আল-জামি` আল-কামিল
1621 - عن عبد الله بن عباس قال: بِتُّ عند خالتي ميمونة ليلة، فقام النبي صلى الله عليه وسلم من الليل، فلما كان في بعض الليل قام النبي صلى الله عليه وسلم فتوضأ من شنٍّ معلَّق وضوءًا خفيفا - يخفِّفه عمرو ويقلِّله - وقام يصلي فتوضأتُ نحوا مما توضأ، ثم جئتُ فقمت عن يساره - وربما قال سفيان: عن شماله - فحوَّلني فجعلني عن يمينه، ثم صلَّي ما شاء الله، ثم اضطجع فنام حتَّى نَفَخَ، ثم أتاه المنادي فآذنه بالصلاة، فقام معه إلى الصلاة، فصلَّى ولم يتوضّأ.
قلنا لعمرو: إن ناسًا يقولون: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم تنامُ عينُه ولا ينام قلبه؟ قال عمرو: سمعت عبيد بن عمير يقول: رؤيا الأنبياء وحي، ثم قرأ: {إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ} [الصافات: 102]
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (138) واللفظ له، من حديث عمرو بن دينار، قال أخبرني كُريب، عن ابن عباس، فذكره. وفي مسلم، صلاة المسافرين (763): صلَّى من الليل ثلاث عشرة ركعة، ثم اضطجع فنام حتَّى نفخ، وكان إذا نام نفخ، فأتاه بلال فآذنه بالصلاة، فقام فصلى ولم يتوضأ. من حديث سلمة بن كُهَيل، عن كريب، عن ابن عباس، فذكر الحديث، وفيه ذكر للدعاء. ومن هذا الوجه اخرجه أيضًا البخاري في كتاب الدعاء (6316)، وسيأتي في كتاب الدعاء.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে আমার খালা মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রাতে (সালাতের জন্য) উঠলেন। যখন রাতের কিছু অংশ পার হলো, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠলেন এবং একটি ঝুলন্ত মশক থেকে হালকাভাবে ওযু করলেন— (বর্ণনাকারী) আমর (এই হালকা হওয়াকে) খুব সংক্ষিপ্ত হওয়া বা অল্প হওয়া বলে ব্যাখ্যা করেছেন— তারপর তিনি সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। আমিও তিনি যেরূপ ওযু করলেন, সেরূপ ওযু করলাম। তারপর আমি এসে তাঁর বাম পাশে দাঁড়ালাম— (সুফিয়ান কখনও কখনও) ‘তাঁর বাম দিক’ বলেছেন— তখন তিনি আমাকে ঘুরিয়ে এনে তাঁর ডান পাশে দাঁড় করালেন। এরপর আল্লাহ যতদিন চাইলেন, তিনি সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি শুয়ে পড়লেন এবং এমনভাবে ঘুমালেন যে তাঁর নাক ডাকার শব্দ শোনা গেল। তারপর একজন আহ্বানকারী এসে তাঁকে সালাতের জন্য অবহিত করলেন। তিনি তার সাথে সালাতের জন্য গেলেন এবং ওযু না করেই সালাত আদায় করলেন।
আমরা আমরকে (ইবনু দীনার) বললাম: লোকেরা তো বলে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের চোখ ঘুমায় কিন্তু তাঁর অন্তর ঘুমায় না? আমর বললেন: আমি উবাইদ ইবনে উমায়রকে বলতে শুনেছি: নবীদের স্বপ্ন হলো ওহী। অতঃপর তিনি পাঠ করলেন: {إِنِّي أَرَى فِي الْمَنَامِ أَنِّي أَذْبَحُكَ} অর্থাৎ 'নিশ্চয় আমি স্বপ্নে দেখি যে, আমি তোমাকে যবেহ করছি।' [সূরা সাফফাত: ১০২]
1622 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينام حتَّى ينفُخ، ثم يقوم فيُصلِّي ولا يتوضأ. قال الطنافسي: قال وكيع: تعني وهو ساجد.
صحيح: رواه ابن ماجه (474) قال: حدَّثنا أبو بكر بن أبي شيبة وعلي بن محمد قالا: ثنا وكيع، ثنا الأعمش، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، فذكر الحديث. والحديث في مصنف ابن أبي شيبة (1/ 132). وإسناده صحيح.
وإبراهيم هو ابن يزيد النخعي الفقيه. وعلي بن محمد هو ابن إسحاق الطَّنافسي - بفتح المهملة وتخفيف النون وبعد الألف فاء مكسورة - ثقة عابد.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এত গভীর ঘুমে ঘুমাতেন যে তিনি নাসিকা গর্জন করতেন (জোরে নিশ্বাস নিতেন)। অতঃপর তিনি উঠে সালাত আদায় করতেন এবং নতুন করে উযু করতেন না। আত-ত্বানাফিসী বলেছেন, ওয়াকী' বলেছেন: এর দ্বারা (আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বুঝিয়েছেন যে তা সিজদারত অবস্থায় ঘটত।
1623 - عن عبد الله بن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينام مستلقيا حتَّى ينفُخ، ثم يقوم فيصلي ولا يتوضأ.
صحيح: رواه أبو يعلى (3570) والبزار (في زوائده 2437) كلاهما من طريق منصور بن أبي الأسود، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد الله، فذكره.
قال البزار: لم يتابع منصور على هذا الإسناد، على أنه كوفي لا بأس به.
قلت: ولا يضرّ تفرده؛ فإنه ثقة، وثقه ابن معين وغيره.
وأما ما رواه ابن ماجه (475) من وجه آخر عن الحجاج، عن فُضيل بن عمرو، عن إبراهيم به
مثله؛ فإنَّ فيه الحجاج، وهو ابن أرطأة صدوق كثير الخطأ والتدليس، وقد عنعن.
وقد يكون هذا خاصًّا بالنبي صلى الله عليه وسلم؛ لما جاء في حديث عائشة: تنام عينه ولا ينام قلبه؛ لأنه جاء في بعض الآثار: أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يكن كغيره.
وأما حديث:"وِكاءُ السَّهِ العينان؛ فمن نام فليتوضأ" فهو حديث ضعيف لا يثبت كما قال ابن العربي.
قلت: رواه أبو داود (203) وابن ماجه (477)، وأحمد (887) كلهم من طريق بقية، عن الوضين بن عطاء، عن محفوظ بن علقمة، عن عبد الرحمن بن عائذ، عن علي بن أبي طالب مرفوعًا. وفيه من العللِ:
الأُولى: بقية بن الوليد الحمصي، وهو مُدلِّس، ويُدلس التسوية، ولكن جاء التصريح بالتحديث عند الإمام أحمد (1/ 111) عن شيخه، والجمهور على أنه يكفي هذا.
والثانية: الوضين بن عطاء مختلف فيه، فوثقه أحمد وابن معين، وضعّفه ابن سعد والجوزجاني؛ وقال الحافظ في التقريب:"سئ الحفظ".
والثالثة: عبد الرحمن بن عائذ، وحديثه عن علي بن أبي طالب مرسل، كما قال أبو زرعة. وسأل ابن أبي حاتم أباه عن هذا الحديث، وعن حديث أبي بكر بن أبي مريم، عن عطية بن قيس، عن معاوية، عن النبي:"العين وِكاءُ السَّهِ"، فقال: ليسا بقويين. العلل (1/ 47).
قلت: حديث معاوية رواه أحمد (16879)، وأبو يعلي (7372)، والطبرانيّ في الكبير (875) كلّهم من طريق أبي بكر بن أبي مريم، به.
وأبو بكر بن أبي مريم ضعيف، سُرق بيته فاختلط.
ولكن حسّنه النّووي في"المجموع" (2/ 20)، وابن الصّلاح كما في البدر المنير (2/ 432) فلعله لمجموع شواهده.
والسَّه: حلقة الدبر أو العجز. الوِكاء: الخيط الذي تُشد به القِربة، والكيس وغيرهما.
وكذلك حديث:"إنما الوضوء على من نام مُضطَجِعًا" منكرٌ.
رواه أبو داود (202)، والترمذي (77)، وأحمد (2315) كلهم من طريق أبي خالد الدالاني، عن قتادة، عن أبي العالية، عن ابن عباس فذكره في حديث طويل.
وإسناده ضعيف من أجل الدالاني. قال أبو داود:"روى له جماعة أي عن قتادة - عن ابن عباس، ولم يذكروا شيئًا من هذا"، يعني تفرد بهذه الزيادة الدالاني، وقد أنكر الإمام أحمد على الدالاني قائلًا: ما ليزيد الدالاني يدخل على أصحاب قتادة.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চিৎ হয়ে ঘুমাতেন এমনকি তিনি নাক ডাকতেন, অতঃপর তিনি উঠে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতেন এবং (নতুন করে) ওযু করতেন না।
1624 - عن أسماء بنت أبي بكر أنها قالت: أتيتُ عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم حين خسفت
الشمس، فإذا الناس قيام يُصلون، وإذا هي قائمة تصلي، فقلت: ما للناس؟ فأشارت بيدها نحو السماء، وقالت: سبحان الله! فقلت: آية، فأشارت أي نعم، فقمتُ حتَّى تجلاني الغَشي، وجعلت أصُبّ فوق رأسي ماءً، فلما انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم حمد الله وأثنى عليه، ثم قال:"ما من شيء كنتُ لم أرَه إلَّا قد رأيتُه في مقامي هذا، حتى الجنة والنار، ولقد أُوحي إلي أنكم تُفتنون في القبور مثلَ أو قريبًا من فتنة الدَّجال - لا أدري أي ذلك قالت أسماء - يُؤتَي أحدكم فيقال: ما علمُك بهذا الرجل؟ فأما المُؤمِن أو المُوقِن - لا أدري أي ذلك قالت أسماء - فيقول: هو محمد رسول الله، جاءنا بالبينات والهدى، فأجَبْنا وآمنّا واتَّبعْنا، فيقال له: نَمْ صالحًا، فقد علمنا إن كنت لمؤمنًا، وأما المنافقُ أو المرتابُ - لا أدري أي ذلك قالت أسماء - فيقول: لا أدري، سمعتُ الناس يقولون شيئًا فقلته".
متفق عليه: رواه مالك في الكسوف (4) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر (وهي امرأته)، عن أسماء بنت أبي بكر (وهي جدتها) فذكرت الحديث، ومن طريقه البخاري (184).
وأما مسلم فرواه من طريقٍ آخر عن هشامٍ به مثله، في صلاة الكسوف (905). وسيعاد الحديث في صلاة الكسوف. وقد بوّب البخاري بقوله:"من لم يتوضأ إلَّا من الغَشْي المُثْقِل".
والغشي دون الإغماء، والإغماء ينقض الوضوء بالإجماع. وكونها كانت تتولى صبّ الماء على نفسها يدل على أن حواسها كانت مدركة.
ومحل استدلال البخاري في عدم نقض الوضوء من الغَشْي من جهة أنها كانت تُصلي خلف النبي صلى الله عليه وسلم، وكان النبي صلى الله عليه وسلم يري خلفه وهو في الصلاة، ولم يُنقل أنه أنكر عليها. كذا في الفتح.
আসমা বিন্তে আবি বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন সূর্যগ্রহণ হয়েছিল, তখন আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এলাম। তখন দেখলাম, লোকেরা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছে, আর তিনিও দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছেন। আমি বললাম: লোকদের কী হয়েছে? তিনি তাঁর হাত আকাশের দিকে ইশারা করলেন এবং বললেন: সুবহানাল্লাহ! আমি বললাম: (এটা কি) কোনো নিদর্শন? তিনি ইশারায় বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর আমি (সালাতে) দাঁড়ালাম, এমনকি আমার উপর দুর্বলতা বা মূর্ছা চেপে বসল এবং আমি আমার মাথার উপর পানি ঢালতে লাগলাম।
যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: ‘যা কিছু আমি (এর আগে) দেখিনি, তার সবকিছুই আমি আমার এই স্থানে দাঁড়িয়ে দেখেছি, এমনকি জান্নাত ও জাহান্নামও। আর আমার কাছে ওহী করা হয়েছে যে, তোমাদেরকে কবরে দাজ্জালের ফিতনার মতো বা কাছাকাছি ফিতনার সম্মুখীন করা হবে। (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এ দুটোর মধ্যে কোনটি তিনি বলেছিলেন, তা আমার জানা নেই।) তোমাদের কারো নিকট এসে বলা হবে: এই ব্যক্তি (মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) সম্পর্কে তুমি কী জানতে? অতঃপর মু’মিন বা দৃঢ় বিশ্বাসী ব্যক্তি— (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এ দুটোর মধ্যে কোনটি তিনি বলেছিলেন, তা আমার জানা নেই)— সে বলবে: তিনি হলেন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আল্লাহর রাসূল। তিনি আমাদের নিকট সুস্পষ্ট প্রমাণাদি ও হিদায়াত নিয়ে এসেছিলেন। আমরা তাঁর ডাকে সাড়া দিয়েছিলাম, ঈমান এনেছিলাম এবং তাঁকে অনুসরণ করেছিলাম। তখন তাকে বলা হবে: তুমি শান্তিতে ঘুমাও। আমরা নিশ্চিত জানতাম যে, তুমি অবশ্যই মু’মিন ছিলে। আর মুনাফিক বা সন্দেহ পোষণকারী ব্যক্তি— (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এ দুটোর মধ্যে কোনটি তিনি বলেছিলেন, তা আমার জানা নেই)— সে বলবে: আমি জানি না, আমি লোকদেরকে কিছু বলতে শুনেছিলাম, তাই আমিও তা বলেছিলাম।’
1625 - عن عروة بن الزبير يقول: دخلتُ على مروان بن الحكم، فتَذاكرنا ما يكون منه الوضوءُ، فقال مروان: ومِنْ مسِّ الذكرِ الوضوءُ، فقال عروة: ما علمتُ هذا، فقال مروانُ بن الحكم: أخْبَرتْني بُسْرةُ بنتُ صفوان أنها سمِعتْ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا مسّ أحدُكم ذكرَه فليتوضَّأ".
صحيح: رواه مالك في الطهارة (58) عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، أنه سمع عُروة، فذكر الحديث. ومن طريق مالك رواه أبو داود (181) والنسائي (163). وفي رواية عند النسائي (1/ 101) قال عروة: فلم أزل أُماري مروان حتَّى دعا رجلًا من حرسه، فأرسله إلى بُسْرَة يسألها عما حدّثتْ من ذلك، فأرسلتْ بسرةُ بمثل الذي حدَّثني عنها مروان.
وقد صحّ سماعُ عروة من بسرة في حديث الترمذي (1/ 126) وابن ماجه (1/ 161)؛ فإنهما رويا من وجه آخر عن هشام بن عروة، قال: أخبرني أبي، عن بُسرة بنت صفوان، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من مَسَّ ذكره فليتوضأ"، وفي رواية الترمذي:"فلا يُصَلِّ حتَّى يتوضأ". فكأنّ عروة رواه من وجهين: عن مروان عن بسرة، ثم عن بسرة نفسها، ومن الخطأ أن يجعل هذا الخلاف سببًا لضعف الحديث. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 43).
উরওয়াহ ইবনুয-যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি মারওয়ান ইবনুল হাকামের নিকট প্রবেশ করলাম। অতঃপর আমরা কিসের দ্বারা ওযু ভঙ্গ হয়, সেই বিষয়ে আলোচনা করছিলাম। মারওয়ান বললেন: লজ্জাস্থান স্পর্শ করলেও ওযু ভঙ্গ হয়। উরওয়াহ বললেন: আমি এ বিষয়ে অবগত নই। তখন মারওয়ান ইবনুল হাকাম বললেন: বুন্রাহ বিন্ত সাফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার লজ্জাস্থান স্পর্শ করে, তখন সে যেন ওযু করে।"
1626 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أفضى أحدكم بيده إلى فرجه، وليس بينهما ستر ولا حجاب فليتوضّأ".
حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (1871) و"الصغير" (110) وابن حبّان (1118) كلُّهم من طريق أحمد بن سعيد الهمداني، قال: حدّثنا أصبغ بن الفرج، قال: حدَّثنا عبد الرحمن بن القاسم، عن نافع بن أبي نعيم القاري، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل نافع بن أبي نعيم القاري؛ فإنّه صدوق.
وهذا الحديث مشهور من رواية يزيد بن عبد الملك النوفلي، وهو ضعيف، ومن طريقه رواه الإمام أحمد (84. 4) والبزّار - كشف الأستار (286) - والبيهقي (1/ 133) وابن حبَّان (1118) وقرنه بنافع بن أبي نعيم.
قال الحافظ في"التلخيص" (1/ 126):"قال ابن عبد البر: كان هذا الحديث لا يُعرف إلَّا من رواية يزيد (بن عبد الملك) حتَّى رواه أصبغ، عن ابن القاسم، عن نافع بن أبي نعيم ويزيد جميعًا عن المقبري، فصحَّ الحديث".
وقال ابن السكن: هو أجود ما رُوِي في هذا الباب. وأخرجه الحاكم (1/ 138) من طريق نافع وصحّحه.
ونقل الحافظ في نافع بن أبي نعيم كلامًا من الأَئمّة والخلاصة: أنّه حسن الحديث.
وللحديث أسانيد أُخرى كلّها ضعيفة.
وفي الباب أحاديث، منها: حديث جابر بن عبد الله وأم حبيبة وأبي أيوب، وكلها ضعيفة. انظر: سنن ابن ماجه (1/ 162).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার হাত দ্বারা তার লজ্জাস্থান স্পর্শ করে, এবং তাদের মাঝে কোনো পর্দা বা আবরণ না থাকে, তবে সে যেন ওযু করে নেয়।"
1627 - عن قيس بن طلق، عن أبيه، قال: قدمنا على نبي الله، فجاء رجل كأنه بدوي فقال: يا نبي الله! ما ترى في مسّ الرجل ذكره بعدما يتوضأ؟ فقال:"وهل هو إلَّا مُضْغة منه؟ !"، أو قال:"بَضعة منه".
حسن: رواه أبو داود (183) والترمذي (85) واللفظ لهما، ورواه أيضًا النسائي (165) ولفظه:"حتَّى قدمنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فبايعناه وصلينا معه، فلما قضى الصلاة جاء رجل كأنه
بدوي فقال: يا رسول الله! ما ترى في رجل مسّ ذكره في الصلاة؟ قال:"وهل هو إلَّا مُضغة منك؟ ، أو بَضْعة منك". كلهم رووه من حديث ملازم بن عمرو الحنفي، حدَّثنا عبد الله بن بدر، عن قيس بن طلق به.
إسناده حسن، ورجاله ثقات غير قيس بن طلق؛ فقد روى الزعفراني عن الشافعي قال: سألنا عن قيس فلم نجد من يعرفه بما يكون لنا قبول خبره. ذكره البيهقي في سننه (1/ 135). ولكن عرفه غيره؛ فوثّقه ابن معين والعجلي وابن حبان. وجعله الحافظ في مرتبة"صدوق".
وللحديث إسناد آخر رواه ابن ماجه (483): حدَّثنا علي بن محمد، ثنا وكيع، ثنا محمد بن جابر قال: سمعت قيس بن طَلْق الحنفي، عن أبيه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم سُئل عن مسّ الذكر فقال:"ليس فيه وضوءٌ، وإنما هو منك".
قال الترمذي بعد أن روى الحديث من طريق ملازم بن عمرو:"وهذا الحديث أحسن شيء رُوِي في هذا الباب، وقد روي هذا الحديث أيوب بن عُتبة ومحمد بن جابر عن قيس بن طلق عن أبيه. وقد تكلم بعض أهل الحديث في محمد بن جابر وأيوب بن عُتبة. وحديث ملازم بن عمرو عن عبد الله بن بدر أصحّ وأحسن" انتهى.
قوله (مُضغة) بضم الميم: هو قدر اللقمة من اللحم.
و(بَضعة) بفتح الباء: هو قطعة من اللحم أكبر من المُضغة.
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 43 - 53) فإني تكلمت في الموضوع بكلام مفصل ولله الحمد، فراجعه إن شئت.
তলক ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা আল্লাহর নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাছে উপস্থিত হলাম। তখন একজন লোক আসলেন, যিনি দেখতে বেদুইনের মতো ছিলেন। তিনি বললেন, হে আল্লাহর নবী! অযু করার পর কোনো ব্যক্তির তার লজ্জাস্থান স্পর্শ করা সম্পর্কে আপনি কী মনে করেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: 'এটা তো তার দেহেরই একটি অংশমাত্র!' অথবা তিনি বললেন: 'তার দেহেরই একটি টুকরা মাত্র।'
1628 - عن سعيد بن المُسَيِّب وعَبّاد بن تميم، عن عمه أنه شكا إلى النبي صلى الله عليه وسلم: الرجلُ يُخيَّل إليه أنَّه يجد الشيءَ في الصلاة، قال:"لا ينصرفُ حتَّى يسمع صوتًا أو يجد ريحًا".
متفق عليه: رواه البخاري (137) ومسلم في الحيض (361) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن الزهري، عن سعيد وعبّاد، فذكر مثله.
وعمه هو: عبد الله بن زيد. كذا قال مسلم في روايته عن أبي بكر بن أبي شيبة وزهير بن حرب في روايتهما عن سفيان.
قلت: عبد الله بن زيد هو ابن عاصم المازني الأنصاري الصحابي المشهور الذي روي صفة وضوء النبي صلى الله عليه وسلم كما سبق، وهو ليس بصاحب الأذان. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 75).
قال الحافظ: اختلف هل هو عم عباد لأبيه أو أمه.
আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সেই ব্যক্তি সম্পর্কে অভিযোগ করলেন, যার সালাতের মধ্যে ধারণা হয় যে তার কিছু নির্গত হয়েছে। তিনি (নবী) বললেন, "সে যেন ফিরে না যায়, যতক্ষণ না সে শব্দ শুনতে পায় অথবা দুর্গন্ধ অনুভব করে।"
1629 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا وجد أحدكم في بطنه شيئًا
فأشكل عليه، أَخَرَج منه شيءٌ أم لا؛ فلا يخرجنَّ من المسجد حتَّى يسمع صوتًا أو يجد ريحًا".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (362) عن زهير بن حرب، عن جرير، عن سُهَيْل، عن أبيه، عن أبي هريرة.
ورواه الترمذي (74)، وابن ماجه (515) من طريق شعبة، عن سهيل، به واختصره بقوله:"لا وضوء إلَّا من صوت أو ريح". ومن هذا الوجه رواه ابن خزيمة (27).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কারো পেটে কোনো কিছু অনুভূত হয় এবং তার কাছে সন্দেহ জাগে যে, কিছু বের হয়েছে কিনা; সে যেন মসজিদ থেকে বের না হয় যতক্ষণ না সে কোনো শব্দ শোনে অথবা গন্ধ পায়।"
1630 - عن ابن عباس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"يأتي أحدكم الشيطان في صلاته حتَّى ينفخ في مقعدته، فيُخيل إليه أنه قد أحدث ولم يُحدِث، فإذا وجد ذلك أحدكم فلا ينصرفَنَّ حتَّى يسمع صوته بأُذنه، أو يجد ريحًا بأنفه".
حسن: رواه البزار - كشف الأستار (1/ 147 رقم 281): حدَّثنا محمد بن عمر، ثنا إسماعيل بن صبيح، ثنا أبو أويس، عن ثور بن يزيد، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
قال البزار: لا نعلمه بهذا اللفظ إلَّا من طريق ابن عباس، ورُوىَ بمعناه من طريق غيره.
وقال الهيثمي في مجمع الزوائد (1/ 242): رواه الطبراني في الكبير والبزار بنحوه، ورجاله رجال الصحيح.
قلت: وهو كما قال، إلَّا أن إسماعيل بن صبيح صدوق كما قال الحافظ في التقريب. وأبو أويس هو: عبد الله بن عبد الله بن أويس بن مالك بن أبي عامر الأصبحي المدني، قريب مالك وصهره، من رجال مسلم، قال ابن معين: ليس بالقوي. وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يحتج به. وهو"صدوق يهم" كما قال الحافظ.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কারো সালাতের সময় শয়তান এসে তার কাছে আসে, এমনকি সে তার নিতম্বের স্থানে ফুঁ দেয়। ফলে তার মনে হয় যে তার বায়ু নির্গত হয়েছে, যদিও তা হয়নি। যখন তোমাদের কেউ এমন কিছু অনুভব করে, তখন সে যেন সালাত থেকে ফিরে না যায়, যতক্ষণ না সে তার কান দিয়ে (বায়ু নিঃসরণের) শব্দ শোনে অথবা তার নাক দিয়ে গন্ধ পায়।"
1631 - عن أبي هريرة قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"لا يزال العبدُ في صلاة ما كان في المسجد ينتظر الصلاة ما لم يُحدِث".
فقال رجل أعجمي: ما الحدث يا أبا هريرة؟ قال: الصوت.
يعني الضرطة. وفي لفظ:"لا تقبل صلاة أحدكم إذا أحدث حتَّى يتوضأ".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (176)، من طريق سعيد المقبري، ومسلم في الطهارة (225)، من طريق همَّام بن منبِّه، كلاهما عن أبي هريرة .. فذكر الحديث. وسيأتي بقية الأحاديث في كتاب الصلاة، باب انتظار الصلاة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "বান্দা যতক্ষণ মসজিদে সালাতের (নামাযের) অপেক্ষায় থাকে, ততক্ষণ সে সালাতের মধ্যেই থাকে, যতক্ষণ না সে 'হাদাস' করে।" তখন একজন অনারব লোক জিজ্ঞেস করল: "হে আবূ হুরায়রা! 'হাদাস' কী?" তিনি (আবূ হুরায়রা) বললেন: "শব্দ।" অর্থাৎ বায়ু ত্যাগ (পাদ)। এবং অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমাদের কারো সালাত কবুল হয় না যখন সে 'হাদাস' করে, যতক্ষণ না সে ওযু করে।"
1632 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى الله عليه وسلم:"لا وضوء إلَّا من صوت أو ريح".
صحيح: رواه الترمذي (74) وابن ماجه (515) كلاهما من طريق شعبة، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة.
إسناده صحيح. قال الترمذي: حسن صحيح. ومن هذا الوجه صحّحه ابن خُزيمة (27).
ويرى البيهقي أن هذا الحديث مختصر من حديث سهيل بن أبي صالح - سبق في الباب الذي قبله - وأن شعبة من أصحاب سهيل اختصره."السنن الكبري" (1/ 117). ويرى ابن التركماني: أنهما حديثان مختلفان؛ لأجل هذا الاحتمال أعدتُ ذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "শব্দ অথবা বাতকর্ম ব্যতীত ওযু (ভঙ্গ হওয়া) অপরিহার্য নয়।"
1633 - عن عائشة قالت: أتتْ سلمى مولاة رسول الله صلى الله عليه وسلم أو امرأة أبي رافع مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم تستأذنه على أبي رافع قد ضربها، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي رافع:"ما لك ولها يا أبا رافع؟". قال: تؤذيني يا رسول الله! ، فقال رسول الله: بِمَ آذيتِه با سَلمى؟". قالت: يا رسول الله! ما آذيتُه بشيء، ولكنه أحدث وهو يصلي، فقلت له: يا أبا رافع! إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أمر المسلمين إذا خرج من أحدهم الريح أن يتوضأ، فقام وضربني، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يضحك ويقول:"يا أبا رافع! إنها لم تأمرك إلَّا بخير".
حسن: رواه أحمد (26339) عن يعقوب - وهو ابن إبراهيم -، قال: حدثني أبي، عن محمد بن إسحاق قال: حدثني هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرت الحديث.
ومحمد بن إسحاق صدوق مُدلِّس وقد صرح بالسماع، فانتفت عنه تهمة التدليس.
ورواه أيضًا من هذا الطريق البزار - كشف الأستار (1/ 146 رقم 280) والطبراني في الكبير (24 رقم 765) بدون التصريح بالسماع من ابن إسحاق.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আযাদকৃত দাসী সালমা অথবা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের আযাদকৃত দাস আবূ রাফি’র স্ত্রী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলেন। তিনি আবূ রাফি’র বিরুদ্ধে বিচার চাইতে অনুমতি চাইলেন, কারণ আবূ রাফি’ তাকে মেরেছিলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবূ রাফি’কে জিজ্ঞেস করলেন: "হে আবূ রাফি’! তোমার এবং তার মধ্যে কী হয়েছে?" আবূ রাফি’ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! সে আমাকে কষ্ট দিয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে সালমা! তুমি কী দিয়ে তাকে কষ্ট দিয়েছো?" সালমা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি তাকে কোনো কিছু দিয়েই কষ্ট দেইনি। তবে সে সালাত আদায় করার সময় তার বায়ু নিঃসরণ হয়েছিল। তখন আমি তাকে বললাম: হে আবূ রাফি’! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুসলমানদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যে, তোমাদের কারো থেকে যদি বায়ু নির্গত হয়, তবে সে যেন নতুন করে উযূ (ওযু) করে নেয়। তখন সে উঠে আমাকে মারধর করলো। এই কথা শুনে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাসতে লাগলেন এবং বললেন: "হে আবূ রাফি’! সে তো তোমাকে শুধু ভালোরই নির্দেশ দিয়েছে।"
1634 - عن أبي الدرداء قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قاء فأفطر، قال معدان بن أبي طلحة: فلقيت ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم في مسجد دمشق فقلت: إن أبا الدرداء حدثني أن النبي صلى الله عليه وسلم قاء فأفطر، قال: صدق، وأنا صببت له وَضوءه.
صحيح: رواه أبو داود (2381) واللفظ له، والترمذي (87) كلاهما عن عبد الوارث، عن حسين بن ذكوان المعلم، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني عبد الرحمن بن عمرو الأوزاعي، عن يعيش بن الوليد بن هشام، أن أباه حدثه، حدثني معدان بن أبي طلحة، أن أبا الدرداء حدثه، فذكر الحديث. وإسناده صحيح.
ولفظ الترمذي:"قاء فتوضّأ، وذكر الشيخ أحمد شاكر أنّ في بعض نسخ التّرمذيّ:"قاء فأفطر فتوضّأ".
ورواه الإمام أحمد (27502) وصحّحه ابن خزيمة (1957) كلاهما من طريق حسين (هو ابن
ذكوان المعلم) بإسناده، بلفظ:"قاء فأفطر".
فمن فهم من قول ثوبان:"قاء فأفطر فصببت له وَضُوءَه" قال: قاء فأفطر فتوضّأ.
وأما قوله (قاء فأفطر) فيحتاج إلى تأويل بأنه استقاء؛ لأن القيء لا يُفطر الصائم.
قال الترمذي: وقال إسحاق بن منصور: معدان بن طلحة. ثم قال: وابن أبي طلحة أصحّ. وقال: جوّد حسين المعلم هذا الحديث، وحديث حسين أصح شيء في هذا الباب. وروى معمر هذا الحديث عن يحيى بن أبي كثير فأخطأ فيه فقال: عن يعيش بن الوليد، عن خالد بن معدان، عن أبي الدرداء، ولم يذكر فيه الأوزاعي. وقال: عن خالد بن معدان، وإنما هو معدان بن أبي طلحة. انتهى.
قلت: رواية معمر هذه رواها الإمام أحمد (27537) عن عبد الرزاق، ثنا معمر، عن يحيى بن أبي كثير، عن يعيش بن الوليد، عن خالد بن معدان، عن أبي الدرداء قال: استقاء رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأفطر، فأتي بماء فتوضأ.
يقول الشيخ أحمد شاكر في تعليقه على الترمذي:"ولسنا نوافق الترمذي في ادعائه الخطأ على معمر، وإنما هو عندنا بإسناد آخر للحديث، وخالد بن معدان تابعي ثقة معروف، مات في أول القرن الثاني، روى عن كثير من الصحابة منهم معاوية، واختلف في سماعه من أبي الدرداء. ويعيش بن الوليد تابعي ثقة أيضًا وقد روي عن معاوية، ومعاوية مات سنة 59 أو 60 هـ ويعيش بن الوليد وخالد بن معدان كلاهما من أهل الشام؛ فلا يبعد أن يروي أحدهما عن الآخر. ومعمر حافظ ثقة متقن؛ فلا يحكم عليه بالخطأ جُزافًا" انتهى.
فإذا صحّ هذا الحديث فلا يحتاج إلى تأويل.
وأما نقض الوضوء من القيء والرُّعاف فقال الترمذي: قال به بعض أهل العلم منهم: سفيان الثوري وابن المبارك وأحمد وإسحاق. وقال مالك والشافعي: ليس في القيء والرُّعاف وضوء. انتهى.
أورده الزيلعي في"نصب الراية" (1/ 37) من جهة الدارقطني وأقر ما قاله الدارقطني. قلت: وفيه بقية وهو مُدلِّس وقد عنعن.
وكذلك ما رُويَ عن جابر قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يعني في غزوة ذات الرِّقاع - فأصاب رجل امرأة رجل من المشركين، فحلف أن لا أنتهي حتَّى أهريق دمًا في أصحاب محمد، فخرج يتبع أثر النبي صلى الله عليه وسلم فنزل النبي صلى الله عليه وسلم منزلًا، فقال:"من رجل يكلؤنا؟" فانتدب رجل من المهاجرين ورجل من الأنصار، فقال:"كونا بفم الشِّعب". قال: فلما خرج الرجلان إلى فم الشعب اضطجع المهاجري، وقام الأنصاري يُصلِّي، وأتى الرجل، فلما رأى شخصه وعرف أنه رَبيئَةٌ للقوم، فرماه بسهم فوضعه فيه، فزعه حتَّى رماه بثلاثة أسهم، ثم ركع وسجد، ثم انتبه صاحبُه، فلما عرف أنهم قد نَذِروا به هرب، ولما رأى المهاجري ما بالأنصاري من الدم قال: سبحان الله! ألا أنبهتني أوَّل ما رمى؟ قال: كنت في سورة أقرأها؛ فلم أحبّ أن أقطعها.
فهو أيضًا ضعيف: أخرجه أبو داود (198) قال: حدَّثنا أبو توبة الربيع بن نافع، حدَّثنا ابن المبارك، عن محمد بن إسحاق، حدثني صدقة بن يسار، عن عقيل بن جابر، عن جابر، فذكر الحديث.
وإسناده ضعيف؛ فإنَّ عقيل بن جابر بن عبد الله الأنصاري لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في الثقات. وقال الذهبي في الميزان: فيه جهالة؛ ما روى عنه سوى صدقة بن يسار. وفي التهذيب: وقد روى جابر البياضي عن ثلاثة من ولد جابر، عن جابر، فيحصل لنا راو آخر وإن كان ضعيفًا عن عقيل مع صدقة، لأن جابرًا له ثلاثة أولاد رووا الحديث. هذا، وعبد الرحمن، ومحمد. انتهى
وبهذا يرفع عنه جهالة العين ويبقى فيه جهالة الحال.
ونقل الحافظ تصحيح ابن خزيمة وابن حبان والحاكم له.
قلت: وهو في صحيح ابن خزيمة (1/ 24 رقم 36)، وبه بوَّب"أن خروج الدم من غير مخرج الحدث لا يوجب الوضوء"، وابن حبان (1096) والحاكم (1/ 156 - 157) وأحمد (14704 و 14865) كلهم من طريق محمد بن إسحاق به، وهو في تهذيب ابن هشام (3/ 218 - 219) ومداره على عقيل بن جابر، وهو مجهول الحال كما سبق. إلَّا أن الحاكم صحّحه.
وقد ذكره أيضًا البخاري تعليقا في صحيحه (1/ 280) ولكن بصيغة التمريض قائلًا:"يذكر عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في غزوة ذات الرقاع …". فالظاهر أنه لم يصحّ عنده، ولكن ذكر البخاري عددا من الآثار، منها قول الحسن: ما زال المسلمون يُصلون في جراحاتهم. وقال طاوس ومحمد بن علي وعطاء وأهل الحجاز: ليس في الدم وضوء. وبوَّب بقوله:"من لم ير الوضوء إلَّا من المَخْرجَين من القُبُل والدُّبُر".
قلت: لما رأيت تبويب البخاري وذكره عددًا من الآثار - وكذا ما فعله البيهقي رحمه الله في
"السنن الكبري" (1/ 140)؛ فإنه أورد حديث عقيل بن جابر من طريق أبي داود ولم يتكلم عليه بشيء، وذكر عددًا من الآثار، وحكم على حديث أبي الدرداء السابق في الباب الذي قبله بالاضطراب - أحببت ذكر حديث جابر لأنه من أقوى أدلة من لم ير نقضَ الوضوء من خروج الدم من غير السبيلين، وهم مالك والشافعي وجماعة من الصحابة والتابعين.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة بلفظ:"من أصابه قيءٌ أو رُعاف أو قلس أو مذي فلينصرف، فليتوضّأ …" الحديث.
رواه ابن ماجه (1221) من حديث إسماعيل بن عياش، عن ابن جريج، عن ابن أبي مليكة، عن عائشة.
وإسماعيل بن عياش ضعيف في روايته عن غير أهل بلده الشاميين، وشيخه هنا ابن جريج حجازي.
ومع ذلك فقد خالف أصحاب ابن جريج فروره مرسلًا، ولم يذكروا ابن أبي مليكة، وهو الصّواب كما قاله الدارقطني في العلل (3707).
وكذلك أعلّه أبو حاتم الرّازيّ في العلل (57) بالإرسال من وجه آخر.
قال الخطابي:"وقال أكثر الفقهاء: سيلان الدم من غير السبيلين ينقض الوضوء. وهذا أحوط المذهبين وبه أقول، وقول الشافعي قوي في القياس، ومذاهبهم أقوى في الاتباع" انتهى.
قال عبد الله بن أحمد: سألتُ أبي عن كلّ ما خرج من السّبيلين؟ قال: فيه الوضوء. وإن كان من الجسد؟ قال: إذا فحش توضأ، وقال: الفاحش لا أُحِدُّه فإذا فحش عنده توضّأ.
قال عبد الله: سمعت أبي يقول في الدّم: إذا فحش أعاد الوضوء، وإذا لم يستفحِشْه لا بأس به". مسائل الإمام أحمد برواية ابنه عبد الله (1/ 76).
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 14 - 66).
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বমি করলেন এবং রোযা ভেঙ্গে ফেললেন। মা’দান ইবন আবী তালহা বলেন: এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আযাদকৃত গোলাম সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে দামেস্কের মসজিদে সাক্ষাৎ করলাম। আমি বললাম, আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বলেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বমি করেছেন এবং রোযা ভেঙ্গে ফেলেছেন। সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সে সত্য বলেছে, আর আমিই তাঁর জন্য অযুর পানি ঢেলে দিয়েছিলাম।
1635 - عن علي بن أبي طالب قال: كنت رجلًا مذّاءً، وكنت أستحيي أن أسأل النبي صلى الله عليه وسلم لمكان ابنته، فأمر المقداد بن الأسود فسأله فقال:"يغسل ذكره، ويتوضأ".
متَّفقٌ عليه: رواه البخاري في الوضوء (178) ومسلم في الحيض (303) كلاهما من طريق الأعمش، عن منذر بن يعلى (أبي يعلي)، عن محمد بن الحنفية، عن علي، فذكره. واللفظ لمسلم، وفي لفظ عند البخاري (269) من وجه آخر:"توضّأ، واغْسلْ ذَكرَك" قوله:"واغْسل ذكرَك" هذا مما لا خلاف فيه.
وفي مسلم عن سليمان بن يسار، عن ابن عباس قال: قال علي بن أبي طالب أرسلنا المقداد بن الأسود إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وفيه:"تَوَضّأ، وانْضَحْ فَرْجَكَ".
قوله:"وانضحْ فرْجك" أي الثوب الذي أصابه المذي يكفيه فيه رَشُّ الماء قليلا، وبه قال أحمد، وقال الشافعي:"لا يجزئ إلا الغَسْل" انظر للمزيد: المنة الكبرى (1/ 30 - 32).
وأما ما رواه مالك في الطهارة (53) عن أبي النضر مولى عمر بن عبيد الله، عن سليمان بن يسار، عن المقداد بن الأسود أن علي بن أبي طالب أمره أن يسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال فيه:"إذا وجد أحدكم فلينضح فرْجَه بالماء، وليتوضأ وضوءَه للصلاة" فهو منقطع، لأن سليمان بن يسار لم يسمع من المقداد ولا من علي، وبين سليمان بن يسار وعلي - ابن عباس كما في إسناد مسلم.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ছিলাম এমন একজন লোক, যার অধিক পরিমাণে 'মাযী' (প্রাক-বীর্য) নির্গত হতো। কিন্তু আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা (আমার স্ত্রী)-এর কারণে তাঁকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞেস করতে লজ্জা পাচ্ছিলাম। তাই আমি মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিলাম, আর তিনি গিয়ে তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যেন তার পুরুষাঙ্গ ধৌত করে এবং উযু করে নেয়।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)
1636 - عن سهل بن حُنيف قال: كنتُ ألقَى من المذي شدّة، وكنت أُكثِرُ من الاغتسال، فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فقال:"إنما يجزيك من ذلك الوضوء" قلت: يا رسول الله! فكيف بما يُصيب ثوبي منه؟ قال:"يكفيك بأن تأخذ كفًّا من ماءٍ، فتنضح بها من ثوبك حيث ترى أنه أصابه".
حسن: رواه أبو داود (210) والترمذي (115) وابن ماجه (506) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، حدثني سعيد بن عبيد السباق، عن أبيه، عن سهل بن حُنيف، فذكره.
وصححه ابن خزيمة (291) وابن حبان (1103)، كلاهما من هذا الوجه.
ورجاله ثقات غير ابن إسحاق؛ فهو صدوق، وهو مُدلِّس إلَّا أنه صرح بالسماع.
قال الترمذي: حسن صحيح، ولا نعرفه إلَّا من حديث محمد بن إسحاق في المذي مثل هذا.
সাহল ইবনে হুনায়েফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মযী (প্রাক-বীর্য) নির্গমনের কারণে খুব কষ্ট পেতাম এবং অধিক পরিমাণে গোসল করতাম। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ ব্যাপারে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: "এর জন্য তোমার জন্য শুধুমাত্র উযু করাই যথেষ্ট।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! মযী আমার কাপড়ে লাগলে আমি কী করব? তিনি বললেন: "তোমার জন্য যথেষ্ট হবে যে তুমি এক আঁজলা পানি নেবে এবং তোমার কাপড়ের যে স্থানে এটি লেগেছে বলে মনে হয়, সেখানে তা ছিটিয়ে দেবে।"
1637 - عن عبد الله بن سعد الأنصاري قال: سألتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عما يُوجِبُ الغُسْل، وعن الماء يكون بعد الماء، فقال:"ذاك المَذي، وكل فَحْل بَمذي، فتَغْسِلُ من ذلك فرجَك وأُنثَييك، وتَوَضَّأ وضوءَك للصلاة".
حسن: رواه أبو داود (211) قال: حدَّثنا إبراهيم بن موسى، أخبرنا عبد الله بن وهب، حدَّثنا معاوية - يعني ابن صالح - عن العلاء بن الحارث، عن حرام بن حكيم، عن عمه عبد الله بن سعد الأنصاري، فذكر الحديث.
إسناده حسن ورجاله ثقات غير حرام بن حكيم؛ فوثقه العجلي والدراقطني، وضعَّفه غيرهما، غير أنه لا ينزل عن درجة"صدوق". وأما الحافظ فجعله في درجة"ثقة".
ثم اعلم أن هذا الحديث جزء من الحديث الذي يرويه عبد الله بن سعد الأنصاري، والجزء الآخر من الحديث أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما يحل لي من امرأتي وهي حائض؟ فقال:"لك ما فوق الإزار" وذكر مؤاكلة الحائض أيضًا.
هكذا يراه أبو داود، فإنه أوَّلًا روي حديث إبراهيم بن موسى كما سبق، ثم روى عن هارون بن محمد بن بكار، ثنا مروان - يعني ابن محمد - ثنا الهيثم بن حميد، ثنا العلاء بن الحارث، عن حرام
ابن حكيم به، وذكر الجزء الثاني من الحديث، ثم قال:"وساق الحديث" أي الحديث الأوَّل.
ونظرًا لكون الحديث يشتمل على أكثر من مسألة فإني فرقته في ثلاثة كتب؛ في الوضوء، وفي الحيض، انظر باب ما جاء في مؤاكلة الحائض، تبعًا للترمذي وابن ماجه. وجزء آخر رواه ابن ماجه (1378) في كتاب إقامة الصلاة، باب ما جاء في التطوع في البيت. وسيأتي ذكره في الصلاة أيضًا.
وفي الباب عن أُبِي بن كعب رواه الإمام أحمد (21110) وابن ماجه (507) وفيه مصعب بن شيبة وهو إن كان من رجال مسلم فقد قال فيه النسائي: منكر الحديث، وقال أبو حاتم: لا يحمدونه ليس بقويٍّ، وقال الدارقطني: ليس بالقوي ولا بالحافظ، وشيخه أبو حبيب يعلى بن مُنْيَة مجهول.
وقال الدارقطني في سننه (488):"والصّواب عن وكيع، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة: كان يقبّل وهو صائم".
وقد أطال في سننه (من رقم 484 إلى 512) النَّفَسَ في تعليل هذا الحديث من جميع طرقه فراجعه إن شئت.
منها ما رواه من طريق الوليد بن صالح، حدّثنا عبيد الله بن عمرو، عن عبد الكريم الجزري، عن عطاء، عن عائشة: أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يُقبل ثم يصلي ولا يتوضّأ. قال:"إن الوليد بن صالح وهم في قوله: عن عبد الكريم، إنّما هو حديث غالب (هو ابن عبيد الله وهو متروك كما قال).
ورواه الثوري، عن عبد الكريم، عن عطاء من قوله، وهو الصّواب" انتهى.
ثم ذكر الترمذيّ مذاهب الفقهاء فقال إثر حديث عائشة: وقد رُوي نحو هذا عن غير واحد من أهل العلم من أصحاب النّبيّ صلى الله عليه وسلم والتابعين. وهو قول سفيان الثوريّ وأهل الكوفة. قالوا: ليس في القبلة وضوء.
وقال مالك بن أنس والأوزاعي والشافعي وأحمد وإسحاق في القبلة وضوء، وهو قول غير واحد من أهل العلم من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم والتابعين، وإنّما ترك أصحابنا حديث عائشة في هذا لأنه لا يصح عندهم لحال الإسناد". ثم ذكر العلل التي سبق إيرادها.
قلت: قول جمهور أهل العلم بأن في القبلة وضوءًا فيه تفصيل، وهو أنّ القبلة قد تكون بشهوة، وقد تكون برحمة، فمن أوجب الوضوء قال: إن كانت ذلك بشهوة، وهو المشهور من مذهب الإمام أحمد، وعليه يحمل قول جماعة من الصحابة منهم عمر بن الخطاب، وابنه عبد الله، وابن مسعود وجماعة، والتلف من بعدهم مثل الزهريّ وزيد بن أسلم ومكحول ويحيى الأنصاري وربيعة والأوزاعي وغيرهم. ومن الفقهاء مالك وغيره من أهل المدينة.
والرواية الثانية عند الإمام أحمد لا تنقض الوضوء، ويحمل هذا إن كانت ذلك بدون شهوة، أو كانت ذلك رحمة، وبه قال جماعة من الصحابة: علي، وابن عباس، وجماعة من التابعين ومن بعدهم منهم: عطاء، وطاوس، والحسن، ومسروق، وهو قول الكوفيين أبي حنيفة وغيره.
والرواية الثالثة عند الإمام أحمد أنه ينقض الوضوء بكل حال، وهو مذهب الشّافعي.
ودليل الشافعي عموم قوله تعالى: {أَوْ لَامَسْتُمُ النِّسَاءَ} [النساء: 43] فجعل مجرد اللّمس ناقضًا للوضوء.
وحمل ابن عباس وغيره بأن المراد باللمس هنا كناية عن الجماع، فلا دليل فيه بنقض الوضوء بمجرد اللّمس الذي قد لا يسلم منه أحد، ولم ينقل عن أحد من الصحابة والتابعين.
ولذا قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله تعالى عندما سئل عن لمس المرأة فذكر فيه ثلاثة مذاهب وقال:"والصحيح في المسألة أحد قولين: إما عدم النّقض مطلقًا، وإما النقض إذا كان بشهوة. وأما وجوب الوضوء من مجرد مسّ المرأة لغير شهوة فهو أضعف الأقوال. ولا يعرف هذا
القول عن أحد من الصحابة ولا روى أحدٌ عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه أمر المسلمين أن يتوضّئوا من ذلك" مختصر من"مجموع الفتاوي" (21/ 4
আবদুল্লাহ ইবনু সা'দ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলাম, কী জিনিস গোসল ওয়াজিব করে, এবং এক পানির (বীর্যের) পর যে পানি আসে (মাযী) তার বিধান কী? তখন তিনি বললেন: "ওটা হলো মাযি (প্রি-সেমিনাল ফ্লুইড)। আর প্রত্যেক পুরুষই মাযি নিঃসরণ করে। সুতরাং তুমি তার জন্য তোমার লজ্জাস্থান ও অণ্ডকোষদ্বয় ধুয়ে নাও এবং সালাতের জন্য তোমার ওযূ সম্পন্ন করো।"
1638 - عن أبي سعيد أن النبي صلى الله عليه وسلم مرَّ بغلام وهو يسلخ شاة، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تنحّ حتَّى أُرّيك"، فأدخل يده بين الجلد واللحم، فدحس بها حتَّى توارت إلى الإبط، ثم مضى، فصلَّى ولم يتوضّأ.
قال أبو داود: زاد عمرو في حديثه: (يعني لم يمس ماء). وقال: عن هلال بن ميمون الرملي.
حسن: رواه أبو داود (185) وابن ماجه (3179) كلاهما من طريق مروان بن معاوية، أخبرنا هلال بن ميمون الجُهَني، عن عطاء بن يزيد الليثي، قال هلال: لا أعلمه إلَّا عن أبي سعيد، وقال أيوب وعمر: وأراه عن أبي سعيد، فذكروا الحديث.
إسناده حسن ورجاله ثقات إلَّا هلال بن ميمون؛ فقد وثقه ابن معين وقال فيه أبو حاتم: ليس بقوي يكتب حديثه. وقال النسائي: ليس به بأس.
قال أبو داود: رواه عبد الواحد بن زياد وأبو معاوية، عن هلال، عن عطاء، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، لم يذكر أبا سعيد. انتهى.
ولكن جاء هذا الحديث من طرق أُخرى موصولة بذكر أبي سعيد، وهي زيادة من الثقات تكون مقبولة.
وصحّحه أيضًا ابن حبَّان (1163) من هذا الوجه.
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি বালকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন সে একটি ছাগলের চামড়া ছাড়াচ্ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি সরে দাঁড়াও, যেন আমি তোমাকে দেখাতে পারি।" অতঃপর তিনি তার হাত চামড়া ও মাংসের মাঝখানে ঢুকিয়ে দিলেন, এবং তিনি তা (ভেতরে) বগল পর্যন্ত প্রবেশ করালেন। এরপর তিনি চলে গেলেন এবং সালাত আদায় করলেন, কিন্তু উযু করলেন না।
1639 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يغتسل ويصلي الركعتين وصلاة الغداة، ولا أراه يُحدِث وضوءًا بعد الغسل.
صحيح: رواه أبو داود (250) واللفظ له، والترمذي (107) والنسائي (252) وابن ماجه (579) كلهم من حديث أبي إسحاق، عن الأسود، عن عائشة، فذكرت الحديث.
وفي رواية:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يتوضأ بعد الغسل". وفي رواية ابن ماجه:"بعد الغسل من الجنابة". قال الترمذي:"حسن صحيح". وصحّحه الحاكم (1/ 153) فقال:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه". وهو كما قال.
قال الترمذي: وهذا قول غير واحد من (أهل العلم) من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم والتابعين؛ أن لا يتوضأ بعد الغُسل.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গোসল করতেন এবং (ফজরের সুন্নাত) দুই রাকাত ও ফজরের (ফরয) সালাত আদায় করতেন, আর আমি দেখিনি যে তিনি গোসলের পর নতুন করে ওযু করেছেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গোসলের পর ওযু করতেন না।" ইবনু মাজাহর বর্ণনায় রয়েছে: "জানাবাতের গোসলের পর।" ইমাম তিরমিযী বলেন: "হাদীসটি হাসান সহীহ।" হাকিম এটিকে সহীহ বলেছেন এবং বলেছেন: "শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ, যদিও তাঁরা এটিকে সংকলন করেননি।" এটি তেমনই যেমন তিনি বলেছেন।
ইমাম তিরমিযী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ এবং তাবিঈনদের মধ্য থেকে একাধিক আহলে ইলমের এই মত যে, গোসলের পর ওযু করতে হয় না।
1640 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم خرج من الخلاء، فأتي بطعام، فذكروا له الوضوء، فقال:"أريد أن أصلي فأتوضأ؟ !".
وفي رواية: كنا عند النبي صلى الله عليه وسلم فجاء من الغائط، وأُتي بطعام، فقيل له: ألا توضأ؟ فقال:"لِمَ؟ أَأُصلي فأتوضأ؟ !".
وفي رواية قال:"لِم؟ أللصلاة؟ !".
وفي رواية:"ما أردتُ صلاة فأتوضَّأ".
صحيح: رواه مسلم في الحيض (374) من طريق عمرو بن دينار، عن سعيد بن الحُوَيْرِث، عن ابن عباس، فذكر الحديث. وسبق تخريج الحديث في باب وجوب الطهارة للصلاة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শৌচাগার থেকে বের হলেন। অতঃপর তাঁর কাছে খাবার আনা হলো। তখন লোকেরা তাঁর কাছে ওযুর কথা উল্লেখ করল। তিনি বললেন: "আমি কি সালাত আদায় করতে চাই যে, ওযু করব?!"
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। অতঃপর তিনি মলত্যাগ সেরে এলেন এবং তাঁর কাছে খাবার আনা হলো। তখন তাঁকে বলা হলো: আপনি কি ওযু করবেন না? তিনি বললেন: "কেন? আমি কি সালাত আদায় করব যে, ওযু করব?!"
আরেক বর্ণনায় তিনি বললেন: "কেন? সালাতের জন্য (ওযু করব)?!"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "আমি তো সালাতের ইচ্ছা করিনি যে ওযু করব।"