস্তু—সোনা এবং কুসুমফুল (বা জাফরান) দ্বারা রাঙানো কাপড়—এর কারণে নারীদের জন্য দুর্ভোগ।"

হাদীসের ফিকহ:
মহিলাদের জন্য সোনা ও রূপা ব্যবহার নিষিদ্ধ হওয়ার হাদীসগুলোকে এমন ক্ষেত্রে প্রযোজ্য বলে গণ্য করা হয়েছে, যেখানে এর যাকাত আদায় করা হয়নি, অথবা অহংকার প্রদর্শনের জন্য তা পরিধান করা হয়েছে। আর এই নিষেধাজ্ঞা ইসলামের প্রাথমিক যুগে সকলের (পুরুষ ও নারী) জন্য প্রযোজ্য ছিল বলেও ধরে নেওয়া হয়, এরপর তা নারীদের জন্য বৈধ করা হয় এবং পুরুষদের জন্য নিষিদ্ধই থেকে যায়, যা পরবর্তী অধ্যায়ে সুস্পষ্টভাবে দেখা যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (14972)


14972 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن خاتم الذهب.

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5864)، ومسلم في اللباس والزينة (2089) كلاهما من طريق شعبة، عن قتادة، عن النضر بن أنس، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) সোনার আংটি ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14973)


14973 - عن البراء بن عازب يقول: نهانا النبي صلى الله عليه وسلم عن سبع: نهانا عن خاتم الذهب أو قال: حلقة الذهب، وعن الحرير، والإستبرق، والديباج، والميثرة الحمراء، والقسي، وآنية الفضة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5863)، ومسلم في اللباس والزينة (2066) كلاهما من طريق شعبة، حدّثنا أشعث بن سليم، قال: سمعت معاوية بن سويد بن مقرن، قال: سمعت البراء ابن عازب يقول: فذكره.




বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে সাতটি জিনিস থেকে নিষেধ করেছেন: তিনি আমাদেরকে সোনার আংটি—অথবা তিনি বলেছেন: সোনার বলয়—থেকে, এবং রেশম, ইস্তাবরাক (মোটা রেশম), দিবাজ (পাতলা রেশম), লাল মিছারা (রেশমী গদি/কাপড়), কাসি (মিশরের তৈরি রেশমী কাপড়) এবং রূপার পাত্র (ব্যবহার করতে) থেকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14974)


14974 - عن ابن عمر أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم اصطنع خاتما من ذهب، فكان يجعل فصه في باطن كفه إذا لبسه، فصنع الناس، ثم إنه جلس على المنبر فنزعه، فقال:"إني كنت ألبس هذا الخاتم، وأجعل فصه من داخل"، فرمى به، ثم قال:"واللَّه، لا ألبسه أبدًا"، فنبذ الناس خواتيمهم.

وفي رواية: واتخذ خاتما من ورق.

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5876)، ومسلم في اللباس والزينة (2091) كلاهما من حديث نافع، عن عبد اللَّه، فذكره. والسياق لمسلم.

قال جويرية: ولا أحسبه إلا قال: في يده اليمنى.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি সোনার আংটি তৈরি করিয়েছিলেন। যখন তিনি সেটি পরতেন, তখন তার আংটির নগীনা হাতের তালুর ভেতরের দিকে রাখতেন। এরপর লোকেরাও (সোনার আংটি) তৈরি করল। অতঃপর তিনি মিম্বারে বসলেন এবং আংটিটি খুলে ফেললেন। তিনি বললেন: “আমি এই আংটিটি পরিধান করতাম এবং এর নগীনা ভেতরের দিকে রাখতাম।” এরপর তিনি সেটি ছুঁড়ে ফেলে দিলেন এবং বললেন: “আল্লাহ্‌র কসম! আমি এটা আর কক্ষনো পরিধান করব না।” ফলে লোকেরাও তাদের আংটিগুলো ছুঁড়ে ফেলে দিল।

অপর এক বর্ণনায় আছে: আর তিনি রৌপ্যের (রূপার) আংটি গ্রহণ করলেন।

হাদিসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। এটি বুখারী (৫৮৭৬) এবং মুসলিম (২০৯১) নাফি’র সূত্রে আব্দুল্লাহ্ (ইবনু উমর)-এর মাধ্যমে বর্ণনা করেছেন। এটি মুসলিমের বর্ণনা।

জুওয়াইরিয়্যাহ বলেছেন: আমি মনে করি না যে তিনি (নাফি’) এটুকু ছাড়া আর কিছু বলেছেন: (তিনি আংটিটি) তাঁর ডান হাতে পরতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14975)


14975 - عن عبد اللَّه بن عباس، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رأى خاتما من ذهب في يد رجل، فنزعه فطرحه، وقال:"يعمد أحدكم إلى جمرة من نار فيجعلها في يده"، فقيل للرجل
بعد ما ذهب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: خذ خاتمك انتفع به، قال: لا واللَّه، لا آخذه أبدًا وقد طرحه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في اللباس والزينة (2090) عن محمد بن سهل التميمي، حدّثنا ابن أبي مريم (هو سعيد)، أخبرني محمد بن جعفر، أخبرني إبراهيم بن عقبة، عن كريب، مولى ابن عباس، عن عبد اللَّه بن عباس، فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তির হাতে স্বর্ণের আংটি দেখতে পেলেন। তিনি তা খুলে ছুঁড়ে ফেলে দিলেন এবং বললেন: "তোমাদের কেউ কি আগুনের একটি জ্বলন্ত অঙ্গার নিজের হাতে রাখার ইচ্ছা করে?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলে যাওয়ার পর লোকটিকে বলা হলো: তোমার আংটিটি নিয়ে নাও, এর দ্বারা উপকার লাভ করো। লোকটি বলল: আল্লাহর কসম! আমি এটা কক্ষনো নেব না, কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজেই তা ছুঁড়ে ফেলে দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14976)


14976 - عن أنس بن مالك أنه رأى في يد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خاتما من ورق يوما واحدا، ثم إن الناس اصطنعوا الخواتيم من ورق ولبسوها، فطرح رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خاتمه، فطرح الناس خواتيمهم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللباس (5868) من طريق يونس (هو ابن يزيد الأيلي)، ومسلم في اللباس (2093: 59) من طريق إبراهيم بن سعد، و (60) من طريق زياد (هو ابن سعد) ثلاثتُهم عن الزهري قال: حدثني أنس، فذكره.

وقوله:"خاتما من ورق" مشكل لأن المعروف أن الخاتم الذي طرحه النبي صلى الله عليه وسلم بسبب اتخاذ الناس مثله إنما هو خاتم الذهب كما سبق من حديث ابن عمر.

لذلك ذهب جمهور أهل العلم على توهيم الزهري في ذكر الورق في هذا الحديث، بل نسبه النووي تبعا للقاضي عياض لجميع أهل الحديث. هذا هو الصحيح بخلاف من حاول تأويله.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাতে মাত্র একদিনের জন্য রূপার একটি আংটি দেখলেন। এরপর লোকেরা রূপার আংটি তৈরি করে পরিধান করতে শুরু করল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর আংটিটি খুলে ফেললেন (বা ফেলে দিলেন)। ফলে লোকেরাও তাদের আংটিগুলো ফেলে দিল।









আল-জামি` আল-কামিল (14977)


14977 - عن علقمة، قال: كنا جلوسا مع ابن مسعود، فجاء خباب، فقال: يا أبا عبد الرحمن، أيستطيع هؤلاء الشباب أن يقرؤوا كما تقرأ؟ قال: أما إنك لو شئت أمرت بعضهم يقرأ عليك؟ قال: أجل، قال: اقرأ يا علقمة، فقال زيد بن حدير، أخو زياد ابن حدير: أتأمر علقمة أن يقرأ وليس بأقرئنا؟ قال: أما إنك إن شئت أخبرتك بما قال النبي صلى الله عليه وسلم في قومك وقومه؟ فقرأت خمسين آية من سورة مريم، فقال عبد اللَّه: كيف ترى؟ قال: قد أحسن، قال عبد اللَّه: ما أقرأ شيئًا إلا وهو يقرؤه، ثم التفت إلى خباب وعليه خاتم من ذهب، فقال: ألم يأن لهذا الخاتم أن يلقى، قال: أما إنك لن تراه علي بعد اليوم، فألقاه.

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4391) عن عبدان، عن أبي حمزة، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، ، فذكره.

وفي معناه أيضًا ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود قال: نهانا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن خاتم الذهب، أو حلقة الذهب.

رواه أحمد (3715)، والطبراني في الكبير (10/ 259)، وأبو يعلى (5152) كلهم من طريق
شعبة، عن يزيد بن أبي زياد، عن أبي سعد، عن أبي كنود، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.

ويزيد بن أبي زياد هو الهاشمي ضعيف باتفاق أهل العلم، وشيخه أبو سعد هو الأزدي مجهول.




আলকামা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে উপবিষ্ট ছিলাম। এমন সময় খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন এবং বললেন, হে আবূ আব্দুর রহমান! এই যুবকেরা কি আপনার মতো করে পড়তে পারবে? তিনি (ইবন মাসঊদ) বললেন, আপনি যদি চান, আমি তাদের কাউকে আপনাকে পড়ে শোনাতে বলব? খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হ্যাঁ। তিনি বললেন, হে আলকামা, তুমি পড়ো।

তখন যিয়াদ ইবন হুদায়রের ভাই যায়দ ইবন হুদায়র বললেন, আপনি আলকামাকে পড়ার নির্দেশ দিচ্ছেন, অথচ তিনি আমাদের মধ্যে সর্বোত্তম পাঠক নন? তিনি (ইবন মাসঊদ) বললেন, আপনি যদি চান, আমি আপনাকে জানাবো আপনার সম্প্রদায় এবং তার (আলকামার) সম্প্রদায় সম্পর্কে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী বলেছেন?

অতঃপর আমি (আলকামা) সূরা মারইয়ামের পঞ্চাশটি আয়াত পড়লাম। আব্দুল্লাহ (ইবন মাসঊদ) বললেন, আপনি (খাব্বাব) কেমন দেখলেন? তিনি (খাব্বাব) বললেন, সে খুব ভালোভাবে পড়েছে। আব্দুল্লাহ (ইবন মাসঊদ) বললেন, আমি এমন কিছু পড়ি না যা সেও না পড়ে। অতঃপর তিনি খাব্বাবের দিকে তাকালেন। খাব্বাবের হাতে সোনার একটি আংটি ছিল। তিনি (ইবন মাসঊদ) বললেন, এই আংটিটি কি ফেলে দেওয়ার সময় হয়নি? খাব্বাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আপনি নিশ্চিত থাকতে পারেন, আজকের পর আর কখনো এটি আমার হাতে দেখবেন না। এরপর তিনি সেটি ফেলে দিলেন।

এই অর্থ সংক্রান্ত আরও একটি বর্ণনা আব্দুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে সোনার আংটি অথবা সোনার বালা ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14978)


14978 - عن علي بن أبي طالب قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن خاتم الذهب، وعن القسي، وعن الميثرة، وعن الجعة.

حسن: رواه الترمذيّ (2808)، وأبو داود (4051)، والنسائي (5165)، وابن ماجه (3654)، وابن أبي شيبة (8/ 110)، وأحمد (1102) كلهم من حديث أبي الأحوص، عن أبي إسحاق، عن هبيرة بن يريم، عن علي، فذكره.

واللفظ للترمذي، واختصره البعض.

قال أبو الأحوص: الجعة: هو شراب يتخذ بمصر من الشعير.

واسناده حسن من أجل هبيرة بن يريم فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".

وأبو إسحاق هو السبيعي مدلس، ولكن رواه أيضًا شعبة عند أبي داود وهو القائل: كفيتكم عن تدليس أبي إسحاق.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বর্ণের আংটি, কাসি (নামক রেশমী বস্ত্র), মায়সারা (নামক রেশমী গদি/কাপড়) এবং জু'আ (নামক পানীয়) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14979)


14979 - عن عائشة قالت: قدمت على النبي صلى الله عليه وسلم حلية من عند النجاشي أهداها له، فيها خاتم من ذهب فيه فص حبشي، قالت: فأخذه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعود معرضا عنه -أو ببعض أصابعه- ثم دعا أمامة ابنة أبي العاص، ابنة ابنته زينب، فقال:"تحلي بهذا يا بنية".

حسن: رواه أبو داود (4235)، وابن ماجه (3644)، وأحمد (24880) كلهم من حديث محمد بن إسحاق قال: حدثني يحيى بن عباد، عن أبيه عباد بن عبد اللَّه، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل تصريح ابن إسحاق عند أبي داود.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নাজ্জাশী (রাজা) কর্তৃক প্রেরিত কিছু অলংকার আসল যা তিনি তাঁকে উপহার হিসেবে দিয়েছিলেন। সেগুলোর মধ্যে একটি সোনার আংটি ছিল, যাতে একটি হাবশি পাথর বা নকশা ছিল। তিনি (আয়িশা) বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা একটি কাঠি দিয়ে—অথবা তাঁর কিছু আঙ্গুল দিয়ে—তা ধরলেন এবং তার প্রতি বিমুখতা দেখালেন। এরপর তিনি উমামা বিনতে আবুল আস (যিনি তাঁর নাতনী, তাঁর কন্যা যাইনাবের কন্যা ছিলেন)-কে ডাকলেন এবং বললেন: "হে আমার প্রিয় কন্যা, তুমি এটি দিয়ে নিজেকে সজ্জিত করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (14980)


14980 - عن زينب بنت نبيط بن جابر قال: حدثتني أمي وخالتي، أن النبي صلى الله عليه وسلم حلاهن رعاثا من الذهب.

حسن: رواه ابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (6/ 168) عن هشام بن عمار، ثنا سعيد بن يحيى اللخمي، ثنا محمد بن عمرو بن علقمة، حدثني محمد بن عمارة بن حزم، عن زينب بنت نبيط بن جابر، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة وشيخه محمد بن عمارة بن حرام فإنهما حسنا الحديث.

ورواه الطبراني في الكبير (25/ 185) من وجه آخر عن محمد بن عمرو بن علقمة به مطولا.

ذكره الهيثمي في المجمع (5/ 150) من جهة الطبراني وقال:"وفيه محمد بن عمرو بن علقمة،
وأقل مراتب حديثه الحسن وبقية رجاله ثقات".

قلت: وتابعه عبد اللَّه بن جعفر عن محمد بن عمارة، رواه ابن مندة في معرفة الصحابة كما ذكره ابن حجر في الإصابة (7/ 686)، وقد روي مرسلا، والحكم لمن وصل.

وقولها:"رعاثا" الرعاث القرطة وهي من حلي الأذن، واحدتها رعثة.




যায়নাব বিনত নুবায়ত বিন জাবির থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মা ও আমার খালা আমার কাছে বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁদেরকে স্বর্ণের র’আছ (কানের দুল) দ্বারা সজ্জিত করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14981)


14981 - عن عمران بن حصين أنه قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن التختم بالذهب.

حسن: رواه الترمذيّ (1738)، والنسائي (5187)، وأحمد (19980)، وابن حبان (5406) كلهم من حديث أبي التياح، قال: حدثني حفص الليثي، قال: أشهد على عمران بن حصين أنه قال: فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل حفص هو ابن عبد اللَّه الليثي البصري لم يرو عنه سوى أبي التياح (يزيد ابن حميد الضبعي)، ولم يوثّقه غير ابن حبان، فهو في عداد المجهولين حتى نجد له متابعا.

ولذلك قال الحافظ في التقريب"مقبول" أي إذا توبع، وهو كذلك فقد تابعه أبو نضرة عن أبي سعيد أو عن عمران بن حصين أنه قال: أشهد على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن لبس الحرير، وعن الشرب في الحناتم. رواه أحمد (19849).

وهو جزء من الحديث، والحديث بكامله رواه أحمد (19838) عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن أبي التياح قال: سمعت رجلا من بني ليث قال: أشهد على عمران بن حصين - قال شعبة أو قال عمران: أشهد على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن الحناتم -أو قال الحنتم- وخاتم الذهب، والحرير.

ورجل من بني ليث هو حفص بن عبد اللَّه الليثي كما سبق.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বর্ণের আংটি পরিধান করতে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14982)


14982 - عن رجل من أشجع قال: رأى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم علي خاتما من ذهب، فأمرني أن أطرحه، فطرحته إلى يومي هذا.

صحيح: رواه أحمد (18290) عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن حصين، عن سالم بن أبي الجعد، عن رجل منا من أشجع، فذكره.

وإسناده صحيح، وحصين هو ابن عبد الرحمن السلمي أبو الهذيل الكوفي قال أبو حاتم:"ثقة مأمون من كبار أصحاب الحديث". وإبهام الصحابي لا يضر.

ورواه أيضًا أحمد (22336) عن علي بن عاصم، حدّثنا حصين، عن سالم بن أبي الجعد، عن رجل من قومه، فذكر نحوه وزاد فيه:"إنما أمرتك أن تستمتع به ولا تطرحه".

وعلي بن عاصم بن صهيب تكلم فيه ابن المديني والبخاري والعقيلي وغيرهم، ويقال: إنه يخطئ ويصر فلعله أخطأ في ذكر الزيادة.




আশজা গোত্রের জনৈক ব্যক্তি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার হাতে সোনার একটি আংটি দেখলেন। অতঃপর তিনি আমাকে তা খুলে ফেলতে নির্দেশ দিলেন। ফলে আমি সেদিন থেকে আজ পর্যন্ত তা খুলে ফেলেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (14983)


14983 - عن أبي الشيخ أنه سمع معاوية -وعنده جمع من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: أتعلمون أن نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن لبس الذهب إلا مقطعا؟ قالوا: نعم.

حسن: رواه النسائي (5151) عن محمد بن المثنى قال: حدّثنا ابن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة، عن أبي الشيخ، أنه سمع معاوية، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي شيخ الهنائي وقيل: اسمه حيوان - حسن الحديث.

انظر: تخريجه مفصلا في النهي عن ركوب النمر.

وللحديث طرق أخرى كثيرة، منها ما رواه النضر بن شميل قال: حدّثنا بيهس بن فهدان قال: حدّثنا أبو شيخ الهنائي، فذكره. رواه النسائي (5159).

قال النسائي: وخالفه علي بن غراب. رواه عن بيهس، عن أبي شيخ، عن ابن عمر قال: نهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن لبس الذهب إلا مقطعا.

قال النسائي: حديث النضر أشبه بالصواب.

قلت: وهو كما قال، فإن علي بن غراب ضعيف، ضعفه أبو داود، وأفرط فيه ابن حبان فقال: حدث بالأشياء الموضوعة فبطل الاحتجاج به.

وأما النضر بن شميل فثقة ثبت من رجال الجماعة.

وقوله:"مقطعا" أي مقطوعا وهو شيء يسير مثل الزر والسن والأنف، بخلاف الكثير فإنه حرام من أجل السرف والخيلاء، والزمن زمن جهاد فالإنفاق في سبيل اللَّه أولى من ادخار الذهب.




মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর নিকট উপস্থিত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের একদলকে তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা কি জানো যে, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বর্ণ পরিধান করতে নিষেধ করেছেন, শুধুমাত্র 'মুকাত্তা' (খুব সামান্য খন্ডিত অংশ) ব্যতীত? তাঁরা বললেন: হ্যাঁ।









আল-জামি` আল-কামিল (14984)


14984 - عن عمرو بن أبي عمرو قال: سألت القاسم بن محمد قلت: إن ناسا يزعمون أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم نهى عن الأحمرين العصفر والذهب، فقال: كذبوا، واللَّه لقد رأيتُ عائشة تلبس المعصفرات وتلبس خواتم الذهب.

حسن: رواه ابن سعد (8/ 70) عن عبد اللَّه بن مسلمة بن قعنب، حدّثنا عبد العزيز بن محمد، عن عمرو بن أبي عمرو، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد العزيز بن محمد وهو الدراوردي فإنه حسن الحديث.

وجاء في أثر حسن رواه البيهقي في الكبرى (1/ 29) عن أبي عبد اللَّه الحافظ، حدّثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدّثنا يحيى بن أبي طالب، أخبرنا عبد الوهاب بن عطاء، أخبرنا سعيد، عن ابن سيرين، عن عمرة أنها قالت: كنا مع عائشة فما زلنا بها حتى رخصت لنا في الحلي، ولم ترخص لنا في الإناء المفضض.

وعبد الوهاب بن عطاء الخفاف حسن الحديث إذا لم يأت بما ينكر عليه. وسعيد هو ابن أبي عروبة.

وبمعناه ما روي عن أبي ثعلبة الخشني أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رأى في إصبعه خاتما من ذهب، فجعل
يقرع يده بعود معه، فغفل النبي صلى الله عليه وسلم عنه، فأخذ الخاتم فرمى به. فنظر النبي صلى الله عليه وسلم، فلم يره في إصبعه، فقال:"ما أرانا إلا قد أوجعناك وأغرمناك".

رواه أحمد (17749)، والنسائي (5190) كلاهما عن عفان، حدّثنا وهيب، قال: حدّثنا النعمان بن راشد، عن الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي ثعلبة الخشني، فذكره.

وفيه النعمان بن راشد وهو الجزري وصف بأنه سيء الحفظ وكثير الغلط فإن أصحاب الزهري رووه مرسلا، منهم: يونس كما قال النسائي فإنه خالفه فرواه عن الزهري، عن أبي إدريس مرسلا.

رواه عبد اللَّه بن وهب في جامعه (589) وعنه النسائي (5191) قال: أخبرني يونس، عن ابن شهاب قال: أخبرني أبو إدريس الخولاني أن رجلا ممن أدرك النبي صلى الله عليه وسلم لبس خاتما من ذهب، فذكر نحوه.

قال النسائي بعد أن ساق عدة روايات عن أصحاب الزهري:"والمراسيل أشبه بالصواب". وكذلك رجح الدارقطني في علله (6/ 320) المرسل.

وأما ما نقله الحافظ ابن حجر في الفتح (10/ 317): عن يونس، عن الزهري، عن أبي إدريس، عن رجل له صحبة قال: فذكر الحديث.

فالظاهر أنه وقع فيه تحريف من"أن رجلا" إلى"عن رجل" لأن قوله: عن رجل يجعل الإسناد متصلا، وجميع من نقل عن يونس قال: إن رجلا أي مرسلا.

فقه هذا الباب:

كان الذهب والفضة في أول الإسلام مباحا للرجال والنساء على البراءة الأصلية، فوقع الحظر على الجميع، ثم أبيحت للنساء دون الرجال.

ولقد ثبت عن عائشة أنها كانت تحلّي بنات أختها الذهب، وكانت أم سلمة تكره ذلك، وتنكره. رواه الطحاوي في شرح المشكل (12/ 299) بإسناد صحيح.

قال الطحاوي:"فكان في إباحة عائشة تحلي بنات أختها الذهب بعد سماعها من النبي صلى الله عليه وسلم ما قد ذكرناه عنها في هذا الباب: أن ذلك لم يكن منها إلا بعد وقوفها على حل ذلك لهن ولأمثالهن بعد حرمته كان عليهن وعلى أمثالهن، فثبت بذلك نسخ ما كانت علمته من منع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ما كان منع منه" اهـ.

وقال ابن شاهين في ناسخ الحديث ومنسوخه (ص 446):"وكان في أول الإسلام يلبس الرجال خواتيم الذهب، وغير ذلك، وكان الحظر قد وقع على الناس كلهم، ثم أباحه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للنساء دون الرجال، فصار ما كان على النساء من الحظر مباحا لهن فنسخت الإباحة الحظر".

وقال شيخ الإسلام ابن تيمية في مجموع الفتاوى (25/ 64):"وباب اللباس أوسع من باب الآنية فإن آنية الذهب والفضة تحرم على الرجال والنساء. وأما باب اللباس: فإن لباس الذهب
والفضة يباح للنساء بالاتفاق، ويباح للرجل ما يحتاج إليه من ذلك. ويباح يسير الفضة للزينة وكذلك يسير الذهب التابع لغيره كالطرز ونحوه في أصح القولين في مذهب أحمد وغيره؛ فإن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن الذهب إلا مقطعًا" اهـ.




আমর ইবনু আবি আমর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কাসিম ইবনু মুহাম্মাদকে জিজ্ঞেস করলাম। আমি বললাম, লোকেরা ধারণা করে যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দুটি লাল জিনিস—কুসুমফুল (দিয়ে রঙ করা কাপড়) এবং স্বর্ণ ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন। জবাবে তিনি বললেন: তারা মিথ্যা বলেছে। আল্লাহর শপথ! আমি আয়েশাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কুসুমফুল রঙ করা পোশাক পরিধান করতে এবং সোনার আংটি পরতে দেখেছি।

হাসান: এটি ইবনু সা'দ (৮/৭০) আব্দুল্লাহ ইবনু মাসলামা ইবনু কা'নাব থেকে, তিনি আব্দুল আযীয ইবনু মুহাম্মাদ থেকে, তিনি আমর ইবনু আবি আমর থেকে বর্ণনা করেছেন। আর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আর এর সনদ হাসান, কারণ এতে আব্দুল আযীয ইবনু মুহাম্মাদ রয়েছেন, যিনি আদ-দারাওয়ার্দী নামে পরিচিত এবং তাঁর হাদীসগুলো হাসান।

আরেকটি হাসান আছারে এসেছে যা বাইহাকী তাঁর সুনান আল-কুবরা (১/২৯) তে আবু আব্দুল্লাহ আল-হাফিজ থেকে, তিনি আবুল আব্বাস মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াকুব থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু আবি তালিব থেকে, তিনি আব্দুল ওয়াহহাব ইবনু আতা থেকে, তিনি সাঈদ থেকে, তিনি ইবনু সীরীন থেকে, তিনি আমরা থেকে বর্ণনা করেছেন। আমরা বলেন: আমরা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। আমরা তার সাথে এতদূর আলোচনা চালিয়ে গেলাম যে তিনি আমাদেরকে অলঙ্কার ব্যবহারের অনুমতি দিলেন। তবে তিনি রূপার প্রলেপযুক্ত পাত্র (ব্যবহারের) অনুমতি দেননি।

আব্দুল ওয়াহহাব ইবনু আতা আল-খাফফাফ উত্তম রাবী, যদি না তিনি আপত্তিজনক কিছু বর্ণনা করেন। আর সাঈদ হলেন ইবনু আবি আরুবা।

এর সমার্থক বর্ণনা আবু ছা'লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর আঙ্গুলে একটি সোনার আংটি দেখতে পেলেন। তখন তিনি তাঁর হাতে থাকা কাঠি দিয়ে তার হাতে আঘাত করতে লাগলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন অন্যমনস্ক হলেন, তখন সে (আবু ছা'লাবা) আংটিটি নিয়ে ফেলে দিল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকালেন এবং তা তার হাতে দেখতে পেলেন না। তখন তিনি বললেন: "আমরা মনে করি, আমরা তোমাকে কষ্ট দিয়েছি এবং আর্থিক ক্ষতি করেছি।"

এটি আহমাদ (১৭৭৪৯) এবং নাসাঈ (৫১৯০) বর্ণনা করেছেন। উভয়েই আফফান থেকে, তিনি উহাইব থেকে, তিনি নু'মান ইবনু রাশিদ থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি আতা ইবনু ইয়াযিদ আল-লাইছি থেকে, তিনি আবু ছা'লাবা আল-খুশানী থেকে বর্ণনা করেছেন। আর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

এতে নু'মান ইবনু রাশিদ আল-জাযারী রয়েছেন, যাঁকে স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা এবং অধিক ভুলকারী হিসেবে বর্ণনা করা হয়েছে। কারণ যুহরীর শিষ্যরা এটিকে মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। তাদের মধ্যে ইউনুসও রয়েছেন, যেমন নাসাঈ বলেছেন, তিনি তাঁর বিরোধিতা করে এটিকে যুহরী থেকে, তিনি আবু ইদ্রিস থেকে, মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

এটি আব্দুল্লাহ ইবনু ওয়াহাব তার জামে' (৫৮৯) তে বর্ণনা করেছেন এবং তার থেকে নাসাঈ (৫১৯১) বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: ইউনুস আমাকে খবর দিয়েছেন, তিনি ইবনু শিহাব থেকে বলেছেন: আবু ইদ্রিস আল-খাওলানী আমাকে খবর দিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগ পেয়েছেন এমন একজন লোক সোনার আংটি পরেছিলেন। এরপর তিনি অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

নাসাঈ, যুহরীর শিষ্যদের থেকে বেশ কয়েকটি বর্ণনা পেশ করার পর বলেছেন: "মুরসাল বর্ণনাগুলোই বিশুদ্ধতার অধিক নিকটবর্তী।" অনুরূপভাবে, দারাকুতনী তার ইলাল (৬/৩২০) গ্রন্থে মুরসাল বর্ণনাটিকে প্রাধান্য দিয়েছেন।

আর হাফেয ইবনু হাজার ফাতহুল বারী (১০/৩১৭) তে ইউনুস থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি আবু ইদ্রিস থেকে, তিনি একজন সাহাবী থেকে বর্ণনা করেছেন বলে যা উদ্ধৃত করেছেন—তাতে বাহ্যত "إن رجلا" (একজন লোক) থেকে "عن رجل" (একজন লোক থেকে) তে বিকৃতি ঘটেছে। কারণ "عن رجل" বললে সনদ মুত্তাসিল (সংযুক্ত) হয়ে যায়। অথচ যারা ইউনুস থেকে বর্ণনা করেছেন, তারা সবাই বলেছেন "إن رجلا" অর্থাৎ মুরসাল হিসেবে।

এই অধ্যায়ের ফিকহ: ইসলামের প্রথম দিকে স্বর্ণ ও রৌপ্য পুরুষ ও মহিলা উভয়ের জন্য মূলনীতির ভিত্তিতেই বৈধ ছিল। এরপর সবার উপর তা নিষিদ্ধ করা হয়। অতঃপর মহিলাদের জন্য বৈধ করা হয়, পুরুষদের জন্য নয়।

নিশ্চয়ই আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে প্রমাণিত যে, তিনি তাঁর ভাগ্নিদেরকে স্বর্ণের অলঙ্কার পরিয়ে দিতেন। তবে উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা অপছন্দ করতেন এবং এর নিন্দা করতেন। এটি তাহাবী শরহুল মুশকিল (১২/২৯৯) তে সহীহ সনদে বর্ণনা করেছেন।

তাহাবী বলেন: "আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই অধ্যায়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে আমাদের কাছে যা বর্ণিত হয়েছে তা শোনার পরও তাঁর ভাগ্নিদেরকে স্বর্ণের অলঙ্কার পরার অনুমতি দেওয়া এটাই প্রমাণ করে যে, পূর্বে এটি তাদের এবং তাদের মতো অন্যদের উপর হারাম থাকা সত্ত্বেও পরবর্তীতে তিনি এর বৈধতা সম্পর্কে নিশ্চিত হওয়ার পরেই তা করেছেন। এর মাধ্যমে প্রমাণিত হয় যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যে নিষেধাজ্ঞা আরোপ করেছিলেন, তা রহিত হয়ে গেছে।" সমাপ্ত।

ইবনু শাহীন তাঁর নাসিখুল হাদীস ওয়া মানসূখুহ (পৃ. ৪৪৬) গ্রন্থে বলেন: "ইসলামের শুরুতে পুরুষরা সোনার আংটি এবং অন্যান্য জিনিস পরিধান করত। আর নিষেধাজ্ঞা সবার উপরই আরোপিত হয়েছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম পুরুষদের বাদে মহিলাদের জন্য তা বৈধ করে দেন। ফলে মহিলাদের উপর যে নিষেধাজ্ঞা ছিল, তা তাদের জন্য বৈধ হয়ে যায় এবং বৈধতা নিষেধাজ্ঞাকে রহিত করে দেয়।"

শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়াহ মাজমূউল ফাতাওয়া (২৫/৬৪) তে বলেন: "পোশাকের অধ্যায় পাত্রের অধ্যায় থেকে অধিক প্রশস্ত। কারণ স্বর্ণ ও রৌপ্যের পাত্র পুরুষ ও মহিলা সবার জন্য হারাম। কিন্তু পোশাকের ক্ষেত্রে: মহিলাদের জন্য স্বর্ণ ও রৌপ্যের পোশাক পরিধান করা সর্বসম্মতিক্রমে বৈধ। আর পুরুষের জন্য তা থেকে যা প্রয়োজন, তা বৈধ। এবং সামান্য পরিমাণ রৌপ্য অলঙ্কারের জন্য বৈধ। অনুরূপভাবে, সামান্য পরিমাণ স্বর্ণ যা অন্য কিছুর সাথে সংযুক্ত থাকে, যেমন কাপড়ের নকশা ইত্যাদির ক্ষেত্রে—আহমাদ (রহ.) সহ অন্যান্য মাযহাবের অধিকাংশের মতে তা বৈধ। কারণ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম স্বর্ণ ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন 'তবে বিচ্ছিন্ন অংশ ব্যতীত'।" সমাপ্ত।









আল-জামি` আল-কামিল (14985)


14985 - عن عبد الرحمن بن طرفة أن جده عرفجة بن أسعد أصيب أنفه في الجاهلية يوم الكِلاب، فاتخذ أنفا من ورق، فأنتن عليه، فأمره النبي صلى الله عليه وسلم أن يتخذ أنفا يعني من ذهب.

حسن: رواه أبو داود (4232)، والترمذي (1770)، والنسائي (5161)، وأحمد (20269)، وصحّحه ابن حبان (5462) كلهم من حديث أبي الأشهب، عن عبد الرحمن بن طرفة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن طرفة فإنه حسن الحديث.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب إنما نعرفه من حديث عبد الرحمن بن طرفة، وقد روى سلم بن زرير، عن عبد الرحمن بن طرفة نحو حديث أبي الأشهب، وقد روى غير واحد من أهل العلم أنهم شدّوا أسنانهم بالذهب، وفي هذا الحديث حجة لهم.

وقال عبد الرحمن بن مهدي:"سلم بن رزين وهمٌ، وزرير أصح" انتهى كلام الترمذيّ.

ويوم الكلاب: يوم معروف من أيام الجاهلية، ووقعة مذكورة من وقائعهم. قاله الخطابي.

وقال الخطابي:"فيه إباحة استعمال اليسير من الذهب للرجال عند الضرورة كربط الأسنان به، وما جرى مجراه مما لا يجري غيره فيه مجراه".




আরফাজাহ ইবনে আসআদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জাহেলী যুগে কিলাবের যুদ্ধের দিন তাঁর নাক আঘাতপ্রাপ্ত হয়। অতঃপর তিনি রুপার/ধাতুর তৈরি একটি নাক লাগালেন। কিন্তু তা থেকে দুর্গন্ধ বের হতে লাগলো। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে স্বর্ণের তৈরি একটি নাক লাগানোর আদেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (14986)


14986 - عن ابن عباس قال: لعن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم المتشبهين من الرجال بالنساء، والمتشبهات من النساء بالرجال.

صحيح: رواه البخاريّ في اللباس (5885) عن محمد بن بشار، حدّثنا غندر، حدّثنا شعبة، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

هذا التشبه يحمل على التشبه في اللباس والزينة والحركات، وأما ما سوى ذلك من التشبه في الحياة الاجتماعية والأسرية كطلب العلم ونشره وتولي المناصب الإدارية ما يناسب كلا منهما فليس من التشبه المحرم.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই পুরুষদের অভিশাপ দিয়েছেন যারা নারীদের বেশ ধারণ করে (সাদৃশ্য গ্রহণ করে), এবং সেই নারীদের অভিশাপ দিয়েছেন যারা পুরুষদের বেশ ধারণ করে (সাদৃশ্য গ্রহণ করে)।

সহীহ: এটি বুখারী (লিবাস: ৫৮৮৫) মুহাম্মাদ ইবনে বাশ্‌শার, তিনি গুন্দার, তিনি শু’বাহ, তিনি কাতাদাহ, তিনি ইকরিমা, তিনি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

এই সাদৃশ্যতা পোশাক, সাজসজ্জা এবং চালচলনের ক্ষেত্রে প্রযোজ্য। তবে সামাজিক ও পারিবারিক জীবনে এর বাইরে অন্য কোনো সাদৃশ্য, যেমন—জ্ঞান অর্জন ও প্রচার, অথবা এমন প্রশাসনিক পদে দায়িত্ব গ্রহণ যা নারী-পুরুষ উভয়ের জন্য উপযুক্ত, তা নিষিদ্ধ সাদৃশ্যতার অন্তর্ভুক্ত নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (14987)


14987 - عن ابن عباس قال: لعن النبي صلى الله عليه وسلم المخنثين من الرجال، والمترجلات من النساء وقال:"أخرجوهم من بيوتكم".

قال: وأخرج النبي صلى الله عليه وسلم فلانا، وأخرج عمر فلانا.
صحيح: رواه البخاريّ في اللباس (5886) عن معاذ بن فضالة، حدّثنا هشام، عن يحيى، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পুরুষদের মধ্যে নারীদের মতো আচরণকারী এবং নারীদের মধ্যে পুরুষদের মতো আচরণকারী-দের অভিশাপ দিয়েছেন এবং বলেছেন: "তাদেরকে তোমাদের ঘর থেকে বের করে দাও।"
তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অমুক ব্যক্তিকে বের করে দিয়েছিলেন এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অমুক ব্যক্তিকে বের করে দিয়েছিলেন।