আল-জামি` আল-কামিল
15448 - عن حذيفة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"الدجال أعور العين اليسرى، جُفال الشعر، معه جنة ونار، فناره جنة، وجنته نار".
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2934) من طرق عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن شقيق، عن حذيفة قال: فذكره.
قوله:"جُفال الشعر" أي كثير الشعر.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাজ্জাল বাম চোখে কানা হবে, তার চুল ঘন হবে। তার সাথে জান্নাত ও জাহান্নাম থাকবে, কিন্তু তার আগুন হবে জান্নাত এবং তার জান্নাত হবে জাহান্নাম।"
15449 - عن حذيفة قال: كنا عند النبي صلى الله عليه وسلم فذكر الدجال، فقال:"لفتنة بعضكم أخوف عندي من فتنة الدجال، إنها ليستْ من فتنة صغيرة، ولا كبيرة إلا تتضع لفتنة الدجال، فمن نجا من فتنة ما قبلها، نجا منها، وإنه لا يضر مسلما، مكتوب بين عينيه: كافر مهجَاة: ك ف ر".
حسن: رواه البزار (2807)، وصحّحه ابن حبان (6807) واللفظ له، كلاهما عن أبي كريب قال: حدّثنا يحيى بن آدم، عن أبي بكر بن عياش، عن الأعمش، عن سليمان بن ميسرة، عن طارق ابن شهاب، عن حذيفة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي بكر بن عياش فإنه حسن الحديث، وتابعه حفص بن غياث إلا أن روايته مختصرة، فقد روى الطبراني في الكبير (3/ 185) عن عمر بن حفص بن غياث، حدثني أبي، حدّثنا الأعمش به. ولفظه: وذكر الدجال"مكتوب بين عينيه كافر يقرؤه كل مسلم". وإسناده صحيح.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট ছিলাম। তখন তিনি দাজ্জাল সম্পর্কে আলোচনা করলেন এবং বললেন: তোমাদের (পারস্পরিক) কোনো কোনো ফিতনা আমার কাছে দাজ্জালের ফিতনার চেয়েও অধিক ভয়ের কারণ। ছোট বা বড় এমন কোনো ফিতনা নেই যা দাজ্জালের ফিতনার দিকে ধাবিত হবে না (বা যার সামনে দাজ্জালের ফিতনা তুচ্ছ নয়)। সুতরাং যে ব্যক্তি এর পূর্ববর্তী ফিতনা থেকে রক্ষা পাবে, সে দাজ্জালের ফিতনা থেকেও রক্ষা পাবে। আর তা (দাজ্জালের ফিতনা) কোনো মুসলিমের ক্ষতি করতে পারবে না। তার দুই চোখের মাঝখানে লেখা থাকবে: কাফির, অক্ষরগুলো বিচ্ছিন্নভাবে লেখা থাকবে: কাফ, ফা, রা।
15450 - عن حذيفة بن اليمان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تكون فتنٌ، على أبوابها دعاةٌ إلى النار، فأن تموتَ وأنت عاضٌّ على جذل شجرةٍ خيرٌ لك من أن تتبع أحدًا منهم".
حسن: رواه ابن ماجه (3981) عن محمد بن عمر بن علي المقدمي، حدّثنا أبو عامر الخزاز،
عن حميد بن هلال، عن عبد الرحمن بن قرط، عن حذيفة، فذكره.
وعبد الرحمن بن قرط مجهول كما في التقريب، ولكنه توبع في الأسانيد السابقة سندًا ومتنًا.
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: এমনসব ফিতনা দেখা দেবে, যার দরজাসমূহে জাহান্নামের দিকে আহ্বানকারী থাকবে। যদি তুমি এমন অবস্থায় মৃত্যুবরণ করো যে তুমি একটি গাছের কাণ্ড শক্ত করে ধরে আছো, তবুও তা তোমার জন্য উত্তম হবে তাদের কারো অনুসরণ করার চেয়ে।
15451 - عن حذيفة: إن الناس كانوا يسألون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الخير، وكنت أسأله عن الشر، فأَحدقه القوم بأبصارهم، فقال: إني قد أرى الذي تنكرون، إني قلت: يا رسول اللَّه، أرأيت هذا الخير الذي أعطانا اللَّه تعالى أيكون بعده شر كما كان قبله؟ قال:"نعم" قلت: فما العصمة من ذلك؟ قال:"السيف" -قال قتيبة في حديثه- قلت: وهل للسيف يعني من بقية؟ قال:"نعم". قال: قلت: ماذا؟ قال:"هُدنة على دَخن" قال: قلت: يا رسول اللَّه ثم ماذا يكون؟ قال:"إن كان للَّه تعالى خليفة في الأرض فضربَ ظهرَك، وأخذ مالَك فأطعْه، وإلا فمُتْ وأنت عاضٌّ بجذلِ شجرة" قلت: ثم ماذا؟ قال:"ثم يخرج الدجال معه نهر ونار، فمن وقع في ناره وجب أجره وحُطَّ وزرُه، ومن وقع في نهره وجب وزرُه وحُطَّ أجره". قال: قلت: ثم ماذا؟ قال:"ثم هي قيام الساعة".
حسن: رواه أبو داود (4244) -واللفظ له- وأحمد (23430)، والحاكم (4/ 432 - 433) كلهم من حديث أبي عوانة، عن قتادة، عن نصر بن عاصم، عن سبيع بن خالد وهو اليشكري قال: أتيت الكوفة في زمن فُتحت تُستر، أجلب منها بِغالًا، فدخلت المسجد، فإذا صدعٌ من الرجال، وإذا رجل جالس تَعرف إذا رأيته أنه من رجال أهل الحجاز، قال: قلت من هذا؟ فتجهَّمني القوم، وقالوا: أما تعرف هذا؟ هذا حذيفة بن اليمان صاحب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل سبيع بن خالد، فقد روى عنه جماعة من الثقات، وذكره ابن حبان في الثقات، ووثقه العجلي كما في التهذيب، وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد.
- وعن خالد بن خالد اليشكري بهذا الحديث قال -يعني حذيفة-: قلتُ: بعد السيف؟ قال - يعني النبي صلى الله عليه وسلم:"بقيةٌ على أقذاءٍ، وهدنةٌ على دخن". ثم ساق الحديث.
قال: وكان قتادة يضعه على الردة التي في زمن أبي بكر:"على أقذاء" يقول: قذى، و"هدنة" يقول: صلح، و"على دخن" على ضغائن.
حسن: رواه أبو داود (4245) من حديث عبد الرزاق -وهو في مصنفه (2071)، وعند أحمد (23429) عن معمر، عن قتادة، عن نصر بن عاصم، عن خالد بن خالد اليشكري، فذكر الحديث بطوله كما عند أحمد، وجاء فيه كما عند أبي داود بزيادة.
وإسناده حسن من خالد بن خالد اليشكري، وهو سبيع بن خالد، ويقال له: خالد بن خالد وهو حسن الحديث كما مضى.
- وعن نصر بن عاصم الليثي قال: أتينا اليشكري في رهط من بني ليث فقال: من القوم؟ فقلنا: بنو ليث أتيناك نسألك عن حديث حذيفة. قال: أقبلنا مع أبي موسى قافلين، وغَلَت الدوابُّ بالكوفة قال: فسألت أبا موسى أنا وصاحب لي، فأذن لنا، فقدمنا الكوفة، فقلت لصاحبي: أنا داخل المسجد، فإذا قامت السوق خرجتُ إليك، قال: فدخلت المسجد، فإذا فيه حلقة كأنما قطعت رؤوسهم يستيعون إلى حديث رجل، قال: فقمت عليهم، فجاء رجل، فقام إلى جنبي قال: فقلت من هذا؟ قال: أبصري أنت؟ قال: قلت: نعم. قال: قد عرفتُ ولو كنت كوفيا، لم تسأل عن هذا، قال: فدنوتُ منه، فسمعتُ حذيفة يقول:
كان الناس يسألون رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن الخير، وكنت أسأله عن الشر، وعرفتُ أن الخير لن يسبقني. قال: قلت: يا رسول اللَّه بعد هذا الخير شر؟ فقال:"يا حذيفة، تعلَّمْ كتاب اللَّه، واتَّبعْ ما فيه"، ثلاث مرار، قال: فقلت: يا رسول اللَّه بعد هذا الخير شر؟ فقال:"يا حذيفة، تعلَّمْ كتاب اللَّه، واتَّبعْ ما فيه"، قلت: يا رسول اللَّه بعد هذا الخير شر؟ قال:"فِتنة وشر" قلت: يا رسول اللَّه بعد هذا الشر خير؟ قال:"يا حذيفة، تعلَّمْ كتاب اللَّه، واتَّبعْ ما فيه" ثلاث مرات، قلت: يا رسول اللَّه بعد هذا الشر خير؟ قال:"هُدنة على دَخن، وجماعةٌ على أقْذاءٍ فيها أو فيهم"، فقلت: يا رسول اللَّه، الهدنة على الدخن ما هي؟ قال:"لا ترجع قلوب أقوام على الذي كانت عليه" قال: قلت: يا رسول اللَّه بعد هذا الخير شر؟ قال:"يا حذيفة، تعلَّمْ كتاب اللَّه، واتَّبعْ ما فيه" ثلاث مرار، قال: قلت: يا رسول اللَّه بعد هذا الخير شر؟ قال:"فتنة عمياءُ صمّاءُ عليها دعاةٌ على أبواب النار، فإن مُتَّ يا حذيفة وأنت عاضٌّ على جِذْلٍ خير لك من أن تتبع أحدًا منهم".
حسن: رواه أبو داود (4246)، وأحمد (23282)، وصحّحه ابن حبان (5963) كلهم من طريق سليمان بن المغيرة، عن حميد، عن نصر بن عاصم الليثي، فذكره.
وإسناده حسن من أجل اليشكري وهو خالد بن خالد أو سبيع بن خالد حسن الحديث.
- وعن سبيع بن خالد بهذا الحديث عن حذيفة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"فإن لم تجد يومئذ خليفةً، فاهرب حتى تموت، فإن تَمُتْ وأنت عاضٌّ" وقال في آخره: قال: قلت: فما يكون بعد ذلك؟ قال:"لو أن رجلا نتج فرسًا لم تُنتج حتى تقوم الساعة".
حسن: رواه أبو داود (4247)، وأحمد (23425) كلاهماصت حديث أبي التياح، عن صخر ابن بدر العجلي، عن سبيع بن خالد، بهذا الحديث، فذكره.
وإسناده حسن من أجل سبيع بن خالد، وأما صخر فهو ابن بدر العجلي فهو مجهول، ولكنه توبع فيما سبق.
قوله:"لو أن رجلا نتج. . ." فيه بيان قرب القيامة بعد ظهور علامات الساعة الكبرى التي يسبقها كما يُفهم من أحاديث حذيفة نفسه، ففيه حذف واختصار.
الفائدة: يستفاد من سرد أحاديث حذيفة بن اليمان في مكانٍ واحدٍ أنه كان يروي مطولا، وأخرى مختصرًا، أو كان أصحابه يختصرون حسب الضرورة، وهي كلها صحيحة إلا بعض الكلمات التي وقع فيها الوهمُ من الرواة.
ومما روي عن حذيفة بن اليمان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقوم الساعة حتى يكون أسعد الناس بالدنيا لُكع بن لُكع".
رواه الترمذيّ (2209)، وأحمد (23303) كلاهما من طريق عمرو بن أبي عمرو، عن عبد اللَّه ابن عبد الرحمن الأنصاري الأشهلي، عن حذيفة، فذكره.
وقال الترمذيّ:"حديث حسن، إنما نعرفه من حديث عمرو بن أبي عمرو".
قلت: عبد اللَّه بن عبد الرحمن الأشهلي تفرد بالرواية عنه عمرو بن أبي عمرو، ولم يوثّقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته على قاعدته في توثيق من لم يعرف فيه جرح. وقال ابن معين:"لا أعرفه".
والمتن ثابت من أحاديث صحابة آخرين كما هو مذكور في محله.
وقوله:"لُكع بن لُكع" على وزن زُفر، والمقصود منه من لا يعرف له أصل، ولا يحمد له خُلق.
وأما ما روي عن حذيفة بن اليمان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"والذي نفسي بيده لا تقوم الساعة حتى تقتلوا إمامكم، وتجتلدوا بأسيافكم، ويرثُ دُنياكم شِرارُكم" فإسناده ضعيف.
رواه الترمذيّ (2170)، وابن ماجه (4043)، وأحمد (23302) كلهم من طرق عن عمرو بن أبي عمرو مولى المطلب، عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن الأنصاري الأشهلي، عن حذيفة بن اليمان، فذكره.
وقال الترمذيّ:"حديث حسن، إنما نعرفه من حديث عمرو بن أبي عمرو".
قلت: عبد اللَّه بن عبد الرحمن الأنصاري مجهول، تفرد بالرواية عنه عمرو بن أبي عمرو، ولم يوثّقه أحد إلا أن ابن حبان ذكره في ثقاته على قاعدته في توثيق من لم يُعرف فيه الجرح.
وقال ابن معين: لا أعرفه، وقال الذهبي في الميزان:"له حديث منكر"، أراد به هذا.
وكذلك لا يصح ما روي عن حذيفة بن اليمان: واللَّه ما أدري أنسي أصحابي أم تناسوا؟ واللَّه ما ترك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من قائد فتنة إلى أن تنقضي الدنيا، يبلغ من معه ثلاثمائة فصاعدًا، إلا قد سماه لنا باسمه واسم أبيه واسم قبيلته.
رواه أبو داود (4243) عن محمد بن يحيى بن فارس، قال: ثنا ابن أبي مريم، قال: أخبرنا ابن فروخ، قال: أخبرني أسامة بن زيد، قال: أخبرني ابن لقبيصة بن ذؤيب، عن أبيه قال: قال حذيفة ابن اليمان، فذكره.
وابن فروخ هو: عبد اللَّه الخراساني مختلف فيه غير أنه يحسن حديثه إذا كان لحديثه أصل، ولا يقبل عند التفرد والمخالفة، وقد تفرد بهذه الرواية.
وابن قبيصة بن ذؤيب إنْ كان إسحاق فصدوق، وإلا فهو مجهول لا يُعرف.
قوله:"قائد فتنة" منكر، وإنما الصحيح هو أسماء المنافقين كما جاء في صحيح مسلم.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই লোকেরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে কল্যাণ (বা ভালো বিষয়) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করত, আর আমি তাঁকে অকল্যাণ (বা খারাপ বিষয়) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতাম। লোকেরা আমার দিকে চোখ তুলে তাকাল। তিনি [হুযাইফা] বললেন: আমি দেখছি তোমরা কী অপছন্দ করছ। আমি বলেছিলাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি মনে করেন যে, আল্লাহ তাআলা আমাদেরকে এই যে কল্যাণ দান করলেন, এর পরে কি পূর্বের মতো কোনো অকল্যাণ আসবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'হ্যাঁ।' আমি বললাম: তাহলে তা থেকে বাঁচার উপায় কী? তিনি বললেন: 'তরবারি (বা যুদ্ধ)।' (বর্ণনাকারী কুতাইবা তাঁর হাদীসে বলেছেন) আমি বললাম: তরবারির (অর্থাৎ যুদ্ধের) পরেও কি কোনো অবশিষ্টাংশ থাকবে? তিনি বললেন: 'হ্যাঁ।' তিনি [হুযাইফা] বললেন: আমি বললাম: কী? তিনি বললেন: 'ধোঁয়ার উপর সন্ধি (বা আপোসমূলক শান্তি)।' তিনি বললেন: আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারপর কী হবে? তিনি বললেন: 'যদি পৃথিবীতে আল্লাহ তাআলার কোনো খলীফা থাকেন, যিনি তোমার পিঠে আঘাত করেন এবং তোমার সম্পদ নিয়ে নেন, তবুও তুমি তার আনুগত্য করো। আর যদি তিনি না থাকেন, তবে গাছের মূল শক্তভাবে কামড়ে ধরে থাকাবস্থায় তুমি মৃত্যুবরণ করো।' আমি বললাম: তারপর কী হবে? তিনি বললেন: 'তারপর দাজ্জাল বের হবে। তার সাথে থাকবে একটি নদী ও একটি আগুন। যে তার আগুনে পতিত হবে, তার জন্য পুরস্কার আবশ্যক হবে এবং তার গুনাহ মাফ হয়ে যাবে। আর যে তার নদীতে পতিত হবে, তার জন্য গুনাহ আবশ্যক হবে এবং তার পুরস্কার মাফ হয়ে যাবে।' তিনি [হুযাইফা] বললেন: আমি বললাম: তারপর কী হবে? তিনি বললেন: 'তারপরই কিয়ামত সংঘটিত হবে।'
15452 - عن معاوية قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إن ما بقي من الدنيا بلاء وفتنة، وإنما مثل عمل أحدكم كمثل الوعاء إذا طاب أعلاه طاب أسفله، وإذا خبث أعلاه خبث أسفله".
حسن: رواه أحمد (16853) واللفظ له، وابن ماجه (4035، 4199)، وصحّحه ابن حبان (392، 690) كلهم من طرق عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر قال: حدثني أبو عبد ربه قال: سمعت معاوية يقول على هذا المنبر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي عبد ربه ويقال: أبو عبد رب، فإنه حسن الحديث، والكلام عليه مبسوط في كتاب القدر.
মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় দুনিয়ার যা অবশিষ্ট আছে, তা হলো বিপদ ও ফিতনা। আর তোমাদের কারো আমলের উদাহরণ হলো সেই পাত্রের মতো, যার উপরিভাগ উত্তম হলে নিম্নভাগও উত্তম হয়, আর যার উপরিভাগ খারাপ হলে নিম্নভাগও খারাপ হয়।"
15453 - عن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: استيقظ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ليلة فَزِعًا يقول:"سبحان اللَّه ماذا أنزل اللَّه من الخزائن، وماذا أنزل من الفتن، من يُوقظ صواحبَ الحجرات، -يريد أزواجه، لكي يُصلين- رب كاسية في الدنيا، عارية في الآخرة".
صحيح: رواه البخاريّ في الفتن (7069) من طرق عن ابن شهاب الزهري، عن هند بنت الحارث الفراسية، أن أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: فذكرته.
উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায় জেগে উঠলেন এবং বললেন: "সুবহানাল্লাহ! আল্লাহ্ কিসের ধন-ভান্ডার নাযিল করেছেন! আর কিসের ফেতনা নাযিল করেছেন! হুজরাসমূহের অধিকারিণীদের কে জাগাবে?"—তাঁর উদ্দেশ্য ছিল তাঁর স্ত্রীগণ, যাতে তারা সালাত আদায় করেন। (তিনি আরও বললেন:) "কত এমন নারী আছে, যারা দুনিয়াতে পরিহিতা (বস্ত্রে আবৃতা), কিন্তু আখিরাতে উলঙ্গ হবে।"
15454 - عن عبد اللَّه بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تدور رَحَى الإسلام بخمس وثلاثين أو ست وثلاثين أو سبع وثلاثين، فإن يهلكوا فسبيل من هلك، وإن يقم لهم دينهم يقم لهم سبعين عاما" قال: قلت: أمما بقي أو مما مضى؟ قال:"مما مضى"
حسن: رواه أبو داود (4254)، وأحمد (3730 - 3731)، والحاكم (4/ 521، و 3/ 114) كلهم من طريق منصور بن المعتمر، عن رِبعي بن حِراش، عن البراء بن ناجية، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
والبراء بن ناجية فيه جهالة، تفرد بالرواية عنه ربعي بن حراش ولم يوثّقه سوى العجلي وابن حبان، ولذا قال الذهبي في الميزان: فيه جهالة لا يعرف إلا بحديث:"تدور رحى الإسلام بخمس وثلاثين سنة".
وأما قول ابن حجر في التقريب:"ثقة" ففيه نظر.
وله طريقان آخران يقويان:
أحدهما: ما رواه أحمد (3707)، وصحّحه ابن حبان (6664) كلاهما من حديث يزيد بن هارون، أخبرنا العوّام بن حوشب، حدثني أبو إسحاق الشيباني سليمان بن أبي سليمان، عن القاسم بن عبد الرحمن (هو ابن عبد اللَّه بن مسعود)، عن أبيه، عن جده.
وعبد الرحمن بن عبد اللَّه بن مسعود لم يسمع من أبيه إلا النزر اليسير، ليس هذا منها.
والثاني: ما رواه البزار (1942)، والطحاوي في شرح المشكل (1612) كلاهما من طريق شريك النخعي، عن مجالد بن سعيد، عن عامر الشعبي، عن مسروق، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره، وفيه:"فإن يصطلحوا فيما بينهم على غير قتال، يأكلوا الدنيا سبعين عاما رغدا، وإن يقتتلوا يركبوا سنن من كان قبلهم".
وشريك سيء الحفظ، وكذا شيخه وبمجموع هذه الطرق يصير الحديث حسنا.
ومعنى الحديث: أن الفتنة تقع بعد خمس وثلاثين سنة، أو بعد ست وثلاثين، أو بعد سبع وثلاثين، ليس على الشك بل متى شاء اللَّه تعالى. فقد شاء أن تقع بعد خمس وثلاثين سنة بعد قتل الخليفة الراشد عثمان بن عفان رضي الله عنه، فكان ذلك سببا لوقوع الاختلاف، وتفرق كلمة المسلمين.
وقوله:"فإن يصطلحوا فيما بينهم. . ." أي أنهم لم يصطلحوا نيما بينهم، فكان قد وقع فيهم سنن اللَّه الكونية من سفك الدماء، والقتال فيما بينهم، ولكن اللَّه بنعمته ورحمته حفظ هذه الأمة من الارتداد والهلاك، وستبقى ما شاء اللَّه إلى يوم القيامة.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামের যাঁতাকল পঁয়ত্রিশ, বা ছত্রিশ, বা সাইঁত্রিশে ঘুরবে (স্থিতিশীল থাকবে)। যদি তারা ধ্বংস হয়, তবে তা ধ্বংসপ্রাপ্তদের পথই হবে। আর যদি তাদের জন্য তাদের দ্বীন প্রতিষ্ঠিত থাকে, তবে তা সত্তর বছর পর্যন্ত প্রতিষ্ঠিত থাকবে।" [রাবী] বললেন, আমি জিজ্ঞাসা করলাম: এটি কি বাকি সময়ের থেকে (গণনা), নাকি যা অতিবাহিত হয়েছে তার থেকে (গণনা)? তিনি বললেন: "যা অতিবাহিত হয়েছে তার থেকে।"
15455 - عن كرز بن علقمة الخزاعي قال: قال أعرابي: يا رسول اللَّه، هل للإسلام من منتهى؟ قال:"نعم، أيما أهل بيت من العرب أو العجم أراد اللَّه عز وجل بهم خيرًا أدخل عليهم الإسلام"، قال: ثم ماذا يا رسول اللَّه؟ قال:"ثم تقع فتن كأنها الظلل"، فقال الأعرابي: كلا يا رسول اللَّه، قال النبي صلى الله عليه وسلم:"بلى والذي نفسي بيده لتعودن فيها أساودَ صُبا يضرب بعضكم رقاب بعض".
وزاد في رواية في آخرها:"وأفضل الناس مؤمن معتزل في شعب من الشعاب، يتقي ربه تبارك وتعالى، ويدع الناس من شره".
صحيح: رواه أحمد (15918، 15917)، وصحّحه الحاكم (1/ 34، و 4/ 454 - 455) كلاهما من طريق الزهري، عن عروة بن الزبير، عن كرز بن علقمة الخزاعي، فذكره.
وإسناده صحيح. وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح".
والرواية الثانية: رواها أحمد (15919)، وصحّحها ابن حبان (5956) كلاهما من طريق
الأوزاعي قال: حدّثنا عبد الواحد بن قيس، حدّثنا عروة بن الزبير، عن كرز الخزاعي، فذكره.
وإسنادها حسن من أجل عبد الواحد بن قيس فإنه حسن الحديث.
قوله:"أساود" جمع أسود أي حيات.
قوله:"صُبًّا" بضم الصاد وتشديد الباء أي كأنهم حيات مصبوبة على الناس.
কুরয ইবনে আলকামা আল-খুযাঈ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন বেদুঈন (আরব) বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! ইসলামের কি কোনো সমাপ্তি আছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, আরব বা অনারব যেই পরিবারকে আল্লাহ তাআলা কল্যাণ দান করতে চান, তাদের মধ্যে ইসলাম প্রবেশ করিয়ে দেন।" সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), এরপর কী হবে? তিনি বললেন: "এরপর এমন সব ফিতনা দেখা দেবে যা হবে অন্ধকারের মতো।" তখন সেই বেদুঈন বলল: কক্ষনো না, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, অবশ্যই! যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! তোমরা অবশ্যই তাতে (সেই ফিতনার মধ্যে) এমন বিষাক্ত সাপের মতো ঝাঁপিয়ে পড়বে যে, তোমাদের একে অপরকে হত্যা করবে।"
এবং অন্য এক বর্ণনায় এর শেষে অতিরিক্ত এসেছে: "আর সর্বোত্তম মানুষ সে মুমিন যে কোনো উপত্যকায় বা গিরিপথে নির্জনে থাকে, নিজের রব আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলাকে ভয় করে এবং মানুষকে তার অনিষ্ট থেকে রক্ষা করে।"
15456 - عن عبد اللَّه بن عمر يقول: كنا قعودًا عند رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فذكر الفتن، فأكثر فى ذكرها حتى ذكر فتنة الأَحلاس، فقال قائل: يا رسول اللَّه، وما فتنة الأحلاس؟ قال:"هي هربٌ وحربٌ ثم فتنة السَّرَّاء دَخَنُها من تحت قَدَمَيْ رجلٍ من أهل بيتي، يزعم أنه مني وليس مني، وإنما أوليائي المتقون، ثم يصطلحُ الناس على رجل كوركٍ على ضلعٍ، ثم فتنةُ الدُّهيماء لا تدع أحدًا من هذه الأمة إلا لطمتْه لطمةً، فإذا قيل: انقضت، تمادت، يُصبح الرجل فيها مؤمنًا ويُمسي كافرًا، حتى يصير الناس إلى فُسطاطَيْن: فُسطاط إيمانٍ لا نفاق فيه، وفُسطاط نفاقٍ لا إيمان فيه، فإذا كان ذاكم، فانتظروا الدجال من يومه أو من غده".
حسن: رواه أبو داود (4242)، وأحمد (6168)، والحاكم (4/ 466) كلهم من حديث أبي المغيرة، حدثني عبد اللَّه بن سالم (وهو الأشعري)، حدثني العلاء بن عتبة اليحصبي، عن عمير بن هانئ العنسي، سمعت عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
قلت: وهو كذلك؛ فإن رجاله رجال الصحيح غير العلاء بن عتبة فإنه صدوق من رجال أبي داود إلا أن أبا حاتم يرى أنه ليس بصحيح كأنه موضوع. العلل (2757).
كذا قال! وهو إمام هذا الفن، ولكنه لم يبيّنْ سبب الوضع، فلعله أشكل عليه معنى الحديث مثله مثل نظرائه في أحاديث الفتن.
وقوله:"يزعم أنه مني وليس مني" لقد وقع هذا كثيرًا في تاريخ الإسلام الطويل، فأراد النبي صلى الله عليه وسلم أن يحذّر أمته من هؤلاء الكذبة، ثم بيّن القاعدة العامة بقوله:"وإنما أوليائي المتقون"، وليس فيه نفيُ شرف لمن ثبت إليه صلى الله عليه وسلم.
وأما ما روي عن عبد اللَّه بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"يكون في هذه الأمة أربع فتن في آخرها الفناء". فلا يصح.
رواه أبو داود (4241)، وابن أبي شيبة (38723) كلاهما من طريق بدر بن عثمان قال: أخبرني الشعبي، عن رجل، عن عبد اللَّه بن مسعود فذكره.
وإسناده ضعيف؛ فإن الراوي عن عبد اللَّه بن مسعود مبهم لم يسم.
وكذلك ما رُويَ عن أبي موسى قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أمتي هذه أمة مرحومة، ليس عليها عذاب في الآخرة، عذابها في الدنيا: الفتن، والزلازل، والقتل".
رواه أبو داود (4278)، وأحمد (19678)، والحاكم (4/ 444) من طريق عبد الرحمن بن عبد اللَّه المسعودي، عن سعيد بن أبي بردة، عن أبيه، عن أبي موسى، فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
قلت: ولكن فيه المسعودي اختلط، وقد وقع اختلاف في إسناده، ساقه البخاري في التاريخ الكبير (1/ 38 - 39) ثم قال:"والخبر عن النبي صلى الله عليه وسلم في الشّفاعة، وأن قوما يعذبون، ثم يخرجون، أكثر، وأبين، وأشهر".
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম। তখন তিনি ফিতনা (বিপর্যয়) নিয়ে আলোচনা করলেন এবং সেটির আলোচনা দীর্ঘায়িত করলেন, এমনকি তিনি 'ফিতনাতুল আহলাস'-এর কথা উল্লেখ করলেন। তখন এক ব্যক্তি জিজ্ঞাসা করল: হে আল্লাহর রাসূল! ফিতনাতুল আহলাস কী? তিনি বললেন: "তা হলো পলায়ন এবং যুদ্ধ। এরপর আসবে আস-সাররা নামক ফিতনা, যার ধূম্রজাল (উৎপত্তি) হবে আমার আহলে বাইতের (পরিবারের) এক ব্যক্তির পায়ের নিচ থেকে, যে ধারণা করবে যে সে আমার অন্তর্ভুক্ত, কিন্তু সে আমার অন্তর্ভুক্ত নয়। বরং মুত্তাকিরাই (আল্লাহভীরুরাই) আমার আপনজন। এরপর লোকেরা এমন এক ব্যক্তির ব্যাপারে ঐক্যবদ্ধ হবে, যা হবে পাঁজরের উপর নিতম্ব রাখার মতো (অর্থাৎ বেমানান ও দুর্বল ভিত্তিযুক্ত শাসন)। এরপর আসবে আদ-দুহায়মা নামক ফিতনা, যা এই উম্মতের কাউকে আঘাত করা ছাড়া ছাড়বে না। যখন বলা হবে যে এটি শেষ হয়ে গেছে, তখন তা আরও দীর্ঘায়িত হবে। এই সময়ে মানুষ সকালে মুমিন থাকবে এবং সন্ধ্যায় কাফির হয়ে যাবে। অবশেষে লোকেরা দুটি তাঁবুতে বিভক্ত হয়ে যাবে: একটি হবে ঈমানের তাঁবু, যেখানে কোনো নিফাক (কপটতা) থাকবে না; আর অপরটি হবে নিফাকের তাঁবু, যেখানে কোনো ঈমান থাকবে না। যখন এমন অবস্থা হবে, তখন তোমরা সেই দিন বা পরের দিনের মধ্যেই দাজ্জালের (আগমন) অপেক্ষা করো।"
15457 - عن أسامة بن زيد قال: أشرف النبي صلى الله عليه وسلم على أُطُمٍ من آطام المدينة فقال:"هل ترون ما أرى؟" قالوا: لا، قال:"فإني لأرى الفتن تقع خلال بيوتكم كوقع القطر"
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7060)، ومسلم في الفتن وأشراط الساعة (2885) كلاهما من طريق الزهري، عن عروة، عن أسامة بن زيد، فذكره.
উসামা ইবনে যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনার দুর্গগুলোর (বা উঁচু ভবনের) একটির উপর আরোহণ করলেন এবং বললেন: “তোমরা কি দেখছ যা আমি দেখছি?” তারা বলল: “না।” তিনি বললেন: “নিশ্চয়ই আমি তোমাদের ঘরবাড়ির মধ্যে ফিতনাসমূহকে বৃষ্টির ফোঁটার মতো পতিত হতে দেখছি।”
15458 - عن حذيفة قال: كنا عند عمر، فقال: أيكم سمع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يذكر الفتن؟ فقال قوم: نحن سمعناه فقال: لعلكم تعنون فتنة الرجل في أهله وجاره؟ قالوا: أجل، قال: تلك تُكفّرها الصلاةُ والصيامُ والصدقةُ، ولكن أيكم سمع النبي صلى الله عليه وسلم يذكر الفتن التي تَموج موجَ البحر، قال حذيفة: فأسكت القوم فقلت: أنا، قال: أنت للَّه أبوك، قال حذيفة: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"تعرض الفتن على القلوب كالحصير عودًا عودًا، فأي قلب أُشربها كُكت فيه نكتةٌ سوداءُ، وأي قلب أَنكرها نُكت فيه نكتةٌ بيضاءُ، حتى تصير على قلبين، على أبيض مثل الصفا، فلا تضره فتنة ما دامت السماوات والأرض، والآخر أسود مربادًا كالكوز مجخيا لا يعرف معروفًا ولا ينكر منكرًا، إلا ما أُشرب من هواه".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (144: 231) عن محمد بن عبد اللَّه بن نمير، حدّثنا أبو خالد -يعني سليمان بن حيان- عن سعد بن طارق، عن ربعي، عن حذيفة، فذكره.
হুজাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তিনি বললেন: তোমাদের মধ্যে কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ফিতনা (বিপর্যয়) সম্পর্কে আলোচনা করতে শুনেছ? তখন কিছু লোক বলল: আমরা শুনেছি। তিনি বললেন: সম্ভবত তোমরা সেই ফিতনার কথা বলছ, যা একজন ব্যক্তির পরিবার ও প্রতিবেশীর মধ্যে ঘটে? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: সেই ফিতনা তো সালাত (নামায), সওম (রোযা) ও সদকা (দান) দ্বারা কাফ্ফারা হয়ে যায় (ক্ষমা হয়ে যায়)। কিন্তু তোমাদের মধ্যে কে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সেই ফিতনা সম্পর্কে আলোচনা করতে শুনেছ, যা সমুদ্রের ঢেউয়ের মতো আছড়ে পড়বে? হুজাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তখন উপস্থিত সকলে নীরব রইল। আমি বললাম: আমি। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ তোমার পিতাকে বরকত দিন (বা তোমার জন্য কল্যাণ হোক)। হুজাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ‘ফিতনাসমূহ অন্তরের ওপর একটির পর একটি চাটাইয়ের পাটির মতো করে পেশ করা হয়। যে অন্তর তা গ্রহণ করে, তাতে একটি কালো দাগ পড়ে। আর যে অন্তর তা অস্বীকার করে, তাতে একটি শুভ্র (সাদা) ফোঁটা পড়ে। এভাবে অন্তর দু’প্রকার হয়ে যায়: একটি হলো শুভ্র (সাদা), যা মসৃণ পাথরের মতো; আসমান ও জমিন বিদ্যমান থাকা পর্যন্ত কোনো ফিতনা তার ক্ষতি করতে পারবে না। আর অন্যটি হলো কালো, ধূসর বর্ণের, উপুড় করে রাখা কলসির মতো; তা কোনো ভালো জিনিসকে চেনে না এবং কোনো খারাপ জিনিসকে অস্বীকারও করে না—তবে কেবল তার প্রবৃত্তি যা গ্রহণ করে (তা ছাড়া)।’
15459 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم"إنه لم يكن نبي قبلي
إلا كان حقا عليه أن يدل أمته على خير ما يعلمه لهم وينذرهم شر ما يعلمه لهم، وإن أمتكم هذه جعل عافيتها في أولها، وسيُصيب آخرها بلاء، وأمور تنكرونها وتجيء فتنة، فيرقق بعضها بعضا، وتجيء الفتنة، فيقول المؤمن هذه مهلكتي، ثم تنكشف وتجيء الفتنة، فيقول المؤمن: هذه هذه فمن أحب أن يُزحزح عن النار، ويدخل الجنة فلتأته منيته، وهو يؤمن باللَّه واليوم الآخر، وليأت إلى الناس الذي يحب أن يؤتى إليه، ومن بايع إماما، فأعطاه صفقة يده، وثمرة قلبه، فليطعْه إن استطاع، فإن جاء آخر ينازعه فاضربوا عنق الآخر".
صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1844: 46) من طريق جرير، عن الأعمش، عن زيد بن وهب، عن عبد الرحمن بن عبد رب الكعبة، عن عبد اللَّه بن عمرو، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আমার পূর্বে এমন কোনো নবী ছিলেন না, যার উপর এটা আবশ্যক ছিল না যে, তিনি তাঁর উম্মতকে এমন সব কল্যাণের প্রতি পথনির্দেশ করবেন যা তিনি তাদের জন্য জানেন এবং তাদের এমন সব অকল্যাণ সম্পর্কে সতর্ক করবেন যা তিনি তাদের জন্য জানেন। আর তোমাদের এই উম্মতের নিরাপত্তা এর প্রারম্ভে রাখা হয়েছে। এর শেষ দিকে বিপদ-মুসিবত ও এমন সব বিষয় আসবে যা তোমরা অপছন্দ করবে। আর ফিতনা আসবে, যার কিছু অংশ অপর অংশকে হালকা করে দেবে। আবার ফিতনা আসবে, তখন মু'মিন বলবে: এটিই আমার ধ্বংসের কারণ। এরপর তা দূর হয়ে যাবে। আবার ফিতনা আসবে, তখন মু'মিন বলবে: এটিই, এটিই (আসল ফিতনা)। অতএব, যে ব্যক্তি আগুন থেকে দূরে থাকতে এবং জান্নাতে প্রবেশ করতে ভালোবাসে, সে যেন এমতাবস্থায় মৃত্যুবরণ করে যে, সে আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি বিশ্বাস রাখে। আর সে যেন মানুষের সাথে এমন ব্যবহার করে যেমন ব্যবহার সে নিজে পেতে পছন্দ করে। আর যে ব্যক্তি কোনো ইমামের (নেতার) হাতে বায়আত করল এবং তার হাতের বন্ধন (শপথ) ও হৃদয়ের ফল (আন্তরিকতা) দিল, সে যেন যথাসম্ভব তাকে মেনে চলে। অতঃপর যদি অন্য কেউ এসে তার সাথে ঝগড়া করে (বা ক্ষমতা নিয়ে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করে), তবে তোমরা সেই অপরজনের গর্দান উড়িয়ে দাও।
15460 - عن الزبير بن عدي، قال: أتينا أنس بن مالك، فشكونا إليه ما نلقى من الحجاج، فقال:"اصبروا، فإنه لا يأتي عليكم زمان إلا الذي بعده شر منه، حتى تلقوا ربكم" سمعته من نبيكم صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاريّ في الفتن (7068) من طريق محمد بن يوسف، حدّثنا سفيان (هو الثوري)، عن الزبير بن عدي قال: فذكره.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (যুবাইর ইবনে আদী বলেন,) আমরা তাঁর নিকট এসে হাজ্জাজ (ইবনে ইউসুফ সাকাফী)-এর পক্ষ থেকে পাওয়া অত্যাচারের অভিযোগ করলাম। তিনি বললেন: "ধৈর্য ধারণ করো। কেননা তোমাদের ওপর এমন কোনো যুগ অতিবাহিত হবে না, যার পরবর্তী যুগ তার চেয়ে খারাপ হবে না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের রবের সাথে মিলিত হও।" তিনি আরও বললেন: "আমি এই কথাটি তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।"
15461 - عن عبد اللَّه بن عمر أنه سمع النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا ترجِعوا بعدي كفارًا يضرب بعضُكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7077)، ومسلم في الإيمان (66) كلاهما من طريق شعبة، أخبرني واقد بن محمد بن زيد، أنه سمع أباه، يحدث عن عبد اللَّه بن عمر، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমার পরে তোমরা কাফির হয়ে যেও না যে, তোমাদের একে অপরের গর্দান মারবে।"
15462 - عن جرير قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع:"استنصِت الناس" فقال:"لا ترجعوا بعدي كفّارًا يضربُ بعضُكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7080)، ومسلم في الإيمان (65) كلاهما من حديث شعبة، أخبرني علي بن مُدركة، سمعت أبا زرعة بن عمرو بن جرير، يحدث عن جدّه جرير، فذكره، ولفظهما سواء.
জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, বিদায় হজ্জের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "মানুষকে চুপ করাতে বলো।" অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার পরে তোমরা একে অপরের গর্দান কর্তনকারী রূপে কুফরী অবস্থায় ফিরে যেও না।"
15463 - عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا ترتدوا بعدي كفارا، يضرب بعضُكم رقابَ بعض".
صحيح: رواه البخاريّ في الفتن (7079) عن أحمد بن إشكاب، حدّثنا محمد بن فضيل، عن أبيه، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "তোমরা আমার পরে একে অপরের ঘাড়ের উপর আঘাত হেনে (অর্থাৎ পরস্পর হত্যা করে) কুফরি অবস্থায় ফিরে যেও না।"
15464 - عن أبي بكرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خطب الناس، فقال:"ألا تدرون أيُّ يوم هذا؟" قالوا: اللَّه ورسولُه أعلم، قال: حتى ظننا أنه سَيُسمّيه بغير اسمه، فقال:"أليس بيوم النحر"، قلنا: بلى يا رسول اللَّه، قال:"أي بلد هذا؟ أليست بالبلدة الحرام؟" قلنا: بلى يا رسول اللَّه، قال:"فإن دماءَكم وأموالَكم وأعراضَكم وأبشارَكم عليكم حرام كحرمة يومكم هذا، في شهركم هذا، في بلدكم هذا، ألا هل بلّغتُ؟" قلنا: نعم، قال:"اللهم اشْهدْ، فليبلغ الشاهدُ الغائبَ، فإنه رُبَّ مبلّغٍ يبلغه لمن هو أوعى له". فكان كذلك، قال:"لا ترجعوا بعدي كفارًا يضرب بعضكم رقاب بعض".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7078)، ومسلم في القسامة (1679: 31) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد، حدّثنا قرة بن خالد، حدّثنا ابن سيرين، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبي بكرة، وعن رجل آخر -هو أفضل في نفسي من عبد الرحمن بن أبي بكرة-، عن أبي بكرة، فذكره.
والرجل الآخر هو: حميد بن عبد الرحمن كما سماه يحيى بن سعيد في إسناد آخر عند الإمام مسلم.
আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকজনের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "তোমরা কি জানো আজকের দিনটি কেমন?" তারা বলল: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই অধিক জানেন। (বর্ণনাকারী বলেন) এমনকি আমরা ধারণা করলাম যে তিনি হয়তো এর অন্য কোনো নাম বলবেন। তখন তিনি বললেন: "এটা কি ইয়াওমুন-নাহার (কুরবানীর দিন) নয়?" আমরা বললাম: অবশ্যই, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন: "এটা কোন শহর? এটা কি পবিত্র শহর নয়?" আমরা বললাম: অবশ্যই, হে আল্লাহর রাসূল। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের রক্ত, তোমাদের সম্পদ, তোমাদের মান-সম্মান এবং তোমাদের চামড়া (দেহ) তোমাদের উপর ঠিক ততখানিই হারাম, যতখানি হারাম তোমাদের এই দিনে, তোমাদের এই মাসে এবং তোমাদের এই শহরে। শুনে রাখো, আমি কি পৌঁছিয়ে দিয়েছি?" আমরা বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "হে আল্লাহ, সাক্ষী থাকুন! উপস্থিত ব্যক্তি যেন অনুপস্থিতদের কাছে এই বার্তা পৌঁছে দেয়। কারণ অনেক প্রচারক যার কাছে বার্তা পৌঁছায়, সে তার চেয়েও অধিক স্মরণকারী হতে পারে (বা অধিক উপলব্ধি করতে পারে)।" অতঃপর তিনি বললেন: "আমার পরে তোমরা একে অপরের গর্দান কর্তনকারী কাফিরে পরিণত হয়ো না।"
15465 - عن واثلة بن الأسقع يقول: خرج علينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال:"أتزعمون أني آخركم وفاة؟ ألا إني من أولكم وفاة، وتتبعوني أفنادًا، يهلك بعضكم بعضا".
صحيح: رواه أحمد (16978)، وأبو يعلى (7488، 7490)، وصحّحه ابن حبان (6646) كلهم من طرق عن الأوزاعي قال: حدثني ربيعة بن يزيد قال: سمعت واثلة بن الأسقع يقول: فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في المجمع (7/ 306):"رجال أحمد رجال الصحيح".
وقوله:"أفنادا" جمع فند أي جماعات متفرقين، قوما بعد قوم.
وقوله:"إني من أولكم وفاة" فيه إخبار عن قرب وفاته صلى الله عليه وسلم، وأنه سيموت قبل أصحابه الكبار مثل أبي بكر، وعمر، وعثمان، وعلي، وغيرهم، وكذلك قبل كثير من أصحابه، وهو وقع كما قال النبي صلى الله عليه وسلم، وآخر أصحابه موتًا توفي بعد وفاته صلى الله عليه وسلم بمائة سنة.
ওয়াছিলাহ ইবনুল আসকা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের নিকট রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন এবং বললেন: "তোমরা কি ধারণা করো যে, তোমাদের মধ্যে আমার মৃত্যু সবার শেষে হবে? শুনে রাখো! নিশ্চয়ই তোমাদের মধ্যে আমার মৃত্যু সবার আগে হবে। আর তোমরা আমার অনুসরণ করবে বিভিন্ন দল হয়ে (বিচ্ছিন্নভাবে), তোমাদের একে অপরের ধ্বংস সাধন করবে।"
15466 - عن معاوية بن أبي سفيان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"تزعمون أني من آخركم وفاةً، ألا وإني من أولكم وفاة، ولتتبعني أفنادًا، يضرب بعضكم رقاب بعض".
حسن: رواه أبو يعلى (7366)، والطبراني في الكبير (19905) كلاهما من طريق الوليد بن مسلم، حدّثنا مروان بن جناح، عن يونس بن ميسرة بن حلبس، عن معاوية بن أبي سفيان، فذكره.
واللفظ لأبي يعلى وسياق الطبراني أطول.
وإسناده حسن من أجل مروان بن جناح فإنه حسن الحديث.
মুয়াবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা মনে করো যে আমি তোমাদের মধ্যে সবার শেষে মারা যাব। সাবধান! নিশ্চয়ই আমি তোমাদের মধ্যে সবার আগে মারা যাব। আর তোমরা দলে দলে আমার অনুসরণ করবে, যেখানে তোমরা একে অপরের ঘাড়ে আঘাত হানবে।"
15467 - عن الأحنف بن قيس، قال: ذهبتُ لأنصر هذا الرجل (يعني عليَّ بن أبي طالب) فلقيني أبو بكرة فقال: أين تريدُ؟ قلت: أنصرُ هذا الرجل. قال: ارجع، فإني سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا التقى المسلمان بسيفيهما فالقاتلُ والمقتولُ في النار". فقلت: يا رسول اللَّه، هذا القاتل، فما بال المقتول؟ قال:"إنه كان حريصًا على قتل صاحبه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (31)، ومسلم في الفتن (2888) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن أيوب ويونس، عن الحسن، عن الأحنف بن قيس، فذكره.
আহনাফ ইবনে ক্বায়স থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এই লোকটিকে (অর্থাৎ আলী ইবনে আবী তালিবকে) সাহায্য করার জন্য যাচ্ছিলাম। তখন আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার সাথে দেখা করে বললেন, তুমি কোথায় যাচ্ছো? আমি বললাম, এই লোকটিকে সাহায্য করতে। তিনি বললেন, ফিরে যাও। কারণ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:
"যখন দু'জন মুসলিম তাদের তরবারি নিয়ে একে অপরের মুখোমুখি হয়, তখন হত্যাকারী এবং নিহত—উভয়ই জাহান্নামে যাবে।"
তখন আমি বললাম (অর্থাৎ, প্রশ্নকারী বললো), ‘হে আল্লাহর রাসূল! এই তো হত্যাকারী, কিন্তু নিহত ব্যক্তির কী দোষ?’ তিনি বললেন, "সেও তার সাথীকে হত্যা করার জন্য আগ্রহী ছিল।"