হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (15388)


15388 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من دعا إلى هدى كان له من الأجر مثل أجور من تبعه لا ينقص ذلك من أجورهم شيئًا، ومن دعا إلى ضلالة كان عليه من الإثم مثل آثام من تبعه، لا ينقص ذلك من آثامهم شيئًا".

صحيح: رواه مسلم في العلم (2674) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وبمعناه ما روي عن أبي جحيفة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من سن سنة حسنة فعمل بها بعده كان لها أجره ومثل أجورهم من غير أن ينقص من أجورهم شيئًا، ومن سن سنة سيئة فعمل بها بعده كان عليه وزره ومثل أوزارهم من غير أن ينقص من أوزارهم شيئًا".

رواه ابن ماجه (207) عن محمد بن يحيى، حدّثنا أبو نعيم حدّثنا إسماعيل أبو إسرائيل، عن الحكم (هو ابن عتيبة) عن أبي جحيفة، فذكره.

وفي إسناده إسماعيل أبو إسرائيل، وهو ابن خليفة الملائي سيء الحفظ.

وبمعناه ما روي عن أنس بن مالك، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"أيما داع إلى ضلالة فاتبع فإن له مثل أوزار من اتبعه، ولا ينقص من أوزارهم شيئًا، وأيما داع دعا إلى هدى فاتبع فإن له مثل أجور من اتبعه، ولا ينقص من أجورهم شيئًا".

رواه ابن ماجه (205) عن عيسى بن حماد المصري قال: أنبأنا الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سعد بن سنان، عن أنس، فذكره.

وسعد بن سنان ضعيف، وبه أعله البوصيري في مصباح الزجاجة.

ولا يصح ما روي عنه مرفوعا:"ما من داع إلى شيء إلا كان موقوفا يوم القيامة لازما له لا يفارقه، وإن دعا رجل رجلًا" ثم قرأ قول اللَّه عز وجل: {وَقِفُوهُمْ إِنَّهُمْ مَسْئُولُونَ (24) مَا لَكُمْ لَا تَنَاصَرُونَ} [الصافات: 24 - 25].

رواه الترمذيّ (3228) من طريق معتمر بن سليمان، حدّثنا ليث بن أبي سليم، عن بشر، عن أنس بن مالك، فذكره.

وليث بن أبي سليم مختلط، وقد اضطرب في إسناد هذا الحديث، فرواه ابن ماجه (208) من طريق أبي معاوية، عن ليث، عن بشير بن نهيك، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه، ولم يذكر الآية.

ولذا قال الترمذيّ عقب حديث أنس:"هذا حديث غريب" أي ضعيف.

وكذلك لا يصح ما روي عنه مرفوعا:"ما من رجل ينعش لسانه حقا يعمل به بعده إلا جرى عليه أجره إلى يوم القيامة، ثم وفاه اللَّه حسابه يوم القيامة".

رواه أحمد (13803) عن علي بن إسحاق، حدّثنا عبد اللَّه (هو ابن المبارك) أخبرنا عبيد اللَّه بن موهب، عن مالك بن محمد بن حارثة الأنصاري أن أنس بن مالك، قال: فذكره.
ومالك بن محمد بن حارثة الأنصاري قال الحسيني: فيه نظر. قال ابن حجر في التعجيل (998): هو مالك بن أبي الرجال.

قلت: إن كان هو مالك بن أبي الرجال، فروايته عن أنس مرسلة كما في الجرح والتعديل (8/ 216) وأما ما روي عن كثير بن عبد اللَّه، عن أبيه، عن جده قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من أحيا سنة من سنتي قد أُميتَتْ بعدي فإن له من الأجر مثل أجر من عمل بها من الناس، لا ينقص من أجور الناس شيئًا، ومن ابتدع بدعة لا يرضاها اللَّه ورسوله فإن عليه مثل إثم من عمل بها من الناس، لا ينقص من آثام الناس شيئًا" فإسناده ضعيف.

رواه الترمذيّ (2677) وابن ماجه (210، 209) كلاهما من طرق عن كثير بن عبد اللَّه بن عمرو ابن عوف المزني، عن أبيه، عن جده، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن".

قلت: في إسناده كثير بن عبد اللَّه بن عمرو بن عوف المزني وهو ضعيف باتفاق أهل العلم. ولذا انتقد على الترمذيّ تحسين هذا الحديث، وأبوه عبد اللَّه بن عمرو بن عوف، لم أجد من وثقه إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، ولذا قال ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم أجد له متابعًا.

وكذلك لا يصح ما روي عن أنس بن مالك قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يا بني إن قدرت أن تصبح وتمسي وليس في قلبك غش لأحد فافعل" ثم قال لي:"يا بني وذلك من سنتي، ومن أحيا سنتي فقد أحبني، ومن أحبني كان معي في الجنة".

رواه الترمذيّ (2678) عن مسلم بن حاتم الأنصاري البصري، حدّثنا محمد بن عبد اللَّه الأنصاري، عن أبيه، عن علي بن زيد، عن سعيد بن المسيب قال: قال أنس بن مالك، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".

قلت: علي بن زيد، وهو ابن جدعان ضعيف، ضعّفه جمهور أهل العلم، وإن كان الترمذيّ حسن الرأي فيه.

وقال الترمذيّ عقب الحديث المذكور:"وذاكرت به محمد بن إسماعيل فلم يعرفه، ولم يعرف لسعيد بن المسيب عن أنس هذا الحديث ولا غيره. ومات أنس بن مالك سنة ثلاث وتسعين، ومات سعيد بن المسيب بعده بسنتين، مات سنة خمسة وتسعين". انتهى كلام الترمذيّ.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সঠিক পথের (হিদায়াতের) দিকে আহ্বান করে, তার জন্য তার অনুসারীদের সমান প্রতিদান রয়েছে, তাতে তাদের প্রতিদান থেকে সামান্যও কমানো হয় না। আর যে ব্যক্তি ভ্রষ্টতার (গোমরাহীর) দিকে আহ্বান করে, তার উপর তার অনুসারীদের পাপের সমান পাপ বর্তায়, তাতে তাদের পাপরাশি থেকে সামান্যও কমানো হয় না।”









আল-জামি` আল-কামিল (15389)


15389 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"بادروا بالأعمال فتنًا كَقطع الليل المظلم، يُصبح الرجلُ مؤمنًا ويُمْسِي كافرًا، أو يُمْسِي مؤمنًا ويُصْبحُ كافرًا، يبيع دينَه بعرض من الدنيا".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (118) من طرق عن إسماعيل بن جعفر قال: أخبرني العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

وروي نحوه عن أبي أمامة عند ابن ماجه (3954) وفيه:"إلا من أحياه اللَّه بالعلم". وفي إسناده علي بن زيد وهو الألهاني منكر الحديث.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা অন্ধকার রাতের টুকরোগুলোর মতো ফিতনাসমূহ আসার আগেই নেক আমলের দিকে দ্রুত ধাবিত হও। যখন কোনো ব্যক্তি সকালে মুমিন অবস্থায় থাকবে এবং সন্ধ্যায় কাফির হয়ে যাবে, অথবা সন্ধ্যায় মুমিন অবস্থায় থাকবে এবং সকালে কাফির হয়ে যাবে, সে (তখন) দুনিয়ার সামান্য স্বার্থের বিনিময়ে তার দ্বীনকে বিক্রি করে দেবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (15390)


15390 - عن أنس بن مالك، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"تكون بين يدي الساعة فتنٌ كقطع الليل المظلم، يُصبح الرجلُ فيها مؤمنًا ويمسي كافرًا، ويُمسي مؤمنًا ويصبح كافرًا، يبيع أقوام دينهم بعرضٍ من الدنيا".

حسن: رواه الترمذيّ (2197)، وأبو يعلى (4260)، والحاكم (4/ 438 - 439) كلهم من طريق يزيد بن أبي حبيب، عن سعد بن سنان، عن أنس، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث غريب من هذا الوجه".

أي ضعيف من هذا الوجه؛ فإن سعد بن سنان ويقال: سنان بن سعد مختلف فيه فضعّفه بعض أهل العلم، ولكن وثّقه ابن معين وأحمد بن صالح، وقال البخاري:"الصحيح عندي سنان بن سعد، وهو صالح مقارب الحديث، وسعد بن سنان خطأ إنما قاله الليث".

وكذا رجّحه أيضًا ابن حبان، وقال: وقد اعتبرت حديثه فرأيت ما روى عن سنان بن سعد يشبه أحاديث الثقات، وما روى عن سعد بن سنان وسعيد بن سنان ففيه المناكير، كأنهما اثنان. الثقات (4/ 336).




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কেয়ামতের পূর্বে অন্ধকার রাতের টুকরোগুলোর ন্যায় ফিতনাসমূহ দেখা দেবে, যখন মানুষ সকালে মুমিন অবস্থায় উঠবে এবং সন্ধ্যায় কাফির হয়ে যাবে, আবার সন্ধ্যায় মুমিন হবে এবং সকালে কাফির হয়ে যাবে, (এবং) মানুষ দুনিয়ার সামান্য স্বার্থের বিনিময়ে তাদের দ্বীন বিক্রি করে দেবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15391)


15391 - عن المقداد بن الأسود، قال: ايم اللَّه، لقد سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إن
السعيد لمن جنب الفتن، إن السعيد لمن جُنِّبَ الفتن، إن السعيد لمن جنب الفتن، ولمن ابتلي فصبر، فواهًا".

صحيح: رواه أبو داود (4263) عن إبراهيم بن الحسن المصيصي، حدّثنا حجاج يعني ابن محمد، حدّثنا الليث بن سعد، قال: حدثني معاوية بن صالح، أن عبد الرحمن بن جبير، حدثه عن أبيه، عن المقداد بن الأسود، فذكره.

وإسناده صحيح.

قوله:"واها" كلمة معناها التلهف، وقد يوضع أيضًا موضع الإعجاب بالشيء.




মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই সে ব্যক্তিই ভাগ্যবান যাকে ফিতনা থেকে দূরে রাখা হয়েছে, নিশ্চয়ই সে ব্যক্তিই ভাগ্যবান যাকে ফিতনা থেকে দূরে রাখা হয়েছে, নিশ্চয়ই সে ব্যক্তিই ভাগ্যবান যাকে ফিতনা থেকে দূরে রাখা হয়েছে। আর যে ব্যক্তি (ফিতনা দ্বারা) আক্রান্ত হওয়ার পরও ধৈর্য ধারণ করেছে, সেও কতই না উত্তম!"









আল-জামি` আল-কামিল (15392)


15392 - عن أنس بن مالك قال: سألوا النبي صلى الله عليه وسلم حتى أحفَوه بالمسألة، فصعد النبي صلى الله عليه وسلم ذات يوم المنبر فقال:"لا تسألوني عن شيء إلا بينتُ لكم" فجعلتُ أنظر يمينًا وشمالًا، فإذا كل رجل رأسه في ثوبه يبكي، فأنشأ رجل، كان إذا لاحى يدعى إلى غير أبيه، فقال: يا نبي اله من أبي؟ فقال:"أبوك حذافة" ثم أنشأ عمر فقال: رضينا باللَّه ربًّا، وبالإسلام دينًا، وبمحمد رسولًا، نعوذ باللَّه من سوء الفتن. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ما رأيت في الخير والشر كاليوم قط، إنه صورت لي الجنة والنار، حتى رأيتهما دون الحائط" فكان قتادة يذكر هذا الحديث عند هذه الآية: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَسْأَلُوا عَنْ أَشْيَاءَ إِنْ تُبْدَ لَكُمْ تَسُؤْكُمْ وَإِنْ تَسْأَلُوا عَنْهَا حِينَ يُنَزَّلُ الْقُرْآنُ تُبْدَ لَكُمْ عَفَا اللَّهُ عَنْهَا وَاللَّهُ غَفُورٌ حَلِيمٌ} [المائدة: 101].

متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7089)، ومسلم في الفضائل (2359) كلاهما من طريق هشام، عن قتادة، عن أنس، فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে প্রশ্ন করতে থাকল, এমনকি তারা অতিরিক্ত প্রশ্ন করে তাঁকে পীড়িত করে তুলল। একদিন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিম্বরে আরোহণ করে বললেন: "তোমরা আমাকে কোনো বিষয়ে জিজ্ঞেস করো না, যার ব্যাখ্যা আমি তোমাদের জন্য প্রকাশ করব না।" তখন আমি ডানে-বাঁয়ে তাকাতে লাগলাম। দেখলাম, প্রত্যেক ব্যক্তির মাথা কাপড়ের ভেতরে (লুকানো) এবং সে কাঁদছে। এরপর একজন লোক দাঁড়াল, যাকে বিতর্কের সময় তার আসল পিতার পরিবর্তে অন্য কারো সন্তান বলে ডাকা হতো। সে বলল: হে আল্লাহর নবী! আমার পিতা কে? তিনি বললেন: "তোমার পিতা হুযাইফা।" এরপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন এবং বললেন: আমরা আল্লাহকে রব হিসাবে, ইসলামকে দীন (জীবনব্যবস্থা) হিসাবে এবং মুহাম্মাদকে রাসূল হিসাবে সন্তুষ্টচিত্তে মেনে নিয়েছি। আমরা নিকৃষ্ট ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করি। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "আজকের মতো কল্যাণ ও অকল্যাণের এমন দৃশ্য আমি কক্ষনও দেখিনি। আমার সামনে জান্নাত ও জাহান্নামকে এমনভাবে প্রতিচ্ছবি করা হয়েছে যে, আমি সে দুটোকে এই দেয়ালের ওপারে দেখতে পাচ্ছিলাম।" ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) এই আয়াতটির সময় এই হাদীসটি উল্লেখ করতেন: "হে মুমিনগণ! এমন সব বিষয়ে প্রশ্ন করো না, যা তোমাদের কাছে প্রকাশ করা হলে তোমাদের খারাপ লাগবে। আর কুরআনের যখন অবতীর্ণ হয়, তখন তোমরা যদি সে সব বিষয়ে প্রশ্ন করো, তাহলে তোমাদের কাছে তা প্রকাশ করা হবে। আল্লাহ সেগুলো ক্ষমা করে দিয়েছেন। আল্লাহ ক্ষমাশীল, সহনশীল।" (সূরা আল-মা'ইদাহ: ১০১)।









আল-জামি` আল-কামিল (15393)


15393 - عن زيد بن ثابت قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تعوذوا باللَّه من الفتن، ما ظهر منها وما بطن" قالوا: نعوذ باللَّه من الفتن ما ظهر منها وما بطن، قال:"تعوذوا باللَّه من فتنة الدجال" قالوا: نعوذ باللَّه من فتنة الدجال.

صحيح: رواه مسلم في الجنة وصفة نعيمها (2867) من طرق عن ابن علية، عن سعيد الجريري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري، عن زيد بن ثابت، فذكره في حديث طويل.




যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আল্লাহর কাছে ফিতনা থেকে আশ্রয় চাও, যা প্রকাশ্য এবং যা গোপন।" তাঁরা বললেন: "আমরা আল্লাহর কাছে প্রকাশ্য ও গোপন ফিতনা থেকে আশ্রয় চাই।" তিনি বললেন: "তোমরা আল্লাহর কাছে দাজ্জালের ফিতনা থেকে আশ্রয় চাও।" তাঁরা বললেন: "আমরা আল্লাহর কাছে দাজ্জালের ফিতনা থেকে আশ্রয় চাই।"









আল-জামি` আল-কামিল (15394)


15394 - عن أبي سعيد الخدري، أنه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يُوشِك أن يكون خير مال المسلم غنمًا يتبع بها شَعَفَ الجبال، ومواقع القطَر يفر بدينه من الفتن".
صحيح: رواه مالك في الاستئذان (16) عن عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدري، أنه قال: فذكره.

ورواه البخاريّ في الفتن (7088) من طريق مالك، به.

قوله:"شعف الجبال" شعفة كل شيء: أعلاه.




আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: অতি শীঘ্রই এমন সময় আসবে যখন মুসলিমের সর্বোত্তম সম্পদ হবে বকরীর পাল, যা নিয়ে সে পাহাড়ের চূড়াগুলোতে এবং বৃষ্টির স্থানগুলোতে অনুসরণ করবে, ফিতনা (বিপর্যয়) থেকে স্বীয় দ্বীনকে রক্ষা করার জন্য সে পলায়ন করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (15395)


15395 - عن أبي سعيد الخدري، قال: جاء أعرابي إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول اللَّه أي الناس خير؟ قال:"رجل جاهد بنفسه وماله، ورجل في شعب من الشعاب: يعبد ربه، ويدع الناس من شره".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6494)، ومسلم في الإمارة (1888) كلاهما من طريق الزهري، عن عطاء بن يزيد الليثي، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন বেদুঈন (মরুচারী আরব) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে জিজ্ঞেস করল: হে আল্লাহর রাসূল! মানুষের মধ্যে কে শ্রেষ্ঠ? তিনি বললেন: (১) ঐ ব্যক্তি, যে তার জান ও মাল দিয়ে জিহাদ করে, এবং (২) ঐ ব্যক্তি, যে পাহাড়ের কোনো এক গিরিপথে থেকে তার রবের ইবাদত করে এবং মানুষকে তার অনিষ্ট থেকে রক্ষা করে।









আল-জামি` আল-কামিল (15396)


15396 - عن الزبير بن عدي، قال: أتينا أنس بن مالك، فشكونا إليه ما نَلْقَى من الحجاج، فقال:"اصبروا، فإنه لا يأتي عليكم زمان إلا الذي بعده شر منه، حتى تلقوا ربَّكم" سمعته من نبيكم صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه البخاريّ في الفتن (7068) من طريق محمد بن يوسف، حدّثنا سفيان (هو الثوري)، عن الزبير بن عدي قال: فذكره.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যুবাইর ইবনে আদী বলেন, আমরা তাঁর (আনাস ইবনে মালিকের) নিকট আসলাম এবং হাজ্জাজ (ইবনে ইউসুফ)-এর পক্ষ থেকে আমরা যে কষ্ট ভোগ করছিলাম, সে বিষয়ে অভিযোগ করলাম। তিনি বললেন: "তোমরা ধৈর্য ধারণ করো। কারণ তোমাদের এমন কোনো সময় আসবে না যার পরবর্তী সময়টি তার চেয়ে মন্দ না হয়, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের রবের সাথে মিলিত হও।" তিনি আরও বললেন: "আমি এটি তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (15397)


15397 - عن العرباض بن سارية قال: صلى بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ذات يوم، ثم أقبل علينا فوعظنا موعظةً بليغةً ذرفتْ منها العيونُ ووجِلَتْ منها القلوبُ، فقال قائل: يا رسول اللَّه! كأن هذه موعظة مودَّعٍ، فماذا تعهد إلينا؟ فقال:"أوصيكم بتقوى اللَّه والسمعِ والطاعةِ، وإن عبدًا حبشيًّا، فإنه من يَعِشْ منكم بعدي فسيرى اختلافا كثيرًا، فعليكم بسنتي، وسنة الخلفاء المهديين الراشدين، تمسكوا بها، وعضُّوا عليها بالنواجذ، وإياكم ومحدثات الأمور، فإن كلَّ محدثةٍ بدعةٌ، وكل بدعةٍ ضلالةٌ".

حسن: رواه أبو داود (4607)، وأحمد (17145)، وصحّحه ابن حبان (5)، والحاكم (1/ 97) كلهم من حديث الوليد بن مسلم قال: حدّثنا ثور بن يزيد، قال: حدثني خالد بن معدان، قال: حدثني عبد الرحمن بن عمرو السلمي، وحجر بن حجر كلاهما عن العرباض، فذكره.

ورواه الترمذيّ (2676)، وابن ماجه (44)، وأحمد (17144)، والحاكم (1/ 95 - 96) كلهم من طرق عن خالد بن معدان، عن عبد الرحمن بن عمرو السلمي وحده بنحوه.
وهذا إسناد حسن، والكلام عليه مبسوط في كتاب الاعتصام.




ইরবাাদ বিন সারিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে সালাত (নামায) আদায় করলেন। অতঃপর আমাদের দিকে ফিরে এমন মর্মস্পর্শী উপদেশ দিলেন যা শুনে চোখগুলো অশ্রুসিক্ত হলো এবং অন্তরগুলো ভীত-কম্পিত হলো। তখন একজন বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! মনে হচ্ছে এটি যেন বিদায়কালীন উপদেশ। আপনি আমাদের কাছে কী অঙ্গীকার করছেন (কী নির্দেশনা দিচ্ছেন)?" তিনি বললেন, "আমি তোমাদেরকে আল্লাহর তাকওয়া (ভীতি) অবলম্বন করতে, (নেতার) কথা শুনতে ও আনুগত্য করতে উপদেশ দিচ্ছি— যদিও সে একজন আবিসিনিয়ার (হাবশি) গোলাম হয়। কারণ তোমাদের মধ্যে যারা আমার পরে বেঁচে থাকবে, তারা অনেক মতপার্থক্য দেখতে পাবে। সুতরাং তোমরা অবশ্যই আমার সুন্নাত এবং হেদায়েতপ্রাপ্ত খুলাফায়ে রাশিদীনের সুন্নাতকে আঁকড়ে ধরবে। তোমরা তা দৃঢ়ভাবে ধারণ করবে এবং মাড়ির দাঁত দিয়ে কামড়ে ধরবে (অর্থাৎ অত্যন্ত শক্তভাবে ধরে থাকবে)। আর তোমরা দ্বীনের মধ্যে নতুন উদ্ভাবিত বিষয়সমূহ (বিদআত) থেকে দূরে থাকবে। কেননা, প্রতিটি নতুন উদ্ভাবিত বিষয়ই বিদআত, আর প্রতিটি বিদআতই হলো পথভ্রষ্টতা।"









আল-জামি` আল-কামিল (15398)


15398 - عن أبي واقد الليثي قال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: ونحن جلوس على بساط:"إنها ستكون فتنة" قالوا: كيف نفعل يا رسول اللَّه؟ قال: فرد يده إلى البساط فأمسك به قال:"تفعلون هكذا"، وذكر لهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوما أنها ستكون فتنة فلم يسمعه كثير من الناس، فقال معاذ: تسمعون ما يقول رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ قالوا: ما قال؟ قال: يقول:"إنها ستكون فتنة"، قالوا: فكيف لنا يا رسول اللَّه؟ أو كيف نصنع؟ قال:"ترجعون إلى أمركم الأول".

صحيح: رواه الطحاوي في شرح المشكل (1184)، والطبراني في الكبير (20/ 43 - 44) كلاهما من طرق عن الليث بن سعد، عن عياش بن عباس القِتْباني، عن بكير بن الأشج، عن بسر ابن سعيد، عن أبي واقد الليثي، فذكره. وإسناده صحيح.




আবু ওয়াকিদ আল-লায়সী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা একটি চাটাইয়ের ওপর বসে ছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই শীঘ্রই ফিতনা (বিপর্যয়) দেখা দেবে।" তাঁরা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কী করব? তিনি তার হাত চাটাইয়ের দিকে ফিরিয়ে তা শক্ত করে ধরলেন এবং বললেন: "তোমরা এমনটি করবে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন তাদের কাছে বর্ণনা করলেন যে শীঘ্রই একটি ফিতনা দেখা দেবে, কিন্তু অনেক লোক তা শুনতে পায়নি। তখন মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা কি শুনছো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কী বলছেন? তারা বলল: তিনি কী বলেছেন? তিনি বললেন: তিনি বলছেন: "নিশ্চয়ই শীঘ্রই ফিতনা দেখা দেবে।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তখন আমাদের কী হবে? অথবা, আমরা কী করব? তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের প্রথম অবস্থার (অর্থাৎ ইসলামের মূল নীতির) দিকে ফিরে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15399)


15399 - عن أبي ذر، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنكم في زمان علماؤه كثير، خطباؤه قليل، من ترك فيه عشير ما يعلم هوى، أو قال: هلك، وسيأتي على الناس زمان يقل علماؤُه ويكثر خطباؤُه، من تمسك فيه بعشير ما يعلم نجا".

حسن: رواه أحمد (21372) عن مؤمل (هو ابن إسماعيل)، حدّثنا حماد، حدّثنا حجاج الأسود، قال: سمعت أبا الصديق يحدث ثابتًا البناني، عن رجل، عن أبي ذر، فذكره.

وفي إسناده رجل مبهم، ومؤمل بن إسماعيل سيء الحفظ، وقد اختلف عليه في إثبات الرجل المبهم وإسقاطه، فرواه أحمد عنه بإثباته. ورواه إسحاق (وهو ابن راهويه) عنه بإسقاطه (أي عن أبي الصديق عن أبي ذر مباشرة) ذكر هذه الرواية البخاري في التاريخ الكبير (2/ 374).

ورواه عيسى بن يونس، عن الحجاج بن أبي زياد الأسود، عن أبي الصديق أو أبي نضرة -شك الحجاج- عن أبي ذر.

أخرج روايته أبو ذر الهروي في ذم الكلام (100)، والبخاري في التاريخ الكبير (2/ 374).

ولا يضر شك الحجاج؛ فإن أبا الصديق وأبا نضرة ثقتان، والإشكال فيه لقاؤهما بأبي ذر فإنه توفي سنة (32 هـ)، وتوفي أبو الصديق وأبو نضرة سنة (108 هـ)، والفرق بين وفاتيهما 76 سنة وهو لا يمنع لقاؤهما بأبي ذر.

وأما ما ذكره العلائي في جامع التحصيل (ص 277): روى عن علي وأبي ذر من قدماء الصحابة، وذلك مرسل. قاله في"التهذيب".

قلت: ولم أجد هذا القول في تهذيب الكمال، وكذا قال أيضًا أبو زرعة العراقي:"لم أره فيه".
فالأصل فيه الاتصال إلا أن يكون مدلسا، فيكون إسناد الحديث حسنًا من أجل إسماعيل بن مؤمل فإن له ما يقويه وهو ما يأتي:

وبمعناه ما روي عن أبي هريرة مرفوعا:"إنكم في زمان من ترك منكم عشر ما أمر به هلك، ثم يأتي زمان من عمل منهم بعشر ما أمر به نجا".

رواه الترمذيّ (2267)، وابن عدي (7/ 2483) كلاهما من طريق نعيم بن حماد، حدّثنا سفيان ابن عيينة، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث لا نعرفه إلا من حديث نعيم بن حماد، عن سفيان بن عيينة".

قلت: نعيم بن حماد سيء الحفظ، وقد أنكرت عليه أحاديث كثيرة، منها هذا الحديث.

وذكر ابن أبي حاتم لأبيه طريق نعيم بن حماد فقال:"هذا عندي خطأ، رواه جرير وموسى بن أعين، عن ليث، عن معروف، عن الحسن، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسل". العلل (2794).

وقال النسائي:"هذا حديث منكر" نقله عنه ابن الجوزي في العلل المتناهية (1425). يعني أن الصحيح هو مرسل الحسن، ورفعه خطأ.




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা এমন এক যুগে আছ যখন আলেম (জ্ঞানী) অনেক এবং বক্তা (খতীব) কম। যে ব্যক্তি এ যুগে তার জানা বিষয়ের দশ ভাগের এক ভাগও ছেড়ে দেবে, সে পথভ্রষ্ট হবে (অথবা তিনি বললেন: ধ্বংস হবে)। আর মানুষের ওপর এমন এক যুগ আসবে যখন আলেম কম হবে এবং বক্তা বেশি হবে। সে যুগে যে ব্যক্তি তার জানা বিষয়ের দশ ভাগের এক ভাগ আঁকড়ে ধরবে, সে মুক্তি পাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15400)


15400 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يكون في آخر الزمان دجالون كذابون، يأتونكم من الأحاديث بما لم تسمعوا أنتم ولا آباؤكم، فإياكم وإياهم، لا يضلونكم، ولا يفتنونكم".

صحيح: رواه مسلم في المقدمة (6، 7) من طرق عن مسلم بن يسار، أنه سمع أبا هريرة يقول: فذكر الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শেষ যুগে অনেক মিথ্যাবাদী দাজ্জাল আবির্ভূত হবে। তারা তোমাদের কাছে এমন সব হাদীস নিয়ে আসবে যা তোমরা কিংবা তোমাদের পূর্বপুরুষেরা শোনোনি। সুতরাং তোমরা তাদের থেকে দূরে থাকবে, যেন তারা তোমাদেরকে পথভ্রষ্ট করতে না পারে এবং ফিতনায় ফেলতে না পারে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15401)


15401 - عن حذيفة بن اليمان يقول: كان الناس يسألون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الخير، وكنت أسأله عن الشر مخافة أن يدركني فقلت: يا رسول اللَّه، إنا كنا في جاهليةٍ وشرٍّ، فجاءنا اللَّه بهذا الخير، فهل بعد هذا الخير شر؟ قال:"نعم" فقلت: هل بعد ذلك الشر من خير؟ قال:"نعم وفيه دَخَن" قلت: وما دَخَنُه؟ قال:"قوم يستنّون بغير سنتي، ويهدُون بغير هدي تَعْرِف منهم وتُنكر" فقلت: هل بعد ذلك الخير من شر؟ قال:"نعم دعاة على أبواب جهنم من أجابهم إليها قذفوه فيها" فقلت: يا رسول اللَّه، صفْهم لنا قال:"نعم قوم من جِلْدتنا، ويتكلمون بألسنتنا" قلت: يا رسول اللَّه! فما ترى إن أدركني ذلك قال:"تَلزم جماعة المسلمين وإمامَهم" فقلت: فإن لم تكن لهم جماعة
ولا إمام؟ قال:"فاعتزل تلك الفِرق كلَّها، ولو أن تَعَضَّ على أصل شَجَرَةٍ حتى يدركك الموت، وأنت على ذلك".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7084)، ومسلم في الإمارة (1847) كلاهما من طريق محمد بن المثنى، حدّثنا أبو الوليد بن مسلم، حدّثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، حدثني بسر بن عبيد اللَّه الحضرمي، أنه سمع أبا إدريس الخولاني يقول: سمعت حذيفة بن اليمان يقول: فذكره.




হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কল্যাণ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করত, আর আমি তাঁকে অকল্যাণ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম—এই আশঙ্কায় যে তা আমাকে গ্রাস করে ফেলবে। অতঃপর আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা জাহিলিয়াত ও অকল্যাণের মধ্যে ছিলাম, অতঃপর আল্লাহ আমাদেরকে এই কল্যাণ (ইসলাম) দান করেছেন। এই কল্যাণের পরে কি আবার কোনো অকল্যাণ আসবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আমি বললাম: সেই অকল্যাণের পরে কি আবার কোনো কল্যাণ আসবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তবে তাতে ধোঁয়া (দখান) থাকবে।" আমি জিজ্ঞেস করলাম: তার 'দখান' কী? তিনি বললেন: "তারা এমন এক সম্প্রদায়, যারা আমার সুন্নাত ছাড়া অন্য রীতি অবলম্বন করবে এবং আমার পথ ছাড়া অন্য পথে পরিচালিত করবে। তুমি তাদের কিছু কাজকে ভালো বলে চিনতে পারবে এবং কিছু কাজকে খারাপ বলে অস্বীকার করবে।" আমি জিজ্ঞেস করলাম: সেই (ধোঁয়া মিশ্রিত) কল্যাণের পরেও কি আবার কোনো অকল্যাণ আসবে? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তখন জাহান্নামের দরজাসমূহের দিকে আহ্বানকারীরা থাকবে। যারা তাদের ডাকে সাড়া দেবে, তারা তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করবে।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি তাদের পরিচয় আমাদের কাছে বর্ণনা করুন। তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তারা আমাদেরই জাতির (বা চামড়ার) লোক হবে এবং আমাদের ভাষাতেই কথা বলবে।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যদি আমি সেই সময় পাই, তবে আপনি আমাকে কী করতে নির্দেশ দেন? তিনি বললেন: "তুমি মুসলিমদের জামাআত এবং তাদের ইমামকে আবশ্যকভাবে ধরে থাকবে।" আমি জিজ্ঞেস করলাম: যদি সেই সময় তাদের কোনো জামাআত বা কোনো ইমাম না থাকে? তিনি বললেন: "তবে তুমি সেই সব দল থেকে সম্পূর্ণভাবে দূরে সরে থাকবে, এমনকি যদি তোমাকে কোনো গাছের শিকড় দাঁত দিয়ে কামড়ে ধরে থাকতে হয়, যতক্ষণ না মৃত্যু তোমার কাছে আসে এবং তুমি সেই অবস্থায় থাকো।"









আল-জামি` আল-কামিল (15402)


15402 - عن نافع قال: جاء عبد اللَّه بن عمر إلى عبد اللَّه بن مطيع حين كان من أمر الحرة ما كان، زمن يزيد بن معاوية فقال: اطرحوا لأبي عبد الرحمن وسادة فقال: إني لم آتك لأجلس، أتيتك لأحدثك حديثا سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقوله:"من خلع يدًا من طاعة لقي اللَّه يوم القيامة لا حجة له، ومن مات وليس في عنقه بيعة مات ميتةً جاهليةً".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1851: 58) عن عبيد اللَّه بن معاذ العنبري، حدّثنا أبي، حدّثنا عاصم -وهو: ابن محمد بن زيد- عن زيد بن محمد، عن نافع قال: فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাফে' (রহ.) বলেন: ইয়াযীদ ইবনে মু'আবিয়ার আমলে যখন হাররার ঘটনা ঘটলো, তখন আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আব্দুল্লাহ ইবনে মুতী'র কাছে আসলেন। ইবনে মুতী' বললেন: আবূ আব্দুর রহমানের জন্য একটি গদি বিছাও। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি আপনার কাছে বসার জন্য আসিনি। আমি আপনার কাছে একটি হাদীস বর্ণনা করার জন্য এসেছি যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আনুগত্য থেকে হাত গুটিয়ে নিল, সে কিয়ামতের দিন আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে, তার (পক্ষে) কোনো যুক্তি বা প্রমাণ থাকবে না। আর যে ব্যক্তি এমন অবস্থায় মারা গেল যে তার গলায় (নেতার) কোনো বায়আত (আনুগত্যের অঙ্গীকার) নেই, সে জাহিলিয়াতের মৃত্যু বরণ করল।"









আল-জামি` আল-কামিল (15403)


15403 - عن أبي ذر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من فارق الجماعةَ شبرًا فقد خلع ربقة الإسلامِ من عنقه".

حسن: رواه أبو داود (4758)، وأحمد (21561)، والحاكم (1/ 117) كلهم من طرق عن مطرف بن طريف، عن أبي الجهم (هو سليمان بن الجهم)، عن خالد بن وهبان، عن أبي ذر، فذكره.

قال الحاكم:"خالد بن وهبان لم يُجرح في رواياته وهو تابعي معروف إلا أن الشيخين لم يخرجاه، وقد روى هذا المتن عن عبد اللَّه بن عمر بإسناد صحيح على شرطهما".

قلت: وبه صار الحديث حسنا.




আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি জামাআত (মুসলিম সমাজ) থেকে এক বিঘত পরিমাণও বিচ্ছিন্ন হলো, সে যেন তার গলা থেকে ইসলামের রজ্জু খুলে ফেলল।"









আল-জামি` আল-কামিল (15404)


15404 - عن أبي ذر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"كيف أنتم وأئمة من بعدي يستأثرون بهذا الفيء؟" قلت: إذن، والذي بعثك بالحق أضع سيفي على عاتقي ثم أضرب به حتى ألقاك أو ألحقك قال:"أولا أدلك على خير من ذلك؟ تصبر حتى تلقاني".

حسن: رواه أبو داود (4759)، وأحمد (21558) كلاهما من طريق زهير (هو ابن معاوية)، حدّثنا مطرف بن طريف، عن أبي الجهم (وهو سليمان بن الجهم)، عن خالد بن وهبان، عن أبي ذر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل خالد بن وهبان كما سبق.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা কেমন হবে যখন আমার পরের ইমামগণ (নেতৃবৃন্দ) এই ফাই’ (গণিমত বা রাষ্ট্রীয় সম্পদ) নিজেদের জন্য কুক্ষিগত করে নেবে?” আমি বললাম: “তাহলে, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে প্রেরণ করেছেন, তাঁর কসম! আমি আমার তরবারি কাঁধে রাখব এবং তা দিয়ে আঘাত করতে থাকব যতক্ষণ না আমি আপনার সাথে মিলিত হই অথবা আপনাকে অনুসরণ করি (মৃত্যুবরণ করি)।” তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি কি তোমাকে এর চেয়ে উত্তম কিছুর সন্ধান দেব না? তুমি ধৈর্য ধারণ করবে যতক্ষণ না আমার সাথে তোমার সাক্ষাৎ হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (15405)


15405 - عن ابن عمر أن عمر بن الخطاب خطب بالجابية فقال: قام فينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مقامي فيكم فقال:"استوصوا بأصحابي خيرًا، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم، ثم يفشو الكذب حتى إن الرجل ليبتدئ بالشهادة قبل أن يسألها، وباليمين قبل أن
يسألها، فمن أراد منكم بُحْبُوحة الجنة فليلزمْ الجماعة، فإن الشيطان مع الواحد، وهو من الاثنين أبعد، ولا يَخْلُوَنَّ أحدكم بامرأة؛ فإن الشيطان ثالثهما، ومن سرته حسنتُه وساءته سيئتُه فهو مؤمن".

صحيح: رواه أحمد (114)، وابن حبان (7254)، والحاكم (1/ 113) كلهم من طريق عبد اللَّه بن المبارك، أنا محمد بن سوقة، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.

ورواه الترمذيّ (2165) عن أحمد بن منيع، ثنا النضر بن إسماعيل، عن محمد بن سوقة به.

وقال:"هذا حديث حسن صحيح غريب من هذا الوجه، وقد رواه ابن المبارك عن محمد بن سوقة، وقد روي هذا الحديث من غير وجه عن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم. أي موصولا" اهـ.

ولكن رجّح أبو زرعة وأبو حاتم والدارقطني المرسل، والحكم لمن وصل.




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জাবিয়াহ নামক স্থানে এক খুতবা প্রদানকালে বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের মাঝে আমার এই স্থানে দাঁড়িয়েছিলেন, যেখানে আমি তোমাদের মাঝে দাঁড়িয়েছি, অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা আমার সাহাবিদের সাথে ভালো ব্যবহার করবে, অতঃপর যারা তাদের পরে আসবে, অতঃপর যারা তাদের পরে আসবে। অতঃপর মিথ্যাচার প্রসারিত হবে, এমনকি মানুষ সাক্ষ্য চাওয়ার আগেই সাক্ষ্য প্রদান করবে এবং শপথ চাওয়ার আগেই শপথ করবে। সুতরাং তোমাদের মধ্যে যে জান্নাতের মধ্যবর্তী স্থানে থাকতে চায়, সে যেন জামা'আ (মুসলিম সমাজ) কে আঁকড়ে ধরে। কেননা শয়তান একাকী ব্যক্তির সাথে থাকে, আর সে দুজন থেকে দূরে থাকে। আর তোমাদের কেউ যেন কোনো নারীর সাথে নির্জনে না থাকে; কেননা শয়তান তাদের তৃতীয়জন হয়। আর যাকে তার নেক আমল আনন্দিত করে এবং তার মন্দ আমল ব্যথিত করে, সে-ই প্রকৃত মু'মিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (15406)


15406 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يجمع اللَّه أمتي -أو قال: -"هذه الأمة على الضلالة أبدًا، ويد اللَّه على الجماعة".

حسن: رواه الحاكم (1/ 115)، من وجهين: عن سلمة بن شعيب والعباس بن عبد العظيم - كلاهما عن عبد الرزاق، أبنأ إبراهيم بن ميمون، أخبرني عبد اللَّه بن طاوس، أنّه سمع أباه يحدث، أنه سمع ابن عباس يحدث أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.

ورواه أيضًا الترمذيّ (2166) عن يحيى بن موسى، قال: حدّثنا عبد الرزاق، فذكره بإسناده. ولفظه:"يد اللَّه مع الجماعة".

وقال:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه من حديث ابن عباس إلا من هذا الوجه".

قلت: وهو كما قال؛ فإنّ إبراهيم بن ميمون الصنعاني -ويقال: الزبيدي- حسن الحديث. ووثّقه ابن معين، وذكره ابن حبان في الثقات.

والكلام عليه مبسوط في تفسير سورة النساء




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা আমার উম্মতকে – অথবা তিনি বলেছেন – এই উম্মতকে চিরকাল গোমরাহীর (বিপথগামিতার) উপর একত্রিত করবেন না। আর আল্লাহর হাত (সাহায্য) জামা‘আতের (ঐক্যবদ্ধ দলের) উপর রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15407)


15407 - عن أبي هريرة قال قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ستكون فِتَنٌ، القاعد فيها خير من القائم، والقائم فيها خير من الماشي، والماشي فيها خير من الساعي، ومن يُشْرف لها تَسْتَشْرِفْه، ومن وجد ملجأً أو معاذًا فَلْيَعُذْ به".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3601)، ومسلم في الفتن (2886) كلاهما من حديث صالح ابن كيسان، عن ابن شهاب، عن ابن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن أن أبا هريرة قال: فذكره.

ورواه مسلم أيضًا من وجه آخر عن أبي سلمة، عن أبي هريرة بلفظ:"تكون فتنة، النائم فيها خير من اليقظان، واليقظان فيها خير من القائم، والقائم فيها خير من الساعي، فمن وجد ملجأً أو
معاذًا فليستعذ".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "অচিরেই ফিতনাসমূহ দেখা দেবে। তাতে উপবিষ্ট ব্যক্তি দাঁড়িয়ে থাকা ব্যক্তির চেয়ে উত্তম। আর দাঁড়িয়ে থাকা ব্যক্তি হেঁটে যাওয়া ব্যক্তির চেয়ে উত্তম। আর হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি দৌড়ে যাওয়া ব্যক্তির চেয়ে উত্তম। আর যে ব্যক্তি তার প্রতি উঁকি দেবে (আগ্রহ দেখাবে), ফিতনা তাকে গ্রাস করে নেবে। অতএব, যে ব্যক্তি কোনো আশ্রয়স্থল বা রক্ষা পাওয়ার স্থান খুঁজে পাবে, সে যেন সেটির আশ্রয় গ্রহণ করে।"