হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (15228)


15228 - عن خالد بن عمير العدوي، قال: خطبنا عتبة بن غزوان، فحمد اللَّه وأثنى عليه، ثم قال: أما بعد، فإن الدنيا قد آذنت بصرم وولت حذاء، ولم يبق منها إلا صبابة كصبابة الإناء، يتصابّها صاحبها، وإنكم منتقلون منها إلى دار لا زوال لها، فانتقلوا بخير ما بحضرتكم، فإنه قد ذكر لنا أن الحجر يلقى من شفة جهنم، فيهوي فيها سبعين عاما، لا يدرك لها قعرًا، وواللَّه لتملأن، أفعجبتم؟ ولقد ذكر لنا أن ما بين مصراعين من مصاريع الجنة مسيرة أربعين سنة، وليأتين عليها يوم وهو كظيظ من الزحام، ولقد رأيتني سابع سبعة مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ما لنا طعام إلا ورق الشجر، حتى قرحت أشداقنا، فالتقطت بردة فشققتها بيني وبين سعد بن مالك، فاتزرت بنصفها واتزر سعد بنصفها، فما أصبح اليوم منا أحد إلا أصبح أميرًا على مصر من الأمصار، وإني أعوذ باللَّه أن أكون في نفسي عظيما، وعند اللَّه صغيرًا، وإنها لم تكن نبوة قط إلا تناسخت، حتى يكون آخر عاقبتها ملكا، فستخبرون وتجربون الأمراء بعدنا.

صحيح: رواه مسلم في الزهد (2967) من طرق عن سليمان بن المغيرة، حدّثنا حميد بن هلال، عن خالد بن عمير العدوي - وقد أدرك الجاهلية، فذكره.

وكان عتبة بن غزوان يومئذ أميرًا على البصرة.




উতবা ইবনে গাযওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। তিনি আল্লাহ্‌র প্রশংসা করলেন ও মহিমা বর্ণনা করলেন, অতঃপর বললেন: "আমা বা'দ (এরপর), নিশ্চয় দুনিয়া ফুরিয়ে যাওয়ার সংকেত দিয়েছে এবং দ্রুত বিদায় নিচ্ছে। পাত্রের তলানিতে লেগে থাকা সামান্য পানির মতো এর আর কিছুই অবশিষ্ট নেই, যা এর অধিকারী পান করে নেয়। আর নিশ্চয় তোমরা এ দুনিয়া থেকে এমন একটি গৃহে (আখেরাত) স্থানান্তরিত হবে, যার কোনো বিনাশ নেই। সুতরাং তোমাদের কাছে যা উত্তম, তা নিয়েই তোমরা স্থানান্তরিত হও। কারণ আমাদের নিকট উল্লেখ করা হয়েছে যে, জাহান্নামের কিনারা থেকে একটি পাথর নিক্ষেপ করা হলে, তা সত্তর বছর ধরে নিচে পড়তে থাকে, তবুও এর গভীরতা শেষ হয় না। আল্লাহর শপথ! অবশ্যই তা ভরে উঠবে। এতে কি তোমরা বিস্মিত হচ্ছ? আর আমাদের নিকট উল্লেখ করা হয়েছে যে, জান্নাতের দুটি দরজার মাঝের দূরত্ব চল্লিশ বছরের রাস্তার সমান। অবশ্যই এর উপর এমন দিন আসবে, যেদিন তা ভিড়ে ঠাসা থাকবে। আমি নিজেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে সাতজনের মধ্যে সপ্তম হিসেবে দেখেছি। আমাদের খাবার ছিল কেবল গাছের পাতা, এমনকি আমাদের মুখের কোণগুলো ফেটে গিয়েছিল। অতঃপর আমি একটি চাদর কুড়িয়ে পেলাম এবং তা আমার ও সা‘দ ইবনে মালিকের মাঝে ভাগ করে নিলাম। আমি অর্ধেক পরিধান করলাম এবং সা‘দ তার অর্ধেক পরিধান করল। কিন্তু আজ আমাদের মাঝে এমন কেউ নেই যে কোনো শহরের শাসক হয়নি। আর আমি আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই যে, আমি যেন নিজের কাছে বিরাট হই, অথচ আল্লাহর নিকট তুচ্ছ হয়ে যাই। আর যে কোনো নবুওয়াতই শুরু হয়েছে, তা পরবর্তীতে পরিবর্তিত হয়েছে, অবশেষে তার শেষ পরিণতি রাজত্বে রূপ নিয়েছে। শীঘ্রই তোমরা আমাদের পরে শাসকদের সম্পর্কে জানতে পারবে এবং তাদের পরীক্ষা করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15229)


15229 - عن جابر بن عبد اللَّه، أنه قال: بعث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بعثا قبل الساحل، فأمر عليهم أبا عبيدة بن الجراح وهم ثلاثمائة، قال: وأنا فيهم، قال: فخرجنا حتى إذا كنا ببعض الطريق فني الزاد، فأمر أبو عبيدة بأزواد ذلك الجيش، فجمع ذلك كله، فكان مزودي تمر، قال: فكان يقوتناه كل يوم قليلا قليلا، حتى فني، ولم تصبنا إلا تمرة تمرة. فقلت: وما تغني تمرة؟ ، فقال: لقد وجدنا فقدها حين فنيت. . . الحديث.

متفق عليه: رواه مالك في صفة النبي صلى الله عليه وسلم (24) عن وهب بن كيسان، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره. ورواه البخاريّ في الشركة (2483)، ومسلم في الصيد والذبائح (1935: 21) كلاهما من طريق مالك، به.

وفي معناه ما روي عن عبد اللَّه بن عامر بن ربيعة، عن أبيه، وكان بدريا، قال: لقد كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يبعثنا في السرية يا بني، ما لنا زاد إلا السلف من التمر، فيقسمه قبضة قبضة حتى يصير إلى تمرة تمرة، قال: فقلت له: يا أبت، وما عسى أن تغني التمرة عنكم؟ ، قال: لا تقل ذلك يا بني فبعد أن
فقدناها فاختللنا إليها.

رواه أحمد (15692) عن يزيد بن هارون، أخبرنا المسعودي، عن أبي بكر بن حفص بن عمر ابن سعد بن أبي وقاص، عن عبد اللَّه بن عامر بن ربيعة، عن أبيه، فذكره.

والمسعودي مختلط، وروى عنه يزيد بن هارون بعد اختلاطه.

ورواه الطبراني في الأوسط (8869) من طريق أسد بن موسى، عن المسعودي به.

وأسد بن موسى لا يعرف متى سمع من المسعودي قبل الاختلاط أم بعده.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপকূলের দিকে একটি অভিযান দল পাঠান। তিনি তাদের উপর আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমীর নিযুক্ত করেন। তারা ছিল তিনশতজন। তিনি বলেন: আমি তাদের মধ্যে ছিলাম। তিনি বলেন: আমরা যাত্রা করলাম। যখন আমরা পথের কিছু অংশে পৌঁছলাম, তখন আমাদের রসদ ফুরিয়ে গেল। এরপর আবু উবাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই বাহিনীর সকল রসদ একত্র করার নির্দেশ দিলেন। সমস্ত কিছু একত্রিত করে মাত্র এক পাত্র খেজুর পাওয়া গেল। তিনি বলেন: তিনি (আবু উবাইদাহ) প্রতিদিন অল্প অল্প করে তা দিয়ে আমাদের জীবন ধারণের ব্যবস্থা করতেন, অবশেষে তা ফুরিয়ে গেল। তখন আমাদের ভাগ্যে দিনে একটির বেশি খেজুর জুটতো না। আমি জিজ্ঞাসা করলাম, একটি খেজুর কী কাজে আসে? তিনি বললেন: যখন এটিও ফুরিয়ে গেল, তখন আমরা এর অভাব তীব্রভাবে অনুভব করেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (15230)


15230 - عن أبي هريرة، قال: قسم النبي صلى الله عليه وسلم يوما بين أصحابه تمرًا، فأعطى كل إنسان سبع تمرات، فأعطاني سبع تمرات إحداهن حشفة، فلم يكن فيهن تمرة أعجب إلي منها، شدت في مضاغي.

صحيح: رواه البخاريّ في الأطعمة (5411) عن أبي النعمان، حدّثنا حماد بن زيد، عن عباس الجريري، عن أبي عثمان النهدي، عن أبي هريرة، فذكره.

وجاء مفصلا في الحديث الآتي:




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবীদের মাঝে খেজুর বণ্টন করলেন। অতঃপর তিনি প্রত্যেক ব্যক্তিকে সাতটি করে খেজুর দিলেন। তিনি আমাকেও সাতটি খেজুর দিলেন, সেগুলোর মধ্যে একটি ছিল হাশফাহ (শুকনো, নিম্নমানের খেজুর)। কিন্তু সেগুলোর মধ্যে ঐ খেজুরটিই আমার কাছে সবচেয়ে বেশি ভালো লেগেছিল, যা আমার চিবানোর স্থানে শক্তভাবে আটকে গিয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (15231)


15231 - عن عبد اللَّه بن شقيق، قال: أقصت بالمدينة مع أبي هريرة سنة، فقال لي ذات يوم ونحن عند حجرة عائشة: لقد رأيتنا وما لنا ثياب إلا البراد المتفتقة، وإنه ليأتي على أحدنا الأيام ما يجد طعاما يقيم به صلبه، حتى إن كان أحدنا ليأخذ الحجر فيشده على أخمص بطنه، ثم يشده بثوبه ليقيم به صلبه، فقسم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات يوم بيننا تمرًا، فأصاب كل إنسان منا سبع تمرات فيهن حشفة، فما سرني أن لي مكانها تمرة جيدة، قال: قلت: لم؟ قال: تشد لي من مضغي. قال: فقال لي: من أين أقبلت؟ قلت: من المنمام. قال: فقال لي: هل رأيت حجر موسى؟ قلت: وما حجر موسى؟ قال: إن بني إسرائيل قالوا لموسى قولا تحت ثيابه في مذاكيره، قال: فوضع ثيابه على صخرة وهو يغتسل، قال: فسعت بثيابه، قال: فتبعها في أثرها وهو يقول: يا حجر، ألق ثيابي، يا حجر، ألق ثيابي، حتى أتت به على بني إسرائيل، فرأوه سويا حسن الخلق، فلَحَبه ثلاث لحَبات، فوالذي نفس أبي هريرة بيده، لو كنت نظرت، لرأيت لحبات موسى فيه.

صحيح: رواه أحمد (8301) عن عبد الصمد (هو ابن عبد الوارث)، حدثني أبي، حدّثنا الجريري، عن عبد اللَّه بن شقيق قال: فذكره. وإسناده صحيح.

والجريري هو: سعيد بن إياس اختلط لكن عبد الوارث سمع منه قبل اختلاطه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এমন সময় দেখেছি যখন আমাদের কাছে ছেঁড়া পশমের চাদর (আল-বিরাদ) ছাড়া কোনো পোশাক ছিল না। আমাদের মধ্যে এমনও দিন আসত যখন মেরুদণ্ড সোজা রাখার মতো (ক্ষুধা নিবারণের মতো) কোনো খাবার পাওয়া যেত না। এমনকি আমাদের মধ্যে কেউ কেউ পাথর নিয়ে পেটের নিচে শক্তভাবে বাঁধত এবং তারপর কাপড় দিয়ে কষে দিত যাতে সে মেরুদণ্ড সোজা রাখতে পারে।

এরপর একদিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে খেজুর ভাগ করে দিলেন। আমাদের প্রত্যেকে সাতটি করে খেজুর পেল, যার মধ্যে একটি শক্ত শুকনো (খাশফা) ছিল। আমার কাছে যদি এর পরিবর্তে একটি ভালো খেজুর থাকত, তাহলেও আমি খুশি হতাম না। বর্ণনাকারী (আব্দুল্লাহ ইবনে শাকীক) বলেন, আমি বললাম: কেন? তিনি বললেন: এটি আমার চিবানোকে দৃঢ় করে (চিবানোর সময় দীর্ঘায়িত করে)।

তিনি আমাকে বললেন: তুমি কোথা থেকে এসেছ? আমি বললাম: আল-মিনমাম থেকে। এরপর তিনি আমাকে বললেন: তুমি কি মূসা (আঃ)-এর পাথর দেখেছ? আমি বললাম: মূসা (আঃ)-এর পাথর কী?

তিনি বললেন: বনী ইসরাঈলরা মূসা (আঃ)-এর পোশাকের নিচে থাকা তাঁর পুরুষাঙ্গ নিয়ে খারাপ কথা বলত। অতঃপর তিনি গোসল করার সময় তাঁর পোশাক একটি পাথরের উপর রাখলেন। পাথরটি তাঁর পোশাক নিয়ে দ্রুত পালাতে শুরু করল। তিনি সেটির পিছু ধাওয়া করলেন এবং বলতে থাকলেন: হে পাথর, আমার পোশাক ফেলে দাও! হে পাথর, আমার পোশাক ফেলে দাও! এভাবে সেটি বনী ইসরাঈলদের সামনে চলে আসল। তারা তাঁকে দেখল, তিনি ছিলেন সুঠাম দেহের অধিকারী ও সুন্দর গঠনের। অতঃপর তিনি পাথরটিকে তিনটি আঘাত করলেন। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কসম, যাঁর হাতে তাঁর প্রাণ, তুমি যদি দেখতে, তবে তুমি সেখানে মূসা (আঃ)-এর আঘাতের চিহ্নগুলো দেখতে পেতে।









আল-জামি` আল-কামিল (15232)


15232 - عن فضالة بن عبيد قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا صلى بالناس خر رجال من قامتهم في الصلاة لما بهم من الخصاصة وهم من أصحاب الصفة حتى يقول الأعراب: إن هؤلاء مجانين، فإذا قضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الصلاة انصرف إليهم، فقال لهم:"لو تعلمون ما لكم عند اللَّه لأحببتم لو أنكم تزدادون حاجة وفاقة" قال فضالة: وأنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يومئذ.

صحيح: رواه الترمذيّ (2368)، وأحمد (23938)، وصحّحه ابن حبان (724) كلهم من طريق أبي عبد الرحمن عبد اللَّه بن يزيد المقري، حدّثنا حيوة بن شريح، أخبرني أبو هانئ الخولاني حميد بن هانئ أن أبا علي عمرو بن مالك الجنبي أخبره عن فضالة بن عبيد، فذكره. وإسناده صحيح.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح".




ফাদালাহ ইবন উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন লোকদেরকে নিয়ে সালাত আদায় করতেন, তখন তাদের চরম অভাব ও ক্ষুধার (দরিদ্রতার) কারণে আসহাবে সুফফার কতিপয় লোক সালাতে দাঁড়ানো অবস্থা থেকে ঢলে পড়ত। এমনকি বেদুঈনরা বলত: ‘নিশ্চয়ই এরা পাগল।’ যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করতেন, তখন তিনি তাদের দিকে ফিরতেন এবং বলতেন: "তোমাদের জন্য আল্লাহর কাছে যা রয়েছে, তোমরা যদি তা জানতে, তবে তোমরা অবশ্যই পছন্দ করতে যে তোমাদের অভাব ও দারিদ্রতা আরও বৃদ্ধি পাক।" ফাদালাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেই দিন আমিও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (15233)


15233 - عن معاوية بن قرة بن إياس قال: قال أبي: عمّرنا مع نبينا صلى الله عليه وسلم وما لنا طعام إلا الأسودان، ثم قال: هل تدري ما الأسودان؟ قلت: لا، قال: التمر والماء.

صحيح: رواه أحمد (16244) عن روح -هو ابن عبادة- قال: حدّثنا بسطام بن مسلم، عن معاوية بن قرة قال: فذكره. وإسناده صحيح.

قوله:"الأسودان" قيل: الأسود تغليبا لسواد التمر فأطلق على الماء والتمر جميعا.




ইয়াস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমরা আমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জীবন যাপন করেছি, আর আমাদের খাদ্য বলতে ছিল কেবল 'আসওয়াদান' (দুটি কালো বস্তু)। অতঃপর তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি জানো 'আসওয়াদান' কী? আমি বললাম: না। তিনি বললেন: তা হলো খেজুর ও পানি।









আল-জামি` আল-কামিল (15234)


15234 - عن أبي هريرة قال: ما كان لنا على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم طعام إلا الأسودين التمر والماء.

حسن: رواه أحمد (7962)، وابن حبان (683) كلاهما من طريق شعبة، عن داود بن فراهيج قال: سمعت أبا هريرة يقول: فذكره.

وإسناده حسن من أجل داود بن فراهيج المدني، فإنه مختلف فيه غير أن حديثه هذا له أصل صحيح، وبهذا يحسن هذا الحديث.

وفي الباب عن ابن عباس قال: جاء نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم رجلان، حاجتهما واحدة، فتكلم أحدهما، فوجد نبي اللَّه من فيه إخلافًا، فقال له:"ألا تستاك؟" فقال: إني لأفعل، ولكني لم أطعم طعاما منذ ثلاث، فأمر به رجلا فآواه وقضى له حاجته.

رواه أحمد (2409) عن حسن بن موسى، حدّثنا زهير -هو ابن معاوية- عن قابوس أن أباه حدثه عن ابن عباس، فذكره.

وقابوس هو ابن أبي ظبيان حصين بن جندب قال ابن حبان: كان رديء الحفظ ينفرد عن أبيه بما لا أصل له. وهذا من روايته عن أبيه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমাদের জন্য খেজুর ও পানি—এই দুটি কালো বস্তু ছাড়া আর কোনো খাদ্য ছিল না।









আল-জামি` আল-কামিল (15235)


15235 - عن إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف، قال: قدم رجل من أهل الشام المدينة، فلقي أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فسلم عليهم، وكان عبد الرحمن بن عوف غائبا في أرض له
بالجرف، فأتاه، فإذا هو واضع رداءه، والمسحاة في يده وهو يحول الماء في أرضه، فلما رآه عبد الرحمن وضع المسحاة من يده، ولبس رداءه، قال: فوقف عليه الرجل فسلم عليه وقال: جئت لأمر، فرأيت أعجب منه، ما أدري أعلمتم ما لم نعلم، أو جاءكم ما لم يأتنا، ما لنا نخف في الجهاد وتتثاقلون عنه، ونزهد في الدنيا وترغبون فيها، وأنتم سلفنا وأصحاب نبينا؟ فقال عبد الرحمن بن عوف: ما علمنا إلا ما علمتم، ولا جاءنا إلا ما جاءكم، ولكنا ابتلينا بالضراء فصبرنا، وابتلينا بالسراء فلم نصبر.

صحيح: رواه عبد الرزاق (20997) عن معمر، عن الزهري قال: أخبرني إبراهيم بن عبد الرحمن بن عوف قال: فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه الترمذيّ (2464) عن قتيبة، حدّثنا صفوان (واسمه: عبد اللَّه بن سعيد الأموي) عن يونس، عن الزهري، عن حميد بن عبد الرحمن، عن عبد الرحمن بن عوف قال: ابتلينا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بالضراء فصبرنا، ثم ابتلينا بالسراء بعده فلم نصبر.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن".

قلت: وهو كما قال؛ فإن في رواية يونس عن الزهري بعض الأوهام.

ولكنه توبع في الإسناد الأول.




ইব্‌রাহীম ইবন আব্দুর রহমান ইবন আওফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: শামের একজন লোক মদীনায় আসল। সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের সাথে সাক্ষাৎ করল এবং তাদের প্রতি সালাম জানাল। সে সময় আব্দুর রহমান ইবন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জুরুফ নামক স্থানে তাঁর জমিতে অনুপস্থিত ছিলেন। লোকটি তাঁর কাছে গেল। সে দেখল, তিনি তাঁর চাদর খুলে রেখেছেন এবং তাঁর হাতে ছিল খননকারী কোদাল, আর তিনি তাঁর জমিতে পানি প্রবাহিত করছিলেন। আব্দুর রহমান যখন তাকে দেখলেন, তখন তিনি হাত থেকে কোদাল নামিয়ে রাখলেন এবং তাঁর চাদর পরিধান করলেন। বর্ণনাকারী বলেন: লোকটি তাঁর (আব্দুর রহমান) সামনে দাঁড়াল, সালাম জানাল এবং বলল: আমি একটি কাজের জন্য এসেছিলাম, কিন্তু তার চেয়েও আশ্চর্য এক দৃশ্য দেখলাম। আমি জানি না— আপনারা এমন কিছু জেনেছেন যা আমরা জানিনি, নাকি আপনাদের কাছে এমন কিছু এসেছে যা আমাদের কাছে আসেনি। কী ব্যাপার! আমরা জিহাদের প্রতি হালকা (উৎসাহী) এবং আপনারা তা থেকে ভারাক্রান্ত (বিমুখ) হন কেন? আমরা দুনিয়াতে নির্লিপ্ত থাকি অথচ আপনারা এর প্রতি আগ্রহী হন কেন? অথচ আপনারাই হলেন আমাদের পূর্বসূরি এবং আমাদের নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবী? আব্দুর রহমান ইবন আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমরা এমন কিছু জানিনি যা তোমরা জানো না, আর আমাদের কাছে এমন কিছু আসেনি যা তোমাদের কাছে আসেনি। তবে আমাদের কষ্ট ও দারিদ্র্য দ্বারা পরীক্ষা করা হয়েছিল, তখন আমরা ধৈর্য ধারণ করেছিলাম। আর যখন আমাদের সচ্ছলতা ও সম্পদ দ্বারা পরীক্ষা করা হলো, তখন আমরা ধৈর্য ধরতে পারিনি।









আল-জামি` আল-কামিল (15236)


15236 - عن أبي هريرة قال: رأيتُ سبعين من أصحاب الصفة، ما منهم رجلٌ عليه رداء، إما إزارٌ وإما كساءٌ، قد ربطوا في أعناقهم، فمنها ما يبلغ نصف الساقين، ومنها ما يبلغ الكعبين، فيجمعه بيده كراهية أن ترى عورتُه.

صحيح: رواه البخاريّ في الصلاة (442) عن يوسف بن عيسى، حدّثنا ابنُ فضيل، عن أبيه، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.

قوله:"رأيتُ سبعين من أصحاب الصفة" قال ابن حجر في الفتح (1/ 536):"هذا يشعر بأنهم كانوا أكثر من سبعين، وهؤلاء الذين رآهم أبو هريرة غير السبعين الذين بعثهم النبي صلى الله عليه وسلم في غزوة بئر معونة، وكانوا من أصحاب الصفة أيضًا، لكنهم استشهدوا قبل إسلام أبي هريرة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সুফ্ফার সত্তরজন সাহাবীকে দেখেছি। তাদের মধ্যে এমন কোনো ব্যক্তি ছিল না যার গায়ে চাদর (রিদা) ছিল। তাদের পরিধানে হয় লুঙ্গি (ইযার) ছিল অথবা (মোটা) বস্ত্রখণ্ড (কিসা) ছিল, যা তারা তাদের গর্দানে (গলায়) বেঁধে রাখত। সেগুলোর মধ্যে কোনটি অর্ধ হাঁটু পর্যন্ত পৌঁছাত এবং কোনটি গোড়ালি পর্যন্ত পৌঁছাত। তারা লজ্জাস্থান প্রকাশ পাওয়ার ভয়ে নিজেদের হাত দিয়ে কাপড়টি ধরে রাখত।









আল-জামি` আল-কামিল (15237)


15237 - عن أبي حرب بن أبي الأسود، أن طلحة حدثه، وكان من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قال: أتيت المدينة، وليس لي بها معرفة، فنزلت في الصفة مع رجل فكان بيني وبينه كل يوم مد من تمر، فصلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات يوم، فلما انصرف، قال رجل من أصحاب الصفة: يا رسول اللَّه أحرق بطوننا التمر، وتخرقت عنا الخنف، فصعد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فخطب ثم قال:"واللَّه، لو وجدت خبزا أو لحما لأطعمتكموه، أما إنكم توشكون أن تدركوا، ومن أدرك ذاك منكم أن يراح عليكم بالجفان، وتلبسون
مثل أستار الكعبة" قال: فمكثت أنا وصاحبي ثمانية عشر يوما وليلة، ما لنا طعام إلا البرير، حتى جئنا إلى إخواننا من الأنصار فواسونا، وكان خير ما أصبنا هذا التمر.

صحيح: رواه أحمد (15988)، والبزار - كشف الأستار (3673)، وصحّحه ابن حبان (6684)، والحاكم (3/ 15) كلهم من طرق عن داود بن أبي هند، عن أبي حرب بن أبي الأسود، فذكره. وإسناده صحيح.

قال البزار:"وطلحة هذا سكن البصرة، وهو طلحة بن عمرو، ولم يرو إلا هذا الحديث".




তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মদিনায় আসলাম, আর সেখানে আমার কোনো পরিচিতি ছিল না। আমি এক ব্যক্তির সাথে সুফ্ফায় (আশ্রয়স্থলে) অবস্থান নিলাম। প্রতিদিন আমার ও তার মাঝে এক মুদ্দ খেজুর ভাগ হতো। একদিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি ফিরলেন, সুফ্ফার অধিবাসীদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! খেজুর খেয়ে খেয়ে আমাদের পেট জ্বলে যাচ্ছে এবং আমাদের জামাকাপড়গুলো ছিঁড়ে গেছে।

তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে আরোহণ করলেন এবং খুতবা দিলেন। এরপর বললেন: "আল্লাহর শপথ! যদি আমি রুটি বা গোশত পেতাম, তবে অবশ্যই তোমাদেরকে তা খাওয়াতাম। তবে তোমরা শীঘ্রই এমন সময় পাবে, যখন তোমাদের মধ্য থেকে যে সেই সময় পাবে, তার কাছে বড় বড় পাত্রে (খাবার) পেশ করা হবে, এবং তোমরা কা'বার পর্দার মতো পোশাক পরিধান করবে।"

তিনি (তালহা) বলেন: আমি ও আমার সাথী আঠারো দিন-রাত সেখানে অবস্থান করলাম, এ সময়ে 'বারিইর' (পিলু গাছের ফল) ব্যতীত আমাদের কোনো খাবার ছিল না। অবশেষে আমরা আমাদের আনসার ভাইদের কাছে আসলাম এবং তারা আমাদের সাহায্য করলেন। আর এই খেজুর যা আমরা পেয়েছিলাম, তাই ছিল আমাদের শ্রেষ্ঠ সম্পদ।









আল-জামি` আল-কামিল (15238)


15238 - عن أبي جحيفة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنها ستفتح عليكم الدنيا حتى تنجدوا بيوتكم كما تنجد الكعبة". قلنا: ونحن على ديننا اليوم، قال:"وأنتم على دينكم اليوم". قلنا: فنحن يومئذ خير أم اليوم قال:"بل أنتم اليوم خير".

حسن: رواه البزار (4227)، والطبراني في الكبير (22/ 108) كلاهما من طرق عن أبي أحمد الزبيري، حدّثنا عبد الجبار بن العباس، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الجبار بن العباس الشيباني فإنه حسن الحديث.

قال الهيثمي في المجمع (10/ 323):"رواه البزار ورجاله رجال الصحيح غير عبد الجبار بن العباس وهو ثقة".

وقال ابن حجر في مختصر زوائد البزار:"غريب صحيح".




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের জন্য দুনিয়া জয় করা হবে, এমনকি তোমরা তোমাদের ঘরকে সজ্জিত করবে, যেভাবে কা'বাকে সজ্জিত করা হয়।" আমরা বললাম: "তখনও কি আমরা আজকের মতো আমাদের দ্বীনের ওপরই থাকব?" তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের আজকের দ্বীনের ওপরই থাকবে।" আমরা বললাম: "তাহলে আমরা কি সেই দিন উত্তম থাকব নাকি আজকের দিন?" তিনি বললেন: "বরং তোমরা আজই উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (15239)


15239 - عن جابر بن عبد اللَّه، قال: كان يقدم على النبي صلى الله عليه وسلم قوم ليست لهم معارف، فيأخذ الرجل بيد الرجل، والرجل بيد الرجلين، والرجل بيد الثلاثة، على قدر طاقته، فأخذ ختني بيد رجلين فخلوت به، فلمته، فقلت: تأخذ رجلين، وعندك ما عندك، فقال: إن عندنا رزقا من رزق اللَّه، فانطلق حتى أريك، فانطلقت، فأراني شيئًا من بر، فقال: هذا عندنا، فقلت: من أين لك هذا؟ ، قال: اشتريناه من العير التي قدمت أمس، وأراني مثل جثوة البعير تمرا، فقال: وهذا عندنا، وأراني جرة فيها ودك، فقال: وهذا دهان وإدام، ثم غدا بهما إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، أو راح بهما، وقد أطعمهما ودهنهما، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني أرى صاحبيك حسني الحال، كم تطعمهما كل يوم من وجبة؟ قال: وجبتين، قال:"وجبتين؟ فلولا كانت واحدة".

صحيح: رواه البزار - كشف الأستار (3606) عن نصر بن علي، أخبرنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، ثنا الجريري، -واسمه: سعد بن إياس-، عن أبي نضرة، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكره.

وإسناده صحيح، وعبد الأعلى سمع من الجريري قبل اختلاطه.

قال الهيثمي في المجمع (10/ 253):"رواه البزار ورجاله رجال الصحيح".




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এমন কিছু লোক আসত যাদের কোনো পরিচিতজন ছিল না (বা থাকার জায়গা ছিল না)। তখন (সাহাবীগণ) কেউ একজন মানুষের হাত ধরে নিতেন, কেউ দু'জন মানুষের হাত ধরে নিতেন, আবার কেউ তিনজন মানুষের হাত ধরে নিতেন—তার সামর্থ্য অনুযায়ী। আমার ভগ্নিপতি দু’জন লোকের হাত ধরলেন। আমি তার সাথে একাকী হলাম এবং তাকে তিরস্কার করলাম। আমি বললাম: তুমি দু’জন লোককে গ্রহণ করলে? অথচ তোমার কাছে যা আছে তা তো সীমিত। তিনি বললেন: আমাদের কাছে আল্লাহর দেওয়া রিজিকের অংশ রয়েছে। চলো, আমি তোমাকে দেখাই। আমি গেলাম। তিনি আমাকে কিছু গম দেখালেন এবং বললেন: এটা আমাদের কাছে আছে। আমি বললাম: এটা তুমি কোথা থেকে পেলে? তিনি বললেন: গতকাল যে কাফেলাটি এসেছিল, তাদের কাছ থেকে কিনেছি। আর তিনি আমাকে একটি উটের স্তূপের মতো খেজুর দেখালেন এবং বললেন: এটাও আমাদের কাছে আছে। এরপর তিনি আমাকে একটি পাত্র দেখালেন, যাতে চর্বি (মেদ) ছিল এবং বললেন: এটা তৈল ও তরকারি (ইদাম)। এরপর তিনি ঐ দু’জন লোককে নিয়ে সকালবেলা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলেন, অথবা সন্ধ্যাবেলা গেলেন। তিনি ইতোমধ্যে তাদের আহার করিয়েছিলেন এবং (তৈল/চর্বি) মেখে দিয়েছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "আমি তোমার এই দু’জন সাথীকে ভালো অবস্থায় দেখছি। তুমি প্রতিদিন তাদের কয়বার খাওয়াব?" তিনি বললেন: দু’বার। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দু’বার? কেন একটি বার হলেই কি যথেষ্ট হত না?"









আল-জামি` আল-কামিল (15240)


15240 - عن أبي موسى قال: لو رأيتنا ونحن مع نبينا صلى الله عليه وسلم لحسبتَ إنما ريحنا ريح الضأن، إنما لباسنا الصوف، وطعامنا الأسودان: التمر والماء.

حسن: رواه الطبراني في الأوسط - مجمع البحرين (5125) عن أحمد بن عمرو القطراني، حدّثنا أبو الربيع الزهراني، حدّثنا عبد اللَّه بن المبارك، حدّثنا أبو سلمة، عن قتادة، عن أبي بردة، عن أبي موسى الأشعري، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي سلمة، وهو محمد بن أبي حفصة؛ فإنه حسن الحديث، وهو من رجال الصحيح.

قال الهيثمي في المجمع (10/ 325):"رواه الطبراني في الأوسط ورجاله رجال الصحيح". وهو كما قال.

ورواه أبو داود (4033) من طريق قتادة، عن أبي بردة، عن أبي موسى به مقتصرا على قوله:"أن ريحنا ريح الضأن". وهو مذكور في كتاب اللباس.




আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যদি আপনি আমাদেরকে দেখতেন যখন আমরা আমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম, তাহলে আপনি মনে করতেন যে আমাদের গায়ের গন্ধ ভেড়ার গন্ধের মতো; আমাদের পোশাক ছিল শুধুমাত্র পশমের; আর আমাদের খাদ্য ছিল দুটি কালো জিনিস: খেজুর ও পানি।









আল-জামি` আল-কামিল (15241)


15241 - عن * *




১৫২৪১ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (15242)


15242 - عن أسامة بن زيد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما تركت بعدي فتنة هي أضر على الرجال من النساء".

متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5096)، ومسلم في الرقاق (2740: 97) كلاهما من طريق سليمان التيمي، عن أبي عثمان النهدي، عن أسامة بن زيد، فذكره.




উসামা ইবন যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার পরে পুরুষদের জন্য মহিলাদের চেয়ে ক্ষতিকর আর কোনো ফেতনা (বিপদ বা পরীক্ষা) আমি রেখে যাইনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (15243)


15243 - عن أسامة بن زيد بن حارثة وسعيد بن زيد بن عمرو بن نفيل أنهما حدثا عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"ما تركت بعدي في النالس فتنة أضر على الرجال من النساء".

صحيح: رواه مسلم في الرقاق (2741) من طرق عن المعتمر بن سليمان قال: قال أبي: حدّثنا أبو عثمان، عن أسامة بن زيد بن حارثة وسعيد بن زيد بن عمرو بن نفيل، فذكراه.




উসামা ইবনু যায়দ ইবনু হারিসা ও সাঈদ ইবনু যায়দ ইবনু আমর ইবনু নুফাইল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমার পরে পুরুষদের জন্য মহিলাদের চেয়ে ক্ষতিকর আর কোনো ফিতনা আমি রেখে যাইনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (15244)


15244 - عن أبي سعيد الخدري عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الدنيا حلوة خضرة، وإن اللَّه مستخلفكم فيها، فينظر كيف تعملون، فاتقوا الدنيا واتقوا النساء؛ فإن أول فتنة بني إسرائيل كانت في النساء".

صحيح: رواه مسلم في الرقاق (2742) من طريق محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن أبي مسلمة قال: سمعت أبا نضرة يحدث عن أبي سعيد الخدري، فذكره.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় দুনিয়া মিষ্টি ও সবুজ (মনোমুগ্ধকর)। আর নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদেরকে এর মধ্যে প্রতিনিধি বানিয়েছেন, অতঃপর তিনি দেখবেন তোমরা কেমন আমল করো। অতএব তোমরা দুনিয়াকে ভয় করো এবং নারীদেরকে ভয় করো; কেননা বনী ইসরাঈলের প্রথম ফিতনা (বিপর্যয়) নারীদের দ্বারাই শুরু হয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (15245)


15245 - عن مطرف بن عبد اللَّه بن الشخير، يحدث عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم قال: كان بالكوفة أمير، قال: فخطب يوما، فقال: إن في إعطاء هذا المال فتنة، وفي إمساكه فتنة، وبذلك قام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في خطبته حتى فرغ، ثم نزل.

صحيح: رواه أحمد (20586) عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة قال: سمعت إسحاق بن سويد قال: سمعت مطرف بن عبد اللَّه بن الشخير، يحدث عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وإسناده صحيح، وإسحاق بن سويد هو ابن هبيرة العدوي البصري، وثّقه الأئمة، منهم أحمد، وابن معين، والنسائي، وابن سعد وغيرهم.
ومن طريقه رواه القضاعي في مسند الشهاب (999)، وابن أبي عاصم في الآحاد والمثاني (2910).

وقال الهيثمي في المجمع (3/ 87):"رجاله ثقات".




নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে হতে এক ব্যক্তি থেকে বর্ণিত: তিনি বলেন, কুফাতে একজন আমীর ছিলেন। তিনি একদিন খুতবা (ভাষণ) দিলেন এবং বললেন: নিশ্চয় এই সম্পদ দান করার মধ্যে ফিতনা (পরীক্ষা) আছে এবং তা আটকে রাখার মধ্যেও ফিতনা আছে। আর এ কারণেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খুতবায় (ভাষণে) দাঁড়ালেন, যতক্ষণ না তিনি তা শেষ করলেন, এরপর তিনি (মিম্বর থেকে) নেমে আসলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (15246)


15246 - عن كعب بن عياض قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن لكل أمة فتنة، وفتنة أمتي المال".

حسن. رواه الترمذيّ (2336)، وأحمد (17471)، وصحّحه ابن حبان (3223)، والحاكم (1/ 318) كلهم من طريق معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه، عن كعب ابن عياض، فذكره.

وإسناده حسن من أجل معاوية بن صالح -وهو ابن حدير- فإنه حسن الحديث.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح غريب، إنما نعرفه من حديث معاوية بن صالح".




কা'ব ইবনে ইয়ায (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয় প্রত্যেক উম্মতের জন্য একটি ফেতনা (পরীক্ষা) রয়েছে, আর আমার উম্মতের ফেতনা হলো ধন-সম্পদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (15247)


15247 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألا إن الدينار والدرهم أهلكا من كان قبلكم، وهما مهلكاكم".

صحيح: رواه ابن حبان (694)، والطبراني في المعجم الأوسط - مجمع البحرين (4921) كلاهما من طرق عن الأعمش، عن أبي وائل، عن أبي موسى، فذكره. وإسناده صحيح.

وأما ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"استحيوا من اللَّه حق الحياء"، قال: قلنا يا رسول اللَّه إنا نستحيي والحمد للَّه، قال:"ليس ذاك ولكن الاستحياء من اللَّه حق الحياء أن تحفظ الرأس وما وعى، والبطن وما حوى، وتتذكر الموت والبلى، ومن أراد الآخرة ترك زينة الدنيا، فمن فعل ذلك فقد استحيا من اللَّه حق الحياء" فإسناده ضعيف.

رواه الترمذيّ (2458)، وأحمد (3671) كلاهما من طريق محمد بن عبيد، حدّثنا أبان بن إسحاق، عن الصباح بن محمد، عن مرة الهمدني، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب إنما نعرفه من هذا الوجه من حديث أبان بن إسحاق، عن الصباح بن محمد".

قلت: وهو كما قال؛ فإن الصباح بن محمد البجلي ضعيف كما في التقريب.

وللحديث طريق آخر وهي أضعف مما ذُكرَ، فيه رجل متروك.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জেনে রাখো, দীনার ও দিরহাম তোমাদের পূর্ববর্তীদেরকে ধ্বংস করেছে, এবং এ দুটিই তোমাদেরও ধ্বংসকারী।"

আর আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর নিকট যথাযথভাবে লজ্জা করো।" বর্ণনাকারী বলেন, আমরা বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা তো লজ্জা করি, আলহামদুলিল্লাহ। তিনি বললেন: "তা নয়, বরং আল্লাহর নিকট যথাযথ লজ্জা হলো: তুমি মাথা এবং যা তার অন্তর্ভুক্ত (সংরক্ষিত) তা রক্ষা করবে, পেট এবং যা সে ধারণ করে তা রক্ষা করবে এবং মৃত্যু ও পচনের কথা স্মরণ করবে। আর যে ব্যক্তি আখিরাত চায়, সে দুনিয়ার অলঙ্কারাদি ত্যাগ করে। সুতরাং যে ব্যক্তি এগুলি করে, সে আল্লাহর নিকট যথাযথভাবে লজ্জা করলো।"