আল-জামি` আল-কামিল
1628 - عن سعيد بن المُسَيِّب وعَبّاد بن تميم، عن عمه أنه شكا إلى النبي صلى الله عليه وسلم: الرجلُ يُخيَّل إليه أنَّه يجد الشيءَ في الصلاة، قال:"لا ينصرفُ حتَّى يسمع صوتًا أو يجد ريحًا".
متفق عليه: رواه البخاري (137) ومسلم في الحيض (361) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن سعيد وعبّاد، فذكر مثله.
وعمه هو: عبد الله بن زيد. كذا قال مسلم في روايته عن أبي بكر بن أبي شيبة وزهير بن حرب في روايتهما عن سفيان.
قلت: عبد الله بن زيد هو ابن عاصم المازني الأنصاري الصحابي المشهور الذي روي صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم كما سبق، وهو ليس بصاحب الأذان. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 75).
قال الحافظ: اختلف هل هو عم عباد لأبيه أو أمه.
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সেই ব্যক্তি সম্পর্কে অভিযোগ করলেন, যার সালাতের মধ্যে ধারণা হয় যে তার কিছু নির্গত হয়েছে। তিনি (নবী) বললেন, "সে যেন ফিরে না যায়, যতক্ষণ না সে শব্দ শুনতে পায় অথবা দুর্গন্ধ অনুভব করে।"
1629 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا وجد أحدكم في بطنه شيئًا
فأشكل عليه، أَخَرَج منه شيءٌ أم لا؛ فلا يخرجنَّ من المسجد حتَّى يسمع صوتًا أو يجد ريحًا".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (362) عن زهير بن حرب، عن جرير، عن سُهَيْل، عن أبيه، عن أبي هريرة.
ورواه الترمذي (74)، وابن ماجه (515) من طريق شعبة، عن سهيل، به واختصره بقوله:"لا وضوء إلَّا من صوت أو ريح". ومن هذا الوجه رواه ابن خزيمة (27).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কারো পেটে কোনো কিছু অনুভূত হয় এবং তার কাছে সন্দেহ জাগে যে, কিছু বের হয়েছে কিনা; সে যেন মসজিদ থেকে বের না হয় যতক্ষণ না সে কোনো শব্দ শোনে অথবা গন্ধ পায়।"
1630 - عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يأتي أحدكم الشيطان في صلاته حتَّى ينفخ في مقعدته، فيُخيل إليه أنه قد أحدث ولم يُحدِث، فإذا وجد ذلك أحدكم فلا ينصرفَنَّ حتَّى يسمع صوته بأُذنه، أو يجد ريحًا بأنفه".
حسن: رواه البزار - كشف الأستار (1/ 147 رقم 281): حدَّثنا محمد بن عمر، ثنا إسماعيل بن صبيح، ثنا أبو أويس، عن ثور بن يزيد، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
قال البزار: لا نعلمه بهذا اللفظ إلَّا من طريق ابن عباس، ورُوىَ بمعناه من طريق غيره.
وقال الهيثمي في مجمع الزوائد (1/ 242): رواه الطبراني في الكبير والبزار بنحوه، ورجاله رجال الصحيح.
قلت: وهو كما قال، إلَّا أن إسماعيل بن صبيح صدوق كما قال الحافظ في التقريب. وأبو أويس هو: عبد الله بن عبد الله بن أويس بن مالك بن أبي عامر الأصبحي المدني، قريب مالك وصهره، من رجال مسلم، قال ابن معين: ليس بالقوي. وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يحتج به. وهو"صدوق يهم" كما قال الحافظ.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কারো সালাতের সময় শয়তান এসে তার কাছে আসে, এমনকি সে তার নিতম্বের স্থানে ফুঁ দেয়। ফলে তার মনে হয় যে তার বায়ু নির্গত হয়েছে, যদিও তা হয়নি। যখন তোমাদের কেউ এমন কিছু অনুভব করে, তখন সে যেন সালাত থেকে ফিরে না যায়, যতক্ষণ না সে তার কান দিয়ে (বায়ু নিঃসরণের) শব্দ শোনে অথবা তার নাক দিয়ে গন্ধ পায়।"
1631 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا يزال العبدُ في صلاة ما كان في المسجد ينتظر الصلاة ما لم يُحدِث".
فقال رجل أعجمي: ما الحدث يا أبا هريرة؟ قال: الصوت.
يعني الضرطة. وفي لفظ:"لا تقبل صلاة أحدكم إذا أحدث حتَّى يتوضأ".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (176)، من طريق سعيد المقبري، ومسلم في الطهارة (225)، من طريق همَّام بن منبِّه، كلاهما عن أبي هريرة .. فذكر الحديث. وسيأتي بقية الأحاديث في كتاب الصلاة، باب انتظار الصلاة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "বান্দা যতক্ষণ মসজিদে সালাতের (নামাযের) অপেক্ষায় থাকে, ততক্ষণ সে সালাতের মধ্যেই থাকে, যতক্ষণ না সে 'হাদাস' করে।" তখন একজন অনারব লোক জিজ্ঞেস করল: "হে আবূ হুরায়রা! 'হাদাস' কী?" তিনি (আবূ হুরায়রা) বললেন: "শব্দ।" অর্থাৎ বায়ু ত্যাগ (পাদ)। এবং অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমাদের কারো সালাত কবুল হয় না যখন সে 'হাদাস' করে, যতক্ষণ না সে ওযু করে।"
1632 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى الله عليه وسلم:"لا وضوء إلَّا من صوت أو ريح".
صحيح: رواه الترمذي (74) وابن ماجه (515) كلاهما من طريق شعبة، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة.
إسناده صحيح. قال الترمذي: حسن صحيح. ومن هذا الوجه صحّحه ابن خُزيمة (27).
ويرى البيهقي أن هذا الحديث مختصر من حديث سهيل بن أبي صالح - سبق في الباب الذي قبله - وأن شعبة من أصحاب سهيل اختصره."السنن الكبري" (1/ 117). ويرى ابن التركماني: أنهما حديثان مختلفان؛ لأجل هذا الاحتمال أعدتُ ذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শব্দ অথবা বাতকর্ম ব্যতীত ওযু (ভঙ্গ হওয়া) অপরিহার্য নয়।"
1633 - عن عائشة قالت: أتتْ سلمى مولاة رسول الله صلى الله عليه وسلم أو امرأة أبي رافع مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم تستأذنه على أبي رافع قد ضربها، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي رافع:"ما لك ولها يا أبا رافع؟". قال: تؤذيني يا رسول الله! ، فقال رسول الله: بِمَ آذيتِه با سَلمى؟". قالت: يا رسول الله! ما آذيتُه بشيء، ولكنه أحدث وهو يصلي، فقلت له: يا أبا رافع! إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أمر المسلمين إذا خرج من أحدهم الريح أن يتوضأ، فقام وضربني، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يضحك ويقول:"يا أبا رافع! إنها لم تأمرك إلَّا بخير".
حسن: رواه أحمد (26339) عن يعقوب - وهو ابن إبراهيم -، قال: حدثني أبي، عن محمد بن إسحاق قال: حدثني هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرت الحديث.
ومحمد بن إسحاق صدوق مُدلِّس وقد صرح بالسماع، فانتفت عنه تهمة التدليس.
ورواه أيضًا من هذا الطريق البزار - كشف الأستار (1/ 146 رقم 280) والطبراني في الكبير (24 رقم 765) بدون التصريح بالسماع من ابن إسحاق.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আযাদকৃত দাসী সালমা অথবা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আযাদকৃত দাস আবূ রাফি’র স্ত্রী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন। তিনি আবূ রাফি’র বিরুদ্ধে বিচার চাইতে অনুমতি চাইলেন, কারণ আবূ রাফি’ তাকে মেরেছিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ রাফি’কে জিজ্ঞেস করলেন: "হে আবূ রাফি’! তোমার এবং তার মধ্যে কী হয়েছে?" আবূ রাফি’ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! সে আমাকে কষ্ট দিয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে সালমা! তুমি কী দিয়ে তাকে কষ্ট দিয়েছো?" সালমা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি তাকে কোনো কিছু দিয়েই কষ্ট দেইনি। তবে সে সালাত আদায় করার সময় তার বায়ু নিঃসরণ হয়েছিল। তখন আমি তাকে বললাম: হে আবূ রাফি’! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুসলমানদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যে, তোমাদের কারো থেকে যদি বায়ু নির্গত হয়, তবে সে যেন নতুন করে উযূ (ওযু) করে নেয়। তখন সে উঠে আমাকে মারধর করলো। এই কথা শুনে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসতে লাগলেন এবং বললেন: "হে আবূ রাফি’! সে তো তোমাকে শুধু ভালোরই নির্দেশ দিয়েছে।"
1634 - عن أبي الدرداء قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قاء فأفطر، قال معدان بن أبي طلحة: فلقيت ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم في مسجد دمشق فقلت: إن أبا الدرداء حدثني أن النبي صلى الله عليه وسلم قاء فأفطر، قال: صدق، وأنا صببت له وَضوءه.
صحيح: رواه أبو داود (2381) واللفظ له، والترمذي (87) كلاهما عن عبد الوارث، عن حسين بن ذكوان المعلم، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني عبد الرحمن بن عمرو الأوزاعي، عن يعيش بن الوليد بن هشام، أن أباه حدثه، حدثني معدان بن أبي طلحة، أن أبا الدرداء حدثه، فذكر الحديث. وإسناده صحيح.
ولفظ الترمذي:"قاء فتوضّأ، وذكر الشيخ أحمد شاكر أنّ في بعض نسخ التّرمذيّ:"قاء فأفطر فتوضّأ".
ورواه الإمام أحمد (27502) وصحّحه ابن خزيمة (1957) كلاهما من طريق حسين (هو ابن
ذكوان المعلم) بإسناده، بلفظ:"قاء فأفطر".
فمن فهم من قول ثوبان:"قاء فأفطر فصببت له وَضُوءَه" قال: قاء فأفطر فتوضّأ.
وأما قوله (قاء فأفطر) فيحتاج إلى تأويل بأنه استقاء؛ لأن القيء لا يُفطر الصائم.
قال الترمذي: وقال إسحاق بن منصور: معدان بن طلحة. ثم قال: وابن أبي طلحة أصحّ. وقال: جوّد حسين المعلم هذا الحديث، وحديث حسين أصح شيء في هذا الباب. وروى معمر هذا الحديث عن يحيى بن أبي كثير فأخطأ فيه فقال: عن يعيش بن الوليد، عن خالد بن معدان، عن أبي الدرداء، ولم يذكر فيه الأوزاعي. وقال: عن خالد بن معدان، وإنما هو معدان بن أبي طلحة. انتهى.
قلت: رواية معمر هذه رواها الإمام أحمد (27537) عن عبد الرزاق، ثنا معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن يعيش بن الوليد، عن خالد بن معدان، عن أبي الدرداء قال: استقاء رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأفطر، فأتي بماء فتوضأ.
يقول الشيخ أحمد شاكر في تعليقه على الترمذي:"ولسنا نوافق الترمذي في ادعائه الخطأ على معمر، وإنما هو عندنا بإسناد آخر للحديث، وخالد بن معدان تابعي ثقة معروف، مات في أول القرن الثاني، روى عن كثير من الصحابة منهم معاوية، واختلف في سماعه من أبي الدرداء. ويعيش بن الوليد تابعي ثقة أيضًا وقد روي عن معاوية، ومعاوية مات سنة 59 أو 60 هـ ويعيش بن الوليد وخالد بن معدان كلاهما من أهل الشام؛ فلا يبعد أن يروي أحدهما عن الآخر. ومعمر حافظ ثقة متقن؛ فلا يحكم عليه بالخطأ جُزافًا" انتهى.
فإذا صحّ هذا الحديث فلا يحتاج إلى تأويل.
وأما نقض الوضوء من القيء والرُّعاف فقال الترمذي: قال به بعض أهل العلم منهم: سفيان الثوري وابن المبارك وأحمد وإسحاق. وقال مالك والشافعي: ليس في القيء والرُّعاف وضوء. انتهى.
أورده الزيلعي في"نصب الراية" (1/ 37) من جهة الدارقطني وأقر ما قاله الدارقطني. قلت: وفيه بقية وهو مُدلِّس وقد عنعن.
وكذلك ما رُويَ عن جابر قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يعني في غزوة ذات الرِّقاع - فأصاب رجل امرأة رجل من المشركين، فحلف أن لا أنتهي حتَّى أهريق دمًا في أصحاب محمد، فخرج يتبع أثر النبي صلى الله عليه وسلم فنزل النبي صلى الله عليه وسلم منزلًا، فقال:"من رجل يكلؤنا؟" فانتدب رجل من المهاجرين ورجل من الأنصار، فقال:"كونا بفم الشِّعب". قال: فلما خرج الرجلان إلى فم الشعب اضطجع المهاجري، وقام الأنصاري يُصلِّي، وأتى الرجل، فلما رأى شخصه وعرف أنه رَبيئَةٌ للقوم، فرماه بسهم فوضعه فيه، فزعه حتَّى رماه بثلاثة أسهم، ثم ركع وسجد، ثم انتبه صاحبُه، فلما عرف أنهم قد نَذِروا به هرب، ولما رأى المهاجري ما بالأنصاري من الدم قال: سبحان الله! ألا أنبهتني أوَّل ما رمى؟ قال: كنت في سورة أقرأها؛ فلم أحبّ أن أقطعها.
فهو أيضًا ضعيف: أخرجه أبو داود (198) قال: حدَّثنا أبو توبة الربيع بن نافع، حدَّثنا ابن المبارك، عن محمد بن إسحاق، حدثني صدقة بن يسار، عن عقيل بن جابر، عن جابر، فذكر الحديث.
وإسناده ضعيف؛ فإنَّ عقيل بن جابر بن عبد الله الأنصاري لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في الثقات. وقال الذهبي في الميزان: فيه جهالة؛ ما روى عنه سوى صدقة بن يسار. وفي التهذيب: وقد روى جابر البياضي عن ثلاثة من ولد جابر، عن جابر، فيحصل لنا راو آخر وإن كان ضعيفًا عن عقيل مع صدقة، لأن جابرًا له ثلاثة أولاد رووا الحديث. هذا، وعبد الرحمن، ومحمد. انتهى
وبهذا يرفع عنه جهالة العين ويبقى فيه جهالة الحال.
ونقل الحافظ تصحيح ابن خزيمة وابن حبان والحاكم له.
قلت: وهو في صحيح ابن خزيمة (1/ 24 رقم 36)، وبه بوَّب"أن خروج الدم من غير مخرج الحدث لا يوجب الوضوء"، وابن حبان (1096) والحاكم (1/ 156 - 157) وأحمد (14704 و 14865) كلهم من طريق محمد بن إسحاق به، وهو في تهذيب ابن هشام (3/ 218 - 219) ومداره على عقيل بن جابر، وهو مجهول الحال كما سبق. إلَّا أن الحاكم صحّحه.
وقد ذكره أيضًا البخاري تعليقا في صحيحه (1/ 280) ولكن بصيغة التمريض قائلًا:"يذكر عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في غزوة ذات الرقاع …". فالظاهر أنه لم يصحّ عنده، ولكن ذكر البخاري عددا من الآثار، منها قول الحسن: ما زال المسلمون يُصلون في جراحاتهم. وقال طاوس ومحمد بن علي وعطاء وأهل الحجاز: ليس في الدم وضوء. وبوَّب بقوله:"من لم ير الوضوء إلَّا من المَخْرجَين من القُبُل والدُّبُر".
قلت: لما رأيت تبويب البخاري وذكره عددًا من الآثار - وكذا ما فعله البيهقي رحمه الله في
"السنن الكبري" (1/ 140)؛ فإنه أورد حديث عقيل بن جابر من طريق أبي داود ولم يتكلم عليه بشيء، وذكر عددًا من الآثار، وحكم على حديث أبي الدرداء السابق في الباب الذي قبله بالاضطراب - أحببت ذكر حديث جابر لأنه من أقوى أدلة من لم ير نقضَ الوضوء من خروج الدم من غير السبيلين، وهم مالك والشافعي وجماعة من الصحابة والتابعين.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة بلفظ:"من أصابه قيءٌ أو رُعاف أو قلس أو مذي فلينصرف، فليتوضّأ …" الحديث.
رواه ابن ماجه (1221) من حديث إسماعيل بن عياش، عن ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، عن عائشة.
وإسماعيل بن عياش ضعيف في روايته عن غير أهل بلده الشاميين، وشيخه هنا ابن جريج حجازي.
ومع ذلك فقد خالف أصحاب ابن جريج فروره مرسلًا، ولم يذكروا ابن أبي مليكة، وهو الصّواب كما قاله الدارقطني في العلل (3707).
وكذلك أعلّه أبو حاتم الرّازيّ في العلل (57) بالإرسال من وجه آخر.
قال الخطابي:"وقال أكثر الفقهاء: سيلان الدم من غير السبيلين ينقض الوضوء. وهذا أحوط المذهبين وبه أقول، وقول الشافعي قوي في القياس، ومذاهبهم أقوى في الاتباع" انتهى.
قال عبد الله بن أحمد: سألتُ أبي عن كلّ ما خرج من السّبيلين؟ قال: فيه الوضوء. وإن كان من الجسد؟ قال: إذا فحش توضأ، وقال: الفاحش لا أُحِدُّه فإذا فحش عنده توضّأ.
قال عبد الله: سمعت أبي يقول في الدّم: إذا فحش أعاد الوضوء، وإذا لم يستفحِشْه لا بأس به". مسائل الإمام أحمد برواية ابنه عبد الله (1/ 76).
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 14 - 66).
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বমি করলেন এবং রোযা ভেঙ্গে ফেললেন। মা’দান ইবন আবী তালহা বলেন: এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আযাদকৃত গোলাম সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দামেস্কের মসজিদে সাক্ষাৎ করলাম। আমি বললাম, আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বলেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বমি করেছেন এবং রোযা ভেঙ্গে ফেলেছেন। সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে সত্য বলেছে, আর আমিই তাঁর জন্য অযুর পানি ঢেলে দিয়েছিলাম।
1635 - عن علي بن أبي طالب قال: كنت رجلًا مذّاءً، وكنت أستحيي أن أسأل النبي صلى الله عليه وسلم لمكان ابنته، فأمر المقداد بن الأسود فسأله فقال:"يغسل ذكره، ويتوضأ".
متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في الوضوء (178) ومسلم في الحيض (303) كلاهما من طريق الأعمش، عن منذر بن يعلى (أبي يعلي)، عن محمد بن الحنفية، عن علي، فذكره. واللفظ لمسلم، وفي لفظ عند البخاري (269) من وجه آخر:"توضّأ، واغْسلْ ذَكرَك" قوله:"واغْسل ذكرَك" هذا مما لا خلاف فيه.
وفي مسلم عن سليمان بن يسار، عن ابن عباس قال: قال علي بن أبي طالب أرسلنا المقداد بن الأسود إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وفيه:"تَوَضّأ، وانْضَحْ فَرْجَكَ".
قوله:"وانضحْ فرْجك" أي الثوب الذي أصابه المذي يكفيه فيه رَشُّ الماء قليلا، وبه قال أحمد، وقال الشافعي:"لا يجزئ إلا الغَسْل" انظر للمزيد: المنة الكبرى (1/ 30 - 32).
وأما ما رواه مالك في الطهارة (53) عن أبي النضر مولى عمر بن عبيد الله، عن سليمان بن يسار، عن المقداد بن الأسود أن علي بن أبي طالب أمره أن يسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال فيه:"إذا وجد أحدكم فلينضح فرْجَه بالماء، وليتوضأ وضوءَه للصلاة" فهو منقطع، لأن سليمان بن يسار لم يسمع من المقداد ولا من علي، وبين سليمان بن يسار وعلي - ابن عباس كما في إسناد مسلم.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ছিলাম এমন একজন লোক, যার অধিক পরিমাণে 'মাযী' (প্রাক-বীর্য) নির্গত হতো। কিন্তু আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা (আমার স্ত্রী)-এর কারণে তাঁকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করতে লজ্জা পাচ্ছিলাম। তাই আমি মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলাম, আর তিনি গিয়ে তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যেন তার পুরুষাঙ্গ ধৌত করে এবং উযু করে নেয়।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
1636 - عن سهل بن حُنيف قال: كنتُ ألقَى من المذي شدّة، وكنت أُكثِرُ من الاغتسال، فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فقال:"إنما يجزيك من ذلك الوضوء" قلت: يا رسول الله! فكيف بما يُصيب ثوبي منه؟ قال:"يكفيك بأن تأخذ كفًّا من ماءٍ، فتنضح بها من ثوبك حيث ترى أنه أصابه".
حسن: رواه أبو داود (210) والترمذي (115) وابن ماجه (506) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، حدثني سعيد بن عبيد السباق، عن أبيه، عن سهل بن حُنيف، فذكره.
وصححه ابن خزيمة (291) وابن حبان (1103)، كلاهما من هذا الوجه.
ورجاله ثقات غير ابن إسحاق؛ فهو صدوق، وهو مُدلِّس إلَّا أنه صرح بالسماع.
قال الترمذي: حسن صحيح، ولا نعرفه إلَّا من حديث محمد بن إسحاق في المذي مثل هذا.
সাহল ইবনে হুনায়েফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মযী (প্রাক-বীর্য) নির্গমনের কারণে খুব কষ্ট পেতাম এবং অধিক পরিমাণে গোসল করতাম। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "এর জন্য তোমার জন্য শুধুমাত্র উযু করাই যথেষ্ট।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! মযী আমার কাপড়ে লাগলে আমি কী করব? তিনি বললেন: "তোমার জন্য যথেষ্ট হবে যে তুমি এক আঁজলা পানি নেবে এবং তোমার কাপড়ের যে স্থানে এটি লেগেছে বলে মনে হয়, সেখানে তা ছিটিয়ে দেবে।"
1637 - عن عبد الله بن سعد الأنصاري قال: سألتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عما يُوجِبُ الغُسْل، وعن الماء يكون بعد الماء، فقال:"ذاك المَذي، وكل فَحْل بَمذي، فتَغْسِلُ من ذلك فرجَك وأُنثَييك، وتَوَضَّأ وضوءَك للصلاة".
حسن: رواه أبو داود (211) قال: حدَّثنا إبراهيم بن موسى، أخبرنا عبد الله بن وهب، حدَّثنا معاوية - يعني ابن صالح - عن العلاء بن الحارث، عن حرام بن حكيم، عن عمه عبد الله بن سعد الأنصاري، فذكر الحديث.
إسناده حسن ورجاله ثقات غير حرام بن حكيم؛ فوثقه العجلي والدراقطني، وضعَّفه غيرهما، غير أنه لا ينزل عن درجة"صدوق". وأما الحافظ فجعله في درجة"ثقة".
ثم اعلم أن هذا الحديث جزء من الحديث الذي يرويه عبد الله بن سعد الأنصاري، والجزء الآخر من الحديث أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما يحل لي من امرأتي وهي حائض؟ فقال:"لك ما فوق الإزار" وذكر مؤاكلة الحائض أيضًا.
هكذا يراه أبو داود، فإنه أوَّلًا روي حديث إبراهيم بن موسى كما سبق، ثم روى عن هارون بن محمد بن بكار، ثنا مروان - يعني ابن محمد - ثنا الهيثم بن حميد، ثنا العلاء بن الحارث، عن حرام
ابن حكيم به، وذكر الجزء الثاني من الحديث، ثم قال:"وساق الحديث" أي الحديث الأوَّل.
ونظرًا لكون الحديث يشتمل على أكثر من مسألة فإني فرقته في ثلاثة كتب؛ في الوضوء، وفي الحيض، انظر باب ما جاء في مؤاكلة الحائض، تبعًا للترمذي وابن ماجه. وجزء آخر رواه ابن ماجه (1378) في كتاب إقامة الصلاة، باب ما جاء في التطوع في البيت. وسيأتي ذكره في الصلاة أيضًا.
وفي الباب عن أُبِي بن كعب رواه الإمام أحمد (21110) وابن ماجه (507) وفيه مصعب بن شيبة وهو إن كان من رجال مسلم فقد قال فيه النسائي: منكر الحديث، وقال أبو حاتم: لا يحمدونه ليس بقويٍّ، وقال الدارقطني: ليس بالقوي ولا بالحافظ، وشيخه أبو حبيب يعلى بن مُنْيَة مجهول.
وقال الدارقطني في سننه (488):"والصّواب عن وكيع، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: كان يقبّل وهو صائم".
وقد أطال في سننه (من رقم 484 إلى 512) النَّفَسَ في تعليل هذا الحديث من جميع طرقه فراجعه إن شئت.
منها ما رواه من طريق الوليد بن صالح، حدّثنا عبيد الله بن عمرو، عن عبد الكريم الجزري، عن عطاء، عن عائشة: أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يُقبل ثم يصلي ولا يتوضّأ. قال:"إن الوليد بن صالح وهم في قوله: عن عبد الكريم، إنّما هو حديث غالب (هو ابن عبيد الله وهو متروك كما قال).
ورواه الثوري، عن عبد الكريم، عن عطاء من قوله، وهو الصّواب" انتهى.
ثم ذكر الترمذيّ مذاهب الفقهاء فقال إثر حديث عائشة: وقد رُوي نحو هذا عن غير واحد من أهل العلم من أصحاب النّبيّ صلى الله عليه وسلم والتابعين. وهو قول سفيان الثوريّ وأهل الكوفة. قالوا: ليس في القبلة وضوء.
وقال مالك بن أنس والأوزاعي والشافعي وأحمد وإسحاق في القبلة وضوء، وهو قول غير واحد من أهل العلم من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم والتابعين، وإنّما ترك أصحابنا حديث عائشة في هذا لأنه لا يصح عندهم لحال الإسناد". ثم ذكر العلل التي سبق إيرادها.
قلت: قول جمهور أهل العلم بأن في القبلة وضوءًا فيه تفصيل، وهو أنّ القبلة قد تكون بشهوة، وقد تكون برحمة، فمن أوجب الوضوء قال: إن كانت ذلك بشهوة، وهو المشهور من مذهب الإمام أحمد، وعليه يحمل قول جماعة من الصحابة منهم عمر بن الخطاب، وابنه عبد الله، وابن مسعود وجماعة، والتلف من بعدهم مثل الزهريّ وزيد بن أسلم ومكحول ويحيى الأنصاري وربيعة والأوزاعي وغيرهم. ومن الفقهاء مالك وغيره من أهل المدينة.
والرواية الثانية عند الإمام أحمد لا تنقض الوضوء، ويحمل هذا إن كانت ذلك بدون شهوة، أو كانت ذلك رحمة، وبه قال جماعة من الصحابة: علي، وابن عباس، وجماعة من التابعين ومن بعدهم منهم: عطاء، وطاوس، والحسن، ومسروق، وهو قول الكوفيين أبي حنيفة وغيره.
والرواية الثالثة عند الإمام أحمد أنه ينقض الوضوء بكل حال، وهو مذهب الشّافعي.
ودليل الشافعي عموم قوله تعالى: {أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ} [النساء: 43] فجعل مجرد اللّمس ناقضًا للوضوء.
وحمل ابن عباس وغيره بأن المراد باللمس هنا كناية عن الجماع، فلا دليل فيه بنقض الوضوء بمجرد اللّمس الذي قد لا يسلم منه أحد، ولم ينقل عن أحد من الصحابة والتابعين.
ولذا قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى عندما سئل عن لمس المرأة فذكر فيه ثلاثة مذاهب وقال:"والصحيح في المسألة أحد قولين: إما عدم النّقض مطلقًا، وإما النقض إذا كان بشهوة. وأما وجوب الوضوء من مجرد مسّ المرأة لغير شهوة فهو أضعف الأقوال. ولا يعرف هذا
القول عن أحد من الصحابة ولا روى أحدٌ عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه أمر المسلمين أن يتوضّئوا من ذلك" مختصر من"مجموع الفتاوي" (21/ 4
আবদুল্লাহ ইবনু সা'দ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, কী জিনিস গোসল ওয়াজিব করে, এবং এক পানির (বীর্যের) পর যে পানি আসে (মাযী) তার বিধান কী? তখন তিনি বললেন: "ওটা হলো মাযি (প্রি-সেমিনাল ফ্লুইড)। আর প্রত্যেক পুরুষই মাযি নিঃসরণ করে। সুতরাং তুমি তার জন্য তোমার লজ্জাস্থান ও অণ্ডকোষদ্বয় ধুয়ে নাও এবং সালাতের জন্য তোমার ওযূ সম্পন্ন করো।"
1638 - عن أبي سعيد أن النبي صلى الله عليه وسلم مرَّ بغلام وهو يسلخ شاة، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تنحّ حتَّى أُرّيك"، فأدخل يده بين الجلد واللحم، فدحس بها حتَّى توارت إلى الإبط، ثم مضى، فصلَّى ولم يتوضّأ.
قال أبو داود: زاد عمرو في حديثه: (يعني لم يمس ماء). وقال: عن هلال بن ميمون الرملي.
حسن: رواه أبو داود (185) وابن ماجه (3179) كلاهما من طريق مروان بن معاوية، أخبرنا هلال بن ميمون الجُهَني، عن عطاء بن يزيد الليثي، قال هلال: لا أعلمه إلَّا عن أبي سعيد، وقال أيوب وعمر: وأراه عن أبي سعيد، فذكروا الحديث.
إسناده حسن ورجاله ثقات إلَّا هلال بن ميمون؛ فقد وثقه ابن معين وقال فيه أبو حاتم: ليس بقوي يكتب حديثه. وقال النسائي: ليس به بأس.
قال أبو داود: رواه عبد الواحد بن زياد وأبو معاوية، عن هلال، عن عطاء، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، لم يذكر أبا سعيد. انتهى.
ولكن جاء هذا الحديث من طرق أُخرى موصولة بذكر أبي سعيد، وهي زيادة من الثقات تكون مقبولة.
وصحّحه أيضًا ابن حبَّان (1163) من هذا الوجه.
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি বালকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন সে একটি ছাগলের চামড়া ছাড়াচ্ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি সরে দাঁড়াও, যেন আমি তোমাকে দেখাতে পারি।" অতঃপর তিনি তার হাত চামড়া ও মাংসের মাঝখানে ঢুকিয়ে দিলেন, এবং তিনি তা (ভেতরে) বগল পর্যন্ত প্রবেশ করালেন। এরপর তিনি চলে গেলেন এবং সালাত আদায় করলেন, কিন্তু উযু করলেন না।
1639 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغتسل ويصلي الركعتين وصلاة الغداة، ولا أراه يُحدِث وضوءًا بعد الغسل.
صحيح: رواه أبو داود (250) واللفظ له، والترمذي (107) والنسائي (252) وابن ماجه (579) كلهم من حديث أبي إسحاق، عن الأسود، عن عائشة، فذكرت الحديث.
وفي رواية:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يتوضأ بعد الغسل". وفي رواية ابن ماجه:"بعد الغسل من الجنابة". قال الترمذي:"حسن صحيح". وصحّحه الحاكم (1/ 153) فقال:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه". وهو كما قال.
قال الترمذي: وهذا قول غير واحد من (أهل العلم) من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم والتابعين؛ أن لا يتوضأ بعد الغُسل.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গোসল করতেন এবং (ফজরের সুন্নাত) দুই রাকাত ও ফজরের (ফরয) সালাত আদায় করতেন, আর আমি দেখিনি যে তিনি গোসলের পর নতুন করে ওযু করেছেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গোসলের পর ওযু করতেন না।" ইবনু মাজাহর বর্ণনায় রয়েছে: "জানাবাতের গোসলের পর।" ইমাম তিরমিযী বলেন: "হাদীসটি হাসান সহীহ।" হাকিম এটিকে সহীহ বলেছেন এবং বলেছেন: "শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, যদিও তাঁরা এটিকে সংকলন করেননি।" এটি তেমনই যেমন তিনি বলেছেন।
ইমাম তিরমিযী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ এবং তাবিঈনদের মধ্য থেকে একাধিক আহলে ইলমের এই মত যে, গোসলের পর ওযু করতে হয় না।
1640 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم خرج من الخلاء، فأتي بطعام، فذكروا له الوضوء، فقال:"أريد أن أصلي فأتوضأ؟ !".
وفي رواية: كنا عند النبي صلى الله عليه وسلم فجاء من الغائط، وأُتي بطعام، فقيل له: ألا توضأ؟ فقال:"لِمَ؟ أَأُصلي فأتوضأ؟ !".
وفي رواية قال:"لِم؟ أللصلاة؟ !".
وفي رواية:"ما أردتُ صلاة فأتوضَّأ".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (374) من طريق عمرو بن دينار، عن سعيد بن الحُوَيْرِث، عن ابن عباس، فذكر الحديث. وسبق تخريج الحديث في باب وجوب الطهارة للصلاة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শৌচাগার থেকে বের হলেন। অতঃপর তাঁর কাছে খাবার আনা হলো। তখন লোকেরা তাঁর কাছে ওযুর কথা উল্লেখ করল। তিনি বললেন: "আমি কি সালাত আদায় করতে চাই যে, ওযু করব?!"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। অতঃপর তিনি মলত্যাগ সেরে এলেন এবং তাঁর কাছে খাবার আনা হলো। তখন তাঁকে বলা হলো: আপনি কি ওযু করবেন না? তিনি বললেন: "কেন? আমি কি সালাত আদায় করব যে, ওযু করব?!"
আরেক বর্ণনায় তিনি বললেন: "কেন? সালাতের জন্য (ওযু করব)?!"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আমি তো সালাতের ইচ্ছা করিনি যে ওযু করব।"
1641 - عن المهاجر بن قُنفذ أنه أتى النبي صلى الله عليه وسلم وهو يبول، فسلم عليه، فلم يرد عليه السلام حتَّى توضأ، ثم اعتذر إليه فقال:"إنِّي كرهت أن أذكر الله عز وجل إلا على طُهر". أو قال:"على طهارة".
صحيح: رواه أبو داود (17) واللفظ له، والنسائي (38) وابن ماجه (350) كلهم من طريق سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن، عن حُصين بن المنذر أبي ساسان، عن المهاجر بن قنفذ بن عمير فذكر مثله، إلَّا ابن ماجه؛ فإنَّ فيه:"أتيت النبي صلى الله عليه وسلم وهو يتوضأ" بدلا من"يبول"، ثم قال:"إنه لم يمنعني من أن أرد عليك إلَّا أنِّي كنت على غير وضوء". ورجاله ثقات.
وحُضين - بمهملة ثم معجمة مصغرًا - ابن المنذر بن الحارث الرقاشي، وأبو ساسان لقبه، وكنيته أبو محمد، صاحب راية عليّ يوم صفين، لا يعرف حضين غيره، ثقة من رجال مسلم.
والحسن هو البصري الإمام التابعي المشهور، ووصفه النسائي وغيره بالتدليس، إلَّا أنَّ الحافظ جعله في المرتبة الثانية الذين احتمل الأئمّة تدليسهم وأخرجوا لهم في الصحيح. كما أنه وُصِف بالإرسال، إلَّا أنه يَروي هنا عن التابعي؛ فلا يضر كونه مُرسِلًا.
وصحّحه ابن خُزيمة (206) وابن حبان (803) والحاكم (1/ 167) كلُّهم من هذا الوجهِ، وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذا اللفظِ …".
মুহাজির ইবনু কুনফুয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট এমন অবস্থায় আসলেন যখন তিনি প্রস্রাব করছিলেন। তিনি তাঁকে সালাম দিলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযু করার আগ পর্যন্ত সালামের উত্তর দিলেন না। এরপর তিনি তার কাছে ওযর পেশ করলেন এবং বললেন: "আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লাকে পবিত্রতা ছাড়া স্মরণ করাটা আমি অপছন্দ করেছি।" অথবা তিনি বললেন: "পবিত্র অবস্থায় (স্মরণ করাটা পছন্দ করেছি)।"
1642 - عن المغيرة بن شعبة قال: كنت مع النبيّ صلى الله عليه وسلم ذات ليلة في سفر فقال: أمعك ماء؟ قلت: نعم، فنزل عن راحلته فمشى حتى تواري عنّي في سواد اللّيل، ثم جاء
فأفرغت عليه الإدارة، فغسل وجهه ويديه، وعليه جبّة من صوف، فلم يستطعْ أن يخرج ذراعيه منها، حتى أخرجهما من أسفل الجبة، فغسل ذراعيه ثم مسح برأسه، ثم أهويتُ لأنزع خفيه، فقال: دعهما، فإني أدخلتهما طاهرتين، فمسح عليهما.
متفق عليه: رواه البخاري في اللباس (5799)، ومسلم في الطهارة (274: 79) كلاهما من طريق زكريا، عن عامر، أخبرني عروة بن المغيرة، عن أبيه، فذكره.
تنبيه: رواه مالك في الطهارة (41) عن ابن شهاب، عن عبّاد بن زياد - من ولد المغيرة بن شعبة - عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة فذكر الحديث.
ولم يورد الشيخان رواية مالك في صحيحيهما، وإنما أوردا من أوجه أُخرى مُختصرًا ومفصلا؛ وذلك - والله أعلم - لما وقع من الوهم من مالك في إسناده في موضعين كما قال الدارقطني: أحدهما قوله: عباد من ولد المغيرة، والصواب هو مولى المغيرة، قاله الشافعي ومصعب الزبيري وغيرهما، والثاني: إسقاط عروة وحمزة ابني المغيرة. انتهى.
لأن عبّادا لم يسمع من المغيرة ولا رآه، وإنما يرويه الزهري عن عبّاد، عن عروة وحمزة ابني المغيرة، عن أبيهما، وربما حدّث الزهريّ به عن عروة وحده دون حمزة. وله طرق أُخرى عن المغيرة بن شعبة. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 170 - 171).
وفي رواية عند مسلم قال:"دعهما! فإني أدخلتهما طاهرتين، فمسح عليهما". وفي رواية عنده:"فمسح على الخفين ومقدِّم رأسه، وعلى عمامته". وفي رواية عنده:"ومسح بناصيته وعلى العمامة وعلى خفيه". ولفظ النسائي (109) قال المغيرة بن شعبة:"خصلتان لا أسأل عنهما أحدًا بعد ما شهدتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: كنا معه في سفر، فبرز لحاجته، ثم جاء فتوضأ، ومسح بناصيته وجانبي عمامته، ومسح على خفيه، قال: وصلاة الإمام خلف الرجل عن رعيته، فشهدت من رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه كان في سفر فحضرت الصلاة، فاحتبس عليهم النبي صلى الله عليه وسلم، فأقاموا الصلاة وقدموا ابن عوف فصلي بهم، فجاء رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلي خلف ابن عوف ما بقي من الصلاة، فلما سلم ابن عوف قام النبي صلى الله عليه وسلم فقضى ما سُبق به".
قال الترمذي بعد أن أخرج الحديث"مسح على الخفين والعمامة": وهو قول غير واحد من أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم منهم أبو بكر وعمر وأنس، وبه يقول الأوزاعي وأحمد وإسحاق، قالوا: يمسح على العمامة. وقال غير واحد من أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم والتابعين: لا يمسح على العمامة إلَّا أن يمسح برأسه مع العمامة، وهو قول سفيان الثوري ومالك بن أنس وابن المبارك والشافعي. قال: وسمعت الجارود بن معاذ يقول: سمعت وكيع بن الجراح يقول: إنْ مسح على العمامة يجزئه للأثر. انتهى
ونقل الخطابي عن الإمام أحمد في المسح على العمامة بأنه جاء عن النبي صلى الله عليه وسلم من خمسة أوجه،
وقال: وشرط من جوَّز المسح على العمامة: أن يعتم الماسح عليها بعد كمال الطهارة، كما يفعله من يريد المسح على الخفين. وقال: وأبي المسح على العمامة أكثر الفقهاء. وتأولوا الخبر في المسح على العمامة على معنى أنه كان يقتصر على مسح بعض الرأس، فلا يمسحه كله مقدمه ومؤخره، ولا ينزع عمامته من رأسه، ولا ينقضها. وجعلوا خبر المغيرة بن شعبة كالمفسر له، وهو أنه وصف وضؤه ثم قال:"ومسح بناصبه وعلى عمامته" فوصل مسح الناصية بالعمامة، وإنما وقع أداء الواجب من مسح الرأس بمسح الناصية، إذ هي جزء من الرأس، وصارت العمامة تبعًا له". انتهى.
وقوله"دعهما فإني أدخلتهما طاهرتين" فيه دليل على أن المسح على الخفين لا يجوز إلَّا إذا لبس الخف بعد الطهارة، أي: بعد الوضوء، وهو أمر يكاد يكون مُتَّفقًا عليه لدى كل من أجاز المسح على الخفين إلَّا داود الظاهري؛ فإنه حمل الطهارة بمعنى الطهارة من النجاسة وإن لم يكن مُستبيحًا للصلاة. انظر: المازري - المُعلِم (1/ 239).
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে আমি একটি সফরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তিনি বললেন: তোমার সাথে কি পানি আছে? আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন তিনি তাঁর সাওয়ারী থেকে নামলেন এবং হেঁটে গেলেন যতক্ষণ না তিনি রাতের অন্ধকারে আমার দৃষ্টি থেকে অদৃশ্য হয়ে গেলেন। অতঃপর তিনি ফিরে এলেন। আমি একটি পাত্র (ইদারা) থেকে তাঁর উপর পানি ঢাললাম। তিনি তাঁর মুখমণ্ডল ও হাতদ্বয় ধুলেন। তাঁর পরনে ছিল পশমের জুব্বা। তিনি তাঁর দুই হাত (হাতা দিয়ে) বের করতে পারছিলেন না। তাই তিনি জুব্বার নিচ দিক দিয়ে হাতদ্বয় বের করলেন এবং সেগুলো ধুলেন। অতঃপর তিনি মাথা মাসাহ করলেন। এরপর আমি তাঁর মোজা খুলে নিতে উদ্যত হলাম, তখন তিনি বললেন: সে দুটোকে থাকতে দাও। কারণ আমি পবিত্র অবস্থায় সে দুটো পরিধান করেছিলাম। অতঃপর তিনি মোজা দুটোর উপর মাসাহ করলেন।
[হাদীসটি] মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী এটি ‘কিতাবুল লিবাস’ (৫৭৯৯) এবং মুসলিম এটি ‘কিতাবুত তাহারাহ’ (২৭৪: ৭৯)-এ বর্ণনা করেছেন। উভয়ই যাকারিয়া, তিনি আমের, তিনি উরওয়াহ ইবনু মুগীরাহ তাঁর পিতা থেকে, এই সনদে বর্ণনা করেছেন।
সতর্কতা: ইমাম মালিক এটি ‘কিতাবুত তাহারাহ’ (৪১)-এ ইবনু শিহাব, তিনি আব্বাদ ইবনু যিয়াদ— যিনি মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ-এর পুত্রদের একজন— তাঁর পিতা থেকে, তিনি মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।
শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম) তাঁদের সহীহদ্বয়ে ইমাম মালিকের এই বর্ণনা উল্লেখ করেননি। বরং তাঁরা অন্য সনদে সংক্ষিপ্ত ও বিস্তারিতভাবে তা উল্লেখ করেছেন। এর কারণ— আল্লাহই সর্বাধিক জানেন— ইমাম মালিক তাঁর সনদে দুই স্থানে ভুল করেছেন, যেমনটি দারাকুতনী বলেছেন: প্রথমত, তাঁর উক্তি যে, আব্বাদ মুগীরাহর পুত্রদের একজন ছিলেন। সঠিক হলো, তিনি মুগীরাহর মাওলা (মুক্ত দাস) ছিলেন, যেমনটি ইমাম শাফিঈ, মুসআব আয-যুবাইরী প্রমুখ বলেছেন। দ্বিতীয়ত: উরওয়াহ ও হামযাহ ইবনু মুগীরাহ-কে সনদ থেকে বাদ দেওয়া।
কারণ আব্বাদ মুগীরাহর কাছ থেকে শুনেননি বা তাঁকে দেখেননি। বরং যুহরী তা আব্বাদ থেকে, তিনি উরওয়াহ ও হামযাহ ইবনু মুগীরাহ থেকে, তাঁরা তাঁদের পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন। আবার কখনো যুহরী হামযাহকে বাদ দিয়ে কেবল উরওয়াহ থেকে বর্ণনা করেছেন। মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীসের অন্যান্য সূত্রও রয়েছে। অধিক জানার জন্য: "আল-মিন্না আল-কুবরা" (১/১৭০-১৭১) দেখুন।
সহীহ মুসলিমের এক বর্ণনায় আছে, তিনি বললেন: "সে দুটোকে থাকতে দাও! কারণ আমি পবিত্র অবস্থায় সে দুটো পরিধান করেছিলাম।" অতঃপর তিনি মোজা দুটোর উপর মাসাহ করলেন। মুসলিমের অপর বর্ণনায় রয়েছে: "অতঃপর তিনি মোজা দুটোর উপর এবং তাঁর মাথার অগ্রভাগ ও পাগড়ির উপর মাসাহ করলেন।" তাঁরই আরেক বর্ণনায় আছে: "আর তিনি তাঁর কপালের উপরিভাগ (নাসিয়া), পাগড়ির উপর এবং মোজা দুটোর উপর মাসাহ করলেন।"
নাসাঈর শব্দ হলো (১০৯): মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: "দুটি বিষয় এমন আছে, যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখার পর আমি আর কাউকে জিজ্ঞেস করিনি।" তিনি বলেন: আমরা তাঁর সাথে সফরে ছিলাম। তিনি প্রকৃতির ডাকে সাড়া দিতে গেলেন। অতঃপর ফিরে এসে ওযু করলেন, মাথার অগ্রভাগ ও পাগড়ির দুই পাশে মাসাহ করলেন এবং মোজার উপর মাসাহ করলেন। তিনি আরও বলেন: "আর ইমামের পিছনে সাধারণ মানুষের সালাত [বিষয়ে] আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে দেখেছি যে, তিনি সফরে ছিলেন। সালাতের সময় হলো, কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে আসতে বিলম্ব করলেন। তাই তারা সালাতের ইক্বামত দিলেন এবং ইবনু আওফকে (ইমামতির জন্য) আগে বাড়ালেন। তিনি তাদের নিয়ে সালাত পড়ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এসে উপস্থিত হলেন এবং ইবনু আওফ-এর পিছনে সালাতের অবশিষ্ট অংশ পড়লেন। যখন ইবনু আওফ সালাম ফিরালেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উঠে দাঁড়ালেন এবং যে অংশ তিনি পাননি, তা আদায় করে নিলেন।"
ইমাম তিরমিযী এই হাদীসটি— "মোজা ও পাগড়ির উপর মাসাহ করেছেন"— বর্ণনা করার পর বলেন: এটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্যে আবূ বকর, উমার ও আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সহ অনেকের মত। আওযাঈ, আহমাদ ও ইসহাকও এই মত দেন। তাঁরা বলেন: পাগড়ির উপর মাসাহ করা যাবে। তবে সাহাবী ও তাবেঈদের মধ্য থেকে একদল আলেম বলেন: পাগড়ির উপর মাসাহ করা বৈধ নয়, যদি না পাগড়ির সাথে মাথার উপরও মাসাহ করা হয়। এটি সুফিয়ান সাওরী, মালিক ইবনু আনাস, ইবনু মুবারক ও শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত। তিনি বলেন: আমি জারূদ ইবনু মু'আযকে বলতে শুনেছি, তিনি ওয়াকী’ ইবনুল জাররাহকে বলতে শুনেছেন: পাগড়ির উপর মাসাহ করলে তা যথেষ্ট হবে, যেহেতু এ বিষয়ে আছার (বর্ণনা) রয়েছে।
আল-খাত্তাবী ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে পাগড়ির উপর মাসাহ করা সম্পর্কে বর্ণনা করেন যে, এ বিষয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে পাঁচটি সূত্র এসেছে। তিনি বলেন: যারা পাগড়ির উপর মাসাহ করা বৈধ বলেছেন, তাদের শর্ত হলো: মাসাহকারীকে অবশ্যই পূর্ণ পবিত্রতার (ওযুর) পর পাগড়ি পরতে হবে, যেমনটি মোজার উপর মাসাহকারী করে থাকে। তিনি আরও বলেন: অধিকাংশ ফুকাহায়ে কিরাম পাগড়ির উপর মাসাহ করা অস্বীকার করেছেন। আর তাঁরা পাগড়ির উপর মাসাহের এই হাদীসকে এইভাবে ব্যাখ্যা করেছেন যে, তিনি মাথার কিছু অংশ মাসাহ করাতে সীমাবদ্ধ ছিলেন, অর্থাৎ মাথার পুরোটা মাসাহ করেননি— অগ্রভাগ বা পশ্চাৎভাগ— আর তিনি মাথা থেকে পাগড়ি খোলেননি বা তা নষ্টও করেননি। আর তাঁরা মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসকে তার ব্যাখ্যা হিসেবে গণ্য করেছেন, যেখানে তিনি তাঁর ওযুর বর্ণনা দিয়ে বলেছেন: "আর তিনি তাঁর কপালের উপরিভাগ (নাসিয়া) ও তাঁর পাগড়ির উপর মাসাহ করলেন।" অর্থাৎ তিনি কপালের অগ্রভাগের মাসাহকে পাগড়ির মাসাহের সাথে সংযুক্ত করেছেন। আর মাথার মাসাহ করার ফরজ কাজটি কপালের অগ্রভাগ মাসাহের মাধ্যমে সম্পন্ন হয়ে গেছে, কারণ এটি মাথার অংশ। আর পাগড়ি তার আনুষঙ্গিক হিসেবে গণ্য হয়েছে।
আর তাঁর উক্তি: "সে দুটোকে থাকতে দাও। কারণ আমি পবিত্র অবস্থায় সে দুটো পরিধান করেছিলাম"— এতে প্রমাণ রয়েছে যে, মোজার উপর মাসাহ করা ততক্ষণ পর্যন্ত বৈধ হবে না, যতক্ষণ না পবিত্রতার অর্থাৎ ওযুর পর মোজা পরিধান করা হয়। এটা এমন একটি বিষয়, যা দাউদ যাহিরী ব্যতীত মোজার উপর মাসাহ বৈধকারী সকল আলেমের নিকট প্রায় ঐকমত্যপূর্ণ। কারণ দাউদ যাহিরী পবিত্রতা বলতে নাপাক থেকে পবিত্রতা বুঝেছেন, যদিও তা নামায আদায়ের জন্য বৈধ না হয়ে থাকে। দেখুন: মাযিরী, আল-মু’লিম (১/২৩৯)।
1643 - عن جرير بن عبد الله البجليّ أنه بال، ثم توضأ ومسح على خفيه، فقيل له: تفعل هذا؟ فقال: نعم؛ رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بال ثم توضّأ ومسح على خفيه. قال الأعمش: قال إبراهيم: كان يعجبهم هذا الحديث؛ لأن إسلام جرير كان بعد نزول المائدة.
متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في الصلاة (387) ومسلم في الطهارة (272) واللفظ له، كلاهما عن الأعمش، عن إبراهيم، عن همام بن الحارث قال: رأيت جريرًا بال، وذكر الحديث.
وفي رواية عند الترمذي: قيل لجرير: متى أسلمت؟ فقال: بعد المائدة.
জারীর ইবনে আবদুল্লাহ আল-বাজালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি পেশাব করলেন, অতঃপর ওযু করলেন এবং তাঁর চামড়ার মোজা (খুফ্ফাইন)-এর উপর মাসেহ করলেন। তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনি কি এমন করেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ; আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে পেশাব করতে দেখেছি, অতঃপর তিনি ওযু করলেন এবং তাঁর চামড়ার মোজার উপর মাসেহ করলেন।
আ‘মাশ বলেন, ইবরাহীম বলেছেন: এই হাদীসটি তাদের (আলিমগণের) কাছে খুবই পছন্দনীয় ছিল; কারণ জারীরের ইসলাম গ্রহণ সূরা মা-ইদাহ (এর বিধান) অবতীর্ণ হওয়ার পর হয়েছিল।
তিরমিযীর এক বর্ণনায় এসেছে: জারীরকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কখন ইসলাম গ্রহণ করেছেন? তিনি বললেন: সূরা মা-ইদাহ (অবতীর্ণ হওয়ার) পরে।
1644 - عن عمرو بن أمية الضَّمْري أنه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح على الخفين.
صحيح: رواه البخاري (204) من حديث أبي سلمة، عن جعفر بن عمرو بن أمَّية الضَّمري، أنَّ أباه أخبره .. فذكر الحديث.
وفي رواية عنده:"رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يمسح على عمامته وخفيه".
আমর ইবনু উমাইয়া আদ-দামরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মোজার উপর মাসেহ করতে দেখেছেন।
অন্য এক বর্ণনায় তাঁর (বুখারীর) নিকট আছে: "আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর পাগড়ি ও মোজার উপর মাসেহ করতে দেখেছি।"
1645 - عن سعد بن أبي وقاص أنه قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم مسح على الخفين، فسأل ابن عمر أباه عن ذلك؟ فقال: نعم، إذا حدثك سعد عن النبي صلى الله عليه وسلم شيئًا فلا تسأل عنه غيره.
صحيح: رواه البخاري في الوضوء (202)، عن أصبغ بن الفرج المصري، عن ابن وهب، قال: حدثني عمرو، حدثني أبو النضر، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن عبد الله بن عمر، عن سعد بن أبي وقاص .. فذكر الحديث ..
وفيه: دليل على أن عمر بن الخطاب رضي الله عنه كان يقبل خبر الواحد، وما نُقِل عنه من التوقف إنما كان عند وقوع ريبة له في بعض المواضع.
وفيه: دليل على تفاوت رُتَب العدالة، ودخول الترجيح في ذلك عند التعارض.
وفيه: تعظيمٌ عظيمٌ من عمرَ لسعيدٍ.
وفيه: أن الصحابي القديم الصحية قد يخفى عليه من الأمور الجلية في الشرع ما يطلع عليه غيره؛ لأن ابن عمر أنكر المسح على الخفين مع قديم صحبته وكثرة روايته.
روي مالك في الطهارة (42) عن نافع وعبد الله بن دينار، أنهما أخبراه أن عبد الله بن عمر قدم الكوفة على سعد بن أبي وقاص، وهو أميرها، فرآه عبد الله بن عمر يمسح على الخفين، فأنكر ذلك عليه، فقال له سعد: سَلْ أباك إذا قدمت عليه، فقدم عبد الله، فنسي أن يسأل عمر عن ذلك، حتَّى قدم سعد فقال: أسألت أباك؟ فقال: لا، فسأله عبد الله، فقال عمر: إذا أدخلت رجليك في الخفين وهما طاهرتان فامْسح عليهما.
قال عبد الله: وإن جاء أحدنا من الغائط؟ فقال: نعم وإن جاء أحدكم من الغائط. انظر للمزيد:"فتح الباري" (1/ 306).
সা'দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মোজার উপর মাসেহ করেছেন। অতঃপর ইবনু উমর তাঁর পিতাকে (উমরকে) এই বিষয়ে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি (উমর) বললেন: হ্যাঁ, সা'দ যখন তোমাদের কাছে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে কিছু বর্ণনা করেন, তখন তোমরা এ বিষয়ে অন্য কাউকে জিজ্ঞেস করো না।
1646 - عن بلال بن رباح أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مسح على الخفين والخمار.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (275)، من طريق الأعمش، عن الحكم، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن كعب بن عُجرة، عن بلال .. فذكره.
والمراد بالخمار: العمامة، كما في سنن أبي داود (153): يمسح على عمامته وموقيه.
والموق: نوع من الخفاف معروف، وساقه إلى القصر.
وبعض أهل العلم ذكروا هذا الحديث في مسند أسامة بن زيد؛ فإنه قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم وبلال الأسواق، فذهب لحاجته ثم خرج، قال أسامة: فسألت بلالًا ما صنع؟ فقال بلال: ذهب النبي صلى الله عليه وسلم لحاجته ثم توضأ فغسل وجهه ويديه ومسح برأسه ومسح على الخفين ثم صلَّى. رواه النسائي (120) من حديث ابن نافع، عن داود بن قيس عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أسامة بن زيد.
ورجاله ثقات غير ابن نافع، وهو: عبد الله بن نافع بن أبي نافع الصائغ، قال الحافظ:"ثقة صحيح الكتاب، في حفظه لين".
والصواب أن يكون هذا الحديث من مسند بلال؛ لأنه هو راوي الحديث، وإن كان أسامة قد حضر بعض القصة.
قال ابن خزيمة - بعد أن روى الحديث من طريق عبد الله بن نافع -: الأسواق: حائط بالمدينة.
وقال: أخبرنا أبو طاهر، نا أبو بكر، قال: سمعت يونس يقول: ليس عن النبي صلى الله عليه وسلم خبر أنه مسح على الخفين في الحضر غير هذا. (1/ 94).
বিলাল ইবনে রাবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মোজা (খুফ্ফাইন) এবং খিমারের (মাথার আবরণের/পাগড়ির) উপর মাসেহ করেছেন।
সহীহ: এটি মুসলিম ‘কিতাবুত তাহারা’ (হাদীস ২৭৫)-এ আ'মাশ, তিনি হাকাম, তিনি আব্দুর রহমান ইবনে আবী লায়লা, তিনি কা'ব ইবনে উজরাহ, তিনি বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন।
'খিমার' দ্বারা উদ্দেশ্য হলো পাগড়ি (আমামা), যেমনটি সুনান আবূ দাঊদ (হাদীস ১৫৩)-এ এসেছে: তিনি তাঁর পাগড়ি ও মোজার উপর মাসেহ করেছেন।
'মাওক' হলো এক ধরনের পরিচিত চামড়ার মোজা (খুফ্ফ), এবং তিনি এটাকে সংক্ষিপ্তভাবে বর্ণনা করেছেন।
কিছু বিশেষজ্ঞ এই হাদীসটিকে উসামা ইবনে যায়েদের মুসনাদে উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাজারের দিকে গেলেন। তিনি প্রাকৃতিক প্রয়োজন সমাধা করতে গেলেন এবং তারপর বের হলেন। উসামা বলেন: আমি বিলালকে জিজ্ঞাসা করলাম, তিনি কী করলেন? বিলাল বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর প্রাকৃতিক প্রয়োজন সেরে ওযু করলেন। অতঃপর তিনি মুখমণ্ডল ও হাত ধুলেন, মাথা মাসেহ করলেন এবং খুফ্ফায় (চামড়ার মোজায়) মাসেহ করলেন, অতঃপর সালাত আদায় করলেন। হাদীসটি নাসায়ী (হাদীস ১২০) বর্ণনা করেছেন ইবনে নাফি'র সূত্রে, তিনি দাঊদ ইবনে কায়েস থেকে, তিনি যায়দ ইবনে আসলাম থেকে, তিনি আতা ইবনে ইয়াসার থেকে, তিনি উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। এর বর্ণনাকারীরা বিশ্বস্ত, তবে ইবনে নাফি' বাদে। তিনি হলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে নাফি' ইবনে আবী নাফি' আস-সা'ইগ। হাফিয (ইবনে হাজার) বলেছেন: "তিনি বিশ্বস্ত এবং তাঁর কিতাব (লিখনী) সহীহ, তবে তাঁর মুখস্থ (হিফয) দুর্বল ছিল।"
তবে সঠিক হলো, এই হাদীসটি বিলালের মুসনাদের অন্তর্ভুক্ত হওয়া; কারণ তিনিই হাদীসের মূল বর্ণনাকারী, যদিও উসামা গল্পের কিছু অংশ উপস্থিত ছিলেন।
ইবনে খুযাইমাহ - আব্দুল্লাহ ইবনে নাফি'র সূত্রে হাদীসটি বর্ণনা করার পর - বলেছেন: আল-আসওয়াক (الأسواق) হলো মদীনার একটি দেয়ালযুক্ত স্থান। তিনি বলেন: আবূ তাহির আমাদেরকে সংবাদ দিয়েছেন, আবূ বকর আমাদেরকে শুনিয়েছেন, তিনি বলেন: আমি ইউনুসকে বলতে শুনেছি: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যে লোকালয়ে (মুসাফির অবস্থায় নন) খুফ্ফার উপর মাসেহ করেছেন, এই হাদীসটি ছাড়া এর আর কোনো খবর নেই। (১/৯৪)।
1647 - عن بُرَيدة بن الحصيب أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى الصلوات يوم الفتح بوضوء واحد، ومسح على فيه، فقال له عمر: لقد صنعت اليوم شيئًا لم تكن تصنعه! فقال:"عمدًا
صنعته يا عمر!".
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (277) من حديث علقمة بن مَرْثَد، عن سليمان بن بُريدة، عن أبيه .. فذكر الحديث. وسبق ذكره في باب جواز الصلوات بوضوء واحد.
বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন একই ওযু দ্বারা [কয়েক ওয়াক্ত] সালাত আদায় করলেন এবং তিনি তাঁর মোজা দুটির উপর মাসাহ করলেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: আপনি আজ এমন একটি কাজ করেছেন যা আপনি পূর্বে করতেন না! তখন তিনি বললেন: "হে উমার! আমি ইচ্ছাকৃতভাবে তা করেছি।"
