আল-জামি` আল-কামিল
15728 - عن سمرة بن جندب، أنّ نبيَّ اللَّه صلى الله عليه وسلم كان يقول:"إنّ الدّجال خارج وهو أعور عين الشمال، عليها ظفرة غليظة، وإنه يبرئُ الأكْمه والأبْرص، ويحيى الموتى، ويقول للناس: أنا ربّكم، فمن قال: أنت ربي فقد فُتن، ومن قال: ربّي اللَّه حتى يموت فقد عُصم من فتنته، ولا فتنة بعده عليه ولا عذاب، فيلبث في الأرض ما شاء اللَّه، ثم يجيء عيسى ابن مريم من قبل المغرب مصدّقًا بمحمّد وعلى ملّته، فيقتل الدّجال، ثم إنما هو قيام الساعة".
حسن: رواه أحمد (20151)، والطبراني في الكبير (6918، 6918) كلاهما من حديث روح ابن عبادة، ثنا سعيد بن أبي عرث بة، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في الحسن -وهو الإمام البصري المعروف- وكان مدلسا، وقد اختلف في سماعه عن سمرة، والصحيح الذي عليه جمهور أهل العلم أنه سمع منه مطلقا.
والكلام عليه مبسوط في كتاب الإيمان.
وفي الباب عن ثعلبة بن عباد العبدي من أهل البصرة قال: شهدت يوما خطبة لسمرة بن جندب، فذكر في خطبته حديثا عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فقال: بينا أنا وغلام من الأنصار نرمي في غرضين لنا على عهد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، حتى إذا كانت الشمس قيد رمحين أو ثلاثة في عين الناظر اسودت حتى آضت كأنها تنومة، قال: فقال أحدنا لصاحبه: انطلق بنا إلى المسجد، فواللَّه ليحدثن شأن هذه الشمس لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في أمته حدثا.
قال: فدفعنا إلى المسجد، فإذا هو بارز قال: ووافقنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حين خرج إلى الناس، فاستقدم، فقام بنا كأطول ما قام بنا في صلاة قط، لا نسمع له صوتا، ثم ركع كأطول ما ركع بنا في صلاة قط، لا نسمع له صوتا، ثم فعل في الركعة الثانية مثل ذلك، فوافق تجلي الشمس جلوسه في الركعة الثانية، قال زهير: حسبته، قال: فسلم، فحمد اللَّه، وأثنى عليه، وشهد أنه عبد اللَّه
ورسوله، ثم قال:"أيها الناس أنشدكم باللَّه، إن كنتم تعلمون أني قصرت عن شيء من تبليغ رسالات ربي عز وجل لما أخبرتموني ذاك فبلغت رسالات ربي كما ينبغي لها أن تبلغ، وإن كنتم تعلمون أني بلغت رسالات ربي لما أخبرتموني ذاك، قال: فقام رجال فقالوا: نشهد أنك قد بلغت رسالات ربك، ونصحت لأمتك، وقضيت الذي عليك، ثم سكتوا.
ثم قال:"أما بعد فإن رجالا يزعمون أن كسوف هذه الشمس وكسوف هذا القمر، وزوال هذه النجوم عن مطالعها لموت رجال عظماء من أهل الأرض، وإنهم قد كذبوا، ولكنها آيات من آيات اللَّه تبارك وتعالى يعتبر بها عباده، فينظر من يحدث له منهم توبة. وايم اللَّه لقد رأيت منذ قصت أصلي ما أنتم لاقون في أمر دنياكم وآخرتكم، وإنه واللَّه لا تقوم الساعة حتى يخرج ثلاثون كذابا آخرهم الأعور الدجال ممسوح العين اليسرى كأنها عين أبي يحيى لشيخ حينئذ من الأنصار بينه وبين حجرة عائشة، وإنها متى يخرج -أو قال: متى ما يخرج- فإنه سوف يزعم أنه اللَّه فمن آمن به، وصدقه، واتبعه، لم ينفعه صالح من عمله سلف، ومن كفر به وكذبه لم يعاقب بشيء من عمله، وقال حسن الأشيب بسيئ من عمله سلف وإنه سيظهر أو قال: سوف يظهر على الأرض كلها إلا الحرم وبيت المقدس، وإنه يحصر المؤمنين في بيت المقدس فيزلزلون زلزالا شديدًا، ثم يهلكه اللَّه تبارك وتعالى وجنوده حتى إن جذم الحائط أو قال أصل الحائط -وقال حسن الأشيب: وأصل الشجرة- لينادي أو قال يقول: يا مؤمن أو قال: يا مسلم، هذا يهودي أو قال: هذا كافر، تعال فاقتله قال: ولن يكون ذلك كذلك حتى تروا أمورًا يتفاقم شأنها في أنفسكم وتساءلون بينكم هل كان نبيكم ذكر لكم منها ذكرًا وحتى تزول جبال على مراتبها ثم على أثر ذلك القبض".
قال: ثم شهدت خطبة لسمرة ذكر فيها هذا الحديث فما قدم كلمة ولا أخرها عن موضعها.
رواه أحمد (20178) واللفظ له، ورواه كل من أبي داود (1184)، والترمذي (562)، والنسائي (1484)، وابن ماجه (1264) مطولًا ومختصرًا، وصحّحه ابن خزيمة (1397)، وابن حبان (2852)، والحاكم (1/ 329 - 331) كلهم من حديث الأسود بن قيس، قال: حدّثني ثعلبة ابن عباد العبدي، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح". وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: هذا من وهمه فإنه ليس على شرط أحدهما لأن ثعلبة بن عبّاد من رجال السنن فقط، ثم هو لم يوثّقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في ثقاته (4/ 98)، ولم يذكر من روى عنه سوى الأسود بن قيس فهو"مجهول".
وأما الحافظ فقال:"مقبول" لِذِكْرِ ابنِ حبان له في الثقات، أي إذا توبع وإلا فلين الحديث.
وفي الباب عن أبي الوداك قال: قال لي أبو سعيد: هل يقر الخوارج بالدجال فقلت: لا، فقال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني خاتم ألف نبي، وأكثر ما بعث نبي يتبع إلا قد حذر أمته الدجال،
وإني قد بين لي من أمره ما لم يبين لأحد، وإنه أعور، وإن ربكم ليس بأعور، وعينه اليمنى عوراء جاحظة، ولا تخفى، كأنها نخامة في حائط مجصص، وعينه اليسرى كأنها كوكب دري، معه من كل لسان، ومعه صورة الجنة خضراء يجري فيها الماء، وصورة النار سوداء تدخن".
رواه عبد اللَّه بن أحمد في مسند أبيه (11752) قال: وجدت هذا الحديث في كتاب أبي بخط يده، حدّثنا عبد المتعال بن عبد الوهاب، حدّثنا يحيى بن سعيد الأموي، حدّثنا مجالد، عن أبي الوداك، فذكره.
وأخرجه الحاكم (2/ 597) من طريق مجالد وسكت عليه، ولكن قال الذهبي:"مجالد" ضعيف.
وأورده الهيثمي في المجمع (7/ 347) وقال:"رواه أحمد وفيه مجالد بن سعيد، وثقه النسائي في رواية، وقال في أخرى: ليس بالقوي، وضعفه جماعة.
قلت: مجالد هو: ابن سعيد بن عمر الهمداني ضعّفه أكثر أهل العلم، وقال فيه البخاري:"صدوق"، وفي التقريب:"ليس بالقوي، وقد تغير في آخر عمره".
وأما ما روي عن أبي عبيدة بن الجراح قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إنه لم يكن نبي بعد نوح إلا وقد أنذر الدجالَ قومَه وإني أنذركموه" فوصفه لنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وقال:"لعله سيدركه من قد رآني وسمع كلامي" قالوا: يا رسول اللَّه، كيف قلوبنا يومئذ؟ أمثلها اليوم؟ قال:"أو خير". فإسناده ضعيف.
رواه أبو داود (4756)، والترمذي (2234)، وأحمد (1692 - 1693)، وابن حبان (6778)، والحاكم (4/ 542 - 543) كلهم من طريق خالد الحذاء، عن عبد اللَّه بن شقيق، عن عبد اللَّه بن سراقة، عن أبي عبيدة بن الجراح، فذكره.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن غريب من حديث أبي عبيدة بن الجراح، لا نعرفه إلا من حديث خالد الحذاء".
وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد".
قلت: في إسناده عبد اللَّه بن سراقة هو الأزدي تابعي، وثّقه العجلي، وذكره ابن حبان في الثقات، وهو غير العدوي الصحابي.
وقال البخاري:"لا يعرف له سماع من أبي عبيدة".
وقال ابن كثير في البداية والنهاية (1/ 130):". . . في إسناده غرابة، ولعل هذا كان قبلَ أن يبين له صلى الله عليه وسلم من أمر الدجال ما بُيِّنَ في ثاني الحال". واللَّه تعالى أعلم.
সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "নিশ্চয় দাজ্জাল বের হবে, সে বাম চোখে কানা হবে, তার ওপর একটি মোটা নখ থাকবে। এবং সে জন্মগত অন্ধ ও কুষ্ঠরোগীকে আরোগ্য করবে, আর মৃতকে জীবিত করবে। আর লোকদেরকে বলবে: আমি তোমাদের রব। সুতরাং যে বলবে: তুমিই আমার রব, সে ফিতনায় পতিত হবে। আর যে বলবে: আল্লাহ্ই আমার রব—এমনকি সে মারা যাবে, সে তার ফিতনা থেকে রক্ষা পাবে। এরপর তার (মৃত্যুর) ওপর কোনো ফিতনা বা আযাব থাকবে না। অতঃপর আল্লাহ্ যা চাইবেন, সে ততকাল পৃথিবীতে থাকবে। তারপর মারইয়াম পুত্র ঈসা (আঃ) পশ্চিম দিক থেকে আগমন করবেন, যিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সত্যায়নকারী হবেন এবং তাঁরই দ্বীনের ওপর থাকবেন। তিনি দাজ্জালকে হত্যা করবেন। এরপরই কেবল কিয়ামত সংঘটিত হবে।"
15729 - عن أنس بن مالك، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يتبع الدجال من يهود أصبهان سبعون ألفا عليهم الطيالسة"
صحيح: رواه مسلم في الفتن (2944) عن منصور بن أبي مزاحم، حدّثنا يحيى بن حمزة، عن الأوزاعي، عن إسحاق بن عبد اللَّه، عن عمه أنس بن مالك، فذكره.
قوله:"الطيالسة" ضربٌ من الأكيسة كانت تلبسها الأعاجم.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইস্পাহানের ইহুদিদের মধ্য থেকে সত্তর হাজার লোক দাজ্জালের অনুসরণ করবে, যাদের পরিধানে থাকবে তায়ালিসাহ।"
15730 - عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ليس من بلد إلا سيطؤه الدجال إلا مكة والمدينة، ليس له من نقابها نَقْبٌ إلا عليه الملائكة صافّين يحرسونها، ثم ترجف المدينة بأهلها ثلاث رجفاتٍ، فيخرج اللَّهُ كل كافرٍ ومنافقٍ".
منفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل المدينة (1881)، ومسلم في الفتن (123: 2943) كلاهما من طريق الوليد بن مسلم، حدّثني أبو عمرو (يعني الأوزاعي)، عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي طلحة، حدّثني أنس بن مالك، فذكره.
وزاد مسلم:"فينزل بالسبخة" وفي رواية أخرى عنده من وجه آخر:"فيأتي سبخة الجرف، فيضرب رواقه".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মক্কা ও মদীনা ছাড়া এমন কোনো শহর নেই যেখানে দাজ্জাল প্রবেশ করবে। মক্কা ও মদীনার এমন কোনো পথ বা প্রবেশপথ নেই যেখানে ফেরেশতারা কাতারবদ্ধভাবে পাহারায় নিযুক্ত নেই। অতঃপর মদীনা তার অধিবাসীদের নিয়ে তিনবার কেঁপে উঠবে (বা ঝাঁকুনি দেবে); ফলে আল্লাহ সেখানে থাকা প্রত্যেক কাফির ও মুনাফিককে বের করে দেবেন।"
15731 - عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المدينة يأتيها الدجال، فيجد الملائكة يحرسونها فلا يقربها الدجال قال: ولا الطاعون إن شاء اللَّه".
صحيح: رواه البخاريّ في الفتن (7133) عن يحيى بن موسى، حدّثنا يزيد بن هارون، أخبرنا شعبة، عن قتادة، عن أنس، فذكره.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দাজ্জাল মদীনায় আসবে, কিন্তু সে দেখবে যে ফেরেশতারা তাকে (মদীনাকে) পাহারা দিচ্ছে। ফলে দাজ্জাল এর (মদীনার) কাছেও ঘেঁষতে পারবে না।” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেন: “আর আল্লাহর ইচ্ছায় সেখানে প্লেগ বা মহামারিও (প্রবেশ করবে) না।”
15732 - عن أبي بكرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا يدخل المدينةَ رعبُ المسيح الدجال، لها يومئذ سبعة أبواب، على كل بابٍ ملكان".
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل المدينة (1879) عن عبد العزيز بن عبد اللَّه، قال: حدّثني إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن جده، عن أبي بكرة، فذكره.
আবু বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মাসীহ দাজ্জালের ভীতি মদীনায় প্রবেশ করবে না। সেদিন এর সাতটি দরজা থাকবে, প্রত্যেক দরজায় দু'জন করে ফেরেশতা থাকবেন।
15733 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"على أنقاب المدينة ملائكة لا يدخلها الطاعون ولا الدجال".
متنق عليه: رواه مالك في الجامع (16) عن نعيم بن عبد اللَّه المجمر، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاريّ في الفتن (7133)، ومسلم في الحج (485: 1379) كلاهما من طريق مالك به.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মদীনার প্রবেশ পথগুলোতে (বা: ফটকগুলোতে) ফেরেশতারা আছেন। তাতে মহামারী (প্লেগ) এবং দাজ্জাল প্রবেশ করতে পারবে না।
15734 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يأتي الدجال وهو محرم عليه أن يدخل نقاب المدينة، فينزل بعض السباخ التي تلي المدينة، فيخرج إليه يومئذ رجل وهو خير الناس -أو من خيار الناس- فيقول: أشهد أنك الدجال الذي حدّثنا
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم حديثه، فيقول الدجال: أرأيت إن قتلت هذا ثم أحييته، هل تشكون في الأمر؟ فيقولون: لا، فيقتله ثم يحييه؛ فيقول: واللَّه ماكنت فيك أشد بصيرة مني اليوم، فيريد الدجال أن يقتله فلا يُسلّطُ عليه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأحكام (7132)، ومسلم في الفتن (112: 2938) كلاهما من طريق أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهري، أخبرني عبيد اللَّه بن عتبة بن مسعود، أن أبا سعيد قال: فذكره.
واللفظ للبخاري وأحال مسلم إلى الحديث الذي قبله.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: দাজ্জাল আসবে, কিন্তু তার জন্য মদীনার প্রবেশপথগুলোতে প্রবেশ করা নিষিদ্ধ থাকবে। অতঃপর সে মদীনার নিকটবর্তী কিছু লবণাক্ত পতিত ভূমিতে অবতরণ করবে। তখন তার কাছে এমন এক ব্যক্তি বের হবে, যিনি হলেন মানুষের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—কিংবা, মানুষের মধ্যে অন্যতম শ্রেষ্ঠ। সে (ব্যক্তিটি) বলবে: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি, তুমিই সেই দাজ্জাল যার সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের জানিয়েছিলেন। দাজ্জাল বলবে: তোমরা কি মনে করো, যদি আমি এই ব্যক্তিকে হত্যা করে আবার জীবিত করি, তবুও কি তোমরা এই বিষয়ে সন্দেহ করবে? তখন তারা বলবে: না (সন্দেহ করব না)। অতঃপর সে তাকে হত্যা করবে এবং এরপর তাকে জীবিত করবে। তখন সে (পুনর্জীবিত ব্যক্তি) বলবে: আল্লাহর কসম! আজ তোমার সম্পর্কে আমার জ্ঞান ও দৃঢ়তা যা হয়েছে, তা আগে কখনো হয়নি। এরপর দাজ্জাল তাকে আবার হত্যা করতে চাইবে, কিন্তু তার উপর ক্ষমতা পাবে না।
15735 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يخرج الدجال، فيتوجه قبله رجل من المؤمنين، فتلقاه المسالح مسالح الدجال، فيقولون له أين تعمد؟ فيقول: أعمد إلى هذا الذي خرج، قال: فيقولون له: أو ما تؤمن بربنا؟ فيقول: ما بربنا خفاء، فيقولون: اقتلوه، فيقول بعضهم لبعض: أليس قد نهاكم ربكم أن تقتلوا أحدًا دونه، قال: فينطلقون به إلى الدجال، فإذا رآه المؤمن قال: يا أيها الناس هذا الدجال الذي ذكر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال: فيأمر الدجال به، فيشبح، فيقول: خذوه وشجوه فيوسع ظهره وبطنه ضربا، قال: فيقول: أو ما تؤمن بي؟ قال: فيقول: أنت المسيح الكذاب، قال: فيؤمر به فيؤشر بالمئشار من مفرقه حتى يفرق بين رجليه، قال: ثم يمشي الدجال بين القطعتين، ثم يقول له: قم فيستوي قائما، قال: ثم يقول له: أتؤمن بي؟ فيقول: ما ازددت فيك إلا بصيرة، قال: ثم يقول: يا أيها الناس إنه لا يفعل بعدي بأحد من الناس قال: فيأخذه الدجال ليذبحه، فيجعل ما بين رقبته إلى ترقوته نحاسا فلا يستطيع إليه سبيلا، قال: فيأخذ بيديه ورجليه، فيقذف به، فيحسب الناس أنما قذفه إلى النار، وإنما ألقي في الجنة"، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هذا أعظم الناس شهادة عند رب العالمين".
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2938: 113) عن محمد بن عبد اللَّه بن قهزاد، حدّثنا عبد اللَّه بن عثمان، عن أبي حمزة، عن قيس بن وهب، عن أبي الوداك، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাজ্জাল বের হবে। তখন একজন মুমিন ব্যক্তি তার দিকে রওনা হবে। দাজ্জালের প্রহরীরা তার সাথে সাক্ষাত করবে এবং তারা তাকে জিজ্ঞেস করবে: তুমি কোথায় যাচ্ছো? সে বলবে: আমি এই যে লোকটি বেরিয়েছে, তার কাছে যাচ্ছি।
তখন তারা তাকে বলবে: তুমি কি আমাদের রবের প্রতি ঈমান আনো না? সে বলবে: আমাদের রবের ব্যাপারে তো কোনো অস্পষ্টতা নেই। তখন তারা বলবে: একে হত্যা করো। তখন তাদের মধ্যে কেউ কেউ একে অপরের সাথে বলবে: তোমাদের রব কি তোমাদেরকে তার (দাজ্জালের) অনুমতি ছাড়া কাউকে হত্যা করতে নিষেধ করেননি?
অতঃপর তারা তাকে দাজ্জালের কাছে নিয়ে যাবে। যখন মুমিন লোকটি তাকে দেখবে, তখন বলবে: হে লোক সকল! এ-ই সেই দাজ্জাল যার কথা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উল্লেখ করেছেন।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: তখন দাজ্জাল তাকে নিয়ে আদেশ করবে, আর তাকে উপুড় করে বাঁধা হবে। দাজ্জাল বলবে: একে ধরো এবং তার উপর আঘাত করো। ফলে তার পিঠ ও পেটে প্রচুর মার দেওয়া হবে। দাজ্জাল তাকে বলবে: তুমি কি আমার প্রতি ঈমান আনো না? লোকটি বলবে: তুমি হলে মিথ্যুক মসীহ।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: তখন দাজ্জাল তাকে নিয়ে আদেশ করবে। করাত দিয়ে তার মাথার সিঁথি থেকে শুরু করে তাকে চিরে দু'পায়ের মাঝখান পর্যন্ত দু'ভাগ করে ফেলা হবে। অতঃপর দাজ্জাল ওই দুই টুকরার মাঝখান দিয়ে হেঁটে যাবে। এরপর তাকে বলবে: ওঠো! তখন সে সোজা হয়ে দাঁড়িয়ে যাবে। এরপর দাজ্জাল তাকে বলবে: তুমি কি আমার প্রতি ঈমান আনো? সে বলবে: তোমার ব্যাপারে আমার অন্তর্দৃষ্টি (ঈমান) আরও বৃদ্ধি পেল।
তখন মুমিন লোকটি বলবে: হে লোক সকল! আমার পর সে আর কারো সাথে এমন আচরণ করতে পারবে না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: তখন দাজ্জাল তাকে জবাই করার জন্য ধরবে, কিন্তু তার গলা ও কণ্ঠাস্থির মধ্যবর্তী স্থানকে তামায় পরিণত করে দেওয়া হবে। ফলে সে তাকে জবাই করার কোনো পথ খুঁজে পাবে না।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: এরপর দাজ্জাল তার দু'হাত ও দু'পা ধরে ছুঁড়ে ফেলে দেবে। লোকজন মনে করবে, সে তাকে আগুনে নিক্ষেপ করেছে। কিন্তু মূলত তাকে জান্নাতে নিক্ষেপ করা হবে।"
অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে (এই ব্যক্তি) হবে রাব্বুল আলামীনের কাছে সর্বাপেক্ষা বড় শহীদ।"
15736 - عن أبي هريرة أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"يأتي المسيح من قبل المشرق، همته المدينة، حتى ينزل دبر أحد، ثم تصرف الملائكة وجهه قبل الشام، وهنالك يهلك".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1380: 466) من طرق عن إسماعيل بن جعفر، أخبرني
العلاء، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাসিহ (দাজ্জাল) পূর্ব দিক থেকে আসবে। তার লক্ষ্য থাকবে মদীনা, এমনকি সে উহুদ পর্বতের পশ্চাদ্ভাগে অবতরণ করবে। এরপর ফেরেশতাগণ তার মুখ সিরিয়ার (শামের) দিকে ঘুরিয়ে দেবে এবং সেখানেই সে ধ্বংস হবে।"
15737 - عن جنادة بن أبي أمية الأزدي قال: ذهبت أنا ورجل من الأنصار إلى رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، فقلنا: حدِّثْنا ما سمعتَ من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يذكر في الدجال، ولا تحدثنا عق غيره، وإن كان مصدقا، قال: خطبنا النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"أنذرتكم الدجالَ -ثلاثا- فإنه لم يكن نبي قبلي إلا قد أنذره أمته، وإنه فيكم أيتها الأمة، وإنه جعد آدم ممسوح العين اليسرى، معه جنة ونار، فناره جنة، وجنته نار، ومعه جبل من خبز ونهر من ماء، وإنه يمطر المطر، ولا ينبت الشجر. وإنه يسلط على نفس، فيقتلها، ولا يسلط على غيرها. وإنه يمكث في الأرض أربعين صباحا، يبلغ فيها كل منهل، ولا يقرب أربعة مساجد: مسجد الحرام، ومسجد المدينة، ومسجد الطور، ومسجد الأقصى، وما يشبه عليكم، فإن ربكم ليس بأعور".
صحيح: رواه أحمد (23685) واللفظ له، وابن أبي شيبة في مصنفه (38661) كلاهما من طرق عن مجاهد بن جبر، عن جنادة بن أبي أمية قال: فذكره.
قال الهيثمي في المجمع (7/ 343):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال إلا أن ذكر المسجد الأقصى ومسجد الطور غريب، والذي في الصحيح مسجد الحرام والمسجد النبوي.
জুনাদাহ ইবনে আবী উমাইয়াহ আল-আযদী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং আনসারদের একজন ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের একজনের কাছে গেলাম। আমরা বললাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাজ্জাল সম্পর্কে যা বলতে শুনেছেন, তাই আমাদের কাছে বর্ণনা করুন। অন্য কারও সূত্রে আমাদের বলবেন না, যদিও তিনি বিশ্বাসযোগ্য হন। তিনি (সেই সাহাবী) বললেন:
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সামনে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "আমি তোমাদেরকে দাজ্জাল সম্পর্কে সতর্ক করছি"—তিনি তিনবার বললেন—"কারণ আমার পূর্বে এমন কোনো নবী আসেননি, যিনি তাঁর উম্মতকে দাজ্জাল সম্পর্কে সতর্ক করেননি। আর হে উম্মতগণ, সে তোমাদের মাঝেই আবির্ভূত হবে। সে হবে ঘন কোঁকড়ানো চুলবিশিষ্ট, গায়ের রঙ হবে শ্যামলা, তার বাম চোখ হবে সম্পূর্ণরূপে মিটে যাওয়া (অন্ধ)। তার সাথে জান্নাত ও জাহান্নাম থাকবে। কিন্তু তার জাহান্নাম হবে জান্নাত এবং তার জান্নাত হবে জাহান্নাম। তার সাথে এক রুটির পাহাড় এবং এক পানির নদী থাকবে। নিশ্চয়ই সে বৃষ্টি বর্ষণ করবে, কিন্তু বৃক্ষরাজি জন্মাবে না। আর তাকে একজন ব্যক্তির উপর কর্তৃত্ব দেওয়া হবে; অতঃপর সে তাকে হত্যা করবে। কিন্তু সে অন্য কারো উপর সেই কর্তৃত্ব লাভ করবে না। সে পৃথিবীতে চল্লিশ সকাল (দিন) অবস্থান করবে। এই সময়ের মধ্যে সে পানির প্রতিটি উৎসস্থলে পৌঁছাবে। তবে সে চারটি মসজিদের নিকটবর্তী হতে পারবে না: মাসজিদুল হারাম, মাসজিদুল মাদীনাহ, মাসজিদে তূর এবং মাসজিদুল আকসা। আর তোমাদের প্রতি যদি তার ব্যাপারে কোনো সন্দেহ সৃষ্টি হয়, তবে (মনে রেখো) তোমাদের রব কক্ষনো কানা নন।"
15738 - عن أبى الدرداء أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من حفظ عشر آيات من أول سورة الكهف عُصِم من الدجال". وفي لفظ:"من آخر الكهف".
صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (809) عن محمد بن المثنى، حدّثنا معاذ بن هشام، حدّثني أبي، عن قتادة، عن سالم بن أبى الجعد الغطفاني، عن معدان بن أبي طلحة اليعمري، عن أبي الدرداء، فذكره.
ورواه أيضًا من طريق شعبة وهمام، عن قتادة به، وقال شعبة:"من آخر الكهف"، وقال همام:"من أول الكهف".
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি সূরা কাহফের প্রথম দিক থেকে দশটি আয়াত মুখস্থ করবে, তাকে দাজ্জালের ফিতনা থেকে মুক্ত রাখা হবে।” অন্য এক বর্ণনায় (বর্ণিত আছে): “(সেগুলো হবে) সূরা কাহফের শেষ দিক থেকে।”
15739 - عن عائشة قالت: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يستعيذ في صلاته من فتنة الدجال.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الفتن (7129)، ومسلم في المساجد ومواضع الصلاة (587) كلاهما من طريق إبراهيم بن سعد، عن صالح، عن ابن شهاب قال: أخبرني عروة بن الزبير أن عائشة قالت: فذكرته.
وأحاديث الاستعاذة من الدجال كثيرة مذكورة في الأدعية، وقال الذهبي: الاستعاذة من الدجال متواترة عن النبي صلى الله عليه وسلم كما قال أبو داود.
نقله ابن كثير في النهاية (1/ 131).
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর সালাতের মধ্যে দাজ্জালের ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাইতে শুনেছি।
15740 - عن مروان بن حصين يحدث قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"من سمع بالدجال فلينأ عنه، فواللَّه إن الرجل ليأتيه وهو يحسب أنه مؤمن فيتبعه مما يبعث به من الشبهات -أو لما يبعث به من الشبهات-".
وفي رواية:"من سمع بالدجال فلينأ منه" ثلاثا يقولها.
صحيح: رواه أبو داود (4319)، وأحمد (19875، 19968)، وصحّحه الحاكم (4/ 531) كلهم من طريق حميد بن هلال، عن أبي الدهماء قال: سمعت عمران بن حصين قال: فذكره.
واللفظ لأبي داود، والزيادة عند أحمد والحاكم. وإسناده صحيح.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وفي هذا الحديث حثٌّ على الابتعاد عن مثيري الفتن والشبهات، وعن المغرضين ضد الثوابت الإسلامية.
ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি দাজ্জাল সম্পর্কে শুনবে, সে যেন তার থেকে দূরে থাকে। আল্লাহর কসম! নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি তার কাছে আসবে এই ভেবে যে সে মুমিন, কিন্তু সে যে সন্দেহ সৃষ্টি করবে (অথবা তার মাধ্যমে যে সন্দেহ সৃষ্টি হবে) তার কারণে সে দাজ্জালকে অনুসরণ করে বসবে।"
অপর এক বর্ণনায় রয়েছে, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কথাটি তিনবার বলেছেন: "যে ব্যক্তি দাজ্জালের কথা শুনবে, সে যেন তার থেকে দূরে থাকে।"
15741 - عن عامر بن شراحيل الشعبي شعب همدان أنه سأل فاطمة بنت قيس أخت الضحاك بن قيس، وكانت من المهاجرات الأُوَل، فقال: حدثيني حديثا سمعتيه من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لا تسنديه إلى أحد غيره، فقالت: لئن شئت لأفعلن، فقال لها: أجل، حدثيني فقالت: نكحت ابن المغيرة وهو من خيار شباب قريش يومئذ، فأصيب في أول الجهاد مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فلما تأيمت خطبني عبد الرحمن بن عوف في نفر من أصحاب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وخطبني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم على مولاه أسامة بن زيد، وكنت قد حدثت أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"من أحبني فليحبّ أسامة"، فلما كلمني رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، قلت: أمري بيدك فأنكحني من شئت، فقال:"انتقلي إلى أم شريك"، وأم شريك امرأة غنية من الأنصار عظيمة النفقة في سبيل اللَّه، ينزل عليها الضيفان، فقلت: سأفعل، فقال:"لا تفعلي إن أم شريك امرأة كثيرة الضيفان فإني أكره أن يسقط عنك خمارك أو ينكشف الثوب عن ساقيك فيرى القوم منك بعض ما تكرهين ولكن انتقلي إلى ابن عمك عبد اللَّه بن عمرو بن أم مكتوم"، وهو رجل من بني فهر فهر قريش وهو من البطن الذي هي منه، فانتقلت إليه.
فلما انقضت عدتي سمعت نداء المنادي منادي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينادي: الصلاة جامعة، فخرجت إلى المسجد، فصليت مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فكنت في صف النساء التي تلي ظهور القوم، فلما قضى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم صلاته جلس على المنبر، وهو يضحك، فقال:"ليلزم كل إنسان مصلاه"، ثم قال:"أتدرون لما جمعتكم؟" قالوا: اللَّه ورسوله أعلم، قال:"إني واللَّه ما جمعتكم لرغبة ولا لرهبة، ولكن جمعتكم لأن تميما الداري كان رجلا نصرانيا، فجاء فبايع، وأسلم، وحدثني حديثا وافق الذي كنت أحدثكم عن مسيح الدجال، حدّثني أنه ركب في سفينة بحرية مع ثلاثين رجلا من لخم وجذام، فلعب بهم الموج شهرًا في البحر، ثم أرفؤا إلى جزيرة في البحر، حتى مغرب الشمس، فجلسوا في أقرب السفينة، فدخلوا الجزيرة، فلقيتهم دابة أهلب كثير الشعر، لا يدرون ما قبله من دبره من كثرة الشعر، فقالوا: ويلك ما أنت؟ فقالت: أنا الجساسة، قالوا: وما الجساسة؟ قالت: أيها القوم، انطلقوا إلى هذا الرجل في الدير، فإنه إلى خبركم بالأشواق، قال: لما سمت لنا رجلا فرقنا منها أن تكون شيطانة.
قال: فانطلقنا سراعا حتى دخلنا الدير، فإذا فيه أعظم إنسان رأيناه قط خلقا، وأشده وثاقا، مجموعة يداه إلى عنقه ما بين ركبتيه إلى كعبيه بالحديد قلنا: ويلك ما أنت؟ قال: قد قدرتم على خبري فأخبروني ما أنتم؟ قالوا: نحن أناس من العرب، ركبنا في سفينة بحرية، فصادفنا البحر حين اغتلم، فلعب بنا الموج شهرًا، ثم أرفأنا إلى جزيرتك هذه، فجلسنا في أقربها، فدخلنا الجزيرة، فلقيتنا دابة أهلب كثير الشعر، لا يدرى ما قبله من دبره من كثرة الشعر، فقلنا ويلك ما أنت؟ فقالت: أنا الجساسة قلنا: وما الجساسة؟ قالت: اعمدوا إلى هذا الرجل في الدير فإنه إلى خبركم بالأشواق، فأقبلنا إليك سراعا، وفزعنا منها ولم نأمن أن تكون شيطانة.
فقال: أخبروني عن نخل بيسان، قلنا: عن أي شأنها تستخبر؟ قال: أسألكم عن نخلها هل يثمر؟ قلنا له: نعم، قال: أما إنه يوشك أن لا تثمر، قال: أخبروني عن بحيرة الطبرية، قلنا: عن أي شأنها تستخبر؟ قال: هل فيها ماء؟ قالوا: هي كثيرة الماء، قال: أما إن ماءها يوشك أن يذهب، قال أخبروني عن عين زغر، قالوا: عن أي شأنها تستخبر؟ قال: هل في العين ماء؟ وهل يزرع أهلها بماء العين؟ قلنا له: نعم هي كثيرة الماء، وأهلها يزرعون من مائها، قال: أخبروني عن نبي الأميين ما فعل؟
قالوا: قد خرج من مكة، ونزل يثرب، قال: أقاتله العرب؟ قلنا: نعم، قال: كيف صنع بهم؟ فأخبرناه أنه قد ظهر على من يليه من العرب وأطاعوه، قال لهم: قد كان ذلك؟ قلنا: نعم، قال: أما إن ذلك خير لهم أن يطيعوه، وإني مخبركم عني، إني أنا المسيح، وإني أوشك أن يؤذن لي في الخروج، فأخرج، فأسير في الأرض، فلا أدع قرية إلا هبطتها في أربعين ليلة غير مكة وطيبة، فهما محرمتان علي كلتاهما، كلما أردت أن أدخل واحدة -أو واحدًا منهما- استقبلني ملك بيده السيف صلتا يصدني عنها، وإن على كل نقب منها ملائكة يحرسونها".
قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وطعن بمخصرته في المنبر:"هذه طيبة، هذه طيبة، هذه طيبة -يعني المدينة-، ألا هل كنت حدثتكم ذلك؟" فقال الناس: نعم،"فإنه أعجبني حديث تميم، أنه وافق الذي كنت أحدثكم عنه، وعن المدينة ومكة، ألا إنه في بحر الشام أو بحر اليمن، لا بل من قبل المشرق، ما هو! من قبل المشرق، ما هو! من قبل المشرق، ما هو! وأومأ بيده إلى المشرق، قالت: فحفظتُ هذا من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2942) من طرق عن عبد الوارث بن عبد الصمد، حدّثنا أبي، عن جدي، عن الحسين بن ذكوان، حدّثنا ابن بريدة، حدّثني عامر بن شراحيل الشعبي، فذكره.
ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমির ইবনু শুরাহিল আশ-শা‘বী (শায়াব হামদান গোত্রের) তাকে—যিনি ছিলেন দাহ্হাক ইবনু কায়েসের বোন এবং প্রথম দিকের মুহাজির মহিলাদের অন্তর্ভুক্ত—জিজ্ঞেস করলেন: আমাকে এমন একটি হাদীস বলুন যা আপনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছেন এবং আপনি যা অন্য কারো সূত্রে বর্ণনা করবেন না। তিনি বললেন: যদি আপনি চান, আমি তা করব। শা‘বী তাকে বললেন: হ্যাঁ, আমাকে তা বলুন।
তিনি বললেন: আমি ইবনু মুগীরাহকে বিয়ে করেছিলাম, তিনি সেই দিন কুরাইশের উত্তম যুবকদের অন্যতম ছিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে প্রথম জিহাদেই তিনি শাহাদাত বরণ করেন। আমি যখন বিধবা হলাম, তখন আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কয়েকজন সাহাবীর সাথে আমাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজেও তাঁর আযাদকৃত গোলাম উসামা ইবনু যায়িদের জন্য আমাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। আমি তখন জানতে পেরেছিলাম যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: "যে আমাকে ভালোবাসে, সে যেন উসামাকেও ভালোবাসে।" যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথে কথা বললেন, আমি বললাম: আমার ব্যাপারটি আপনার হাতে, আপনি যাকে ইচ্ছা আমার সাথে বিয়ে দিন। তখন তিনি বললেন: "তুমি উম্মে শারীকের কাছে চলে যাও।" উম্মে শারীক ছিলেন আনসার গোত্রের একজন ধনী মহিলা, যিনি আল্লাহর পথে অনেক খরচ করতেন এবং যার বাড়িতে প্রচুর মেহমান আসত। আমি বললাম: আমি তা-ই করব। তিনি বললেন: "না, তুমি তা করো না। কারণ উম্মে শারীক একজন এমন মহিলা যার বাড়িতে অনেক মেহমান আসে। আমি অপছন্দ করি যে, তোমার ওড়না (খিমার) তোমার মাথা থেকে পড়ে যাক, অথবা তোমার পায়ের গোছা থেকে কাপড় সরে যাক, আর লোকেরা তোমার এমন কিছু দেখে ফেলুক যা তুমি অপছন্দ কর। বরং তুমি তোমার চাচাতো ভাই আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনু উম্মে মাকতূমের কাছে চলে যাও।" তিনি ছিলেন কুরাইশের ফিহর গোত্রের লোক এবং সেই গোত্রের অন্তর্ভুক্ত, যার থেকে ফাতেমার গোত্রও ছিল। অতঃপর আমি তার কাছে চলে গেলাম।
যখন আমার ইদ্দত শেষ হলো, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আহ্বানকারীকে ঘোষণা দিতে শুনলাম: "আস-সালাতু জামিআহ (নামাযের জন্য সমবেত হও)।" আমি মসজিদে গেলাম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে নামায পড়লাম। আমি মহিলাদের সারিতে ছিলাম, যা লোকেদের পিছন দিকে ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন নামায শেষ করলেন, তিনি মিম্বরের উপর বসলেন এবং হাসছিলেন। তিনি বললেন: "প্রত্যেক ব্যক্তি যেন তার সালাতের স্থানে স্থির থাকে।" এরপর তিনি বললেন: "তোমরা কি জানো, আমি কেন তোমাদের একত্রিত করেছি?" তারা বলল: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: "আল্লাহর শপথ! আমি তোমাদেরকে কোনো কিছুর আগ্রহে বা ভয়ে একত্রিত করিনি, বরং আমি তোমাদের একত্রিত করেছি এই জন্য যে, তামীম আদ্-দারী ছিলেন একজন খ্রিস্টান লোক। সে এসে আমার কাছে বায়াত গ্রহণ করেছে এবং ইসলাম গ্রহণ করেছে। আর সে আমাকে একটি হাদীস শুনিয়েছে যা মাসীহ আদ্-দাজ্জাল (দাজ্জাল) সম্পর্কে আমি তোমাদেরকে যা বলতাম তার সাথে মিলে যায়।
সে আমাকে জানিয়েছে যে, সে লাখম ও জুযাম গোত্রের ত্রিশ জন লোকের সাথে একটি সামুদ্রিক জাহাজে আরোহণ করেছিল। সমুদ্রে এক মাস ধরে ঢেউ তাদেরকে নিয়ে খেলা করেছে। অতঃপর তারা সমুদ্রের একটি দ্বীপে সূর্য ডোবার সময় ভিড়ল। তারা নৌকার ছোট ডিঙিতে বসে দ্বীপে প্রবেশ করল। সেখানে তাদের সাথে একটি প্রাণীর সাক্ষাৎ হলো যা ছিল লোমশ, প্রচুর পশমবিশিষ্ট। পশমের আধিক্যের কারণে তারা বুঝতে পারছিল না যে তার অগ্রভাগ কোনটি আর পশ্চাৎভাগ কোনটি। তারা বলল: তোমার ধ্বংস হোক! তুমি কী? সেটি বলল: আমি হলাম জাসসাসাহ (তদন্তকারিণী)। তারা বলল: জাসসাসাহ কী? সেটি বলল: হে লোকসকল! তোমরা ঐ ডেরার (মঠ বা প্রাসাদ) কাছে থাকা লোকটির কাছে যাও। কারণ সে তোমাদের সংবাদ জানার জন্য অত্যন্ত আগ্রহী। [ফাতেমা বিনতে কায়েস বললেন:] তামীম বললেন: যখন এটি আমাদের কাছে একজন লোকের নাম বলল, তখন আমরা ভয় পেলাম যে, এটি শয়তানী কিছু হবে।
তিনি [তামীম] বললেন: আমরা দ্রুত সেখান থেকে চলে গেলাম এবং সেই ডেরায় প্রবেশ করলাম। সেখানে আমরা এমন এক বিশাল আকৃতির মানুষ দেখতে পেলাম যা আমরা এর আগে কখনও দেখিনি। তাকে শক্ত করে বেঁধে রাখা হয়েছে; তার দু'হাত তার ঘাড়ের সাথে এবং হাঁটুর মাঝখান থেকে গোড়ালি পর্যন্ত লোহার শিকলে বাঁধা। আমরা বললাম: তোমার ধ্বংস হোক! তুমি কে? সে বলল: তোমরা আমার খবর জানতে সক্ষম হয়েছ, এবার তোমরা আমাকে তোমাদের খবর বলো। তারা বলল: আমরা আরবের কিছু লোক। আমরা একটি সামুদ্রিক জাহাজে আরোহণ করেছিলাম। উত্তাল সমুদ্রের মুখে পড়লাম। ঢেউ আমাদের নিয়ে এক মাস ধরে খেলা করল। অতঃপর আমরা তোমার এই দ্বীপে এসে ভিড়লাম। আমরা নৌকার ডিঙিতে বসলাম এবং দ্বীপে প্রবেশ করলাম। সেখানে আমাদের সাথে একটি লোমশ প্রাণীর সাক্ষাৎ হলো, যার পশমের আধিক্যের কারণে তার অগ্রভাগ ও পশ্চাৎভাগ বোঝা যাচ্ছিল না। আমরা বললাম: তোমার ধ্বংস হোক! তুমি কে? সেটি বলল: আমি জাসসাসাহ। আমরা বললাম: জাসসাসাহ কী? সেটি বলল: তোমরা এই ডেরার লোকটির কাছে যাও। কারণ সে তোমাদের সংবাদ জানার জন্য অত্যন্ত আগ্রহী। আমরা দ্রুত তোমার কাছে ছুটে এলাম। আমরা তাকে দেখে ভয় পেয়েছিলাম এবং নিশ্চিত ছিলাম না যে সে শয়তান কি না।
তখন লোকটি বলল: বাইসানের খেজুর গাছ সম্পর্কে আমাকে খবর দাও। আমরা বললাম: এর কোন অবস্থা সম্পর্কে জানতে চাও? সে বলল: আমি জানতে চাই—তার গাছে কি ফল ধরে? আমরা তাকে বললাম: হ্যাঁ, ধরে। সে বলল: সাবধান! অচিরেই তাতে ফল ধরা বন্ধ হয়ে যাবে। সে বলল: তিবারিয়া হ্রদ সম্পর্কে আমাকে খবর দাও। আমরা বললাম: এর কোন অবস্থা সম্পর্কে জানতে চাও? সে বলল: এতে কি পানি আছে? তারা বলল: তাতে প্রচুর পানি আছে। সে বলল: সাবধান! অচিরেই এর পানি শুকিয়ে যাবে। সে বলল: যুগর ঝর্ণা সম্পর্কে আমাকে খবর দাও। তারা বলল: এর কোন অবস্থা সম্পর্কে জানতে চাও? সে বলল: এই ঝর্ণায় কি পানি আছে? আর তার অধিবাসীরা কি সেই ঝর্ণার পানি দিয়ে চাষাবাদ করে? আমরা তাকে বললাম: হ্যাঁ, তাতে প্রচুর পানি আছে এবং তার অধিবাসীরা সেই পানি দিয়ে চাষাবাদ করে। সে বলল: উম্মী (নিরক্ষর) নবীর কী অবস্থা?
তারা বলল: তিনি মক্কা থেকে বেরিয়ে এসে ইয়াসরিবে (মদীনায়) অবস্থান করছেন। সে বলল: আরবরা কি তার সাথে যুদ্ধ করেছে? আমরা বললাম: হ্যাঁ। সে বলল: তিনি তাদের সাথে কেমন আচরণ করেছেন? আমরা তাকে জানালাম যে, তিনি তার নিকটবর্তী আরবদের উপর বিজয়ী হয়েছেন এবং তারা তার আনুগত্য করেছে। সে তাদের বলল: তা কি হয়ে গেছে? আমরা বললাম: হ্যাঁ। সে বলল: সাবধান! তাদের জন্য এটি উত্তম যে, তারা তার আনুগত্য করুক। আর আমি তোমাদেরকে আমার সম্পর্কে জানাচ্ছি। আমিই মাসীহ (দাজ্জাল)। অচিরেই আমাকে বের হওয়ার অনুমতি দেওয়া হবে। তখন আমি বের হব এবং পৃথিবীতে পরিভ্রমণ করব। মক্কা এবং তায়বা (মদীনা) ছাড়া আমি চল্লিশ রাতের মধ্যে এমন কোনো গ্রাম বাকি রাখব না যেখানে প্রবেশ করব না। এই দুটি আমার উপর হারাম করা হয়েছে। যখনই আমি এর কোনো একটিতে প্রবেশ করতে চাইব, তখনই এক ফেরেশতা তার হাতে উন্মুক্ত তরবারি নিয়ে আমাকে প্রতিহত করবেন। আর এর প্রতিটি প্রবেশ পথে ফেরেশতারা পাহারা দিচ্ছেন।
[ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন:] রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন—এবং মিম্বরের উপর লাঠি দ্বারা আঘাত করে ইঙ্গিত করলেন—"এইটি তায়বা, এইটি তায়বা, এইটি তায়বা"—অর্থাৎ মদীনা। "সাবধান! আমি কি তোমাদেরকে এই বিষয়ে বলিনি?" লোকেরা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তামীমের হাদীসটি আমাকে আনন্দিত করেছে, কারণ এটি দাজ্জাল এবং মক্কা ও মদীনা সম্পর্কে আমি তোমাদেরকে যা বলতাম তার সাথে মিলে গেছে। সাবধান! সে (দাজ্জাল) সিরিয়ার সাগরে অথবা ইয়ামানের সাগরে আছে। না, বরং সে পূর্ব দিক থেকে আসবে। সে পূর্ব দিক থেকে আসবে। সে পূর্ব দিক থেকে আসবে!"—আর তিনি তার হাত দ্বারা পূর্ব দিকে ইঙ্গিত করলেন। [ফাতেমা বিনতে কায়েস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন:] আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এটি মুখস্থ করে রাখলাম।
15742 - عن سالم بن عبد اللَّه أخبره، أن عبد اللَّه بن عمر أخبره: أن عمر بن الخطاب انطلق مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في رهط قبل ابن صياد حتى وجده يلعب مع الصبيان عند أطم بني مغالة، وقد قارب ابن صياد يومئذ الحلم، فلم يشعر حتى ضرب رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ظهره بيده، ثم قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لابن صياد:"أتشهد أني رسول اللَّه؟ فنظر إليه ابن صياد، فقال: أشهد أنك رسول الأميين، فقال ابن صياد لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: أتشهد أني رسول اللَّه؟ فرفضه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وقال:"آمنت باللَّه وبرسله"، ثم قال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ماذا ترى؟" قال ابن صياد: يأتيني صادق وكاذب، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خلط عليك الأمر"، ثم قال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إني قد خبأت لك خبيئا"، فقال ابن صياد: هو الدخ، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اخسأ، فلن تعدو قدرك"، فقال عمر بن الخطاب: ذرني يا رسول اللَّه أضرب عنقه، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن يكنه فلن تسلط عليه، وإن لم يكنه فلا خير لك في قتله".
وقال سالم بن عبد اللَّه: سمعت عبد اللَّه بن عمر يقول: انطلق بعد ذلك رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأبي بن كعب الأنصاري إلى النخل التي فيها ابن صياد حتى إذا دخل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم النخل، طفق يتقي بجذوع النخل، وهو يختل أن يسمع من ابن صياد شيئًا قبل أن يراه ابنُ صياد، فرآه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو مضطجع على فراش في قطيفة له فيها زمزمة، فرأت أم ابن صياد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو يتقي بجذوع النخل، فقالت لابن صياد: يا صاف! (وهو اسم ابن صياد) هذا محمد، فثار ابن صياد، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لو تركتْه بَيَّنَ".
قال سالم: قال عبد اللَّه بن عمر: فقام رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في الناس، فأثنى على اللَّه بما هو أهله، ثم ذكر الدجال، فقال:"إني لأنذركموه، ما من نبي إلا وقد أنذره قومه، لقد أنذره نوح قومه، ولكن أقول لكم فيه قولا لم يقله نبي لقومه، تعلَّموا أنه أعور، وأن اللَّه تبارك وتعالى ليس بأعور".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1354 - 1355)، وفي الجهاد والسير (3055 - 3057، ومسلم في الفتن وأشراط الساعة (2930 - 2931) كلاهما من طريق الزهري، عن سالم، فذكره. والسياق لمسلم.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদল লোকের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ইবনে সাইয়্যাদের কাছে গেলেন। অবশেষে তাঁরা তাকে বানী মুগালাহ গোত্রের একটি দুর্গের (বা টিলার) কাছে শিশুদের সাথে খেলতে দেখলেন। সেদিন ইবনে সাইয়্যাদ বালেগ হওয়ার কাছাকাছি ছিল। সে টেরও পেল না, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হাত দিয়ে তার পিঠে আঘাত করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইবনে সাইয়্যাদকে বললেন: "তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আমি আল্লাহর রাসূল?"
ইবনে সাইয়্যাদ তাঁর দিকে তাকিয়ে বলল: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি উম্মীদের রাসূল। এরপর ইবনে সাইয়্যাদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলল: আপনি কি সাক্ষ্য দেন যে, আমি আল্লাহর রাসূল? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা প্রত্যাখ্যান করলেন এবং বললেন: "আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলগণের ওপর ঈমান এনেছি।"
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কী দেখতে পাও?" ইবনে সাইয়্যাদ বলল: আমার কাছে সত্যবাদী ও মিথ্যাবাদী আসে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার কাছে বিষয়টি মিশ্রিত হয়ে গেছে।"
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "আমি তোমার জন্য একটি গোপন কথা লুকিয়ে রেখেছি।" ইবনে সাইয়্যাদ বলল: তা হলো 'আদ-দুখ' (ধোঁয়াশা)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "দূর হও! তুমি তোমার সীমা অতিক্রম করতে পারবে না।"
তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমাকে ছেড়ে দিন, আমি তার গর্দান উড়িয়ে দেই। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "যদি সে (প্রতিশ্রুত দাজ্জাল) হয়, তবে তুমি তার ওপর ক্ষমতা লাভ করবে না। আর যদি সে না হয়, তবে তাকে হত্যা করার মধ্যে তোমার কোনো কল্যাণ নেই।"
সালেম ইবনে আবদুল্লাহ (রহ.) বলেন: আমি আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং উবাই ইবনে কা'ব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই খেজুর বাগানের দিকে গেলেন, যেখানে ইবনে সাইয়্যাদ ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বাগানে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি খেজুর গাছের কাণ্ডের আড়ালে নিজেকে লুকিয়ে রাখতে লাগলেন। তিনি গোপনে শুনতে চাইলেন যে, ইবনে সাইয়্যাদ তাঁকে দেখার আগে কী বলছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখতে পেলেন যে, সে তার চাদরের নিচে একটি বিছানায় শুয়ে আছে এবং সে বিড়বিড় করছে (বা গুনগুন করছে)। ইবনে সাইয়্যাদের মা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খেজুর গাছের কাণ্ডের আড়ালে লুকিয়ে থাকতে দেখে ফেললেন। তিনি ইবনে সাইয়্যাদকে বললেন: হে সাফ! (এটি ইবনে সাইয়্যাদের নাম) এই যে মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! তখন ইবনে সাইয়্যাদ চমকে উঠে গেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে তাকে ছেড়ে দিত, তাহলে সে তার অবস্থা স্পষ্টভাবে প্রকাশ করত।"
সালেম (রহ.) বলেন: আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষের মাঝে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহর যথাযথ প্রশংসা করলেন। এরপর তিনি দাজ্জাল সম্পর্কে আলোচনা করলেন এবং বললেন: "আমি তোমাদেরকে তার সম্পর্কে সতর্ক করছি। এমন কোনো নবী নেই, যিনি তার জাতিকে তার সম্পর্কে সতর্ক করেননি। নূহ (আঃ)-ও তার জাতিকে সতর্ক করেছিলেন। কিন্তু আমি তোমাদেরকে তার সম্পর্কে এমন একটি কথা বলব, যা কোনো নবীই তাঁর জাতিকে বলেননি। তোমরা জেনে রাখো যে, সে কানা (এক চোখ অন্ধ), আর আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা কানা নন।"
15743 - عن عبد اللَّه قال: كنا مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم فمررنا بصبيان فيهم ابن صياد، ففرَّ الصبيانُ، وجلس ابن صياد فكأن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم كره ذلك فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"تربت يداك أتشهد أني رسول اللَّه؟" فقال: لا بل تشهد أني رسول اللَّه، فقال عمر بن الخطاب: ذرني يا رسول اللَّه حتى أقتله، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إن يكن الذي ترى فلن تستطيع قتله".
وفي لفظ: كنا نمشي مع النبي صلى الله عليه وسلم فمرَّ بابن صياد، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"قد خبأت لك خبيئا"، فقال: دخ، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اخسأ فلن تعدو قدرك"، فقال عمر: يا رسول اللَّه، دعني فأضرب عنقه، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"دعه، فإن يكن الذي تخاف لن تستطيع قتله".
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2924: 85) من طريق جرير، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد اللَّه فذكره باللفظ الأول.
ورواه (2924: 86) من طريق أبي معاوية، عن الأعمش به باللفظ الثاني.
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে ছিলাম। আমরা কিছু বালকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, তাদের মধ্যে ইবনু সায়্যাদও ছিল। তখন অন্য শিশুরা পালিয়ে গেল, কিন্তু ইবনু সায়্যাদ বসে রইল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যেন তা অপছন্দ করলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "তোমার দু'হাত ধূলিধূসরিত হোক! তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আমি আল্লাহর রাসূল?" সে বলল: না, বরং আপনি সাক্ষ্য দিন যে, আমি আল্লাহর রাসূল। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে ছেড়ে দিন, আমি তাকে হত্যা করি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "যদি সে তাই হয়, যা তুমি দেখছো (অর্থাৎ দাজ্জাল হয়), তবে তুমি তাকে হত্যা করতে সক্ষম হবে না।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে হাঁটছিলাম। তিনি ইবনু সায়্যাদের পাশ দিয়ে গেলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বললেন: "আমি তোমার জন্য একটি গোপন বিষয় লুকিয়ে রেখেছি।" সে বলল: ‘দুখ’ (অর্থাৎ ধোঁয়া/গোপন জিনিস)। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "দূর হ! তুই তোর সীমা অতিক্রম করতে পারবি না।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে ছেড়ে দিন, আমি এর গর্দান উড়িয়ে দেই। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও। যদি সে তা-ই হয় যা তুমি ভয় পাচ্ছো, তবে তুমি তাকে হত্যা করতে সক্ষম হবে না।"
15744 - عن أبي سعيد الخدري قال: لقيه -أي ابنَ صياد- رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم وأبو بكر وعمر في
بعض طرق المدينة، فقال له رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتشهد أني رسول اللَّه؟" فقال هو: أتشهد أني رسول اللَّه؟ فقال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"آمنتُ باللَّه وملائكته وكتبه، ما ترى؟" قال: أرى عرشا على الماء، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ترى عرش إبليس على البحر، وما ترى؟" قال أرى صادقا وكاذبا أو كاذبين وصادقا، فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لُبِسَ عليه، دَعُوه".
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2925) عن محمد بن المثنى، حدّثنا سالم بن نوح، عن الجريري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد قال: فذكره.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদীনার কোনো এক পথে ইবনু সাইয়্যাদের সাথে সাক্ষাৎ করলেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আমি আল্লাহর রাসূল?" সে (ইবনু সাইয়্যাদ) বলল: "আপনি কি সাক্ষ্য দেন যে, আমি আল্লাহর রাসূল?" আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আল্লাহ, তাঁর ফেরেশতা ও তাঁর কিতাবসমূহের প্রতি বিশ্বাস করি। তুমি কী দেখতে পাও?" সে বলল: "আমি পানির উপর একটি সিংহাসন দেখতে পাচ্ছি।" আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি ইবলিসের সিংহাসন সমুদ্রের উপর দেখছ। আর কী দেখছ?" সে বলল: "আমি একজন সত্যবাদী ও একজন মিথ্যাবাদী অথবা দু'জন মিথ্যাবাদী ও একজন সত্যবাদীকে দেখতে পাচ্ছি।" আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ব্যাপারটি তার কাছে আবৃত (সন্দেহযুক্ত) হয়ে গেছে। তাকে ছেড়ে দাও।"
15745 - عن أبي سعيد أن ابن صيّاد سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن تربة الجنة فقال:"درمكة بيضاء، مسك خالص".
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2928: 93) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا أبو أسامة، عن الجريري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره.
وهذا هو الصحيح، والنظر يدل على ذلك أن يكون النبي صلى الله عليه وسلم هو المسئول عن الغيبيات لا سائلا عنها، ولكن قدّم مسلم (2928: 92) رواية نصر بن علي الجهضمي، حدّثنا بشر بن مفضل، عن أبي سلمة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لابن صائد: ما تربة الجنة. . . الحديث.
فجعل ابن صائد هو المسؤول، ولعل ذلك نظزا لقوتها من حيث الصناعة الحديثية، فإنها أقوى من رواية الجريري.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনু সাইয়্যাদ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে জান্নাতের মাটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি বললেন: "সাদা মিহি মাটি, খাঁটি কস্তুরী।"
15746 - عن أبي سعيد الخدري قال: خرجنا حجاجا أو عمارًا، ومعنا ابن صائد، قال: فنزلنا منزلا، فتفرق الناس، وبقيت أنا وهو فاستوحشت منه وحشة شديدة مما يقال عليه، قال: وجاء بمتاعه فوضعه مع متاعي فقلت: إن الحرَّ شديدٌ، فلو وضعته تحت تلك الشجرة، قال: ففعل، قال: فرفعت لنا غنم، فانطلق، فجاء بعس، فقال: اشرب أبا سعيد فقلت: إن الحر شديد، واللبن حار، ما بي إلا أني أكره أن أشرب عن يده -أو قال: آخذ عن يده- فقال: أبا سعيد لقد هممت أن آخذ حبلا فأعلقه بشجرة ثم أختنق مما يقول لي الناس، يا أبا سعيد من خفي عليه حديث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، ما خفي عليكم معشر الأنصار، ألست من أعلم الناس بحديث رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم؟ أليس قد قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هو كافر" وأنا مسلم؟ أو ليس قد قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"هو عقيم لا يولد له"، وقد تركت ولدي بالمدينة؟ أو ليس قد قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يدخل المدينة ولا مكة"، وقد أقبلت من المدينة وأنا أريد مكة؟
قال أبو سعيد الخدري: حتى كدت أن أعذره، ثم قال: أما واللَّه إني لأعرفه،
وأعرف مولده، وأين هو الآن، قال: قلت له: تبا لك سائر اليوم.
وفي رواية عنه قال: فما زال حتى كاد أن يأخذ فيَّ قوله، قال: فقال له: أما واللَّه إني لأعلم الآن حيث هو، وأعرف أباه وأمه، قال: وقيل له: أيسرك أنك ذاك الرجل؟ قال: فقال: لو عرض علي ما كرهت.
صحيح: رواه مسلم في الفتن (2927: 91) عن محمد بن المثنى، حدّثنا سالم بن نوح، أخبرني الجريري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري قال: فذكره.
والرواية الثانية: رواها مسلم (2927: 90) من طريق معتمر، عن أبيه، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره.
وروي عن أبي سعيد أنه قال: ذُكر ابن صياد عند النبي صلى الله عليه وسلم فقال عمر: إنه يزعم أنه لا يمر بشيء إلا كلّمه.
رواه أحمد (11753) عن عبد المتعال، حدّثنا يحيى بن سعيد الأموي، حدّثنا مجالد، عن أبي الوداك، عن أبي سعيد فذكره.
وأورده الهيثمي في المجمع (8/ 4) وقال: رواه أحمد وفيه مجالد بن سعيد وهو ضعيف، وقد وُثّقَ، وبقية رجاله ثقات.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা হজ্ব বা উমরাহর উদ্দেশ্যে বের হলাম, আর আমাদের সাথে ইবনু সায়্যিদও ছিল। তিনি বলেন: আমরা একটি স্থানে অবতরণ করলাম। লোকেরা (আলাদা আলাদা হয়ে) ছড়িয়ে পড়ল, আর আমি ও সে রয়ে গেলাম। লোকেরা তার সম্পর্কে যা বলত, তার কারণে আমি তার থেকে তীব্রভাবে অস্বস্তি অনুভব করছিলাম।
তিনি বলেন: সে তার জিনিসপত্র নিয়ে এসে আমার জিনিসপত্রের সাথে রাখল। আমি বললাম: প্রচণ্ড গরম, তুমি যদি ওগুলো ওই গাছের নিচে রাখতে। তিনি বললেন: সে তাই করল।
তিনি বলেন: আমাদের সামনে কিছু ছাগল তোলা হলো। সে গেল এবং একটি বড় পেয়ালা নিয়ে এলো। সে বলল: পান করুন, হে আবূ সাঈদ। আমি বললাম: গরম প্রচণ্ড, আর দুধও গরম। (আসলে) আমার সমস্যা ছিল এটাই যে, আমি তার হাত থেকে পান করতে — বা তিনি বলেছেন: তার হাত থেকে নিতে — অপছন্দ করছিলাম।
তখন সে বলল: হে আবূ সাঈদ! আমি এতটাই উদ্বিগ্ন যে, আমার ইচ্ছে হয় একটি দড়ি নিয়ে গাছে ঝুলিয়ে গলায় ফাঁস দেই, এই কারণে যে লোকেরা আমার সম্পর্কে কী বলে! হে আবূ সাঈদ! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর হাদীস যা অন্যদের কাছে অস্পষ্ট থাকতে পারে, তা তোমাদের আনসারদের কাছে অস্পষ্ট থাকার কথা নয়। আমি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর হাদীস সম্পর্কে অবগত লোকদের মধ্যে নই? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি বলেননি, "সে (দাজ্জাল) কাফির," অথচ আমি মুসলমান? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি বলেননি, "সে (দাজ্জাল) বন্ধ্যা, তার কোনো সন্তান হবে না," অথচ আমি মদীনায় আমার সন্তানকে রেখে এসেছি? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি বলেননি, "সে (দাজ্জাল) মদীনা বা মক্কায় প্রবেশ করবে না," অথচ আমি মদীনা থেকে মক্কার উদ্দেশ্যে এসেছি?
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এমনকি আমি প্রায় তাকে ক্ষমা করে দিতে উদ্যত হয়েছিলাম। এরপর সে বলল: আল্লাহর কসম! আমি তাকে (দাজ্জালকে) অবশ্যই চিনি, তার জন্মস্থানও জানি এবং এখন সে কোথায় আছে, তাও জানি। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে বললাম: আজকের দিনের বাকি সময় তোর জন্য ধ্বংস হোক!
তাঁর থেকে অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি বলেন: সে (ইবনু সায়্যিদ) আমার উপর এমন প্রভাব ফেলছিল যে, আমি প্রায় তার কথা মেনে নিতে যাচ্ছিলাম। বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে (ইবনু সায়্যিদ) তাকে বলল: আল্লাহর কসম! আমি এখন অবশ্যই জানি সে কোথায় আছে, আর আমি তার বাবা-মাকেও চিনি। বর্ণনাকারী বলেন: তাকে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল: তুমি কি চাও যে, তুমিই সেই ব্যক্তি হও (দাজ্জাল)? সে বলল: যদি আমার কাছে প্রস্তাব করা হয়, তবে আমি অপছন্দ করব না।
আর আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে ইবনু সায়্যাদের কথা আলোচনা করা হয়েছিল। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে দাবি করে যে, সে যা কিছুর পাশ দিয়ে যায়, তা-ই তার সাথে কথা বলে।
15747 - عن جابر بن عبد اللَّه قال: لقي نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم ابن صائد ومعه أبو بكر وعمر قال: وابن صائد مع الغلمان، فقال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتشهد أني رسول اللَّه؟" قال: أتشهد أني رسول اللَّه؟ فقال نبي اللَّه:"آمنت باللَّه وبرسوله" قال: فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما ترى؟" قال: أرى عرشا على الماء فقال صلى الله عليه وسلم:"ترى عرش إبليس على البحر" قال:"انظر ما ترى" قال: أرى صادقين وكاذبين فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لبس على نفسه" فدعاه.
صحيح: رواه مسلم في الفتن وأشراط الساعة (2926)، وابن حبان (6784) كلاهما من طريق محمد بن عبد الأعلى قال: حدّثنا معتمر بن سليمان قال: سمعت أبي، قال: حدّثنا أبو نضرة، عن جابر بن عبد اللَّه قال: فذكره. واللفظ لابن حبان، ولم يسق مسلم لفظه، وإنما أحال على حديث أبي سعيد قبله (2925).
قوله:"فدعاه" أي تركاه.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইবনে সাইদ-এর সাথে সাক্ষাৎ করলেন, তাঁর সাথে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও ছিলেন। তিনি বললেন: ইবনে সাইদ তখন বালকদের সাথে ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আমি আল্লাহর রাসূল?" সে বলল: আপনি কি সাক্ষ্য দেন যে, আমি আল্লাহর রাসূল? তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি ঈমান এনেছি।" তিনি বললেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কী দেখতে পাও?" সে বলল: আমি পানির উপর একটি আরশ দেখতে পাচ্ছি। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি সমুদ্রের উপর ইবলিসের আরশ দেখতে পাচ্ছ।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দেখো, তুমি কী দেখতে পাও।" সে বলল: আমি দু'জন সত্যবাদী এবং দু'জন মিথ্যাবাদীকে দেখতে পাচ্ছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে নিজেই নিজেকে বিভ্রান্ত করেছে।" এরপর তাকে ছেড়ে দিলেন।