হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (15548)


15548 - عن أبي عامر عبد اللَّه بن لحي قال: حججنا مع معاوية بن أبي سفيان، فلما قدمنا مكة قام حين صلى صلاة الظهر، فقال إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن أهل الكتابين افترقوا في دينهم على ثنتين وسبعين ملة، وإن هذه الأمة ستفترق على ثلاث وسبعين ملة -يعني الأهواء- كلها في النار إلا واحدة، وهي الجماعة، وإنه سيخرج في أمتي أقوام تجارى بهم تلك الأهواء، كما يتجارى الكلب بصاحبه، لا يبقى منه عرق ولا مفصل إلا دخله".

واللَّه، يا معشر العرب، لئن لم تقوموا بما جاء به نبيكم صلى الله عليه وسلم لغيركم من الناس أحرى أن لا يقوم به.
حسن: رواه أحمد (16937) والسياق له، وأبو داود (4597)، والدارمي (2560)، وابن أبي عاصم في السنة (1، 2)، وصحّحه الحاكم (1/ 128) كلهم من طرق عن صفوان بن عمرو، حدثني أزهر بن عبد اللَّه الحرازي، عن أبي عامر عبد اللَّه بن لحي الهوزني، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أزهر بن عبد اللَّه الحرازي فإنه حسن الحديث. وحسّنه أيضًا ابن حجر في تخريج أحاديث الكشاف (62).

قوله:"الكَلَب" بفتحتين، داء يصيب الإنسان من عضَّ الكلب المجنون.

وفي معناه ما روي عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص. رواه الترمذيّ (2641)، وفيه عبد الرحمن ابن زياد الإفريقي ضعيف.

قال الخطابي في معالم السنن:"فيه دلالة على أن هذه الفرق كلها غير خارجة من الدين، إذْ قد جعلهم النبي صلى الله عليه وسلم كلهم من أمته، وفيه أن المتأول لا يخرج من الملة وإنْ أخطأ في تأويله" اهـ.

قلت: وهو كما قال وقوله:"كلها في النار إلا واحدة" أي أن هذه الفرق لا تدخل الجنة دخولا أوليًّا، كما أنها لا تبقى في النار على وجه التأبيد بخلاف الفرقة الناجية فإنها تدخل الجنة دخولا أوليا.

وقوله:"ستفترق أمتي على ثلاث وسبعين فرقة" ليس المراد به الحصر، وإنما المراد به الكثرة لأن الحصر ليس بمطابق للواقع.




মুয়াবিয়া ইবনে আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি যোহরের সালাত আদায়ের পর দাঁড়িয়ে বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় কিতাবধারী দু’টি জাতি (ইয়াহুদী ও খ্রিষ্টানগণ) তাদের ধর্মে বাহাত্তর (৭২)টি দলে বিভক্ত হয়েছিল। আর এই উম্মতও তিয়াত্তর (৭৩)টি দলে—অর্থাৎ প্রবৃত্তির অনুসারী দলে—বিভক্ত হবে। এদের মধ্যে মাত্র একটি দল ব্যতীত বাকি সব জাহান্নামে যাবে। আর সেই মুক্তিপ্রাপ্ত দলটি হলো 'আল-জামায়াত' (ঐক্যবদ্ধ মূলধারা)। আর নিশ্চয়ই আমার উম্মতের মধ্যে এমন কিছু লোক বের হবে যাদের মধ্যে সেইসব কুপ্রবৃত্তি এমনভাবে সংক্রমিত হবে, যেমন জলাতঙ্ক রোগ তার আক্রান্ত ব্যক্তির মধ্যে ছড়িয়ে পড়ে; তার কোনো রগ বা অস্থিসন্ধি অবশিষ্ট থাকবে না যেখানে এটি প্রবেশ করবে না।" এরপর তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম! হে আরবের লোকেরা, যদি তোমরা তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর আনীত বিষয়গুলি প্রতিষ্ঠিত না করো, তবে তোমাদের ছাড়া অন্য লোকেরা তা প্রতিষ্ঠিত না করার ক্ষেত্রে অধিকতর যোগ্য (অর্থাৎ পিছিয়ে থাকবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (15549)


15549 - عن سمرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"توشكون أن يملأ اللَّه أيديكم من العجم، ثم يكونون أسدًا لا يفرون، يقتلون مقاتلتكم، ويأكلون فيئكم".

صحيح: رواه أحمد (20181)، والبزار (4537)، والطبراني في الكبير (7/ 268)، وصحّحه الحاكم (4/ 512) كلهم من حديث عفان بن مسلم، قال: حدّثنا حماد بن سلمة، أخبرنا يونس بن عبيد، عن الحسن، عن سمرة، فذكره.

وقال البزار:"وهذا الحديث لا نعلمه يروى عن سمرة إلا من هذا الوجه، ولا نعلمه رواه عن يونس إلا حماد بن سلمة".

قلت: لم ينفرد به حماد بن سلمة عن يونس، بل تابعه هشيم بن بشير عنه كما عند أحمد (20123). قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".

ورواه يزيد بن إبراهيم، عن الحسن، عن أبي موسى نحوه كما عند الروياني في مسنده (537). والأشبه بالصواب ما رواه يونس بن عبيد، عن الحسن، عن سمرة كما جزم الدارقطني في العلل (7/ 251).
وفي مطبوعة مجمع الزوائد (7/ 311):"عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يوشك أن يكثر فيكم من العجم أسد لا يفرون، فيقتلون مقاتلتكم، ويأكلون فيئكم". رواه الطبراني ورجاله رجال الصحيح".

قلت: لم أقف عليه في المعجمين الصغير والأوسط، وأما الكبير فليس فيه مسند أبي هريرة.

وجعله السيوطي في الجامع الكبير من مسند أبي موسى، وعزاه إلى الطبراني فيحتمل أن يكون وقع خطأ (عن أبي هريرة) في مطبوعة الزوائد.




সামুরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "অচিরেই আল্লাহ তাআলা তোমাদের হাত আজম (অনারব) জাতি দ্বারা পূর্ণ করে দেবেন। অতঃপর তারা এমন সিংহে পরিণত হবে যারা (যুদ্ধক্ষেত্র থেকে) পলায়ন করবে না। তারা তোমাদের যোদ্ধাদের হত্যা করবে এবং তোমাদের ফায় (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) ভক্ষণ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15550)


15550 - عن ثوبان مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يُوشك أن تداعَى عليكم الأممُ من كل أفق كما تَدَاعى الأكلةُ على قَصْعتها"، قال: قلنا: يا رسول اللَّه أمن قلة بنا يومئذ؟ قال:"أنتم يومئذ كثير، ولكن تكونون غُثَاءً كغُثاءِ السيلِ تُنْزع المهابةُ من قلوب عدوكم، ويُجعل في قلوبكم الوهنُ"، قال: قلنا: وما الوهن؟ قال:"حبُّ الحياة، وكراهيةُ الموت".

حسن: رواه أحمد (22397) عن أبي النضر، حدّثنا المبارك بن فضالة، حدثنا مرزوق أبو عبد اللَّه الحمصي، حدّثنا أبو أسماء الرحبي، عن ثوبان مولى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.

وإسناده حسن فإن المبارك -هو ابن فضالة- حسن الحديث إذا صرح بالتحديث، ومرزوق أبو عبد اللَّه الحمصي حسن الحديث أيضًا.

ورواه أبو داود (4297)، وابن أبي عاصم في الزهد (268) كلاهما من طريق آخر عن أبي عبد السلام، عن ثوبان، فذكره.

وأبو عبد السلام قيل هو: صالح بن رستم الهاشمي مولاهم، وقيل: هو آخر لا يعرف اسمه، وهو مجهول ولكنه توبع.




সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "অচিরেই বিভিন্ন জাতি তোমাদের উপর ঝাঁপিয়ে পড়বে—সকল দিক থেকে, যেভাবে ক্ষুধার্ত ব্যক্তিরা খাবারের পাত্রের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ে।" তিনি বলেন, আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সেদিন কি আমাদের সংখ্যা কম হওয়ার কারণে এমনটি হবে? তিনি বললেন: "বরং সেদিন তোমরা সংখ্যায় অনেক হবে, কিন্তু তোমরা হবে বন্যার স্রোতে ভেসে আসা আবর্জনার মতো। তোমাদের শত্রুদের অন্তর থেকে তোমাদের প্রতি ভয় দূর করে নেওয়া হবে এবং তোমাদের অন্তরে 'আল-ওয়াহন' (দুর্বলতা) সৃষ্টি করা হবে।" তিনি বলেন, আমরা বললাম: 'আল-ওয়াহন' কী? তিনি বললেন: "জীবনের প্রতি মাত্রাতিরিক্ত ভালোবাসা এবং মৃত্যুকে অপছন্দ করা (বা মৃত্যুর ভয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (15551)


15551 - عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يُوشك المسلمون أن يحاصروا إلى المدينة حتى يكون أبعد مسالحهم سلاح".

صحيح: رواه أبو داود (4250)، وصحّحه ابن حبان (6771)، والحاكم (4/ 511) كلهم من طرق عن ابن وهب قال: حدّثنا جرير بن حازم، عن عبيد اللَّه بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده صحيح. وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وقوله:"سلاح" موضع قريب من خيبر كما نقله أبو داود عن الزهري.

وقوله:"مسالحهم" أي ثغورهم التي فيها أقوام يرقبون عدوهم.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "অচিরেই মুসলিমদেরকে মদীনার দিকে অবরুদ্ধ করা হবে, এমনকি তাদের দূরতম সীমান্তচৌকি (বা ঘাঁটি) 'সিলাহ' নামক স্থান পর্যন্ত হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15552)


15552 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا وقعت الملاحم بعث اللَّه بعثا من الموالي هم أكرم العرب فرسًا، وأجوده سلاحًا، يؤيد اللَّه بهم الدين".

حسن: رواه ابن ماجه (4090)، وصحّحه الحاكم (4/ 548) كلاهما من طريق عثمان بن أبي العاتكة، عن سليمان بن حبيب المحاربي، عن أبي هريرة، فذكره.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري".

وإسناده حسن من أجل عثمان بن أبي العاتكة فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في غير روايته عن علي بن يزيد الألهاني.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মহাযুদ্ধসমূহ (মালাহিম) সংঘটিত হবে, আল্লাহ মাওয়ালীদের (অনারব বা স্বাধীন হওয়া দাসদের) মধ্য থেকে একটি দল প্রেরণ করবেন। ঘোড়ার দিক থেকে তারা আরবের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সম্মানিত এবং অস্ত্রের দিক থেকে সবচেয়ে উন্নত হবে। আল্লাহ তাদের দ্বারা দ্বীনকে শক্তিশালী করবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (15553)


15553 - عن عبد اللَّه بن عمر قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا أراد اللَّه بقوم عذابا أصاب العذاب من كان فيهم، ثم بعثوا على أعمالهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7108)، ومسلم في الجنة وصفة نعيمها (2879) كلاهما من طريق عبد اللَّه بن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب الزهري، أخبرني حمزة بن عبد اللَّه بن عمر أنه سمع عبد اللَّه بن عمر يقول: فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন আল্লাহ কোনো কওমকে শাস্তি দিতে ইচ্ছা করেন, তখন তাদের মধ্যে যারা থাকে, সবার উপরই সেই আযাব নেমে আসে। অতঃপর তারা নিজ নিজ আমল অনুযায়ী উত্থিত হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15554)


15554 - عن طارق بن شهاب أن رجلا سأل النبي صلى الله عليه وسلم وقد وضع رجله في الغرز: أي الجهاد أفضل؟ قال:"كلمة حق عند سلطان جائر".

صحيح: رواه النسائي (4209)، وأحمد (18828، 18830) من طرق عن سفيان (هو الثوري)، عن علقمة بن مرثد، عن طارق بن شهاب، فذكره.

وإسناده صحيح، وطارق بن شهاب رأى النبي صلى الله عليه وسلم ولم يسمع منه فروايته من قبيل مرسل الصحابي وهو حجة.




তারিক ইবনু শিহাব থেকে বর্ণিত, যে এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে জিজ্ঞাসা করলেন, যখন তিনি (সওয়ার হওয়ার জন্য) রেকাবে পা রেখেছিলেন: সর্বোত্তম জিহাদ কোনটি? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “জালিম শাসকের সামনে হক কথা বলা।”









আল-জামি` আল-কামিল (15555)


15555 - عن أبي أمامة قال: عرض لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رجل عند الجمرة الأولى، فقال: يا
رسول اللَّه أي الجهاد أفضل؟ فسكت عنه، فلما رأى الجمرة الثانية سأله، فسكت عنه، فلما رمى جمرة العقبة، وضع رجله في الغرز ليركب، قال:"أن السائل؟" قال: أنا يا رسول اللَّه، قال:"كلمة حق عند سلطان جائر".

حسن: رواه ابن ماجه (4012)، وأحمد (22158، 22207) كلاهما من طرق عن حماد بن سلمة، عن أبي غالب، عن أبي أمامة، فذكره.

وإسناده حسن، من أجل أبي غالب، فإنه مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث ما لم يتبين خلافه.




আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রথম জামরার (নিকট) একজন লোক এসে বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! কোন জিহাদটি শ্রেষ্ঠ? তিনি তার সম্পর্কে নীরব থাকলেন। যখন তিনি দ্বিতীয় জামরা দেখলেন, তখন লোকটি তাঁকে (আবার) জিজ্ঞাসা করল, কিন্তু তিনি তার সম্পর্কে নীরব থাকলেন। যখন তিনি জামরাতুল আকাবায় পাথর নিক্ষেপ করলেন এবং আরোহণ করার জন্য রিকাবে পা রাখলেন, তিনি বললেন: "জিজ্ঞেসকারী লোকটি কে?" সে বলল: আমি ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: "অত্যাচারী শাসকের সামনে সত্য কথা বলা।"









আল-জামি` আল-কামিল (15556)


15556 - عن أبي سعيد الخدري أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن من أعظم الجهاد كلمة عدل عند سلطان جائر".

حسن: رواه أبو داود (4344)، والترمذي (2174) واللفظ له، وابن ماجه (4011) كلهم من حديث إسرائيل، حدّثنا محمد بن جحادة، عن عطية العوفي، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه".

قلت: في إسناده عطية العوفي - هو ابن سعد بن جنادة ضعيف من سوء حفظه، وقد وجدت له متابعًا عند أحمد (11143) في حديث طويل، وهو مخرج في موضعه، رواه من طريق علي بن زيد ابن جدعان، عن أبي النضرة، عن أبي سعيد.

وابن جدعان ضعيف، وبهذين الطريقين يكون الحديث حسنا.




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই সর্বশ্রেষ্ঠ জিহাদ হলো জালিম শাসকের সামনে হক বা ন্যায়ের কথা বলা।









আল-জামি` আল-কামিল (15557)


15557 - عن ابن عمر قال: سمعتُ الحجاج يخطب فذكر شيئًا أنكرته فذكرت مقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا ينبغي للمؤمن أن يذل نفسه" قلت: يا رسول اللَّه! كيف يذل نفسه؟ قال:"يتعرض من البلاء لما لا يُطيق".

حسن: رواه الطبراني في الأوسط (5353) عن محمد بن أحمد بن أبى خيثمة، قال: حدّثنا زكريا بن يحيى الضرير، حدّثنا شبابة، عن ورقاء بن عمر، عن عبد الكريم، عن مجاهد، عن ابن عمر قال: فذكره.

ورواه البزار - الكشف (3323) عن زكريا بن يحيى الضرير البغدادي بهذا الإسناد إلا أنه وقع في مطبوعة الكشف:"ثنا شبابة بن سوار، ثنا العلاء بن عبد الكريم، عن مجاهد". والصواب ما في الأوسط.

وقال الطبراني عقبه:"لم يرو هذا الحديث عن مجاهد إلا عبد الكريم، ولا يُروى عن ابن عمر إلا بهذا الإسناد".

قلت: عبد الكريم هو ابن مالك الجزري فيما يظهر، وهو ثقة، وزكريا بن يحيى الضرير ترجم
له الخطيب في تاريخه (8/ 457)، ولم يذكر فيه جرحا أو تعديلا، لكن روى عنه جمع منهم أئمة حفاظ، فمثله يحسن حديثه ما لم يتبين العكس، وقد جوّد العراقي هذا الإسناد في تخريج الإحياء (1/ 152).

وقال الهيثمي في مجمع الزوائد (7/ 274):"رواه البزار والطبراني في الأوسط والكبير باختصار، وإسناد الطبراني في الكبير جيد، ورجاله رجال الصحيح غير زكريا بن يحيى بن أيوب الضرير، روى عن جماعة، وروى عنه جماعة، ولم يتكلم فيه أحد" اهـ.

وقع إسناده في مطبوعة الطبراني هكذا:"حدّثنا محمد بن أحمد بن أبي خيثمة، قال: حدّثنا زكريا بن يحيى المدائني، حدّثنا شبابة بن سوار، عن ورقاء بن عمر، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عمر".

كذا وقع"ابن أبي نجيح"، ويبدو أن هذا خطأ فإن الطبراني قد نص في الأوسط:"لم يروه عن مجاهد إلا عبد الكريم".

وعلى فرض صحته فإنه لا يقدح لأن ابن أبي نجيح -واسمه عبد اللَّه- ثقة أيضًا، وله ما يقوي.

وفي معناه ما روي عن حذيفة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا ينبغي للمؤمن أن يذل نفسه، قالوا: وكيف يذل نفسه؟ قال: يتعرض من البلاء لما لا يطيق".

رواه الترمذيّ (2254)، وابن ماجه (4016)، وأحمد (23444) كلهم من حديث عمرو بن عاصم قال: حدّثنا حماد بن سلمة، عن علي بن زيد، عن الحسن، عن جندب، عن حذيفة، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب".

قلت: في إسناده علي بن زيد وهو ابن جدعان ضعّفه جمهور أهل العلم.

وقد روي مرسلا عن الحسن عن النبي صلى الله عليه وسلم وهو أصح.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি হাজ্জাজকে খুতবা দিতে শুনেছি। সে এমন কিছু আলোচনা করছিল যা আমি অপছন্দ করলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথা স্মরণ করলাম: "কোনো মু'মিনের জন্য উচিত নয় যে সে নিজেকে অপমানিত করে।" আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! সে কিভাবে নিজেকে অপমানিত করে? তিনি বললেন, "সে এমন বিপদের সম্মুখীন হয় যা সে সহ্য করতে সক্ষম নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (15558)


15558 - عن ابن عمر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لن تجتمع أمتي على الضلالة أبدًا فعليكم بالجماعة فإن يد اللَّه على الجماعة".

حسن: رواه الطبراني في الكبير (12/ 447) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، حدثني محمد بن أبي بكر المقدمي، ثنا معتمر بن سليمان، عن مرزوق مولى آل طلحة، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل مرزوق مولى آل طلحة فإنه حسن الحديث.

وقد روي الحديث عن المعتمر بن سليمان على أوجه عديدة، منها: ما رواه الترمذيّ (2167)، وابن أبي عاصم في السنة (80)، والحاكم (1/ 115) كلهم من طريق المعتمر بن سليمان، حدّثنا
سليمان المدني، عن عبد اللَّه بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.

وقال الترمذيّ:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وسليمان المدني هو عندي سليمان بن سفيان، وقد روى عنه أبو داود الطيالسي وأبو عامر العقدي وغير واحد من أهل العلم".

قلت: سليمان بن سفيان ضعّفه ابن المديني وابن معين، وأبو زرعة، وأبو حاتم، والنسائي وغيرهم.

وقد ساق الحاكم (1/ 114 - 115) سبعة أوجه من وجوه الاختلاف على المعتمر بن سليمان ثم قال:

فقد استقر الخلاف في إسناد هذا الحديث على المعتمر بن سليمان، وهو أحد أركان الحديث من سبعة أوجه لا يسعنا أن نحكم أن كلها محمولة على الخطأ بحكم الصواب لقول من قال: عن المعتمر، عن سليمان بن سفيان المدني، عن عبد اللَّه بن دينار، ونحن إذا قلنا هذا القول نسبنا الراوي إلى الجهالة، فوهنّا به الحديث، ولكنا نقول إن المعتمر بن سليمان أحد أئمة الحديث، وقد روي عنه هذا الحديث بأسانيد يصح بمثلها الحديث، فلا بد من أن يكون له أصل بأحد هذه الأسانيد.

ثم وجدنا للحديث شواهد من غير حديث المعتمر لا أدعي صحتها ولا أحكم بتوهينها بل يلزمني ذكرها لإجماع أهل السنة على هذه القاعدة من قواعد الإسلام، فممن روى عنه هذا الحديث من الصحابة عبد اللَّه بن عباس". اهـ

قلت: حديث ابن عباس حسن وهو الحديث الآتي:




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মত কখনোই পথভ্রষ্টতার উপর একমত হবে না। সুতরাং তোমরা জামা'আতের (ঐক্যবদ্ধ সমাজের) সাথে থাকো। কারণ, আল্লাহর সাহায্য জামা'আতের উপর রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15559)


15559 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يجمع اللَّه أمتي -أو قال: - هذه الأمة على الضلالة أبدًا، ويد اللَّه على الجماعة".

حسن: رواه الحاكم (1/ 115)، من وجهين: عن سلمة بن شعيب والعباس بن عبد العظيم - كلاهما عن عبد الرزاق، أنبأ إبراهيم بن ميمون، أخبرني عبد اللَّه بن طاوس، أنّه سمع أباه يحدث، أنه سمع ابن عباس يحدث أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.

ورواه أيضًا الترمذيّ (2166) عن يحيى بن موسى، قال: حدّثنا عبد الرزاق، فذكره بإسناده. ولفظه:"يد اللَّه مع الجماعة".

وقال:"حسن غريب، لا نعرفه من حديث ابن عباس إلا من هذا الوجه".

قلت: وهو كما قال؛ فإنّ إبراهيم بن ميمون الصنعاني -ويقال: الزبيدي- حسن الحديث. ووثّقه ابن معين وذكره ابن حبان في الثقات.

والكلام عليه مبسوط في تفسير سورة النساء (115).

روي عن أبي مالك الأشعري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن اللَّه أجاركم من ثلاث خلال: أن لا يدعو عليكم نبيكم فتهلكوا جميعا، وأن لا يظهر أهل الباطل على أهل الحق، وأن لا تجتمعوا على ضلالة".
رواه أبو داود (4253) عن محمد بن عوف الطائي، ثنا محمد بن إسماعيل، حدثني أبي، قال ابن عوف: وقرأت في أصل إسماعيل، قال: حدثني ضمضم، عن شريح، عن أبي مالك الأشعري قال: فذكره.

وشريح هو ابن عبيد لم يسمع من أبي مالك الأشعري كما قال أبو حاتم، ولذا قال ابن حجر في التلخيص (3/ 141) في إسناده انقطاع.

ومحمد بن إسماعيل بن عياش متكلم فيه وعابوا عليه أنه حدث عن أبيه من غير سماع، لكن ذكر ابن عوف أنه قرأ هذا الحديث في أصل أبيه إسماعيل بن عياش.

وكذلك لا يصح ما روي عن أنس بن مالك يقول: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: يقول:"إن أمتي لا تجتمع على ضلالة، فإذا رأيتم اختلافا فعليكم بالسواد الأعظم".

رواه ابن ماجه (3950)، وعبد بن حميد (1220)، وابن عدي في ترجمة معان بن رفاعة من الكامل كلهم من طريق معان بن رفاعة السلامي، حدثني أبو خلف الأعمى قال: سمعت أنس بن مالك يقول: فذكره.

ومعان بن رفاعة ضعيف، وأبو خلف الأعمى متروك، ورماه ابن معين بالكذب.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ আমার উম্মতকে—অথবা তিনি বললেন: এই উম্মতকে—কখনো পথভ্রষ্টতার ওপর একত্রিত করবেন না। আর আল্লাহর হাত জামা‘আতের (সংগঠিত দলের) উপর রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (15560)


15560 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إن اللَّه يبعث لهذه الأمة على رأس كل مائة سنة من يجدد لها دينها".

حسن: رواه أبو داود (4219)، والحاكم (4/ 522)، والداني في الفتن (364) كلهم من طريق ابن وهب، عن سعيد بن أبي أيوب، عن شراحيل بن يزيد المعافري، عن أبي علقمة (هو الفارسي المصري)، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل شراحيل بن يزيد المعافري فإنه حسن الحديث.

وقال أبو داود عقبه:"رواه عبد الرحمن بن شريح الإسكندراني لم يَجُز به شراحيلَ". أي لم يجاوزه فأسقط من الإسناد أبا علقمة وأبا هريرة.

وعبد الرحمن ثقة، لكن وصله سعيد بن أبي أيوب، وهو ثقة ثبت، فوصْله زيادة مقبولة.

وأما أحاديث الأبدال والأقطاب فكلها ضعيفة، وأشهرها ما روي عن علي بن أبي طالب:

قال شريح بن عبيد: ذُكر أهل الشام عند علي بن أبي طالب وهو بالعراق فقالوا: العنْهم يا أمير المؤمنين، قال: لا إني سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"الأبدال يكونون بالشام، وهم أربعون رجلا، كلما مات رجل أبدل اللَّه مكانه رجلا، يسقى بهم الغيث، وينتصر بهم على الأعداء، ويصرف عن أهل الشام بهم العذابُ".
رواه أحمد (896) عن أبي المغيرة، حدّثنا صفوان، حدثني شريح بن عبيد قال: فذكره.

وشريح بن عبيد لم يدرك عليا ففيه انقطاع.

وصفوان هو: ابن عمرو بن هرم السكسكي من رجال الصحيح، وقد تكلم فيه النسائي.

ورواه عبد الرزاق في مصنفه (20455) عن معمر، عن الزهري، عن عبد اللَّه بن صفوان قال: قال رجل يوم صفين: اللهم العنْ أهل الشام، قال: فقال علي: لا تسب أهل الشام جمًّا غفيرًا، فإن بها الأبدال، فإن بها الأبدال، فإن بها الأبدال.

وهذا إسناد صحيح، ومعنى الأبدال هنا الذي يُبدلون المنكر، وينشرون المعروف، وقد روي عن بعض السلف أن فلانا كان من الأبدال.

قال الإمام أحمد: إن لم يكونوا أصحاب الحديث فمن هم؟ .

وقال أيضًا: إن كان من الأبدال في العراق أحد فأبو إسحاق إبراهيم بن هانئ، كما في علل الدارقطني (6/ 29).

وقال يزيد بن هارون: الأبدال هم أهل العلم. وقال الإمام الشافعي في بعضهم: كنا نعده من الأبدال. وقال البخاري في التاريخ الكبير (7/ 127) في ترجمة فروة بن مجالد:"وكانوا لا يشكون في أنه من الأبدال، مستجاب الدعوة.

وقال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله في مجموع الفتاوى (4/ 97):"وأما أهل العلم فكانوا يقولون: هم الأبدال؛ لأنهم أبدال الأنبياء، وقائمون مقامهم حقيقة، ليسوا من المعدمين الذين لا يعرف لهم حقيقة، كل منهم يقوم مقام الأنبياء في القدر الذي ناب عنهم فيه، هذا في العلم والمقال، وهذا في العبادة والحال، وهذا في الأمرين جميغا، وكانوا يقولون: هم الطائفة المنصورة إلى قيام الساعة، الظاهرون على الحق؛ لأن الهدى ودين الحق الذي بعث اللَّه به رسله معهم، وهو الذي وعد اللَّه بظهوره على الدين كله، وكفى باللَّه شهيدًا. انتهى.

وأما ما روي عن جماعة من الصحابة عن وجود الأبدال والأقطاب والأغواث والنقباء والنجباء والأوتاد فكلها باطلة على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كما قال الحافظ ابن القيم في المنار المنيف (307).

وقال:"وأقرب ما فيها لا تسبوا أهل الشام فإن فيهم البُدلاء، كلما مات رجل منهم أبدل اللَّه مكانه رجلا آخر، ذكره أحمد، ولا يصح أيضًا فإنه منقطع". اهـ

وهو كما قال، وقد سبق تخريجه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা এই উম্মতের জন্য প্রতি শতকের শুরুতে এমন ব্যক্তিকে প্রেরণ করবেন, যিনি তাদের জন্য তাদের দীনকে নবায়ন (সংস্কার) করবেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (15561)


15561 - عن * *




১৫৫৬১ - থেকে বর্ণিত...









আল-জামি` আল-কামিল (15562)


15562 - عن أبي هريرة قال: كان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يوما بارزا للناس، فأتاه رجل، فسأله عن أشياء منها: قال: يا رسول اللَّه! متى الساعة؟ قال:"ما المسؤول عنها بأعلم من السائل، ولكن سأحدثك عن أشراطها، إذا ولدت الأمة ربها، فذاك من أشراطها، وإذا كانت العراة الحفاة رؤوس الناس، فذاك من أشراطها، وإذا تطاول رعاء البهم في البنيان، فذاك من أشراطها، في خمس لا يعلمهن إلا اللَّه"، ثم تلا صلى الله عليه وسلم {إِنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَاذَا تَكْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ (34)} [سورة لقمان آية: 34].

قال: ثم أدبر الرجل، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ردّوا عليَّ الرجل" فأخذوا ليردوه، فلم يروا شيئًا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هذا جبريل، جاء ليعلّم الناسَ دينَهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (50)، ومسلم في الإيمان (9: 5) كلاهما من طرق عن إسماعيل بن إبراهيم، أخبرنا أبو حيان التيمي، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকজনের সামনে উপবিষ্ট ছিলেন। তখন তাঁর কাছে এক ব্যক্তি এসে তাঁকে কয়েকটি বিষয় সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! কিয়ামত কখন হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যাকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছে, সে জিজ্ঞাসা কারীর চেয়ে বেশি জানে না। তবে আমি তোমাকে এর কিছু আলামত সম্পর্কে বলছি: যখন দাসী তার প্রভুকে জন্ম দেবে, তখন সেটা হবে কিয়ামতের আলামতগুলোর মধ্য থেকে একটি। আর যখন উলঙ্গদেহী, খালি পায়ের মানুষেরা মানুষের নেতা হবে, তখন সেটাও হবে কিয়ামতের আলামতগুলোর মধ্য থেকে একটি। আর যখন বকরির রাখালেরা ইমারত নির্মাণে প্রতিযোগিতা করে আকাশচুম্বী করবে, তখন সেটাও হবে কিয়ামতের আলামতগুলোর মধ্য থেকে একটি। (এরপর বললেন:) এমন পাঁচটি জিনিস আছে, যা আল্লাহ ছাড়া কেউ জানে না। তারপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয় আল্লাহর কাছেই কিয়ামতের জ্ঞান রয়েছে। তিনিই বৃষ্টি বর্ষণ করেন এবং তিনিই জানেন যা গর্ভে রয়েছে। কেউ জানে না আগামীকাল সে কী অর্জন করবে এবং কেউ জানে না কোন স্থানে তার মৃত্যু ঘটবে। নিশ্চয় আল্লাহ সর্বজ্ঞ, সব বিষয়ে খবর রাখেন।" (সূরা লুকমান, আয়াত: ৩৪)।

(আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বলেন: এরপর লোকটি চলে গেল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "লোকটিকে আমার কাছে ফিরিয়ে আনো।" সাহাবীরা তাকে ফিরিয়ে আনতে গেলেন, কিন্তু কিছুই দেখতে পেলেন না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইনি জিবরীল (আঃ)। তিনি তোমাদেরকে তোমাদের দ্বীন শিক্ষা দেওয়ার জন্য এসেছিলেন।" (বুখারী ও মুসলিম)









আল-জামি` আল-কামিল (15563)


15563 - عن عائشة قالت: كان رجال من الأعراب جفاة يأتون النبي صلى الله عليه وسلم فيسألونه متى الساعة؟ فكان ييظر إلى أصغرهم فيقول:"إن يعشْ هذا لا يدركه الهرمُ حتى تقوم عليكم ساعتُكم".

قال هشام -أحد رواة الحديث-: يعني موتهم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6511)، ومسلم في الفتن (2952) كلاهما من طريق هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاري.

قوله:"حتى تقوم عليكم ساعتكم" أي أنتم مخاطبون ومن معكم في هذا القرن لا تدركون
الساعة، وبالتالي فإن الساعة قريبة بالنسبة لما مضى من الزمان.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কতিপয় রূঢ় স্বভাবের বেদুঈন পুরুষ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসত এবং তাঁকে জিজ্ঞেস করত: কিয়ামত কবে হবে? তখন তিনি তাদের মধ্যে সবচেয়ে কমবয়সী ব্যক্তির দিকে তাকিয়ে বলতেন: "যদি এই ব্যক্তি বেঁচে থাকে, তবে তার বার্ধক্য আসার আগেই তোমাদের কিয়ামত সংঘটিত হবে।" হিশাম—যিনি এই হাদীসের অন্যতম বর্ণনাকারী—বলেছেন: (এখানে 'তোমাদের কিয়ামত' বলতে) তাদের মৃত্যু উদ্দেশ্য।









আল-জামি` আল-কামিল (15564)


15564 - عن أنس أن رجلا من أهل البادية أتى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول اللَّه، متى الساعة قائمة؟ قال:"ويلك. وما أعددتَ لها؟" قال: ما أعددتُ لها إلا أني أحب اللَّه ورسوله، قال:"إنك مع من أحببت"، فقلنا: ونحن كذلك قال:"نعم"، ففرحنا يومئذ فرَحًا شديدًا، فمرَّ غلام للمغيرة، وكان من أقراني، فقال: إن أُخِّرَ هذا فلن يدركه الهرمُ حتى تقومَ الساعةُ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الأدب (6167)، ومسلم في الفتن وأشراط الساعة (2953: 139) كلاهما من طريق همام، عن قتادة، عن أنس، فذكره.

واللفظ للبخاري ولفظ مسلم نحوه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, হে আল্লাহর রাসূল, কিয়ামত কবে সংঘটিত হবে? তিনি বললেন, তোমার ধ্বংস হোক! এর জন্য তুমি কী প্রস্তুত করেছ? সে বলল, আমি এর জন্য বিশেষ কিছু প্রস্তুত করিনি, তবে আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসি। তিনি বললেন, তুমি যাকে ভালোবাসো, (আখিরাতে) তার সাথেই থাকবে। আমরা বললাম, আমরাও কি তেমনি? তিনি বললেন, হ্যাঁ। ফলে সেদিন আমরা অত্যন্ত আনন্দিত হলাম। এরপর মুগীরাহ-এর একজন বালক পাশ দিয়ে যাচ্ছিল, সে আমার সমবয়সী ছিল। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যদি একে (বেঁচে থাকতে) দেওয়া হয়, তবে সে বার্ধক্যে পৌঁছাবে না, এর আগেই কিয়ামত সংঘটিত হয়ে যাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (15565)


15565 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول قبل أن يموت بشهر:"تسألوني عن الساعة؟ وإنما علمها عند اللَّه، وأقسم باللَّه ما على الأرض من نفس منفوسة تأتي عليها مائة سنة".

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2538) من طريق حجاج بن محمد، قال ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد اللَّه يقول: فذكره.

قوله:"على الأرض" احتراز عن المخلوقين في غير الأرض مثل الملائكة.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর মৃত্যুর এক মাস পূর্বে বলতে শুনেছি: তোমরা কি আমাকে কিয়ামত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করছো? এর জ্ঞান তো কেবল আল্লাহর কাছেই রয়েছে। আর আমি আল্লাহর কসম করে বলছি, পৃথিবীতে এমন কোনো জীবিত প্রাণী (বা ব্যক্তি) নেই, যার উপর দিয়ে একশত বছর অতিবাহিত হবে (অথচ সে জীবিত থাকবে)।









আল-জামি` আল-কামিল (15566)


15566 - عن أبي سعيد قال: لما رجع النبي صلى الله عليه وسلم من تبوك، سألوه عن الساعة، فقال رسول اللَّه: صلى الله عليه وسلم"لا تأتي مائة سنة وعلى الأرض نفس منفوسة اليوم".

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2539) من طريق داود، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره.

جواب النبي صلى الله عليه وسلم يفيد عما ينفع السائل، وأما سؤاله عن الساعة فجوابه مقدر وهو: أن علمه عند اللَّه كما في الأحاديث الأخرى.

وفيه تصريح قوي لجمهور المحدثين والفقهاء والأصوليين على موت الخضر، بخلاف الذين يزعمون أن الخضر حيٌّ وهم يلتقون به، ويأخذون منه العلم الخاص.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক থেকে ফিরলেন, তখন তারা তাঁকে কিয়ামত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আজকের দিনে পৃথিবীতে জীবিত কোনো প্রাণী শতবর্ষ পূর্ণ করবে না (অর্থাৎ শতবর্ষের পরে আজকের দিনে জীবিত কোনো মানুষ পৃথিবীতে অবশিষ্ট থাকবে না)।"









আল-জামি` আল-কামিল (15567)


15567 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بادروا بالأعمال ستا: الدجال، والدخان، ودابة الأرض، وطلوع الشمس من مغربها، وأمر العامة، وخويصة أحدكم".

وفي رواية عنه:"بادروا بالأعمال ستا: طلوع الشمس من مغربها، أو الدخان، أو
الدجال، أو الدابة، أو خاصة أحدكم، أو أمر العامة".

صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2947: 129) من طريق قتادة، عن الحسن، عن زياد بن رياح، عن أبي هريرة، فذكره باللفظ الأول.

ورواه (2947: 128) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره باللفظ الثاني.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা ছয়টি বিষয়ের পূর্বে দ্রুত আমল কর: দাজ্জাল, ধোঁয়া (দুখহান), ভূ-পৃষ্ঠের জন্তু (দাব্বাতুল আরদ), পশ্চিম দিক থেকে সূর্য উদয়, সাধারণ বিপর্যয় (আম্রুল আম্মাহ), আর তোমাদের কারো নিজস্ব মুসিবত (খুওয়াইসাতু আহাদিকুম)।

তাঁর থেকে বর্ণিত অন্য এক বর্ণনায় আছে: তোমরা ছয়টি বিষয়ের পূর্বে দ্রুত আমল কর: পশ্চিম দিক থেকে সূর্য উদয়, অথবা ধোঁয়া, অথবা দাজ্জাল, অথবা ভূ-পৃষ্ঠের জন্তু (দাব্বাহ), অথবা তোমাদের কারো নিজস্ব মুসিবত, অথবা সাধারণ বিপর্যয়।