আল-জামি` আল-কামিল
15008 - عن صفية بنت شيبة قالت: بينما نحن عند عائشة قالت: وذكرت نساء قريش وفضلهن، فقالت عائشة: إن لنساء قريش لفضلا، وإني واللَّه ما رأيت أفضل من نساء الأنصار أشد تصديقا بكتاب اللَّه، ولا إيمانًا بالتنزيل، لقد أنزلت سورة النور {وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَى جُيُوبِهِنَّ} انقلب رجالهن إليهن يتلون عليهن ما أنزل إليهن فيها، ويتلو الرجل على امرأته وابنته وأخته، وعلى كل ذي قرابته، ما منهن امرأة إلا قامت إلى مرطها المرحل فاعتجرت به تصديقا وإيمانا بما أنزل اللَّه من كتابه، فأصبحن يصلين وراء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الصبح معتجرات كأن على رؤوسهم الغربان.
حسن: رواه ابن أبي حاتم في تفسيره (8/ 2575) عن أبيه، ثنا أحمد بن عبد اللَّه بن يونس، حدثني الزنجي بن خالد، حدثني عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم، عن صفية بنت شيبة قالت: فذكرته.
وإسناده حسن من أجل الزنجي بن خالد وشيخه عبد اللَّه بن عثمان، فإنهما حسنا الحديث.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কুরাইশ মহিলাদের এবং তাদের মর্যাদার আলোচনা হচ্ছিল, তখন তিনি বললেন:
"নিশ্চয়ই কুরাইশ মহিলাদের বিশেষ মর্যাদা রয়েছে। কিন্তু আল্লাহর কসম! আমি আনসারী মহিলাদের চেয়ে অধিক উত্তম কাউকে দেখিনি—যারা আল্লাহর কিতাবের প্রতি এতো বেশি সত্যায়নকারী এবং নাযিলকৃত বিষয়ের প্রতি এতো দৃঢ় ঈমান পোষণকারী।
যখন সূরা নূরের এই আয়াতটি নাযিল হলো: {আর তারা যেন তাদের ওড়না/খিমার তাদের বুকদেশের উপর টেনে দেয়} (وَلْيَضْرِبْنَ بِخُمُرِهِنَّ عَلَى جُيُوبِهِنَّ)—তখন তাদের পুরুষরা তাদের স্ত্রীদের কাছে ফিরে গেলেন এবং তাদের নিকট যা নাযিল হয়েছিল, তা পাঠ করে শোনালেন। পুরুষেরা তার স্ত্রী, কন্যা, বোন এবং সকল নিকটাত্মীয়ের কাছে তা তিলাওয়াত করল। তখন তাদের মধ্যে এমন কোনো নারী ছিলেন না, যিনি নকশা করা চাদরের দিকে এগিয়ে যাননি এবং তা দিয়ে নিজেদের আবৃত করেননি—আল্লাহর কিতাবে নাযিল হওয়া বিষয়ের প্রতি সত্যায়ন ও ঈমানস্বরূপ।
ফলে তারা এমন অবস্থায় সকাল করলেন যে, তারা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পেছনে ফজরের সালাত আদায় করছিলেন, আবৃত অবস্থায়—যেন তাদের মাথার উপরে কাক বসে আছে।" (অর্থাৎ সম্পূর্ণ কালো কাপড়ে আবৃত)।
15009 - عن أم سلمة، أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل عليها وهي تختمر، فقال:"لَيّةً لا ليَّتَيْنِ"
صحيح: رواه أبو داود (4115)، وأحمد (26522)، والحاكم (4/ 194 - 195) كلهم من حديث سفيان الثوري، عن حبيب بن أبي ثابت، عن وهب مولى أبي أحمد، عن أم سلمة، فذكرته.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: وهو كما قال، وقد اختلف في تعيين وهب مولى أبي أحمد، فذهب الحاكم إلى أنه أبو سفيان وهو من رجال الشيخين، ولذا صحّح هذا الإسناد، وإنه تبع في ذلك شيخه الدارقطني، واختاره المزي، ونقل الحافظ ابن حجر عن ابن عبد البر أنه قال: قيل: اسمه قزمان، ولا يصح له اسم غير كنيته.
قلت: الأول أصح واللَّه أعلم.
قال أبو داود:"معنى قوله:"لية لا ليتين" يقول: لا تعتم مثل الرجل، لا تكرره طاقا أو طاقين".
في الآية الكريمة ذكر اللَّه سبحانه وتعالى جملة المحارم الذين يجوز لهم إبداء الزينة إلا أنهم جميعا ليسوا على مرتبة واحدة.
قال القرطبي في تفسيره:"لما ذكر اللَّه تعالى الأزواج وبدأ بهم، ثنى بذوي المحارم وسوى بينهم في إبداء الزينة، ولكن تختلف مراتبهم بحسب ما في نفوس البشر. فلا مرية أن كشف الأب والأخ على المرأة أحوط من كشف ولد زوجها. وتختلف مراتب ما يبدى لهم؛ فيبدى للأب ما لا يجوز إبداؤه لولد الزوج".
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন যখন তিনি (মাথার কাপড়) পেঁচিয়ে নিচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন: "এক পেঁচ, দুই পেঁচ নয়।"
আবু দাউদ বলেন: তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বাণী "এক পেঁচ, দুই পেঁচ নয়" এর অর্থ হলো: সে যেন পুরুষের মতো পাগড়ি না বাঁধে। সে যেন এটিকে এক বা দু'বার ভাঁজ করে না নেয়।
পবিত্র আয়াতে আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা সেই সমস্ত মাহরামদের উল্লেখ করেছেন যাদের সামনে নিজেদের সৌন্দর্য প্রকাশ করা জায়েয, তবে তারা সকলেই একই স্তরের নন।
আল-কুরতুবী তাঁর তাফসীরে বলেন: আল্লাহ তাআলা যখন স্বামীদের কথা উল্লেখ করলেন এবং তাদের দিয়ে শুরু করলেন, অতঃপর তিনি মাহরামদের উল্লেখ করলেন এবং তাদের সামনে সৌন্দর্য প্রকাশের ক্ষেত্রে তাদের সমতুল্য রাখলেন। কিন্তু মানুষের অন্তরের অবস্থার ভিত্তিতে তাদের স্তর ভিন্ন হয়ে থাকে। এতে কোনো সন্দেহ নেই যে, স্বামীর পুত্রের তুলনায় পিতা ও ভাইয়ের সামনে (পর্দা) উন্মোচন করা অধিক সুরক্ষিত। আর তাদের সামনে যা প্রকাশ করা হবে, তার স্তরও ভিন্ন হবে; পিতার সামনে যা প্রকাশ করা যায়, তা স্বামীর পুত্রের সামনে প্রকাশ করা জায়েয নয়।
15010 - عن عبد اللَّه بن مسعود عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المرأة عورة، فإذا خرجت استشرفها الشيطان".
صحيح: رواه الترمذيّ (1173)، وابن خزيمة (1685)، وابن حبان (5598) كلهم من حديث عمرو بن عاصم، قال: حدّثنا همام، عن قتادة، عن مورِّق، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه، فذكره. واللفظ للترمذي. وإسناده صحيح.
وزاد ابن خزيمة:"وأقرب ما تكون من وجه ربها وهي في قعر بيتها".
وقد روي عن علي، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"عورة الرجل على الرجل كعورة المرأة على الرجل، وعورة المرأة على المرأة كعورة المرأة على الرجل".
رواه الحاكم (4/ 180) عن علي بن حمشاذ العدل، ثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي وعلي بن الصقر السكري قالا: ثنا إبراهيم بن حمزة الزهري، ثنا إبراهيم بن علي الرافعي، حدثني علي بن عمر بن علي بن أبي طالب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد" وتعقبه الذهبي فقال: الرافعي ضعفّوه.
قلت: وهو كما قال، والرافعي هو إبراهيم بن علي بن حسن بن أبي رافع المدني ضعّفه الدارقطني وابن حبان وغيرهما، ومشّاه ابن معين وقال أبو حاتم:"شيخ".
وأما قوله تعالى: {وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا مَا ظَهَرَ مِنْهَا} فقد اختلفت أقوال الصحابة في تعيين هذه الزينة.
فقال ابن مسعود: كالرداء والثياب.
وروي عنه أنه قال: الزينة زينتان: زينة لا يراها إلا الزوج، الخاتم والسوار، وزينة يراها الأجانب وهي الظاهر من الثياب.
وقال ابن عباس: الكف ورقعة الوجه. أخرجه ابن أبي شيبة (17281) عن زياد بن الربيع، عن صالح الدهان، عن جابر بن زيد، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن، صالح الدهان هو: صالح بن إبراهيم أبو نوح وثّقه ابن معين وقال أبو حاتم:"ليس به بأس". الجرح والتعديل (4/ 393).
كما روي عنه أيضًا أنه قال: الكحل والخاتم. ذكره البيهقي (2/ 225).
وروى ابن جرير في تفسيره (17/ 259) بإسناده عن ابن عباس قال:"الزينة الظاهرة: الوجه، وكحل العين، وخضاب الكف، والخاتم. فهذه تظهر في بيتها لمن دخل من الناس عليها". أي من المحارم.
وجمع بعض أهل العلم قولي ابن عباس فقالوا: قوله: الوجه والكفان قبل نزول الحجاب، والكحل والعين وخضاب الكف والخاتم بعد الحجاب لأن وضع المرأة اختلف بعد نزول الحجاب كما قالت عائشة، وعليه يدل الأحاديث والآثار الآتية.
وقد كانت المرأة قبل نزول الحجاب تبرز للرجال فمنعها اللَّه عن ذلك فقال عز وجل: {وَقَرْنَ فِي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَى} [الأحزاب: 33]
وكانت آية الحجاب نزلت بناء على طلب عمر بن الخطاب.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নারী হলো গোপনীয় (পর্দার বস্তু)। যখন সে ঘর থেকে বের হয়, শয়তান তাকে আকর্ষণীয় করে তোলে (বা তার দিকে লক্ষ্য করে)।" ইবনে খুযাইমাহ আরও যোগ করেছেন: "আর সে তার রবের চেহারার সবচেয়ে নিকটবর্তী হয়, যখন সে তার ঘরের গভীরে অবস্থান করে।"
15011 - عن أنس قال: قال عمر: يا رسول اللَّه يدخل عليك البر والفاجر، فلو أمرت أمهات المؤمنين بالحجاب فأنزل اللَّه آية الحجاب.
صحيح: رواه البخاري (4790) عن مسدد، عن يحيى بن أيوب، عن حميد، عن أنس، فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনার নিকট ভালো-মন্দ (ধার্মিক ও পাপী) উভয় ধরনের লোক প্রবেশ করে। আপনি যদি উম্মুল মুমিনীনদেরকে পর্দার আদেশ করতেন!' অতঃপর আল্লাহ তাআলা পর্দার (হিজাবের) আয়াত নাযিল করলেন।
15012 - عن أنس بن مالك قال: قال عمر: وافقت ربي في ثلاث ومنها: آية الحجاب.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصلاة (402) عن عمرو بن عون، قال: حدّثنا هشيم، عن حميد، عن أنس، فذكر الحديث بطوله وهو مخرج في موضعه.
ورواه مسلم في فضائل الصحابة (2399) من وجه آخر عن ابن عمر، عن عمر مختصرًا.
إلا أن النبي صلى الله عليه وسلم الذي كان أعلم من عمر وأغير منه لم يفعل ذلك حتى نزل الوحي، كما في سورة الأحزاب في قصة زينب بنت جحش الآتية.
والخطأ في هذا من ظنَّ أن عمر طلب من النبي صلى الله عليه وسلم احتجاب أمهات المؤمنين فأنزل اللَّه عز وجل آية الحجاب مباشرة.
আনাস ইবন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি আমার রবের সাথে তিনটি বিষয়ে একমত হয়েছি। সেগুলোর মধ্যে একটি হলো: পর্দার আয়াত (নাযিল হওয়া)।
হাদিসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি: এটি ইমাম বুখারী সালাত অধ্যায়ে (৪০২) আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে পূর্ণাঙ্গভাবে বর্ণনা করেছেন এবং এটি অন্যত্রও বর্ণিত আছে। ইমাম মুসলিমও এটি ফাদাইলুস সাহাবা (২৩৯৯) অধ্যায়ে ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাধ্যমে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন।
তবে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে অধিক জ্ঞানী ও অধিক আত্মমর্যাদাশীল ছিলেন, তিনি ওহী নাযিল হওয়ার আগ পর্যন্ত তা করেননি। যেমনটি সূরা আহযাবে যয়নাব বিনতে জাহশের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘটনায় আসছে। এক্ষেত্রে সেই ব্যক্তি ভুল করে, যে মনে করে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উম্মাহাতুল মু'মিনীনদের জন্য পর্দার আবেদন করেছিলেন এবং আল্লাহ্ তা'আলা সরাসরি পর্দার আয়াত নাযিল করেছিলেন।
15013 - عن أنس قال: لما انقضتْ عدة زينب، قال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم لزيد:"فاذكرها علي" قال: فانطلق زيد حتى أتاها، وهي تخمر عجينها، قال: فلما رأيتها عظمت في صدري، حتى ما أستطيع أن أنظر إليها أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذكرها، فوليتها ظهري، ونكصت على عقبي، فقلت: يا زينب: أرسل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يذكركِ، قالت: ما أنا بصانعة شيئًا حتى أوامر ربي، فقامت إلى مسجدها، ونزل القرآن، وجاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فدخل عليها بغير إذن، قال: فقال: ولقد رأيتنا أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أطعمنا الخبز واللحم حين امتد النهار، فخرج الناس، وبقي رجال يتحدثون في البيت بعد الطعام،
فخرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم واتبعته، فجعل يتتبع حجر نسائه يسلم عليهن، ويقلن: يا رسول اللَّه، كيف وجدت أهلك؟ قال: فما أدري أنا أخبرته أن القوم قد خرجوا أو أخبرني، قال: فانطلق حتى دخل البيت، فذهبت أدخل معه، فألقى الستر بيني وبينه، ونزل الحجاب، قال: ووعظ القوم بما وعظوا به، زاد ابن رافع في حديثه: {لَا تَدْخُلُوا بُيُوتَ النَّبِيِّ إِلَّا أَنْ يُؤْذَنَ لَكُمْ إِلَى طَعَامٍ غَيْرَ نَاظِرِينَ إِنَاهُ} إلى قوله: {وَاللَّهُ لَا يَسْتَحْيِي مِنَ الْحَقِّ} [سورة الأحزاب: 53].
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1428) من طرق عن سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন যাইনাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ইদ্দত শেষ হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যায়দকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “তুমি তার কাছে আমার পক্ষ থেকে বিবাহের প্রস্তাব দাও।” যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি তার কাছে গেলাম। সে তখন আটা খামির করছিল। তিনি বললেন: যখন আমি তাকে দেখলাম, তখন আমার অন্তরে তার মহত্ত্ব এমনভাবে বেড়ে গেল যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যেহেতু তার কথা উল্লেখ করেছেন, তাই আমি তার দিকে সরাসরি তাকাতে পারছিলাম না। আমি তাকে পিঠ দেখালাম এবং আমার গোড়ালির উপর ভর করে পেছনের দিকে সরে আসলাম। আমি বললাম: হে যাইনাব, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনাকে বিবাহের প্রস্তাব দেওয়ার জন্য আমাকে পাঠিয়েছেন। যাইনাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আমার রবের সাথে পরামর্শ না করে কিছু করব না। অতঃপর তিনি তার সালাতের স্থানে (সালাত আদায়ের জন্য) দাঁড়ালেন। এরপর (এ বিষয়ে) কুরআনের আয়াত নাযিল হলো। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং অনুমতি ছাড়াই তার কাছে প্রবেশ করলেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি দেখেছি, যখন দিনের অনেকটা সময় পার হয়ে গেল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে রুটি ও গোশত খাওয়ালেন। এরপর লোকেরা (খাবার শেষে) বেরিয়ে গেল। কিন্তু কিছু লোক খাবার পরেও ঘরের মধ্যে বসে গল্প করতে লাগল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন বেরিয়ে গেলেন এবং আমি তাঁর পিছু নিলাম। তিনি তখন তাঁর স্ত্রীদের কক্ষগুলোতে গেলেন এবং তাদের সালাম দিলেন। স্ত্রীরা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আপনার পরিবারকে কেমন পেলেন? তিনি বললেন: আমার মনে নেই—আমি কি তাঁকে বললাম যে, লোকেরা চলে গেছে, নাকি তিনি আমাকে বললেন। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি চললেন এবং ঘরে প্রবেশ করলেন। আমি তাঁর সাথে প্রবেশ করতে যাচ্ছিলাম, তখন তিনি আমার ও তাঁর মাঝে পর্দা ঝুলিয়ে দিলেন। এরপর পর্দার (হিজাবের) বিধান নাযিল হলো। তিনি বললেন: আর যারা (গল্প করছিল), তাদেরকে ওই উপদেশ দিলেন যা তাদের দেওয়া হয়েছিল। ইবনু রাফি তার হাদীসে এতটুকু অংশ অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: “তোমরা নবীর গৃহে প্রবেশ করো না, তবে তোমাদেরকে খাবারের অনুমতি দিলে ভিন্ন কথা—তোমরা খাবারের প্রস্তুতির জন্য অপেক্ষায় থেকো না...” [সূরা আল-আহযাব: ৫৩]-এর এই আয়াত পর্যন্ত, “আর আল্লাহ সত্য বলতে লজ্জিত হন না।” (সূরা আল-আহযাব: ৫৩)।
15014 - عن عائشة قالت (في حديث الإفك حين جاءها صفوان بن المعطل):"فأتاني فعرفني حين رآني، وكان يراني قبل الحجاب، فاستيقظتُ باسترجاعه حين عرفني، فخمرت وجهي بجلبابي. . .".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4750)، ومسلم في التوبة (2770) كلاهما من حديث يونس بن يزيد، عن الزهري، قال: أخبرني عروة بن الزبير وسعيد بن المسيب، وعلقمة بن وقاص، وعبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة بن مسعود، عن حديث عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইফকের ঘটনা প্রসঙ্গে (যখন সাফওয়ান ইবনু মুআত্তাল তাঁর কাছে এলেন) তিনি বলেন: সে আমার কাছে এলো এবং আমাকে দেখেই চিনতে পারল, কারণ পর্দার বিধান আসার আগে সে আমাকে দেখত। যখন সে আমাকে চিনতে পারল, তখন তার ইস্তিরজা (ইন্না লিল্লাহি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজিউন বলা) শুনে আমি জেগে উঠলাম। অতঃপর আমি আমার জিলবাব (চাদর) দিয়ে আমার মুখমণ্ডল আবৃত করে নিলাম।
15015 - عن عائشة قالت: خرجت سودة بعد ما ضرب الحجاب لحاجتها، وكانت امرأة جسيمة لا تخفى على من يعرفها، فرآها عمر بن الخطاب فقال: يا سودة، أما واللَّه ما تخفين علينا، فانظري كيف تخرجين.
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4795)، ومسلم في السلام (2170) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
قوله:"لا تخفى على من يعرفها" أي من ضخامة جسمها لا من وجهها.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্দার বিধান অবতীর্ণ হওয়ার পর তার প্রয়োজনে বাইরে বের হলেন। তিনি ছিলেন দীর্ঘদেহী (ভারী) মহিলা, ফলে যারা তাকে চিনত তাদের কাছে তিনি গোপন থাকতেন না (তাদের দৃষ্টি এড়াতেন না)। তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখতে পেলেন এবং বললেন: হে সাওদা! আল্লাহর কসম, তুমি আমাদের কাছ থেকে লুকাতে পারছ না। সুতরাং তুমি কীভাবে বাইরে আসো তা লক্ষ্য করো।
15016 - عن أم سلمة قالت: لما نزلت: {يُدْنِينَ عَلَيْهِنَّ مِنْ جَلَابِيبِهِنَّ}، خرج نساء الأنصار كأن على رءوسهن الغربان من الأكسية.
حسن: رواه أبو داود (4101) عن محمد بن عبيد، حدّثنا ابن ثور، عن معمر، عن ابن خثيم، عن صفية بنت شيبة، عن أم سلمة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل ابن خثيم وهو عبد اللَّه بن عثمان بن خثيم القاري المكي فإنه حسن الحديث.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {তারা যেন নিজেদের চাদরের কিয়দংশ নিজেদের ওপর টেনে দেয়} [সূরা আহযাব ৩৩:৫৯], তখন আনসারী মহিলারা এমনভাবে (ঘর থেকে) বের হয়ে এলেন যে মনে হচ্ছিল তাদের মাথার উপর যেন (কালো) চাদরের কারণে কাক বসে আছে।
15017 - عن أنس قال: كنت ردف أبي طلحة يوم خيبر، وقدمي تمس قدم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. قال: فأتيناهم حين بزغت الشمس، وقد أخرجوا مواشيهم وخرجوا بفؤوسهم
ومكاتلهم ومرورهم. فقالوا: محمد، والخميس. قال: وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خربت خيبر! إنا إذا نزلنا بساحة قوم فساء صباح المنذرين" قال: وهزمهم اللَّه عز وجل. ووقعت في سهم دحية جارية جميلة، فاشتراها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بسبعة أرؤس. ثم دفعها إلى أم سليم تصنعها له وتهيئها. -قال: وأحسبه قال- وتعتد في بيتها، وهي صفية بنت حيي. قال: وجعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وليمتها التمر والأقط والسمن، فحصت الأرض أفاحيص، وجيء بالأنطاع، فوضعت فيها، وجيء بالأقط والسمن فشبع الناس. قال: وقال الناس: لا ندري أتزوجها أم اتخذها أم ولد؟ قالوا: إن حجبها فهي امرأته، وإن لم يحجبها فهي أم ولد، فلما أراد أن يركب حجبها.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4200) ومسلم في النكاح (87: 1365) كلاهما من طريق ثابت، عن أنس قال: فذكره. والسياق لمسلم، وسياق البخاري مختصر. إلا أنه ذكره في مواضع كثيرة.
عن فاطمة بنت المنذر قالت: كنا نخمر وجوهنا ونحن محرمات، ونحن مع أسماء بنت أبي بكر الصديق.
رواه مالك في الحج (18) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، فذكرته.
وفي معناه ما روي عن عائشة قالت: كان الركبان يمرون بنا ونحن مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم محرمات، فإذا حاذوا بنا أسدلت إحدانا جلبابها من رأسها على وجهها، فإذا جاوزونا كشفنا.
رواه أبو داود (1833)، وابن ماجه (2935)، وأحمد (24021)، وابن خزيمة (2691) كلهم من حديث يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن عائشة، فذكرته.
ويزيد بن أبي زياد الهاشمي لما كبر تغير فصار يتلقن، فضُعِّفَ من أجله.
وقد استدل شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله وغيره بقول النبي صلى الله عليه وسلم:"لا تنتقب المرأة، ولا تلبس القفازين" أن النقاب والقفازين كانا معروفين في النساء اللاتي لم يحرمن، وذلك يقتضي ستر وجوههن وأيديهن. ذكره في تفسير سورة النور.
قلت: وعلى هذا فيحمل كل حديث فيه كشف عن وجه المرأة أن ذلك كان قبل نزول الحجاب.
وأما ما روي عن عائشة أن أسماء بنت أبي بكر دخلت على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وعليها ثياب رقاق، فأعرض عنها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وقال:"يا أسماء، إن المرأة إذا بلغت المحيض لم تصلح أن يرى منها إلا هذا وهذا" وأشار إلى وجهه وكفيه. فهو ضعيف.
رواه أبو داود (4104)، والبيهقي (2/ 226) كلاهما من حديث الوليد بن مسلم، عن سعيد بن بشير، عن قتادة، عن خالد، عن ابن دريك، عن عائشة، فذكرته.
قال أبو داود:"هذا مرسل، خالد بن دريك لم يدرك عائشة، وسعيد بن بشير ليس بالقوي".
وفي نسخة:"لم يسمع خالد بن دريك من عائشة، ولا أدركها".
قلت: وهو كما قال، وسعيد بن بشير هو الأزدي مولاهم، أبو عبد الرحمن الشامي ضعيف، ضعفه النسائي وأبو داود، وقال البخاري:"يتكلمون في حفظه وهو محتمل"، وقال ابن معين:"ليس بشيء"، وقال ابن حبان:"كان رديء الحفظ فاحش الخطأ".
وفيه أيضًا: الوليد بن مسلم مدلس وقد عنعن.
وكذلك لا يصح ما رواه البيهقي (7/ 86) من حديث ابن لهيعة، عن عياض بن عبد اللَّه أنه سمع إبراهيم بن عبيد بن رفاعة الأنصاري، يخبر عن أبيه، أظنه عن أسماء بنت عميس أنها قالت: دخل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على عائشة بنت أبي بكر، وعندها أختها أسماء، وعليها ثياب شامية واسعة الأكمام، فلما نظر إليها رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قام فخرج، فقالت لها عائشة: تنحي فقد رأى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أمرًا كرهه، فتنحت، فدخل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فسألته عائشة: لم قام؟ قال:"أولم تري إلى هيئتها إنه ليس للمرأة المسلمة أن يبدو منها إلا هكذا". وأخذ بكفيه، فغطى بهما ظهر كفيه حتى لم يبد من كفه إلا أصابعه، ثم نصب كفيه على صدغيه حتى لم يبد إلا وجهه. قال البيهقي:"إسناده ضعيف".
قلت: ابن لهيعة فيه كلام معروف. وعياض بن عبد اللَّه الفهري المدني قال فيه ابن معين:"ضعيف الحديث"، وقال البخاري:"منكر الحديث"، وقال أبو حاتم:"ليس بالقوي".
ورواه أيضًا أبو داود في مراسيله (424) عن محمد بن بشار، حدّثنا أبو داود، حدّثنا هشام، عن قتادة، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن الجارية إذا حاضت لم يصلح أن يرى منها إلا وجهها ويداها إلى المفصل".
وهذا أيضًا مرسل.
وذكر البيهقي (7/ 86) حديث غبطة بنت عمرو المجاشعية قالت: حدثتني عمتي أم الحسن، عن جدتها، عن عائشة أن هند بنت عتبة قالت: يا نبي اللَّه، بايعني. قال:"لا أبايعك حتى تغيري كفيك كأنها كفي سبع".
وغبطة وأم الحسن مجهولتان.
ثم ذكر البيهقي حديث مطيع بن ميمون أبي سعيد قال: حدثتنا صفية بنت عصمة، عن عائشة قالت: جاءت امرأة وراء الستر بيدها كتاب إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقبض النبي صلى الله عليه وسلم يده وقال:"ما أدري أيد رجل أم يد امرأة؟". قالت: بل يد امرأة. قال:"لو كنت امرأة لغيرت أظفارك بالحناء".
ومطيع بن ميمون هذا ضعيف كما في الكاشف، وصفية بنت عصمة ذكرها الذهبي في فصل النسوة المجهولات.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি খায়বারের দিন আবু তালহার পেছনে সওয়ারী ছিলাম। আমার পা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পা স্পর্শ করছিল। তিনি বললেন, আমরা যখন তাদের কাছে পৌঁছলাম, তখন সূর্য উদিত হয়েছে। তারা তাদের গবাদি পশু বের করেছে এবং তাদের কুড়াল, ঝুড়ি ও কোদাল নিয়ে বেরিয়েছে। তারা বলল: 'মুহাম্মাদ এবং বাহিনী এসেছে' (মুহাম্মাদ, ওয়াল খামীস)! তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "খায়বার ধ্বংস হয়েছে! আমরা যখন কোনো কওমের আঙ্গিনায় অবতরণ করি, তখন সতর্কীকৃতদের সকালটি মন্দ হয়।" তিনি বললেন, অতঃপর আল্লাহ তাআলা তাদের পরাজিত করলেন। দিহয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভাগে একজন সুন্দরী দাসী পড়ল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাতটি মাথা (দাস) এর বিনিময়ে তাকে কিনে নিলেন। এরপর তিনি তাকে উম্মে সুলাইমের হাতে তুলে দিলেন, যাতে তিনি তাকে প্রস্তুত করেন ও সজ্জিত করেন। তিনি (আনাস) বললেন—আমার মনে হয় তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন—এবং তার বাড়িতে ইদ্দত পালন করেন। আর তিনি ছিলেন সাফিয়াহ বিনতে হুয়াই। তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার ওয়ালীমা (বিবাহভোজ) হিসেবে খেজুর, পনির (আকিত) ও ঘি ঠিক করলেন। মাটিতে গর্ত খোঁড়া হলো, এবং চামড়ার দস্তরখান আনা হলো। খেজুর, পনির ও ঘি আনা হলো এবং মানুষেরা তৃপ্তিসহকারে খেলো। তিনি বললেন, লোকেরা বলাবলি করল: আমরা জানি না তিনি কি তাকে বিবাহ করেছেন, নাকি তাঁকে 'উম্মে ওয়ালাদ' (দাসী স্ত্রী) হিসেবে গ্রহণ করেছেন? তারা বলল: যদি তিনি তাকে পর্দা করান, তবে তিনি তাঁর স্ত্রী; আর যদি তিনি তাকে পর্দা না করান, তবে তিনি 'উম্মে ওয়ালাদ'। অতঃপর যখন তিনি (যাত্রা করে) আরোহণ করতে চাইলেন, তখন তিনি তাকে পর্দা করালেন।
ফাতিমা বিনতে মুনযির থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মুহরিম থাকা অবস্থায়ও নিজেদের মুখমণ্ডল আবৃত করে রাখতাম, আর আমরা আসমা বিনতে আবি বকর সিদ্দীকের সাথে ছিলাম।
এ অর্থেই আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ইহরাম অবস্থায় থাকতাম, তখন আমাদের পাশ দিয়ে আরোহীরা অতিক্রম করত। যখন তারা আমাদের সামনে আসত, তখন আমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার জিলবাব (চাদর) মাথা থেকে মুখের উপর ঝুলিয়ে দিত। আর যখন তারা আমাদের অতিক্রম করে যেত, তখন আমরা মুখ খুলে ফেলতাম।
শাইখুল ইসলাম ইবনে তাইমিয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) এবং অন্যরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের এই বাণী দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন: "মহিলা যেন নিকাব না পরে এবং হাতমোজা না পরে।" [এর দ্বারা প্রমাণিত হয়] যে নিকাব ও হাতমোজা এমন মহিলাদের মধ্যে পরিচিত ছিল যারা ইহরাম বাঁধেনি, আর এটি তাদের মুখমণ্ডল ও হাত ঢাকার দাবি রাখে। তিনি সূরা নূরের তাফসীরে এটি উল্লেখ করেছেন।
আমি (গ্রন্থকার) বলি: এই ভিত্তিতে, মহিলাদের মুখমণ্ডল উন্মুক্ত হওয়ার বিষয়ে বর্ণিত প্রতিটি হাদীসকে পর্দার আয়াত নাযিলের পূর্বের সময়ের বলে ধরা হবে।
আর যা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, আসমা বিনতে আবি বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট প্রবেশ করলেন, তখন তার পরনে ছিল পাতলা কাপড়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন এবং বললেন: "হে আসমা, যখন কোনো মহিলা প্রাপ্তবয়স্কা হয়, তখন তার মুখমণ্ডল ও হাতদ্বয় ছাড়া আর কিছু দেখা যাওয়া বৈধ নয়।" আর তিনি তার মুখমণ্ডল ও তালুদ্বয়ের দিকে ইশারা করলেন। এটি দুর্বল।
আবু দাউদ বলেন: "এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ)। খালিদ ইবনে দুরাইক আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাননি। আর সাঈদ ইবনে বাশীর শক্তিশালী নন।" অন্য একটি কপিতে আছে: "খালিদ ইবনে দুরাইক আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি এবং তিনি তাঁকে পাননি।"
আমি বলি: বিষয়টি তেমনই, যেমন তিনি বলেছেন। সাঈদ ইবনে বাশীর—আযদী, তাদের মুক্ত করা দাস, আবু আবদির রাহমান আশ-শামী—তিনি দুর্বল। ইমাম নাসাঈ ও আবু দাউদ তাকে দুর্বল বলেছেন। ইমাম বুখারী বলেছেন: "তার স্মৃতিশক্তি নিয়ে কথা আছে, তবে সে সহনশীল।" ইবনে মুঈন বলেছেন: "সে কিছুই নয়।" ইবনে হিব্বান বলেছেন: "তার স্মৃতিশক্তি দুর্বল ছিল এবং ভুল খুব বেশি করত।"
তাছাড়া এতে আল-ওয়ালীদ ইবনে মুসলিম আছেন, যিনি একজন মুদাল্লিস এবং তিনি 'আনআনা' (عن) ব্যবহার করেছেন।
অনুরূপভাবে ইমাম বায়হাকী (৭/৮৬) ইবনে লাহীআহ থেকে, তিনি ইয়াদ ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে, তিনি ইবরাহীম ইবনে উবায়েদ ইবনে রিফাআহ আল-আনসারী থেকে, যিনি তার পিতা থেকে, আমার মনে হয় আসমা বিনতে উমাইস থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আয়েশা বিনতে আবি বকরের নিকট প্রবেশ করলেন, তার বোন আসমা তার নিকট ছিলেন, আর তার পরিধানে ছিল প্রশস্ত হাতাওয়ালা শামী কাপড়। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার দিকে তাকালেন, তিনি উঠে বাইরে চলে গেলেন। আয়েশা তাকে বললেন: সরে যাও, কারণ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন কিছু দেখেছেন যা তিনি অপছন্দ করেছেন। অতঃপর সে সরে গেল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রবেশ করলেন। আয়েশা তাকে জিজ্ঞেস করলেন: কেন আপনি উঠে গিয়েছিলেন? তিনি বললেন: "তুমি কি তার পোশাকের ধরণ দেখোনি? মুসলিম মহিলার জন্য তার এই অংশটুকু ছাড়া আর কিছু প্রকাশ করা জায়েজ নয়।" আর তিনি নিজের তালুদ্বয় দিয়ে নিজের হাতের পিঠ এমনভাবে ঢেকে দিলেন যে তার হাতের আঙ্গুলগুলো ছাড়া আর কিছুই দেখা যাচ্ছিল না। অতঃপর তিনি নিজের তালুদ্বয় কানের পাশের অংশে এমনভাবে রাখলেন যে তার মুখমণ্ডল ছাড়া আর কিছুই দেখা যাচ্ছিল না। ইমাম বায়হাকী বলেন: "এর সনদ দুর্বল।"
আমি বলি: ইবনে লাহীআহ সম্পর্কে সুপরিচিত সমালোচনা রয়েছে। ইয়াদ ইবনে আব্দুল্লাহ আল-ফিহরী আল-মাদানী সম্পর্কে ইবনে মুঈন বলেছেন: "দুর্বল হাদীসের বর্ণনাকারী।" ইমাম বুখারী বলেছেন: "মুংকারুল হাদীস (অগ্রহণযোগ্য হাদীসের বর্ণনাকারী)।" আবু হাতিম বলেছেন: "শক্তিশালী নন।"
আর এটি ইমাম আবু দাউদ তার মুরাসীল গ্রন্থে মুহাম্মাদ ইবনে বাশার থেকে, তিনি আবু দাউদ থেকে, তিনি হিশাম থেকে, তিনি কাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো বালিকা যখন ঋতুমতী হয়, তখন তার মুখমণ্ডল এবং কব্জি পর্যন্ত দুই হাত ছাড়া আর কিছু দেখা বৈধ নয়।" এটিও মুরসাল।
আর ইমাম বায়হাকী গিবতাহ বিনতে আমর আল-মুজাশিয়্যাহর হাদীসটি উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেন: আমাকে আমার ফুফু উম্মুল হাসান তার দাদী থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, হিন্দ বিনতে উতবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর নবী, আমার হাতে বাইআত নিন। তিনি বললেন: "আমি তোমাকে বাইআত করব না যতক্ষণ না তুমি তোমার হাতের তালুর রং পরিবর্তন করো, (যা রঙ না করার কারণে) যেন হিংস্র পশুর হাতের মতো মনে হচ্ছে।" গিবতাহ ও উম্মুল হাসান উভয়ই মাজহুল (অজ্ঞাত)।
অতঃপর ইমাম বায়হাকী মুতি' ইবনে মাইমুন আবু সাঈদ থেকে বর্ণিত হাদীস উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট সাফিয়্যাহ বিনতে ইসমা বর্ণনা করেছেন, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, পর্দার আড়াল থেকে এক মহিলা তার হাতে একটি চিঠি নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এলেন। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজের হাত গুটিয়ে নিলেন এবং বললেন: "আমি জানি না এটি পুরুষের হাত নাকি মহিলার হাত?" মহিলা বললেন: বরং এটি মহিলার হাত। তিনি বললেন: "যদি তুমি মহিলা হতে, তাহলে তুমি অবশ্যই মেহেদি দ্বারা তোমার নখগুলো রাঙাতে।" মুতি' ইবনে মাইমুন এই বর্ণনাকারীটি আল-কাশেফ গ্রন্থে দুর্বল হিসেবে উল্লিখিত হয়েছেন, আর সাফিয়্যাহ বিনতে ইসমা'কে যাহাবী অজ্ঞাত নারীদের অধ্যায়ে উল্লেখ করেছেন।
15018 - عن الحارث بن قيس قال: كتب عمر بن الخطاب إلى أبي عبيدة: أما بعد! فإنه بلغني أن نساء من نساء المسلمين يدخلن الحمامات مع نساء أهل الشرك فانْهَ من قبلك عن ذلك، فإنه لا يحل لامرأة تؤمن باللَّه واليوم الآخر أن ينظر إلى عورتها إلا أهل ملتها.
حسن: رواه البيهقي في الكبرى (7/ 95) عن أبي نصر، أنبأنا أبو منصور، ثنا أحمد (ابن نجدة)، حدّثنا سعيد (ابن منصور)، حدّثنا إسماعيل بن عياش، عن هشام بن الغاز، عن عبادة بن نُسي، عن أبيه، عن الحارث بن قيس، فذكره.
وفيه نُسي -بالتصغير- الكندي الشامي، لم يرو عنه إلا ابنه عبادة، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وهو مجهول لأنه لم يوثقه غيره، إلا أن هذا هو التفسير المعتمد عند السلف أنهم منعوا نساء المسلمين من إبداء زينتهن لغير المسلمات من أهل الكتاب والشرك، وذكره الحافظ ابن كثير في تفسيره وسكت عنه.
وقوله:"إلى عورتها" يعني به العورة المخففة وهي -غير القبل والدبر-، كما رُوي عن بعض أهل العلم، وأما العورة المغلظة وهي: القبل والدبر، فلا يجوز النظر إليها؛ لأنه جاء النهي أن تنظر المرأة إلى عورة المرأة، وكذلك الرجل إلى عورة الرجل.
হারিস ইবনে কায়স থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু উবাইদাকে চিঠি লিখলেন: অতঃপর! আমার কাছে খবর পৌঁছেছে যে, মুসলিম মহিলাদের মধ্য থেকে কতিপয় নারী মুশরিক নারীদের সাথে হাম্মামে (গোসলখানায়) প্রবেশ করে। তাই তুমি তোমার অধীনস্থদেরকে এ কাজ থেকে বারণ করো। কারণ, যে নারী আল্লাহ ও শেষ দিবসের প্রতি ঈমান রাখে, তার জন্য বৈধ নয় যে, তার সমগোত্রীয় নারী ছাড়া অন্য কেউ তার সতর দেখুক।
15019 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا زوج أحدكم خادمه -عبده، أو أجيره- فلا ينظر إلى ما دون السرة، وفوق الركبة".
حسن: رواه أبو داود (496، 4114) عن زهير بن حرب، حدّثنا وكيع، حدثني داود بن سوار المزني، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
وأما داود بن سوار فقال أبو داود:"صوابه سوار بن داود المزني، وهمَ فيه وكيع".
قلت: هكذا قال محمد بن عبد الرحمن الطفاوي وعبد اللَّه بن بكر السهمي من شيوخ أحمد كما في مسنده (6756).
وسوار بن داود هذا وثّقه ابن معين، وقال أحمد: شيخ بصري لا بأس به، وذكره ابن حبان في الثقات. ثم هو قد توبع. تابعه الأوزاعي. رواه أبو داود (4113)، وعنه البيهقي (2/ 226) عن محمد بن عبد اللَّه بن ميمون، حدّثنا الوليد، عن الأوزاعي، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن
جده أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا زوّج أحدكم عبده أمته أو أجيره، فلا ينظرن إلى عورتها".
والوليد هو ابن مسلم وهو مدلس وقد عنعن، ولكن ذكره البيهقي بالتحديث.
قال البيهقي:"وهذه الرواية إذا قرنت برواية الأوزاعي دلنا على أن المراد بالحديث نهي السيد عن النظر إلى عورتها إذا زوجها، وأن عورة الأمة ما بين السرة والركبة".
قلت: هذا الحديث خاص بالأمة، وأما الفقهاء فجعلوه عاما فقالوا: إن عورة المرأة بالنسبة للمرأة هي كعورة الرجل إلى الرجل -أي ما بين السرة والركبة- فقالوا: ولذا يجوز لها النظر إلى جميع بدنها عدا ما بين هذين العضوين، وذلك لوجود المجانسة وانعدام الشهوة غالبا، ولكن يحرم ذلك مع الشهوة وخوف الفتنة.
واستدلوا أيضًا بحديث أبي أيوب قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: ما فوق الركبتين من العورة، وما أسفل من السرة من العورة. رواه البيهقي (2/ 229) وقال:"فيه سعيد بن أبي راشد البصري ضعيف".
قلت: هذا توسع مخالف للآية الكريمة في قوله تعالى: {وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ آبَائِهِنَّ أَوْ آبَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ أَبْنَائِهِنَّ أَوْ أَبْنَاءِ بُعُولَتِهِنَّ أَوْ إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي إِخْوَانِهِنَّ أَوْ بَنِي أَخَوَاتِهِنَّ أَوْ نِسَائِهِنَّ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُهُنَّ أَوِ التَّابِعِينَ غَيْرِ أُولِي الْإِرْبَةِ مِنَ الرِّجَالِ أَوِ الطِّفْلِ الَّذِينَ لَمْ يَظْهَرُوا عَلَى عَوْرَاتِ النِّسَاءِ وَلَا يَضْرِبْنَ بِأَرْجُلِهِنَّ لِيُعْلَمَ مَا يُخْفِينَ مِنْ زِينَتِهِنَّ وَتُوبُوا إِلَى اللَّهِ جَمِيعًا أَيُّهَ الْمُؤْمِنُونَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ} [النور: 31].
فاستثنى اللَّه تعالى في هذه الآية الكريمة مواطن الزينة وهي الغالب اليد والذراع إلى قريب من العضد مكان الدملج، والرأس والأذنين والعنق موضع القلادة، والقدم وشيء من الساق موضع الخلخال. وباللَّه التوفيق.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার খাদেমকে—চাই সে তার দাস হোক অথবা মজুর—বিবাহ দেয়, তখন সে (মালিক) যেন (তার স্ত্রীর) নাভির নিচের এবং হাঁটুর উপরের অংশের দিকে দৃষ্টি না দেয়।"
15020 - عن جابر، أن أم سلمة استأذنت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الحجامة، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم أبا طيبة أن يحجمها، قال: حسبت أنه قال: كان أخاها من الرضاعة، أو غلاما لم يحتلم.
صحيح: رواه مسلم في السلام (2206) من طرق عن الليث، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে শিঙ্গা (হিজামা) লাগানোর অনুমতি চাইলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ তাইবাহকে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি তাঁকে শিঙ্গা লাগান। (বর্ণনাকারী) বলেন: আমার ধারণা, তিনি বলেছেন: হয় সে উম্মু সালামার দুধভাই ছিলেন, অথবা সে একজন নাবালক ছেলে ছিলেন (যার স্বপ্নদোষ হয়নি)।
15021 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم أتى فاطمة بعبد كان قد وهبه لها، قال: وعلى فاطمة ثوب، إذا قنعت به رأسها لم يبلغ رجليها، وإذا غطت به رجليها لم يبلغ رأسها، فلما رأى النبي صلى الله عليه وسلم ما تلقى قال:"إنه ليس عليك بأس، إنما هو أبوك وغلامك".
حسن: رواه أبو داود (4106) عن محمد بن عيسى، حدّثنا أبو جميع سالم بن دينار، عن
ثابت، عن أنس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل سالم بن دينار فإنه حسن الحديث، وقد وثّقه ابن معين، وقال أحمد: أرجو أن لا يكون به بأس، وليّنه أبو زرعة.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাতিমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট এমন এক গোলামকে নিয়ে এলেন, যাকে তিনি ফাতিমাকে দান করেছিলেন। (আনাস) বলেন: ফাতিমার পরিধানে এমন একটি কাপড় ছিল যে, যদি তিনি তা দিয়ে মাথা ঢাকতেন, তবে তা তাঁর পা পর্যন্ত পৌঁছাত না। আর যদি তিনি তা দিয়ে পা ঢাকতেন, তবে তা তাঁর মাথা পর্যন্ত পৌঁছাত না। যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখলেন যে তিনি (ফাতিমা) সমস্যার সম্মুখীন হয়েছেন, তখন তিনি বললেন: "তোমার কোনো অসুবিধা নেই (বা, এতে দোষের কিছু নেই)। কারণ, সে তোমার পিতা এবং তোমার গোলাম।"
15022 - عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت حين ذكر الإزار: فالمرأة يا رسول اللَّه؟ قال:"ترخيه شبرا"، قالت أم سلمة: إذا ينكشف عنها. قال:"فذراعًا لا تزيد عليه".
حسن: رواه مالك في اللباس (13) عن أبي بكر بن نافع، عن أبيه نافع مولى ابن عمر، عن صفية بنت أبي عبيد أنها أخبرته عن أم سلمة، فذكرته.
ومن هذا الطريق رواه أبو داود (4117)، وصحّحه ابن حبان (5451).
وهذا الحديث له طرق كثيرة، والصواب كما رواه مالك.
وإسناده حسن من أجل أبي بكر بن نافع وثّقه أبو داود، واختلف فيه قول ابن معين، قال الدوري عن ابن معين: ليس به بأس، وقال مرة: ليس بشيء. وقال ابن عدي: لولا أنه لا بأس به لما روى عنه مالك؛ لأن مالكا لا يروي إلا عن ثقة، وقد روى غير مالك عن أبي بكر بن نافع أشياء غير محفوظة، وأرجو أنه صدوق لا بأس به. وقال أبو أحمد الحاكم: لم أقف على اسمه، ويقال: هو ثقة وقد توبع.
رواه أحمد (26532) من حديث محمد بن إسحاق، والنسائي (5338) من حديث أيوب بن موسى كلاهما عن نافع، عن صفية بنت أبي عبيد، عن أم سلمة، فذكرته.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত। তিনি (নিচের) পোশাক (ইযার) সম্পর্কে আলোচনা ওঠার পর বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! নারীদের জন্য (পোশাকের বিধান) কী? তিনি বললেন: "তারা এক বিঘত পরিমাণ ঝুলিয়ে রাখবে।" উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে তো তাদের শরীর/পা খুলে যাবে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে এক হাত (পরিমাণ) ঝুলিয়ে রাখবে, কিন্তু এর বেশি বাড়াবে না।"
15023 - عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم أقام بعض نسائه، وشَبَّر من ذيلها شبرًا أو شبرين وقال:"لا تزدن على هذا".
حسن: رواه أبو يعلى (3796) عن سويد بن سعيد، حدّثنا معتمر بن سليمان، عن حميد، عن أنس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل سويد بن سعيد الهروي الأصل كان صدوقا في نفسه إلا أنه عمي فصار يتلقن ما ليس من حديثه، ومتابعة ضرار بن صرد يؤكد أنه لم يخطئ في هذا.
وهو ما رواه الطبراني في الأوسط - مجمع البحرين (4250) عن محمد بن محمد التمار، حدثني ضرار بن صرد أبو نعيم، ثنا معتمر بن سليمان بإسناده ولفظه: أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم شبّر لفاطمة من عقبها شبرا وقال:"هذا ذيل المرأة".
وضرار بن صرد أبو نعيم الطحان ضعيف ضعّفه الدارقطني وغيره، وفي التقريب:"صدوق له أوهام" ومتابعة بعضهما البعض تدل على أنهما لم يخطئا فيه، إلا أن بعض العلماء تكلموا في
ضرار بن صرد بكلام شديد لو تفرد لَعُدَّ من الضعفاء.
وفي معناه ما روي أيضًا عن أم سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم شبر لفاطمة شبرًا من نطاقها.
رواه الترمذيّ (1732)، وأحمد (26554) كلاهما من حديث عفان، حدّثنا حماد بن سلمة قال: حدّثنا علي بن زيد، عن أم الحسن أن أم سلمة حدثتهم، فذكرت الحديث.
قال الترمذيّ:"وروى بعضهم عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن الحسن، عن أمه، عن أم سلمة".
وعلي بن زيد بن جُدعان ضعيف، والحسن هو الإمام البصري مدلس.
وفي معناه ما روي أيضًا عن ابن عمر قال: رخص رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لأمهات المؤمنين في الذيل شبرًا، ثم استزدنه، فزادهن شبرًا، فكن يرسلن إلينا فنذرع لهن ذراعا.
رواه أبو داود (4119)، وابن ماجه (2581)، وأحمد (4683) كلهم من حديث سفيان الثوري، حدثني زيد العمي، عن أبي الصديق، عن ابن عمر، فذكره.
وزيد العمي هو زيد بن الحواري أبو الحواري البصري ضعيف باتفاق أهل العلم إلا أن الدارقطني كان حسن الرأي فيه.
وأبو الصديق هو: بكر بن عمرو، وقيل: ابن قيس الناجي -بالنون والجيم- بصري من رجال الجماعة.
وفي معناه أيضًا ما روي عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر فاطمة أو أم سلمة أن تجر الذيل ذراعا.
رواه ابن ماجه (3582)، وأحمد (7573) كلاهما من حديث حماد بن سلمة، عن أبي المهزّم، عن أبي هريرة، فذكره.
وأبو المهزّم -بتشديد الزاي- التميمي البصري اسمه يزيد وقيل: عبد الرحمن بن سفيان وهو ضعيف باتفاق أهل العلم، وقد قال النسائي: متروك الحديث.
ورواه أيضًا أحمد (24469)، وابن ماجه (3583) من وجه آخر عن أبي المهزم، عن أبي هريرة، عن عائشة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في ذيول النساء قال:"شبرًا" قالت: قلت: إذن تخرج سوقهن قال:"فذراع".
فقه الحديث:
لقد أجمع العلماء على جواز جر الثوب للنساء، ولكنهم كرهوا زيادة على شبرين أو ذراع لما فيه إضاعة للأموال، وتفاخر بين النساء، وتشبه بالكافرات الأعجمية التي ترخي خمسة أذرع أو أكثر، والنساء يحملن من ورائهن.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কোনো এক স্ত্রীকে দাঁড় করালেন এবং তাঁর পোশাকের ঝুল এক বিঘত বা দুই বিঘত পরিমাপ করলেন এবং বললেন: "এর চেয়ে বেশি বাড়াবে না।"
[অন্যান্য সহায়ক বর্ণনাসমূহ উল্লেখ করার পর ফিকহুল হাদীসের অংশ:]
আলেমগণ নারীদের জন্য পোশাক টেনে চলার বৈধতার উপর ঐকমত্য পোষণ করেছেন, তবে দুই বিঘত বা এক হাতের বেশি বাড়ানোকে তাঁরা মাকরুহ (অপছন্দনীয়) মনে করেছেন। কারণ এতে সম্পদের অপচয় হয়, নারীদের মধ্যে গর্ব প্রকাশ পায় এবং এটা অনারব কাফির নারীদের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ, যারা পাঁচ হাত বা তারও বেশি লম্বা ঝুল ব্যবহার করে এবং মহিলারা তাদের পেছন থেকে তা বহন করে।
15024 - عن أسماء، أن امرأة قالت: يا رسول اللَّه، إن لي ضرة، فهل علي جناح إن
تشبعت من زوجي غير الذي يعطيني؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"المتشبع بما لم يعط كلابس ثوبي زور".
متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5219)، ومسلم في اللباس (2130) من طريق هشام (هو ابن عروة)، حدثتني فاطمة (هي ابنة المنذر)، عن أسماء، فذكرته.
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমার একজন সতীন আছে। আমার স্বামী আমাকে যা দেননি, তা আমি পেয়েছি বলে দেখালে কি আমার কোনো পাপ হবে?" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যা তাকে দেওয়া হয়নি, তা পাওয়ার ভানকারী (বা পরিতৃপ্ত সাজা ব্যক্তি) মিথ্যা পোশাক পরিধানকারীর মতো।"
15025 - عن عائشة أن امرأة قالت: يا رسول اللَّه، أقول: إن زوجي أعطاني ما لم يعطني؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"المتشبع بما لم يعط كلابس ثوبي زور".
صحيح: رواه مسلم في اللباس والزينة (2129) عن محمد بن عبد اللَّه بن نمير، ثنا وكيع وعبدة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
ومعنى الحديث كما قال النووي:"قال العلماء: معناه المتكثر بما ليس عنده بأن يُظهر أن عنده ما ليس عنده، يتكثر بذلك عند الناس ويتزين بالباطل فهو مذموم، كما يذم من لبس ثوبي زور. قال أبو عبيد وآخرون: هو الذي يلبس ثياب أهل الزهد والعبادة والورع، ومقصوده أن يظهر للناس أنه متصف بتلك الصفة، ويظهر من التخشع والزهد أكثر مما في قلبه، فهذه ثياب زور ورياء. وقيل: هو كمن لبس ثوبين لغيره وأوهم أنهما له. وقيل: هو من يلبس قميصًا واحدًا ويصل بكميه كمين آخرين، فيظهر أن عليه قميصين. وحكى الخطابي قولا آخر أن المراد هنا بالثوب الحالة والمذهب، والعرب تكني بالثوب عن حال لابسه، ومعناه أنه كالكاذب القائل ما لم يكن، وقولا آخر أن المراد الرجل الذي تطلب منه شهادة زور فيلبس ثوبين يتجمل بهما فلا ترد شهادته لحسن هيئته. واللَّه أعلم".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার স্বামী আমাকে যা দেননি, আমি কি এমন কথা বলতে পারি যে তিনি তা দিয়েছেন?" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "যা তাকে দেওয়া হয়নি, তা পাওয়ার ভানকারী (বা পরিতৃপ্তির প্রকাশকারী) হল এমন ব্যক্তির মতো, যে মিথ্যা বা ভণ্ডামির দুটি কাপড় পরিধান করে।"
15026 - عن أم سلمة قالت: استيقظ النبي صلى الله عليه وسلم من الليل وهو يقول:"لا إله إلا اللَّه، ماذا أنزل الليلة من الفتن، ماذا أنزل من الخزائن، من يوقظ صواحب الحجرات، كم من كاسية في الدنيا عارية يوم القيامة"
صحيح: رواه البخاريّ في اللباس (5844) عن عبد اللَّه بن محمد، ثنا هشام، أخبرنا معمر، عن الزهري، أخبرتني هند بنت الحارث، عن أم سلمة، فذكرته.
وزاد في آخره: قال الزهري: وكانت هند لها أزرار في كميها بين أصابعها.
قوله:"كم من كاسية في الدنيا عارية يوم القيامة" جاء في تفسيره أقوال كثيرة منها أنها كاسية بالثياب، لكنها شفافة لا تستر عورتها، فتعاقب في الآخرة بالعري جزاء على ذلك.
قوله:"قال الزهري. . . الخ موصول بالإسناد السابق.
وهند بنت الحارث الفراسية ويقال: القرشية.
قال الحافظ:"والمعنى أنها كانت تخشى أن يبدو من جسدها شيء بسبب سعة كميها، فكانت تزرر ذلك لئلا يبدو منه شيء، فتدخل في قوله:"كاسية عارية". فتح الباري (10/ 303).
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে জেগে উঠলেন এবং বললেন: "আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই! আজ রাতে কতই না ফিতনা অবতীর্ণ করা হলো! কতই না ভান্ডার (অনুগ্রহ বা রহমত) নাযিল করা হলো! হুযরাসমূহের অধিকারিণীদের কে জাগাবে? দুনিয়াতে কত পরিধানকারিণীই না কিয়ামতের দিন বিবস্ত্র থাকবে।"
15027 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"صنفان من أهل النار لم أرهما، قوم معهم سياط كأذناب البقر يضربون بها الناس، ونساء كاسيات عاريات مميلات مائلات، رؤوسهن كأسنمة البخت المائلة، لا يدخلن الجنة، ولا يجدن ريحها، وإن ريحها ليوجد من مسيرة كذا وكذا"
صحيح: رواه مسلم في اللباس والزينة (2128) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
قوله:"كاسيات عاريات" قيل: معناه تستر بعض بدنها، وتكشف بعضه إظهارًا بحالها، وقيل: معناه تلبس ثوبا رقيقا يصف ما تحته، وقيل: تلبس ثوبا ضيقا يحجم جسدها، والأظهر أنه يشمل ذلك كله.
قوله:"أسنمة البخت" أي هن اللواتي يجعلن على رؤوسهن كالعمامة مثل سنام الإبل، وهو شعار المغنيات في ذلك الزمان، و"البخت": جمالٌ طوال الأعناق.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দুই প্রকার জাহান্নামী আছে, যাদেরকে আমি দেখিনি। এক প্রকার হলো এমন সম্প্রদায়, যাদের কাছে গরুর লেজের মতো চাবুক থাকবে, যা দিয়ে তারা মানুষকে প্রহার করবে। আর দ্বিতীয় প্রকার হলো সেই সকল নারী, যারা হবে পরিহিতা অথচ নগ্ন, যারা পুরুষদেরকে নিজেদের দিকে আকৃষ্ট করে এবং নিজেরা পুরুষের প্রতি আকৃষ্ট হয়। তাদের মাথাগুলো হবে বুখতী উটের হেলে পড়া কুঁজের মতো। তারা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারবে না এবং জান্নাতের সুঘ্রাণও পাবে না। অথচ জান্নাতের সুঘ্রাণ এত এত দূর থেকেও পাওয়া যায়।”