আল-জামি` আল-কামিল
1608 - عن أبي رافع قال: أشهد لقد كنت أشوي لرسول الله صلى الله عليه وسلم بطن شاة، ثم صلَّى ولم يتوضّأ.
صحيح: أخرجه مسلم في الحيض (357) من طريق عمرو، حدَّثني سعيد بن أبي هِلال، عن
عبد الله بن عبد الله بن أبي رافع، عن أبي غطفان، عن أبي رافع .. فذكره.
আবূ রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য একটি বকরির পেটের মাংস ভুনা করে রান্না করেছিলাম। অতঃপর তিনি সালাত আদায় করলেন কিন্তু নতুন করে ওযু করলেন না।
1609 - عن جابر بن عبد الله يقول: قرّبتُ للنبي صلى الله عليه وسلم خبزًا ولحما فأكل، ثم دعا بوضوء فتوضأ به، ثم صلَّى الظهر، ثم دعا بفضل طعامه فأكل، ثم قام إلى الصلاة ولم يتوضأ.
حسن: رواه أبو داود (191) قال: حدَّثنا إبراهيم بن الحسن الخثعمي، ثنا حجّاج، قال ابن جريج: أخبرني محمد بن المنكدر، قال: سمعتُ جابر بن عبد الله يقول، فذكر الحديث.
وفي هذا ردّ على ما نقله البيهقي في المعرفة عن الشافعي أنه قال:"لم يسمع ابن المنكدر هذا الحديث من جابر، وإنما سمعه من عبد الله بن محمد بن عقيل عن جابر"؛ فقد صرّح ابن المنكدر في رواية ابن جريج بأنه سمعه من جابر. والذي دفعه إلى هذا هو شكّ سفيان في سماع ابن المنكدر هذا الحديث من جابر في بعض الروايات.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সামনে রুটি ও গোশত পরিবেশন করলাম, অতঃপর তিনি তা খেলেন। এরপর তিনি ওযূর পানি চাইলেন এবং তা দিয়ে ওযূ করলেন। এরপর তিনি যুহরের সালাত আদায় করলেন। এরপর অবশিষ্ট খাবার নিয়ে আসার জন্য বললেন এবং তা খেলেন। এরপর তিনি সালাতের জন্য দাঁড়ালেন, কিন্তু (নতুন করে) ওযূ করলেন না।
1610 - عن قال الترمذي (80): حدَّثنا ابن أبي عمر، حدَّثنا سفيان بن عيينة، قال: حدَّثنا عبد الله بن محمد بن عقيل، سمع جابرًا. قال سفيان: وحدَّثنا محمد بن المنكدر، عن جابر قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا معه، فدخل على امرأة من الأنصار، فذبحت له شاةً فأكل، وأتته بقناع من رطب فأكل منه، ثم توضأ للظهر وصلى، ثم انصرف، فأتتْه بعلالةٍ من علالة الشاة فأكل، ثم صلَّى العصر ولم يتوضأ.
وفي مسند أحمد (14299) يقول سفيان: سمعت ابن المنكدر غير مرة يقول: عن جابر، وكأني سمعته (مرة) يقول: أخبرني من سمع جابرًا، فظننتُه سمعه من ابن عقيل، ابن المنكدر وعبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر: أن النبي صلى الله عليه وسلم أكل لحمًا، ثم صلَّى ولم يتوضأ، وأن أبا بكر أكل لِبَأً، ثم صلَّى ولم يتوضأ، وأن عمر أكل لحمًا، ثم صلَّى ولم يتوضأ.
وأخرجه ابن ماجه (489) من طريق سفيان بن عيينة، عن ابن المنكدر وعمرو بن دينار وعبد الله بن محمد بن عقيل، كلهم عن جابر، قال: أكل النبي صلى الله عليه وسلم وأبو بكر وعمر خبزًا ولحمًا ولم يتوضأوا.
ففي هذا الإسناد أن سفيان سمعه من ثلاثة منهم ابن المنكدر، ثم شكّ في أن ابن المنكدر سمعه من جابر، والشك مردود بمقابل اليقين.
ورواه غير سفيان بن عيينة ولم يشكوا في سماع ابن المنكدر من جابر، كما مضى من رواية أبي داود من طريق ابن جريج، وفيه تصريح بالسماع منه.
قوله (العُلالة) بضم العين المهملة: البقية، أو ما يتعلل به شيئًا بعد شيء، والمراد هنا: بقية لحم الشاة.
وقوله (لِبَأ) بكسر اللام وفتح الباء - على وزن عِنَب: أول اللبن عند الولادة. وقال أبو زيد: وأكثر ما يكون ثلاث حلبات، وأقله حلبة. المصباح المنير".
وقوله (القِناع): الطبق.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন, আর আমি তাঁর সাথে ছিলাম। তিনি আনসারদের এক মহিলার ঘরে প্রবেশ করলেন। মহিলা তাঁর জন্য একটি বকরী যবেহ করলেন। তিনি তা থেকে খেলেন এবং তাঁকে এক ঝুড়ি তাজা খেজুর (রতব) এনে দিলেন, তিনি তা থেকেও খেলেন। এরপর তিনি যোহরের জন্য উযূ করলেন এবং সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ফিরে এলেন। মহিলা তাঁকে বকরীর অবশিষ্ট (মাংসের) কিছু অংশ এনে দিলেন, তিনি তা থেকে খেলেন। এরপর তিনি উযূ না করেই আসরের সালাত আদায় করলেন।
অন্যান্য বর্ণনায় রয়েছে, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গোশত খেলেন, এরপর সালাত আদায় করলেন এবং নতুন করে উযূ করলেন না। আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) 'লিব্বা' (নবজাতকের জন্য প্রথম দুধ/কলোস্ট্রাম) খেলেন, এরপর সালাত আদায় করলেন এবং নতুন করে উযূ করলেন না। আর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গোশত খেলেন, এরপর সালাত আদায় করলেন এবং নতুন করে উযূ করলেন না।
ইবনু মাজাহর এক বর্ণনায় বলা হয়েছে, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রুটি ও গোশত খেলেন, কিন্তু তাঁরা উযূ করলেন না।
1611 - عن جابر بن عبد الله قال: كان آخر الأمرين من رسول الله صلى الله عليه وسلم ترك الوضوء مما
غَيَّرتِ النار.
صحيح: رواه أبو داود (192) والنسائي (185) من حديث علي بن عياش، ثنا شُعيب بن أبي حمزة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر. وفي رواية النسائي: قال محمد بن المنكدر سمعت جابرًا.
قال أبو داود: هذا اختصار من الحديث الأوَّل.
قلت: فمن الممكن أن ابن المنكدر سمع من وجهين؛ مرة بالواسطة وأخرى بدون واسطة، فروى بوجهين، وهو أمر معروف في علم الحديث.
وإسناده صحيح. وصححه ابن خزيمة (43)، من هذا الوجه.
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে এ ব্যাপারে সর্বশেষ নির্দেশ ছিল, আগুন পরিবর্তন করেছে (অর্থাৎ রান্না করা হয়েছে) এমন খাদ্যবস্তু গ্রহণের পর ওযু করা ছেড়ে দেওয়া।
1612 - عن المغيرة بن شعبة قال: ضِفتُ النبي صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فأمر بِجَنْبٍ فشُوِي، وأخذ الشفرة فجعل يحز لي بها منه، قال: فجاء بلال فآذنه بالصلاة، قال: فألقي الشفرة وقال:"ما له! تربت يداه!". وقام يُصلي.
زاد الأنباري: وكان شاربي وفَى فقصَّه لي على سواك. أو قال:"أقصُّه لك على سواك".
حسن: رواه أبو داود (188) قال: حدَّثنا عثمان بن أبي شيبة ومحمد بن سليمان الأنباري - المعنى -، قالا: حدَّثنا وكيع، عن مسعر، عن أبي صخرة جامع بن شدَّاد، عن المغيرة بن عبد الله (اليشكري الكوفي) عن المغيرة بن شعبة .. فذكر الحديث.
ورجاله ثقات غير المغيرة بن عبد الله اليشكري، ذكره ابن حبان في الثقات، وقال العجلي: كوفي ثقة. وجعله الحافظ في درجة"ثقة". وهو من رجال مسلم، ولكن على قاعدة الحافظ يكون"صدوقًا".
وما رواه أبو داود الطيالسي في مسنده (2/ 75 رقم 733) من متابع له وهو أبو عون الثقفي محمد بن عبيد الله، عن المغيرة بن شعبة مختصرًا؛ فإنَّ في طريقه إليه المسعودي وعنه رواه أبو داود الطيالسي، والمسعودي ثقة إلَّا أنه قد اختلط، وأبو داود ممن سمع منه بعد اختلاطه، كما أن أبا عون لم يدرك المغيرة بن شعبة.
وما عزاه المنذري إلى الترمذي وابن ماجه فلم أجد الحديث في سنن ابن ماجه، وأما الترمذي ففي شمائله (159)، وكذا أخرجه أيضًا النسائي في الكبري (6621) عن مسعر به مُختصرًا.
وقوله:"فأمر بجنبٍ" أي قطعة لحمٍ. وقوله:"تربت يداه" هي كلمة تقولها العرب عند اللوم والتأنيب، ومعناه الدعاء عليه بالفقر والعدم، وهم لا يريدون وقوع ذلك الأمر، وكقولهم:"لا والله!"، و"بلى والله!"، وذلك من لغو اليمين الذي لا اعتبار به ولا كفارة فيه. ذكره الخطابي في شرحه لأبي داود.
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক রাতে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মেহমান ছিলাম। তিনি একটি পার্শ্বের (মাংস) ভুনা করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি ছুরি নিলেন এবং তা দিয়ে আমার জন্য মাংস কেটে দিতে লাগলেন। তিনি বলেন, এমন সময় বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে সালাতের খবর দিলেন। তখন তিনি ছুরিটি ফেলে দিলেন এবং বললেন: "তার কী হলো! তার হাত ধূলি-ধূসরিত হোক!" এরপর তিনি সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়িয়ে গেলেন।
আম্বারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অতিরিক্ত বলেছেন: আমার গোঁফ বড় হয়ে গিয়েছিল, তাই তিনি মিসওয়াকের উপর রেখে তা কেটে দিলেন। অথবা তিনি বললেন: "আমি তোমার জন্য মিসওয়াকের উপর রেখে তা কেটে দেব।"
1613 - عن أم سلمة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أكل كَتِفًا، فجاءه بلال، فخرج إلى الصلاة، ولم يَمَسّ ماءً.
صحيح: رواه النسائي (182) وابن ماجه (491) كلاهما من حديث جعفر بن محمد، عن أبيه، عن علي بن الحسين، عن زينب بنت أم سلمة، عن أم سلمة، فذكرت الحديث.
وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (44)، من هذا الوجهِ.
ورواه الترمذي (1829) من وجه آخر عن حجاج بن محمد قال: قال ابن جريج: أخبرني محمد بن يوسف أن عطاء بن يسار أخبره أن أم سلمة أخبرته أنها قرَّبتْ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم جَنْبًا مشْويًّا، فأكل منه، ثم قام إلى الصلاة وما توضأ. قال الترمذي: حسن صحيح غريب من هذا الوجه.
ورواه النسائي (183) من طريق ابن جريج، عن محمد بن يوسف، عن سليمان بن يسار قال: دخلت على أم سلمة فحدَّثَتني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصبح جُنُبا من غير احتلام، ثم يصوم. وحدَّثنا مع هذا الحديث أنها حدثته أنها قرَّبتْ إلى النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت الحديث.
وللحديث طرق أخرى في مسند الإمام أحمد وغيره عن أم سلمة.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি (পশুর) কাঁধের গোশত খেলেন। এরপর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিকট আসলেন, তখন তিনি সালাতের জন্য বের হয়ে গেলেন এবং পানি স্পর্শ করলেন না (অর্থাৎ অযু করলেন না)।
সহীহ: এটি নাসাঈ (১৮২) ও ইবনু মাজাহ (৪৯১) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই জা‘ফর ইবনু মুহাম্মাদ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আলী ইবনুল হুসাইন থেকে, তিনি যাইনাব বিনত উম্মে সালামা থেকে, তিনি উম্মে সালামা থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। আর এর সনদ সহীহ। ইবনু খুযাইমাহ (৪৪) এই সূত্রে এটিকে সহীহ বলেছেন।
এটি তিরমিযীও (১৮২৯) ভিন্ন সূত্রে হাজ্জাজ ইবনু মুহাম্মাদ থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: ইবনু জুরাইজ বলেছেন: মুহাম্মাদ ইবনু ইউসুফ আমাকে জানিয়েছেন যে, আতা ইবনু ইয়াসার তাকে জানিয়েছেন যে, উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে জানিয়েছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ভুনা পার্শ্বদেশ (গোশত) পেশ করলেন। তিনি তা থেকে আহার করলেন। অতঃপর তিনি সালাতের জন্য দাঁড়ালেন এবং অযু করলেন না। ইমাম তিরমিযী বলেছেন: এই সূত্রে হাদীসটি হাসান সহীহ গারীব।
এটি নাসাঈ (১৮৩) ইবনু জুরাইজ-এর সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু ইউসুফ থেকে, তিনি সুলাইমান ইবনু ইয়াসার থেকে বর্ণনা করেছেন। সুলাইমান ইবনু ইয়াসার বলেন: আমি উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। তিনি আমাকে জানালেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) স্বপ্নদোষ ছাড়াই জুনুব (গোসল ফরয) অবস্থায় সকাল করতেন, অতঃপর সাওম পালন করতেন। এই হাদীসের সাথে তিনি (উম্মে সালামা) আরও বলেন যে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট (গোশত) পেশ করেছিলেন— অতঃপর হাদীসটি উল্লেখ করেন।
এই হাদীসের অন্যান্য সূত্র ইমাম আহমাদ ও অন্যান্যদের মুসনাদে উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে।
1614 - عن عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزبيدي قال: كنا يومًا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصُفَّة، فوُضِع لنا طعامٌ فأكلنا، ثم أقيمتِ الصلاةُ، فصلينا ولم نتوضأ.
صحيح: رواه أحمد (17705) عن هارون - قال ابنه عبد الله أبو عبد الرحمن - وسمعتُه أنا من هارون قال: حدَّثنا عبد الله بن وهب، قال: أخبرني حيوة بن شُريح، قال: أخبرني عُقبة بن مسلم، عن عبد الله بن الحارث بن جَزْء فذكر مثله.
وهارون - هو ابن معروف. وإسناده صحيح.
ورواه ابن ماجه (3300) من طريق عبد الله بن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث قال: حدثني سليمان بن زياد الحضرمي، أنه سمع عبد الله بن الحارث بن جَزْء يقول: كنا نأكل على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم في المسجد الخبزَ واللحم. ولم يذكر فيه الصلاة.
وللحديث إسناد آخر رواه ابن ماجه (3311) والإمام أحمد (17702) كلاهما من طريق ابن لهيعة، حدَّثنا سليمان بن زياد الحضرمي، عن عبد الله بن الحارث بن جَزْء الزبيدي قال: أكلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم طعامًا في المسجد، لحمًا قد شُوِي، فمسحنا أيدينا بالحصْباءِ، ثم قُمنا نُصلي، ولم نتوضأ. واللفظ للإمام أحمد، ولفظ ابن ماجه نحوه، وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكن رواه الترمذي في الشمائل (167) عن قتيبة - وهو ابن سعيد - عن ابن لهيعة به مُختصرًا.
ورواية قتيبة بن سعيد عن ابن لهيعة صحيحة.
ورواه أبو داود (193) من طريق عبيد بن ثمامة المُرادي، قال: قدم علينا مِصرَ عبد الله بن الحارث بن جَزْء من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فسمعتُه يحدث في مسجد مصر، قال: لقد رأيتني سابع سبعة، أو سادس ستة مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في دار رجل، فمرَّ بلال، فناداه بالصلاة، فخرجنا فمررنا برجل وبُرمتُه على النار.
فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أطابتْ بُرمتُك؟" قال: نعم بأبي أنت وأُمي! فتناول منها بَضْعَةً فلم يزل يعلكها حتَّى أحرم بالصلاة، وأنا أنظر إليه.
وإسناده ضعيف فإنَّ عبيد بن ثمامة المرادي لم يرو عنه غير ابن أبي كريمة. ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" ولكنه لا بأس به في المتابعات وقد صحَّ الإسناد بدونه.
আব্দুল্লাহ ইবনুল হারিস ইবনে জায’ আয-যুবাইদি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সুফ্ফায় (মসজিদের বারান্দা) ছিলাম। তখন আমাদের সামনে খাবার রাখা হলো, আর আমরা খেলাম। অতঃপর সালাতের ইকামত দেওয়া হলো। আমরা সালাত আদায় করলাম, কিন্তু (নতুন করে) ওযু করিনি।
1615 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أكل كَتِف شاةٍ فمضمض وغسل يديه وصلَّى.
حسن: رواه ابن ماجه (493) قال: حدَّثنا محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب، ثنا عبد العزيز بن المختار، ثنا سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
ورجاله ثقات غير محمد بن عبد الملك بن أبي الشوارب؛ قال النسائي: لا بأس به. وهو صدوق كما في"التقريب"، إلَّا أنَّه توبع؛ فقد رواه ابن خزيمة (42)، ومن طريقه ابن حبَّان (1051)، عن أحمد بن عبدة الضبي، ثنا عبد العزيز - يعني ابن محمد الدراوردي -، عن سهيل به، ولفظه: عن أبي هريرة، أنَّه رأى النبيَّ صلى الله عليه وسلم يتوضَّأُ من ثَوْر أَقِطٍ، ثمَّ رآه أكل كَتِفَ شاةٍ، ثمَّ صلَّي ولم يتوضَّأ. وقال البوصيري في زوائده: رجال إسناده ثقات.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি ছাগলের কাঁধের গোশত খেলেন, অতঃপর তিনি কুলি করলেন, তাঁর দুই হাত ধুলেন এবং সালাত আদায় করলেন।
(অন্যান্য সূত্রে) আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরো বর্ণিত: তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে একবার পনিরের দই (আক্বিত) খাওয়ার পর উযু করতে দেখেছিলেন। অতঃপর তিনি তাঁকে (নবীকে) একটি ছাগলের কাঁধের গোশত খেতে দেখলেন, তারপর তিনি সালাত আদায় করলেন কিন্তু উযু করলেন না।
1616 - عن ابن عباس قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم شرب لبنًا، ثم دعا بماء فمضمض وقال:"إنَّ له دَسَمًا".
متفق عليه: البخاري في الوضوء (211) ومسلم في الحيض (358) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، ثنا الليث، عن عُقيل، عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
وأمّا ما رواه ابن ماجه (498) من طريق الوليد بن مسلم، قال: حدّثنا الأوزاعيّ، عن الزّهريّ، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس، أنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"فمضمضوا من اللّبن، فإنّ له دسمًا". فهذا اللّفظ فيه شذوذ؛ فإنّ الجميع رووه من فعل النّبي صلى الله عليه وسلم، ورواه الوليد بن مسلم من أمره، والوليد مدلّس ولكنّه صرّح بالتحديث إلّا أنه خالف الثقات في متن الحديث.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুধ পান করলেন। অতঃপর তিনি পানি চাইলেন এবং কুলি করলেন। আর বললেন: "নিশ্চয় এর মধ্যে তৈলাক্ততা (বা চর্বি) আছে।"
1617 - عن أنس بن مالك يقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم شرب لبنًا فلم يُمضمض، ولم يتوضأ وصلى.
حسن: رواه أبو داود (197) قال: حدَّثنا عثمان بن أبي شيبة، عن زيد بن الحباب، عن مطيع بن راشد، عن توبة العنبري، أنه سمع أنس بن مالك فذكره.
قال: زيد: دلني شعبة على هذا الشيخ.
قلت: رجاله ثقات غير مطيع بن راشد فإنه لم يوثقة غير شبعة في قول زيد بن الحباب بأنه دلَّه عليه، ولو لم يعرفه لما دلَّه عليه. ولو علم فيه جرحًا لبيَّنه. وقال أبو داود كما في تهذيب التهذيب:
أثنى عليه شعبة. وبهذا ارتفع عنه الجهالة، لأنه لم يرو عنه غير زيد بن الحباب. وحسَّن إسنادَه الحافظ في الفتح (1/ 313) وقال:"أغرب ابن شاهين فجعل حديث أنس ناسخًا لحديث ابن عباس، ولم يذكر من قال فيه بالوجوب حتَّى يحتاج إلى دعوى النسخ" انتهى.
وأمَّا ما رواه ابن ماجه (501) عن إسحاق بن إبراهيم السّواق، قال: حدّثنا الضّحاك بن مخلد، قال: حدّثنا زمعة بن صالح، عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك قال: حلب رسول الله شاة وشرب من لبنها، ثم دعا بماء فمضمض فاه وقال:"إنّ له دسمًا" فهو ضعيف؛ من أجل زمْعة - بكون الميم - ابن صالح الجنديّ اليماني نزيل مكة، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، قال البخاريّ: يخالف في حديثه، وقال ابن حبان: كان رجلًا صالحًا يهم ولا يعلم ويخطئ ولا يفهم حتى غلب في حديثه المناكير التي يرويها عن المشاهير، ولذا قال المزي في"تحفة الأشراف" (1/ 378): رواه غير واحد عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن ابن عباس، وهو المحفوظ" اهـ.
قلت: وكذلك لا يصح ما رُوي عن أمّ سلمة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا شربتم اللبن فمضمضوا؛ فإنَّ فيه دَسَمًا".
رواه ابن ماجه (499) قال: حدَّثنا أبو بكر بن أبي شيبة، ثنا خالد بن مَخْلَد، عن موسى بن يعقوب، حدثني أبو عبيدة بن عبد الله بن زَمْعة، عن أبيه، عن أم سلمة.
ورجاله ثقات غير خالد بن مَخْلَد القطواني، كان صدوقًا في نفسه، ولكن نقم عليه التشيع.
وموسى بن يعقوب المطلبي الزَمْعي مختلف فيه؛ فوثقه ابن معين. وقال أبو داود: صالح. وقال ابن عدي: لا بأس به عندي. وذكره ابن حبان في الثقات. وضعّفه ابن المديني وقال: ضعيف منكر الحديث. وقال النسائي: ليس بالقوي. وقال أحمد: لا يعجبني حديثه.
والخلاصة فيه كما قال الحافظ:"صدوق سيئ الحفظ".
فمثله لا يقبل حديثه إذا تفرّد أو خالف؛ حيث تفرّد بلفظ الأمر، والصّواب أنه من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم.
وأمَّا قول البوصيري:"رجاله ثقات" فهو ليس على إطلاقه.
وفي الباب ما رُوي عن عبد المهيمن بن عباس بن سهل بن سعد السّاعديّ، عن أبيه، عن جدّه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"مضمضوا من اللّبن، فإنّ له دسمًا".
رواه ابن ماجه (500) عن أبي مصعب، قال: حدّثنا عبد المهيمن بن عباس، بإسناده. وإسناده ضعيف من أجل عبد المهيمن هذا، فإنّ أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وبه أعلّه البوصيريّ في"الزوائد" فقال:"هذا إسناد ضعيف، عبد المهيمن قال البخاري: منكر الحديث".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুধ পান করলেন, কিন্তু তিনি কুলি করলেন না, ওযুও করলেন না এবং সালাত আদায় করলেন।
1618 - عن أنس قال: أقيمت الصلاة والنبي صلى الله عليه وسلم يناجي رجلًا في جانب المسجد، فما
قام إلى الصلاة حتَّى نام القوم.
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (642) وفي الاستئذان (6292) ومسلم في الحيض (376) كلاهما من طريق عبد العزيز بن صهيب، عن أنس، واللفظ للبخاري، وفي رواية مسلم عن قتادة قال: سمعت أنسًا يقول:"كان أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم ينامون، ثم يصلون ولا يتوضأون".
قال: قلت: سمعته من أنس؟ قال: إي والله! . وفي رواية أبي داود (200):"ينتظرون العشاء الآخرة حتَّى تخفق رؤوسُهم، ثم يصلون ولا يتوضأون". وفي رواية عنده عن ثابت، عن أنس قال:"أقيمت صلاة العشاء، فقال رجل: لي حاجة، فقام النبي صلى الله عليه وسلم يناجيه حتَّى نام القوم - أو بعض القوم - ثم صلوا". وفي البخاري (642):"فحبسه بعدما أقيمتِ الصلاة".
قال الخطابي:"وفي هذا الحديث من الفقه أن عين النوم ليس بحدث، ولو كان حَدَثًا لكان على أي حال وجد ناقضًا للطهارة كسائر الأحداث التي قليلها وكثيرها وعمدها وخطؤها سواء في نقض الطهارة، وإنما هو مَظِنَّة للحدث، موهم لوقوعه من النائم غالبًا …".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একবার সালাতের ইক্বামত দেওয়া হলো, অথচ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মসজিদের এক কোণে এক ব্যক্তির সাথে গোপনে কথা বলছিলেন। তিনি সালাতে দাঁড়ালেন না, যতক্ষণ না লোকেরা ঘুমিয়ে পড়ল।
(হাদীসটি) মুত্তাফাকুন আলাইহি।
মুসলিমের একটি বর্ণনায় ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণ ঘুমিয়ে পড়তেন, তারপর সালাত আদায় করতেন এবং নতুনভাবে ওযূ করতেন না।
তিনি (ক্বাতাদাহ-এর সাথী রাবী) বলেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম, ‘আপনি কি এটা আনাসের নিকট থেকে শুনেছেন?’ তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহর শপথ!
আবূ দাঊদের একটি বর্ণনায় আছে: "তাঁরা ইশার শেষ সময়ের জন্য অপেক্ষা করতেন, এমনকি তাঁদের মাথা ঢলে পড়ত (অর্থাৎ ঘুমিয়ে পড়তেন), এরপর তাঁরা সালাত আদায় করতেন এবং ওযূ করতেন না।"
তাঁরই (আবূ দাঊদের) আরেকটি বর্ণনায় সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "ইশার সালাতের জন্য ইক্বামত দেওয়া হলো। তখন এক ব্যক্তি বলল: আমার একটি প্রয়োজন আছে। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার সাথে গোপনে কথা বলার জন্য দাঁড়ালেন, এমনকি লোকেরা—অথবা কিছু লোক—ঘুমিয়ে পড়ল, এরপর তাঁরা সালাত আদায় করলেন।"
আর বুখারীর বর্ণনায় আছে: "ইক্বামত দেওয়ার পর তিনি [রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)] লোকটিকে থামিয়ে রাখলেন [বা তার সাথে কথা বলতে থাকলেন]।"
খাত্তাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এই হাদীস থেকে যে ফিকহী মাসআলা পাওয়া যায় তা হলো, ঘুম স্বয়ং ওযূ ভঙ্গের কারণ নয়। যদি ঘুম ওযূ ভঙ্গের কারণ হতো, তবে তা সামান্য বা বেশি, ইচ্ছাকৃত বা ভুলবশত—যেভাবেই হোক না কেন, অন্যান্য ওযূ ভঙ্গের কারণের মতোই পবিত্রতা নষ্ট করত। বরং ঘুম হলো ওযূ ভঙ্গের স্থান বা ক্ষেত্র, কারণ ঘুমন্ত ব্যক্তির কাছ থেকে অধিকাংশ সময় (ওযূ ভঙ্গ হওয়ার) সন্দেহ জাগায়।
1619 - عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم شُغل عنها (أي صلاة العشاء) ليلة، فأخّرها حتَّى رقدنا في المسجد، ثم استيقظنا، ثم رقدنا، ثم استيقظنا، ثم خرج علينا النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال:"ليس أحد من أهل الأرض ينتظر الصلاة غيركم".
متفق عليه: رواه البخاري في مواقيت الصلاة (570) ومسلم في المساجد (639) كلاهما من حديث عبد الرزاق قال: أخبرني ابن جريج، قال: أخبرني نافع، قال: حدّثنا عبد الله بن عمر فذكر الحديث.
وسيأتي الحديث بكامله في كتاب الصلاة.
قوله:"حتَّى رقدنا" ليس معناه مستلقيًا، كما هو المتبادر، بل معناه: رقدنا قاعدين، أي: نِمنا ونحن جلوسٌ. ونوم الجلوسِ لا ينقض الوضوء كما هو الظاهر من هذا الحديث.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই (ইশার) সালাত সম্পর্কে ব্যস্ত হয়ে পড়লেন, ফলে তিনি তা বিলম্বিত করলেন, এমনকি আমরা মসজিদে ঘুমিয়ে পড়লাম, এরপর জেগে উঠলাম, আবার ঘুমিয়ে পড়লাম, তারপর আবার জেগে উঠলাম। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের কাছে বেরিয়ে এলেন এবং বললেন: "তোমরা ছাড়া পৃথিবীর আর কেউই এই সালাতের জন্য অপেক্ষা করছে না।"
1620 - عن عائشة قالت: أَعْتَم رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعشاء حتَّى ناداه عمرُ: الصلاةَ؛ نام النساء والصبيانُ. فخرج فقال:"ما ينتظرها من أهل الأرض غيركم". قال: لا يُصلَّي يومئذ إلَّا بالمدينة.
متفق عليه: رواه البخاري في المواقيت (569) ومسلم في المساجد (638) كلاهما من طريق ابن شهاب، عن عروة، عن عائشة قالت، فذكرت الحديث. ومن وجه آخر عند مسلم: حتَّى نام أهل المسجد.
قال النووي رحمه الله تعالى:"هذا محمول على نوم لا ينقض الوضوء، وهو نوم الجالس ممكنّا مقعده، وفيه دليل على أن نوم مثل هذا لا ينتقض، وبه قال الأكثرون، وهو الصحيح من مذهبنا".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইশার সালাত এত বিলম্বিত করলেন যে, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে ডেকে বললেন: সালাত! নারী ও শিশুরা ঘুমিয়ে পড়েছে। তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বেরিয়ে এলেন এবং বললেন: “তোমাদের ছাড়া পৃথিবীর অন্য কোনো অধিবাসী এই (সালাতের) জন্য অপেক্ষা করছে না।” (বর্ণনাকারী) বলেন, সেদিন মদীনা ছাড়া আর কোথাও সালাত আদায় করা হচ্ছিল না।
1621 - عن عبد الله بن عباس قال: بِتُّ عند خالتي ميمونة ليلة، فقام النبي صلى الله عليه وسلم من الليل، فلما كان في بعض الليل قام النبي صلى الله عليه وسلم فتوضأ من شنٍّ معلَّق وضوءًا خفيفا - يخفِّفه عمرو ويقلِّله - وقام يصلي فتوضأتُ نحوا مما توضأ، ثم جئتُ فقمت عن يساره - وربما قال سفيان: عن شماله - فحوَّلني فجعلني عن يمينه، ثم صلَّي ما شاء الله، ثم اضطجع فنام حتَّى نَفَخَ، ثم أتاه المنادي فآذنه بالصلاة، فقام معه إلى الصلاة، فصلَّى ولم يتوضّأ.
قلنا لعمرو: إن ناسًا يقولون: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم تنامُ عينُه ولا ينام قلبه؟ قال عمرو: سمعت عبيد بن عمير يقول: رؤيا الأنبياء وحي، ثم قرأ: {إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ} [الصافات: 102]
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (138) واللفظ له، من حديث عمرو بن دينار، قال أخبرني كُريب، عن ابن عباس، فذكره. وفي مسلم، صلاة المسافرين (763): صلَّى من الليل ثلاث عشرة ركعة، ثم اضطجع فنام حتَّى نفخ، وكان إذا نام نفخ، فأتاه بلال فآذنه بالصلاة، فقام فصلى ولم يتوضأ. من حديث سلمة بن كُهَيل، عن كريب، عن ابن عباس، فذكر الحديث، وفيه ذكر للدعاء. ومن هذا الوجه اخرجه أيضًا البخاري في كتاب الدعاء (6316)، وسيأتي في كتاب الدعاء.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে আমার খালা মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রাতে (সালাতের জন্য) উঠলেন। যখন রাতের কিছু অংশ পার হলো, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠলেন এবং একটি ঝুলন্ত মশক থেকে হালকাভাবে ওযু করলেন— (বর্ণনাকারী) আমর (এই হালকা হওয়াকে) খুব সংক্ষিপ্ত হওয়া বা অল্প হওয়া বলে ব্যাখ্যা করেছেন— তারপর তিনি সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। আমিও তিনি যেরূপ ওযু করলেন, সেরূপ ওযু করলাম। তারপর আমি এসে তাঁর বাম পাশে দাঁড়ালাম— (সুফিয়ান কখনও কখনও) ‘তাঁর বাম দিক’ বলেছেন— তখন তিনি আমাকে ঘুরিয়ে এনে তাঁর ডান পাশে দাঁড় করালেন। এরপর আল্লাহ যতদিন চাইলেন, তিনি সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি শুয়ে পড়লেন এবং এমনভাবে ঘুমালেন যে তাঁর নাক ডাকার শব্দ শোনা গেল। তারপর একজন আহ্বানকারী এসে তাঁকে সালাতের জন্য অবহিত করলেন। তিনি তার সাথে সালাতের জন্য গেলেন এবং ওযু না করেই সালাত আদায় করলেন।
আমরা আমরকে (ইবনু দীনার) বললাম: লোকেরা তো বলে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের চোখ ঘুমায় কিন্তু তাঁর অন্তর ঘুমায় না? আমর বললেন: আমি উবাইদ ইবনে উমায়রকে বলতে শুনেছি: নবীদের স্বপ্ন হলো ওহী। অতঃপর তিনি পাঠ করলেন: {إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ} অর্থাৎ 'নিশ্চয় আমি স্বপ্নে দেখি যে, আমি তোমাকে যবেহ করছি।' [সূরা সাফফাত: ১০২]
1622 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينام حتَّى ينفُخ، ثم يقوم فيُصلِّي ولا يتوضأ. قال الطنافسي: قال وكيع: تعني وهو ساجد.
صحيح: رواه ابن ماجه (474) قال: حدَّثنا أبو بكر بن أبي شيبة وعلي بن محمد قالا: ثنا وكيع، ثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، فذكر الحديث. والحديث في مصنف ابن أبي شيبة (1/ 132). وإسناده صحيح.
وإبراهيم هو ابن يزيد النخعي الفقيه. وعلي بن محمد هو ابن إسحاق الطَّنافسي - بفتح المهملة وتخفيف النون وبعد الألف فاء مكسورة - ثقة عابد.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এত গভীর ঘুমে ঘুমাতেন যে তিনি নাসিকা গর্জন করতেন (জোরে নিশ্বাস নিতেন)। অতঃপর তিনি উঠে সালাত আদায় করতেন এবং নতুন করে উযু করতেন না। আত-ত্বানাফিসী বলেছেন, ওয়াকী' বলেছেন: এর দ্বারা (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বুঝিয়েছেন যে তা সিজদারত অবস্থায় ঘটত।
1623 - عن عبد الله بن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينام مستلقيا حتَّى ينفُخ، ثم يقوم فيصلي ولا يتوضأ.
صحيح: رواه أبو يعلى (3570) والبزار (في زوائده 2437) كلاهما من طريق منصور بن أبي الأسود، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله، فذكره.
قال البزار: لم يتابع منصور على هذا الإسناد، على أنه كوفي لا بأس به.
قلت: ولا يضرّ تفرده؛ فإنه ثقة، وثقه ابن معين وغيره.
وأما ما رواه ابن ماجه (475) من وجه آخر عن الحجاج، عن فُضيل بن عمرو، عن إبراهيم به
مثله؛ فإنَّ فيه الحجاج، وهو ابن أرطأة صدوق كثير الخطأ والتدليس، وقد عنعن.
وقد يكون هذا خاصًّا بالنبي صلى الله عليه وسلم؛ لما جاء في حديث عائشة: تنام عينه ولا ينام قلبه؛ لأنه جاء في بعض الآثار: أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يكن كغيره.
وأما حديث:"وِكاءُ السَّهِ العينان؛ فمن نام فليتوضأ" فهو حديث ضعيف لا يثبت كما قال ابن العربي.
قلت: رواه أبو داود (203) وابن ماجه (477)، وأحمد (887) كلهم من طريق بقية، عن الوضين بن عطاء، عن محفوظ بن علقمة، عن عبد الرحمن بن عائذ، عن علي بن أبي طالب مرفوعًا. وفيه من العللِ:
الأُولى: بقية بن الوليد الحمصي، وهو مُدلِّس، ويُدلس التسوية، ولكن جاء التصريح بالتحديث عند الإمام أحمد (1/ 111) عن شيخه، والجمهور على أنه يكفي هذا.
والثانية: الوضين بن عطاء مختلف فيه، فوثقه أحمد وابن معين، وضعّفه ابن سعد والجوزجاني؛ وقال الحافظ في التقريب:"سئ الحفظ".
والثالثة: عبد الرحمن بن عائذ، وحديثه عن علي بن أبي طالب مرسل، كما قال أبو زرعة. وسأل ابن أبي حاتم أباه عن هذا الحديث، وعن حديث أبي بكر بن أبي مريم، عن عطية بن قيس، عن معاوية، عن النبي:"العين وِكاءُ السَّهِ"، فقال: ليسا بقويين. العلل (1/ 47).
قلت: حديث معاوية رواه أحمد (16879)، وأبو يعلي (7372)، والطبرانيّ في الكبير (875) كلّهم من طريق أبي بكر بن أبي مريم، به.
وأبو بكر بن أبي مريم ضعيف، سُرق بيته فاختلط.
ولكن حسّنه النّووي في"المجموع" (2/ 20)، وابن الصّلاح كما في البدر المنير (2/ 432) فلعله لمجموع شواهده.
والسَّه: حلقة الدبر أو العجز. الوِكاء: الخيط الذي تُشد به القِربة، والكيس وغيرهما.
وكذلك حديث:"إنما الوضوء على من نام مُضطَجِعًا" منكرٌ.
رواه أبو داود (202)، والترمذي (77)، وأحمد (2315) كلهم من طريق أبي خالد الدالاني، عن قتادة، عن أبي العالية، عن ابن عباس فذكره في حديث طويل.
وإسناده ضعيف من أجل الدالاني. قال أبو داود:"روى له جماعة أي عن قتادة - عن ابن عباس، ولم يذكروا شيئًا من هذا"، يعني تفرد بهذه الزيادة الدالاني، وقد أنكر الإمام أحمد على الدالاني قائلًا: ما ليزيد الدالاني يدخل على أصحاب قتادة.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চিৎ হয়ে ঘুমাতেন এমনকি তিনি নাক ডাকতেন, অতঃপর তিনি উঠে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতেন এবং (নতুন করে) ওযু করতেন না।
1624 - عن أسماء بنت أبي بكر أنها قالت: أتيتُ عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين خسفت
الشمس، فإذا الناس قيام يُصلون، وإذا هي قائمة تصلي، فقلت: ما للناس؟ فأشارت بيدها نحو السماء، وقالت: سبحان الله! فقلت: آية، فأشارت أي نعم، فقمتُ حتَّى تجلاني الغَشي، وجعلت أصُبّ فوق رأسي ماءً، فلما انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم حمد الله وأثنى عليه، ثم قال:"ما من شيء كنتُ لم أرَه إلَّا قد رأيتُه في مقامي هذا، حتى الجنة والنار، ولقد أُوحي إلي أنكم تُفتنون في القبور مثلَ أو قريبًا من فتنة الدَّجال - لا أدري أي ذلك قالت أسماء - يُؤتَي أحدكم فيقال: ما علمُك بهذا الرجل؟ فأما المُؤمِن أو المُوقِن - لا أدري أي ذلك قالت أسماء - فيقول: هو محمد رسول الله، جاءنا بالبينات والهدى، فأجَبْنا وآمنّا واتَّبعْنا، فيقال له: نَمْ صالحًا، فقد علمنا إن كنت لمؤمنًا، وأما المنافقُ أو المرتابُ - لا أدري أي ذلك قالت أسماء - فيقول: لا أدري، سمعتُ الناس يقولون شيئًا فقلته".
متفق عليه: رواه مالك في الكسوف (4) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر (وهي امرأته)، عن أسماء بنت أبي بكر (وهي جدتها) فذكرت الحديث، ومن طريقه البخاري (184).
وأما مسلم فرواه من طريقٍ آخر عن هشامٍ به مثله، في صلاة الكسوف (905). وسيعاد الحديث في صلاة الكسوف. وقد بوّب البخاري بقوله:"من لم يتوضأ إلَّا من الغَشْي المُثْقِل".
والغشي دون الإغماء، والإغماء ينقض الوضوء بالإجماع. وكونها كانت تتولى صبّ الماء على نفسها يدل على أن حواسها كانت مدركة.
ومحل استدلال البخاري في عدم نقض الوضوء من الغَشْي من جهة أنها كانت تُصلي خلف النبي صلى الله عليه وسلم، وكان النبي صلى الله عليه وسلم يري خلفه وهو في الصلاة، ولم يُنقل أنه أنكر عليها. كذا في الفتح.
আসমা বিন্তে আবি বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন সূর্যগ্রহণ হয়েছিল, তখন আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এলাম। তখন দেখলাম, লোকেরা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছে, আর তিনিও দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছেন। আমি বললাম: লোকদের কী হয়েছে? তিনি তাঁর হাত আকাশের দিকে ইশারা করলেন এবং বললেন: সুবহানাল্লাহ! আমি বললাম: (এটা কি) কোনো নিদর্শন? তিনি ইশারায় বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর আমি (সালাতে) দাঁড়ালাম, এমনকি আমার উপর দুর্বলতা বা মূর্ছা চেপে বসল এবং আমি আমার মাথার উপর পানি ঢালতে লাগলাম।
যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: ‘যা কিছু আমি (এর আগে) দেখিনি, তার সবকিছুই আমি আমার এই স্থানে দাঁড়িয়ে দেখেছি, এমনকি জান্নাত ও জাহান্নামও। আর আমার কাছে ওহী করা হয়েছে যে, তোমাদেরকে কবরে দাজ্জালের ফিতনার মতো বা কাছাকাছি ফিতনার সম্মুখীন করা হবে। (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এ দুটোর মধ্যে কোনটি তিনি বলেছিলেন, তা আমার জানা নেই।) তোমাদের কারো নিকট এসে বলা হবে: এই ব্যক্তি (মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) সম্পর্কে তুমি কী জানতে? অতঃপর মু’মিন বা দৃঢ় বিশ্বাসী ব্যক্তি— (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এ দুটোর মধ্যে কোনটি তিনি বলেছিলেন, তা আমার জানা নেই)— সে বলবে: তিনি হলেন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আল্লাহর রাসূল। তিনি আমাদের নিকট সুস্পষ্ট প্রমাণাদি ও হিদায়াত নিয়ে এসেছিলেন। আমরা তাঁর ডাকে সাড়া দিয়েছিলাম, ঈমান এনেছিলাম এবং তাঁকে অনুসরণ করেছিলাম। তখন তাকে বলা হবে: তুমি শান্তিতে ঘুমাও। আমরা নিশ্চিত জানতাম যে, তুমি অবশ্যই মু’মিন ছিলে। আর মুনাফিক বা সন্দেহ পোষণকারী ব্যক্তি— (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এ দুটোর মধ্যে কোনটি তিনি বলেছিলেন, তা আমার জানা নেই)— সে বলবে: আমি জানি না, আমি লোকদেরকে কিছু বলতে শুনেছিলাম, তাই আমিও তা বলেছিলাম।’
1625 - عن عروة بن الزبير يقول: دخلتُ على مروان بن الحكم، فتَذاكرنا ما يكون منه الوضوءُ، فقال مروان: ومِنْ مسِّ الذكرِ الوضوءُ، فقال عروة: ما علمتُ هذا، فقال مروانُ بن الحكم: أخْبَرتْني بُسْرةُ بنتُ صفوان أنها سمِعتْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا مسّ أحدُكم ذكرَه فليتوضَّأ".
صحيح: رواه مالك في الطهارة (58) عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، أنه سمع عُروة، فذكر الحديث. ومن طريق مالك رواه أبو داود (181) والنسائي (163). وفي رواية عند النسائي (1/ 101) قال عروة: فلم أزل أُماري مروان حتَّى دعا رجلًا من حرسه، فأرسله إلى بُسْرَة يسألها عما حدّثتْ من ذلك، فأرسلتْ بسرةُ بمثل الذي حدَّثني عنها مروان.
وقد صحّ سماعُ عروة من بسرة في حديث الترمذي (1/ 126) وابن ماجه (1/ 161)؛ فإنهما رويا من وجه آخر عن هشام بن عروة، قال: أخبرني أبي، عن بُسرة بنت صفوان، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من مَسَّ ذكره فليتوضأ"، وفي رواية الترمذي:"فلا يُصَلِّ حتَّى يتوضأ". فكأنّ عروة رواه من وجهين: عن مروان عن بسرة، ثم عن بسرة نفسها، ومن الخطأ أن يجعل هذا الخلاف سببًا لضعف الحديث. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 43).
উরওয়াহ ইবনুয-যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মারওয়ান ইবনুল হাকামের নিকট প্রবেশ করলাম। অতঃপর আমরা কিসের দ্বারা ওযু ভঙ্গ হয়, সেই বিষয়ে আলোচনা করছিলাম। মারওয়ান বললেন: লজ্জাস্থান স্পর্শ করলেও ওযু ভঙ্গ হয়। উরওয়াহ বললেন: আমি এ বিষয়ে অবগত নই। তখন মারওয়ান ইবনুল হাকাম বললেন: বুন্রাহ বিন্ত সাফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার লজ্জাস্থান স্পর্শ করে, তখন সে যেন ওযু করে।"
1626 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أفضى أحدكم بيده إلى فرجه، وليس بينهما ستر ولا حجاب فليتوضّأ".
حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (1871) و"الصغير" (110) وابن حبّان (1118) كلُّهم من طريق أحمد بن سعيد الهمداني، قال: حدّثنا أصبغ بن الفرج، قال: حدَّثنا عبد الرحمن بن القاسم، عن نافع بن أبي نعيم القاري، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل نافع بن أبي نعيم القاري؛ فإنّه صدوق.
وهذا الحديث مشهور من رواية يزيد بن عبد الملك النوفلي، وهو ضعيف، ومن طريقه رواه الإمام أحمد (84. 4) والبزّار - كشف الأستار (286) - والبيهقي (1/ 133) وابن حبَّان (1118) وقرنه بنافع بن أبي نعيم.
قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 126):"قال ابن عبد البر: كان هذا الحديث لا يُعرف إلَّا من رواية يزيد (بن عبد الملك) حتَّى رواه أصبغ، عن ابن القاسم، عن نافع بن أبي نعيم ويزيد جميعًا عن المقبري، فصحَّ الحديث".
وقال ابن السكن: هو أجود ما رُوِي في هذا الباب. وأخرجه الحاكم (1/ 138) من طريق نافع وصحّحه.
ونقل الحافظ في نافع بن أبي نعيم كلامًا من الأَئمّة والخلاصة: أنّه حسن الحديث.
وللحديث أسانيد أُخرى كلّها ضعيفة.
وفي الباب أحاديث، منها: حديث جابر بن عبد الله وأم حبيبة وأبي أيوب، وكلها ضعيفة. انظر: سنن ابن ماجه (1/ 162).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার হাত দ্বারা তার লজ্জাস্থান স্পর্শ করে, এবং তাদের মাঝে কোনো পর্দা বা আবরণ না থাকে, তবে সে যেন ওযু করে নেয়।"
1627 - عن قيس بن طلق، عن أبيه، قال: قدمنا على نبي الله، فجاء رجل كأنه بدوي فقال: يا نبي الله! ما ترى في مسّ الرجل ذكره بعدما يتوضأ؟ فقال:"وهل هو إلَّا مُضْغة منه؟ !"، أو قال:"بَضعة منه".
حسن: رواه أبو داود (183) والترمذي (85) واللفظ لهما، ورواه أيضًا النسائي (165) ولفظه:"حتَّى قدمنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبايعناه وصلينا معه، فلما قضى الصلاة جاء رجل كأنه
بدوي فقال: يا رسول الله! ما ترى في رجل مسّ ذكره في الصلاة؟ قال:"وهل هو إلَّا مُضغة منك؟ ، أو بَضْعة منك". كلهم رووه من حديث ملازم بن عمرو الحنفي، حدَّثنا عبد الله بن بدر، عن قيس بن طلق به.
إسناده حسن، ورجاله ثقات غير قيس بن طلق؛ فقد روى الزعفراني عن الشافعي قال: سألنا عن قيس فلم نجد من يعرفه بما يكون لنا قبول خبره. ذكره البيهقي في سننه (1/ 135). ولكن عرفه غيره؛ فوثّقه ابن معين والعجلي وابن حبان. وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق".
وللحديث إسناد آخر رواه ابن ماجه (483): حدَّثنا علي بن محمد، ثنا وكيع، ثنا محمد بن جابر قال: سمعت قيس بن طَلْق الحنفي، عن أبيه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم سُئل عن مسّ الذكر فقال:"ليس فيه وضوءٌ، وإنما هو منك".
قال الترمذي بعد أن روى الحديث من طريق ملازم بن عمرو:"وهذا الحديث أحسن شيء رُوِي في هذا الباب، وقد روي هذا الحديث أيوب بن عُتبة ومحمد بن جابر عن قيس بن طلق عن أبيه. وقد تكلم بعض أهل الحديث في محمد بن جابر وأيوب بن عُتبة. وحديث ملازم بن عمرو عن عبد الله بن بدر أصحّ وأحسن" انتهى.
قوله (مُضغة) بضم الميم: هو قدر اللقمة من اللحم.
و(بَضعة) بفتح الباء: هو قطعة من اللحم أكبر من المُضغة.
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 43 - 53) فإني تكلمت في الموضوع بكلام مفصل ولله الحمد، فراجعه إن شئت.
তলক ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা আল্লাহর নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে উপস্থিত হলাম। তখন একজন লোক আসলেন, যিনি দেখতে বেদুইনের মতো ছিলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর নবী! অযু করার পর কোনো ব্যক্তির তার লজ্জাস্থান স্পর্শ করা সম্পর্কে আপনি কী মনে করেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'এটা তো তার দেহেরই একটি অংশমাত্র!' অথবা তিনি বললেন: 'তার দেহেরই একটি টুকরা মাত্র।'
