হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (15408)


15408 - عن نوفل بن معاوية أنه ذكر الحديث مثل حديث أبي هريرة هذا، إلا أن أبا بكر زاد فيه:"من الصلاة صلاةٌ، من فاتَتْه فكأنما وُتِرَ أهلَه وماله".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المناقب (3602)، ومسلم في الفتن (2886) كلاهما عن صالح ابن كيسان، عن ابن شهاب، قال: حدثني أبو بكر بن عبد الرحمن بن الحارث، عن عبد الرحمن ابن مطيع بن الأسود، عن نوفل بن معاوية، ولم يسوقا لفظ الحديث، وإنما ذكرا فقط ما زاده أبو بكر من ذكر الصلاة.

ومعاوية بن نوفل من مسلمة الفتح ليس له في البخاري غير هذا الحديث، مات بالمدينة، وعمره مائة وعشرون سنة، وهو ممن عاش في الجاهلية ستين سنة، وفي الإسلام ستين سنة.

وسبق ذكر هذا الحديث في كتاب الصلاة، باب إثم من فاتتْه صلاة العصر.




নওফল ইবনে মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসের অনুরূপ একটি হাদীস উল্লেখ করেছেন। তবে আবূ বকর এতে বাড়িয়ে বলেছেন: “সালাতসমূহের মধ্যে একটি সালাত রয়েছে; যে ব্যক্তি তা ফউত করলো, সে যেন তার পরিবার ও তার সম্পদ হারালো।”









আল-জামি` আল-কামিল (15409)


15409 - عن عثمان الشحام قال: انطلقت أنا وفرقد السَّبَخِي إلى مسلم بن أبي بكرة وهو في أرضه، فدخلنا عليه، فقلنا: هل سمعتَ أباك يحدث في الفتن حديثا؟ قال: نعم، سمعت أبا بكرة يُحدّثُ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنها ستكون فتن، ألا ثم تكون فتنة، القاعد فيها خير من الماشي فيها، والماشي فيها خير من الساعي إليها، ألا فإذا نزلتْ أو وقعتْ فمن كان له إبل فَلْيَلْحَقْ بإبله، ومن كانت له غنم فَلْيَلْحَقْ بغنمه، ومن كانت له أرض فَلْيَلْحَقْ بأرضه" قال: فقال رجل: يا رسول اللَّه، أرأيت من لم يكن له إبل ولا غنم ولا أرض؟ قال:"يعمد إلى سيفه، فيدقُّ على حَدِّه بحجر، ثم لينجُ إن استطاع النجاء، اللهم هل بلغت؟ اللهم هل بلغت؟ اللهم هل بلغت؟" قال: فقال رجل: يا رسول اللَّه، أرأيت إن أُكْرِهْتُ حتى يُنْطلق بي إلى أحد الصفين أو إحدى الفئتين، فضربني رجل بسيفه، أو يجيء سهم فيقتلني؟ قال:"يبوءُ بإثمِه وإثمِك، ويكون من أصحاب النار".

صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2887) عن أبي كامل الجحدري فضيل بن حسين، حدّثنا حماد بن زيد، حدّثنا عثمان الشحام، فذكره.




আবু বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই এমন ফিতনা আসবে। শুনে রাখো, এরপর এক ফিতনা দেখা দেবে, যেখানে উপবিষ্ট ব্যক্তি হেঁটে যাওয়া ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে এবং হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি তার দিকে দ্রুত ধাবিত হওয়া ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে। সাবধান! যখন তা সংঘটিত হবে বা নেমে আসবে, তখন যার উট রয়েছে, সে যেন তার উটের কাছে চলে যায়। আর যার ছাগল (বা ভেড়া) রয়েছে, সে যেন তার ছাগলের কাছে চলে যায়। আর যার জমি রয়েছে, সে যেন তার জমির সাথে যুক্ত থাকে (কৃষিকাজে মনোযোগ দেয়)।"

বর্ণনাকারী বলেন, তখন একজন লোক জিজ্ঞেস করল, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি মনে করেন যার উট, ছাগল বা জমি কিছুই নেই (সে কী করবে)? তিনি বললেন: "সে যেন তার তলোয়ারের দিকে লক্ষ্য করে এবং পাথরের মাধ্যমে তার ধার ভোঁতা করে ফেলে। এরপর সে যদি মুক্তি পেতে সক্ষম হয়, তবে যেন মুক্তি লাভ করে। হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি? হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি? হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি?"

বর্ণনাকারী বলেন, তখন অন্য একজন লোক বলল, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি মনে করেন যদি আমাকে বাধ্য করা হয়, এমনকি আমাকে দুই দলের কোনো একটির দিকে নিয়ে যাওয়া হয়, অতঃপর এক লোক আমাকে তার তলোয়ার দ্বারা আঘাত করে, অথবা একটি তীর এসে আমাকে হত্যা করে? তিনি বললেন: "সে তার পাপ এবং তোমার পাপের বোঝা নিয়ে ফিরবে এবং সে জাহান্নামের অধিবাসী হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15410)


15410 - عن سعد بن أبي وقاص قال عند فتنة عثمان بن عفان: أشهد أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنها ستكون فتنة، القاعد فيها خير من القائم، والقائم خير من الماشي، والماشي خير من الساعي، قال: أفرأيت إن دخل علي بيتي وبسط يده إلي ليقتلني قال:"كن كابن آدم".

حسن: رواه الترمذيّ (2194)، وأحمد (1609) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا الليث بن
سعد، عن عياش بن عباس، عن بكير بن عبد اللَّه بن الأشج، عن بسر بن سعيد، أن سعد بن أبي وقاص قال: فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن".

قلت: وهو كذلك، والكلام عليه مبسوط في تفسير سورة المائدة.




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি উসমান ইবনু আফ্‌ফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফিতনার সময় বলেছেন: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই একটি ফিতনা সংঘটিত হবে। তাতে যে উপবিষ্ট, সে দাঁড়ানো ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম; দাঁড়ানো ব্যক্তি চলমান ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম; আর চলমান ব্যক্তি দ্রুত ধাবমান ব্যক্তি অপেক্ষা উত্তম।" সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি বলুন, যদি কেউ আমার ঘরে প্রবেশ করে এবং আমাকে হত্যা করার জন্য আমার দিকে হাত বাড়ায়? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আদম (আঃ)-এর পুত্রের মতো হয়ে যাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (15411)


15411 - عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن بين يدي الساعة فتنا كقطع الليل المظلم، يُصبح الرجل فيها مؤمنًا ويُمسي كافرًا، ويُمسي مؤمنًا ويصبح كافرًا، القاعد فيها خير من القائم، والماشي فيها خير من الساعي، فكسروا قِسِيّكم، وقَطِّعوا أوتارَكم، واضربوا سيوفَكم بالحجارة، فإن دخل -يعني على أحد منكم- فليكن كخير ابني آدم".

حسن: رواه أبو داود (4259)، والترمذي (2204)، وابن ماجه (3961)، وأحمد (19730)، وصحّحه ابن حبان (5962) كلهم من طريق محمد بن جحادة، عن عبد الرحمن بن ثروان، عن هزيل بن شرحبيل، عن أبي موسى، فذكره.

وذكره الترمذيّ مختصرًا وقال:"هذا حديث حسن غريب".

قلت: وهو كما قال؛ فإن عبد الرحمن بن ثروان حسن الحديث.

ورواه أبو داود (4262)، وأحمد (19662)، والحاكم (4/ 440) كلهم من طريق عبد الواحد ابن زياد، حدّثنا عاصم الأحول، عن أبي كبشة قال: سمعت أبا موسى يقول: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن بين أيديكم فتنا كقطع الليل المظلم، يُصبح الرجل فيها مؤمنًا ويُمسي كافرًا، ويُمسي مؤمنا ويُصبح كافرًا، القاعد فيها خير من القائم، والقائم فيها خير من الماشي، والماشي فيها خير من الساعي، قالوا: فما تأمرنا؟ قال:"كونوا أحلاس بيوتكم".

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

قلت: أبو كبشة هو السدوسي لا يعرف له راو غير عاصم الأحول، ولم يوثقه أحد، ولذا قال الذهبي في الميزان:"لا يعرف" إلا أنه توبع في الإسناد الأول.

وقوله:"كونوا أحلاس بيوتكم"، والأحلاس جمع حِلْس، وهو الكساء الذي يلي ظهر البعير تحت القتب، شبّهها للزومها ودوامها، فقوله: كونوا أحلاس البيت أي الزموها ملازمة الفراش.




আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই কিয়ামতের আগে এমন ফিতনা আসবে যা ঘোর অন্ধকার রাতের খণ্ডের মতো হবে। সেই ফিতনার সময় মানুষ সকালে মুমিন হবে আর সন্ধ্যায় কাফের হয়ে যাবে, আর সন্ধ্যায় মুমিন হবে আর সকালে কাফের হয়ে যাবে। যে তাতে বসে থাকবে, সে দাঁড়িয়ে থাকা ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে, আর যে হেঁটে চলবে, সে দৌড়াতে থাকা ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে। সুতরাং তোমরা তোমাদের ধনুকগুলো ভেঙে ফেলো এবং এর রশিগুলো ছিঁড়ে ফেলো, আর তোমাদের তরবারিগুলোকে পাথর দ্বারা আঘাত করে (অকেজো) করে দাও। যদি (যুদ্ধ বা ফিতনা) তোমাদের কারো উপর প্রবেশ করে, তবে সে যেন আদম (আঃ)-এর দুই পুত্রের মধ্যে উত্তম জনের মতো হয়ে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (15412)


15412 - عن عُديسة ابنة وُهْبان بن صيفي أنها كانت مع أبيها في منزله فمرض، فأفاق من مرضه ذلك، فقام علي بن أبي طالب بالبصرة، فأتاه في منزله حتى قام على باب حجرته، فسلّم ورد عليه الشيخُ السلام، فقال له عليٌّ: كيف أنت يا أبا مسلم؟ قال: بخير، فقال عليٌّ: ألا تخرج معي إلى هؤلاء القوم فتُعينَني؟ قال: بلى إن رضيتَ بما
أُعطيك، قال عليٌّ: وما هو؟ فقال الشيخ: يا جارية هاتِ سيفي، فأخرجتْ إليه غِمدًا فوضعتْه في حجره، فاستلَّ منه طائفةً، ثم رفع رأسه إلى عليٍّ، فقال: إن خليلي عليه السلام وابن عمك عهد إلي: إذا كانت فتنةٌ بين المسلمين أن أَتّخِذَ سيفا من خشبٍ، فهذا سيفي، فإن شئتَ خرجتُ به معك، فقال عليٌّ: لا حاجة لنا فيك ولا فى سيفك، فرجع من باب الحجرة ولم يدخل.

حسن: رواه الترمذيّ (2203)، وابن ماجه (3960)، وأحمد (20670) كلهم من طريق عبد اللَّه بن عبيد مؤذن مسجد جردان، عن عُديسة بنت وُهبان، فذكرته. والسياق لأحمد.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب، لا نعرفه إلا من حديث عبد اللَّه بن عبيد".

قلت: عبد اللَّه هذا ثقة، وقد توبع، فقد رواه أحمد (27199) من طريق عبد الكبير بن الحكم الغفاري وعبد اللَّه بن عبيد، عن عُديسة نحوه.

ومدار الإسناد على عُديسة بنت وُهبان الغفارية، وهي تابعية، وابنة صحابي، روى عنها جمع، ولم يتكلم فيها أحد بجرح أو تعديل، فحديثها حسن، وقد توبع.

رواه الطبراني في الكبير (1/ 273) من طريق يحيى بن زهدم بن الحارث الغفاري، عن أبيه، عن أهبان بن صيفي نحوه.

ويحيى بن زهدم بن الحارث الغفاري ضعيف لكنه لم يتهم إلا في روايته عن أبيه، عن العرس ابن عميرة، وزهدم بن الحارث متكلم فيه أيضًا، وهما مترجمان في اللسان.

وُهبان بن صيفي، ويقال أيضًا: أهبان بن صيفي الغفاري، وبه ترجم الحافظ في التقريب.




উদাইসা বিনত উহবান ইবনু ছাইফি থেকে বর্ণিত, তিনি তার পিতার সাথে তার ঘরে ছিলেন। তার পিতা অসুস্থ হয়ে পড়েন। পরে তিনি সে অসুস্থতা থেকে সুস্থ হয়ে উঠলেন। যখন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসরায় অবস্থান করছিলেন, তখন তিনি তার পিতার বাড়িতে আসলেন এবং কক্ষের দরজার সামনে দাঁড়িয়ে গেলেন। তিনি সালাম দিলেন। তখন সেই বৃদ্ধ লোকটি সালামের জবাব দিলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: "হে আবু মুসলিম, কেমন আছেন?"

তিনি বললেন: "ভালো আছি।" তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আপনি কি আমার সাথে এই কওমের (বিদ্রোহী গোষ্ঠীর) বিরুদ্ধে বের হবেন না এবং আমাকে সাহায্য করবেন না?"

তিনি বললেন: "হ্যাঁ, যদি আপনি আমি যা দেব তাতে সন্তুষ্ট থাকেন।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "সেটা কী?" তখন বৃদ্ধ লোকটি বললেন: "ওগো বালিকা, আমার তরবারি নিয়ে এসো!" মেয়েটি তখন তার কাছে একটি খাপ বের করে আনল এবং তা তার কোলের উপর রাখল। তিনি তা থেকে একটি অংশ বের করলেন (যা কাঠের ছিল)। এরপর তিনি আলীর দিকে মাথা তুলে বললেন: "নিশ্চয়ই আমার বন্ধু (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিনি আপনার চাচাতো ভাই, আমার কাছে অঙ্গীকার করেছিলেন যে, যখন মুসলমানদের মধ্যে ফিতনা দেখা দেবে, তখন যেন আমি কাঠের তরবারি বানিয়ে নিই। এটাই হলো আমার তরবারি। যদি আপনি চান, তবে আমি এটি নিয়ে আপনার সাথে বের হব।" তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আপনার বা আপনার তরবারির কোনো প্রয়োজন আমাদের নেই।" এরপর তিনি কক্ষের দরজা থেকেই ফিরে গেলেন এবং ভেতরে প্রবেশ করলেন না।









আল-জামি` আল-কামিল (15413)


15413 - عن أبي بردة قال: مررت بالربذة، فإذا فسطاط، فقلت: لمن هذا؟ فقيل: لمحمد بن مسلمة، فاستأذنت عليه، فدخلت عليه، فقلت: رحمك اللَّه، إنك من هذا الأمر بمكان، فلو خرجت إلى الناس، فأمرت ونهيت فقال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنه ستكون فتنة وفرقة واختلاف، فإذا كان ذلك، فأت بسيفك أحُدًا، فاضرب به عُرْضَه، واكسِرْ نَبْلَك، واقْطع وَتَرَك، واجلس في بيتك"، فقد كان ذلك.

وقال يزيد مرة:"فاضرب به حتى تقطعه، ثم اجلس في بيتك حتى تأتيك يدٌ خاطئة، أو يُعافيك اللَّه عز وجل"، فقد كان ما قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وفعلتُ ما أمرني به، ثم استنزل سيفًا كان معلقًا بعمود الفُسطاط فاخْترطَه، فإذا سيف من خشب فقال: قد فعلتُ ما أمرني به رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، واتخذت هذا، أرهب به الناس.

حسن: رواه أحمد (16029) عن يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن أبي بردة، فذكره.
ورواه ابن ماجه (16029) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا يزيد بن هارون، عن حماد بن سلمة، عن ثابت أو علي بن زيد بن جدعان -شك أبو بكر- عن أبي بردة، فذكره مختصرًا.

قلت: الحديث حديث علي بن زيد بن جدعان، وذكر ثابت في هذا الإسناد خطأ، فقد رواه أحمد عن يزيد بن هارون به، وسماه: علي بن زيد بدون شك.

وكذلك رواه عفان بن مسلم ومؤمل بن إسماعيل كلاهما عن حماد بن سلمة، عن علي بن زيد به دون شك.

وعلي بن زيد بن جدعان ضعيف.

ولكن روي هذا الحديث بإسناد آخر وهو ما رواه أحمد (17979) عن زيد بن الحباب قال: أخبرني سهل بن أبي الصلت قال: سمعت الحسن يقول: إن عليا بعث إلى محمد بن مسلمة فجيء به، فقال: ما خَلَّفك عن هذا الأمر، قال: دفع إلي ابن عمك يعني النبي صلى الله عليه وسلم سيفا، فقال:"قاتل به ما قوتل العدو، فإذا رأيت الناس يقتل بعضهم بعضا، فاعمد به إلى صخرة، فاضربه بها، ثم الزم بيتك حتى تأتيك منية قاضية أو يدٌ خاطئة. قال: خلوا عنه".

ورجال إسناده لا بأس به، والحسن لم يسمع من عليٍّ ولا من محمد بن مسلمة إلا أنه يقوّي ما قبله.




মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ বুরদাহ বলেন, আমি রাবাযা নামক স্থান দিয়ে যাওয়ার সময় একটি তাঁবু দেখতে পেলাম। আমি জিজ্ঞাসা করলাম, এটা কার তাঁবু? লোকেরা বলল, এটা মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর। আমি অনুমতি চাইলে তিনি অনুমতি দিলেন এবং আমি তাঁর কাছে প্রবেশ করে বললাম, আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন। এই ফিতনার বিষয়ে আপনি একটি গুরুত্বপূর্ণ স্থানে আছেন। আপনি কেন লোকদের মাঝে বেরিয়ে এসে সৎকাজের আদেশ ও অসৎকাজের নিষেধ করছেন না?

তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই ফিতনা, বিভেদ এবং মতপার্থক্য সৃষ্টি হবে। যখন এমন পরিস্থিতি সৃষ্টি হয়, তখন তোমার তলোয়ার নিয়ে উহুদ পাহাড়ে যাও, সেটির একপাশে আঘাত করে তলোয়ারটি ভেঙে ফেলো, তোমার তীরগুলো ভেঙে ফেলো, তোমার ধনুকের ছিলা কেটে ফেলো এবং তোমার ঘরে বসে থাকো।" তিনি বললেন, সেই ফিতনা ইতোমধ্যে সংঘটিত হয়েছে।

ইয়াযিদ (বর্ণনাকারী) কোনো এক সময় বর্ণনা করতে গিয়ে বলেন: "(রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন) 'তুমি তলোয়ারটি এমনভাবে আঘাত করো যেন তা কেটে যায় (ভেঙে যায়), এরপর তুমি তোমার বাড়িতে বসে থাকো, যতক্ষণ না কোনো ভুলকারী হাত তোমার কাছে এসে পৌঁছায় অথবা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল তোমাকে নিরাপত্তা দেন।'" মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা বলেছিলেন, তা সংঘটিত হয়েছে এবং তিনি আমাকে যা আদেশ করেছিলেন, আমি তা পালন করেছি। অতঃপর তিনি তাঁবুর খুঁটির সাথে ঝুলন্ত একটি তলোয়ার নামিয়ে এনে খাপ থেকে বের করলেন। দেখা গেল, সেটি একটি কাঠের তলোয়ার। তিনি বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যা আদেশ করেছিলেন, আমি তা করেছি এবং আমি এটি প্রস্তুত করেছি যেন এর মাধ্যমে আমি লোকদের ভয় দেখাতে পারি।

(অন্য এক সূত্রে বর্ণিত আছে): হাসান (রহ.) বলেন, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তলব করলেন এবং তিনি এলে তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, আপনি কেন এই (যুদ্ধের) বিষয়টি থেকে দূরে থাকলেন? তিনি বললেন, আপনার চাচাতো ভাই (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে একটি তলোয়ার দিয়ে বলেছিলেন: "যতদিন শত্রুর বিরুদ্ধে যুদ্ধ চলবে, ততদিন তা দিয়ে যুদ্ধ করো। কিন্তু যখন তুমি দেখবে লোকেরা একে অপরকে হত্যা করছে, তখন তুমি সেটি নিয়ে একটি পাথরের কাছে যাও এবং তা দিয়ে পাথরে আঘাত করো (ভেঙে ফেলো)। এরপর তুমি তোমার ঘরে অবস্থান করো যতক্ষণ না তোমার নির্ধারিত মৃত্যু আসে অথবা কোনো ভুলকারী হাত (তোমাকে হত্যা করে)।" আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তাকে ছেড়ে দাও।









আল-জামি` আল-কামিল (15414)


15414 - عن عبد اللَّه بن أبي أوفى قال: أوصاني أبو القاسم،"إن أنا أدركت شيئًا من هذه (يعني الفتن) أن أعمد إلى أُحُدٍ، فأكْسِرَ سيفي، وأقعدَ في بيتي، فإن دُخل علي في بيتي، قال: اقعُدْ في مخدعك، فإن دُخل عليك فاجثو على ركبتيك، وتقول: بؤ بإثمي وإثمك فتكون من أصحاب النار، وذلك جزاء الظالمين"، فقد كسرتُ سيفي، فإذا دخل علي بيتي دخلتُ مخدعي، فإذا دخل عليَّ مخدعي جثوتُ على ركبتي، وقلت ما قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن أقول.

حسن: رواه البزار (3377) عن إبراهيم بن عبد اللَّه، قال: أخبرنا بشر بن محمد بن أبان، قال: أخبرنا زياد بن أبي مسلم أبو عمر الصفار، قال: سمعت أبا الأشعث الصنعاني، يقول: بعثني يزيد ابن معاوية إلى عبد اللَّه بن أبي أوفى فقدمت ومعي ناس من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقلت: ما تأمرون به الناس؟ فقال: أوصاني أبو القاسم، فذكره.

وبشر بن محمد بن أبان فيه كلام يسير، قال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، وقد توبع في الجملة، فرواه أحمد (171982) عن عبد الصمد، حدّثنا زياد بن مسلم أبو عمر، حدّثنا أبو الأشعث الصنعاني قال: بعثنا يزيد بن معاوية إلى ابن الزبير، فلما قدمت المدينة دخلت على فلان -نسي زياد اسمه- فقال: إن الناس قد صنعوا ما صنعوا، فما ترى؟ فقال: أوصاني خليلي أبو القاسم، فذكر نحوه.

وإسناده حسن من أجل زياد بن أبي مسلم الصفار فإنه حسن الحديث ما لم يأت بما ينكر عليه.
والصحابي الذي نسي اسمه هو عبد اللَّه بن أبي أوفى كما في حديث البزار.

وقوله:"بعثني يزيد بن معاوية إلى عبد اللَّه بن أبي أوفى"، الصحيح أن بعثه كان إلى ابن الزبير في مكة، وكان ذاهبا إلى مكة فمرَّ بالمدينة، ولقي عبد اللَّه بن أبي أوفى وسمع منه هذا الحديث.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবুল কাসিম (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অসিয়ত করেছিলেন, 'যদি আমি এই বিষয়গুলোর (অর্থাৎ ফিতনাগুলোর) কোনো কিছু পাই, তবে আমি যেন উহুদের দিকে যাই, অতঃপর আমার তরবারি ভেঙে ফেলি এবং আমার বাড়িতে বসে থাকি।' যদি আমার বাড়িতে প্রবেশ করা হয়, [রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম] বলেন: 'তুমি তোমার গোপন কক্ষে বসে থাকো। আর যদি তোমার গোপন কক্ষেও প্রবেশ করা হয়, তবে হাঁটু গেড়ে বসে পড়ো এবং বলো: 'তুমি আমার পাপ এবং তোমার পাপের বোঝা নিয়ে যাও, ফলে তুমি জাহান্নামের অধিবাসী হবে, আর এটাই জালিমদের প্রতিদান।' আব্দুল্লাহ ইবনে আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: 'আমি আমার তরবারি ভেঙে ফেলেছি। যদি আমার বাড়িতে কেউ প্রবেশ করে, তবে আমি আমার গোপন কক্ষে প্রবেশ করি। আর যদি আমার গোপন কক্ষেও কেউ প্রবেশ করে, তবে আমি হাঁটু গেড়ে বসে পড়ি এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যা বলতে বলেছিলেন, তাই বলি।'









আল-জামি` আল-কামিল (15415)


15415 - عن جندب بن سفيان -رجل من بَجيلة- قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ستكون بعدي فتنٌ كقطع الليل المظلم، تصدم الرجل كصدم جباه فحول الثيران، يُصبح الرجل فيها مسلمًا ويُمسي كافرًا، ويُمسي مسلمًا ويُصبح كافرًا"، فقال رجل من المسلمين، يا رسول اللَّه! فكيف نصنع عند ذلك؟ قال:"ادخلوا بيوتَكم واخْمِلوا ذكركم"، قال رجل من المسلمين: أفرأيت إن دُخل على أحدنا بيته؟ قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فليمسك بيديه، وليكن عبد اللَّه المقتول، ولا يكن عبد اللَّه القاتل، فإن الرجل يكون في قبة الإسلام فيأكل مال أخيه، ويسفك دمه، ويعصي ربه، ويكفر بخالقه، فتجب له جهنم".

حسن: رواه ابن أبي شيبة (38585)، وأبو يعلى (1523)، والطبراني في الكبير (1724) كلهم من طريق عبد الحميد بن بهرام، عن شهر بن حوشب قال: حدثني جندب بن سفيان، فذكره.

وإسناده حسن من أجل شهر بن حوشب فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث ما لم يتبين خلافه.

وعبد الحميد بن بهرام أيضًا صدوق وهو من أخص أصحاب شهر بن حوشب، وقد حسّنه أيضًا ابن حجر في المطالب العالية (4341).

وجندب بن سفيان هو: جندب بن عبد اللَّه بن سفيان، وقد ينسب على جده وهو البجلي. انظر ترجمته في الإصابة (1231).




জন্দুব ইবনু সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার পরে ঘোর অন্ধকার রাতের টুকরোগুলির মতো ফিতনা (বিপর্যয়) দেখা দেবে। তা একজন মানুষকে আঘাত করবে, যেমন ষাঁড়ের কপালে কপাল আঘাত করে। তাতে একজন মানুষ সকালে মুসলিম অবস্থায় থাকবে এবং সন্ধ্যায় কাফিরে পরিণত হবে, আর সন্ধ্যায় মুসলিম অবস্থায় থাকবে এবং সকালে কাফিরে পরিণত হবে।" তখন মুসলিমদের মধ্য থেকে একজন লোক জিজ্ঞেস করল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! সেই সময় আমাদের কী করা উচিত? তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের ঘরে প্রবেশ করো এবং তোমাদের আলোচনা (খ্যাতি) গোপন করো।" মুসলিমদের মধ্য থেকে একজন লোক বলল: আপনি কি মনে করেন, যদি আমাদের কারো ঘরে প্রবেশ করা হয় (আক্রমণ করা হয়)? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যেন তার দু'হাত গুটিয়ে রাখে এবং আল্লাহর সেই বান্দা হোক যে নিহত হয়েছে, কিন্তু আল্লাহর সেই বান্দা না হোক যে হত্যাকারী হয়েছে। কারণ, কোনো মানুষ ইসলামের ছত্রছায়ায় থেকেও তার ভাইয়ের সম্পদ গ্রাস করে, তার রক্ত ঝরায়, তার রবের অবাধ্য হয় এবং তার সৃষ্টিকর্তাকে অস্বীকার করে (কুফরী করে), ফলে তার জন্য জাহান্নাম ওয়াজিব হয়ে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (15416)


15416 - عن أبي جمرة، عن ابن عباس: أن النبي صلى الله عليه وسلم أعطى محمد بن مسلمة سيفا، فقال:"قاتل المشركين ما قوتلوا، فإذا رأيت سيفين اختلفا بين المسلمين فاضرب حتى ينثلم، واقعد في بيتك حتى تأتيك منية قاضية، أو يد خاطئة".

قال أبو جمرة: ثم أتيت ابن عمر فحذا لي على مثله عن النبي صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه الطبراني في الكبير (12/ 230) عن العباس بن الفضل الأسفاطي، ثنا أبو الوليد الطيالسي، ثنا ثواب بن عتبة، عن أبي جمرة، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل ثواب بن عتبة فإنه حسن الحديث ما لم يأت بما ينكر عليه، والعباس بن الفضل صدوق حسن الحديث أيضًا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে একটি তলোয়ার দিলেন এবং বললেন: "যতক্ষণ মুশরিকরা তোমাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করে, ততক্ষণ তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করো। আর যখন তুমি দেখবে মুসলিমদের মধ্যে দুটি তলোয়ার (দুটি দল) মতভেদ করছে, তখন (তোমার) তলোয়ারটিকে আঘাত করতে থাকো যতক্ষণ না তা ভেঙে যায়, এবং তুমি তোমার ঘরে বসে থাকো, যতক্ষণ না তোমার নিশ্চিত মৃত্যু অথবা কোনো ভুল হাত (আক্রমণ) তোমার কাছে আসে।" আবু জামরাহ বলেন: অতঃপর আমি ইবনে উমরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলাম। তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এর অনুরূপ (হাদিস) আমাকে বর্ণনা করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (15417)


15417 - عن محمد بن مسلمة قال: قال رسول اللَّه:"يا محمد، إذا رأيت الناس يقتتلون على الدنيا، فاعمدْ بسيفك إلى أعظم صخرة في الحرة، فاضربْ بها حتى ينكسر، ثم اجلس في بيتك حتى تأتيك يد خاطئة، أو منية قاضية"، ففعلت ما أمرني به النبي صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (1311)، وفي الصغير (1/ 144) كلاهما من طريق محمد ابن مسلمة المخزومي قال: حدثني محمد بن إبراهيم بن دينار، قال: حدثني عبيد اللَّه بن عمر، عن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن محمد بن مسلمة، فذكره.

قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن عبيد اللَّه إلا محمد تفرد به محمد بن مسلمة".

قلت: رجاله كلهم ثقات، والإسناد صحيح. قال الهيثمي في المجمع (7/ 300 - 301):"رجاله ثقات". وللحديث طرق أخرى (19979) إلا أن فيه انقطاعًا.

وفي الباب عن عبد الرحمن بن سمرة قال: كنت آخذًا بيد ابن عمر في طريق من طرق المدينة، إذ أتى على رأس منصوب قال: شقي قاتلُ هذا، فلما مضى قال: وما أرى هذا إلا قد شقي، سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من مشى إلى رجل من أمتي ليقتله فليقل هكذا -يعني فليمد عنقه- فالقاتل في النار، والمقتول في الجنة".

رواه أبو داود (4260)، وأحمد (5708) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن رقبة بن مصقلة، عن عون بن أبي جحيفة، عن عبد الرحمن بن سمرة قال: فذكره.

وعبد الرحمن بن سمرة اختلف في اسم أبيه فقيل: سمرة، وقيل: سمير، وقيل: سميرة، ولم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعه ولم أجد له متابعا.




মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে মুহাম্মাদ, যখন তুমি দেখবে মানুষ দুনিয়ার জন্য মারামারি করছে, তখন তোমার তলোয়ার নিয়ে হাররাহ (পাথুরে ভূমি)-এর সবচেয়ে বড় পাথরের দিকে যাও এবং সেটি দিয়ে আঘাত করো যতক্ষণ না তা ভেঙে যায়। এরপর তুমি তোমার বাড়িতে বসে থাকো, যতক্ষণ না কোনো ভুলকারী হাত তোমার দিকে আসে অথবা নির্ধারিত মৃত্যু এসে যায়।" মুহাম্মাদ ইবনে মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর আমি তাই করলাম যা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে নির্দেশ দিয়েছিলেন।

আর এই বিষয়ে আব্দুল রহমান ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: আমি মদীনার পথের মধ্য দিয়ে ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরে যাচ্ছিলাম। এমন সময় আমরা একটি কর্তিত (খুঁটিতে স্থাপিত) মাথার পাশ দিয়ে গেলাম। তিনি (ইবনে উমার) বললেন: এর হত্যাকারী হতভাগা। যখন আমরা এগিয়ে গেলাম, তিনি বললেন: আমার মনে হয় না যে এই লোকটি হতভাগা হয়নি। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আমার উম্মতের কোনো লোককে হত্যার উদ্দেশ্যে হেঁটে যায়, সে যেন এরূপ বলে—অর্থাৎ, সে যেন তার গর্দান বাড়িয়ে দেয়—কারণ হত্যাকারী জাহান্নামে যাবে এবং নিহত ব্যক্তি জান্নাতে যাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15418)


15418 - عن عمرو بن وابصة الأسدي، عن أبيه قال: إني لبالكوفة في داري إذ سمعت على باب الدار: السلام عليكم أألج؟ قلت: وعليك السلام، فَلِجْ، فلما دخل إذا هو عبد اللَّه بن مسعود، قال: فقلت: يا أبا عبد الرحمن أية ساعه زيارة هذه -وذلك في نحر الظهيرة- قال: طال علي النهار، فتذكرت من أتحدث إليه قال: فجعل يحدث عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وأحدثه قال: ثم أنشأ يحدثني فقال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"تكون فتنة، النائم فيها خير من المضطجع، والمضطجع فيها خير من القاعد، والقاعد فيها خير من القائم، والقائم خير من الماشي، والماشي خير من الراكب، والراكب خير من المجري، قتلاها كلها في النار، قال: قلت: يا رسول اللَّه ومتى ذلك؟ قال:"ذلك أيام الهرج"، قلت: ومتى أيام الهرج؟ قال:"حين لا يأمن الرجل جليسه"، قال: فبم تأمرني إن أدركت ذلك الزمان، قال:"اكفُفْ نفسك ويدك وادخلْ دارَك"، قال: قلت: يا رسول اللَّه أرأيت إن دخل رجل عليَّ داري قال:"فادخل بيتك"، قال: قلت: يا رسول اللَّه، أرأيت إن دخل عليَّ بيتي، قال:"فادخل مسجدك واصنع هكذا وقبض بيمينه على الكوع، وقل: ربي اللَّه، حتى تموت على ذلك".

حسن: رواه عبد الرزاق (20727) -ومن طريقه الحاكم (4/ 426 - 427) - عن معمر بن راشد،
عن إسحاق بن راشد، عن عمرو بن وابصة، عن أبيه، فذكره.

ورواه أحمد (4287)، ونعيم بن حماد في الفتن (339) كلاهما من طريق ابن المبارك، عن معمر به. وإسناده حسن من أجل عمرو بن وابصة فإنه حسن الحديث.

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

ولا يُعلّ هذا ما رواه أحمد (4286) من طريق عبد الرزاق، عن معمر، عن رجل، عن عمرو بن وابصة، عن أبيه فذكره. إلا أنه في خارج المصنف فإني لم أجد هذه الرواية في مصنف عبد الرزاق.

والرجل المبهم هو إسحاق بن راشد الجزري كما جزم به الدارقطني في العلل (5/ 281)، وتبعه ابن حجر في التعجيل (2/ 632).

ورواه أبو داود (4258) من طريق القاسم بن غزوان، عن إسحاق بن راشد الجزري، عن سالم، قال: حدثني عمرو بن وابصة الأسدي، عن أبيه وابصة، عن ابن مسعود نحوه.

وزاد فيه: فلما قتل عثمان طار قلبي مطاره، فركبت حتى أتيت دمشق، فلقيت خريم بن فاتك الأسدي، فحدثته، فحلف باللَّه الذي لا إله إلا هو لسمعه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كما حدثنيه ابن مسعود.

والقاسم بن غزوان فيه جهالة، وقد خالفه معمر الثقة، فلم يذكر فيه سالما، فالقول قول معمر، وذكر سالم من باب المزيد.

وسالم المذكور في هذا الإسناد اختلف في تعيينه، أو هو ابن أبي الجعد، أو ابن أبي المهاجر، أو ابن عجلان الأفطس، وكلهم ثقات.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ওয়াবিসার পিতা বলেন: আমি কূফায় আমার ঘরে অবস্থান করছিলাম, এমন সময় দরজার বাইরে শুনতে পেলাম, 'আসসালামু আলাইকুম! আমি কি প্রবেশ করব?' আমি বললাম, 'ওয়া আলাইকুমুস সালাম, প্রবেশ করুন।' যখন তিনি ভেতরে এলেন, আমি দেখলাম, তিনি হলেন আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। আমি বললাম, 'হে আবু আবদুর রহমান! এই অসময়ে কেন এসেছেন?'— এটা ছিল ঠিক দুপুরের সময়। তিনি বললেন, 'আমার কাছে দিনটি অনেক দীর্ঘ মনে হচ্ছিল, তাই ভাবলাম, কার সাথে কথা বলা যায়।' এরপর তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করতে শুরু করলেন, আর আমিও তার কাছে হাদীস বর্ণনা করলাম। এরপর তিনি আমাকে নতুন করে হাদীস শোনাতে শুরু করলেন। তিনি বললেন, আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি:

"একটি ফিতনা বা মহা-বিপর্যয় দেখা দেবে, যখন তাতে যে ঘুমন্ত থাকবে সে অর্ধশায়িত ব্যক্তির চেয়ে উত্তম, অর্ধশায়িত ব্যক্তি উপবিষ্ট ব্যক্তির চেয়ে উত্তম, উপবিষ্ট ব্যক্তি দণ্ডায়মান ব্যক্তির চেয়ে উত্তম, দণ্ডায়মান ব্যক্তি হেঁটে চলমান ব্যক্তির চেয়ে উত্তম, হেঁটে চলমান ব্যক্তি আরোহী ব্যক্তির চেয়ে উত্তম এবং আরোহী ব্যক্তি দ্রুত দৌড়াতে থাকা ব্যক্তির চেয়ে উত্তম। সেই ফিতনার সকল নিহত ব্যক্তিই জাহান্নামে যাবে।"

(আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন) আমি বললাম, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! কখন ঘটবে এমন?' তিনি বললেন, "এটা ঘটবে 'হার্জ' (হত্যাকাণ্ড ও বিশৃঙ্খলা)-এর দিনগুলোতে।" আমি বললাম, 'হার্জের দিনগুলো কখন?' তিনি বললেন, "যখন মানুষ তার পাশের সাথীকেও বিশ্বাস করতে পারবে না।" আমি বললাম, 'যদি আমি সেই সময় পাই, তবে আপনি আমাকে কী নির্দেশ দেন?' তিনি বললেন, "তুমি তোমার নফস (নিজেকে) ও হাতকে নিয়ন্ত্রণ করবে এবং নিজের ঘরে প্রবেশ করবে।" আমি বললাম, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি কোনো ব্যক্তি আমার প্রধান ঘরে প্রবেশ করে, তখন?' তিনি বললেন, "তাহলে তুমি তোমার ভেতরের কামরায় প্রবেশ করবে।" আমি বললাম, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি সে আমার ভেতরের কামরায়ও প্রবেশ করে, তখন?' তিনি বললেন, "তাহলে তুমি তোমার মসজিদে (নামাযের স্থানে) প্রবেশ করবে এবং এমন করবে"— এ কথা বলে তিনি ডান হাত দিয়ে কব্জি চেপে ধরলেন— "আর বলবে: 'আমার রব আল্লাহ।' এভাবে তুমি সেই অবস্থার ওপর মৃত্যু বরণ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15419)


15419 - عن أبي ذر قال: ركب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حمارًا وأردفني خلفه، وقال:"يا أبا ذر، أرأيت إن أصاب الناسَ جوعٌ شديدٌ لا تستطيع أن تقوم من فراشك إلى مسجدك، كيف تصنع؟" قال: اللَّه ورسوله أعلم، قال:"تعفَّفْ".

قال:"يا أبا ذر، أرأيت إن أصاب الناس موت شديد، يكون البيت فيه بالعبد -يعني القبر- كيف تصنع؟" قلت: اللَّه ورسوله أعلم، قال:"اصبر".

قال:"يا أبا ذر، أرأيت إن قتل الناس بعضهم بعضا -يعني- حتى تغرق حجارةُ الزيت من الدماء، كيف تصنع؟" قال: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"اقعد في بيتك، وأغلقْ عليك بابك"، قال: فإن لم أترك، قال:"فأت من أنت منهم، فكن فيهم"، قال: فآخذُ سلاحي؟ قال:"إذن تُشاركهم فيما هم فيه، ولكن إن خشيتَ أن يروعك شعاعُ السيف فألقِ طرفَ ردائِك على وجهك حتى يبُوْءَ بإثمِه وإثمِك".

صحيح: رواه أحمد (21325، 21445)، وصحّحه ابن حبان (5960، 6685)، والحاكم (4/ 423 - 424)، والبيهقي (8/ 191) كلهم من طرق عن أبي عمران الجوني، عن عبد اللَّه بن
الصامت، عن أبي ذر الغفاري، فذكره.

وإسناده صحيح، لكن زاد حماد بن زيد بين أبي عمران الجوني وبين عبد اللَّه بن الصامت"المشعث بن طريف".

ومن طريقه رواه أبو داود (4261)، وابن ماجه (3958). قال أبو داود:"لم يذكر المُشَعِّث في هذا الحديث غير حماد بن زيد".

وهو كما قال، فقد رواه جمع من الثقات منهم شعبة ومعمر وحماد بن سلمة ومرحوم بن عبد العزيز العطار بدون ذكر المشعث، فالقول قولهم.

انظر للمزيد: كتاب الحدود، باب في قطع النباش.




আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি গাধার পিঠে আরোহণ করলেন এবং আমাকে তাঁর পেছনে বসালেন। অতঃপর তিনি বললেন, "হে আবূ যর, তোমার কী মনে হয়, যদি লোকেদের ওপর এমন তীব্র দুর্ভিক্ষ নেমে আসে যে তুমি তোমার বিছানা থেকে তোমার মসজিদ পর্যন্ত যেতেও সক্ষম হবে না, তখন তুমি কী করবে?" তিনি বললেন, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই অধিক অবগত। তিনি বললেন, "তুমি আত্মসংযমী থাকবে (এবং পবিত্রতা বজায় রাখবে)।"

তিনি আবার বললেন, "হে আবূ যর, তোমার কী মনে হয়, যদি লোকেদের ওপর তীব্র মরণব্যাধি নেমে আসে, যাতে একটি বাড়ির মূল্য হবে কেবল একটি গোলামের সমতুল্য—অর্থাৎ কবর—তখন তুমি কী করবে?" আমি বললাম, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই অধিক অবগত। তিনি বললেন, "ধৈর্য ধারণ করবে।"

তিনি বললেন, "হে আবূ যর, তোমার কী মনে হয়, যদি লোকেরা পরস্পরকে হত্যা করতে শুরু করে—এমনকি (মদীনার) ‘হাউজুল যায়েত’-এর পাথরও রক্তে ডুবে যায়—তখন তুমি কী করবে?" তিনি বললেন, আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই অধিক অবগত। তিনি বললেন, "তুমি তোমার ঘরে বসে থাকবে এবং তোমার দরজা বন্ধ করে রাখবে।" আমি বললাম, যদি আমাকে (জোর করে) ছেড়ে না দেওয়া হয় (অর্থাৎ আমাকে বের করে আনা হয়)? তিনি বললেন, "তুমি তাদের কাছে যাও, যাদের দলভুক্ত তুমি, এবং তাদের সাথেই থাকো।" আমি বললাম, আমি কি আমার অস্ত্র নেব? তিনি বললেন, "তাহলে তো তুমি তাদের কৃতকর্মে অংশগ্রহণ করলে। কিন্তু যদি তুমি আশঙ্কা করো যে তলোয়ারের ঝলকানি তোমাকে ভীত করবে, তবে তোমার চাদরের এক দিক তোমার মুখের ওপর ফেলে দাও, যেন সে তার পাপ এবং তোমার পাপের বোঝা বহন করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15420)


15420 - عن ابن عمر قال: دخلت على حفصة ونَسْواتُها تنطِفُ، قلت: قد كان من أمر الناس ما تَرين، فلم يُجعل لي من الأمر شيء، فقالت: الحقْ فإنهم ينتظرونك، وأخشى أن يكون في احتباسك عنهم فُرْقة، فلم تدعْه حتى ذهب، فلما تفرق الناس، خطب معاويةُ، قال: من كان يريد أن يتكلم في هذا الأمر فليُطْلعْ لنا قرنَه، فلنحنُ أحقُّ به منه ومن أبيه. قال حبيب بن مسلمة: فهلا أجبته؟ قال عبد اللَّه: فحللتُ حَبْوَتي، وهممتُ أن أقول: أحقُّ بهذا الأمر منك من قاتلَك وأباك على الإسلام، فخشيتُ أن أقول كلمةً تُفَرِّقُ بين الجمع، وتسفِكُ الدم، ويُحمل عني غير ذلك، فذكرتُ ما أعدّ اللَّه في الجنان.

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4108) عن إبراهيم بن موسى، أخبرنا هشام، عن معمر، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر قال: فذكره.

قوله:"نسواتها" حصل فيه قلب، والصواب:"نوساتها" أي ذوائبها ومعنى تنطف أي تقطر كأنها قد اغتسلت.

قوله:"قد كان من أمر الناس ما ترين" مراده بذلك ما وقع بين علي ومعاوية من القتال في صفين.

قوله:"فحللت حبوتي" الحبوة: ثوب يُلقى على الظهر، ويربط طرفاه على الساقين بعد ضمهما.

قوله:"من قاتلك وأباك على الإسلام" أبوه هو سفيان بن حرب، وكان رأس الأحزاب يوم الخندق.

وأما ما روي عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ستكون فتنة صماء بكماء عمياء، من أشرف لها استشرفت له، وإشراف اللسان فيها كوقوع السيف" فإسناده ضعيف.

رواه أبو داود (4264) من طريق يحيى بن سعيد قال: قال خالد بن أبي عمران، عن عبد
الرحمن بن البيلماني، عن عبد الرحمن بن هرمز، عن أبي هريرة، فذكره. وعبد الرحمن بن البيلماني ضعيف.

وقد روي عنه على وجه آخر.

رواه ابن ماجه (3968) من طريق محمد بن الحارث، عن محمد بن عبد الرحمن بن البيلماني، عن أبيه، عن ابن عمر مرفوعا بلفظ:"إياكم والفتن، فإن اللسان فيها مثل وقع السيف".

ومحمد بن الحارث هو الحارثي ضعيف، ومحمد بن عبد الرحمن بن البيلماني منكر الحديث، وقد اتهمه ابن عدي وابن حبان، وأبوه ضعيف.

وكذلك لا يصح ما روي عن عبد اللَّه بن عمرو قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنها ستكون فتن، تستنظف العرب، قتلاها في النار، اللسان فيها أشد من وقع السيف".

رواه أبو داود (4265)، والترمذي (2178)، وابن ماجه (3967)، وأحمد (6980) كلهم من طريق ليث، عن طاوس، عن زياد بن سيمين كوش، عن عبد اللَّه بن عمرو، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث غريب، سمعت محمد بن إسماعيل يقول: لا يعرف لزياد بن سيمين كوش غير هذا الحديث، رواه حماد بن سلمة، عن ليث، فرفعه، ورواه حماد بن زيد عن ليث فأوقفه" اهـ.

قلت: كذا قال! وقد رواه أبو داود من طريق حماد بن زيد، عن ليث فرفعه، فالظاهر أن حماد ابن زيد اختلف عليه في رفعه ووقفه.

ومدار الوجهين -أعني المرفوع والموقوف- على ليث وزياد، وليث هو ابن أبي سليم سيء الحفظ، وزياد بن سيمين كوش فيه جهالة، وقد فصل القول فيه ابن حجر في ترجمة زياد بن سليم من التهذيب.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম, তখন তাঁর চুলের অগ্রভাগ থেকে পানি ঝরছিল। আমি বললাম: মানুষের মধ্যে যে অবস্থা সৃষ্টি হয়েছে, তা আপনি দেখতেই পাচ্ছেন। আর এই (রাজনৈতিক) বিষয়ে আমার জন্য কোনো কিছুই রাখা হয়নি। তিনি বললেন: আপনি তাদের কাছে যান, কারণ তারা আপনার জন্য অপেক্ষা করছে। আমি ভয় পাচ্ছি যে আপনার এই অনুপস্থিতির কারণে তাদের মধ্যে বিভেদ সৃষ্টি হতে পারে। এরপর হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে যেতে বলা বন্ধ করলেন না, যতক্ষণ না তিনি চলে গেলেন।

এরপর যখন লোকেরা (একত্রিত হয়ে) বিচ্ছিন্ন হলো, তখন মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ভাষণ দিলেন। তিনি বললেন: যে কেউ এই বিষয়ে (শাসন ক্ষমতা নিয়ে) কথা বলতে চায়, সে যেন আমাদের সামনে তার শিং বের করে দেখায়। আমরা তার এবং তার পিতার চেয়েও এর (ক্ষমতার) অধিক হকদার।

হাবিব ইবনে মাসলামা বললেন: আপনি কেন তাকে উত্তর দিলেন না? আবদুল্লাহ (ইবনে উমর) বললেন: আমি আমার 'হিবওয়াহ' খুলে ফেললাম এবং বলতে মনস্থ করলাম: এই ব্যাপারে আপনার চেয়ে অধিক হকদার হলো সেই ব্যক্তি, যিনি ইসলামের জন্য আপনার ও আপনার পিতার বিরুদ্ধে যুদ্ধ করেছেন। কিন্তু আমি ভয় পেলাম যে আমি এমন কোনো কথা বলে ফেলব যা জমায়েতকে বিভক্ত করে দেবে, রক্তপাত ঘটাবে এবং আমার সম্পর্কে ভিন্ন অর্থ নেওয়া হবে। তাই আমি জান্নাতে আল্লাহ যা প্রস্তুত করে রেখেছেন, তা স্মরণ করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (15421)


15421 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول:"ويل للعرب، من شر قد اقترب، فتنٌ كقطع الليل المظلم يُصبح الرجل فيها مؤمنًا ويمسي كافرًا، ويمسي مؤمنًا ويصبح كافرًا، يبيع دينه بعرضٍ من الدنيا قليلٍ، المتمسكُ منهم يومئذ على دينه كالقابض على خبط الشوك أو جمر الغضى".

حسن: رواه أحمد (9073) عن يحيى بن إسحاق، وحسن (هو ابن موسى) - وجعفر الفريابي في صفة المنافق (100) عن قتيبة بن سعيد - كلاهما عن ابن لهيعة، عن أبي يونس -وهو سليم بن جبير مولى أبي هريرة- عن أبي هريرة، فذكره.

واللفظ للفريابي. وإسناده حسن فإن ابن لهيعة -وإن كان سيء الحفظ- إلا أن بعض أهل العلم
احتملوا ما رواه قتيبة عنه.

وقوله:"فتن كقطع الليل المظلم. . . يبيع دينه بعرض من الدنيا". رواه مسلم في الإيمان (118) من طريق العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة، وهو مذكور في موضعه.

وفي معناه ما روي عن أنس بن مالك قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: يأتي على الناس زمان، الصابر فيهم على دينه كالقابض على الجمر".

رواه الترمذيّ (2260)، وابن عدي (5/ 1711) كلاهما من حديث إسماعيل بن موسى الفزاري ابن بنت السدي الكوفي قال: حدّثنا عمر بن شاكر، عن أنس بن مالك، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وعمر بن شاكر شيخ بصري قد روى عنه غير واحد من أهل العلم".

قلت: عمر بن شاكر ضعيف، قال أبو حاتم: ضعيف يروي عن أنس المناكير، وقال ابن عدي:"يحدث عن أنس بنسخة قريبا من عشرين حديثا غير محفوظة".

وروي نحوه من حديث أبي ثعلبة الخشني في أثناء حديث طويل عند أبي داود (4341)، والترمذي (3058)، وابن ماجه (4014).

وفي إسناده من لم يوثّقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته، وهو مخرج في تفسير سورة المائدة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "আরবদের জন্য দুর্ভোগ, সেই অকল্যাণ থেকে যা নিকটবর্তী হয়েছে। [তা হলো] অন্ধকার রাতের অংশের মতো ফিতনা। সেই ফিতনার কারণে মানুষ সকালে মুমিন অবস্থায় থাকবে এবং সন্ধ্যায় কাফির হয়ে যাবে, আবার সন্ধ্যায় মুমিন থাকবে এবং সকালে কাফির হয়ে যাবে। তারা দুনিয়ার সামান্য স্বার্থের বিনিময়ে তাদের দ্বীন বিক্রি করে দেবে। তাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সেদিন তার দীনের উপর সুদৃঢ় থাকবে, সে যেন কাঁটাবহুল গাছের ডাল অথবা জ্বলন্ত 'গাদা' কাঠ কয়লার মুষ্টি ধারণকারী।"









আল-জামি` আল-কামিল (15422)


15422 - عن معقل بن يسار أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"العبادة في الهرج كهجرة إليَّ".

صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2948) من طرق عن حماد بن زيد، عن معلى ابن زياد، عن معاوية بن قرة، عن معقل بن يسار، فذكره.

قوله:"في الهرج" قال النووي:"المراد بالهرج هنا الفتنة واختلاط أمور الناس، وسبب كثرة فضل العبادة فيه أن الناس يغفلون عنها، ويشتغلون عنها ولا يتفرغ لها إلا الأفراد".




মা'কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "গোলযোগপূর্ণ (বা ফিতনার) সময়ে ইবাদত করা আমার দিকে হিজরত করার মতো।"









আল-জামি` আল-কামিল (15423)


15423 - عن أبي زيد عمرو بن أخطب قال: صلّى بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الفجر، وصَعِدَ المنبر، فخطبنا حتى حضرت الظهرُ فنزل، فصلى ثم صعد المنبر، فخطبنا حتى حضرت العصرُ، ثم نزل فصلى، ثم صعد المنبر فخطبنا حتى غربتِ الشمسُ، فأخبرنا بما كان، وبما هو كائن، فأعلمُنا أحفظُنا.

صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2892) من طرق عن أبي عاصم (هو الضحاك ابن مخلد)، أخبرنا عزرة بن ثابت، أخبرنا علباء بن أحمر، حدثني أبو زيد -يعني عمرو بن أخطب- قال: فذكره.




আবু যায়দ আমর ইবন আখতাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন এবং মিম্বরে আরোহণ করলেন। অতঃপর তিনি আমাদেরকে খুতবা (ভাষণ) দিলেন, যতক্ষণ না যুহরের সময় হলো। তখন তিনি (মিম্বর থেকে) নেমে আসলেন এবং সালাত আদায় করলেন। তারপর তিনি আবার মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং আমাদেরকে খুতবা দিলেন, যতক্ষণ না আসরের সময় হলো। অতঃপর তিনি (মিম্বর থেকে) নেমে আসলেন এবং সালাত আদায় করলেন। তারপর তিনি মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং আমাদেরকে খুতবা দিলেন, যতক্ষণ না সূর্য ডুবে গেল। ফলে যা কিছু ঘটেছে এবং যা কিছু ঘটবে— সবকিছু সম্পর্কেই তিনি আমাদেরকে খবর দিলেন। সুতরাং আমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সবচেয়ে ভালো মুখস্থ রাখতে পেরেছে, সে-ই হলো সবচেয়ে বেশি জ্ঞানী।









আল-জামি` আল-কামিল (15424)


15424 - عن عمر بن الخطاب قال: قام فينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مقاما، فأخبرنا عن بدء الخلق حتى دخل أهل الجنة منازلهم، وأهل النار منازلهم، حفظ ذلك من حفظه، ونسيه من نسي.

صحيح: رواه الطبراني في مسند رقبة بن مصقلة من تأليفه، وابن مندة في أماليه -ومن طريقهما ابن حجر في تغليق التعليق (3/ 487) - من رواية عيسى بن موسى، عن أبي جمرة، عن رقبة بن مصقلة، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب قال: سمعت عمر بن الخطاب يقول: فذكره.

وذكره البخاري في بدء الخلق (3192) معلقا عن عيسى بن موسى به إلا أنه سقط منه ذكر أبي جمرة كما نبّه عليه الحافظ ابن حجر.

وإسناده صحيح. والكلام عليه مبسوط في كتاب بدء الخلق.

وروي عن أبي سعيد الخدري قال: صلى بنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوما صلاة العصر بنهار، ثم قام خطيبا، فلم يدع شيئًا يكون إلى قيام الساعة إلا أخبرنا به، حفظه من حفظه، ونسيه من نسيه، وكان فيما قال:"إن الدنيا حلوة خضرة، وإن اللَّه مستخلفكم فيها فناظر كيف تعملون، ألا فاتقوا الدنيا، واتقوا النساء"، وكان فيما قال:"ألا لا يمنعن رجلا هيبة الناس أن يقول بحق إذا علمه"، قال: فبكى أبو سعيد فقال: قد واللَّه رأينا أشياء فهبنا، فكان فيما قال:"ألا إنه يُنصب لكل غادر لواءٌ يوم القيامة بقدر غَدْرته، ولا غدرة أعظم من غدرة إمام عامةٍ يركز لواؤه عند استه"، فكان فيما حفظنا يومئذ:"ألا إن بني ادم خلقوا على طبقات شتى، فمنهم من يولد مؤمنًا ويحيى مؤمنًا ويموت مؤمنًا، ومنهم من يولد كافرًا ويحيى كافرًا ويموت كافرًا، ومنهم من يولد مؤمنًا ويحيى مؤمنًا ويموت كافرًا، ومنهم من يولد كافرًا ويحيى كافرًا ويموت مؤمنًا.

ألا وإن منهم البطيء الغضب سريع الفيء، ومنهم سريعُ الغضب سريعُ الفيء فتلك بتلك، ألا وإن منهم سريع الغضب بطيءُ الفيء، ألا وخيرهم بطيءُ الغضب، سريعُ الفيء، ألا وشرهم سريعُ الغضب بطيءُ الفيء، ألا وإن منهم حسنُ القضاء حسنُ الطلب، ومنهم سيءُ القضاء حسنُ الطلب، ومنهم حسنُ القضاء وسيء الطلب، فتلك بتلك، ألا وإن منهم السيءُ القضاء، السيءُ الطلب، ألا وخيرهم الحسنُ القضاء، الحسنُ الطلب، ألا وشرهم سيءُ القضاء، سيءُ الطلب، ألا وإن الغضب جمرة في قلب ابن آدم، أما رأيتم إلى حمرة عينيه وانتفاخ أوداجه، فمن أحسَّ بشيء من ذلك فليلصقْ بالأرض". قال: وجعلنا نلتفتُ إلى الشمس هل بقي منها شيء؟ فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألا إنه لم يبق من الدنيا فيما مضى منها إلا كما بقي من يومكم هذا فيما مضى منه".

رواه الترمذيّ (2191) واللفظ له، وأحمد (11143)، والحاكم (4/ 505) كلهم من طريق علي بن زيد بن جدعان القرشي، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن".

وقال الحاكم:"هذا حديث تفرد بهذه السياقة علي بن زيد بن جدعان القرشي، عن أبي نضرة،
والشيخان رضي الله عنهما لم يحتجا بعلي بن زيد".

وتعقبه الذهبي بقوله:"ابن جدعان صالح الحديث".

قلت: الراجح فيه أنه ضعيف وقد ذكر الذهبي في الميزان بعض أحاديثه وقال: إنها منكرة. ولكن لبعض فقراته أسانيد صحيحة مثل قوله:"الدنيا حلوة خضرة"، و"القول بالحق"، و"الترهيب من الغدر" وهي مخرجة في مواضعها.

هذه الخطبة وردتْ أجزاؤها مفرقة في كتب الفتن والملاحم وأشراط الساعة وأخبار الماضين ونحوها، فإنها تضمنت أجزاء هذه الخطبة، كما أن هذه الكتب اشتملت على أحاديث أخرى في مواضع ومناسبات مختلفة، فلم يذهب شيء من هذه الخطبة البتة، ويدل على ذلك قول حذيفة:"حفظه من حفظه، ونسيه من نسيه، قد علمه أصحابي هؤلاء، وإنه ليكون منه الشيء قد نسيته، فأراه فأذكره كما يذكر الرجل وجه الرجل إذا غاب عنه، ثم إذا رآه عرفه".

وحاولتُ في الجامع الكامل جمع أجزاء هذه الخطبة من مصادرها المختلفة، وإليكم حديث حذيفة بن اليمان في ذكر هذه الخطبة.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে একবার দাঁড়িয়ে ভাষণ দিলেন। তিনি সৃষ্টির শুরু থেকে জান্নাতীরা তাদের নিজ নিজ স্থানে প্রবেশ করা এবং জাহান্নামীরা তাদের নিজ নিজ স্থানে প্রবেশ করা পর্যন্ত সব বিষয়ে আমাদের জানালেন। যারা তা স্মরণ রাখার রাখলো, আর যারা ভুলে যাওয়ার ভুলে গেল।

আর অন্য এক বর্ণনায় আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন দিনের বেলায় আমাদের নিয়ে আসরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি বক্তৃতার জন্য দাঁড়ালেন। তিনি কিয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত যা কিছু ঘটবে তার কিছুই বাদ দিলেন না, সব আমাদের জানালেন। যে তা স্মরণ রাখার রাখলো, আর যে ভুলে যাওয়ার ভুলে গেল। তিনি যা বলেছিলেন তার মধ্যে ছিল: "নিশ্চয় দুনিয়া মিষ্টি ও সবুজ (মনোমুগ্ধকর), এবং আল্লাহ তোমাদেরকে এতে খলিফা বানিয়েছেন, অতঃপর দেখবেন তোমরা কেমন আমল করো। সাবধান! তোমরা দুনিয়াকে ভয় করো এবং নারীদেরকে ভয় করো।" তিনি যা বলেছিলেন তার মধ্যে আরও ছিল: "সাবধান! কোনো ব্যক্তিকে যেন মানুষের ভয় হক কথা জানা সত্ত্বেও তা বলা থেকে বিরত না রাখে।" আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, অতঃপর তিনি কেঁদে উঠলেন এবং বললেন: আল্লাহর কসম, আমরা অনেক জিনিস দেখেছি এবং (মানুষের ভয়ে) ভয় পেয়েছি। তিনি যা বলেছিলেন তার মধ্যে আরও ছিল: "সাবধান! কিয়ামতের দিন প্রত্যেক বিশ্বাসঘাতকের জন্য তার বিশ্বাসঘাতকতার পরিমাণ অনুযায়ী একটি পতাকা উত্তোলন করা হবে। সাধারণ জনগণের নেতার বিশ্বাসঘাতকতার চেয়ে বড় কোনো বিশ্বাসঘাতকতা নেই, তার পতাকা তার পশ্চাদ্দেশের কাছে স্থাপন করা হবে।" ঐ দিন আমরা যা স্মরণ রেখেছিলাম তার মধ্যে ছিল: "সাবধান! আদম সন্তানকে বিভিন্ন স্তরে সৃষ্টি করা হয়েছে। তাদের মধ্যে কেউ আছে যে মুমিন রূপে জন্ম নেয়, মুমিন রূপে জীবন যাপন করে এবং মুমিন রূপে মৃত্যুবরণ করে। তাদের মধ্যে কেউ আছে যে কাফির রূপে জন্ম নেয়, কাফির রূপে জীবন যাপন করে এবং কাফির রূপে মৃত্যুবরণ করে। তাদের মধ্যে কেউ আছে যে মুমিন রূপে জন্ম নেয়, মুমিন রূপে জীবন যাপন করে এবং কাফির রূপে মৃত্যুবরণ করে। আর তাদের মধ্যে কেউ আছে যে কাফির রূপে জন্ম নেয়, কাফির রূপে জীবন যাপন করে এবং মুমিন রূপে মৃত্যুবরণ করে।" "সাবধান! তাদের মধ্যে কেউ কেউ আছে যাদের ক্রোধ ধীর, আর (ভুল থেকে) ফিরে আসা দ্রুত। তাদের মধ্যে কেউ আছে যাদের ক্রোধ দ্রুত, আর ফিরে আসাও দ্রুত; এটা ওটার সমান সমান। তাদের মধ্যে কেউ আছে যাদের ক্রোধ দ্রুত, আর ফিরে আসা ধীর। সাবধান! তাদের মধ্যে উত্তম হলো সে, যার ক্রোধ ধীর, আর ফিরে আসা দ্রুত। সাবধান! তাদের মধ্যে নিকৃষ্ট হলো সে, যার ক্রোধ দ্রুত, আর ফিরে আসা ধীর। সাবধান! তাদের মধ্যে কেউ আছে উত্তম পরিশোধকারী, উত্তম চয়নকারী (চাহিদা পেশকারী)। তাদের মধ্যে কেউ আছে মন্দ পরিশোধকারী, উত্তম চয়নকারী। তাদের মধ্যে কেউ আছে উত্তম পরিশোধকারী, মন্দ চয়নকারী; এটা ওটার সমান সমান। সাবধান! তাদের মধ্যে কেউ আছে মন্দ পরিশোধকারী, মন্দ চয়নকারী। সাবধান! তাদের মধ্যে উত্তম হলো সে, যে উত্তম পরিশোধকারী, উত্তম চয়নকারী। সাবধান! তাদের মধ্যে নিকৃষ্ট হলো সে, যে মন্দ পরিশোধকারী, মন্দ চয়নকারী। সাবধান! ক্রোধ হলো আদম সন্তানের হৃদয়ের একটি জ্বলন্ত অঙ্গার। তোমরা কি তার চোখের লালভাব এবং গলার শিরা ফুলে ওঠা দেখোনি? সুতরাং যে কেউ এর কিছু অনুভব করে, সে যেন মাটির সাথে মিশে যায় (স্থির হয়ে বসে পড়ে)।" আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমরা সূর্যের দিকে তাকাতে লাগলাম—এর কিছু অবশিষ্ট আছে কি না? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সাবধান! দুনিয়া তার অতীত অংশের তুলনায় এতটুকুই বাকি আছে, যতটুকু তোমাদের এই দিনের অতীত অংশের তুলনায় বাকি আছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15425)


15425 - عن حذيفة قال: قام فينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مقاما، ما ترك شيئًا يكون في مقامه ذلك إلى قيام الساعة إلا حدث به، حفظه من حفظه، ونسيه من نسيه، قد علمه أصحابي هؤلاء، وإنه ليكون منه الشيء قد نسيته، فأراه فأذكره كما يذكر الرجل وجه الرجل إذا غاب عنه، ثم إذا رآه عرفه.

متفق عليه: رواه البخاريّ في القدر (6604)، ومسلم في الفتن وأشراط الساعة (2891: 23) كلاهما من طرق عن الأعمش، عن شقيق أبي وائل، عن حذيفة، فذكره. والسياق لمسلم.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের মাঝে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি স্থানে (উপদেশ দেওয়ার জন্য) দাঁড়ালেন। তিনি সেখানে কিয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত যা কিছু ঘটবে তার কিছুই বাদ দিলেন না, বরং সব কথাই বলে দিলেন। যারা তা মুখস্থ রেখেছে, তারা রেখেছে; আর যারা ভুলে গেছে, তারা ভুলে গেছে। আমার এই সাহাবীগণ তা জানে। আর এর (ভবিষ্যৎবাণীর) কোনো কোনো বিষয় এমনও থাকে যা আমি ভুলে গিয়েছিলাম, কিন্তু যখন তা দেখি, তখন তা আমার স্মরণ হয়ে যায়। যেমন একজন ব্যক্তি অপর ব্যক্তির মুখমণ্ডল ভুলে যাওয়ার পর আবার যখন তাকে দেখে, তখন চিনতে পারে।









আল-জামি` আল-কামিল (15426)


15426 - عن حذيفة أنه قال: أخبرني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بما هو كائن إلى أن تقوم الساعة، فما منه شيء إلا قد سألته، إلا أني لم أسأله ما يخرج أهل المدينة من المدينة؟

صحيح: رواه مسلم في الفتن (2891: 24) من طريق محمد بن جعفر غندر، عن شعبة، عن عدي بن ثابت، عن عبد اللَّه بن يزيد، عن حذيفة، فذكره.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত যা কিছু ঘটবে সে সম্পর্কে আমাকে খবর দিয়েছেন। এর মধ্যে এমন কোনো বিষয় নেই যা আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করিনি। তবে আমি তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করিনি যে, কিসের কারণে মদীনার অধিবাসীরা মদীনা থেকে বের হয়ে যাবে?









আল-জামি` আল-কামিল (15427)


15427 - عن حذيفة بن اليمان قال: واللَّه إني لأعلم الناس بكل فتنة هي كائنة فيما بيني وبين الساعة، وما بي إلا أن يكون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أسرَّ إليّ في ذلك شيئًا لم يُحدثه غيري، ولكن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال وهو يحدث مجلسًا أنا فيه عن الفتن، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو يعُدُّ الفتن:"منهن ثلاث لا يكدْنَ يذرْنَ شيئًا، ومنهن فتن كرياحِ الصيف، منها صغار، ومنها كبار". قال حذيفة: فذهب أولئك الرهط كلهم غيري.
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2891: 22) عن حرملة بن يحيى التجيبي، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، أن أبا إدريس الخولاني كان يقول: قال حذيفة ابن اليمان، فذكره.




হুযাইফাহ ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর কসম! আমার এবং কিয়ামতের মধ্যবর্তী সময়ে যত ফিতনা ঘটবে, সেগুলোর মধ্যে আমিই সবচাইতে বেশি জ্ঞানী। এমনটা নয় যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এ বিষয়ে আমাকে এমন কোনো গোপন কথা বলে গেছেন যা অন্য কাউকে বলেননি। বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন ফিতনাসমূহ সম্পর্কে আলোচনা করছিলেন, তখন আমি সেই মজলিসে উপস্থিত ছিলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফিতনাসমূহের বর্ণনা দিতে গিয়ে বললেন: "এর মধ্যে তিনটি ফিতনা এমন রয়েছে, যা প্রায় কিছুই অবশিষ্ট রাখবে না (অর্থাৎ সবকিছু ধ্বংস করে ছাড়বে)। আর এর মধ্যে কিছু ফিতনা গ্রীষ্মকালের বাতাসের মতো হবে, সেগুলোর কিছু ছোট হবে এবং কিছু বড় হবে।" হুযাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি ছাড়া সেই দলের সবাই (ইন্তেকাল করে) চলে গেছেন।