আল-জামি` আল-কামিল
161 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ألم تروا إلى ما قال ربُّكم؟ قال: ما أنعمتُ على عبادي من نعمة إِلَّا أصبح فريق منهم بها كافرين، يقولون: الكواكب وبالكواكب".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (72) من طرق عن يونس، عن ابن شهاب، قال: حدثني عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن عتبة، أنّ أبا هريرة قال (فذكر الحديث).
رواه من وجه آخر عن عمرو بن الحارث، أن أبا يونس مولى أبي هريرة حدثه، عن أبي هريرة، وفيه:"ما أنزل اللَّه من السماء من بركة، إِلَّا أصبح فريق من الناس بها كافرين. ينزل اللَّه الغيث فيقولون: الكوكبُ كذا وكذا".
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা কি দেখোনি তোমাদের রব কী বলেছেন? আল্লাহ বলেছেন: আমি আমার বানাকদেরকে যে নিয়ামতই দান করি না কেন, তাদের মধ্য থেকে একটি দল সেই নিয়ামতের কারণে অকৃতজ্ঞ হয়ে যায়। তারা বলে: নক্ষত্রমণ্ডলীর কারণে এবং নক্ষত্রমণ্ডলীর প্রভাবে।"
162 - عن ابن عباس قال: مُطِرَ الناس على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"أصبح من الناس شاكرٌ، ومنهم كافرٌ، قَالُوا: هذه رحمة اللَّه، وقال بعضهم: لقد صدق نوءُ كذا وكذا". فنزلت هذه الآية {فَلَا أُقْسِمُ بِمَوَاقِعِ النُّجُومِ} حتى بلغ: {وَتَجْعَلُونَ رِزْقَكُمْ أَنَّكُمْ تُكَذِّبُونَ} [سورة الواقعة: 75 - 82].
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (73) عن عباس بن عبد العظيم العنبريّ، حدثنا النضر بن محمد، حدثنا عكرمة (وهو ابن عمار)، حدثنا أبو زُميل، قال: حدثني ابن عباس، فذكره.
وأبو زميل هو: سماك بن الوليد الحنفي.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মানুষের উপর বৃষ্টিপাত হলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মানুষের মধ্যে কেউ কেউ কৃতজ্ঞতা প্রকাশকারী হয়ে গেল এবং তাদের কেউ কেউ কাফির (অকৃতজ্ঞ) হয়ে গেল।" [যারা কৃতজ্ঞ,] তারা বলল: 'এটি আল্লাহর রহমত,' আর তাদের কেউ কেউ বলল: 'অমুক অমুক নক্ষত্রের উদয় সত্য প্রমাণিত হলো।' তখন এই আয়াত নাযিল হয়: {অতএব আমি নক্ষত্রসমূহের অবস্থানস্থলের শপথ করছি} [সূরাহ আল-ওয়াকি'আহ: ৭৫] থেকে শুরু করে {আর তোমরা মিথ্যা প্রতিপন্ন করাকেই তোমাদের জীবিকা করে নিয়েছো} [সূরাহ আল-ওয়াকি'আহ: ৮২] পর্যন্ত।
163 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اثنتان في الناس هما بهم كفر:
الطّعن في النَّسب، والنّياحة على الميّت".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (67) من طرق عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মানুষের মধ্যে দুটি বিষয় আছে, যা তাদের জন্য কুফরি তুল্য: বংশের প্রতি অপবাদ দেওয়া এবং মৃতের জন্য উচ্চস্বরে বিলাপ করা।
164 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"ثلاث من عمل أهل الجاهليّة لا يتركهن أهلُ الإسلام: النّياحة، والاستسقاء بالأنواء، وكذا". قلت لسعيد: وما هو؟ قال:"دعوى الجاهليّة: يا آل فلان، يا آل فلان. . .".
حسن: رواه الإمام أحمد (7560) عن ربعي بن إبراهيم، حدثنا عبد الرحمن -يعني ابن إسحاق-، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكره.
وصحّحه ابن حبان (3141)، ورواه من طريق أبي خيثمة، حدثنا ربعي بن إبراهيم، به إِلَّا أنه قال في الثالثة:"التعاير" وهو الطعن في الأنساب، فكأنه شكّ أولًا فقال:"دعوى الجاهلية" ثم استذكر وتأكّد فقال:"التعاير" أو أنه قصد من قوله:"دعوى الجاهلية" الافتخار بالأنساب والطَّعن فيه.
وإسناده حسن لأجل عبد الرحمن بن إسحاق وهو المدنيّ، نزيل البصرة، حسن الحديث، وليس هو بالواسطي أبي شيبة الضعيف.
انظر: الأحاديث الأخرى في كتاب الجنائز، باب النهي عن النّياحة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “জাহিলিয়্যাতের (আইয়্যামে জাহিলিয়্যাতের) তিনটি কাজ রয়েছে যা ইসলামের অনুসারীরাও বর্জন করে না: (১) উচ্চস্বরে বিলাপ করা (নিয়াহা), (২) নক্ষত্রের (আনওয়া) মাধ্যমে বৃষ্টি কামনা করা এবং (৩) এরকম (অন্য একটি কাজ)।” (বর্ণনাকারী বলেন,) আমি সাঈদকে জিজ্ঞেস করলাম: সেটা কী? তিনি বললেন: “জাহিলিয়্যাতের দাবি— ‘হে অমুকের বংশধরগণ! হে অমুকের বংশধরগণ!’ (বলে গোত্রপ্রীতি ও বংশমর্যাদা নিয়ে অহংকার করা)।”
165 - عن ابن عباس: أنّ ناسًا من أهل الشّرك كانوا قد قتلوا وأكثروا، وزنوا وأكثروا، فأتوا محمّدًا صلى الله عليه وسلم فقالوا: إنّ الذي تقول وندعو إليه لحسن، لو تُخبرنا أنّ لما عملنا كفّارةً، فنزلت: {وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ} [سورة الفرقان: 68]، ونزل: {قُلْ يَاعِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللَّهِ} [سورة الزمر: 53].
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4810)، ومسلم في الإيمان (122) كلاهما عن ابن جريج، قال: أخبرني يعلي بن مسلم، أنّه سمع سعيد بن جبير يحدّث عن ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুশরিকদের (অংশীবাদীদের) মধ্য থেকে কিছু লোক ছিল যারা প্রচুর খুন করেছিল এবং প্রচুর ব্যভিচার করেছিল। অতঃপর তারা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আপনি যা বলেন এবং যেদিকে আহ্বান করেন, তা নিশ্চয়ই উত্তম। আপনি যদি আমাদেরকে জানান যে আমরা যা করেছি তার কাফফারা (প্রায়শ্চিত্ত) আছে। তখন নাযিল হলো: "আর তারা যারা আল্লাহ্র সাথে অন্য কোনো ইলাহকে ডাকে না, আল্লাহ্র নিষিদ্ধকৃত কোনো প্রাণকে হক (ন্যায্য) ব্যতীত হত্যা করে না এবং ব্যভিচার করে না।" [সূরা আল-ফুরকান: ৬৮] এবং নাযিল হলো: "বলুন: হে আমার বান্দাগণ, যারা নিজেদের প্রতি বাড়াবাড়ি করেছো (গুনাহ করেছো), তোমরা আল্লাহ্র রহমত থেকে নিরাশ হয়ো না।" [সূরা আয-যুমার: ৫৩]।
166 - عن ابن مسعود قال: قال رجلٌ: يا رسول اللَّه، أنواخذ بما عملنا في الجاهليّة؟ قال:"من أحسن في الإسلام لم يؤاخذ بما عمل في الجاهليّة، ومن أساء في الإسلام أُخذ بالأول والآخر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في استابة المرتدين (6921)، ومسلم في الإيمان (120) كلاهما من حديث منصور، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن ابن مسعود، فذكر الحديث، ولفظهما سواء.
والإساءة معناها هنا: الكفر والشّرك، فمن أشرك باللَّه وكفر به بعد إسلامه أخذ بالجاهلية
والإسلام، وإلَّا فلا؛ لأنَّ اللَّه تعالى يقول: {قُلْ لِلَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ يَنْتَهُوا يُغْفَرْ لَهُمْ مَا قَدْ سَلَفَ} [سورة الأنفال: 38]، وفي حديث عمرو بن العاص السَّابق:"إنّ الإسلام يهدم ما كان قبله".
ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি বলল, ইয়া রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! জাহিলিয়্যাতে (ইসলাম পূর্ব যুগে) আমরা যে কাজ করেছি, তার জন্য কি আমাদের পাকড়াও করা হবে? তিনি বললেন: “যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে উত্তম কাজ করবে, জাহিলিয়্যাতে সে যা করেছে তার জন্য তাকে পাকড়াও করা হবে না। আর যে ব্যক্তি ইসলামের মধ্যে খারাপ কাজ করবে, তাকে প্রথম এবং পরের (কাজ) উভয়ের জন্যই পাকড়াও করা হবে।”
167 - عن ابن شُمَاسةَ الْمَهريّ قال: حضرنا عمرو بن العاص وهو في سياقة الموت. فبكى طويلا وحوَّل وجهه إلى الجدار، فجعل ابنُه يقول: يا أبتاه أما بشرّكَ رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم بكذا؟ أمَّا بشّرك رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم بكذا؟ قال: فأقبل بوجهه فقال: إنّ أفضل ما نُعدُّ شهادةُ أن لا إله إِلَّا اللَّه، وأنَّ محمدًا رسولُ اللَّه. إنّي قد كنتُ على أطباقٍ ثلاثٍ: لقد رأيتُني وما أحدٌ أشدَّ بُغْضا لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم منِّي. ولا أحبَّ إليَّ أن أكون قد استمكنتُ منه فقتلتُه. فلو مُتُّ على تلك الحال لكنتُ من أهل النّار، فلمّا جعل اللَّهُ الإسلامَ في قلبي أتيتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم، فقلت: ابسُط يمينَك فلأبايِعْك. فبسط يَمينَه. قال: فقبضتُ بدي. قال:"مالك يا عمرو؟". قال: قلت: أردتُ أن أشترط. قال:"تشترطُ بماذا؟". قلت: أن يُغفَرَ لي. قال:"أما علمتَ أنّ الإسلام يَهْدِم ما كان قبله، وأنَّ الهجرةَ تَهْدِمُ ما كان قبلها، وأنَّ الحجَّ يَهْدم ما كان قبله؟". وما كان أحدٌ أحبَّ إليَّ من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ولا أجلّ في عيني منه. وما كنتُ أطيق أن أملأ عينيَّ منه إجلالًا له، ولو سُئلتُ أن أصفه ما أطقتُ؛ لأني لم أكن أملأُ عينيَّ منه، ولو مُتُّ على تلك الحال لرجوتُ أن أكون من أهل الجنّة. ثمَّ وَلِينا أشياءَ ما أدري ما حالي فيها. فإذا أنا مُتُّ فلا تصحبني نائحةٌ ولا نارٌ، فإذا دفنتموني فشُنُّوا عليَّ التراب شَنًّا، ثم أقيموا حول قبري قدر ما تُنحر جَزور ويُقْسم لَحُمها حتى أستأنس بكم، وأنظر ماذا أراجع به رسلَ ربّي.
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (121) من طرق عن أبي عاصم الضّحاك، قال: أخبرنا حيدة ابن شريح، قال: حدثني يزيد بن أبي حبيب، عن ابن شُماسة، فذكر الحديث.
قوله:"كنت على أطباق ثلاثة" أي أحوال ومنازل، ومنه قول اللَّه تعالى: {لَتَرْكَبُنَّ طَبَقًا عَنْ طَبَقٍ} [سورة الانشقاق: 19] أي حالا بعد حال.
قوله:"فشنّوا عليَّ التراب شنًّا" روي بالسين المهملة والمعجمة، فقيل: هما بمعنى واحد، وهو الصّب. وقيل بالمهملة: الصبُّ في سهولة، وبالمعجمة: صبّ في تفريق. وهذه سنة في صبِّ التراب على الميت في القبر، قاله عياض. انظر:"المفهم" للقرطبي (1/ 330).
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইবনু শুমাসা আল-মাহরি (رحمه الله) বলেন: আমরা আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত হলাম, যখন তিনি মৃত্যু যন্ত্রণায়। তিনি দীর্ঘক্ষণ কাঁদলেন এবং নিজের চেহারা দেয়ালের দিকে ঘুরিয়ে নিলেন।
তখন তাঁর ছেলে বলতে শুরু করলেন: হে আব্বা! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) কি আপনাকে এই বিষয়ে সুসংবাদ দেননি? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) কি আপনাকে ঐ বিষয়ে সুসংবাদ দেননি?
তিনি তখন চেহারা ঘুরিয়ে নিলেন এবং বললেন: নিঃসন্দেহে আমরা যা সঞ্চয় করি তার মধ্যে সর্বোত্তম হলো এই সাক্ষ্য দেওয়া যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর রাসূল। আমি তিনটি অবস্থায় (স্তরে) ছিলাম।
আমি এমন অবস্থায় ছিলাম যখন আমার চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি বেশি বিদ্বেষ পোষণকারী আর কেউ ছিল না। আর আমার কাছে এর চেয়ে প্রিয় কিছু ছিল না যে, আমি তাঁকে কাবু করে হত্যা করতে সক্ষম হতাম। যদি আমি ওই অবস্থায় মারা যেতাম, তবে আমি অবশ্যই জাহান্নামবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হতাম।
অতঃপর যখন আল্লাহ আমার অন্তরে ইসলামকে স্থান দিলেন, তখন আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং বললাম: আপনার ডান হাত প্রসারিত করুন, আমি আপনার হাতে বায়‘আত করব। তিনি তাঁর ডান হাত প্রসারিত করলেন। আমি তখন আমার হাত গুটিয়ে নিলাম।
তিনি বললেন: “হে আমর! তোমার কী হলো?” আমি বললাম: আমি শর্ত করতে চাই। তিনি বললেন: “কী বিষয়ে শর্ত করবে?” আমি বললাম: যেন আমাকে ক্ষমা করা হয়। তিনি বললেন: “তুমি কি জানো না যে, ইসলাম তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ মিটিয়ে দেয়? আর হিজরত তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ মিটিয়ে দেয়? আর হজ (Hajj) তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ মিটিয়ে দেয়?”
(এরপর আমি এমন অবস্থায় পৌঁছলাম) যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেয়ে অধিক প্রিয় এবং আমার চোখে অধিক সম্মানিত আর কেউ ছিলেন না। তাঁর প্রতি সম্মান ও শ্রদ্ধাবশত আমি চোখ ভরে তাঁর দিকে তাকাতেও সক্ষম ছিলাম না। আমাকে যদি তাঁর বর্ণনা দিতে বলা হতো, তবে আমি তা পারতাম না; কারণ আমি চোখ ভরে তাঁর দিকে তাকাইনি। যদি আমি সেই অবস্থায় মারা যেতাম, তবে আমি আশা করতাম যে আমি জান্নাতবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হব।
এরপর আমরা এমন কিছু বিষয়ে কর্তৃত্ব লাভ করলাম (শাসনকার্য পরিচালনা করলাম) যেগুলোর ব্যাপারে আমি জানি না আমার অবস্থা কী হবে।
সুতরাং যখন আমি মারা যাব, তখন যেন কোনো বিলাপকারিণী মহিলা এবং কোনো আগুন (প্রথাগত অগ্নিপূজা বা জানাযার আগুনের মতো কিছু) আমার সাথে না যায়। যখন তোমরা আমাকে দাফন করবে, তখন আমার উপর ভালোভাবে মাটি ছিটিয়ে দেবে। এরপর তোমরা আমার কবরের চারপাশে ততটা সময় অবস্থান করবে যতটা সময় একটি উট জবাই করে তার মাংস ভাগ করে দেওয়া যায়। যাতে আমি তোমাদের উপস্থিতিতে সান্ত্বনা লাভ করতে পারি এবং দেখতে পারি আমার রবের ফেরেশতাদের কী উত্তর দেব।
168 - عن حكيم بن حزام قال: قلت: يا رسول اللَّه، أرأيت أشياء، كنتُ أتحنّثُ بها
في الجاهليّة من صدقة أو عتاقة، وصلة رحم، فهل فيها من أجْرٍ؛ فقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"أسلمتَ على ما سلف من خير".
وفي رواية: أنّ حكيم بن حزام أعتق في الجاهليّة مائة رقبة، وحمل على مائة بعير ثم أعتق في الاسلام مائة رقبة، وحمل على مائة بعير، ثم أتى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر نحو حديثه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1436)، ومسلم في الإيمان (123) كلاهما من حديث ابن شهاب الزهريّ، قال: أخبرني عروة بن الزبير، أنّ حكيم بن حزام. . . (فذكر مثله).
والرواية الثانية عند البخاريّ (2538)، ومسلم - كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عنه.
وفي رواية قال:"فواللَّه لا أدعُ شيئًا صنعتُه في الجاهليّة إِلَّا فعلتُ في الإسلام مثله".
وقوله:"التحنُّث" التعبّد.
وقوله:"أسلمتَ على ما أسلفتَ من خير" ذهب أكثر أهل العلم إلى تأويله. وقال الحربيّ:"ما تقدّم لك من الخير الذي عملته هو لك كما تقول: أسلمت على ألف درهم، أي على أن أحرزها لنفسه".
قال القرطبي:"وهذا الذي قاله الحربي هو أشبهها وأولاها".
হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি কি মনে করেন জাহিলিয়াতের যুগে আমি যেসব কাজ করতাম, যেমন সাদাকা, দাস মুক্তি এবং আত্মীয়তার বন্ধন বজায় রাখা—সেগুলোর জন্য কি কোনো প্রতিদান আছে? তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তুমি পূর্বে করা সকল নেক কাজের ওপর ইসলাম গ্রহণ করেছো।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে, হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জাহিলিয়াতের যুগে একশো গোলাম আযাদ করেছিলেন এবং একশো উটের ওপর (মালামাল) বহন করিয়েছিলেন। এরপর ইসলামের যুগেও তিনি একশো গোলাম আযাদ করেন এবং একশো উটের ওপর (মালামাল) বহন করান। এরপর তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে তাঁর আগের (জিজ্ঞাসিত) হাদীসের অনুরূপ উল্লেখ করেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে, তিনি (হাকীম) বলেন: আল্লাহর কসম, জাহিলিয়াতের যুগে আমি যা কিছু করেছি, ইসলামেও আমি তার অনুরূপ কাজ করা পরিত্যাগ করব না।
169 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا أسلم العبد فحسُن إسلامه، كتب اللَّه له كلَّ حسنة كان أزلفها، ومحيتْ عنه كلّ سيئة كان أزلفها، ثم كان بعد ذلك القصاص، الحسنة بعشر أمثالها إلى سبعمائة ضعف، والسيئة بمثلها إِلَّا أن يتجاوز اللَّه عز وجل عنها".
صحيح: رواه النسائيّ (4998) من طريق الوليد (هو ابن مسلم)، والبيهقي في"شعب الإيمان" (24) من طريق إسماعيل بن أبي أويس - كلاهما قالا: حدثنا مالك، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره، ولفظهما سواء.
إِلَّا أن البيهقي قال:"أسنده مالك وأرسله ابنُ عيينة، ثم روى الحديث من طريقه مرسلًا".
قلت: الحُكم لمن أسنده لما فيه من زيادة علم.
وذكره البخاريّ في الإيمان (41) معلقًا عن مالك، ولم يسنده في موضع آخر، إِلَّا أنه أسقط قوله:"كتب اللَّه له كل حسنة كان أزلفها" لأنَّه مشكل على القواعد؛ لأنَّ الكافر لا يثاب على العمل الصالح الصَّادر منه في كفره وشركه، لأنّ من شرط المتقرب أن يكون عارفًا لمن يتقرّب إليه، والكافر ليس كذلك ذكره المازريّ وغيره، وتابعه القاضي عياض على تقرير هذا الإشكال وردَّه النوويُّ فقال: الصواب الذي عليه المحقِّقون -بل نقل بعضُهم فيه الإجماع- أنّ الكافر إذا فعل أفعالًا جميلة كالصّدقة، وصلة الرّحم، ثم أسلم ومات على الإسلام أنّ ثواب ذلك يكتب له. . . .".
انتهى كلامه ملخصًا.
وذكر الحافظ ابن حجر في الفتح (1/ 99) احتمالات أخرى ومن أقواها قوله:"والحقّ أنه لا يلزم من كتابة الثواب للمسلم في حال إسلامه تفضلا من اللَّه وإحسانًا أن يكون ذلك لكون عمله الصادر منه في الكفر مقبولًا، والحديث إنما تضمّن كتابة الثواب ولم يتعرّض للقبول، ويحتمل أن يكون القبول يصير معلقًا على إسلامه فيقبل ويثاب إن أسلم وإلَّا فلا". انتهى.
قلت: وعليه يدل حديث حكيم بن حزام قبله.
وقوله:"وأزلفها" أي أسلف وقدّم.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন কোনো বান্দা ইসলাম গ্রহণ করে এবং তার ইসলাম উত্তম হয়, আল্লাহ তার পূর্বে কৃত সকল নেক আমল তার জন্য লিপিবদ্ধ করেন, এবং তার পূর্বে কৃত সকল পাপ (গুনাহ) তার থেকে মুছে দেন, এরপর থেকে কিসাস (প্রতিদান/হিসাব) শুরু হয়। একটি নেকি দশ গুণ থেকে সাতশ গুণ পর্যন্ত বৃদ্ধি করা হয়, এবং মন্দ (পাপ) হয় তার অনুরূপ, তবে যদি আল্লাহ তাআলা তা মাফ করে দেন।"
170 - عن عائشة قالت: قلت: يا رسول اللَّه، ابن جدعان كان في الجاهليّة يصل الرحم ويطعم المسكين فهل ذاك نافعه؟ قال: لا ينفعه، إنه لم يقل يوما: رب اغفر لي خطيئتي يوم الدين.
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (214) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا حفص بن غياث، عن داود، عن الشعبي، عن مسروق، عن عائشة فذكرته.
وابن جدعان هو عبد اللَّه بن جدعان التيمي القرشي أحد أجواد العرب المشهورين في الجاهليّة وهو من أقرباء عائشة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম, 'হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), ইবনু জুদ'আন জাহিলিয়াতের (অন্ধকার যুগে) সময় আত্মীয়তার বন্ধন রক্ষা করত এবং অভাবীকে খাবার খাওয়াত। এতে কি তার কোনো উপকার হবে?' তিনি বললেন, 'তার কোনো উপকার হবে না। কারণ সে একদিনও বলেনি: হে আমার রব, বিচার দিবসে আমার পাপ ক্ষমা করে দিন।'
171 - عن عدي بن حاتم قال: قلت: يا رسول اللَّه، إن أبي كان يصل الرحم ويفعل كذا وكذا، قال: إن أباك أراد أمرًا فأدركه يعني الذِّكر.
حسن: رواه أحمد (18263)، والطبراني في الكبير (17/ 104)، وابن حبان (332) كلهم من طريق شعبة، عن سماك بن حرب، قال: سمعت مري بن قطري قال: سمعت عدي بن حاتم فذكره.
وإسناده حسن من أجل سماك فإنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، ومري بن قطري وإن تفرد عنه سماك إِلَّا أن ابن معين وثقه كما في تاريخ عثمان الدارمي عنه (766).
وأما قول الحافظ فيه:"مقبول" فلعله لم يجد فيه إِلَّا ذكر ابن حبان له في"الثقات".
আদি ইবন হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা তো আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখতেন এবং এমন এমন (ভালো) কাজ করতেন।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই তোমার পিতা একটি জিনিস চেয়েছিলেন এবং তিনি তা লাভ করেছেন"— অর্থাৎ সুখ্যাতি (মানুষের প্রশংসা)।
172 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"بدأ الإسلام غريبًا وسيعود كما بدأ غريبًا، فطوبى للغرباء".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (146) من طرق عن مروان الفزاريّ، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলাম অপরিচিতভাবে (গরীব অবস্থায়) শুরু হয়েছিল এবং তা আবার তেমনই অপরিচিতভাবে ফিরে আসবে যেমনভাবে শুরু হয়েছিল। অতএব, সেই অপরিচিতদের জন্য সুসংবাদ।"
173 - عن ابن عمر، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا وسيعود غريبًا كما بدأ، وهو يأرز بين المسجدين كما تأرز الحيّة في جحرها".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (146) من طرق عن شبابة بن سوَّار، حدثنا عاصم (وهو ابن محمد العمريّ)، عن أبيه، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় ইসলাম অপরিচিত রূপে শুরু হয়েছিল এবং তা আবার শুরু হওয়ার মতো অপরিচিত রূপে ফিরে আসবে। আর তা দুই মসজিদের (মক্কা ও মদীনার) মাঝে গুটিয়ে যাবে, যেমন সাপ তার গর্তের মধ্যে গুটিয়ে যায়।"
174 - عن سعد بن أبي وقاص قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الإيمان بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى يومئذ للغرباء إذا فسد الناس، والذي نفس أبي القاسم بيده! ليأرز الإيمان بين هذين المسجدين كما تأرز الحيّة في جحرها".
حسن: رواه الإمام أحمد (1604)، وأبو يعلى (756)، والبزار في"البحر الزّخّار" (1119) كلهم من طرق عن عبد اللَّه بن وهب، قال: أخبرني أبو صخر، عن أبي حازم، عن ابن سعد، عن سعد -قال البزار: أحسبه عامرًا-.
قلت: وهو كما حسب، فقد جاء تصريحه في كتاب الإيمان لابن منده (424) بأنه عامر بن سعد.
وإسناده حسن، من أجل أبي صخر وهو حميد بن زياد الخرّاط وهو"صدوق" من رجال مسلم.
قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 277):"رواه أحمد والبزار وأبو يعلى، ورجال أحمد وأبي يعلى رجال الصحيح".
والمسجدان هما: مسجد مكة، والمدينة.
সা'দ ইবন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয় ঈমান অপরিচিত অবস্থায় শুরু হয়েছিল এবং যেভাবে শুরু হয়েছিল তেমনই অপরিচিত অবস্থায় ফিরে আসবে। সুতরাং, যেদিন মানুষ নষ্ট হয়ে যাবে, সেদিন সেই অপরিচিতদের (আল-গুরবা) জন্য সুসংবাদ। সেই সত্তার কসম, যার হাতে আবুল কাসিমের প্রাণ! ঈমান অবশ্যই এই দুই মসজিদের মাঝে সংকুচিত হবে, যেভাবে সাপ তার গর্তে সংকুচিত হয়।”
175 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى للغرباء" قيل: من هم يا رسول اللَّه؟ قال:"الذين يَصْلُحون إذا فسد النّاس".
صحيح: رواه الآجريّ في"الغرباء" (1) عن عبد اللَّه بن أبي داود، حدثنا محمد بن آدم المصيصيّ، حدثنا حفص بن غياث، عن الأعمش، عن أبي إسحاق، عن أبي الأحوص، عن عبد اللَّه -يعني ابن مسعود- فذكر الحديث.
وإسناده صحيح. والمصيصيّ هذا ثقة، وثَّقه النسائيّ وغيره.
ورواه أبو عمرو الدَّانيّ في"الفتن" (288) من طريق الآجريّ، به، إِلَّا أنه قال فيه:"عن أبي صالح" بدلًا من"أبي إسحاق"، والظاهر أنه وهم منه، أو خطأ من الناسخ.
وأبو إسحاق هو السبيعيّ وقد اختلط في آخر عمره، ولكن سماع الأعمش منه كان قديمًا.
ورواه الترمذيّ (2629) عن أبي كريب، وابن ماجة (3988) عن سفيان بن وكيع، والإمام أحمد وابنه (3784) عن عبد اللَّه بن محمد بن أبي شيبة، كلّهم عن حفص بن غياث، به، إِلَّا أن الترمذيّ لم يذكر السؤال وتفسيرَ الغرباء.
وأما الإمام أحمد وابن ماجة فذكرا تفسير الغرباء بلفظ آخر"قال: قيل: ومن الغرباء؟ قال: النّزاع من القبائل". وسفيان بن وكيع ضعيف لكنه توبع.
وقال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح غريب من حديث ابن مسعود، إنما نعرفه من حديث حفص ابن غياث، عن الأعمش، وأبو الأحوص اسمه عوف بن مالك بن نضلة الجشميّ، تفرَّد به حفص".
قوله:"النُّزَّاع" ضبط بضم ثم تشديد، قيل: هو جمع نزيع ونازع، وهو الغريب الذي نزع عن أهله وعشيرته، أي الذين يخرجون عن الأوطان لإقامة سنن الدين. قاله السّنديّ.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই ইসলামের সূচনা হয়েছিল অপরিচিত অবস্থায়, এবং তা শুরু হওয়ার মতোই আবার অপরিচিত অবস্থায় ফিরে আসবে। সুতরাং সুসংবাদ সেই অপরিচিতদের (আল-গুরবা) জন্য।" জিজ্ঞাসা করা হলো: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারা কারা?" তিনি বললেন: "তারা হলো সেইসব লোক, যারা মানুষের মাঝে অনাচার শুরু হলে নিজেদেরকে সংশোধন করে নেয়।"
176 - عن عبد اللَّه بن عمرو بن العاص قال: قال رسول اللَّه ذات يوم ونحن عنده:"طوبى للغرباء" وقيل: ومن الغرباء يا رسول اللَّه؟ قال:"أناسٌ صالحون في أناسِ سَوءٍ كثيرٍ، من يَعْصِيهم أكثر ممن يُطيعهم". ثم ذكر فقراء المهاجرين الذين تُتَّقى بهم المكاره. . .
حسن: رواه الإمام أحمد (6650) عن حسن بن موسى، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا الحارث بن يزيد، عن جندب بن عبد اللَّه، أنه سمع سفيان بن عوف يقول: سمعت عبد اللَّه بن عمرو، فذكر الحديث.
وفيه ابن لهيعة مختلط، ولكن رواه عبد اللَّه بن المبارك في"الزهد" (775)، والبيهقي في"الزهد" (203) من طريق أبي عبد الرحمن (وهو عبد اللَّه بن يزيد المقرئ) - كلاهما عن ابن لهيعة بإسناده، نحوه. وهما ممن سمعا منه قبل الاختلاط.
وفي الإسناد جندب بن عبد اللَّه وهو الوابلي الكوفي من رجال"التعجيل" ولم يذكر من روي عنه غير الحارث بن يزيد، ولكن قال العجليّ:"كوفيّ تابعيٌّ ثقة" ولم يذكره ابن حبان في"الثقات" وهو على شرطه.
وله أسانيد أخرى غير أنّ ما ذكرته هو أصحها.
وقد روي موقوفًا على عبد اللَّه بن عمرو، ولفظه:"طوبى للغرباء الذين يُصلحون عند فساد الناس".
رواه أبو عمرو الدَّاني في"الفتن" (291) بإسناد لا بأس به.
وفي الباب عن أنس بن مالك مرفوعًا:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا، فطوبى للغرباء".
رواه ابن ماجة (3987) عن حرملة بن يحيى، قال: حدثنا عبد اللَّه بن وهب، قال: أنبأنا عمرو ابن الحارث وابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سنان بن سعد، عن أنس، فذكره.
وسنان بن سعد ويقال: سعد بن سنان، -صوَّب البخاريُّ وابنُ يونس الأول، - تكلَّم فيه أهل العلم فقال الإمام أحمد:"تركتُ حديثه لأنه مضطرب"، وقال ابن سعد، والنسائي:"منكر الحديث"، وقال الجوزجانيّ:"أحاديثه واهية".
وأخرجه ابن عدي في"الكامل" (5/ 1823) في ترجمة عثمان بن عبد اللَّه بن عمرو بن عثمان
ابن عفّان، وقال:"حدّث عن مالك وحماد بن سلمة وابن لهيعة وغيرهم بالمناكير، يكنى أبا عمرو، وكان يسكن نصيبين، ودار البلاد وحدَّث في كل موضع بالمناكير عن الثقات".
وفي الباب أيضًا عن كثير بن عبد اللَّه بن عمرو بن عوف بن زيد بن مِلْحة، عن أبيه، عن جدّه، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الدّين ليأرز إلى الحجاز كما تأرز الحيّةُ إلى جحرها، وليعُقِلَنَّ الدين من الحجاز معقِلَ الأُروية من رأس الجبل، إنّ الدّين بدأ غريبًا، ويرجع غريبًا، فطوبى للغرباء الذين يُصلحون ما أفسد النّاسُ من بعدي من سنّتي".
رواه الترمذيّ (2630) عن عبد اللَّه بن عبد الرحمن، أخبرنا إسماعيل بن أبي أُويس، حدثني كثير ابن عبد اللَّه بن عمرو بن عوف بن زيد بإسناده مثله.
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن صحيح" وفي نسخة:"حسن" فقط. والصّواب أنّه ضعيف من أجل كثير بن عبد اللَّه لأنّ أهل العلم مطبقون على تضعيفه، وهذه من المواضع التي تساهل فيها الترمذيّ، فصحّح هذا الحديث.
وعن سهل بن سعد قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وليعود كما بدأ. فطوبى للغرباء" قالوا: يا رسول اللَّه، وما الغرباء؟ قال:"الذين يُصلحون عند فساد الناس".
رواه الهرويّ في ذم الكلام (1471)، وابن عدي في الكامل (2/ 462)، والطبراني في الثلاثة -كما قال الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278) - كلّهم من طريق بكر بن سُليم، حدثني أبو حازم، عن سهل بن سعد، فذكر الحديث.
وقال الهيثميّ:"رجاله رجال الصحيح غير بكر بن سُليم وهو ثقة".
قلت: بكر بن سُليم -مصغرًا- الصواف أبو سَليم الطّائفي المديني.
قال ابن عدي:"يحدّث عن أبي حازم، عن سهل بن سعد وغيره، ما لا يوافقه أحدٌ عليه". ثم قال:"ولبكر بن سُليم غير ما ذكرتُ من الحديث قليل، وعامة ما يرويه غير محفوظ، ولا يتابع عليه، وهو من جملة الضّعفاء الذين يكتب حديثهم".
وقال الحافظ:"مقبول" أي إذا تُوبع، ولم أجد من تابعه فهو لين الحديث.
وعن أبي سعيد الخدريّ قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"بدأ الاسلام غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى للغرباء".
رواه الطبراني في الأوسط (7279) عن محمد بن نصير، قال: حدثنا الشّاذكونيّ، قال: حدثنا سلْم بن قتيبة، قال: حدثنا محمد بن مُهزَّم، عن عطية، عن أبي سعيد، فذكر الحديث.
قال الطبرانّي:"لم يرو هذا الحديث عن محمد بن مُهزَّم إِلَّا سلْم بن قتيبة، تفرّد به الشَّاذكونيّ".
وأعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278) بعطية وقال:"هو ضعيف".
وعطية هو ابن سعيد بن جُنادة العوفيّ ضعفه أبو داود، والنسائيّ، وأبو حاتم وغيرهم. وقال ابن
معين:"صالح".
والخلاصة: أنّه شيعي مدلس، إذا انفرد ولم يتابع فلا يقبل.
وعن جابر بن عبد اللَّه قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا، فطوبي للغرباء" قال: من هم يا رسول اللَّه؟ قال: الذين يُصلحون حين يُفسد الناس".
رواه الطبراني في الأوسط (4912) عن عُمارة بن وثيمة بن موسى بن الفرات المصريّ أبي رفاعة، قال: حدثنا أبو صالح عبد اللَّه بن صالح، قال: حدثني الليث بن سعد، قال: حدثني يحيى ابن سعيد، قال: كتب إليَّ خالد بن أبي عمران، قال: حدثني أبو عياش، قال: سمعت جابر بن عبد اللَّه، فذكر الحديث.
ورواه الطّحاويّ في شرحه (689)، واللالكائيّ في السنة (173)، والبيهقي في الزهد (ص 198) كلهم من حديث عبد اللَّه بن صالح، بإسناده مثله.
وفيه عبد اللَّه بن صالح مختلف فيه غير أنه لا بأس به في الشّواهد.
وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278) فقال:"عبد اللَّه بن صالح كاتب الليث، وهو ضعيف وقد وُثِّق".
إِلَّا أنه توبع: رواه الهرويّ في ذم الكلام (1472) من طريقه، ومن طريق ابن وهب - كلاهما عن الليث بن سعد، بإسناده مثله.
ورواه الطبرانيّ في الأوسط (8971) من وجه آخر عن خالد بن أبي عمران بإسناده.
ولكن مداره على أبي عياش وهو المعافريّ المصريّ، روى عنه جماعة، ولكن لم أقف على توثيق من أحد، حتى ابن حبان لم يذكره في"الثقات" على قاعدته في ذكر المجاهيل وهو على شرطه، قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة ولم أقف على من تابعه في هذا الحديث.
وعن سلمان قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود غريبًا".
رواه الطبراني في الكبير (6/ 314) عن عبد اللَّه بن أحمد بن حنبل، ثنا إبراهيم بن الحسن العلاف، ثنا عيسى بن ميمون، عن عون بن أبي شداد، عن أبي عثمان، عن سلمان، فذكر الحديث.
ورواه أيضًا الهرويّ في ذم الكلام (1477) من وجه آخر عن إبراهيم بن الحسن العلاف، بإسناده مثله، وزاد في آخره:"فيا طوبى للغرباء".
وفيه عيسى بن ميمون وهو المدنيّ، مولى القاسم بن محمد، يعرف بالواسطيّ، قال البخاريّ:"منكر الحديث"، وقال أبو حاتم:"لا يصح حديثه".
وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (7/ 279) فقال بعد أن عزاه للطبراني:"وفيه عيسى بن ميمون وهو متروك".
وعن عبد الرحمن بن سنَّة، أنَّه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"بدأ الإسلام غريبًا ثم يعود غريبًا كما بدأ،
فطوبى للغرباء". قيل: يا رسول اللَّه، ومن الغرباء؟ قال:"الذين يَصْلحون إذا فسد الناس، والذي نفسي بيده لينحازنَّ الإيمان إلى المدينة كما يحوز السّيل، والذي نفسي بيده ليأرزنّ الإسلامُ إلى ما بين المسجدين كما تأرزُ الحيّةُ إلى جحرها".
رواه عبد اللَّه بن أحمد في زيادته على المسند (16690) عن أبي أحمد الهيثم بن خارجة، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، عن إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي فروة، عن يوسف بن سليمان، عن جدته ميمونة، عن عبد الرحمن بن سَنَّة، فذكر الحديث.
ورواه الهرويّ في ذم الكلام (1478)، وابن عدي في الكامل (4/ 1615) كلاهما من طريق إسماعيل بن عياش، بإسناده، نحوه.
وفيه إسحاق بن عبد اللَّه بن أبي فروة متروك، كذَّبه ابن معين وغيره، وبه أعلّه الحافظ الهيثميّ في"المجمع" (7/ 278).
وقال ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل في ترجمة عبد الرحمن بن سنّة: روي عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم حديثًا، ليس إسناده بالقائم؛ لأنّ راويه إسحاق بن أبي فروة".
وضعف هذا الحديث البخاريّ وغيره من أجل ابن أبي فروة.
وعن أبي موسى الأشعريّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقوم الساعة حتى ترى الأرض دمًا، يكون الإسلام غريبًا". فذكر الحديث.
أورده الهيثميّ في"المجمع" (7/ 279) هكذا مبتورًا ولم يعز إلى مخرجه، ولعله سقط من المطبوعة، وقال:"وفيه سليمان بن أحمد الواسطيّ، وهو ضعيف".
قلت: سليمان بن أحمد الواسطيّ هذا ممن يسرق الحديث، ترجمه ابن عدي في"الكامل" (3/ 1139 - 1140) وقال:"ولسليمان أحاديث أفراد غرائب، يحدّث بها عنه علي بن عبد العزيز وغيره، وهو عندي ممن يسرق الحديث، ويُشتبه عليه".
وعن واثلة بن الأسقع، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"بدأ الإسلام غريبًا، وسيعود غريبًا كما بدأ، فطوبى للغرباء" قيل: يا رسول اللَّه، ومن الغرباء؟ قال:"الذين يَصلحون إذا فسد الناس".
رواه تمام في فوائده (1705، 1706) من طرق عن سليمان بن سلمة الخبائريّ، نا المؤمّل بن سعيد الرحبيّ، عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن واثلة بن الأسقع، فذكر الحديث.
وإسناده ضعيف جدًّا؛ فإنّ الخبائريّ متروك. قال ابن أبي حاتم:"سمع منه أبي ولم يحدّث عنه، وسألته عنه، فقال: متروك الحديث، لا يشتغل به. فذكرتُ ذلك لابن الجنيد فقال: صدق، كان يكذب، ولا أحدّث عنه بعد هذا".
وشيخه المؤمّل بن سعيد منكر الحديث، كما قال أبو حاتم.
وقال ابن حبان:"منكر الحديث جدًّا، فلستُ أدري وقع المناكير في روايته منه، أو من سليمان
ابن سلمة راويه، لأنّ سليمان كان يروي الموضوعات عن الأثبات، فإن كان منه أو من المؤمّل أو منهما معا بطل الاحتجاج برواية يرويانها" انظر:"المجروحين" (1075).
وعن أبي الدرداء، وأبي أمامة الباهليّ، وأنس بن مالك، وواثلة بن الأسقع، قالوا: خرج علينا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ونحن نتمارى في شيء من الدّين، فغضب غضبًا شديدًا لم يغضب مثله، ثم انتهرنا فقال:"يا أمّة محمد لا تُهيِّجوا على أنفسكم وَهَج النار". ثم ذكر حديثًا طويلًا، قال في آخره:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا، وسيعود كما بدأ فطوبى للغرباء" قالوا: يا رسول اللَّه، ومن الغرباء؟ قال: الذين يصلحون إذا فسد الناسُ، ولا يُمارون في دين اللَّه، ولا يُكفِّرون أحدًا من أهل التوحيد بذنب".
ضعيف جدًّا. رواه الطبراني في الكبير (8/ 178 - 179)، وابن عدي في الكامل (6/ 2089 - 2090)، وابن حبان في المجروحين (896)، والبيهقي في الزهد (199) كلهم من طريق محمد بن الصباح الجرجرائيّ.
إِلَّا البيهقي فإنه رواه من طريق سعيد بن محمد الجرميّ، كلاهما عن كثير بن مروان الفلسطينيّ، عن عبد اللَّه بن يزيد الدّمشقيّ، قال: حدثني أبو الدرداء وأبو أمامة الباهليّ وأنس بن مالك وواثلة ابن الأسقع، قالوا (فذكروا الحديث).
فذكره بطوله الطبرانيّ، وابن حبان، وأما ابن عدي فاختصره قائلًا:"فذكر حديثًا طويلًا" وقال فيه:"إنّ الإسلام بدأ غريبًا". وكذلك ذكره البيهقي مختصرًا.
وأخرجه الخطيب في"تاريخ بغداد" (12/ 481) وقال عقبه:"بلغني عن إبراهيم بن عبد اللَّه بن الجنيد قال: سألت يحيى بن معين عن كثير بن مروان المقدسيّ، فقال: ليس بشيء، كذَّاب، كان ببغداد يحدّث بالمنكرات".
وقال ابن عدي: قال العباس: سمعت يحيى بن معين يقول:"كثير بن مروان ضعيف، وقد سمعت أنا منه"، وفي موضع آخر:"كثير بن مروان الشَّاميّ، وليس بشيء". وقال:"ولكثير بن مروان أحاديث ليست بالكثيرة، ومقدار ما يرويه لا يتابعه الثقات عليه" انتهى.
وقال ابن حبان:"منكر الحديث جدًّا، لا يجوز الاحتجاج به، ولا الرواية عنه إِلَّا على جهة التعجُّب".
وبه أعلّه الهيثميّ في المجمع (1/ 156) فقال:"كثير بن مروان ضعيف جدًّا".
وعن رجل قال: كنتُ في مجلس فيه عمر بن الخطَّاب بالمدينة، فقال لرجل من القوم: يا فلان، كيف سمعتَ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم ينعت الإسلام؟ قال: سمعت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الإسلام بدأ جَذّعًا، ثم ثنيًّا، ثم ربَاعيًّا، ثم سداسيًّا، ثم بازلًا". قال: فقال عمر بن الخطّاب: فما بعد البزول إلّا النقصان.
رواه الإمام أحمد (15802) عن محمد بن جعفر، حدثنا عوف، قال: حدثني علقمة المزنيّ،
قال: حدثني رجل قال (فذكر الحديث).
وإسناده ضعيف، لإبهام الرّاوي.
ورواه أبو يعلى (192) من طريق يزيد بن زريع، ويحيى بن سعيد، عن عوف، به. وزاد: قال يزيد في حديثه في مسجد البصرة قال: حدثني رجل قد سماه، ونسي عوفٌ اسمه.
وأورده الهيثميّ في"المجمع" (7/ 279) وقال:"رواه أحمد وأبو يعلى، وفيه راو لم يُسم، وبقية رجاله ثقات".
وقوله:"بازلًا" هو ما طلع نابه، وكملتُ قوته، ويكون بعد ثمان سنين، ثم يقال بعد ذلك: بازلُ عامٍ، بازل عامين.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত থাকাকালে তিনি বললেন: "তোবা (সুসংবাদ) গুরাবা বা অপরিচিতদের জন্য।" জিজ্ঞাসা করা হলো: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! গুরাবা কারা?" তিনি বললেন: "তারা হলো সৎ লোক, যারা বহু সংখ্যক অসৎ লোকের মাঝে অবস্থান করে। যারা তাদের অবাধ্য হয়, তাদের সংখ্যা তাদের অনুসারীদের চেয়েও অনেক বেশি।" অতঃপর তিনি মুহাজিরদের মধ্য থেকে এমন দরিদ্রদের কথা উল্লেখ করলেন, যাদের দ্বারা বিপদাপদ থেকে রক্ষা পাওয়া যায়।
177 - عن أبي هريرة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"نحن أحقُّ بالشّك من إبراهيم إذ قال: {رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِ الْمَوْتَى قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِنْ قَالَ بَلَى وَلَكِنْ لِيَطْمَئِنَّ قَلْبِي} [سورة البقرة: 260]، ويرحم اللَّه لوطًا لقد كان يأوي إلى ركن شديد، ولو لبثتُ في السّجن طول ما لبث يوسفُ لأجبتُ الدَّاعي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأنبياء (3372)، ومسلم في الفضائل (2370: 152) كلاهما من حديث ابن وهب، قال: أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، وسعيد ابن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.
قال أبو سليمان الخطّابي: ليس في قوله:"نحن أحقّ بالشّك من إبراهيم" اعتراف بالشّك على نفسه، ولا على إبراهيم، لكن فيه نفي الشّك عنهما، يقول: إذا لم أشك أنا ولم أرتَبْ في قدرة اللَّه عز وجل على إحياء الموتى، فإبراهيم أولى بأن لا يشك ولا يرتاب، وقال ذلك على سبيل التواضع، والهضم من النَّفس. وفيه الإعلام أن المسألة من قبل إبراهيم لم تعرض من جهة الشّك، لكن من قبل زيادة العلم، فإن العيان يفيد من المعرفة والطمأنينة ما لا يفيد الاستدلال، وقوله:"ليطمئن قلبي"، أي: بيقين النّظر". انتهى باختصار. انظر:" أعلام الحديث" (3/ 1545 - 1546).
وقوله:"لأجبتُ الدَّاعي" أي لأسرعتُ الإجابة في الخروج من السّجن، ولَمَا قدّمت طلب البراءة، فوصفه بشدّة الصَّبر حيث لم يبادر بالخروج، وإنما قاله صلى الله عليه وسلم تواضعًا، والتواضع لا يحط مرتبة الكبير، بل يزيده رِفعة وجَلالًا.
وقيل: هو من جنس قوله:"لا تفضلوني على يونس" وقد قيل: إنَّه قاله قبل أن يعلم أنَّه أفضل من الجميع. انظر:"الفتح" (6/ 413).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমরা ইবরাহীম (আঃ)-এর চেয়েও সন্দেহের (শঙ্কা দূর করার) বেশি হকদার ছিলাম, যখন তিনি বলেছিলেন: 'হে আমার প্রতিপালক! আমাকে দেখান, কীভাবে আপনি মৃতকে জীবিত করেন। আল্লাহ বললেন: তুমি কি বিশ্বাস করো না? তিনি বললেন: অবশ্যই, কিন্তু আমার অন্তর যেন প্রশান্তি লাভ করে।' (সূরা বাকারা: ২৬০)। আর আল্লাহ লূত (আঃ)-এর প্রতি রহম করুন; তিনি এক শক্তিশালী আশ্রয়স্থলের শরণাপন্ন হতেন। আর ইউসুফ (আঃ) কারাগারে যত দীর্ঘ সময় ছিলেন, আমাকে যদি তত দীর্ঘ সময় থাকতে হতো, তবে আমি আহ্বানকারীকে (কারাগার থেকে মুক্তির আহ্বানকারীকে) তৎক্ষণাৎ সাড়া দিতাম।"
178 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تقوم السّاعةُ حتى تطلع الشّمس من مغربها، فإذا طلعتْ ورآها الناسُ آمن منْ عليها، فذاك حين {لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ} [سورة الأنعام: 158]".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4635)، ومسلم في الإيمان (157) كلاهما من حديث عمارة بن القعقاع، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة. . . فذكره.
وفي لفظ مسلم من وجه آخر عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة:"فإذا طلعتْ من مغربها آمن الناسُ كلّهم أجمعون فيومئذ {لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا} [سورة الأنعام: 158]".
وبهذا اللّفظ رواه عبد الرزاق، عن همام، عن أبي هريرة. ومن طريقه رواه البخاريّ (4636)، ومسلم (157).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না সূর্য তার পশ্চিম দিক থেকে উদিত হবে। যখন তা উদিত হবে এবং লোকেরা তা দেখবে, তখন পৃথিবীর উপরস্থ সবাই ঈমান আনবে। আর এটিই সেই সময়, যখন আল্লাহ তাআলা বলেন: "এটি সেই সময় যখন কোনো ব্যক্তির ঈমান তার কোনো উপকারে আসবে না, যদি সে পূর্বে ঈমান না এনে থাকে অথবা ঈমানের মাধ্যমে ভালো কাজ না করে থাকে।" (সূরা আল-আনআম: ১৫৮)।
179 - عن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ثلاث إذا خرجْن لا ينفع نفسًا إيمانُها لم تكن آمنتْ من قبل أو كسبتْ في إيمانها خيرًا: طلوع الشّمس من مغربها، والدّجال، ودابة الأرض".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (158) من طرق عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিনটি বিষয় যখন প্রকাশিত হবে, তখন এমন কোনো ব্যক্তির ঈমান আর কোনো উপকারে আসবে না যে ব্যক্তি পূর্বে ঈমান আনেনি অথবা ঈমান আনার পর কোনো কল্যাণকর কাজ করেনি। সেই তিনটি বিষয় হলো: পশ্চিম দিক থেকে সূর্যের উদয় হওয়া, দাজ্জাল এবং ভূ-গর্ভ থেকে জন্তুর (দা-বাতুল আরদ) আবির্ভাব।
180 - عن أبي ذرٍّ، أن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال يومًا:"أتدرون أين تذهبُ هذه الشَّمسُ؟" قالوا: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"إنّ هذه تجري حتى تنتهي إلى مستقرِّها تحت العرش. فتخرُّ ساجدةً، فلا تزال كذلك حتى يقال لها: ارْتفعي، ارْجعي من حيثُ جئتِ، فترجعُ. فتصبحُ طالعةً من مطلعها. ثم تجري حتى تنتهي إلى مستقرها تحت العرش، فتخرُّ ساجدةً، ولا تزال كذلك حتى يقال لها: ارْتفعيّ، ارْجعي من حيثُ جئتِ، فترجعُ. فتصبح طالعةً من مطلعها، ثم تجري لا يستنكرُ الناس منها شيئًا حتى تنتهي إلى مستقرِّها ذاك تحت العرش. فيقال لها: ارْتفعيّ، أصبحي طالعةً من مغربك، فتصبحُ طالعةُ من مغربها". فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أتدرون متى ذاكم؟ ذاك حين {لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا} [سورة الأنعام: 158]".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3199)، ومسلم في الإيمان (159) كلاهما من حديث إبراهيم بن يزيد التيميّ، عن أبيه، عن أبي ذرّ، فذكره، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ فيه اختصار.
وفي رواية لهما:"فذلك قوله تعالى: {وَالشَّمْسُ تَجْرِي لِمُسْتَقَرٍّ لَهَا ذَلِكَ تَقْدِيرُ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ}
[سورة يس: 38]".
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একদিন বললেন, "তোমরা কি জানো, এই সূর্য কোথায় যায়?" তারা বললেন, "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন।" তিনি বললেন, "নিশ্চয় এটি (সূর্য) চলমান থাকে যতক্ষণ না তা আরশের নীচে তার নির্দিষ্ট গন্তব্যে পৌঁছায়। অতঃপর তা সিজদায় লুটিয়ে পড়ে। সে সিজদারত অবস্থায় থাকে, যতক্ষণ না তাকে বলা হয়: 'ওঠো, যেখান থেকে এসেছ সেখানে ফিরে যাও।' তখন সে ফিরে যায়। ফলে তা তার উদয়স্থল থেকেই উদিত হয়। অতঃপর তা আবার চলমান হয় যতক্ষণ না আরশের নীচে তার নির্দিষ্ট গন্তব্যে পৌঁছায়। অতঃপর তা সিজদায় লুটিয়ে পড়ে। সে সিজদারত অবস্থায় থাকে, যতক্ষণ না তাকে বলা হয়: 'ওঠো, যেখান থেকে এসেছ সেখানে ফিরে যাও।' তখন সে ফিরে যায়। ফলে তা তার উদয়স্থল থেকেই উদিত হয়। এরপর তা চলতে থাকে এবং মানুষ এতে কোনো অস্বাভাবিকতা দেখতে পায় না, যতক্ষণ না তা আরশের নীচে তার সেই গন্তব্যে পৌঁছে যায়। তখন তাকে বলা হয়: 'ওঠো, তোমার অস্তাচল থেকে উদিত হও।' ফলে তা তার অস্তাচল থেকেই উদিত হয়।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "তোমরা কি জানো এটা কখন ঘটবে? এটা ঘটবে তখন, যখন [আল্লাহর বাণী]: 'যে ব্যক্তি পূর্বে বিশ্বাসী ছিল না কিংবা বিশ্বাস স্থাপনকালে কোনো সৎকর্ম করেনি, তার জন্য সে সময়ের বিশ্বাস কোনো ফল দেবে না।' (সূরা আন'আম: ১৫৮)।"