আল-জামি` আল-কামিল
1648 - عن أبي عبيدة بن محمد بن عمار بن ياسر قال: سألت جابر بن عبد الله عن المسح على الخفين، فقال: السنة يا ابن أخي! قال: وسألته عن المسح على العمامة، فقال: أمِسَّ الشعرَ الماءَ.
حسن: رواه الترمذي (102) قال: حدّثنا قتيبة بن سعيد، حدَّثنا بشر بن المُفضَّل، عن عبد الرحمن بن إسحاق القرشي، عن أبي عبيدة به.
ورجاله ثقات غير أبي عبيدة؛ فقيل هو أخو سلمة بن محمد، وقيل هما واحد. قال البخاري في ترجمة سلمة: أراه أخا أبي عبيدة.
وذكر أبو أحمد الحاكم أبا عبيدة فيمن لا يُعرف اسمه.
واختلف فيه قول أبي حاتم؛ فقال مرة: منكر الحديث ولا يُسمى، وقال في موضع آخر: صحيح الحديث. وقال فيه ابن معين: ثقة. وقال عبد الله بن أحمد بن حنبل: أبو عبيدة هذا ثقة، وأخوه سلمة لم يرو عنه إلَّا علي بن زيد، ولا يعرف حاله.
وأما قول الحافظ فيه بأنه"مقبول" فالظاهر أنه رجّح أنهما واحد، وإلَّا فأبو عبيدة بعد توثيق ابن معين وعبد الله بن أحمد يستحق أن يرفع إلى درجة"صدوق".
وقوله (أمِسَّ الشعرَ الماءَ)، وفي رواية مالك بلاغا (52) عن جابر بن عبد الله:"حتَّى يمسَّ الشعرَ الماءُ" كذا في موطأ محمد، قال الشيخ اللكنوي في"التعليق الممجد" (1/ 286): من الإمساس أو المس، أي: يصيب الشعر، بالنصب على أنه مفعول مقدم، (الماءُ) بالرفع أو النصب.
وفي موطأ يحيى:"حتَّى يُمْسَح الشعرُ بالماءِ".
وأما المسح على العمامة فقال ابن عبد البر:"رُوِي عن جماعة من السلف من الصحابة والتابعين - ذكرهم المصنفون: ابن أبي شيبة وعبد الرزاق وابن المنذر -، أنهم أجازوا المسح على العمامة، قال: وبه قال الأوزاعي وأبو عبيد القاسم بن سلَّام وأحمد وإسحاق وأبو ثور؛ للآثار الواردة في ذلك، (منها حديث عمرو بن أمية الضمري في البخاري) وقِياسًا على الخفين، ولأن الرأس والرجلين عندهم ممسوحان ساقطان في التيمم. وقال: وأما الذين لم يروا المسح على العمامة ولا على الخمار فعروة بن الزبير والقاسم بن محمد والشعبي والنخعي وحماد بن أبي سليمان، وهو قول مالك وأبي حنيفة والشافعي وأصحابهم"."الاستذكار" (2/ 219).
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু উবাইদাহ ইবনে মুহাম্মাদ ইবনে আম্মার ইবনে ইয়াসির বলেন: আমি জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে চামড়ার মোজার (খুফ্ফাইন) উপর মাসাহ করা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "হে আমার ভ্রাতুষ্পুত্র, এটা সুন্নাহ।" তিনি বলেন: আমি তাকে পাগড়ির উপর মাসাহ করা সম্পর্কেও জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: "পানি দিয়ে চুল স্পর্শ করো (অর্থাৎ চুলে পানি পৌঁছাও)।"
1649 - عن أبي يَعْفُور قال: سألت أنس بن مالك عن المسح على الخفين فقال: كان
رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح عليهما.
صحيح: رواه ابن حبان (4/ 147 رقم 1318) قال: أخبرنا محمد بن عبيد الله بن الجنيد بِبُست، قال: حدّثنا قتيبة بن سعيد، قال: حدَّثنا أبو عوانة، عن أبي يعفور، فذكره. وإسناده صحيح.
أبو يعفور هو: وقْدان العبدي الكوفي الكبير، ويقال اسمه: واقد، من رجال الجماعة.
وأما ما رواه ابن ماجه (548): حدَّثنا محمد بن عبد الله بن نُمير، ثنا عمر بن عبيد الطنافسي، ثنا عمر بن المثنَّى، عن عطاء الخراساني، عن أنس قال: كنت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفَر فقال:"هل من ماء؟"، فتوضأ ومسح على خفه، ثم لحق بالجيش وأمَّهم، فإسناده ضعيف.
قال البوصيري في الزوائد: هذا إسناد ضعيف منقطع. قال أبو زرعة: عطاء الخراساني لم يسمع من أنس. وقال العقيلي: عمر بن المثنَّى حديثه غير محفوظ.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু ইয়া'ফুর বলেন: আমি তাঁকে মোজার উপর মাসেহ করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মোজার উপর মাসেহ করতেন।
1650 - عن ثوبان قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سرية، فأصابهم البرد، فلما قدموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرهم أن يمسحوا على العصائب والتَّساخين.
حسن: رواه أبو داود (146): حدَّثنا أحمد بن محمد بن حنبل، ثنا يحيى بن سعيد، عن ثور، عن راشد بن سعد، عن ثوبان، فذكره.
وهو في مسند أحمد (22383)، وصحّحه الحاكم (1/ 169)، وقال: صحيح على شرط مسلم.
قلت: إسناده حسن، رجاله ثقات غير أن راشد بن سعد؛ اختلف في سماعه من ثوبان، والراجح أنه سمع كما صرّح به البخاريّ في التاريخ الكبير أنه قال في ترجمته:"سمع ثوبان ويعلى بن مرة"، وجاء تصريحه بالسماع منه في الأدب المفرد (579). وسماعه غير مستبعد لأنه شهد صفين مع معاوية، ومات ثوبان سنة أربع وخمسين.
وقد تابعه أبو سلام الأسود، عن ثوبان عند البزار. انظر: كشف الأستار (1/ 154)، ولكن في سنده عتبة بن أبي أمية الدمشقي، قال ابن حبان: يروي المقاطيع. انظر: مجمع الزوائد (1/ 255).
والتساخين: قال الإمام الخطَّابي في"غريب الحديث" (2/ 61):"قال بعضهم: النساخين كلُّ ما يُسخّن به القدم من خُفٍّ، وجوربٍ، ونحو ذلك.
ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি অভিযানকারী দলকে প্রেরণ করলেন। অতঃপর তারা ঠান্ডায় আক্রান্ত হলো। যখন তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে আসলেন, তখন তিনি তাদের পাগড়ি এবং মোজা বা গরম কাপড়ের (যা দিয়ে পা গরম রাখা হয়) ওপর মাসেহ করার নির্দেশ দিলেন।
1651 - عن وعن أبي طلحة: أن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ فمسح على الخفين والخمار.
حسن: رواه الطبراني في المعجم الصغير (2/ 95) قال: حدَّثنا محمد بن الفضل بن الأسود النظري، ثنا عمر بن شبة النميري، ثنا حرمى بن عُمارة، ثنا شعبة، عن عمرو بن دينار، عن يحيى بن جعدة، عن عبد الرحمن بن عبد القاريّ، عن أبي طلحة، فذكر الحديث.
قال الطبراني: لم يروه عن شعبة إلَّا حرمى، تفرد به عمر بن شبّة.
وقال الهيثمي في"مجمع الزوائد" (1/ 255 - 256): رجاله موثقون.
قلت: عمر بن شبَّة وشيخه حرمي بن عُمارة صدوقان.
আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উযু করলেন এবং মোজা ও মাথার আবরণের (খিমার) উপর মাসাহ করলেন।
1652 - عن أبي ذر قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح على الموقين والخمار.
حسن: رواه الطبراني في الأوسط (7 رقم 6261) قال: حدَّثنا محمد بن علي الصائغ، ثنا المسيب بن واضح، ثنا مُخلد بن الحسين، عن هشام بن حسَّان، عن حُميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت، عن أبي ذر، فذكر مثله.
قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن هشام بن حسَّان إلَّا مَخْلَد بن الحسين، تفرد به المسيب بن واضح.
والمُسيِّب بن واضح مختلف فيه؛ ذكره ابن عديٍّ في الكاملِ (6/ 2383) وقال: سمعت أبا عروبة يقول: كان المُسيِّب بن واضح لا يُحدِّث إلَّا بشيءٍ يعرفه، ونقف عليه. وقال: وكان أبو عبد الرحمن النسائيِّ حسنَ الرأي فيه، ويقول:"الناسُ يؤذوننا"؛ أي: يتكلَّمون فيه.
وذكر له أحاديث، وليس فيها الحديث المذكور، وقال: وله أحاديث كثيرة عن شيوخه، وعامَّة ما خالف فيه الناس هو ما ذكرته، لا يتعمَّده، بل يشبه عليه، وهو لا بأس به.
وفهم الذهبي من قول ابن عديٍّ هذا أنَّ باقي حديثه مستقيم، وهو مِمَّن يُكتَب حديثه .. وقال أبو حاتم: صدوق يُخطئ كثيرًا، فإذا قيل له لم يقبل.
وأمَّا الدارقطني؛ فقد سأله السُّلمي عنه، فقال: ضعيف. ونص على تضعيفه في السنن في أماكن كثيرةٍ.
والخُلاصة: أنَّه بين القبول والردِّ، وهنا لا بأس من قبول حديثه؛ لأجل كثرة الشواهد.
ذكره أيضًا الزيلعي في نصب الراية (1/ 184) وسكت عليه.
وقوله:"الموقين": أي الخُفَّين.
আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মোযাদ্বয়ের এবং মাথার আবরণের উপর মাসাহ করতে দেখেছি।
1653 - عن أبي أيوب أنه نزع خفيه، فنظروا إليه، فقال: أما إنِّي قد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح عليهما، ولكن حبّب إليّ الوضوء.
صحيح: أخرجه أحمد (23574) قال: حدَّثنا محمد بن عبيد، ثنا الأعمش، عن المسيب بن رافع، عن علي بن مدرك قال: رأيت أبا أيوب نزع خفيه، فذكره.
وإسناده صحيح، ومحمد بن عبيد هو ابن أبي أمية الطنافسي.
ورواه أيضًا الطبراني في الكبير (4040) من طريق محمد بن عبيد به.
ورواه أيضًا ابن أبي شيبة (1/ 176) والطبراني (3982) والبيهقي (1/ 293) كلهم من طريق منصور بن زاذان، عن ابن سيرين، عن أفلح مولى أيوب، عن أيوب، فذكر نحوه.
قال الحافظ في"المطالب العالية" (1/ رقم 100) بعد أن رواه من جهة ابن أبي شيبة:"إسناده صحيح".
وأخرجه الحارث في مسنده"بغية الباحث" (81) وعبد الرزاق (769) كلاهما من طريق محمد بن سيرين، عن أبي أيوب - بدون واسطة - ولم يرفعه.
আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি একবার তাঁর চামড়ার মোজা খুলে ফেললেন। লোকেরা তাঁর দিকে তাকাল। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে তিনি মোজার উপর মাসেহ করেছেন, কিন্তু আমার কাছে (পায়ের) ওযু করা প্রিয়।"
1654 - عن شُريح بن هانئ قال: أتيت عائشة أسألها عن المسح على الخفين، فقالت: عليك بابن أبي طالب فَسَلْه؛ فإنه كان يسافر مع رسول الله، فسألناه فقال: جعل رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاثةَ أيَّامِ ولياليهنَّ للمسافر، ويومًا وليلةً للمقيم.
صحيح: رواه مسلم في الطهارة (276) عن إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا الثوري، عن عمرو بن قيس المُلائي، عن الحكم بن عتيبة، عن القاسم بن مُخيمِرة، عن شُريح بن هانئ، قال: أتيتُ عائشة، فذكر الحديث.
قال مسلم: وكان سفيان إذا ذكر عمرو بن قيس أثنى عليه.
قلت: وهو في مصنف عبد الرزاق (1/ 203 رقم 789) كما رواه أيضًا عبد الرزاق (788) عن معمر، عن يزيد بن أبي زياد، عن القاسم بن مخيمرة به مثله.
শুরাইহ ইবনু হানি' থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম মোজার উপর মাসাহ করার বিষয়ে জিজ্ঞাসা করার জন্য। তিনি বললেন: তুমি ইবনু আবি তালিবের (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে যাও এবং তাকে জিজ্ঞাসা করো। কারণ তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফরে থাকতেন। অতঃপর আমরা তাকে (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে) জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসাফিরের জন্য তিন দিন ও তিন রাত এবং মুকিমের জন্য এক দিন ও এক রাত সময় নির্ধারণ করেছেন।
1655 - عن صفوان بن عسّال قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمرنا إذا كنّا سفرًا أن لا ننزع خفافنا ثلاثةَ أيَّامٍ ولياليهن إلَّا من جنابة، لكن من غائط وبول ونوم.
حسن: رواه الترمذي (96) والنسائي (126، 127) وابن ماجه (478) من حديث عاصم بن أبي النجود، عن زِرِّ بن حُبَيش، عن صفوان بن عسَّال، فذكر مثله.
قال الترمذي:"حسن صحيح". وقال: قال محمد (ابن إسماعيل البخاري): أحسن شيء في الباب حديث صفوان بن عسال.
وصححه أيضًا ابن خزيمة (196) وابن حبان (1100) من هذا الوجهِ.
قلت: رجاله ثقات غير عاصم بن أبي النجود، إلَّا أنه لا ينزل عن درجة"صدوق"، وله متابعات.
قال الترمذي:"وقد رُوِي هذا الحديث عن صفوان بن عسال أيضًا من غير حديث عاصم".
قلت: قال الحافظ في تلخيصه (1/ 157): وذكر ابن مندة أبو القاسم أنه رواه عن عاصم أكثر من أربعين نفسًا، وتابع عاصمًا عليه عبد الوهاب بن بخت، وإسماعيل بن أبي خالد، وطلحة بن مُصرِّف، والمنهال بن عمرو، ومحمد بن سوقه. وذكر جماعة معه، ومراده أصل الحديث؛ لأنه في الأصل طويل مشتمل على التوبة، والمرء مع من أحب. انتهى.
وقوله (سفرًا) جمع سافر، كما يقال: تأجر: تجر، راكب: ركْب.
وقوله (لكن من غائط وبول ونوم) قال الخطابي: كلمة (لكن) موضوعة للاستدراك، وذلك لأنه قد تقدمه نفي واستثناء، وهو قوله:"كان يأمرنا أن لا ننزع خفافنا ثلاثةَ أيَّامٍ ولياليهن إلَّا من
جنابة"، ثم قال:"لكن من بول وغائط ونوم"، فاستدركهـ بـ (لكن) ليُعِلمَ أنَّ الرخصة إنما جاءت في هذا النوع من الأحداث دون الجنابة؛ فإنَّ المسافر الماسح على خفه إذا أجنب كان عليه نزع الخف، وغسل الرجلين مع سائر البدن، وهذا كما تقول: ما جاءني زيد لكن عمرو، وما رأيت زيدًا لكن خالدًا. اهـ. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 179).
تنبيه: انظر هذا الحديث في كتاب العلم مُطوَّلًا كما رواه النسائي وغيره.
সাফওয়ান ইবন আস্সাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ করতেন, যখন আমরা সফরে থাকতাম, তখন যেন আমরা আমাদের মোজা (খুফ্ফাইন) তিন দিন ও তিন রাত পর্যন্ত না খুলি, তবে জানাবাতের (বড় নাপাকী) কারণে খুলতে হবে। কিন্তু পায়খানা, পেশাব ও ঘুমের (ছোট নাপাকী) কারণে (খোলার প্রয়োজন নেই)।
1656 - عن خزيمة بن ثابت عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"المسح على الخفين للمسافر ثلاثةَ أيَّامٍ، وللمقيم يوم وليلة".
صحيح: رواه أبو داود (1/ 109) عن حفص بن عمر، ثنا شعبة، عن الحكم وحماد، عن إبراهيم، عن أبي عبد الله الجدلي، عن خزيمة بن ثابت، فذكر الحديث.
قال أبو داود: رواه منصور بن المُعتمِر، عن إبراهيم التيمي بإسناده قال فيه:"ولو استزدناه لزادنا".
قلت: وإبراهيم في الإسناد الأول هو ابن يزيد النخعي الفقيه المشهور.
ورواه الترمذي (95) عن قتيبة، ثنا أبو عوانة، عن سعيد بن مسروق، عن إبراهيم التيمي، عن عمرو بن ميمون، عن أبي عبد الله الجدلي، عن خزيمة بن ثابت، فذكر الحديث مثل إبراهيم النخعي، ولم يذكر ما ذكره أبو داود عن منصور بن المُعتمِر، عن إبراهيم التيمي.
قال الترمذي: وذكر عن يحيى بن معين أنه صحَّح حديث خزيمة في المسح، وقال: أبو عبد الله الجدلي اسمه: عبد بن عبد، ويقال: عبد الرحمن بن عبد الله. كذا في بعض النسخ. ثم قال: هذا حديث حسن صحيح.
وصحّحه أيضًا ابن حبَّان (1329) من طريق إبراهيم التيمي به.
ورواه ابن ماجه (553) عن علي بن محمد، ثنا وكيع، ثنا سفيان، عن أبيه، عن إبراهيم التيمي، عن عمرو بن ميمون، عن خزيمة بن ثابت قال: جعل رسول الله صلى الله عليه وسلم للمسافر ثلاثًا، ولو مضى السائل على مسألته لجعلها خمسًا. وقال: حدَّثنا محمد بن بشّار، ثنا محمد بن جعفر، ثنا شعبة، عن سلمة بن كُهَيل، قال: سمعت إبراهيم التيمي، يُحدِّث عن الحارث بن سُوَيد، عن عمرو بن ميمون، عن خزيمة بن ثابت، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ثلاثةَ أيَّامٍ - أحسبه قال: - ولياليهن للمسافر في المسح على الخفين".
ونظرًا لوجود الاختلاف في الإسناد والمتن حكم عليه بعض أهل العلم بالاضطراب، وقالوا: إن فيه ثلاث علل:
الأولى: الاختلاف في الإسناد والزيادة في المتن.
الثانية: الانقطاع، قال البخاري: لا يصح عندي حديث خزيمة بن ثابت في المسح؛ لأنه لا يعرف لأبي عبد الله الجدلي سماع من خزيمة. كان شعبة يقول: لم يسمع إبراهيم النخعي من أبي
عبد الله الجدلي حديث المسح. انتهى
والثالثة: ذكر ابن حزم أن أبا عبد الله الجدلي لا يعتمد على روايته.
وأجاب عن هذه العلل بالتفصيل الشيخ تقي الدين ابن دقيق العيد في الإمام، والحافظ ابن القيم في تهذيب السنن.
وخلاصته: أن ما زاده بعض الرواة في المتن - وهو"لو استزدناه لزادنا"، وفي رواية ابن ماجه:"لجعلها خمسًا" - هذا كله ظن وحسبان، والحجة إنما تقوم بقول صاحب الشريعة لا بظن الراوي، فهذه الزيادة في المتن لا تعكر ما صحّ؛ لأن حديث خزيمة بن ثابت موافقٌ لما رواه غيره من الصحابة.
وأما الانقطاع - كما قال البخاري - فيحمل على مذهبه، وهو ثبوت اللقاء، والجمهور على ثبوت المعاصرة، وهو حاصل.
وأما قول ابن حزم فمردود؛ فإنَّ أبا عبد الله الجدلي وثقه الأئمة منهم أحمد ويحيى، وقد سبق أن صحّح الحديث ابن معين والترمذي.
وكون إبراهيم النخعي روي مرة عن عمرو بن ميمون، عن أبي عبد الله الجدلي، عن خزيمة؛ وأخرى عن أبي عبد الله الجدلي، فإنْ صحَّ ذلك فلعله سمعه من عمرو بن ميمون، عن أبي عبد الله الجدلي أوَّلًا، ثم تيسر له السماع عن أبي عبد الله الجدلي مباشرةً. فرواه عنه. ولهذا أمثلة كثيرة في كتب الحديث.
খুজাইমা ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মুসাফিরের জন্য মোজার উপর মাসেহ হলো তিন দিন এবং মুকীম (স্থায়ী বাসিন্দা)-এর জন্য একদিন ও এক রাত।”
1657 - عن أبي بكرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه رخص للمسافر - إذا توضأ ولبس خفيه، ثم أحدث وضوءًا - أن يمسح ثلاثةَ أيَّامٍ ولياليهن، وللمقيم يومًا وليلة.
حسن: رواه ابن ماجه (556) قال: حدَّثنا محمد بن بشّار وبشر بن هلال الصواف، قالا: حدَّثنا عبد الوهاب بن عبد المجيد قال: حدَّثنا المهاجر أبو مخلَد، عن عبد الرحمن بن أبي بكرة، عن أبيه، فذكر الحديث.
ورجاله ثقات غير المهاجر أبي مخلد؛ فليَّنه أبو حاتم. وقال الساجي: صدوق معروف. وهو قريب إلى"صدوق"؛ وقد صحّح الشافعي والخطابي وغيرهما هذا الحديث. انظر: التلخيص (1/ 157).
وأخرجه ابن خزيمة في صحيحه (192) وابن حبان (1324) كلاهما من طريق عبد الوهاب بن عبد المجيد به، ولفظه:"عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه رخَّص للمسافر ثلاثةَ أيَّامٍ ولياليهن، وللمقيم يومًا واحدًا إذا تطهّر فلبس خفَّيه أن يمسح عليهما".
قال الترمذي في علله الكبير: سألت محمدًا - يعني البخاري - أي حديث أصحّ عندك في التوقيت في المسح على الخفين؟ فقال: حديث صفوان بن عسال، وحديث أبي بكرة حديث حسن. انتهى. العلل الكبير (1/ 175 - 176).
আবু বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসাফিরের জন্য—যখন সে ওযু করে এবং তার মোজা পরিধান করে, অতঃপর তার ওযু ভেঙে যায়—তখন সে যেন তিন দিন ও তিন রাত মাসাহ করতে পারে। আর মুকীম (স্থায়ী বাসিন্দা)-এর জন্য এক দিন ও এক রাত।
1658 - عن عبد الله بن عمر قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرنا أن نمسح على الخفين يومًا وليلة في الحضر، وللمسافر ثلاثًا.
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط"مجمع البحرين" (1/ رقم 469) قال: حدَّثنا عبدان بن محمد المروزي، عن قتيبة بن سعيد، عن حميد بن عبد الرحمن الرواسي، عن الحسن القصاب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكر الحديث. وقال: لم يروِه عن نافع إلَّا الحسن.
ورجاله ثقات غير الحسن القصَّاب؛ فلم يوثقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات (6/ 161).
ورواه أيضًا من طريق عبد الرزاق: ثنا معمر، عن الزّهريّ، عن سالم أن عبد الله كان يمسح على الخفين، ويقول: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بذلك. قال الزيلعي: وهذا سند صحيح."نصب الراية" (1/ 173).
আব্দুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে আদেশ করেছেন যে, আমরা যেন মুকিম অবস্থায় একদিন ও একরাত এবং মুসাফিরের জন্য তিন দিন ও রাত মোজার উপর মাসাহ করি।
1659 - عن عوف بن مالك الأشجعي، أنَّ النبي صلى الله عليه وسلم أمر بالمسح على الخفين في غزة تبوك ثلاثة أيام ولياليهن للمسافر، ويومًا وليلةً للمقيم.
حسن: رواه أحمد (23995) والبزار (2757) والطبراني في الكبير (18/ 40) وفي الأوسط (1167) والدارقطني (1/ 197) كلهم من طريق هشيم، قال: أنبأنا داود بن عمرو، عن بسر بن عبيد الله الحضرمي، عن أبي إدريس الخولاني، عن عوف بن مالك الأشجعي، فذكر الحديث.
قال الطبراني: لا يُروى عن عوف إلَّا بهذا الإسناد؛ تفرد به هشيم.
وقال الهيثمي في"مجمع البحرين" (1/ 259): رجاله موثقون.
قلت: وهو كما قال غير أنَّهم اختلفوا في داود بن عمرو، وهو الأزدي الدمشقي؛ قال ابن معين: مشهور. وقال الدارمي: ثقة. وقال أبو زرعة: لا بأس به. وفي التقريب:"صدوق يخطئ".
وقد نقل البيهقي عن الترمذي أنه سأل البخاري عن هذا الحديث فقال: حديث حسن."السنن الكبرى" (1/ 275 - 277).
وهو الصواب؛ فإنَّ داود بن عمرو مع خفة ضبطه لم يُخطئ في هذا الحديث؛ فإنه روى على المشهور.
ونقل الزيلعي في"نصب الراية" (1/ 168) عن صاحب"التنقيح" قال أحمد: هذا من أجود حديث في المسح على الخفين؛ لأنه في غزوة تبوك، وهي آخر غزوة غزاها. انتهى
الأحاديث الصحيحة والصريحة تدل على توقيت المسح بثلاثة أيام ولياليهن للمسافر، - أي له أن يصلي خمس عشرة صلاة فقط -، ويوم وليلة للمقيم، - أي له أن يصلي خمس صلوات فقط - وبه قال الجمهور.
وأما الأحاديث الواردة في عدم التوقيت: فكلّها معلّلة، مثل حديث أبي بن عمارة قال: يا رسول الله! أمسح على الخفين؟ قال:"نعم"، قال: يومًا؟ قال:"يومًا" قال: يومين؟ قال:"يومين"، قال: ثلاثة؟ قال:"ثلاثة، وما شئت". رواه أبو داود (1/ 110) وقال: وقد اختلف في إسناده، وليس بالقوي. ورواه ابن أبي مريم ويحيى بن إسحاق والسليخي، عن يحيى بن أيوب،
وقد اختلف في إسناده. انظر: للمزيد:"المنة الكبرى" (1/ 181 - 182).
أو مثل حديث أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا توضأ أحدكم ولبس خفيه، فليصل فيهما، وليمسح عليهما، ثم لا يخلعهما إن شاء إلَّا من جنابة".
رواه الحاكم في المستدرك (1/ 181) وقال: صحيح على شرط مسلم، وقال أيضًا: رواته عن آخرهم ثقات.
وحمله ابن الجوزي على مدة الثلاث.
ومثله: حديث ميمونة، سألت النبي صلى الله عليه وسلم عن المسح فقالت: يا رسول الله! أكل ساعة بمسح الإنسان على الخفين ولا ينزعهما؟ قال:"نعم". رواه أحمد (26827) واللفظ له، وأبو يعلى (6/ رقم 7059) كلاهما من طريق أبي بكر الحنفي، ثنا عمر بن إسحاق بن يسار أخو محمد بن إسحاق، قال: قرأت كتابا لعطاء بن يسار مع عطاء بن يسار قال: سألت ميمونة رسول الله صلى الله عليه وسلم … ، فذكر الحديث. ولفظ أبي يعلى: قرأت لعطاء كتابا معه؛ فإذا فيه: حدثتني ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها قالت: يا رسول الله! أيخلع الرجل خفَّيه كل ساعة؟ قال صلى الله عليه وسلم: لا، ولكن يمسحهما ما بدا له".
ورواه أيضًا الدارقطني (1/ 199) من جهة أحمد بن حنبل، ونقل الهيثمي عن الدارقطني أنه قال: عمر بن إسحاق بن يسار ليس هو بالقوي. وقال: وذكره ابن حبان في الثقات. انظر:"مجمع الزوائد" (1/ 258).
قلت: وإن صحّ فهو محمول على التوقيت.
ومنها: حديث عقبة بن عامر الجُهَني أنه قدم على عمر بفتح دمشق قال: وعليّ خفان، فقال لي عمر: كم لك يا عقبة لم تتزع خفيك؟ فتذكرت من الجمعة إلى الجمعة، فقلت: منذ ثمانية أيام، قال: أحسنت وأصبت السنة.
رواه الدارقطني (1/ 199) من طريق حيوة، سمعت يزيد بن أبي حبيب يقول: حدثني عبد الله بن الحكم، عن علي بن رباح. ورواه الحاكم في المستدرك (1/ 180) من وجه آخر عن موسى بن علي بن رباح، عن أبيه، عن عقبة بن عامر. قال: صحيح على شرط مسلم
وقال الدارقطني في العلل: إن عمر بن الحارث ويحيى بن أيوب والليث بن سعد رووه عن يزيد فقالوا: أصبت، ولم يقولوا: السنة. وهو المحفوظ. وقال: ورواه جرير بن حازم، عن يحيى بن أيوب، عن يزيد بن أبي حبيب، عن علي بن رباح، عن عقبة. وأسقط من الإسناد عبد الله بن الحكم البلوي. وقال فيه: أصبت السنة كما قال ابن لهيعة. انتهى. انظر: نصب الراية (1/ 180).
قلت: والصحيح الثابت عن عمر بن الخطاب مثل الجمهور؛ ثلاثةَ أيَّامٍ للمسافر ويوم وليلة للمقيم، كما رواه عبد الرزاق (1/ 206 رقم 797) عن معمر، عن يزيد بن أبي زياد، عن زيد بن وهب الجُهَني قال: كنا بأذربيجان فكتب إلينا عمر بن الخطاب: أن نمسح على الخفين ثلاثًا إذا
سافرنا، وليلةً إذا أقمنا.
আওফ ইবনে মালিক আল-আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাবুক যুদ্ধে মুসাফিরের জন্য মোজার উপর তিন দিন ও তিন রাত এবং মুকীমের জন্য এক দিন ও এক রাত মাসাহ করার নির্দেশ দিয়েছিলেন।
1660 - عن المغيرة بن شعبة قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ، ومسح على الجوربين والنعلين.
حسن: رواه أبو داود (159) والترمذي (99) وابن ماجه (559) كلهم من حديث سفيان، عن أبي قيس الأودي، عن الهزيل بن شرحبيل، عن المغيرة بن شعبة، فذكر الحديث. ورواه الإمام أحمد (18206) من هذا الوجه.
وصحّحه ابن خزيمة (198)، وعنه ابن حبان (1338) كلّهم من حديث سفيان بإسناده، مثله.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: ورجاله ثقات غير أبي قيس، وهو عبد الرحمن بن ثَرْوان، اختلف فيه؛ فقال الامام أحمد: يخالف في أحاديثه، وقال أبو حاتم: ليس بقوِيٍّ. وقال النسائي: لا بأس به. ووثقه ابن معين والعجلي. وذكره ابن حبان في الثقات؛ فهو لا ينزل عن مرتبة"صدوق يهم"، وقال الحافظ في التقريب:"صدوق ربما خالف".
قال أبو داود: كان عبد الرحمن بن مهدي لا يحدث بهذا الحديث؛ لأن المعروف عن المغيرة أن النبي صلى الله عليه وسلم مسح على الخفين. وقال: ورُوي هذا الحديث عن أبي موسى الأشعري، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه مسح على الجوربين، وليس بالمتصل ولا بالقوي.
وقال أبو داود أيضًا: ومسح على الجوربين علي بن أبي طالب، وابن مسعود، والبراء بن عازب، وأنس بن مالك، وأبو أُمامة، وسهل بن سعد، وعمرو بن حُرَيْث، ورُوي عن عمر بن الخطاب، وابن عباس. انتهى.
ونقل البيهقيّ عن مسلم بن الحجّاج، وعبد الرحمن بن مهدي، والإمام أحمد، وابن معين تضعيف هذا الحديث."انظر السنن الكبري" (1/ 284).
وقال الدارقطني في"العلل" (7/ 112):"ولم يروه غير أبي قيس وهو مما يعدّ عليه به؛ لأنّ المحفوظ عن المغيرة المسح على الخفين".
وقد أطال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" في تعليل هذا الحديث، ونقل عن الإمام أحمد جواز المسح على الجوربين وتعليله رواية أبي قيس. وقال:"وهذا من إنصافه وعدله رحمه الله تعالى. وذكر ثلاثة عشر صحابيًّا ممن يروى عنهم المسح على الجوربين. وقال: عمدة هؤلاء الصّحابة صريح القياس، فإنه لا يظهر بين الجوربين والخفين فرق مؤثر، وقال: وهو قول أكثر أهل العلم منهم من سمينا من الصحابة، وأحمد، وإسحاق، وعبد الله بن المبارك، وسفيان الثوري، وعطاء بن أبي رباح، والحسن البصريّ، وسعيد بن المسيب، وأبو يوسف وقال: ولا نعرف في الصحابة مخالفًا لمن سميناه انتهى كلامه باختصار.
قلت: وأما الذين ذهبوا إلى تصحيح الحديث أو تحسينه رأوا أنه حديث مستقل؛ فإن المغيرة بن شعبة وصف وضوء النبي صلى الله عليه وسلم، فمنهم من روى عنه المسح على الخفين، وهؤلاء الأكثرون، ومنهم من روى عنه المسح على العمامة، ومنهم من روى عنه المسح على الجوربين، فهي أحاديث متعددة غير مخالفة، وإليه يشير الشيخ تقي الدين (ابن دقيق العيد) في الامام:"ومن يصحح يعتمد على تعديل أبي قيس على كونه ليس مخالفًا لرواية الجمهور مخالفة معارضة، بل هو أمر زائد على ما رووه، ولا يعارضه ولا سيما وهو طريق مستقل برواية هزيل عن المغيرة لم يشارك المشهورات في سندها". انظر: نصب الراية (1/ 185). والله أعلم بالصّواب.
মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ওযু করলেন এবং তিনি মোজা ও জুতার উপর মাসেহ করলেন।
1661 - عن ثوبان قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم سرية فأصابهم البرد، فلما قدموا على رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرهم أن يمسحوا على العصائب والتّساخين.
حسن: رواه أبو داود (146) عن أحمد بن محمد بن حنبل، ثنا يحيى بن سعيد، عن ثور، عن راشد بن سعد، عن ثوبان، فذكره. وهو في مسند الإمام أحمد (22383).
وإسناده حسن كما سبق في المسح على الخفين والعمامة.
و"التساخين": كلّ ما يُسخن به القدم من خُفٍّ وجورب وغير ذلك.
قال الترمذي: وهو قول غير واحد من أهل العلم، وبه يقول سفيان الثوري وابن المبارك والشافعي وأحمد وإسحاق، قالوا: يمسح على الجوربين وإن لم تكن نعلين إذا كانا ثخينين. قال: وفي الباب عن أبي موسى. وقال: وسمعت صالح بن محمد الترمذي قال: سمعتُ أبا مقاتل السمرقندي يقول: دخلت على أبي حنيفة في مرضه الذي مات فيه، فدعا بماء فتوضأ وعليه جوربان، فمسح عليهما، ثم قال: فعلت اليوم شيئًا لم أكن أفعله؛ مسحت على الجوربين وهما غير منعَّلين. انتهى.
قال شيخ الإسلام في فتاويه:"يجوز المسحُ على الجوربين، إذا كان يمشي فيهما، سواء كانت مجلدة، أو لم تكن، في أصحِّ قولي العلماء. ففي السنن: أنَّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم مسح على جوربيه ونعليه. وهذا الحديث إذا لم يثبت فالقياس يقتضي ذلك. فإنَّ الفرق بين الجوربين والنعلين إنَّما هو كون هذا من صوفٍ، وهذا من جلودٍ. ومعلوم أنَّ مثل هذا الفرق غير مؤثِّرٍ في الشريعة، فلا فرق بين أن يكون جلودًا أو قطنًا، أو كتَّانًا، أو صوفًا، كما لم يُفرق بين سواد اللباس في الإحرام وبياضه، وغايته أنَّ الجلد أبقى من الصوف، فهذا لا تأثير له، كما لا تأثير لكون الجلد قويًّا، بل يجوز المسح على ما يبقى وما لا يبقى.
وأيضًا فمن المعلوم أن الحاجة إلى المسح على هذا الحاجة إلى المسح على هذا سواء. ومع التساوي في الحكمة والحاجة يكون التفريق بينهما تفريقًا بين المتماثلين. وهذا خلاف العدل والاعتبار الصحيح الذي جاء به الكتاب والسنة، وما أنزل الله به من كتبه، وأرسل به رسله.
ومن فرَّق بكون هذا ينفذ الماء منه، وهذا لا ينفذ منه فقد ذكر فرقًا طرديًّا عديم التأثير. ولو قال قائل: يصل الماء إلى الصوف أكثر من الجلد، فيكون المسح عليه أولى للصوق الطَّهور به أكثر، كان هذا الوصف أولى بالاعتبار من ذلك الوصف، وأقرب إلى الأوصاف المؤثِّرةِ. وذلك أقرب إلى الأوصاف الطردية، وكلاهما باطلٌ". انتهى.
وفي الباب حديث أبي موسى الذي أشار إليه أبو داود والترمذي رواه ابن ماجه (560) أن النبي صلى الله عليه وسلم توضأ ومسح على الجوربين والنعلين. رواه عن محمد بن يحيى، ثنا مُعلَّى بن منصور وبشر بن آدم قالا: ثنا عيسى بن يونس، عن عيسى بن سِنان، عن الضحاك بن عبد الرحمن بن عَرْزَب، عن أبي موسى الأشعري، فذكر الحديث.
وفيه علتان كما قال أبو داود:
الأُولى: ليس بمتصل؛ لأن الضحاك بن عبد الرحمن لم يدرك أبا موسى الأشعري.
والثانية: ليس بالقوي؛ لأن عيسى بن سنان الراوي عن الضحاك ضعيف؛ ضعَّفه أحمد وابن معين وأبو زرعة والنسائي وغيرهم.
সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি অভিযান দল (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করলেন। অতঃপর তারা ঠান্ডার শিকার হলেন। যখন তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ফিরে আসলেন, তখন তিনি তাদেরকে মাথা বাঁধা পট্টিসমূহ (আল-আসায়িব) এবং মুজার (আত-তাসাকীন) উপর মাসাহ করার নির্দেশ দিলেন।
1662 - عن عبيد بن جريج، أنَّه قال لعبد الله بن عمر: يا أبا عبد الرحمن! رأيتك تصنع أربعًا لم أر أحدًا من أصحابك يصنعها. قال: وما هُنَّ يا ابن جريج؟ فذكر من الأربع: رأيتك تلبس النِّعال السِّبْتِيَّة. فقال: وأمَّا النعال السِّبْتِيَّة؛ فإني رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يلبس النعال التي ليس فيها شعرٌ، ويتوضَّأ فيها. فأنا أُحبُّ أن ألبسها.
متّفق عليه: رواه مالك في الحجِّ (31) عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن عبيد بن جريج .. فذكر الحديث.
ورواه البخاري في الوضوء (166)، وفي اللباس (5805)، عن عبد الله بن يوسف، ومسلمٌ في الحجِّ (1187)، عن يحيى بن يحيى - كلاهما عن مالك به. وسيأتي الحديث كاملًا في الحجِّ.
وبوَّب عليه البخاري بقوله: غسل الرجلين في النعلين، ولا يمسح على النعلين.
ومطابقة الحديث للترجمة في قوله:"ويتوضَّأُ فيها"، فإنَّ ظاهره: كان صلى الله عليه وسلم يغسل رجليه وهما في نعلين، ولو أراد المسيح لقال:"عليهما".
ولكن رواه سفيان، عن محمد بن عجلان، عن المقبري، فزاد فيه:"ومسح عليهما". هكذا رواه ابن خزيمة (199) ومن طريقه البيهقي (1/ 287) وقال:"وهذه الزيادة إن كانت محفوظة فلا تنافي غسلهما، فقد يغسلهما في النعل ويمسح عليهما كما مسح بناصيته وعلى عمامته". انتهى.
وقوله:"السِّبْتِيَّة" بكسر المهملة. هي التي لا شعر فيها، مشتقَّة من السبت، وهو الحلق، أو
لأنّها سبتت بالدِّباغِ، أي لانت.
وأمَّا ما رُوي عن يعلى بن عطاء، عن أبيه، قال: أخبرني أوس بن أبي أوس الثقفي، أنَّه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم، أتي كِظَام قومٍ - وفي لفظٍ: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم أتى كِظامةَ. يعني - ميضأة - فتوضّأ ومسح على نعليه وقدميه. فهو حديثٌ معلولٌ رواه أبو داود (160) قال: حدَّثنا مسدد، وعباد بن موسى، قالا: حدَّثنا هُشيم، عن يعلى بن عطاء، عن أبيه.
ورجاله ثقات، غير عطاء - والد يعلى، وهو العامري -، فهو مجهولٌ كما قال ابن القطَّان، وفي"التقريب""مقبول، أي إن توبع، وحيث لم نجد له متابعًا فهو ليِّن الحديث، مع اختلاف فيه؛ فقد رواه أحمد (16158) من حديث شعبة، قال: حدَّثني يعلى، عن أبيه، ولفظه:"رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم توضَّأ ومسح على نعليه، ثمَّ قام إلى الصلاة".
وخالفه حمَّاد بن سلمة؛ فلم يقل: (عن أيه)، وإنَّما رواه عن يعلى بن عطاء، عن أوس بن أبي أوس، قال:"رأيت أبي توضَّأ فمسح على نعليه، فقلت: أتمسح على النعلين؟ فقال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح عليهما".
ومن هذا الوجه رواه الإمام أحمد (16165) وابن حبَّان (1339).
قال البيهقي:"فيه انقطاع، وهذا إسناد غير قوي".
قلت: وهو يشير إلى الانقطاع بين يعلى بن عطاء، وبين أوس بن أبي أوس، وقوله: غير قوي - إشارة إلى مخالفة حمَّاد بن سلمة لهشيم وشعبة، وفي إسنادهما والد يعلى، وهو مجهولٌ كما سبق.
والخلاصة فيه كما قال الحازمي (62 - 63):"لا يُعرف هذا الحديث مجوَّدًا متَّصلًا إلَّا من حديث يعلى بن عطاء، وفيه اختلافٌ أيضًا، وعلى تقدير ثبوته ذهب بعضهم إلى نسخه". وقال أيضًا:"ومع هذا الاضطراب لا يمكن المصير إليه، ولو ثبت كان منسوخًا كما قاله هشيم".
وأمَّا تعقيب ابن التركماني على البيهقي، بأنَّه أخرجه ابن حبَّان في صحيحه، فالاحتجاج به كافٍ .. فالصواب أنَّه ليس بكافٍ؛ لأنَّ فيه والد يعلى وهو مجهولٌ كما سبق، وابن حبَّان اشتهر بتوثيق المجاهيل كما هو معروف.
كذلك ما رُوي عن ابن عباس، أنَّه رأى رسول الله صلى الله عليه وسلم توضَّأ مرَّة مرَّة، ومسح على نعليه. فلا يصحُّ.
رواه البيهقي (1/ 286) وقال: هكذا رواه رواد بن الجراح، وهو ينفرد عن الثوري بمناكير، وهذا أحدها، والثقات رووه عن الثوري، دون هذه اللفظة، وروي عن زيد بن الحباب، عن الثوري هكذا، وليس بمحفوظ. انتهى.
وكذلك لا يصحُّ ما رُويَ عن علي بن أبي طالب، أنَّه دعا بِكُوز من ماءٍ، ثمَّ توضَّأ وضوءًا خفيفًا، ثمَّ مسح على نعليه، ثمَّ قال: هكذا وضوء النبيّ صلى الله عليه وسلم، للطاهرِ ما لم يُحِدث. رواه ابن خزيمة (200) والبيهقي (1/ 75). فإنَّ في إسناده إبراهيم بن أبي الليثِ، وهو متروك الحديث كما
قال الذهبي في"الميزان".
وعلى فرض صحَّته عن علي بن أبي طالب، فذكر البيهقي عدَّة تأويلات منها: أنَّه توضَّأ وضوءًا متطوَّعًا به، لا وضوءًا واجبًا عليه، وإليه أشار علي بن أبي طالبٍ في قوله:"هذا وضوء من لم يُحِدث" رواه ابن حبان (1340) بإسناد صحيح، موقوفًا عليه، أو أراد غسل الرجلين في النعلين كما قال البخاري، أو أراد به المسح على الجوربين؛ لأنَّ الثابت عنه أنَّه غسل الرجلين، وهو الثابت عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم.
আব্দুল্লাহ ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উবাইদ ইবন জুরাইজ তাকে বললেন: হে আবূ আবদুর রহমান! আমি আপনাকে চারটি কাজ করতে দেখেছি, যা আপনার বন্ধুদের (সাহাবীগণের) মধ্যে অন্য কাউকে করতে দেখিনি। তিনি বললেন: হে ইবন জুরাইজ! সেগুলো কী? অতঃপর তিনি (ইবন জুরাইজ) চারটি কাজের মধ্যে একটির কথা উল্লেখ করে বললেন: আমি আপনাকে সাবতিয়্যা জুতা পরতে দেখেছি। তিনি (ইবন উমার) বললেন: সাবতিয়্যা জুতাসমূহের কথা যদি বল, তাহলে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এমন জুতা পরতে দেখেছি, যাতে কোনো পশম ছিল না এবং তিনি তা পরিধান করে উযু করতেন। তাই আমি তা পরতে পছন্দ করি।
1663 - عن علي بن أبي طالب قال: لو كان الدين بالرأي لكان أسفل الخفّ أولى بالمسح من أعلاه، وقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح على ظاهر خُفَّيهِ.
صحيح: رواه أبو داود (162) قال: حدَّثنا محمد بن العلاء، ثنا حفص - يعني ابن غياث - عن الأعمش، عن أبي إسحاق، عن عبد خير، عن علي، فذكره.
ورجاله ثقات غير أبي إسحاق، وهو ثقة عابد إلَّا أنه اختلط، وكان الأعمش من أوثق تلاميذه.
ثمَّ رواه أبو داود بإسناد آخر عن الأعمش به ولفظه، قال:"ما كنت أرى باطن القدمين إلَّا أحق بالغسل، حتَّى رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يمسح على ظهر خفيه". وفي رواية أُخرى مثله أيضًا جميعًا من طريق الأعمش.
ثم قال أبو داود: ورواه أبو السوداء، عن ابن عبد خير، عن أبيه قال: رأيت عليًّا توضَّأ فغسل ظاهر قدميه وقال: لولا أنِّي رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعله. وساق الحديث. انظر للمزيد:"المدخل إلى السنن الكبرى للبيهقي" (219).
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: যদি দ্বীন যুক্তিনির্ভর হতো, তাহলে মোজার উপরিভাগের চেয়ে তার নিচের অংশই মাসেহ করার জন্য বেশি উপযোগী হতো। অথচ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মোজার উপরিভাগের উপর মাসেহ করতে দেখেছি।
1664 - عن المغيرة بن شعبة قال: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يمسح على الخفين، على ظاهرهما.
حسن: رواه أبو داود (161) عن محمد بن الصباح البزار، كما رواه أيضًا الترمذي (98) عن علي بن حُجْر، كلاهما عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، عن أبيه، عن عروة بن الزبير، عن المغيرة بن شعبة، فذكر الحديث. واللفظ للترمذي، ولفظ أبي داود:"كان يمسح على الخفين".
قال أبو داود: وقال غير محمد (يعني ابن الصباح البزار):"على ظهر الخفين".
وفيه إشارة إلى أن الذي قال:"على ظهر الخفين" هو: علي بن حُجر.
ولكن اختُلِف على عبد الرحمن بن أبي الزناد؛ فروى عنه محمد بن الصباح وعلي بن حُجر كما ترى عن أبيه، عن عروة بن الزبير، ولكن رواه أبو داود الطيالسي (رقم 727 بتحقيق الدكتور التركي) وعنه البيهقي (1/ 291) عن ابن أبي الزناد، عن أبيه، عن عروة بن المغيرة، عن المغيرة بن شعبة أن النبي صلى الله عليه وسلم مسح ظاهر خفيه.
ثم قال البيهقي: كذا رواه أبو داود الطيالسي عن عبد الرحمن بن أبي الزناد. وكذلك رواه إسماعيل بن موسى عن ابن أبي الزناد. ورواه سليمان بن داود الهاشمي ومحمد بن الصباح وعلي بن حجر عن ابن أبي الزناد، عن أبيه، عن عروة بن الزبير، عن المغيرة. انتهى.
فالظاهر أن عبد الرحمن بن أبي الزناد أخطأ في تعيين عروة، ولا يضر هذا الخطأ؛ لأنه تردد بين الراويين الثقتين: عروة بن الزبير وعروة بن المغيرة.
وأما عبد الرحمن بن أبي الزناد فمختلف في توثيقه، والخلاصة: أنَّه صدوق فقد وثَّقه العجلي، وقال ابن عدي: هو ممن يكتب حديثه. وأما ابن معين فقال: ليس بشيء. وقال النسائي: لا يحتج بحديثه.
قلت: ومثل هذا يستشهد به، ولذا حسنه الترمذيّ.
মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাঁর মোজার (খুফফাইন) উপরিভাগের ওপর মাসাহ করতে দেখেছি।
1665 - عن * *
১৬৬৫ - ...থেকে * *
1666 - عن عائشة أم المؤمنين أنها قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره، حتَّى إذا كان بالبيداء، أو بذات الجيش انقطع عِقْدٌ لي، فأقام رسول الله صلى الله عليه وسلم على التِماسِه، وأقام الناسُ معه، وليسوا على ماءٍ، وليس معهم ماءٌ، فأتى الناسُ إلى أبي بكر الصديق فقالوا: ألا تَرى ما صنعتْ عائشةُ؟ أقامتْ برسول الله صلى الله عليه وسلم وبالناس، وليسوا على ماءٍ وليس معهم ماءٌ، قالت عائشة: فجاء أبو بكر ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم واضعٌ رأسَه على فخذي قد نام، فقال: حبستِ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم والناسَ، وليسوا على ماءٍ وليس معهم ماءٌ؟ قالت عائشة: فعاتبني أبو بكر، فقال ما شاء الله أن يقول، وجعل يَطْعن بيده في خاصِرتي، فلا يمنعني من التحرك إلَّا مكانُ رأسِ رسول الله صلى الله عليه وسلم على فخذي، فنام رسول الله صلى الله عليه وسلم حتَّى أصبح على غير ماء، فأنزل الله تبارك وتعالى آيةَ التيمم، فتيمّموا.
فقال أُسَيدُ بن حُضَيرْ: ما هي بأوَّلِ بركِتكم يا آلَ أبي بكر!
قالت: فبَعثْنا البعير الذي كنتُ عليه، فوجدنا العِقْد تحتَه.
متفق عليه: رواه مالك في الطهارة (89) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، واللفظ له، ومن طريقه البخاري في التيمم (334) ومسلم في الحيض (367). وفي رواية عند البخاري في التفسير (4608) من طريق عمرو، عن عبد الرحمن بن القاسم: سَقَطَت قِلادة لي بالبيداء، ونحن داخلون المدينة، فأناخ رسول الله صلى الله عليه وسلم ونزل، فثنى رأسه في حِجْري راقدًا، أقبل أبو بكر، فلكزني لكزةً شديدةً وقال: حبَستِ الناس في قِلادة؟ فبِيَ الموتُ لمكان رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد أوجعني، ثم إن رسول الله صلى الله عليه وسلم استيقظ وحضرتِ الصبحُ، فالتُمِس الماء فلم يوجد فنزلت … وفي رواية عند مسلم من وجه آخر عن هشام، عن أبيه، عن عائشة: أنها استعارت من أسماء قِلادةً فهلكت، فأرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم ناسًا من أصحابه في طلبها، فأدركتهم الصلاةُ فصَلُّوا بغير وضُوء، فلما أتوا النبي صلى الله عليه وسلم شَكوا ذلك إليه، فنزلت آية التيمم.
فقال أسيد بن حُضير: جزاك الله خيرًا؛ فوالله! ما نزل بك أمرٌ قط إلَّا جعل الله لكِ منه مخرجًا، وجعل للمسلمين فيه بركةً.
قولها:"فبي الموت" أي كاد ينزل بي الموت من شدّة الوجع، ولم أتحرك حتَّى لا أزعج رسول الله صلى الله عليه وسلم.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি উম্মুল মু’মিনীন, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে তাঁর কোনো এক সফরে বের হলাম। যখন আমরা বায়দা নামক স্থানে বা যাতুল জাইশ নামক স্থানে পৌঁছলাম, তখন আমার একটি হার ছিঁড়ে পড়ে গেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা খোঁজার জন্য অবস্থান করলেন এবং লোকেরাও তাঁর সাথে অবস্থান করল। তারা এমন এক স্থানে ছিল, যেখানে কোনো পানি ছিল না এবং তাদের সাথেও কোনো পানি ছিল না।
তখন লোকেরা আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে বলল: আপনি কি দেখছেন না, আয়েশা কী করেছে? সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং সকল মানুষকে এমন স্থানে আটকে রেখেছে, যেখানে কোনো পানি নেই এবং তাদের কাছেও কোনো পানি নেই!
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন আমার উরুর উপর মাথা রেখে ঘুমিয়ে ছিলেন। তিনি (আবূ বকর) বললেন: তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং সকল মানুষকে আটকে রেখেছ, অথচ এখানে কোনো পানি নেই এবং তাদের সাথেও কোনো পানি নেই?
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আবূ বকর আমাকে তিরস্কার করলেন এবং আল্লাহ যা বলার ইচ্ছা করেছেন, তা বললেন। তিনি নিজের হাত দিয়ে আমার কোমরের দু'পাশে খোঁচা দিতে লাগলেন। কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা আমার উরুর ওপর থাকার কারণেই আমি নড়াচড়া করা থেকে বিরত ছিলাম।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানেই ঘুমিয়ে রইলেন, এমনকি সকাল হয়ে গেল, তখনও সেখানে কোনো পানি ছিল না। তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তায়াম্মুমের আয়াত নাযিল করলেন। ফলে তারা তায়াম্মুম করল।
তখন উসাইদ ইবনু হুদ্বাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ বকরের পরিবার! এটিই তোমাদের প্রথম বরকত নয়!
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমরা আমার উটটিকে উঠালাম, যার উপর আমি ছিলাম, আর তার নিচেই আমরা হারটি খুঁজে পেলাম।
অন্য এক বর্ণনায় উসাইদ ইবনু হুদ্বাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ আপনাকে উত্তম প্রতিদান দিন! আল্লাহর কসম, আপনার উপর এমন কোনো বিপদ আসেনি, যার কারণে আল্লাহ আপনার জন্য কোনো পথ বের করেননি এবং মুসলিমদের জন্য তাতে বরকত রাখেননি!
1667 - عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: جُعِلت لي الأرض مسجدًا وطهورًا، فأيما رجل من أُمَّتي أدركته الصلاة فليصل".
متفق عليه: أخرجه البخاري في التيمم (335) ومسلم في المساجد (521) كلاهما من طريق هشيم، عن سيار، عن يزيد الفقير، عن جابر بن عبد الله .. فذكر الحديث.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার জন্য গোটা পৃথিবীকে মসজিদ এবং পবিত্রতাকারী (তহূর) রূপে নির্ধারণ করা হয়েছে। সুতরাং আমার উম্মতের যে কোনো ব্যক্তির যখনই সালাতের সময় হবে, সে যেন সালাত আদায় করে নেয়।"
